Friday, April 9, 2021

भारतीय घरों का सच दिखाती फिल्म : The great indian kitchen


 The great indian kitchen फिल्म देखते हुए कई चेहरों का आँखों के समक्ष आ जाना लाज़मी है। हर मध्यमवर्गीय भारतीय महिला अपनी जिंदगी में कभी न कभी इन अनुभवों से गुजरती है। भारत के किसी भी प्रदेश की रसोई हो। त्योहारों पर बनने वाले सुस्वादु व्यंजन को दरकिनार कर दें तब भी रोज के खाने में भी बहुत मेहनत लगती है। पीसना,तलना, भूनना और ये सारी मेहनत स्त्री के हिस्से ही आती है। उस पर से पुरुषों के नखरे ,चटनी सिलबट्टे पर पिसी होनी चाहिए, चावल कुकर में नहीं,पानी में उबाल कर बनाये जाएं। पुरुष किसी भी प्रदेश में जाकर बस जाएँ पर उनकी जीभ पर पारंपरिक स्वाद का असर बना रहता है . शुरू के दृश्यों में ही अप्पम, इडियप्पम, पुट्टू,डोसा-सांभर, उबले केले,टोपियोको, केले के चिप्स छनते देख पता कल जाता है,यह केरल की रसोई है.

सुबह से घर की महिलाएं रसोई में लग जाती हैं और पुरुष जूठे चाय का कप भी सिंक में नहीं रखते।टेबल पर सांभर से निकाले सहजन भी चबा कर थाली के बगल में छोड़ देते हैं। जूठी प्लेटें और टेबल पर से जूठन उठाते उबकाई आ जाए. पर घर की स्त्रियाँ चेहरे पर बिना शिकन लाए जूठन उठाती हैं. ससुर जी के जूते भी सास सामने लाकर रखती है। और ससुर गर्व से बहू से कहते हैं, 'मेरी पत्नी एम.ए. पास है फिर भी अपने पिता के कहने पर उसे नौकरी नहीं करने दी' ।जबकि सास बहू से कहती हैं, 'तुम अप्लाई कर दो, सेलेक्ट हो जाने के बाद बात की जाएगी।'
नायिका लकड़ी के चूल्हे पर चावल बनाते, गैस पर साम्भर पकाते हुए टेबल पर रखे लैपटॉप पर नौकरी के आवेदन भी टाइप करती जाती है.
फ़िल्म में पीरियड आने पर किये जाने वाले छुआछूत पर भी विस्तार से चर्चा है। जब पीरियड आने पर नायिका को हर काम की मनाही हो जाती है और वो आराम से मोबाइल देखती रहती है, किताब पढ़ती रहती है तो मुझे एक पल को लगा, इस दिन-रात की मेहनत से कुछ दिनों के लिए बचाव अच्छा ही है।पर स्त्रियों को ऐसे समय में आराम देने की सोच नहीं बल्कि उन्हें हीन दिखाने की मंशा होती है। लड़की की बुआ सास आती है और उसे एक छोटे से कमरे में एक दरी बिछाकर सोने ,किसी के सामने न आने ,अपनी प्लेट धोकर अलग रखने के लिए कहती है। स्कूटर से गिरे पति को उठाने जाती है तब भी उसे झिड़की मिलती है,उसने पति को छू कैसे दिया ? पति साबरी मलाई की यात्रा पर जाने वाला था। पंडित उसे पत्नी के छू लेने पर शुद्ध होने का उपाय बताते हैं , 'गाय का गोबर खाना पड़ेगा या गोमूत्र पीना पड़ेगा फिर कहते हैं, नदी में डुबकी लगा लो तब भी शुद्धि हो जाएगी'। यानी पुरुष की सुविधा के लिए आसानी से नियम में परिवर्तन कर दिए जाते हैं।
मेरे पास केरल की एक लड़की पेंटिंग सीखने आती थी। उसने एक दिन आक्रोश में बताया, 'पता है, मेरा पति कहता है, पीरियड आने पर जमीन पर सोया करो ,मैं ब्राह्मण हूँ '। उस लड़की ने गुस्से में आगे कहा ,'और मैं क्या हूँ...पांच दिनों के लिए मेरी जाति चली जाती है ?' एक दिन उसने पति से सैनिटरी नैपकिन लाने को कहा तो पति ने कहा, "मैं पूजा-पाठ वाला आदमी हूँ,मुझसे ये सब मत मंगवाया करो।" पति आई आई टी से पढ़ा एक मल्टीनेशनल कंपनी में कार्यरत था। फ़िल्म में भी नायिका अपने पति से सैनिटरी नैपकिन लाने के लिए कहती है ,उसके पति को नागवार तो गुजरता है पर शुक्र है, वो कुछ कहता नहीं।
इस फ़िल्म का एक दृश्य बहुत महत्वपूर्ण है। नायिका मायके आई हुई है। उसका छोटा भाई बाहर से आता है, एक ग्लास पानी मांगता है। माँ दूसरी बहन से पानी लाने के लिए कहती है, और नायिका बिफर जाती है, "तू खुद से एक ग्लास पानी नहीं ले सकता ?" पहले शायद उसे भी ये बड़ी बात नहीं लगती हो पर ससुराल में पुरुषों का बिलकुल ही काम न करना और स्त्रियों से सारे काम की अपेक्षा ने नायिका का ध्यान अपने मायके में लडके-लडकी के बीच होते भेदभाव की तरफ खींचा. शुरुआत ऐसे ही होती है, एक ग्लास पानी ला दो, खाना लगा दो, बिस्तर बिछा दो और लडकों को अपना काम भी करने की आदत नहीं पडती. आम मध्यमवर्गीय माँओं की तरह माँ नायिका को माफ़ी मांग लेने और अडजस्ट करने की सलाह देती है.
फ़िल्म में किचन का सिंक टपकता रहता है।नायिका उसके नीचे बाल्टी लगाकर रखती है और फिर गंदा पानी उठाकर बाहर फेंकती है। पति से कहकर थक जाती है,वे बड़ी सुविधा से भूल जाते हैं। नायिका का बार बार गंदे पानी से भरी बाल्टी फेंकना और पोंछा लगाते रहना उन्हें बड़ी बात लगती ही नहीं क्यूंकि उन्हें तो टेबल पर खाना परस कर मिल जाता है, धुले कपड़े मिल जाते हैं.
अंत में नायिका वही गंदा पानी ससुर और पति के चेहरे पर फेंक देती है और घर छोडकर चली आती है. पर उन्हें क्या, उन्हें तो एक दूसरी लडकी मिल जाती है जो शादी के बाद उसी तरह उनके जूते बर्तन उठाती है...और बिना चेहरे पर शिकन लाए घर के सारे काम करती है.

फिल्म में बीफ (गौ-मांस) का भी कई बार जिक्र है. बहुत लोगों को ज्ञात नहीं है कि केरल के हिन्दू जो बहुत पूजा-पाठ करते हैं, मंदिर जाते हैं, सुबह तुलसी में जल देते हैं , शाम को दिया जलाते हैं. उनके खान-पान में बीफ सामान्य रूप से शामिल है.

फिल्म की लोकेशन और कलाकारों के अभिनय बहुत सहज और सच्चे लगते हैं। अगर इसका हिंदी रीमेक बना तो फ़िल्म कुछ अलग ही नज़र आएगी। एक बात और ध्यान देने वाली है, केरल में सर पर पल्ला या घूंघट का रिवाज नहीं है। नायिका सलवार सूट तो पहनती है पर दुपट्टा कभी नहीं लेती।उत्तरभारतीय घरों में तो सारा काम करते, सर पर दुपट्टा और पल्ला सम्भालते स्त्रियाँ परेशान होती रहती हैं।
The great indian kitchen में महिला को सुबह से शाम तक किचन में खटते दिखाया जाता है। कभी जो कोई फ़िल्म The great indian house पर बनी तो फिर दिखाना पड़ेगा, सुबह महिला किचन में काम करती है, बच्चों को स्कूल छोड़ने-लाने जाती है, सब्जी-राशन लाती है। बच्चों को डॉक्टर के पास ,उनके स्कूल के पी.टी.एम., स्पोर्ट्स डे, एनुअल डे, अटेंड करती है। घर में मेहमानों की आवाभगत, उन्हें घुमाना-फिराना, बीमार सास-ससुर की सेवा सब महिला के जिम्मे। महानगर में पुरुषों की मजबूरी होती है, सुबह के गए, देर रात गए लौटते हैं।अक्सर प्राइवेट नौकरी होती है,छुट्टी नहीं ले पाते। यहाँ पुरुष विलेन नहीं मजबूर होते हैं।पर इनमें ही जो पुरूष स्वभाव से क्रूर होते हैं पत्नी के इतना कुछ करने के बाद भी उसे गालियों और नीले-काले निशान से भी नवाजते हैं।

