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बुधवार, 14 अगस्त 2013

जीना यहाँ,मरना यहाँ...इसके सिवा जाना कहाँ

मुम्बई एक happening city  तो है ही...हमेशा चर्चा में रहती है . कुछ लोगो को पसंद आती है कुछ लोगो को नहीं, कोई इस शहर से बेपनाह मुहब्बत  करता है तो कोई शिद्दत से नफरत तो किसी किसी के नफरत और मुहब्बत का पलड़ा बिलकुल बराबर का रहता है. इस शहर में कोई मजबूरीवश रहता  है  तो कोई शौक से रहता है . इस शहर के अन्दर भी हर तबके के लोगों के लिए जैसे एक अलग शहर बना हुआ है. और ये  सारे शहर समानांतर चलते हैं. और सब अपने अपने शहर में मगन रहते हैं.एक दुसरे के क्षेत्र  का अतिक्रमण नहीं करते. 

इस शहर में हज़ार कमियाँ हैं . सडकों की हालत खस्ता है . रोड पर गड्ढे हैं.( मुम्बई की सडकों से कहीं अच्छी तो मेरी गाँव की सड़कें हैं .मेरा बेटा  हैरान था ,वहाँ की सड़कों को देखकर..'माँ, एक भी गड्ढा नहीं है सड़क पर' ये उदगार थे उसके  ) भयंकर ट्रैफिक जैम है . एक जगह से दूसरी जगह पहुँचने में घंटो लगते हैं. बेतहाशा महंगाई है . लगातार होती बारिश है... बहुत भीड़ है..गंदगी है... ढूँढने बैठें तो शायद लिखते थक जाएँ पर कमियों की फेहरिस्त ख़त्म न हो.

 मुम्बई में कुछ महीने गुजार चुके एक मित्र ने एक दिलचस्प बात नोटिस की कि इस शहर में इतनी सारी कमियाँ होते हुए भी यहाँ रहने वाला  एक भी व्यक्ति,उन्हें  ऐसा नहीं मिला जिसे मुंबई से शिकायत हो, इस शहर को भला-बुरा कहे, कोसे ...यहाँ रहने वाले सभी को मुंबई पसंद है ....जबकि ऐसा किसी और शहर के लिए उन्होंने नहीं देखा ."

उनकी इस बात ने सोचने के लिए मजबूर कर दिया ,आखिर ऐसी क्या बात है, मुम्बई में ??
 बाहर से आनेवालों को मुम्बई पसंद नहीं आती पर वही बाहर से आये लोग जब यहाँ के बाशिंदे बन जाते हैं तो उन्हें मुम्बई रास आ जाती है. हालात वहीँ रहते हैं पर नज़रें बदल जाती हैं...भावनाएं अलग सी हो जाती हैं .

इसका मतलब यही होगा कि जब लोग यहाँ बसने की सोच लेते हैं तो फिर इस शहर को अपना लेते हैं... उसके अनुसार रहने की आदत डाल लेते हैं . इसकी अच्छाइयां-बुराइयां उनकी अपनी हो जाती हैं. और जब किसी को भी, चाहे वो शहर हो या व्यक्ति या कोई वस्तु ,अपना लो तो उसकी बुराइयां दिखती तो हैं पर खलती नहीं. कुछ देर के लिए खीझ भी जाएँ...परेशान भी हो जाएँ पर ये भाव स्थायी नहीं होते  क्यूंकि "जीना यहाँ,मरना यहाँ...इसके सिवा जाना कहाँ

अब जिन शहरों में रहते हुए भी लोग नाखुश रहते हैं, उस शहर से शिकायत होती है तो शायद यही वजह होती हो कि उनके सामने हमेशा ये विकल्प खुला होता है , "उस शहर को छोड़ कर चले जाने का " . दुसरे शहर में बसने का सपना पलता रहता है उनके मन में . इसमें कोई बुराई भी नहीं ,हर किसी  को बेहतर भविष्य के प्रयास का हक है. पर जिनलोगों ने उस शहर को अपना बसेरा बना लिया होगा, वे शायद शिकायत न करते हों, उस शहर को भला-बुरा न कहते हों  या करते भी हों तो खुद के लिए नहीं अपने बच्चों के लिए क्यूंकि उन्हें बच्चों के भविष्य के लिए शायद साधन सीमित लगते हों,वहाँ  .वरना अपनी पुरानी बनिए की दूकान, दूधवाला , सब्जीवाली , कपड़े की दूकान जिसे अब दादा के बाद पोता चला रहा हो..सब अपने से लगते होंगे .रास्ते में जमा  पानी और नियमित पावर कट भी जीवन का हिस्सा बन गए होंगे .और अपने हिस्से से शिकायत कैसी ? 
(वैसे कुछ लोगों की शिकायत की आदत ही होती है,  हर चीज़ से शिकायत होती है,उन्हें ...उनका जिक्र नहीं हो रहा ,यहाँ ) 
मेरा गाँव 

वरना मेरे गाँव में ज्यादा सुविधाएं नहीं थीं. बिजली नहीं रहती थी (अब भी नाम के लिए ही आती है ) ..शहर दूर था ,अच्छे डॉक्टर नहीं थे पर हमने अपने दादा जी को या गाँव के लोगो को कभी गाँव की बुराई करते नहीं सुना .क्यूंकि वो 'उनका गाँव' था .उस से अलग जीवन उन्होंने जिया नहीं था और ना ही जीने की इच्छा थी,इसीलिए उन्हें कोई शिकायत भी नहीं थी. 


गुरुवार, 25 अप्रैल 2013

सुबहें किसिम किसिम की


सुबह वॉक पर जिन सड़कों से गुजरती हूँ वह शांत बंगलों का इलाका है. उनींदे से बंगले भरी दुपहर को भी शायद नींद से पूरी तरह नहीं जागते. इन बंगलों में या तो विदेश में बस गए बच्चों के माता-पिता हैं या केयरटेकर. इनलोगों का इन बंगलों को बेचने का कोई इरादा नहीं. वरना बिल्डर्स की गिद्ध दृष्टि तो लगी हुई है कि कब कोई बंगले का मालिक इन का मोह त्यागे और ये उस जगह पर आकाश छूती बिल्डिंग खड़ी कर दें. बंगलों के छोटे-छोटे गेट शांत वीतराग से दीखते हैं. सुबह सुबह कभी कोई आता-जाता नहीं दीखता और मुझे अपने बचपन की कॉलोनी याद आ जाती है.  एकदम से जैसे पूरा परिदृश्य  जीवंत हो उठता है. ऐसा लगता है, एक गेट पर अखबार पढ़ते शर्मा जी खड़े हैं और दूसरी गेट पर खड़े सिन्हा साहब से जोर जोर से अखबार में पढ़ी कोई खबर डिस्कस कर रहे हैं. खबर ज़रा इंटरेस्टिंग हुई तो कुछ कुर्सियां निकल आती  .आस-पास के ऑफिसर्स   क्वार्टर से और लोग भी जुट जाते . एक घर से चाय की प्यालियाँ आ जातीं जो बहस को और गरमा देतीं. अचानक कोई घडी देखता और सबको याद आ जाता, दफ्तर जाना है . सब तैयार होने के लिए अपने अपने घर का रुख करते हैं और सभा बर्खास्त हो जाती .

