मंगलवार, 11 मई 2010

बहुत याद आता है , नीम का वो पेड़

कुछ दिन पहले मॉर्निंग वाक पे मेरी सहेली ने, फलों से लदे एक कटहल के पेड़ को दिखाते हुए कहा, '.तुम्हे पता है...कटहल जड़ों के पास  भी फलते हैं'.मैने कहा 'हाँ...मैने भी देखा है'..फिर वो बताने लगी कि केरल के एक गाँव में उसकी मौसी के घर के पास एक कटहल का पेड़ है, वहाँ उसने बड़े बड़े कटहल ..जड़ों के पास फले हुए देखे हैं..कल उसकी मौसी  का फोन आया और वह बहुत दुखी है क्यूंकि उस पेड़ को लोग काटने वाले हैं..वह इतना बड़ा हो  गया है और आंधी में इतने जोरों से हिलता है कि कभी भी उनके घर पर गिर  सकता है...उसकी मौसी बहुत दुखी थी..मेरी सहेली भी दुखी थी..उसकी बचपन की स्मृतियाँ जुड़ी थीं उस पेड़ से.
और मुझे एकदम से अपने गाँव का नीम का पेड़ याद आ गया.
जब भी गाँव जाती...दिन में दस बार दो शब्द  जरूर कानों में पड़ते.."नीम तर" ..बच्चे कहाँ खेल रहें हैं  हैं,"नीम तर"....बाबा  कहाँ बैठे हैं..नीम तर'...प्रसाद काका कहाँ हैं..'नीम तर'

और एक बार जब गाँव गयी और फिर अपने प्रियस्थल ' नीम तर' गई तो देखा वहाँ नीम का पेड़ नहीं था,बल्कि एक आलीशान भवन खड़ा था.
और अपने घर के दालान में छुपकर यह कविता लिखी थी. तब से वह इस डायरी से उस डायरी में रीन्यू होती रही..और अब तो बरसों से उनके पन्ने भी नहीं पलटे. उस दिन आकर ढूंढ कर निकाला. और कुछ ब्लॉग मित्रों को दिखाया..क्यूंकि 'कविता' मेरी विधा नहीं है..और कांफिडेंस भी नहीं था..उन्हें बहुत पसंद आई और एक लम्बा सा wowwwwww  भी लिख दिया प्रतिक्रिया में शायद मेरा उत्साह बढाने को :)


और  भारत एक है का एक और सजीव उदाहरण...केरल के एक छोटे से गाँव के कटहल  के पेड़ ने बिहार के एक गाँव के नीम के पेड़ से अपने दुख बांटे

 बहुत याद आता है , नीम का वो पेड़

 बहुत दिनों बाद आई , बिटिया
हवा में घुली,मिटटी की सोंधी महक ने , जैसे की हो शिकायत

पाय लागू काकी, राम राम काका,  रामसखी कईसी हो तुम
पूछते चल पड़े, डगमग से.  विकल कदम,
मिलने को उस बिछड़े साथी से,
दिया था जिसने साथ,हरक्षण , हरदम

शाम होते ही उसकी शाखाओं पर गूंजता,पंछियों  का कलरव
जड़ों के पास लगा होता,बच्चों का जमघट
मेघों का कोमल तम, श्यामल तरु से छन
आलस दूर करता , लालसा भरता गोपन

रात होती और जमा होती बहुएं,घर घर से
जो दिन के उजाले में होती किवाड़ों के पीछे,
बड़े बूढों के डर से.
हंसी ठिठोली होती
बांटे जाते राज
पोंछे जाते आंसू
और समझाई जाती बात

मनाया था,इस नीम के पेड़ ने ,उन रूठे बेटों को
जो,घर से झगड़ ,आ बैठते थे,इसकी छाँव
दिया था दिलासा,उस रोती दुल्हन को
जब रखी,  उसकी डोली कहारों ने
और सुस्ताने बैठे थे पल भर ,इस ठांव.

इसकी कोमल दलों  ने दुलार से
सहलाया था,उन फफोलों को
जब निकलती थी माता
गाँव के मासूम  नौनिहालों  को.


पहनी रहती ,बच्चियां
नीम के खरिकों के छोटे छोटे टुकड़े
नाक-कान छिदवाने के बाद.
ताकि,पहन सकें झुमके और नथ
जब लें फेरें अपने साजन के साथ.