नौकरी वाली महिलाओं की गाथा तो और भी साहस भरी, सुबह चार बजे उठकर ,रात ग्यारह बजे तक घर-दफ्तर सब सम्भालती हैं।

खैर, इन सब पर फ़िल्म जब बनेगी तब देखी जाएगी।फिलहाल तो अमेज़न प्राइम पर The great indian kitchen देख लीजिए (खासकर सभी पुरुष )। भाषा मलयालम है,अगर इंग्लिश सबटाइटिल्स पढ़ने में मुश्किल हो तब भी आराम से देखी जा सकती है। समझने में कोई कठिनाई नहीं होगी।

Thursday, February 18, 2021

प्रवासी पक्षी : खंजन

 


जानि सरद रितु खंजन आए।

पाइ समय जिमि सुकृत सुहाए।।’’

पंछियों की दुनिया में रूचि लेने से पहले ही इस 'खंजन' पक्षी से परिचित थी. माँ को रामायण की बहुत सारी चौपाइयां कंठस्थ हैं और गाँव में कभी इस पक्षी को दिखाकर उन्होंने ये चौपाई कही थी. हमारे गाँव में इसे खिर्लीच कहा जाता है. तभी से इस पक्षी की पहचान हो गई थी .पर कभी गहराई से नहीं सोचा था कि ऐसा क्यूँ कहते हैं कि खंजन को देख कर समझ जाना चाहिए कि शरद ऋतु आने वाली है.

सहस्त्रों वर्षों से ये पंछी हज़ारों किलोमीटर की दूरी तय कर सर्दियों में बर्फीले प्रदेशों से हमारे यहाँ आते हैं. और गर्मी आते ही अपने देश लौट जाते हैं. गर्मियों में ही ये अपने देश में प्रजनन और बच्चों की देखभाल करते हैं. उन प्रदेशों में यह पंछी गौरैया की तरह ही आम है पर हमें इनके दर्शन शरद ऋतु में ही होते हैं. इनकी पूंछ हमेशा हिलती रहती है इसीलिए अंग्रेजी में इसे wagtail कहते हैं. ये अलग अलग रंगों के होते हैं. सफेद-सलेटी-पीला .मैंने सफेद वाला खंजन ही देखा था. पहली बार पीले रंग के गले और वक्ष वाला खंजन देखा.
नवंबर-दिसम्बर से ही अन्य प्रदेशों के पक्षी-प्रेमी खंजन की तस्वीर लगाने लगे थे. पर मुंबई में मुझे ये पंछी नजर नहीं आ रहे थे .अब तो सर्दी उतार पर है.मैंने आशा ही छोड़ दी थी कि आज सुबह दूर से एक छोटा सा पंछी नजर आया जिसकी पूंछ लगातार हिल रही थी . मैं समझ गई, आज मेरा लकी डे है 🙂. नई जगह पर कुछ कुछ भूला सा, देर तक चुपचाप बैठा यह इधर उधर देख रहा था 💛💛 .
इस पंछी से सम्बन्धित एक जिज्ञासा और थी . आँखों की सुन्दरता की उपमा खंजन नयन से दी जाती है .तुलसीदास ने भी सीता जी के आँखों की तुलना खंजन से की है.
सूरदास ने कृष्ण जी के रूप का बखान करते हुए कहा


खंजन नैन रूप रस माते।
अतिसय चारू चपल अनियारे, पल पिंजरा न समाते।
लेकिन खंजन पक्षी की आँखें बहुत खास नहीं होतीं।ज्यादातर पक्षियों की तरह ही सामान्य सी होती हैं
शायद खंजन पक्षी के आकार की तुलना आँखों से की गई है. अगर दो खंजन पास पास हों तो दो सुंदर नयनों से लगेंगे.



























Sunday, January 17, 2021

दोस्ती की भावना से भरा पंछी 'मैगपाई रॉबिन ' Magpie Robin

 सफेद और काले रंग का ये सुंदर सा पंछी ' मैगपाई रॉबिन ' बहुत खूबसूरत लगता है. यह बहुत जल्दी दोस्ती कर लेता है .दोस्ती यानी आप पर भरोसा कर लेता है कि उसे कोई नुकसान नहीं पहुंचेगा. सुबह मेरे कमरे की खिड़की खुलने से पहले यह आवाजें लगाता है.और शाम को खिड़की बंद होने पर भी मानो डांटता है कि इतनी जल्दी क्यों बंद कर लिया. :)  कई बार खिड़की से कूदकर घर के अंदर भी आ जाता है. अगर मैं बहुत देर तक खिड़की के पास ना जाऊं तो अपनी सुरीली आवाज़ में इतनी टेर लगाता है कि सागर कह उठती है, 'भाभी  जाओ ,अपना चेहरा दिखा कर आ जाओ "उसे भी झिड़कती है, 'रुक आ रहीं हैं :) '

 अगर मैं खिड़की पर खड़ी हूँ और रॉबिन  सामने वाले पेड़ की डाल पर बैठा हो तो उड़ कर खिड़की पर आ कर बैठ जायेगा . उड़ते हुए उसके काले-सफेद पंख इतने सुंदर लगते हैं कि मैं मुग्ध हो देखती रह जाती हूँ, वीडियो लेना भूल जाती हूँ.मेरे बच्चे भी  मुझे देखकर, हर बार इस तरह दौड़ कर नहीं आयें होंगे. अगर मैं खिड़की पर हाथ टिका कर बैठूं तो बिलकुल कुहनी के पास बैठ जाएगा, ज़रा भी नहीं डरता 😊

नर-रॉबिन के सर-चोंच-वक्ष और पंख चमकते हुए काले रंग के होते हैं. पेट सफेद होता है और पंख पर सफेद धारियां होती हैं जो बहुत सुंदर लगती हैं. मादा-रॉबिन के सर-चोंच-वक्ष और पंख धूसर रंग के होते हैं.नर की तरह ही पेट सफेद और पंख पर सफेद धारियां होती हैं. मादा-रॉबिन बहुत शांत दिखती है. एक ही जगह पर देर तक बैठी रहती है. इनसे  ही शिकायत  है, नर और मादा कभी साथ साथ बैठे नहीं दिखते .इनकी ऐसी एक भी तस्वीर नहीं ले पाई हूँ. वैसे भी बुलबुल-तोता-गौरया=मैना-कबूतर की तरह ये झुण्ड में नहीं रहते. कभी कभी ही दो रॉबिन साथ में दिखते हैं.

रॉबिन की इन आदतों के विषय में अपूर्व को बता रही थी तो उसने बताया, “डबलिन में भी रॉबिन बहुत दिखते हैं . (रॉबिन की अलग किस्म ).ग्रैंडपा (मकान-मालिक) इनकी एक स्टोरी सुनाते हैं “ . मुझे वो कहानी सुनने की इच्छा थी पर हमेशा ह्मारी बात किसी और तरफ मुड जाती. एक रोज मैंने कहा, “पहले रॉबिन की कहानी सुनाओ, फिर आगे दूसरी बात होगी “

“हाँ सुनाता हूँ...ग्रैंडपा बताते हैं, अगर लॉन में अकेले टहल रहे हो तो रॉबिन पास में आ जाएगा .पार्क में भी अकेले देख,उडकर पास आ जाता है , बहुत फ्रेंडली होता है “

“कहानी तो सुनाओ...”
“यही कहानी थी...”

