Wednesday, January 30, 2013

पैसा क्या याददाश्त और संवेदनशीलता का इरेज़र है..

सबलोगो ने अपने जीवन में कुछ चरित्र ऐसे जरूर देखे होंगे जिन्होंने हमेशा दुसरो का भला किया , परिवार वालों के लिए खून-पसीना एक किया पर जब उन्हें जरूरत पड़ी तो परिवारवालों ने मुहं मोड़ लिया। ऐसा होता तो अक्सर है पर क्यूँ होता है? आखिर लोग इतने कृतघ्न क्यूँ हो जाते हैं, उनकी आँखों का पानी क्यूँ मर जाता है? आखिर इसके पीछे कैसी मानसिकता काम करती है ?क्या वे समझते हैं, उनका हक़ सिर्फ लेना है, और दुसरे का कर्तव्य उन्हें  देने का है ? जब उसे जरूरत पड़ी तो ये तो असमर्थ हैं क्यूंकि इन्हें देना तो आता ही नहीं इन्होने तो सिर्फ लेना ही सीखा है।


एक परिचिता  हैं। उनके पति पिछले  तीस साल से सऊदी अरब में काम कर रहे हैं। पिता की मृत्यु के बाद बहुत कम उम्र में ही वे 'सऊदी अरब' नौकरी पर चले गए। खुद को हर ख़ुशी से महरूम रखकर , दिन रात खून पसीने बहा कर  रुपये कमा कर भेजे और अपने दोनों भाईयों को पढाया -लिखाया, तीन बहनों की शादी की। खुद भी शादी की पर अपनी पत्नी और दोनों बेटों से दूर रहे। उनकी पत्नी और बच्चों ने भी साल  में बस एक महीने के लिए ही पति और पिता का प्यार जाना। दोनों भाइयों की शादी हो गयी, बहनें ससुराल चली गयीं। फिर भी जब भी जिसे जरूरत पड़ी, ये बड़े भाई हमेशा सहायता को तत्पर रहे।

 एक भाई को फ़्लैट  बुक करना है तो एक भाई के बेटे को इंटरनेशनल  स्कूल में पढ़ाना है, सबसे बड़े भाई ने मदद की । इनके बेटे को बाइक का शौक था, बेटे के लिए बाइक बुक भी कर दी। पर उनकी माँ  ने कहा छोटे भाई को गाडी लेनी है, उसे लोकल ट्रेन से ऑफिस आने-जाने में  दिक्कत होती है। बेटे को बाइक नहीं दिलाकर छोटे भाई के लिए गाड़ी खरीद दी।
सिर्फ पैसो से ही नहीं, मन से भी पिता सा स्नेह दिया। छोटी बहन को जब बार बार मिसकैरेज हो जा रहे थे तो पैदल चल कर 'सिद्धि विनायक मंदिर' गए और मन्नत मांगी । बहन के बेटे के जनम पर धूम धाम से पार्टी दी।

और आज वे कैंसर से जूझ रहे हैं। हॉस्पिटल में हैं। तो भाई-बहन कभी ऑफिस से छुट्टी न मिलने का, कभी बुखार का तो कभी  बच्चों के इम्तहान का बहाना बना कभी कभार घंटे भर के लिए हॉस्पिटल में झाँक लेते हैं। डॉक्टर ने उनके बीस वर्षीय बेटे को अपने केबिन में बुला कर बीमारी  की गंभीरता से अवगत करवाया। दो महीने में ही वह बीस साल का लड़का उम्र की कई सीढियां पार कर गया है। जहाँ उसके चाचा को पिता की जगह खड़े हो जाना चाहिए था, यह लड़का, अपनी माँ और अपने छोटे भाई को संभाल रहा है। उनकी पत्नी कहती हैं, हमें इनके भाई-बहनों से रुपये-पैसे नहीं चाहिए, बस प्यार और सांत्वना के दो बोल चाहिए, वो भी वे लोग नहीं दे सकते। जो ननदें कल तक बहनों जैसी थीं, फरमाइश करते नहीं थकती थीं, 'भैया से ये मंगवा दो ,वो मंगवा दो' आज भाई को देखने  की भी फुर्सत नहीं है उनके पास।
 पत्नी के  भाई गाँव में रहते हैं, खेती पर निर्भर हैं और अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ा रहे हैं, कभी अपनी  बहन और जीजाजी से एक पैसे की मदद नहीं ली . वे बारी बारी से आकर बहन को सहारा दे रहे है, उसे आश्वासन दे रहे हैं, रुपये-पैसे की फ़िक्र न करें ,इलाज में कमी नहीं होनी चाहिए , जरूरत पड़ने पर वे जमीन बेच देंगे। 
क्या पैसा धीरे -धीरे जमीर को खा जाता है, कोई संवेदना शेष नहीं रहती न ही याददाश्त में ही कुछ बचा रहता है?? पैसा सबकुछ इरेज़ कर देता है?  