सुबह होती,बांटता सबको दातुन
गाँव की चमकती हंसी रहें,सलामत
औषधीय गुणों से, स्वस्थ रखे तन मन
जैसे हो इसका गंगा पुत्र जैसा, भीष्म प्रण
.

मार्तंड  की  प्रचंड  किरणों  से बचने
रोटी,प्याज,मिर्ची,नमक की लिए पोटली.
पी, ठंडा पानी कुंए  का,शीतल छाया के नीचे
चला  आता  किसान , विश्राम  हेतु , घडी दो घड़ी.


आता दशहरा और खेली जाती रामलीला
सजती चौपाल भी और किए जाते फैसले
चुप खड़ा देखता नीम, इस जग की लीला
देखता  बदलती  दुनिया  और  जग  के  झमेले .

तेज होती गयी  चाल,याद करते एक-एक पल.
अब मिलने को मन हो रहा था ,बहुत ही विकल
पर झूमता,इठलाता,खुद पर इतराता
कहाँ था वह नीम का पेड़??
खड़ा था,वहाँ  एक लिपा-पुता बेजान भवन
दंभी ,अभिमानी ,व्योम  से नजरे मिलाता .


 तीक्ष्ण  सूरज  दिखा रहा था  नाराजगी,सर पर चढ़ के
नहीं थी शीतल छाँव नीम की, ना  ही  वो  नीम  बयार
 कुपित  हुई धरा  ,गाँव तो अनाथ हो गया हो जैसे.
शिथिल  कदम  लौट  चले , यादों में संजोये उस नीम का प्यार.


52 टिप्‍पणियां:

  1. रश्मि जीईईईईईईईईईईई ! इरादा क्या है? अब गद्ध के साथ काव्य पर भी कब्ज़ा करना है क्या ? जबरदस्त्त भाव हैं और शानदार तरीके से बुने हैं आपने ..में न कहती थी कि आजमाओ ये विधा ...
    बहुत ही खूबसूरत लिखा है.

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  2. तुम तो कमाल करती हो, जिसको छू दिया वो सोना हो गया, क्या अभिव्यक्ति है, लगता है कि नीम का पेड़ एक सजीव चित्रण बन गया है , ये तो कलम का कमाल है और तुम्हारी भी कूची पकड़ दो तो रंग दो संसार औरकलम है तो रच दिया विस्तार.

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  3. याद कुछ आई इस क़दर भूली हुई कहानियां
    सोये हुए दिलो में दर्द जगा के रह गयी ..

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  4. आपकी पोस्ट पढ़कर... कुछ यादें ताज़ा हो गईं...

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  5. अरे रेखा जी..शिखा...बस...बस...आपलोगों को ही तो दिखाया था...और आपलोगों के ok करने के बाद ही हिम्मत की, पोस्ट करने की..बहुत बहुत शुक्रिया इस हौसलाअफजाई के लिए ..

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  6. रश्मि,

    बहुत बढ़िया....कविता में कहानी कह दी....सारे दृश्य आँखों के सामने आ गए....गांव का माहौल मुखरित हो गया...


    पर भाई कुछ तो हमारे लिए छोड़ दो....:):):)


    बहुत अच्छी रचना.....आगे भी इस विधा में तुम्हारे लेखन का इंतज़ार रहेगा .

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  7. फिरदौस, निर्झर नीर.,संजय जी...आप सबका शुक्रिया

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  8. रश्मि जी बहुत बेहतरीन कविता मै तो पढ़ते पढ़ते खो सा गया गया गाँव की यादो में ,,, आपने एक एक पल को जिस संजीदगी और करीने से सजोया है अदभुद है ,,,, साथ ही ग्रामीण रीती रिवाजो और और परम्पराओं को जिस तरह से कविता में समाहित किया है येसा लगता जैसे वो चीजे प्रत्यछ हो रही हो और हम उसके द्रष्टा नहीं भुक्त भोगी हो ,,, नीम से जुडी हर घटना के साथ खुद का जुड़ाव सा महसूश होता है ,,,,सबसे अच्छी बात ये लगी की जड़ नीम भी हमें मानवीय संवेदनाओं से भरा लगने लगा और उसके विछुड़ने और उस के साथ बिताये पल हर रश और भाव लिए है ,,,,,
    पहनी रहती ,बच्चियां
    नीम के खरिकों के छोटे छोटे टुकड़े
    नाक-कान छिदवाने के बाद.
    ताकि,पहन सकें झुमके और नथ
    जब लें फेरें अपने साजन के साथ
    सादर
    प्रवीण पथिक
    9971969084

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  9. दी.. क्या कमाल की कविता लिखी है!!! अब हम बच्चों की बात लगने वाली है.. :)
    सच कहा बहुत तकलीफ होती है जब कुछ सोच के रखा हो मन में और वो ना मिले.. जैसे कोई नीम का पेड़ :(
    शानदार और जानदार लेख.. लिप्टन टाइगर की तरह..