ये कहानी थी या इन्सटाग्राम स्टोरी :) ....मुझे लगा था रॉबिन से जुड़ा कोई किस्सा होगा. :D














 

Thursday, December 17, 2020

फील्ड मार्शल मानेकशॉ

 


१९४२ में द्वीतीय विश्वयुद्ध शुरू हो गया था.पूरे विश्व में तबाही मची हुई थी. हर देश युद्ध से किसी ना किसी प्रकार प्रभावितथा. उस वक्त भारत आज़ाद नहीं हुआ था और भारतीय सेना, अंग्रेजों कीमदद कर रही थी. बर्मा में भारतीय सेना तैनात थी और जापानियों के दांत खट्टे कर रहीथी. बर्मा के एक बहुत ही महत्वपूर्ण चौकी ‘पगोडा हिल’ पर जापानियों ने कब्जा कर लिया था. एक नौजवान कैप्टन ‘सैम ’मानेकशॉ' अपनी बटालियन ‘राइफल कंपनी’ की अगुवाई करतेहुए ‘पगोडा हिल’ की तरफ बढ़ रहेथे. हिल के ऊपर से जापानी अंधाधुंध गोलिया दाग रहे थे . मानेकशा ने अपने सैनिकोंको चट्टानों की आड़ लेते हुए ऊपर की तरफ गोलियां चलाते हुए आगे बढने का आदेश दिया.खुद भी वे सबसे आगे बहादुरी से ऊपर की तरफ गोलिया दागते और चीते की सी फुर्ती सेचट्टानों के पीछे छुप जाते. राइफल कंपनी के कई सैनिक शहीद हो गए थे. बचे हुए कुछसैनिकों के साथ मानेकशा चोटी पर पहुंच गए और अब दोनों तरफ के सैनिक आमने -सामने थे. सैम मानेकशॉ अपनी रायफल सेएक जापानी को निशाना बना रहे थे तभी दूसरी तरफ से एक दुसरे जापानी ने आकर उनपरगोलियों की बरसात कर दी. मानेकशा ने पलट कर उसे भी मार गिराया पर खुद भी गिर पड़े, उनके पेट में 9 गोलियां लगी थीं. लेकिन पगोडा हिल पर फतह हासिल कर ली थी.
ज्यादातर जापानी सैनिक मारे गए थे .जो एकाध बचे थे,वे पीठ दिखा भाग खड़े हुए थे. सैम मानेकशॉ के शरीर से जगह जगह से खून बह रहा था, गोलियों ने उनके फेफड़े, किडनी, लीवर सबको डैमेज कर दिया था. पर उनके चेहरे पर जीत की मुस्कान थी .मेजर जनरल ‘डी. टी. कोवान’ जो देहरादून मिलिट्री अकादमी में उनके कंपनी कमांडर भी रह चुके थे ‘पगोडा हिल’ पर कब्जे कीखबर सुनते ही दौड़ते हुए, उन्हें बधाईदेने आये .पर मानेकशा को इस बुरी तरह जख्मी देखकर चिंतित हो गए. वे ,मानेकशा की वीरता के लिए उन्हें ‘मिलिट्री क्रॉस’ पदक दिलवाना चाहते थे. पर मानेकशा की हालत देख. .उन्हें लगा, अब सैम का बचना मुश्किल है . इस पदक के लिए नियम था कि यह पदक सिर्फजीवित मिलिट्री ऑफिसर को ही मिलता है. ‘डी. टी. कोवान’ ने कुछ सोचा और झट अपना मेडल उतार कर सैम मानेकशा की वर्दी पर लगा करअपने जूनियर को एक कड़क सैल्यूट दिया. मानेकशा ने भी बेहोशी से मुंदती आँखों को ज़रासा खोल अपने दाहिने हाथ को माथे से लगा,उनके सैल्यूट काजबाब दिया.
मानेकशा के अर्दली सिपाही शेर सिंह ने उन्हें अपने कंधे पर उठाया औरदौड़ते हुए कैम्प में इलाज के लिए ले गए .वहाँ, डॉक्टर नेउन्हें फर्स्ट एड देकर ‘पेगु’ के अस्पताल में रेफर कर दिया . पहाड़ियों का ऊंचा नीचा, झाड़ियों से भरा दुर्गम रास्ता, जीप हिचकोलेखाती आगे बढ़ रही थी. मानेकशा का सर सिपाही शेर सिंह की गोद में था. शेर सिंहउन्हें बीच बीच में पानी पिलाता और जगाने की कोशिश करते हुए कहता, ‘साब आप शेर दा पुत्तर हो, ये गोलियां आपका कुछ नहीं बिगाड़ सकतीं. आँखें खोलो साब. आपको अभी बहुतसारे जंग फतह करने हैं. “ मानेकशा जरा सीआँखें खोल मुस्करा देते अस्पताल तक जाने में ३६ घंटे लग गये. अस्पताल पहुँच कर शेर सिंह नेउन्हें बेड पर लिटाया और भागते हुए डॉक्टरको बुलाने चले गए. ऑस्ट्रेलियन डॉक्टर ने जब सुना कि उनके पेट में 9 गोलियां लगीहैं और ३६ घंटे बीत चुके हैं तो उन्हें देखने से इनकार कर दिया. कहा, ‘अब टुमारा शाब नई बच शकता उसपर टाईम वेष्ट करनेका कोई फायडा नई ,इतने टाईम मेंमैं दूशरा सोल्जर्स को डेक लेगा “ शेर सिंह उनकारास्ता रोक कर घुटने के बल बैठ गया , “नई डॉक्टर आपकोमेरे शाब को देखना ही पडेगा. मेरा शाब बहुत बहादुर है. उसको कुछ नहीं हो सकता.उसको बस थोड़ा इलाज की जरूरत है. “ शेर सिंह कीजिद के आगे डॉक्टर को मानेकशा को देखने जाना ही पड़ा. उसी वक्त सैम को ज़रा सा होशआया और डॉक्टर ने उनसे पूछा....” टुमको क्या हुआयंगमैन?“ ऐसी घायल अवस्था में भी सैम ने मुस्करा कर कहा, “ कुछ नहीं बस एक शैतान गधे ने लात मार दी “ डॉक्टर हैरान रह गए , ऐसी हालत मेंभी कोई मजाक कर सकता है. उन्होंने हंस कर कहा, ‘टुमारा सेन्सऑफ ह्यूमर तो कमाल का है, अब तो टुमकोबचाना ही पड़ेगा “ डॉक्टर नेगोलियां निकालीं, उनकी छोटी आंतके कुछ हिस्से काट दिए. घावों को स्टिच करके उन्हें ‘रंगून’ के बड़े अस्पतालमें भेज दिया.
सैम बिस्तर पर पड़े , खिड़की से कुछबच्चों को खेलते देख रहे थे .उन्हें अपने बचपन की याद आ गई वे भी ऐसे ही अपनेदोस्तों के साथ खेला करते थे ..बॉल अक्सर झाड़ियों में चली जाती और जब सारे बच्चे बॉल ढूंढ रहे होते, वे भागकर अपने पिता की क्लिनिक में पहुँच जाते. कानों में आला लगाए, मरीजों दवाइयां देते,उनकी मरहमपट्टीकरते पिता, सैम को कोईदेवदूत सरीखे लगते. सैम ने सोच लिया, वे भी बड़े होकरडॉक्टर बनेंगे .पिता ने कहा, ‘वे अच्छेनम्बरों से पास होंगे तो उन्हें मेडिकल पढने लन्दन भेज देंगे.” सैम ने सीनियर कैम्ब्रिज में टॉप किया. पांच विषयों में डिस्टिंक्शनलाया. पर पिता को पन्द्रह वर्ष की उम्र में बेटे को अकेले विदेश भेजना गवारानहीं हुआ. पिता ने वादा किया कि सैम के अठारह के होते ही उन्हें मेडिकल पढने लंदनभेज देंगे. लेकिन सैम का उत्साह से भरा किशोर मन बुझ गया. उन्हें अंदाजा नहीं था , ईश्वर ने इस से कहीं बड़ा काम उनके लिए सोच रखा है. सिर्फ कुछ मरीजोंकी जिंदगी बचाना उनकी तकदीर में नहीं था बल्कि देश की तकदीर बदलने में वे सहायकहोने वाले थे. डॉक्टर बनकर कुछ ही बच्चों के जन्म का निरिक्षण कर पाते जबकि उनकीदेखरेख में एक नया राष्ट्र जन्म लेने वाला था. और नियति ने उनकी नजरों के सामने अखबार के पन्नों पर छपा एक विज्ञापनरख दिया. विज्ञापन में था कि देहरादून मेंपहली भारतीय सेना अकादमी में एडमिशन के लिए परीक्षा होने वाली है. सैम ने माँ सेदिल्ली जाने के लिए पैसे मांगे . माँ उन्हें इस तरह चुप और उदास देखकर परेशान थीं.उन्होंने झट से रूपये निकाल कर दे दिए कि दिल्ली जाकर बच्चे का मन बहल जाएगा.
मिलिट्री एकेडमी से ट्रेनिंग कर वे सेकेण्ड लेफ्टिनेंट बने और फिरकैप्टन के रूप में बर्मा में उनकी पोस्टिंग हुई. जहां उन्होंने अपनी जान दांव पर लगा, वीरता के झंडे गाड़ दिए. जब स्वतन्त्रता मिली और भारत का विभाजन हुआ तो सैम मानेकशा के सामनेबड़ी दुविधा आ गई . वे पारसी थे और पारसी लोगों के लिए दोनों देशों के द्वार खुलेहुए थे. अब तक पूरा देश एक था.. लाहौर से बंबई, कलकत्ता सेढाका हर जगह बेख़ौफ़ आया जाया करते थे. हर शहर में उनके मित्र थे . अब उसी देश को दोटुकड़ों में बंटता देख उनका कलेजा फट रहा था. अब वे एक देश में रहना क़ुबूल करें तोदूसरा देश उनके लिए अजनबी हो जाएगा . सैम मानेकशा गोरखा रेजिमेंट से जुड़े हुए थे.सेना के भी दो भाग हो गए थे और गोरखा रेजिमेंट भी दो भागों में बंट गया था . इसरेजिमेंट में उनके प्राण बसते थे .वे बड़े जोश से कहते थे, “ अगर कोई सिपाही कहता है कि वो मौत से नहीं डरतातो फिर या तो वो झूठ बोल रहा होता है या फिर वो गोरखा है.” वे खुद को पारसी नहीं गोरखा कहते थे. उनका प्रचलित नाम “सैम बहादुर “ भी गोरखारेजिमेंट की ही देन था. सैम अपने सिपाहियों से दोस्ताना व्यवहार रखते थे. उनकी बीच जाकर बैठ जाते. उनके साथ हंसी मजाक करते . कभी उनकी मेस में चले जाते ,साथ खाना खाते .