 ये दुनिया सचमुच जीने लायक नहीं है। कहते हैं,नेकी कर दरिया में डाल . पर जो नेकी कर के दरिया में डाल  आता है, उसके साथ दुसरे भी नेकी कर दरिया में क्यूँ नहीं डाल आते ?
क्या नेकी करने का ठेका सिर्फ एक के पास ही होता है??

जाने क्यूँ प्यासा  का ये गीत बहुत याद आ रहा है 



Saturday, January 19, 2013

अभी वक्त लगेगा, दिमाग की खिड़कियाँ खुलने में

हाल ही में कुछ दरिंदो द्वारा दामिनी की नृशंस हत्या ने पूरे देश को आंदोलित कर दिया है। और टी वी , पत्रिकाओं, फेसबुक और हमारे ब्लॉगजगत में भी समाज में स्त्रियों के स्थान , उनकी सुरक्षा, उनके अधिकार और कर्तव्य  पर जम कर चर्चा  हो रही है। 


जब भी ऐसी कोई घटना घटती है, कई चेहरों से मुखौटे  उतर जाते हैं। और उनकी सोच देख कर हैरानगी होती है। उच्च शिक्षित ,उच्च पद पर आसीन लोगों की सोच इतनी सतही कैसे हो सकती है? इसमें स्त्री-पुरुष दोनों शामिल हैं। लोग ऐसी ऐसी प्रतिकियाएं देते हैं कि उनकी बुद्धि पर तरस ही खाया जा सकता है। और यह भी आशंका होती है कि ऐसी सोच रखने वाले लोग,अपने घर की स्त्रियों की कितनी सहायता कर पाते होंगे ?, उन्हें आगे बढ़ने के कितने मौके देते होंगे ?

पर ऐसा है क्यूँ ? मुश्किल ये है कि समाज में पुरुषों के स्थान, उनके अधिकार-कर्तव्य ,उनकी जीवन शैली में समय के साथ कोई बदलाव नहीं आया है। आज भी घर के मुखिया वही होते हैं। घर से या के घर सदस्यों से सम्बंधित महत्वपूर्ण निर्णय लेने का अधिकार उनके पास ही होता है। घर की देखभाल,वे अपना कर्तव्य मानते हैं। और उनकी जीवनशैली होती है, घर से बाहर  जाकर पैसे कमा कर लाना और फिर घर में आराम फरमाना, उनके खाने-पीने, कपडे लत्ते  का ख्याल घर की महिलायें ही रखती  हैं चाहे वे माँ हो या फिर पत्नी।

लेकिन महिलाओं की जीवन शैली में आमूल चूल परिवर्तन आ चुका  है। आज भी अधिकाँश महिलायें, घर का ख्याल रखते हुए गृहणी का ही रोल अदा  करती हैं। पर पहले जहाँ वे लकड़ी के चूल्हे पर काम करती थी, फिर कोयले के चूल्हे, मिटटी तेल के स्टोव पर काम करने लगीं। पर अब गाँव गाँव में भी गैस के चूल्हे का प्रवेश हो चुका  है। अब बिना धुएं के बिना हकलान हुए बस नॉब घुमाती हैं और चूल्हा जल जाता है। मिक्सर  में सेकेण्ड भर में मसाला पिस जाता है, वाशिंग मशीन में कपड़े  धुल जाते हैं। 