ऐसी जाने कितनी बीती सुबहों की  यादें ,स्मृति की किवाड़ थपथपा गुजर जाती हैं . 
कभी गाँव  की सुबह आँखों के आगे साकार हो जाती  है, जहाँ प्रसाद काका अरहर के सूखे डंठलों से बाहर झाड़ू लगा रहे होते. झाडू लगा, पत्ते, लकड़ी (दूसरी गंदगी तो होती नहीं ) एक कोने में इकट्ठे कर देते कि रात में जलाएंगे . दादा जी एक कुर्सी पर बैठे , गाय बैलों को सानी देने का निर्देश दे रहे होते. गाय- बैलों की बथान में चारा कट रहा होता . .. सामने की सड़क से ढेर सारी गाय-भैंसों को हांकता और खुद एक भैंस पर सवार शिवनाथ ऊँचे स्वर में आल्हा -उदल गाते, उन्हें चराने के लिए ले जा रहा होता . घर से लगे किचन गार्डन में चाचा अपनी खुरपी ले सब्जियों के पौधों की देखभाल में लगे होते. हर मौसमी सब्जी उस गार्डेन में होती. मटर की फलियाँ, टमाटर, मिर्ची , भिन्डी, गोभी को हम छू छू  कर ही खुश  हो लेते. चाचा कभी मना नहीं करते, भले ही उन्हें क्यारियाँ दुबारा बनानी पड़ें. कभी कभी हमें उन्हें तोड़ने की जिम्मेवारी भी सौंपी जाती और इनाम में चौकलेट भी मिलती. 
पर सुबह तो हम  बच्चे लोग उनींदे से बाहर  के बरामदे मे चौकी पर बैठे होते. दादी , बाहर एक चबूतरे पर स्थित हनुमान  जी की पूजा कर डलिया लिए अन्दर के भगवान  की पूजा करने  जा रही होतीं. हनुमान जी के चबूतरे पर पास ही खड़े गुलमोहर और कनेल के पेड़ की सघन छाया होती. दादी तो सुबह शाम ही पूजा करतीं पर कनेल का पेड़ दिन भर अपने पीले पीले फूलों का अर्पण करता रहता . उन दिनों भाग- दौड़  के खेल ही पसंद थे, दादी के कहने पर कभी बस हाथ जोड़ने के लिए ही हम बच्चे उस चबूतरे पर जाते . अब सोचती हूँ, उस ठंढे चबूतरे पर पेड़ों की सघन छाया में बैठ कोई किताब पढ़ना कितना सुखदायक  अनुभव होता.
अन्दर जाते हुए दादी , हमें नाश्ता करने का निर्देश  देती जातीं. हम आँगन में आ जाते. एक तरफ काकी हंसुए (फसुल ) से ढेर सारी  सब्जी काट रही होतीं. उनकी बेटी या तो आँगन में पड़े सिल पर ढेर सारा मसाला पीस रही होती या फिर चापाकल से बाल्टियों में पानी भर  रही होतीं . लकड़ी के चूल्हे पर मिटटी का लेप लगाए पीतल के दो बड़े बड़े बर्तन चढ़े होते, एक में दाल उबल रही होती और दुसरे में चावल के लिए  अदहन खौल रहा होता. चाची हमें देखते ही पूछतीं , "क्या खाइएगा  नाश्ते में ? " 
अब ख्याल आता है कभी चाची से भी कोई पूछता था" क्या खायेंगी या नाश्ता किया या नहीं ?" या किसी भी गृहणी से कोई पूछता है, कभी ?? 

नाश्ते का ख्याल  जैसे वर्त्तमान  में ला पटकता  है  . गुलाबी  सुबह हो या सुहानी शाम...नाश्ता-लंच -डिनर में क्या बनाना है, जैसी चिंताएं किसी महिला का कभी पीछा नहीं छोड़तीं. पर वो विचार जैसे माथे पर एक थपकी दे चला जाता है. सुबह अपना सौन्दर्य समेटे वैसे ही खड़ी रहती है, ध्यान नहीं भटकने  देती.
 पर सुबह तो गाँव की हो, मुंबई की हो या टिम्बकटू की भली सी ही लगती है {वैसे टिम्बकटू की सुबह देखी नहीं है :)} मुंबई की दौड़ती- भागती सड़कें भी जैसे सुबह दम भर को सुस्ता रही होती हैं . इक्का दुक्का कार, ऑटो उन्हें हौले से जगाती है पर वे करवट बदल फिर सो जाती हैं .लेकिन जल्द ही स्कूल जाते बच्चों का ग्रुप सड़क के किनारे जमा होने लगता है और बसों की आवाजाही,अगले चौबीस घंटो के लिए  सड़क को पूरी तरह जगा देती है .

सुबह की सैर सेहत सुधारने के लिहाज से की जाती है. पर इसके साथ कुछ फायदे अपनेआप जुड़
जाते हैं .एक तो घर से निकलते ही मुस्कराहटों का आदान-प्रदान , सुबह की शुरुआत इस से अच्छी और क्या होगी और हर थोड़ी दूर पर खिले खिले चेहरे वाले बच्चों को देख दिन यूँ ही बन जाता  है. कहीं चार लडकियां बेपरवाह हंस रही होती हैं और मन अपने आप एक छोटी सी दुआ मांग लेता है ,' ईश्वर इनकी हंसी यूँ ही हमेशा सलामत रखना '. कहीं कोई अलसाया ,उनींदा सा बच्चा ,अपनी माँ की गोद में चढ़ा हुआ होता है. माँ खुद ही एक स्कूल गर्ल सी लग रही होती है .पास ही शॉर्ट्स में एक युवा पिता बच्चे का बैग कंधे पर टाँगे खड़ा होता है. एकदम जैसे पास खड़े बच्चे का बड़ा रूप .अच्छा लगता है ज्यादा से ज्यादा पिताओं को बच्चों की जिम्मेवारी लेते  देख. एक आबनूसी रंग के छः फीट  से भी लम्बे पिता , के एक कंधे पर गुलाबी दुसरे पर नीली बैग और गले में गुलाबी-नीले रंग के वाटर बोतल  टंगे देख तस्वीर खींचने को हाथ मचल जाता है. पर रोक लेती हूँ खुद को. वैसे वे शायद बुरा भी नहीं मानते , दोनों बेटियों से बातें करते ,उनके दांतों की धवल पंक्ति चमक चमक जाती है, और उनके स्नेहिल स्वभाव का परिचय दे जाती है. पर किसकी किसकी फोटो लूँ ?? थोड़ी  ही दूर पर एक पिता अपने नवजात शिशु को धूप में लेकर खड़ा रहता है, नवजात शिशुओं को अक्सर जौंडिस की शिकायत हो जाती है और डॉक्टर शिशु को धूप सेंकने की सलाह देते  हैं. इसे भी वही शिकायत होगी. नई नवेली माँ  को जैसे पति पर भरोसा नहीं होता , वो हर थोड़ी देर बाद आकर बच्चे के कपड़े पर यूँ ही हाथ  फेर जाती है . बच्चे को कपड़ा तो ओढ़ाना नहीं जो वो ठीक कर जाए. खुले बदन , बेसुध सो रहे बच्चे को निहारते माता- पिता  की जोड़ी बहुत भली लगती है, पर फिर भी फोटो खींचने की  इच्छा , उनकी दुनिया में खलल डालने सा लगता है .

कई जगह अपनी कंपनी के बस का इंतज़ार करते लोग भी दिख जाते हैं. एक लड़का और एक लड़की अक्सर बातों में खोये , खड़े रहते हैं. मेरे मन  में एक कहानी जन्म लेने लगती है .फिर सर झटक देती हूँ, क्या पता लड़की शादी- शुदा हो. उसकी सीनियर हो. एक कॉलेज जानेवाली लड़की के पैरों के नाखून पर लगी पीले रंग की नेल्पौलिश और ठीक उसी रंग के चप्पल की स्ट्रैप पर नज़र पड़ती है. क्या क्या आ गया है फैशन में .

सड़क के किनारे बन रही अदरक-इलायची वाली  चाय की खुशबू नथुनों में भर जाती है. हम सहेलियां एक दूसरेको देखते हैं और आँखों में ही कहते हैं,बरसात आने दो ,फिर हम भी इस चाय का लुत्फ़ उठाएंगे. बारिश में पूरी तरह भीग कर  इस  खुशबु वाली  चाय पीने से बड़ा सुख और कुछ नहीं. पर हम महिलाओं के लिए ये बस यहाँ मुंबई में ही संभव है, आस-पास खड़े चाय पीते ऑटो वाले भी नोटिस नहीं करते. 

वॉक से लौटते वक़्त काका (जिनके विषय में एक पोस्ट यहाँ लिखी है ) मिलते हैं और आदतन एक टॉफी , कोई मीठी गोली थमा देते हैं. मुझे टॉफी पसंद नहीं पर काका को मना भी  कैसे करूँ . सामने से ही बच्चों का झुण्ड आ रहा होता है. पास में ही एक म्युनिसिपल स्कूल है . चौड़े दुपट्टे ओढ़े लडकियां ,अपने छोटे भाई-बहनों का हाथ थामे होतीं. बीच बीच में कामवालियां भी अपने बच्चों के बैग उठाये तेजी से कदम बढ़ा रही होतीं, बच्चे को स्कूल छोड़, उन्हें घर घर काम पर भी जाना होता है. मैं उनमे से किसी बच्चे को टॉफी देना चाहती  हूँ. कभी कोई बच्चा  ले लेता है, कभी कोई मुस्करा कर आगे बढ़ जाता है , कभी साथ में उसकी बड़ी बहन या बड़ा भाई होते हैं, वे मुझ पर भरोसा कर के इशारा करते हैं, 'ले लो चौकलेट .' 

बिल्डिंग की  गेट पर ही  ग्राउंड फ्लोर पर रहने वाला 'पायलट डेरेक' हाथ में सैंडविच लिए मिल जाता है. मैं टोक देती हूँ , "कॉलेज की आदत गयी नहीं अभी तक ??" वो झेंपा सा मुस्कुरा देता है और अपनी एयरहोस्टेस पत्नी की तरफ मुखातिब हो जाता  है, जो खिड़की पर खड़ी कुछ कह रही होती है. दोनों अलग अलग एयरलाइंस में हैं,बहुत कम मिल पाते हैं, कितनी ही बातें कहने को रह जाती होंगी, जो अब उसकी पत्नी खिड़की से झांक कर कह रही है. ऐसे ही दौड़ती-भागती सेवेंथ फ्लोर  वाली लड़की भी रोज मिलती है. गीले बाल , सादे कपड़े ,कोई मेकअप नहीं, एक मल्टीनेशनल कंपनी में कार्यरत है. रात के दस बज जाते हैं, लौटते . कहाँ समय है फैशन का ?? और लोग बवाल मचाते हैं आजकल की लडकियों को फैशन के अलावा कुछ नहीं सूझता .