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  10. बहुत बढ़िया लिखा है, रश्मि जी बचपन की कुछ यादें ताजा की दी आपने

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  11. 'नीम का पेड़' धारावाहिक याद आया।

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  12. विधा तो आपका कमाल है, और इतना जबरदस्त.......

    मार्तंड की प्रचंड किरणों से बचने
    रोटी,प्याज,मिर्ची,नमक की लिए पोटली.
    पी,ठंढा पानी कूए का,शीतल छाया के नीचे
    चला आता किसान , विश्राम हेतु , घडी दो घड़ी.

    विस्मयविमुग्ध हूँ

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  13. बड़ी खूबी से कविता ने बाँध कर रखा ,
    देखता नीम, इस जग की लीला
    देखता बदलती दुनिया और जग के झमेले .
    और ज़माना इतना बदल गया कि बूढ़े नीम को अपना अस्तित्व ही गंवाना पड़ा ।

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  14. बहुत सुन्दर भावपूर्ण रचना , रश्मी जी , पुरानी यादे सचमुच कभी-कभार बहुत कुरेदती है दिमाग को !
    स्वार्थ और लालच बस
    काट डाला उस नीम के पेड़ को,
    कभी वात्सल्य बिखेरा था ममता ने
    जिस पेड़ की छाँव से!
    अबके यूँ भी मेरी माँ ने
    मदर्स डे पर ख़त नहीं भेजा गाँव से !!

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  15. बहुत अच्छी प्रस्तुति।
    राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।

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  16. रश्मि दी, जब कोई बात दिल से कही जाती है, तो वह किसी भी विधा में हो दूसरों के दिल तक पहुँचती है... कविता भावनाओं की अभिव्यक्ति के लिये सबसे सटीक विधा है... मुझे लगता है, जब हृदय भावपूरित हो जाता है, तो जो भाव छलक पड़ते हैं, वही कविता कहला उठते हैं... मैं बचपन से ही कवितायें लिख रही हूँ और अभी तक सीख नहीं पायी हूँ. क्योंकि शिल्प पर मैंने कभी ध्यान नहीं दिया और न देना चाहती हूँ. मुझे लगता है दिल से निकली बात कच्ची-पक्की जैसी भी हो, उसे नैसर्गिक रूप में रखना ज्यादा अच्छा है... पर ये मुझे लगता है. शिल्प पर थोड़ा बहुत ध्यान तो देना ही पड़ता है...
    मुझे ये कविता बहुत अच्छी लगी... मुझे भी गाँव का वो आम का पेड़ याद आ गया, जो हमारे दुआरे पर था. बँटवारे के बाद चाचा के हिस्से पड़ा और उन्होंने इसी डर से कटवा दिया कि सौ साल पुराना वो पेड़ कहीं उनके नये-नवेले घर पर न गिर जाये... खैर अब वहाँ नये-नये आम के पेड़ खड़े हैं... चाचा ने एक काटा और चार लगाये... अगर हम सभी यही करें... तो पेड़ों की कमी न हो... पर फिर भी उस पेड़ से जो नाता होता है, उससे जुड़ी यादें होती हैं... वो भुलाई नहीं जा सकतीं.