एक बार यूँ ही उन्होंने एक सिपाही से पूछा, “ तुम्हारा क्या नाम है ? “
“तेज बहादुर “
“तुम्हारे चीफका क्या नाम है ? “
वह सैनिक घबरा गया . हडबडाते हुए उसने कहा, “सैम बहादुर “
मानेकशा ठहाका लगाकर हंस पड़े , ‘हाँ एकदम सही कहा .मैं गोरखा ही हूँ .मेरा नाम ‘सैम बहादुर’ ही होना चाहिए.” और तब से सबलोगउन्हें प्यार से ‘सैम बहादुर’ ही कहने लगे.बंटवारे के बाद इस रेजिमेंट के कुछ सैनिकों से उनकी दूरी हो जायेगी ,यह बात उन्हें कचोट रही थी. सैम मानेकशा का बचपन अमृतसर में गुजरा था, पढ़ाई नैनीताल और देहरादून में हुई थी. उनकी पत्नी सीलू भी अमृतसर कीथीं. भारत उनके दिल के ज्यादा करीब था और उन्होंने अपने दिल की सुन, भारत में रहने का फैसला किया .वे अपना गम भुलाकर देश की सेवा में जुट गए. उन दिनों हर तरफ मार काटमची हुई थी. दंगे हो रहे थे . दोनों देशों के बीच लकीरें खिंच गईं थीं और लकीरोंके पार, अपना सबकुछछोडकर लुटे-पिटे से लोग चले आ रहे थे. सबके चेहरे से मुस्कान गायब थी, चेहरा ग़मगीन था और आँखों में आंसू भरे हुए थे. लोग अपना घर,जमीन,धन सब छोडकरआये थे. कुछ लोगों के परिवार भी बिछड़ गए थे.
सेना की जिम्मेवारी बढ़ गई थी. सेनाउन्हें फिर से बसाने, शांति बहालकरने में पूरी तरह लगी हुई थी. मिलिट्री ऑपरेशन के डायरेक्टरके पद पर होने की वजह से सैम मानेकशा खासे व्यस्त हो गए थे. कभी कश्मीर में सरउठाये कबाइलियों का दमन करने के लिए उनकी पुकार होती तो कभी कलकत्ता में नोआखालीमें हो रहे दंगो को शांत करने के लिए उन्हें बुलाया जाता. कश्मीर में कबाइलियों काआतंक बढ़ता जा रहा था . वहाँ के राजा हरिसिंह भारत से सहायता तो मांग रहे थे परभारत में विलय होने क कागज़ पर हस्ताक्षर करने में देर कर रहे थे . पंडित नेहरूसैनिक कार्यवाई को लेकर असमंजस में थे. आखिर सरदार पटेल ने स्थिति सम्भाली, राजा हरिसिंह से भारत में शामिल होने के कागज़ पर दस्तखत कराये , नेहरु को समझाया और मानेकशासे कश्मीर में को शांति स्थापित करने के लिए प्रयास करने लिए कहा . मानेकशाअभी कश्मीर में काम कर ही रहे थे किकलकत्ता में दंगे शुरू हो गए. ब्रिटिश कमांडर इन चीफ ने आकर कहा कि “सरदार पटेल आपको कलकत्ता में बुला रहे हैं. आपको ले जाने के लिए एकप्लेन तैयार खड़ा है.” कलकत्ता मेंसरदार पटेल के साथ कलकत्ता के मुख्यमंत्री वी.सी. रॉय खड़े थे . उन्होंने मानेकशासे सीधा पूछा, “मुझे कोई बहस नहीं, कोई टालमटोल नहीं सिर्फ सीधा जबाब चाहिए ...अगरमैं सेना को सिचुएशन सौंप दूँ तो आप हमारे कितने बंगालियों को मारेंगे और कितने दिनों में शांति कायम हो जाएगी?” सैम मानेकशा की रगों में जवान खून उबाल मार रहा था .वे नेताओं की तरह घुमा फिरा कर बात करना नहींजानते थे . वे साफ़ साफ़ बोलने के लिए बदनामथे ,उन्हें मुँहफट भी कहा जाता था .मानेकशा बोले, “शायद सौ लोग की जान जा सकती है और एक महीने मेंशांति लागू हो जायेगी.” सरदार पटेल नेवी सी राय की तरफ मुड़ कर कहा, ‘दंगे में तोहजारों मर रहे हैं, ये सिर्फ सौ कीबात कर रहे हैं. “.फिर मानेकशा से बोले, “ “ठीक है ...आपकार्यवाई शुरू कीजिये.” मानेकशा नेपूरे कलकत्ता के कोने कोने में अपने जवान तैनात किये. खुद दिन रात हर महल्ले कादौरा करते. लोगों से मिलते , उनकीपरेशानियां सुनते, उन्हें समझाते.लोगों के घरों में राशन पहुँचवाते, बच्चों के लिए दूध भिजवाते. बीमार को पूरी सुरक्षा के साथ अस्पताल लेजाते. इस तरह आम लोगों को उनपर भरोसा हुआऔर बिना किसी खून खराबे के कुछ ही दिनों में पूरी तरह शांति बहाल हो गई.. बाद मेंसरदार पटेल ने मानेकशा को बुला कर गुजराती में कहा, ‘ “तमे साचो नहींबोलो ? तमे बोल्यो एक सो बंगालीयो ना मारसो पण एक बी नईमारयो “(तुमने सच नहींकहा था ? एक सौ बंगालीको मारोगे पर एक को भी नहीं मारा )फिर पास बुलाकर, ‘वेलडन...थैंक्यू’ कहकर उनकी पीठ थपथपाई .
पर फूलों के साथ काँटों का रिश्ता हमेशा से रहा है. अगर कुछ लोग उनकीतारीफों के पुल बाँध रहे थे तो कुछ लोग उन पुलों को धराशायी करने में भी जुटे हुएथे. मानेकशा का इतनी लगन और मेहनत से काम करना और बड़े नेताओं का उनपर अटूट विश्वासकुछ अधिकारियों से देखा नहीं जा रहा था. उन दिलजले लोगों ने मंत्रियों के कान भरनेशुरू कर दिए. सैम मानेकशा किसी के भी मुंह पर सीधे शब्दों में अपनी बात रखते जोअधिकारियों को नागवार गुजरता. वे लोग चमचागिरी के आदी थे. जूनियर्स उनकी झूठीतारीफ करें, हर बात में हाँमें हाँ मिलाये. उनके बोदे चुटकुलों पर छ्तफाड़ ठहाके लगाएं. उनके हर निर्णय कोआँखें मूँद कर सपोर्ट करें. यह सब मानेकशा से नहीं होता और वे मंत्रियों ,उच्च अधिकारियों के बैड बुक्स में आ गए. समय समय पर कही गई उनकी बातोंको तोड़-मरोड़ कर उनके विरुद्ध इन्क्वायरी बिठा दी गई. उसमें कोई भी सिरियस चार्जनहीं था ,कुछ बड़ीहास्यास्पद सी बातें थीं.
अभी इन्क्वायरी चल ही रही थी कि १९६२ में चीन ने भारत परआक्रमण कर दिया .नेहरु समेत सभी लोग चकित रह गए. भारत युद्ध के लिए बिलकुल भीतैयार नहीं था. ईर्ष्यावश मानेकशा को युद्ध की गतिविधियों से दूर रखा गया. जब कईमोर्चों पर भारत की हार होने लगी तो सैम मानेकशा के विरुद्ध आरोपों को खारिज करउन्हें युद्ध की कमान सौंपी गई. पर तब तक बहुत देर हो चुकी थी. भारत के एक बड़े भू भाग पर चीन ने कब्जा कर लिया था.चीन की जीत पर पकिस्तान इतराया और उसने भी सोचा, वह भी भारत को मात दे सकता है. पाकिस्तान अपनी अंदरूनी समस्याओं सेजूझ रहा था. उसके पास शक्तिशाली नेतृत्व नहीं था. वहाँ के लोगों को अपने नेताओं परभरोसा नहीं था . रोजमर्रा की चीजें नहीं मिल रही थीं. लोग भूखे थे, बेरोजगार थे .अपनी सरकार से बेहतर सुविधाओं की मांग कर रहे थे .और इन सबसे लोगों का ध्यानहटाने के लिए पाकिस्तान ने सोचा, ‘भारत पर आक्रमणकर देगा तो सारी जनता का ध्यान युद्ध की तरफ हो जाएगा. उनमें देशभक्ति का जोश उबालमारने लगेगा और रोज की असुविधाओं से उनका ध्यान हट जायेगा”