घर आती हूँ, तो मेरे दोनों बेटे कॉलेज के लिए तैयार हो रहे होते हैं. और बरसों पुराना उनका झगडा बदस्तूर जारी रहता है. के.जी  से जो शुरुआत हुई है , कि 'इसने मेरी पेन्सिल ले ली'...'रबर ले ली '...'नोटबुक ले ली'...अब बस रूप बदल गया  है, 'इसने मेरा पेन ड्राइव ले लिया '...'मैंने तो देखा तक नहीं'...तुमने ही गुम किया है'...'मैं क्या पहनूं अब ?जो टीशर्ट सोचा था, इसने कल पहन ली '. ..'तुम भी तो मेरा पहन लेते हो ,बिना पूछे '...पहले मैं इन बातों पर खीझ जाती थी . अब एक मुस्कान आ जाती है. अब इन झगड़ों की उम्र ज्यादा नहीं बची . अंकुर जल्दी ही जॉब ज्वाइन करने वाला है और अब उसके कपड़े, उसकी चीज़ें अलग तरह की होंगीं .

बच्चे नाश्ता कर कॉलेज के लिए और पतिदेव चाय पी कर , Kipper (हमारा डॉग ) को घुमाने के लिए निकल जाते हैं. पास में  ही एक Dog's park बना है जहाँ सिर्फ कुत्ते और उनके मालिक को ही प्रवेश की अनुमति है. बड़े शहर के चोंचले. यहाँ के कार्पोरेटर ने वायदा किया था कि जीतने पर Dog's park बनवा देगा. वायदे तो और भी बहुत सारे किये होंगे, पूरा बस यही किया. 

मैं बालकनी में चली आती हूँ. सामने ढेर सारे पेड़ों की शाखाएं लहरा रही होतीं. और उनपर चिड़ियों की चहचहाट गूँज रही होती. हाल में ही गौरैया दिवस गुजरा है .और फेसबुक पर कई छोटे शहरों, कस्बों में रहने वाले लोगों ने लिखा कि 'कई महीनों से उन्होंने गौरैया नहीं देखी.' पर इस मामले में खुशनसीब हूँ कि गौरैया, कबूतर, कव्वे, कोयल तो रोज ही दीखते हैं,  तोता, बुलबुल, किंगफिशर, नीलकंठ (दूसरा नाम नहीं पता )  भी अक्सर दिख जाते हैं. एक दिन वहीं खड़ी थी और सुबह सुबह ही अदा का फोन आया, उसने कव्वे की आवाज़ सुन खुश होकर कहा ,"अरे ! ये कव्वे की आवाज़ है क्या , बहुत दिनों बाद सुनी. " क्या दिन आ गए हैं, कोयल सी आवाज़ वाली कव्वे की आवाज़ सुन खुश हो रही है. 

नीचे देखती हूँ, एक नवविवाहित युवक ऑफिस जाने के लिए निकलता है. पीछे पीछे घुटनों तक का फ्रॉक पहने उसकी पत्नी उसे छोड़ने आती है. युवक जबतक गेट से निकल कर आँखों से ओझल नहीं हो जाता, उसकी पत्नी देखती रहती है. पर वो खडूस (अब खडूस ही कहूँगी ) एक बार भी पलट कर नहीं  देखता . सोचती हूँ, कभी सामने मिल गया तो बोल दूंगी, ,एक बार पलट कर मुस्करा  कर हाथ हिला देगा तो उसका कुछ नहीं जाएगा.' एक कपल साथ में ऑफिस के लिए निकलते हैं , लड़की की गोद में एक साल का बच्चा है. माँ/सास  पीछे पीछे आती है. लड़की बच्चे को माँ की गोद में दे देती है , फिर ले लेती है...इधर पति अधैर्य होकर कार की हॉर्न मार  रहा होता है, पर बच्चे को लेने और देने का क्रम तीन चार बार चलता है. इतने छोटे बच्चे को छोड़ ऑफिस जाने में उसका जी टूक टूक हो जाता होगा . पर इस महंगाई में दोनों की नौकरी बिना गुजारा भी मुश्किल और फिर कई बार कैरियर में पिछड़ जाने की बात  भी होती है.  

एक और पिता ऑफिस जाने से पहले ,दस-पन्दरह मिनट अपनी बेटी के साथ जरूर खेलता है.  पर उसका बेटी के साथ खेलने का तरीका बहुत अलग सा है .सोचती हूँ, उसके घर की कोई बड़ी बूढी देख लें तो अच्छी  लानत मलामत करे उसकी. बच्ची  को जोर जोर से हवा में उछाल कर पकड़ना तो मामूली बात है. कभी उसे नीचे गिराने की एक्टिंग कर के डराता  है. तो कभी कार की छत पर उसे बिठा हट जाता है. बच्ची चिल्ला कर रोती है तो प्यार से उसे गले लगा लेता है. एक दिन तो हद कर दी. बेटी को पैसेंजर सीट पे बिठाया बेल्ट लगाया और ड्राइवर से बोला , 'गाड़ी आगे ले लो.' गाड़ी के सरकते ही बच्ची जोर से चिल्लाने लगी और पिता ने फिर हँसते हुए उठा सीने से चिपटा लिया. राम जाने यूँ डरा डरा कर खिलाने में उसे क्या मजा आता है. कभी मिले तो जरूर टोक दूंगी. पर इन सबके ऑफिस जाने का वक़्त एक सा होता है, आने का नहीं .

एक युवा शायद लम्बी टूर पर जा रहा है. साथ में बैग भी है. टैक्सी आ गयी है. उसका भी चार पांच महीने का छोटा सा बच्चा  है. लाल रंग के गाउन में बीवी बच्चे को लिये खड़ी रहती है. युवक पहले तो दो तीन बार बच्चे को चूम कर प्यार करता है और फिर बेझिझक पत्नी के होठों को चूमकर भी विदा कहता  है. आस-पास इतने लोग आ जा रहे होते हैं ,पर कोई पलट कर भी नहीं देखता . वैसे ही  सामने वाली टेरेस पर भारी बदन वाली 'प्रियंका चोपड़ा 'की म्यूजिक टीचर शॉर्ट्स और बनियान में घूम घूम कर फोन पर बतियाती रहती है. उसके घुघराले बालों वाला प्यारा सा बेटा  दूध का ग्लास थामे माँ की चाल की नक़ल करता उसके पीछे पीछे घूमता रहता है. उसके ही बगल वाले फ़्लैट में एक बच्चा  अपने छोटे छोटे हाथों से धुले कपड़े फैलाने में पिता की मदद करता है. पिता उसे रुमाल, मोजे जैसे छोटे -छोटे कपड़े फैलाने के लिए दे देते हैं. देख  मन सुकून से भर जाता है, यह बच्चा बड़ा होकर घर के काम करने में कभी अपनी हेठी नहीं समझेगा. 

यहाँ करीब करीब हर स्कूल में दो शिफ्ट होती है.  दोपहर की शिफ्ट वाले बच्चे अक्सर स्विमिंग पूल में आकर स्विमिंग तो कम करते हैं, एक दुसरे पर पानी फेंकना , पानी में धकेल देना, जैसी शरारतें ही ज्यादा करते  हैं. पानी की छाप छाप के बीच उनकी खिलखिलाहटें कानों को भली लगती है. एक पांच साल की बच्ची लाल रंग के स्विमिंग सूट में इतने कॉन्फिडेंस से चल कर आती है कि कई मॉडल्स पानी भरें, उसके सामने . वो स्विमिंग सीख रही है पर इतनी दिलेर है, बार बार इंस्ट्रक्टर का हाथ झटक देती है. कभी कभी तो बस उसके सर पर बंधा  लाल रंग का बैंड ही पानी के ऊपर नज़र आता है,पूरा शरीर पानी के भीतर . उसकी माँ घबरा कर कभी पूल के इस किनारे तो कभी उस किनारे से आवाज़ लगाती रहती है . पर वो बेख़ौफ़ तैरती रहती है. बस उसका ये आत्मविश्वास ये निडरता ताजिंदगी बनी रहे.

सामने गेट से एक अंकल आंटी चर्च से लौट रहे होते हैं. दोनों हमेशा साथ दिखते हैं. अक्सर एक दुसरे के लडखडा जाने पर सहारा देते हैं . थैला भी बारी बारी से उठाते हैं, कभी अंकल, तो कभी आंटी. उनके पीछे से ही नमूदार होती है मेरी काम वाली  बाई .और मुझे याद आ जाता है, किचन में बर्तन खाली करने हैं, वॉशिंग मशीन में कपड़े डालने हैं . सोफे, कुर्सियों,टेबल  पर से चीज़ें हटानी हैं, पतिदेव का ब्रेकफास्ट तैयार करना है . 