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  17. पेड़ पड़ जाता है
    दिलों से जुड़ जाता है
    कैसे ही काट डालो
    जड़ों से गहरा अपनापा है।

    पेड़ प्रण हो जाए
    एक काटो मजबूरी में
    तो चार अवश्‍य दो लगाये
    सारा पर्यावरण ही सुधर जाये।

    कविता पढ़ कर कविता ही लिखी जा रही है।

    @ रेखा श्रीवास्‍तव
    रश्मि जी तो पारस हैं
    जिस विधा को छू भर देंगी
    वो तर जाएगी
    मन में घर कर जाएगी।

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  18. सुन्दर और आत्मीय लगी आपकी कविता. गुनी लोगों की टिप्पणियों के बाद मेरे लिए कहने को कुछ बचा नहीं है , लेकिन दिल को पुरसुकून देती हुई कविता , प्रकृति से आपका लगाव सराहनीय है . आपकी इस कविता से मुझे डॉराही मासूम रजा का नीम का पेड़ याद आया , और मै बुधई को साधुवाद देना चाहूँगा जिसने नीम के पेड़ पर लिखने के लिए आपको उकसाया. शिल्प और कविता के मर्म के बारे में विद्वान ब्लोगेर्स ने पहले ही बहुत कुछ लिख दिया है, आभार

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  19. तीक्ष्ण सूरज दिखा रहा था नाराजगी,सर पर चढ़ के
    नहीं थी शीतल छाँव नीम की, ना ही वो नीम बयार
    कुपित हुई धरा ,गाँव तो अनाथ हो गया हो जैसे.
    शिथिल कदम लौट चले , यादों में संजोये उस नीम का प्यार.
    .......कमाल की रचना ....
    गाँव से दूर शहर में गाँव की याद आना और याद में खो जाना ......
    नीम के पेड़ को माध्यम बनाकर अपने मन की व्यथा का सुंदरा भावपूर्ण चित्रण किया है आपने... मन को छू गयी रचना ...
    मनोभावों की भावपूर्ण प्रस्तुति के लिए हार्दिक शुभकामनाएँ

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  20. अच्छी पोस्ट... पसंद आई ... विशेष कर कविता वाला भाग और उसमें भी हिंदी शब्दों को चयन पसंद आया...

    वैसे नीम शाश्वत थीम है लिखने के लिए... शरद जोशी ने कहा है हमसे सिर्फ महसूस किया है...

    पर घर को और नीम को याद करने की कोई शर्त नहीं होती...

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  21. उपन्यास तो पढ़ नहीं पाए लेकिन यह पोस्ट पढ़कर आनंद आ गया रश्मि जी । पुरानी यादों को कितने बेहतरीन तरीके से प्रस्तुत किया है आपने । वृक्षों को काटकर तो हम अपना ही भविष्य काट रहे हैं ।

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  22. जो मास्टर है वो तो हर जगह हर बात में हर विधा में मास्टर ही है ,ये साबित हो ही गया न ।

    बहुत ही प्रभावशाली रचना । अच्छा लगा पढ के ।

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  23. बहुत ही सुन्दर व भावपूर्ण कविता है।
    खतहल का पेड़ मेरे भी एक घर के आँगन में था और नीम का पेड़ तप लगभग हर बगीचे में था। पेड़ काटना आने वाली पीढ़ियों के प्रति एक बहुत ही बड़ा अपराध है।
    घुघूती बासूती

    जवाब देंहटाएं
  24. @
    मनाया था,इस नीम के पेड़ ने ,उन रूठे बेटों को
    जो,घर से झगड़ ,आ बैठते थे,इसकी छाँव
    दिया था दिलासा,उस रोती दुल्हन को
    जब रखी, उसकी डोली कहारों ने

    और सुस्ताने बैठे थे पल भर ,इस ठांव.

    इन लाईनों को कई बार पढ़ा....एकदम सजीव लाईनें हैं । अब तो डोली नहीं आती शादियों में.....डोली का चलन बंद हो गया है...कहांर अब दूसरे रोजगार में लग गये हैं.....लेकिन यह यादें अब भी ताजा हैं कि किस तरह डोली लेकर कहांर पैदल चलते थे....उनके चलने की एक निश्चित गति होती थी....उनके मुंह से भिन्न भिन्न प्रकार की हुंकारी भरती आवाजें निकलती रहती थी और जब कभी वह कहीं थक जाते तो किसी पेड़ की छांह में डोली रख दी जाती....