पर इस बार भारत की सेना सम्भल चुकी थी और अब उनके पास सैम मानेकशाजैसे सैन्य अधिकारी का साथ भी था. उनके और दूसरे जाबांज ऑफिसर्स के प्रयासों सेभारत इस युद्ध में विजयी रहा. पाकिस्तान के पास अमरीका से खरीदे आधुनिक पैटन टैंकथे. भारत के पास वही द्वितीय विश्व युद्ध के समय के पुराने टैंक थे. पर मशीन सेज्यादा मशीन चलाने वाले पर कोई भी जीत निर्भर करती है. हमारे पास साहस से भरे तेजदिमाग वाले वीर ऑफिसर थे. जिन्होंने पाकिस्तान के मंसूबों पर पानी फेर दिया. पाकिस्तान में उथल पुथल जारी थी. 1970 में आम चुनाव हुए और पूर्वीपाकिस्तान के शेख मुजिबुर्र्रह्मान की ‘आवामी लीग’ ने बहुमत हासिल किया. यह पश्चिमी पाकिस्तान के रहनुमाओं को कैसे बर्दाश्तहोता और उन्होंने पूर्वी पाकिस्तान के लोगों पर जुल्म ढाने शुरू कर दिए.पाकिस्तानी सेना ने आम लोगों पर लूट-पाट, बलात्कार, कत्ल शुरू कर दिए. आम लोग जान बचाने के लिए भारत से लगी सीमा वाले गाँवों में भाग कर आने लगे. बहुत दुखद स्थिति थी. रोज हजारों लोग अपना घर बार, सामान सब कुछ छोड़कर सिर्फ जान बचाने के लिए भारत की सीमा में दाखिलहोने लगे.
बंगाल, त्रिपुरा, असम के मुख्यमंत्री परेशान हो गए. उन्होंने उस समय की प्रधानमन्त्रीइंदिरा गांधी को चिट्ठी लिखी. और इस पलायन को रोकने के लिए कुछ करने को कहा. एक हीउपाय था ,भारतीय सेनाभेजकर पाकिस्तानी सेना को जुल्म ढाने से रोक दिया जाए. इस सूरत में युद्ध होना निश्चितही था.अप्रैल 1971 को इंदिरा गांधी ने अपने कैबिनेट की मीटिंग बुलाई और ‘सेना प्रमुख सैम मानेकशा’ को भी बुलाया.मानेकशा से पाकिस्तान पर आक्रमण के लिए कहा पर सैम मानेकशा ने बिलकुल इनकार करदिया .उन्होंने कहा, “इस वक्त हमारीसेना युद्ध के लिए बिलकुल तैयार नहीं है. कुछ ही दिनों में मॉनसून आने वाला है.बांगला देश की मिटटी दलदल सी बन जाएगी ,उसमें हमारेटैंक धंस जायेंगे .बारिश के समय वहाँ की नदियाँ छोटे मोटे समुद्र का रूप ले लेतीहैं. एक छोर से दूसरा छोर नहीं दिखता .ऐसेमें हम सही तरीके से युद्ध नहीं कर पायेंगे . अभी पंजाब के खेतों में फसल लगी हुईहै. सारी फसल रौंदी जाएगी और हमारी मूवमेंट पर भी असर पड़ेगा .इस वजह से इन सारीतैयारियों के लिए मेरी सेना को वक्त चाहिए “ रक्षा मंत्री जगजीवन राम जो सैम नहीं कह पाते थे ने भी जोर देकर कहा, ‘” साम मान भी जाओ, युद्ध के लिएतैयार हो जाओ “ पर मानेकशा ने हाथ जोड़ लिए. जब सबलोग मीटिंग से जाने लगे तो इंदिरागांधी ने मानेकशा को रुकने के लिए कहा. मानेकशा ने सबके जाने के बाद कहा, “इस से पहले कि आप कुछ कहें .मैं इस्तीफा देने केलिए तैयार हूँ. मानसिक या शारीरिक स्वास्थ्य खराब होने का कोई भी बहाना बना दूँगा.पर इस वक्त मैं युद्ध के पक्ष में बिलकुल नहीं हूँ. १९६२ की तरह हमलोग बुरी तरहहार जायेंगे “ इंदिरा गांधी ने कहा, “नहीं आपकाइस्तीफा नहीं चाहिए. मुझे ये बताइये कि आपको युद्ध की तैयारी के लिए कितना वक्तचाहिए ?” मानेकशा ने कहा, “देश के कोने कोने से अपने सैनिकों को इकट्ठाकरने, युद्ध का प्लान बनाने उन्हें प्लान समझाने, सैनिकों को बौर्डर पर तैनात करने में मुझे चार-पांच महीने लग जायेंगे.और युद्ध की तैयारी के बाद मैं आपको भारत की जीत की पूरी गारंटी देता हूँ. “ इंदिरा गांधीने हामी भरी और मानेकशा युद्ध की तैयारी में लग गए.
मानेकशा यह भी चाहते थे किभारत की शांतिप्रिय देश की छवि को कोई ठेस ना पहुंचे . पूर्वी पाकिस्तान की मुक्तिवाहिनी सेना को भारत की मदद मिल ही रही थी. उनकी योजना थी कि इन सबसे त्रस्त होकरपाकिस्तान खुद ही आक्रमण कर दे. मानेकशा ने दिसम्बर में अपनी सेना की पूरी तैयारी की सूचना इंदिरागांधी को दी. मानेकशा खुद लद्दाख से लेकर पूरे बौर्डर पर जाकर सैनिकों से मिलते औरकहते, “हमने आपको ट्रेनिंग दी, हथियार दिए अब आप अपने देश को जीत दिला दो “ सारे जवान सबसे बड़े अफसर को अपने पास देखकर जोश से भर जाते. जब इंदिरा गांधी ने पूछा, “अब हम युद्ध केलिए तैयार हैं ? “ मानेकशा नेअपने बेलौस अंदाज में कहा, “येस, वी आर रेडी स्वीटी’ इंदिरा गांधी उनकीबात करने के तरीके से वाकिफ थीं. उन्होंने बिलकुल बुरा नहीं माना और नज़रंदाज़ करदिया .3 दिसम्बर 1971 को लड़ाई शुरू हुई और सिर्फ 13 दिनों में मानेकशा केनेतृत्व में भारतीय सेना ने,पाकिस्तानीसेना को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया.पाकिस्तानी सेना बुरी तरह हार रही थी. मानेकशा को पता था, अब वे लोग सरेंडर कर देंगे . उन्होंने पहले ही समर्पण के कागज़ात तैयारकरवा लिए थे. मानेकशा ने जनरल जगजीत सिंहअरोड़ा से कहा, “ इट्स अ बिग डे इन योर लाइफ. टेक योर वाइफ विदयू.” सैम मानेकशा के मन में औरतों के लिए बहुत इज्जतथी. प्रधान मंत्री और सेनाप्रमुख दोनों काएक दूसरे पर भरोसा बहुत जरूरी है. तभी कोई देश आगे बढ़ता है. पाकिस्तानी जनरल नियाज़ी के साथ 93 हज़ार पाकिस्तानी सैनिकों ने सरेंडरकर दिया. एक नए देश ‘बांग्ला देश’ का उदय हुआ.
पर मानेकशा को बंदी बनाये गए ,पाक्सितानी सैनिकों की ज्यादा चिंता थी. वे उन्हें लेकर भारत आये.उनके आराम का पूरा ख्याल रखा. भारतीय सैनिक टेंट लगाकर सोते थे. जबकि बंदी बनायेगए पाकिस्तानी सैनिक उनके पक्के बैरक में सोते थे. मानेकशा कैम्प में जाकर सभी से मिलते. पाकिस्तानी सूबेदार से पूछते , ‘बिस्तर में खटमल तो नहीं है. मच्छरदानी है ना. “ फिर उनके किचन में जाकर खुदखाना खा कर देखते कि खाना ठीक बना है या नहीं. साफ़ सफाई करने वाले से हाथ मिलानेको हाथ बढाया तो उस सफाईकर्मी ने मना कर दिया. मानेकशा ने कहा, ‘क्यूँ कोई नाराजगी है...हाथ क्यूँ नहीं मिलाओगे ?’ उसने हाथ मिलाया जब वे सबसे मिलकर जाने लगे तोपाकिस्तानी सूबेदार ने कहा, ‘गुस्ताखी माफ़हो हुजुर तो कुछ पूछूँ ? ‘ मानेकशाने कहा,, ‘आप हमारेमेहमान हैं कुछ भी पूछ सकते हैं. उसने कहा, “अब मुझे पता चलगया कि हिन्दुस्तानी फ़ौज क्यूँ जीती. आप खुद जाकर सिपाहियों से मिल रहे हैं. उनकेआराम का ख्याल रख रहे हैं. उनका खाना चखकर देख रहे हैं. हमारे यहाँ ऐसा नहीं होता. सेना के अफसर अपने आपको नवाबजादे समझतेहैं.” मानेकशा को ये ख्याल था कि ये पाकिस्तानी अपने गाँव जायेंगे . वहाँखटिया पर बैठेंगे, हुक्का पियेंगे. अपने गाँव वालों को युद्ध के किस्से सुनायेंगे .तब वोहमारे बारे में कहेंगे कि हिन्दुस्तान के लोग बुरे नहीं हैं ,उन्होंने हमारा ख्याल रखा. उनके मन में हमारे लिए नफरत का जलजला नहींहोगा.जब वे रिटायरमेंट के बाद पाकिस्तान गए तो पाकिस्तानी सैनिकों ने अपनी पगड़ीउतार कर उनके पैरों पर रख दी और उन्हें अपने भाइयों के साथ इतना बढ़िया सुलूक करनेके लिए दिलो जान से शुक्रिया कहा.
१९७२ में उन्हें पद्मविभूषण दिया गया. १९७३ में उन्हें ;फील्ड मार्शल’ की उपाधि दीगई. वे जीवनपर्यन्त भारत के फील्ड मार्शल रहे. एक सार्थक भरी पूरी जिंदगी जीने के बाद 27 जून 2008 को उन्होंने अपनीआँखें सदा के लिए मूँद लीं