अब खुद से मिलने के वक़्त की मियाद ख़त्म......इंतज़ार अगली सुबह का .



रविवार, 13 मार्च 2011

होली के रंग,गाँव की सोंधी मिटटी के संग


कल एक पोस्ट डाली  थी...'रोडीज ' के ऑडिशन में आये एक लड़के की करुण कथा...और उसके जीवट की...पर अब पता चला...वो सारी कहानी  मनगढ़ंत थी...कोटिशः धन्यवाद ..अभिषेक और मीनाक्षी जी का जिनलोगों ने कुछ  लिंक देकर उसकी असलियत  बतायी....दरअसल मेरे बेटे ने भी कहा था...'वो फेक है'..पर मैंने कहा...वो सब अफवाह होगा...पर लिंक देखकर तो शक यकीन में बदल गया. अब चैनल वाले जाने कि उसके साथ क्या सुलूक करें....अब तक वे आम दर्शक  को बेवकूफ बनाते आये हैं...कोई उन्हें बना गया....पर मैंने  सोचा...पोस्ट डिलीट करना ही ठीक रहेगा. ऊपर स्पष्टीकरण और लिंक दे भी दूँ...फिर भी उसे निगेटिव पब्लिसिटी तो मिल ही जाएगी. क्यूँ बेकार में लोगों का कीमती समय बर्बाद किया जाए. जिनलोगों ने उसे पढ़कर उसपर अपने कमेन्ट दिए...क्षमाप्रार्थी  हूँ...उनका बहुमूल्य समय नष्ट हुआ.

होली नज़दीक है तो होली की कुछ यादें शेयर करने का उपयुक्त  मौका है...

कोई कहता है उन्हें होली नहीं पसंद...कोई कहता है बहुत पसंद है.पर मैंने कभी खुद को इस स्थिति में पाया ही नहीं कि पसंद या नापसंद करूँ.शायद बचपन सेही इस त्योहार को अपने अंदर रचा बसा पाया है.

ग्यारह  वर्ष की उम्र में हॉस्टल चली गयी...और तब से जैसे बस होली का इंतज़ार ही रहता...बाकी का पूरा साल होली में की गयी मस्ती याद करके ही गुजरता.सरस्वती पूजा के विसर्जन वाले दिन से जो गुलाल खेलने की शुरुआत होती वह होली की छुट्टी के अंतिम दिन तक चलती रहती. हमारे हॉस्टल का हर कमरा' इंटरकनेक्टेड' था.पूरी रात हर कमरे में जाकर सोने वालों के बालों में अबीर डालने का और मुहँ पर दाढ़ी मूंछ बनाने का सिलिसिला चलता रहता.पेंट ख़त्म हो जाते तो कैनवास वाले जूते का सफ़ेद रंग वाला शू पोलिश भी काम आता (ड्रामा में हमलोग बाल सफ़ेद करने के लिए भी इसका उपयोग करते थे) उन दिनों ज्यादातर लड़कियों के लम्बे बाल होते थे.उन्हें रोज़ शैम्पू करने होते.और टीचर से डांट पड़ती...बाल खुले क्यूँ रखे हैं?.मैं शुरू से ही नींद की अपराधिनी हूँ .इसलिए इस रात वाली गैंग में हमेशा शामिल रहती..बाकी सदस्य अदलते बदलते रहते.

सरस्वती पूजा में हमलोग गेट से लेकर स्टेज तक ,जहाँ सरस्वती जी की मूर्ति रखी जाती थी.सुर्खी की एक सड़क बनाते थे.(सुर्खी ईंट के चूरे जैसा होता है ) उसके ऊपर चॉक पाउडर से अल्पना बनायी जाती थी.हर वर्ष होली में एक बार उस सुर्खी से जमकर होली खेली जाती.ये रास्ता मैदान के बीच से होकर जाता था और हम लोग रोज शाम को मैदान में 'बुढ़िया कबड्डी' खेला करते थे.किसी ना किसी का मन मचल जाता और वो एक पर सुर्खी उठा कर फेंकती..वो लड़की उसके पीछे भागती पर बीच में जो मिल जाता,उसे ही लगा देती. फिर पूरा हॉस्टल ही शामिल हो जाता इसमें. एक बार शनिवार के दिन ऐसे ही हम सब सुर्खी से होली खेल रहें थे. अधिकाँश लड़कियों ने यूनिफ़ॉर्म नहीं बदले थे.सफ़ेद शर्ट और आसमानी रंग की स्कर्ट सुर्खी से लाल हो गयी थी.उन दिनों 'सर्फ़ एक्सेल' भी नहीं था.फिर भी हमें कोई परवाह नहीं थी. मेट्रन मार्केट गयीं थीं. वो कब आकर हमारे बीच खड़ी हो गयीं पता ही नहीं चला.जब जोर जोर से चिल्लाईं तब हमें होश आया और हमें सजा मिली की इसी हालत में खड़े रहो. सब सर झुकाए लाईन में खड़े हो गए. शाम रात में बदल गयी,सुर्खी चुभने लगी,मच्छर काटने लगे पर मेट्रन दी का दिल नहीं पिघला.जब खाने की घंटी बजी और कोई मेस में नहीं गया तो मेस में काम करने वाली गौरी और प्रमिला हमें देखने आई. झूठमूठ का डांटा फिर इशारे से कहा..एक एप्लीकेशन लिखो...कि अब ऐसे नहीं करेंगे.सबने साईन किया डरते डरते उनके कमरे में जाकर दिया.फिर हमें आलू की पानी वाली सब्जी और रोटी(रात का रोज़ का यही खाना था,हमारा) खाने की इजाज़त मिली.पर सिर्फ हाथ मुहँ धोने की अनुमति थी,नहा कर कपड़े बदलने की नहीं.खाना तो हमने किसी तरह खा लिया.पर मेट्रन के लाईट बंद करने के आदेश के बावजूद ,अँधेरे में ही एक एक कर बाथरूम में जाकर बारह बजे रात तक सारी लडकियां नहाती रहीं.

हॉस्टल में 'टाइटल' देने का बड़ा चलन था...रोज ही नोटिस बोर्ड के पास एक कागज़ चिपका होता.और किसी ना किसी कमरे की लड़कियों ने बाकियों की खबर ली होती.खूब दुश्मनी निकाली जाती इस बहाने. कई बार तो असली झगडे भी हो जाते और बोल चाल बंद हो जाती.पर ऐसा कभी कभी होता...ज्यादातर सब टाइटल पढ़ हँसते हँसते लोट पोट ही हो जाते.

मेरे स्कूल के दिनों में पापा की पोस्टिंग मेरे पैतृक गाँव के पास थी. अक्सर हॉस्टल से सीधा मैं गाँव ही चली जाती.वहाँ की होली भी निराली होती थी.दिन भर अलग अलग लोगों के ग्रुप निकलते.सुबह सुबह लड़कों का हुजूम निकलता.लड़के गोबर और कीचड़ से भी खेला करते.और कोई दामाद अगर गाँव में आ गया तो उसकी खैर नहीं उसे फटे जूते और उपलों का माला भी पहनाया जाता.एक बार मेरे पापा दालान में बैठे शेव कर रहें थे.एक हुडदंगी टोली आई पर वे निश्चिन्त बैठे थे कि ये सब उनसे उम्र  में  छोटे  हैं.पर उनमे ही उनका हमउम्र भी कोई था और उसने उन्हें एक कीचड़ भरी बाल्टी से नहला दिया.पापा को सीधा नहर में जाकर नहाना पड़ा.

लड़कियों का ग्रुप एक बाल्टी में रंग और प्लेट में अबीर और सूखे मेवे(कटे हुए गरी, छुहारे) लेकर घर घर घूमता.उन दिनों घर की बहुएं बाहर नहीं निकलती थीं. कई घर की बहुएं तो लड़कियों से भी बात नहीं करती थीं.(ये बात अब तक मेरी समझ में नहीं आती). घर में काम करने वाली,आँगन में एक पटरा और रंग भरी बाल्टी रखती. कमरे से घूंघट निकाले बहू आकर पटरे पर बैठ जाती और हम लोग अपनी अपनी बाल्टी से एक एक लोटा रंग भरा जल शिव जी की तरह उनपर ढाल देते.फिर घूंघट के अंदर ही उनके गालों पर अबीर मल देते और हाथों में थोड़े अबीर में लिपटे मेवे थमा देते.वे बहुएं भी हमारी फ्रॉक खींच हमें नीचे बैठातीं और एक लोटा रंग डाल देतीं.घूंघट के अंदर से भी वे सब कुछ देखती रहतीं.कोई लड़की अगर बचने की कोशिश में पीछे ही खड़ी रहती तो इशारे से उसे भी बुला कर नहला देतीं.