    अब इस तरह का लेखन करते हुए शायद कोई नई उम्र का शख्स कम ही दिखे क्योंकि यथार्थ को देखना और फिर उस पर लिखना एक अलग बात हो जाती है.....इस तरह नींम के पेड़ का वर्णन, उसके आस पास घटित हो रही चीजों का सूक्ष्म अवलोकन बहुत ही ज्यादा संवेदनशीलता की मांग करता है जो कि कविता देख कर पता चल रहा है।

    बहुत सुंदर कविता है।

    कवित्त पर बेहिचक हाथ आजमाईये। कॉन्फिडेंस की ऐसी तैसी....। लिखते रहिये, कॉन्फिडेंस खुद ब खुद खींचा चला आएगा :)

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  25. एक बात बताऊँ रश्मि जी, जैसे आपके लिए वो नीम का पेड़ ख़ास था और रहेगा, मेरे लिए भी मेरे गाँव में वो एक कुआँ ख़ास है :)

    कविता पढके तो बहुत ही आनंद आया...बहुत शानदार !

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  26. तीक्ष्ण सूरज दिखा रहा था नाराजगी,सर पर चढ़ के
    नहीं थी शीतल छाँव नीम की, ना ही वो नीम बयार
    कितना करीबी लिखा है आपने. यह गाथा आपके गाँव के नीम के पेड़ का ही नहीं यह तो हमारे - तुम्हारे - उसके यानि सबके गाँव के नीम के पेड़ की गाथा है.
    बहुत सुन्दर

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  27. आह!! कहाँ तक यात्रा करा लाई इस कविता के माध्यम से..चौबारे का पेड़ भी याद आया और नीम तर दद्दा भी.


    बहुत सुन्दर, बधाई.

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  28. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  29. विधा परिवर्तन के परिणाम इतने सुखद होगे ये सिर्फ़ पढके ही जाना जा सकता था. वैसे भी मूल बात अभिव्यक्ति है और उसकी आप माहिर खिलाडी है. ऐसे ही यदा कदा सर्वदा अलग अलग विधाओ मे हाथ आजमती रहे. नये कौशल अधिक प्रशन्नता लाते है.

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  30. रश्मि जी कभी कभी हमारी यादे इन चीजो से जुड जाती है, ओर वो चीजे हमे बहुत प्यरी भी लगती है, बहुत् सुंदर रचना लगी . धन्यवाद

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  31. Hi..

    Jaisa ki sabne hi kaha, kavita sirf kavita na rah kar pratyaksh rup se jeevant ho uthi hai..

    Jo hruday se kalakar hota hai, wo har vidha main mahir bhi hota hai..wo chahe chitrakari ho, kahani lekhan, sansmaran, aalekh, aadi har kshetr main nipun bhi hota hai..ye aapki mahanta hai ki aap ese apne mitr ki cosmetic surgery ka naam de rahi hain..

    Neem ka ped ke madhyam se aapne us adhadhundh shahrikaran ki oor dhyan dilaya hai.. Jiske chalte aisi jaane kitni dhroharon se hum vanchit ho chuke hain, jinhone sadiyon se humare jeevan main mook sahbhagi ka dayitva nibhaya hai..

    Mujhe bhi apna gaon yaad aa gaya..

    Gaon kinare neemiya tare barson se jo bhi hota aaya uska sajeev varnan aapki Kavita main chitrit hai.. Wah..
    Har vyakti jo bhi gaon ki prustbhoomi se aaya hai aapki kavita main chitrit har drushya ko apni aankhon se dekh chuka hoga apni jindgi main..

    Sundar kavita..

    DEEPAK..

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  32. मैं नहीं समझता की की इस महान रचना पर चंद शब्द टिपण्णी के लिख कर इसके साथ न्याय कर पाऊंगा ..हां बस इतना कहूँगा ..की बड़े दिनों बाद ऐसी रचना मिली जिसे पढ़कर लगता है की हिन्दी साहित्य का दौर अपने चरम पर जल्दी ही आएगा

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  33. रश्मि जी लो एक और woooow
    भावुक कर दिया आपने और पुरानी स्म्रतियो में खो गए. शानदार कविता और लेख दोनों.

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  34. रश्मि जी, पेड़ों को लेकर आपने बहुत सुन्दरा लिखा है, इसके पीछे आपका प्रकृति के प्रति जो स्नेह और लगाव है वह भी झलकता है, इसके साथ ही उनसे जुड़ीं आपकी चिंताएं और सरोकार भी द्दृष्टिगोचर होते हैं। कविता सुन्दर है। बधाई !