Saturday, February 1, 2020

फ़िल्म पंगा : अधूरे सपनों को पूरा करने की जद्दोजहद

हमारे देश क्या पूरे संसार में ही कुछ वर्ष पहले तक लड़के/लड़कियों के काम सुनिश्चित थे।उन्हें शादी कर घर और बच्चे की देखभाल करनी है और लड़के को नौकरी कर पैसे कमाना है।धीरे धीरे बदलाव आए लड़कियाँ पढ़ने लगीं, नौकरी करने लगीं लेकिन घर और बच्चे की जिम्मेवारी आज भी उनकी ही है।(अपवाद छोड़कर)

पर जब लड़कियाँ पढ़ रही होती हैं,बढ़ रही होती हैं,उनके भी कई शौक होते हैं। वे खेलती हैं, पेंटिंग करती हैं, गाने गाती हैं,लिखती हैं पर फिर वही शादी-बच्चे और सबकुछ बैकसीट पर। पर अगर कोई शादी-बच्चे के बाद भी वापस अपनी कला,अपने खेल में वापस लौटना चाहे तो उसे उसके पूरे परिवार,दोस्त, सहकर्मी सबके सहयोग की जरूरत होती है।खुद पर भी बहुत मेहनत करनी होती  है।समय आगे निकल गया होता है और हर क्षेत्र में बहुत बदलाव आ गए होते हैं। उस लेवल तक खुद को लाने के लिए कड़े परिश्रम की आवश्यकता होती है।

फ़िल्म 'पंगा' एक कबड्डी खिलाड़ी की इसी यात्रा और संघर्ष की कहानी है। पति और समाज ने खेल में उसकी सफलता देखी है ।पर उसके बेटे ने सिर्फ उसका 'मम्मी रूप' ही देखा है। वो एक कड़ी बात कह देता है, 'रेलवे में टिकट ही तो काटती हो।' हालांकि बेटे के मुँह से ये ताना अच्छा नहीं लगता पर आजकल बच्चे ऐसा बोलते हैं और कार्टून देखकर तो उनकी भाषा और लहजा बिल्कुल ही बदल गया है।पर जब बच्चे को पता चलता है कि उसकी माँ राष्ट्रीय स्तर की कबड्डी खिलाड़ी रह चुकी है तो वह उनके कम बैक के लिए बहुत जोर देता है। सेरेना विलयम्स का उदाहरण भी देता है पर एक बात समझ नहीं आई। फ़िल्म के लेखक/निर्देशक ने मैरी कॉम का उदाहरण क्यों नहीं दिया। पश्चिम की तरफ देखने की आदत हमारी जाएगी नहीं 😏

जया निगम के कम बैक की मेहनत बहुत तफ़सील से दिखाई गई है।अक्सर किसी खेल पर बनी फिल्म में खेल कम होता है,इमोशन और ड्रामे ज्यादा होते हैं।पर इसमें बहुत सारा कबड्डी भी है। कंगना की ट्रेनिंग, अड़चनें, असफलता और फिर सफलता सब देखने को मिलती है।
फ़िल्म में एक रोचक दृश्य है। किसी की दमित इच्छाएं, अवचेतन में किसी भी रूप में निकल सकती हैं। सबलोग फिल्म देखने जाएंगे नहीं, इसलिए बता देती हूँ ,जया नींद में लात चलाती हैं। तो नए-नवेले पतियों, पत्नी की इच्छा रोकने की कोशिश मत करना।और लड़कियों तुम्हें भो आइडियाज मिल गए हैं 😀

पति के रूप में जस्सी गिल का काम बहुत अच्छा है।फ़िल्म देखकर ही सही ऐसे संवेदनशील,समर्पित, हेल्पफुल,प्यार करने वाले पतियों की संख्या में इज़ाफ़ा हो तो बेहतर :)  नीना गुप्ता माँ के छोटे से रोल में हर दृश्य में अपनी छाप छोड़ जाती हैं। सिनेमा अब निरूपा राय वाली माँ के इमेज से बहुत आगे निकल गया है। माँ अपनी ज़िंदगी भी जीती है, बेटी से असहमति भी दिखाती है और समय पड़ने पर उसकी सहायता भी करती है।हालांकि बच्चे के मुँह से नानी का मजाक कुछ अच्छा नहीं लगता। हर बच्चा अपनी नानी के बहुत करीब होता है (जैसा मैंने अब तक देखा है)।
ऋचा चड्ढा ने बिंदास दोस्त की भूमिका बहुत अच्छी निभाई है । सिर्फ लड़के ही नहीं, अब लड़कियाँ भी अपना सबकुछ छोड़कर अपनी सहेली की सहायता के लिए आ सकती हैं।