इसके बाद शुरू होता रंग छुडाने का सिलसिला.आँगन में चापाकल के पास हम बहनों का हुजूम जमा हो जाता,आटा,बेसन से लेकर केरोसिन तेल तक आजमाए जाते.त्वचा छिल जाती.पर हम रंग छुड़ा कर ही रहते.घर की औरतें बड़े बड़े कडाहों में पुए पूरी तलने में लगी होतीं.पुए का आटा रात में ही घोल कर रख दिया जाता.एक बार मेरी दादी ने जिन्हें हम 'ईआ' बुलाते थे.मैदे के घोल में शक्कर की जगह नमक डाल दिया था.वहाँ बिजली तो रहती नहीं थी.एक थैले में गाय बैलों के लिए लाया गया नमक और दूसरे थैले में शक्कर एक ही जगह टंगी थी.सुबह सुबह सबसे पहले 'ईआ' ने मुझे ही दिया चखने को,जब मैंने कहा नमकीन है तो उन्हें यकीन नहीं हुआ.फिर उन्होंने हमारे घर में काम करने वाली (पर बहुओं पर सास से भी ज्यादा प्यार,अधिकार और रौब जमाने वाली) 'भुट्टा काकी' से चखने को कहा .जब उन्होंने भी यही बताया तब उनके होश उड़ गए...फिर तो पता नहीं कितने एक्सपेरिमेंट किये गए.दुगुना,शक्कर..मैदा सब मिला कर देखा गया..पर अंततः उसे फेंकना ही पड़ा.

शाम को होली गाने वालों की टोली घर घर घूमती.पूरे झाल मंजीरे के साथ हर घर के सामने कुछ होली गीत गाये जाते और बदले में उन्हें ढेर सारा अनाज दिया जाता.सारे दिन खेतों में काम करने वाले,गाय-भैंस चराने वालों का यह रूप, हैरान कर देता हमें.हमारे 'प्रसाद काका' जो इतने गंभीर दीखते कभी काम के अलावा कोई बात नहीं करते. वे भी आज के दिन भांग या ताड़ी के नशे में गाने में मशगूल रहते.ज्यादातर वे लोग एक ही लाइन पर अटक जाते..." गोरी तेरी अंखियाँ लगे कटार..."...बस अलग अलग सुर में यही लाईन दुहराते रहते.

अब तो पता नहीं...गाँव में भी ऐसी होली होती है या नहीं.

शुक्रवार, 17 सितंबर 2010

कितने अजीब रिश्ते हैं यहाँ के...

यह शिखा की पोस्ट का एक्सटेंशन भर है. विदेशों में वृद्धों के अकेलेपन की बातें पढ़ ,अपने देश में वृद्धों की अवस्था का ख्याल आ गया. विदेशों में बच्चों के व्यस्क होते ही ,उनसे अपना घर अलग बनाने की अपेक्षा की जाती  है. हाल  में ही एक अंग्रेजी फिल्म देखी,जिसमे एक लड़के का सबलोग बहुत मजाक उड़ाते हैं और हर लड़की, उसके साथ शादी के लिए सिर्फ इसलिए इनकार कर देती है क्यूंकि  वह अब तक अपने  माता-पिता के साथ रहता है. उसे अपने पैरेंट्स के साथ रहना पसंद है पर माता-पिता चिंतित होकर एक काउंसलर हायर करते हैं. जो उस लड़के के साथ प्रेम का अभिनय कर उसे ,अकेले अपना घर बनाने पर मजबूर कर दे. वहाँ इस तरह की प्रथा है फिर भी, बुढापे में अकेलापन खलता है क्यूंकि युवावस्था तो पार्टी, डांस, बदलते पार्टनर,घूमने फिरने,बियर में कट जाती है. पर बुढापे में शरीर साथ नहीं देता और अगर उसपर जीवनसाथी भी साथ छोड़ दे तो अकेले ज़िन्दगी काटनी  मुश्किल हो जाती  है.

वहाँ जब अकेले रहने की आदत के बावजूद बुढापे में अकेलेपन  से त्रस्त रहते हैं  तो हमारे देश में वृद्धों के लिए अकेले दिन बिताना कितना कष्टदायक है जब उनका बचपन और युवावस्था तो भरे-पूरे परिवार के बीच गुजरा हो.

पहले संयुक्त परिवार की परम्परा थी. कृषि ही जीवन-यापन का साधन था. जो कि एक सामूहिक प्रयास है. घर के हर सदस्य को अपना योगदान देना पड़ता है.अक्सर जमीन घर के सबसे बुजुर्ग व्यक्ति के नाम ही होती थी. और वो निर्विवाद रूप से स्वतः ही घर के मुखिया होते थे.इसलिए उनकी उपेक्षा नहीं की जा सकती थी. घरेलू कामों में उनकी पत्नी का वर्चस्व होता था.

पर घर से बाहर जाकर नौकरी करने के चलन के साथ ही संयुक्त परिवार टूटने लगे और रिश्तों में भी विघटन शुरू हो गया. गाँव में बड़े-बूढे अकेले पड़ते गए और बच्चे शहर में बसने लगे. अक्सर शहर में रहनेवाले माता-पिता के भी बच्चे नौकरी के लिए दूसरे शहर चले जाते हैं और जो लोग एक शहर में रहते भी हैं वे भी साथ नहीं रहते. अक्सर बेटे-बहू, माता-पिता के साथ रहना पसंद नहीं करते.या कई बार माता-पिता को ही अपनी स्वतंत्र ज़िन्दगी में एक खलल सा लगता है.

हमारी बिल्डिंग में एक नवयुवक ने फ़्लैट ख़रीदा और अपने माता-पिता के साथ रहने आ गया. बड़े मन से उसने अपने फ़्लैट की फर्निशिंग करवाई. मौड्यूलर  किचन ...आधुनिक फर्नीचर..ए.सी...आराम और सुविधा की हर एक चीज़ जुटाई..हमलोग देखते और कहते भी, 'आखिर घर को कितने सजाने संवारने के बाद शादी करेगा.' और दो साल बाद घर पूरी तरह सेट कर लेने के बाद उसने शादी की. एक साल के अंदर ही बेरहम नियति ने अपने रंग दिखा दिए और पिता  अचानक दिल का दौरा पड़ने से चल बसे.

अब घर में उसकी माँ और बेटा, बहू थे. बहू भी नौकरी वाली  थी.पर पता नहीं ,सास-बहू दोनों के बीच क्या हुआ ,छः महीने में ही वह किराए का घर ले, थोड़ी दूर रहने चला गया. बेटा,बिना नागा रोज शाम को माँ से मिलने आता है. अब तो एक प्यारी सी बेटी का पिता है.उसे भी लेकर आता है पर बहू नहीं आती. सारा दिन उसकी माँ अकेले रहती हैं. कहीं भी नहीं आती-जातीं. पता नहीं कैसे दिन गुजारती हैं? उनकी ही आँखों का जिक्र मैने अपनी, इस कविता की भूमिका में किया था. आखिर ऐसा क्या हो गया कि सामंजस्य नहीं हो पाया? बहू सुबह आठ बजे के गए रात के आठ बजे आती थी. सिर्फ वीकेंड्स ही बिताने थे साथ..वह भी नहीं जमा. किसकी गलती ,कौन दोषी...नहीं कहा जा सकता. पर अकेलापन तो इन बुजुर्ग महिला के हिस्से ही आया. बेटी को बहू ,क्रेच में कहीं छोडती है. अगर दोनों साथ रहतीं तो उसकी देख-रेख में उनका दिन अच्छा  व्यतीत हो जाता.

एक पहचान का  युवक भी अपने माता-पिता का इकलौता बेटा है. अच्छी नौकरी में है. फ़्लैट खरीद लिया है. चीज़ें भी जुटा ली हैं. शादी के प्रपोज़ल्स आ रहें हैं.पर बात एंगेजमेंट तक आते आते रह जाती है.लडकियाँ कुछ दिन बात-चीत करने के बाद इशारे में कह देती हैं कि सास -ससुर के साथ रहना गवारा नहीं होगा.आगे  पता नहीं कोई लड़की तैयार हो भी जाए तो फिर उक्त युवक जैसी समस्या ना आ जाए.