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  35. मार्तंड की प्रचंड किरणों से बचने
    रोटी,प्याज,मिर्ची,नमक की लिए पोटली.पी, ठंडा पानी कुंए का,शीतल छाया के नीचे
    चला आता किसान , विश्राम हेतु , घडी दो घड़ी......
    वाह भई वाह ...
    इस विधा में भी लाजवाब ...!!

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  36. बहुत सुन्दर।
    यादें और अतीत का अनुभव व्यक्तित्व को रिच नेस देता है। पर वह न हो तो शायद व्यक्ति बहुत से मानसिक कष्ट से बच जाये।
    पर अनुभव और कष्ट होना/न होना अपने हाथ नहीं है।

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  37. आज कल चाहे विज्ञान ने कितने ही सुख के साधन इजाद कर लिए हो पर पेड़ों की वो छाव वाला मजा नहीं है, आज फिर से मेरा मन बचपन में चला गया, अपने गाँव में. बहुत अच्छी लगी ये पोस्ट.

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  38. वाकई बहुत ही खूबसूरत लिखा है. मेरा भी बचपन गुज़रा है, अपनी नानी के आंगन में उगे नीम के पेड़ के नीचे. जब कुछ वर्ष पहले जब में ननिहाल गया तो पाया कि उसे काट दिया गया है. मेरा मन भी ऐसे ही रोया था.

    मेरी कविता "नानी का आंगन" अवश्य पढ़ें.
    http://premras.blogspot.com

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  39. चलिए एक कदम और आगे ....बधाई .....!!

    वैसे उपन्यास लिखने वालों के लिए कविता क्या चीज .....??

    हाँ तसवीरें बहुत अच्छी आई हैं आपकी और शिखा जी की ......

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  40. यह आविष्कारी और चमत्कारी दवा तो बाबा आदम के ज़माने से प्रचलित हैं. लेकिन इसका प्रचार और प्रसार आजकल या तो बाबा रामदेव कर रहे हैं या फिर आप...
    www.iamshishu.blogspot.com/

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  41. हम अपने आस पास के पेड़ पौधों से रहते रहते कितने जुड़ जाते हैं ये उनसे अलग हो कर ही पता चलता है।

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  42. सही में रशिमी जी भारत एक है.दर्द एक है साझा है......बिहार के नीम और केरल के कटहल के कटने का दर्द एक है.....कविता ने उन सभी नीमों की याद दिला दी. जो मेरी दिल्ली में थी. कई सड़कों पर दोनो ओऱ से झुक कर गर्मी में छाता का काम करते थे, पर पहले सड़क चोड़ी हुई. फिर मेट्रो आई....और सब पेड़ लगभग गायब होते गए..हैं भी तो वो हरियाली कहां बची.....जो गर्मी की भरी दुपहरिया में एसी से भी ज्यादा ठंडक देते थे...

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  43. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  44. चार पैसे कमाने मैं आया शहर
    गाँव मेरा मुझे याद आता रहा..

    मुझे मॉर्निंग वाक करे हुये जमाने हो गये :( काश हम लोग ब्लोग पर वाक भी कर सकते तो सेहत के बारे मे ज्यादा सोचना नही पडता. :)

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  45. रश्मि जी दो बातें

    पहली यह निश्चित रूप से कविता है
    दूसरी जो इसे महान वगैरह कह रहे हैं उनसे बिल्कुल विचलित न होईये…यह महान कविता नहीं है।

    आशा है इससे बहुत बेहतर कवितायें आप लिखेंगी…

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  46. बहुत सारी यादें है दिल में कुछ ऐसी ही, आप कि बहुत अच्छी कविता ,सुन्दर भाव..

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  47. मुझे लग रहा था कि मैं इस कविता पर लिख चुका हूँ लेकिन ऐसा नहीं था । अब इतने दिनों बाद लिखूँ भी तो क्या लिखूँ । इतना ही कि यह कविता अच्छी लगी और नीम का पेड़ तो मेरे अवचेतन में भी है मेरे जन्मस्थल बैतूल का । कविता अच्छी है ,लेकिन कहीं कहीं तुक मिलाने के चक्कर में ग़लत शब्द आ गये है ॥बस…॥ और बेहतर कविता आप लिख सकती हैं , मुझे पता है ।

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  48. मन प्रसन्न हुआ ! जितना लिखो उतना कम

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  49. कविता के मामले मे मेरी समझ ज़रा कम ही है पर अच्छा है इतना ज़रूर कह सकती हूँ,

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