फ़िल्म क्वीन से ही 'कंगना रनौत' ने साबित कर दिया है कि वे बड़ी कुशलता से पूरी फिल्म अपने कंधे पर ढो सकती हैं। माँ-खिलाड़ी हर रोल में उनका अभिनय बहुत सहज है। अब उनकी फैन फॉलोइंग भी जबरदस्त हो गई है। मेरी एक फ्रेंड जिसे फिल्मों में खास रुचि नहीं है, उसने जैसे ही सुना कि नायिका कंगना रानौत है, ना उसने फ़िल्म का नाम पूछा ना विषय और फ़िल्म देखने को तैयार हो गई।

'निल बटे सन्नाटा' के बाद निर्देशक 'अश्विनी अय्यर तिवारी' की फ़िल्म 'पंगा' से पता चलता है,उनमें  छोटे छोटे क्षण पकड़ने की अद्भुत क्षमता है। फ़िल्म में जरा भी बोझिलता नहीं है। पूरी फिल्म में एक खुशनुमा अहसास छाया रहता है। उनसे आगे भी ऐसी फिल्मों की उम्मीद बनी रहती है जहाँ स्त्री कभी भी आस नहीं छोड़ती और डिप्रेशन में नहीं जाती बल्कि हर हाल में ज़िन्दगी जीना नहीं छोड़ती।

ये फ़िल्म महिलाओं से ज्यादा पुरुषों को देखनी चाहिए। महिलाएं तो अपनी इच्छाएं/सपने जानती ही हैं। पुरुषों को प्रेरणा लेनी चाहिए कि किस तरह वे उनके सपने पूरे करने में सहायक हो सकते हैं ।

Sunday, January 12, 2020

फ़िल्म 'छपाक' : तेज़ाब बोतल से पहले दिमाग में आता है

मैंने एसिड सर्वाइवर्स से सम्बन्धित कुछ आलेख लिखे हैं. जिसे Alok Dixit ji    ने शेयर भी किया था . बहुत पहले से लक्ष्मी अग्रवाल , अंशु राजपूत से जुडी हुई हूँ. इनका हौसला, जिंदगी जीने का ज़ज्बा हमेशा ही प्रेरणा देते हैं. जब लक्ष्मी अग्रवाल के जीवन पर 'छपाक' फिल्म बन रही थी,तभी से इसके रिलीज़ होने का इंतज़ार शुरू हो गया था . और संयोग ऐसे जुटे कि जल्दी से इसे देख भी लिया. इस तरह की फ़िल्में सबको जरूर देखनी चाहिए ताकि आमजन सोचने पर मजबूर हो जाए ,ये कैसे वहशी समाज में हम रह रहे हैं जहाँ एक लडकी के 'ना' की ऐसी सजा उसे दी जाती है.

'छपाक' फिल्म का विषय इतना गम्भीर होते हुए भी यह फिल्म बिलकुल भी बोझिल नहीं है. एसिड से बिगड़े हुए चेहरे के साथ एक लड़की कैसे अपना दर्द भुलाकर  आम सा जीवन जीने की ज़द्दोज़हद में लगी होती है, पूरी फिल्म इसी पर आधारित है. एसिड से जलते शरीर की दर्द भरी चीखें आपके अंतस को झकझोर देती हैं. पर मालती सिर्फ अपनी किस्मत पर रोते बिसूरते हुए नहीं बैठती बल्कि आगे बढ़कर अपने जीवन की बागडोर अपने हाथों में लेती है, कोर्ट में पेश होकर अपराधी को सजा भी दिलाती है और एसिड की खुलेआम बिक्री पर रोक लगाने के लिए PIL भी दाखिल करती है. मालती खुशनसीब है कि उसकी मालकिन उसके इलाज का खर्च उठाती हैं, वकील उसका साथ देती हैं, उसकी हिम्मत बढाती हैं .पर सभी लडकियां इतनी किस्मतवाली नहीं हैं. फिल्म में ही एक लडकी मालती से कहती है, " दीदी आपकी सात सर्जरी हुई तब आपको ऐसा चेहरा मिला. हमारी दूसरी सर्जरी के ही पैसे नहीं जुट रहे." सभी एसिड सर्वाइवर्स के इलाज का खर्च सरकार को उठाना चाहिए ,आखिर अपने नागरिकों को सुरक्षा देने की जिम्मेवारी सरकार की है. एसिड की बिक्री पर बैन लगाने के बावजूद भी यह कैसे सहज उपलब्ध हो जा रहा है और मासूमों की जिंदगी तबाह किये जा रहा है ??

एसिड एक लडकी पर फेंका जाता है पर उसकी झुलसन में पूरा परिवार झुलस जाता है. एक सामान्य जिंदगी जीते, हंसते-खेलते परिवार की सारी जिंदगी उलट पुलट जाती है. इस गम से उबरने में मालती के पिता शराब में डूब जाते हैं. भाई उपेक्षित हो जाता है, समाज के उपहास भरे तानों से डिप्रेशन में जाकर गम्भीर बीमारी लगा बैठता है. फिर भी इन सबसे अगर मालती टूट जाती तो ये उस अपराधी की जीत होती . अपने ऊपर किये किसी भी जुल्म का जबाब यही है कि घुटने ना टेके जाएं, जुल्म के बावजूद अपना सामान्य जीवन जारी रखा जाए, हंसना-बोलना-खुश रहना ना छोड़ा जाए तो ये उस आतातायी की सबसे बड़ी हार होती है.

फिल्म में बड़े subtle तरीके से दिखाया गया है कि इनलोगों को सिर्फ कोरी सहानुभूति की नहीं बल्कि आर्थिक संबल की ज्यादा आवश्यकता है. मालती अपना इंटरव्यू लेने वालों से भी पूछ लेती है, 'उनके यहाँ कोई नौकरी है ? ' NGO के संचालक से भी पहला सवाल यही करती है, 'सैलरी कितनी मिलेगी ?". जागरूकता फैलाना,विरोध करना,  न्याय के लिए आवाज़ उठाना सब अपनी जगह सही है पर अपना और अपने परिवार का पेट पालने का प्रश्न पहला होता है.
लडकियों का तन मन झुलस जाता है पर नारी सुलभ इच्छाएं तो यथावत रहती हैं. जब मालती डॉक्टर से भोलेपन से पूछती है, 'मेरा कान बना सकते है ?' (उसे झुमके पहनने का बहुत शौक है ) तो दर्शकों के भीतर कुछ दरक जाता है. फिल्म में एक जगह मालती दृढ़ता से कहती है, "उसने सिर्फ मेरा तन बिगाड़ा है .मेरा मन वैसा अहि है.उसपर कोई असर नहीं हो सका "

फिल्म के अंत में आंकड़े पढ़कर एक सदमा लगता है .2013 के बनिस्पत 2017 में एसिड फेंकने की घटना में दुगुनी बढ़ोत्तरी हो गई है. फिल्म में आखिरी दर्ज घटना 7 दिसम्बर 2019 की है . Anshu Rajput ji के स्टेटस में देखा ..कल यानी 11 जनवरी 2020 को ही लखनऊ में तेरह साल की एक बच्ची के ऊपर तेज़ाब फेंका गया है. लडकियाँ आगे बढ़ रही हैं, घर से निकल रही हैं, सर झुकाकर किसी का भी प्रेम निवेदन स्वीकार नहीं कर रहीं, ना कहना सीख रहीं हैं और उसकी ऐसी भीषण सजा भुगत रही हैं. मुंबई प्लेटफार्म पर प्रियंका राठौर के साथ हुए हादसे का पूरा अपडेट रोज पढ़ती थी. नेवी ज्वाइन करने के लिए मुंबई आने वाली प्रियंका के ऊपर उसके पडोसी लड़के ने सिर्फ इसलिए एसिड फेंक दिया क्यूंकि वो नकारा और आवारा था और उसके घरवाले उसे प्रियंका का उदाहरण देते थे . टेढ़े मेढ़े अक्षरों में लिखी  प्रियंका की वो चिट्ठी अखबार में भी पढ़ी थी, जहां वो अपने बिगड़े हुए चेहरे के साथ भी सिर्फ ज़िंदा रहना चाहती थी ताकि पैसे कमा कर अपने पिता की मदद कर सके. पर वो जान गंवा बैठी.