पर कई बार बुजुर्ग भी अपनी ज़िन्दगी अकेले बिताना चाहते हैं. पोते-पोतियों की देखभाल  को  एक अतिरिक्त भार की तरह समझते हैं. उन्हें लगता है, अपने बच्चों की देख-भाल  की,घर संभाले अब क्या सारी ज़िन्दगी यही करें. एक आंटी जी हैं,पटना में. बेटा, बड़े मनुहार-प्यार से माँ को अपने पास ले गया. बेटे- बहू..पोते पोती सब इज्जत-प्यार देते थे.पर कहने लगीं.वहाँ वे बस एक केयर टेकर जैसी बन कर रह गयी थीं.(बहू भी नौकरी पर जाती थी ) पोते-पोतियों को उनके हाथ का बना खाना अच्छा लगता तो सारा समय  किचन में ही बीतता था.अब बड़े से बंगले में अकेली रहती हैं. सत्संग में जाती हैं. अक्सर गायत्री पूजा में शामिल होती हैं और अपनी मर्जी से अपने दिन बिता रही हैं.

एक पोस्ट (गीले कागज़ से रिश्ते...लिखना भी मुश्किल, जलाना भी मुश्किल)पहले भी मैने लिखी थी कि सास की बहू से नहीं जमी और बहू अलग मकान लेकर अपने बच्चों के साथ रहने लगी. दोनों पति-पत्नी अकेले दिन गुजार रहें थे.घर में  शान्ति छाई रहती. .सास की मृत्यु के बाद ससुर की देखभाल  के लिए बहू वापस इस घर में आकर रहने लगी और घर में रौनक हो गयी. दिन भर बच्चों की चहल-पहल से घर गुलज़ार लगता. मुझे ऐसा लगता था पर अब सोचती हूँ,क्या पता उन्हें अपना शांतिपूर्ण जीवन ही ज्यादा पसंद हो.

कई बार यह भी देखा है कि शुरू में सास ने एक आदर्श सास की इमेज के प्रयास  मे बहू को इतना लाड़-प्यार दिया कि बहू ने घबरा कर किनारा कर लिया. एक आंटी जी,बहू को बेटी से भी  बढ़कर मानतीं. उसे तरह -तरह के टिफिन बना कर देतीं. ऑफिस से आने पर कोई काम नहीं करने देतीं. सारे रिश्तेदारों में उसकी बड़ाई करती नहीं थकतीं. फिर पता नहीं क्या हुआ... कुछ दिनों बाद बहू से बात-चीत भी नहीं रही. और जाहिर है बहू अलग रहने चली गयी और आना-जाना भी नहीं रहा.
एक किसी मनोवैज्ञानिक द्वारा लिखे आलेख में पढ़ा था कि ऐसा करने पर बहू के  अवचेतन मन में लगने लगता है कि उसकी सास उसकी माँ की जगह लेने की कोशिश कर रही हैं. जबकि उसकी अपनी माँ तो है ही. और इसलिए उसका मन विद्रोह कर उठता है.

यह अजीब दुविधा की स्थिति है. बिलकुल कैच 22 सिचुएशन. प्यार दो तो मुसीबत,ना दो तो मुसीबत. ये रिश्ते तलवार की धार पर चलने के समान हैं. जरा सी गफलत हुई और रिश्ते लहू-लुहान हो उठे, कई बार तो क़त्ल ही हो जाता है रिश्तों का.

यहाँ महानगरों में एक चलन देख रही हूँ. अक्सर बेटे या बेटियाँ  माता-पिता का पुराना घर बेच कर , उन्हें अपनी बिल्डिंग में या बिल्डिंग के पास ही एक छोटे से फ़्लैट में शिफ्ट करवा दे रहें . दोनों पक्ष की आज़ादी भी बनी रहती है और जरूरत पड़ने पर माता-पिता की भी देखभाल हो जाती है और बेटे-बेटियां भी जरूरत पड़ने पर बच्चों को अकेला घर मे छोड़ने के बजाय माता-पिता के पास छोड़ देते हैं यह लिखते हुए रेखा और राज-बब्बर की फिल्म 'संसार' (शायद यही सही नाम है ) याद हो आई जिसमे कुछ ऐसा ही हल बताया गया था.

पर यह सब तो मध्यमवर्गीय परिवार की बातें हैं जहाँ कम से कम बुजुर्गों को आर्थिक और शारीरिक कष्ट नहीं झेलना पड़ता (अधिकतर, वरना ..अपवाद तो यहाँ भी हैं,) लेकिन निम्न वर्ग में तो रिश्तों का बहुत ही क्रूर रूप देखने को मिलता है.वहाँ लोकलाज की भावना भी नहीं रहती.आज ही वंदना दुबे अवस्थी की यह पोस्ट पढ़, रिश्तों पर से विश्वास ही उठता  सा लगा.

मंगलवार, 11 मई 2010

बहुत याद आता है , नीम का वो पेड़

कुछ दिन पहले मॉर्निंग वाक पे मेरी सहेली ने, फलों से लदे एक कटहल के पेड़ को दिखाते हुए कहा, '.तुम्हे पता है...कटहल जड़ों के पास  भी फलते हैं'.मैने कहा 'हाँ...मैने भी देखा है'..फिर वो बताने लगी कि केरल के एक गाँव में उसकी मौसी के घर के पास एक कटहल का पेड़ है, वहाँ उसने बड़े बड़े कटहल ..जड़ों के पास फले हुए देखे हैं..कल उसकी मौसी  का फोन आया और वह बहुत दुखी है क्यूंकि उस पेड़ को लोग काटने वाले हैं..वह इतना बड़ा हो  गया है और आंधी में इतने जोरों से हिलता है कि कभी भी उनके घर पर गिर  सकता है...उसकी मौसी बहुत दुखी थी..मेरी सहेली भी दुखी थी..उसकी बचपन की स्मृतियाँ जुड़ी थीं उस पेड़ से.
और मुझे एकदम से अपने गाँव का नीम का पेड़ याद आ गया.
जब भी गाँव जाती...दिन में दस बार दो शब्द  जरूर कानों में पड़ते.."नीम तर" ..बच्चे कहाँ खेल रहें हैं  हैं,"नीम तर"....बाबा  कहाँ बैठे हैं..नीम तर'...प्रसाद काका कहाँ हैं..'नीम तर'

और एक बार जब गाँव गयी और फिर अपने प्रियस्थल ' नीम तर' गई तो देखा वहाँ नीम का पेड़ नहीं था,बल्कि एक आलीशान भवन खड़ा था.
और अपने घर के दालान में छुपकर यह कविता लिखी थी. तब से वह इस डायरी से उस डायरी में रीन्यू होती रही..और अब तो बरसों से उनके पन्ने भी नहीं पलटे. उस दिन आकर ढूंढ कर निकाला. और कुछ ब्लॉग मित्रों को दिखाया..क्यूंकि 'कविता' मेरी विधा नहीं है..और कांफिडेंस भी नहीं था..उन्हें बहुत पसंद आई और एक लम्बा सा wowwwwww  भी लिख दिया प्रतिक्रिया में शायद मेरा उत्साह बढाने को :)


और  भारत एक है का एक और सजीव उदाहरण...केरल के एक छोटे से गाँव के कटहल  के पेड़ ने बिहार के एक गाँव के नीम के पेड़ से अपने दुख बांटे

 बहुत याद आता है , नीम का वो पेड़

 बहुत दिनों बाद आई , बिटिया
हवा में घुली,मिटटी की सोंधी महक ने , जैसे की हो शिकायत

पाय लागू काकी, राम राम काका,  रामसखी कईसी हो तुम
पूछते चल पड़े, डगमग से.  विकल कदम,
मिलने को उस बिछड़े साथी से,
दिया था जिसने साथ,हरक्षण , हरदम

शाम होते ही उसकी शाखाओं पर गूंजता,पंछियों  का कलरव
जड़ों के पास लगा होता,बच्चों का जमघट
मेघों का कोमल तम, श्यामल तरु से छन
आलस दूर करता , लालसा भरता गोपन

रात होती और जमा होती बहुएं,घर घर से
जो दिन के उजाले में होती किवाड़ों के पीछे,
बड़े बूढों के डर से.
हंसी ठिठोली होती
बांटे जाते राज
पोंछे जाते आंसू
और समझाई जाती बात

मनाया था,इस नीम के पेड़ ने ,उन रूठे बेटों को
जो,घर से झगड़ ,आ बैठते थे,इसकी छाँव
दिया था दिलासा,उस रोती दुल्हन को
जब रखी,  उसकी डोली कहारों ने
और सुस्ताने बैठे थे पल भर ,इस ठांव.

इसकी कोमल दलों  ने दुलार से
सहलाया था,उन फफोलों को
जब निकलती थी माता
गाँव के मासूम  नौनिहालों  को.


पहनी रहती ,बच्चियां
नीम के खरिकों के छोटे छोटे टुकड़े
नाक-कान छिदवाने के बाद.
ताकि,पहन सकें झुमके और नथ
जब लें फेरें अपने साजन के साथ.

सुबह होती,बांटता सबको दातुन
गाँव की चमकती हंसी रहें,सलामत
औषधीय गुणों से, स्वस्थ रखे तन मन
जैसे हो इसका गंगा पुत्र जैसा, भीष्म प्रण
.