फिल्म का एक डायलॉग है , "किसी को नेस्तनाबूद कर देने का, तबाह कर डालने का ,बर्बाद कर देने का ख्याल पहले दिमाग में आता  है तब उसके बाद एसिड की बोतल हाथों में आती है " इसलिए दिमाग का इलाज़ ज्यादा जरूरी है. ऊँची जाति वाले निम्न जाति की लडकियों को सबक सिखाने के लिए उनपर एसिड फेंक देते हैं. और ऐसे जघन्य कृत्य में कोई जेंडर विभेद नहीं है. मालती के ऊपर एसिड एक लडकी ही फेंकती है. 'लक्ष्मी अग्रवाल' के एक इंटरव्यू में भी सुना था कि उन्हें लड़कियों से ही ज्यादा ताने मिलते हैं.पूरे समाज की मानसिकता ही विकृत हो चली है.

मेघना गुलज़ार ने बहुत ही संवेदनशील फिल्म बनाई है .दीपिका पादुकोण ने इसे मेघना गुलज़ार के साथ प्रोड्यूस भी किया है. दीपिका ने जिस तरह  पूरी फिल्म में अपने चेहरे पर एसिड विक्टिम का मेकअप किये रखा,उसकी तारीफ़ के लिए शब्द नहीं हैं. जनता से जो प्यार उन्हें मिला है, ऐसी फिल्मों में काम कर वे सूद समेत वापस कर रही हैं (और बदले में और प्यार पा रहीं हैं ) .मालती के संघर्ष में मितभाषी साथी के रूप में विक्रांत मैसी ने बहुत अच्छा काम किया है. सभी सह कलाकार अपने रोल को जीते हुए प्रतीत होते हैं. पूरी फिल्म में टुकड़ों में बजता गीत बहुत कर्णप्रिय है.

Sunday, August 25, 2019

फिल्म मिशन मंगल ; एक समीक्षा


मंगल मिशन ' फिल्म पर ज्यादातर नकारात्मक  प्रक्रियाएं मिलीं. कुछ ने तो कहा कि फ्री में टोरेंट पर बढ़िया प्रिंट मिले तब भी न देखो.  पर मैं तो कभी किसी की सुनती नहीं, इसलिए थियेटर में देखने चली गई. पर फिल्म देखने के बाद आभास हो गया कि वे लोग ऐसा क्यूँ कह रहे थे. जिन्हें विषय पर केन्द्रित, तकनीकी रूप से उन्नत, अंग्रेजी फ़िल्में देखने की आदत होगी, उन्हें यह फिल्म बहुत निराश करेगी बल्कि एक मजाक ही लगेगी. लेकिन आमजन जो ज्यादातर मनोरंजन के लिए फ़िल्में देखते हैं, उनके लिए यह एक जरूरी फिल्म है. फिल्म को मनोरंजक बनाते हुए जरूरी जानकारी भी देने की कोशिश की गई है. ये अलग बात है कि फिल्म में बॉलीवुड मसाला डालने के चक्कर में सब घालमेल हो गया है और इसी वजह से सिनेमा के गम्भीर दर्शक चिढ गए हैं. लेकिन फिर भी लोगों तक सरल भाषा में ‘मंगल ग्रह अभियान’ की मोटी मोटी बातें पहुँचाने की कोशिश की गई है.

मंगलयान की सफलता पर हमसबने उस मिशन में शामिल महिलाओं की तस्वीरें लगाई थीं और गौरवान्वित भी हुए थे .यह पूरी फिल्म मंगल मिशन को सफल बनाने के उनके संघर्ष,लगन, जुनून के इर्द गिर्द बुनी गई है. 2010 में जब राकेश धवन( अक्षय कुमार) के नेतृत्व में ISRO की एक टीम रॉकेट लौंच करने में असफल हो जाती हैं तो उन्हें सजा के तौर पर मंगल अभियान की तैयारी के लिए भेज दिया जाता है. जिसके लिए न कोई स्पष्ट योजना है, ना बजट और ना ही अनुभवी वैज्ञानिकों की टीम उन्हें मिलती है. वैज्ञानिक तारा (विद्या बालन ) जो उस असफलता के लिए खुद को दोषी मानती हैं, राकेश धवन का पूरा साथ देती हैं. उनकी टीम में चार और महिलाएं और दो पुरुष शामिल होते हैं . सब मिलकर रोजमर्रा के जीवन की छोटी छोटी घटनाओं से प्रेरणा लेकर अभियान को सफल बनाने में जुट जाते हैं. पैसे की अतिशय कमी की वजह से खर्च कम करने के लिए कई तरह के जुगाड़ लगाए जाते हैं.(जिसमें भारतीय माहिर हैं 😊 ) राकेश धवन बजट की बात पर १९६३ में पहले रॉकेट प्रक्षेपण का उदाहरण देते हैं, तब भी पैसे इतने कम थे कि रॉकेट के अलग अलग पार्ट, साइकिल और बैलगाड़ी पर ढो कर ले जाए गए थे . काम करने का जुनून हो तो रास्ते खुद ब खुद निकलते चले आते हैं. कई अडचनों को पार करते हुए एक हॉलीवुड फिल्म की बजट से भी कम बजट में भारत, मंगल ग्रह के ऑर्बिट में प्रथम प्रयास में ही सफलतापूर्वक सेटेलाइट भेजने वाला,पहला देश बन जाता है. ये सारी तकनीकी बातें भी बहुत सरलता से दर्शकों तक पहुंच जाती हैं.

फिल्म ‘मंगल अभियान पर केन्द्रित है पर निर्माता-निर्देशक की रूचि फिल्म में इस अभियान से इतर वैज्ञानिकों की निजी जिंदगी दिखाने की है जो पूरी तरह उनकी कल्पना पर आधारित है. दर्शकों को बांधे रखने के लिए कोई मसाला छोड़ा नहीं गया, सास-बहू की नोंक-झोंक, घर-बाहर एक साथ सम्भालती सुपर वूमन, तलाक के बाद अकेली मुस्लिम लडकी को घर मिलने की परेशानी, एक आज़ाद-ख्याल लडकी का सिगरेट फूंकना और बॉयफ्रेंड बदलना, एक कुंवारे चम्पू लडके का बाबाओं के चक्कर लगाना, विदेश में बसे बेटे द्वारा बूढ़े माँ-बाप की उपेक्षा, एक आर्मी ऑफिसर का घायल होना, सब शामिल है. देशभक्ति का तड़का भी भरपूर है.  पर पता नहीं एकाध जगह फूहड़ हास्य भी शामिल करने की क्या मजबूरी थी.

इन सबके बावजूद यह फिल्म देखी जानी चाहिए. जिन लोगों ने विस्तार से मंगलयान के अभियान के विषय में नहीं पढ़ा, शायद उनकी रूचि जागेगी . फिल्म में दी गई थोड़ी सी जानकारी से उनका मन नहीं भरेगा वे सब कुछ जानना चाहेंगे. क्या पता कोई बच्चा वैज्ञानिक बनने का सपना भी देखने लगे और पढाई में मन लगाए ( हो सकता है ये उम्मीद कुछ ज्यादा लगे पर उम्मीद ही तो है ) .
फिल्म में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका विद्या बालन की है जो उन्होंने बखूबी निभाई है. अक्षय कुमार 
कभी कभी कुछ ज्यादा ही ड्रामेटिक लगते हैं. शरमन जोशी, थ्री इडियट्स के बाद से ही चम्पू लडके के रोल में टाइप्ड हो गए हैं पर अभिनय सहज ही था . सभी कलाकारों ने अपनी भूमिका के साथ न्याय किया.
गीत-संगीत की गुंजाइश इस फिल्म में नहीं थी फिर भी डिस्को का एक लचर सा निरर्थक  दृश्य रचा अगया है. छायांकन बहुत सुंदर है.

मंगल अभियान की सफलता का सारा श्रेय इसरो के वैज्ञानिकों के अथक परिश्रम को है. पर फिल्म तो चैरिटी या शौक के लिए नहीं बनाई गई है. वैज्ञानिकों के संघर्ष पर फिल्म बनाकर पैसे कमाने हैं, शायद कर मुक्त करवाने की लालसा में अंत में मोदी जी का भाषण भी शामिल किया गया है. या फिर पार्टी विशेष के लिए अपनी प्रतिबद्धता दिखानी हो पर इस फिल्म में बहुत असम्बद्ध सा लगता है.

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