मार्तंड  की  प्रचंड  किरणों  से बचने
रोटी,प्याज,मिर्ची,नमक की लिए पोटली.
पी, ठंडा पानी कुंए  का,शीतल छाया के नीचे
चला  आता  किसान , विश्राम  हेतु , घडी दो घड़ी.


आता दशहरा और खेली जाती रामलीला
सजती चौपाल भी और किए जाते फैसले
चुप खड़ा देखता नीम, इस जग की लीला
देखता  बदलती  दुनिया  और  जग  के  झमेले .

तेज होती गयी  चाल,याद करते एक-एक पल.
अब मिलने को मन हो रहा था ,बहुत ही विकल
पर झूमता,इठलाता,खुद पर इतराता
कहाँ था वह नीम का पेड़??
खड़ा था,वहाँ  एक लिपा-पुता बेजान भवन
दंभी ,अभिमानी ,व्योम  से नजरे मिलाता .


 तीक्ष्ण  सूरज  दिखा रहा था  नाराजगी,सर पर चढ़ के
नहीं थी शीतल छाँव नीम की, ना  ही  वो  नीम  बयार
 कुपित  हुई धरा  ,गाँव तो अनाथ हो गया हो जैसे.
शिथिल  कदम  लौट  चले , यादों में संजोये उस नीम का प्यार.


सोमवार, 19 अप्रैल 2010

इस बार का संस्मरण 'विदाउट टिकट यात्रा' का

पिछली पोस्ट में अपने 'विदाउट रिजर्वेशन ' यात्रा का जिक्र किया था,इस बार सोचा 'विदाउट टिकट' वाली कहानी भी सुना ही दी जाए. वैसे भी  यह संस्मरण अपने कॉलेज के दिनों में ही मैंने 'साप्ताहिक हिन्दुस्तान' के 'याद आते हैं, वे क्षण ' कॉलम के लिए लिखा था. साइड बार में उस रचना के कटिंग की तस्वीर भी है. जो  'रोमांचकारी सफ़र' शीर्षक से  प्रकाशित हुई थी  .

"मेरे छोटे भाई 'नीरज' की माइनिंग इंजीनियरिंग' की प्रवेश परीक्षा में उत्तीर्ण होने की सूचना कुछ इतनी देर से मिली थी कि धनबाद जाकर 'इन्डियन स्कूल ऑफ माइन्स' में एडमिशन लेने में बस एक दिन का समय था और  नीरज गाँव में अपनी छुट्टियाँ बिता रहा था. उन दिनों फोन की  सुविधा तो थी नहीं कि उसे तत्काल खबर पहुंचाई जा सके. लिहाजा पापा ने मुझे ,मेरे छोटे भाई को चाची जी के साथ गाँव के लिए प्रस्थान करने को कहा.उन दिनों हमलोग समस्तीपुर में थे. सुबह छः बजे हमलोग बस से मुजफ्फरपुर के लिए रवाना  हो गए .जहाँ से हमें अपने गाँव जाने के लिए ट्रेन पकडनी थी. बस, अभी रेलवे स्टशन के पास वाले क्रॉसिंग पर पहुंची ही थी कि मोतीहारी जाने वाली ट्रेन स्टेशन पर नज़र आई. बस के कंडक्टर सहित,सहयात्रियों ने सलाह दी कि यहीं से उतर कर ट्रेन पकड़ लें और अगले स्टेशन पर टिकट ले लें. हमें समय की बचत भी करनी थी ताकि नीरज उसी दिन वापस समस्तीपुर आ सके. सो हम भी जल्दी से बस से उतर कर ट्रेन पर सवार हो गए.

पर ट्रेन तो अगले स्टेशन पर रुकी ही नहीं. इसके बाद कई स्टेशन पर ट्रेन नहीं रुकी. हमारे तो होश फाख्ता हो गए कि अगर टिकट चेकर आ गया तो कितनी बेइज्जती होगी. मैं उस समय ग्रेजुएशन कर रही थी,भाई छोटा था ,चाची जी ज्यादातर गाँव में ही रहती थीं .उन्हें अकेले यात्रा करने का अनुभव नहीं था. सबसे ज्यादा जिम्मेदारी  मुझे ही  महसूस हो रही थी और इसीलिए सबसे अधिक चिंतित भी मैं ही थी.

अब हमें यकीन हो गया था कि यह ट्रेन हमारे  गाँव के छोटे स्टेशन पर भी नहीं रुकेगी.पर अब हमें इंतज़ार था बीच के एक बड़े स्टेशन 'चकिया' का. जहाँ हर फास्ट ट्रेन रूकती थी. हमने तय किया वहीँ उतर जायेंगे और फिर किसी अन्य  साधन से गाँव जाने की सोचेंगे. वहाँ के स्टेशन मास्टर भी पहचान के थे. जो भी फाइन होगा हम दे देंगे और बाकी चीज़ें  वे संभाल लेंगे.

पर यह ट्रेन तो फास्ट ही नहीं सुपर फास्ट निकली और वहाँ भी नहीं रुकी. अभी तक हम थोड़ा बहुत मजाक भी कर रहें थे कि टी.टी. के आने पर बाथरूम में छुप जाएंगे या फिर और कई बहाने सोच रहें थे. अब तो सबकी बोलती बंद हो गयी. सैनिक स्कूल में पढने वाला तेरह वर्षीय 'निशित' अपनी बहादुरी के कुछ जौहर दिखाने की जुगत सोचने लगा. चाची जी अपने छत्तीस करोड़ देवी देवताओं की मनौतियाँ मनाने लगीं. मैं गहन चिंता में डूब गयी. पता नहीं कितना फाइन लेंगे? हमारे पास उतने पैसे हैं भी या नहीं? कहीं जेल ही ना ले जाएँ.? हमें कोई अनुभव ही नहीं था इस तरह बेटिकट यात्रा का. और ना किसी से ऐसे किस्से कभी सुने थे क़ि ज्ञानवर्धन हुआ हो.  यह ट्रेन कहीं दूर से आ रही थी लिहाजा बिलकुल खाली थी. कोई अन्य  पैसेंजर भी नहीं था साथ. जो किसी तरह की कोई सलाह भी दे सके. बस इन सबसे बेफिक्र चाची  की गोद में बैठी एक साल  की 'मीतू' किलकारियां भर रही थी और हैरान-परेशान थी कि कोई उसके साथ खेल क्यूँ नहीं रहा.

हमारे गांव का स्टेशन भी आया और हम खाली खाली निगाहों  से अपने लहलाहते खेत-खिलहान और बाग़-बगीचे देखते रहें. पर उनके बीच हमें अब जेल की सलाखें और हथकड़ियां नज़र आ रही थीं. किन्तु भगवान को भी अब शायद हम पर तरस आ गया और उन्होंने हमारा और इम्तहान  लेना स्थगित कर दिया. अगले ही स्टेशन पर ट्रेन रुक गयी. यहाँ क्रॉसिंग  था और दूसरी तरफ से कोई ट्रेन आ रही थी. ट्रेन के रुकते ही हम ताबड़तोड़ कूद पड़े. किसी तरह इस ट्रेन से तो पीछा छूटे. स्टेशन पर खड़े लोग भी आवाक रह गए क़ि इस ट्रेन से लोग यहाँ क्यूँ उतर रहें हैं ? खैर, शायद जिसने पूछा हमने थोड़ा बहुत बताया और उनलोगों से पता चला क़ि दूसरी तरफ से पैसेंजर ट्रेन आ रही है. हमलोगों ने ५० पैसे के टिकट कटाए और शान से उस ट्रेन पर सवार हो अपने गाँव के स्टेशन वापस चले आए.

वहाँ से तांगे से अपने गाँव पहुंचे. नीरज को खुशखबरी सुनायी और वह तुरंत ही समस्तीपुर के लिए निकल गया जहाँ से रात को पापा के साथ धनबाद के लिए रवाना हो गया.

दोनों भाई अब जिम्मेदार अफसर हैं. मीतू भी अब एम.ए में है. मैंने  तब ये संस्मरण किसी पत्रिका के लिए लिखा था जिसके पाठक अलग थे और अब यहाँ लिख रही हूँ, अपने मित्रों के लिए जो पाठक भी हैं.

बुधवार, 24 फ़रवरी 2010

होली के रंग,गाँव की सोंधी मिटटी के संग



कोई कहता है उन्हें होली नहीं पसंद...कोई कहता है बहुत पसंद है.पर मैंने कभी खुद को इस स्थिति में पाया ही नहीं कि पसंद या नापसंद करूँ.शायद बचपन सेही इस त्योहार को अपने अंदर रचा बसा पाया है.
दस वर्ष की उम्र में हॉस्टल चली गयी...और तब से जैसे बस होली का इंतज़ार ही रहता...बाकी का पूरा साल होली में की गयी मस्ती याद करके ही गुजरता.सरस्वती पूजा के विसर्जन वाले दिन से जो गुलाल खेलने की शुरुआत होती वह होली की छुट्टी के अंतिम दिन तक चलती रहती. हमारे हॉस्टल का हर कमरा' इंटरकनेक्टेड' था.पूरी रात हर कमरे में जाकर सोने वालों के बालों में अबीर डालने का और मुहँ पर दाढ़ी मूंछ बनाने का सिलिसिला चलता रहता.पेंट ख़त्म हो जाते तो कैनवास वाले जूते का सफ़ेद रंग वाला शू पोलिश भी काम आता (ड्रामा में हमलोग बाल सफ़ेद करने के लिए भी इसका उपयोग करते थे) उन दिनों ज्यादातर लड़कियों के लम्बे बाल होते थे.उन्हें रोज़ शैम्पू करने होते.और टीचर से डांट पड़ती...बाल खुले क्यूँ रखे हैं?.मैं शुरू से ही नींद की अपराधिनी हूँ .इसलिए इस रात वाली गैंग में हमेशा शामिल रहती..बाकी सदस्य अदलते बदलते रहते.

सरस्वती पूजा में हमलोग गेट से लेकर स्टेज तक ,जहाँ सरस्वती जी की मूर्ति रखी जाती थी.सुर्खी की एक सड़क बनाते थे.(सुर्खी ईंट के चूरे जैसा होता है ) उसके ऊपर चॉक पाउडर से अल्पना बनायी जाती थी.हर वर्ष होली में एक बार उस सुर्खी से जमकर होली खेली जाती.ये रास्ता मैदान के बीच से होकर जाता था और हम लोग रोज शाम को मैदान में 'बुढ़िया कबड्डी' खेला करते थे.किसी ना किसी का मन मचल जाता और वो एक पर सुर्खी उठा कर फेंकती..वो लड़की उसके पीछे भागती पर बीच में जो मिल जाता,उसे ही लगा देती. फिर पूरा हॉस्टल ही शामिल हो जाता इसमें. एक बार शनिवार के दिन ऐसे ही हम सब सुर्खी से होली खेल रहें थे. अधिकाँश लड़कियों ने यूनिफ़ॉर्म नहीं बदले थे.सफ़ेद शर्ट और आसमानी रंग की स्कर्ट सुर्खी से लाल हो गयी थी.उन दिनों 'सर्फ़ एक्सेल' भी नहीं था.फिर भी हमें कोई परवाह नहीं थी. मेट्रन मार्केट गयीं थीं. वो कब आकर हमारे बीच खड़ी हो गयीं पता ही नहीं चला.जब जोर जोर से चिल्लाईं तब हमें होश आया और हमें सजा मिली की इसी हालत में खड़े रहो. सब सर झुकाए लाईन में खड़े हो गए. शाम रात में बदल गयी,सुर्खी चुभने लगी,मच्छर काटने लगे पर मेट्रन दी का दिल नहीं पिघला.जब खाने की घंटी बजी और कोई मेस में नहीं गया तो मेस में काम करने वाली गौरी और प्रमिला हमें देखने आई. झूठमूठ का डांटा फिर इशारे से कहा..एक एप्लीकेशन लिखो...कि अब ऐसे नहीं करेंगे.सबने साईन किया डरते डरते उनके कमरे में जाकर दिया.फिर हमें आलू की पानी वाली सब्जी और रोटी(रात का रोज़ का यही खाना था,हमारा) खाने की इजाज़त मिली.पर सिर्फ हाथ मुहँ धोने की अनुमति थी,नहा कर कपड़े बदलने की नहीं.खाना तो हमने किसी तरह खा लिया.पर मेट्रन के लाईट बंद करने के आदेश के बावजूद ,अँधेरे में ही एक एक कर बाथरूम में जाकर बारह बजे रात तक सारी लडकियां नहाती रहीं.
हॉस्टल में 'टाइटल' देने का बड़ा चलन था...रोज ही नोटिस बोर्ड के पास एक कागज़ चिपका होता.और किसी ना किसी कमरे की लड़कियों ने बाकियों की खबर ली होती.खूब दुश्मनी निकाली जाती इस बहाने. कई बार तो असली झगडे भी हो जाते और बोल चाल बंद हो जाती.पर ऐसा कभी कभी होता...ज्यादातर सब टाइटल पढ़ हँसते हँसते लोट पोट ही हो जाते.

मेरे स्कूल के दिनों में पापा की पोस्टिंग मेरे पैतृक गाँव के पास थी. अक्सर हॉस्टल से सीधा मैं गाँव ही चली जाती.वहाँ की होली भी निराली होती थी.दिन भर अलग अलग लोगों के ग्रुप निकलते.सुबह सुबह लड़कों का हुजूम निकलता.लड़के गोबर और कीचड़ से भी खेला करते.और कोई दामाद अगर गाँव में आ गया तो उसकी खैर नहीं उसे फटे जूते और उपलों का माला भी पहनाया जाता.एक बार मेरे पापा दालान में बैठे शेव कर रहें थे.एक हुडदंगी टोली आई पर वे निश्चिन्त बैठे थे कि ये सब उनसे उम्र  में  छोटे  हैं.पर उनमे ही उनका हमउम्र भी कोई था और उसने उन्हें एक कीचड़ भरी बाल्टी से नहला दिया.पापा को सीधा नहर में जाकर नहाना पड़ा.

लड़कियों का ग्रुप एक बाल्टी में रंग और प्लेट में अबीर और सूखे मेवे(कटे हुए गरी, छुहारे) लेकर घर घर घूमता.उन दिनों घर की बहुएं बाहर नहीं निकलती थीं. कई घर की बहुएं तो लड़कियों से भी बात नहीं करती थीं.(ये बात अब तक मेरी समझ में नहीं आती). घर में काम करने वाली,आँगन में एक पटरा और रंग भरी बाल्टी रखती. कमरे से घूंघट निकाले बहू आकर पटरे पर बैठ जाती और हम लोग अपनी अपनी बाल्टी से एक एक लोटा रंग भरा जल शिव जी की तरह उनपर ढाल देते.फिर घूंघट के अंदर ही उनके गालों पर अबीर मल देते और हाथों में थोड़े अबीर में लिपटे मेवे थमा देते.वे बहुएं भी हमारी फ्रॉक खींच हमें नीचे बैठातीं और एक लोटा रंग डाल देतीं.घूंघट के अंदर से भी वे सब कुछ देखती रहतीं.कोई लड़की अगर बचने की कोशिश में पीछे ही खड़ी रहती तो इशारे से उसे भी बुला कर नहला देतीं.

इसके बाद शुरू होता रंग छुडाने का सिलसिला.आँगन में चापाकल के पास हम बहनों का हुजूम जमा हो जाता,आटा,बेसन से लेकर केरोसिन तेल तक आजमाए जाते.त्वचा छिल जाती.पर हम रंग छुड़ा कर ही रहते.घर की औरतें बड़े बड़े कडाहों में पुए पूरी तलने में लगी होतीं.पुए का आटा रात में ही घोल कर रख दिया जाता.एक बार मेरी दादी ने जिन्हें हम 'ईआ' बुलाते थे.मैदे के घोल में शक्कर की जगह नमक डाल दिया था.वहाँ बिजली तो रहती नहीं थी.एक थैले में गाय बैलों के लिए लाया गया नमक और दूसरे थैले में शक्कर एक ही जगह टंगी थी.सुबह सुबह सबसे पहले 'ईआ' ने मुझे ही दिया चखने को,जब मैंने कहा नमकीन है तो उन्हें यकीन नहीं हुआ.फिर उन्होंने हमारे घर में काम करने वाली (पर बहुओं पर सास से भी ज्यादा प्यार,अधिकार और रौब जमाने वाली) 'भुट्टा काकी' से चखने को कहा .जब उन्होंने भी यही बताया तब उनके होश उड़ गए...फिर तो पता नहीं कितने एक्सपेरिमेंट किये गए.दुगुना,शक्कर..मैदा सब मिला कर देखा गया..पर अंततः उसे फेंकना ही पड़ा.

शाम को होली गाने वालों की टोली घर घर घूमती.पूरे झाल मंजीरे के साथ हर घर के सामने कुछ होली गीत गाये जाते और बदले में उन्हें ढेर सारा अनाज दिया जाता.सारे दिन खेतों में काम करने वाले,गाय-भैंस चराने वालों का यह रूप, हैरान कर देता हमें.हमारे 'प्रसाद काका' जो इतने गंभीर दीखते कभी काम के अलावा कोई बात नहीं करते. वे भी आज के दिन भांग या ताड़ी के नशे में गाने में मशगूल रहते.ज्यादातर वे लोग एक ही लाइन पर अटक जाते..." गोरी तेरी अंखियाँ लगे कटार..."...बस अलग अलग सुर में यही लाईन दुहराते रहते.

अब तो पता नहीं...गाँव में भी ऐसी होली होती है या नहीं.

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