पुरुषों को सुबह का चाय-नाश्ता, दोपहर का खाना, रात्रि-भोजन  हमेशा से सामने परस कर मिलता है। अब ये खाना, लकड़ी के चूल्हे पर बना है या गैस के इस से उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। इसी तरह उनके कपडे भी धुले- प्रेस किये हुए आलमारी में सहेजे हुए मिलते हैं . अब वे कपडे जमीन पर पटक पटक कर धोये गए हैं, या वाशिंग मशीन में ,लोहे वाली इस्त्री से आयरन किये गए हैं या बिजली वाले, इस से उन्हें क्या मतलब? उनकी दिनचर्या तो सदियों से वही चली आ रही है। टेबल पर खाना हाज़िर ,  आलमारी में तहाये हुए कपड़े, व्यवस्थित .
सुबह उठे, अखबार पढ़ा, इंटरनेट पर समय बिताया, नहा  धोकर गंदे कपड़े बदल कर इस्त्री किये हुए कपडे पहने ,काम पे गए ,शाम को वापस आये, चाय पी, धुले हुए कपडे पहने ,टी वी देखा ( पहले रेडियो पर समाचार सुनते थे ),खाना खाया , नींद आयी तो साफ़-सुथरा बिस्तर भी सामने।

अगर स्त्री भी घर से बाहर जाकर काम करती  है , फिर भी पति की दिनचर्या में कोई बदलाव नहीं होता। स्त्री सुबह उठ  कर वैसे ही  किचन में जाती है, कपड़ो का ख्याल रखती है, बच्चो का ख्याल रखती है, शाम को फिर से किचन का रुख करती है । हाँ, जहाँ दिन में ,थोड़ी देर आराम कर लिया करती  थी, अब सारा दिन ऑफिस में  काम करती है।
स्त्रियों के पहनावे में भी बदलाव आया है। अब सर पर पल्लू नहीं है, साड़ी की जगह सलवार-कमीज़ और जींस ने ले ली है . पर पुरुषों के लिए वही पैंट कमीज़। 

इन सबसे इतर, घर में पुरुषों के नाज़-नखरे (pampering ) भी उठाये जाते हैं। बढ़िया भोजन, दूध-फल ,उन्हें देने के बाद ही  स्त्री खाती है बल्कि अक्सर नहीं ही खाती है। और बहुत कम घरों में ऐसा होता  है कि पुरुष भी स्त्री के खाने-पीने का उतना ही ख्याल रखें। और यह सब पुरातन जमाने से चला आ रहा  है। 

तो कहने का अर्थ यह है कि जब पुरुषों के जीवनचर्या में कोई बदलाव आया ही नहीं तो एकाएक उनके विचार, उनकी मानसिकता कैसे बदल जायेगी?? उनका रोल नहीं बदला है और इसी तरह वे स्त्री को भी बदले हुए रोल में स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं।  अब स्त्रियाँ,आँखें मूँद कर उनकी बात नहीं मान रही हैं। वे भी अपनी इच्छा-अनिच्छा जाहिर कर रही हैं। उनकी गलत बातों का विरोध कर रही हैं। तो पुरुषों के अहम् को ठेस लग रही है। जो स्त्री अब तक चारदीवारी में कैद थी। उनका हर कहा मानती थी। पति-बेटे ने जैसा कपडा ला दिया, पहन लिया। जहाँ घुमाने ले गए चली गयीं  .अब वे अपनी पसंद-नापसंद  बताती  हैं। इनकार भी कर देती हैं, कहीं जाने से। 

और स्त्रियों के इस बदले हुए रूप से पुरुष कैसे सामंजस्य करे ,समझ नहीं  पा रहा। पुरुषों को  मदद की जरूरत है। उनके दिमाग की खिड़कियाँ खुलने में अभी वक्त लगेगा। क्यूंकि यह सब उनके लिए बहुत ही असुविधाजनक भी है। वे स्त्रियों को घर के अन्दर सहमी-सिकुड़ी से देखने के आदी थे, अब सडकों पर यूँ बेख़ौफ़ घूमते देखेंगे तो असहज तो होंगे ही।

अगर वे किसी महिला को आत्मविश्वास से लबरेज़, आत्मनिर्भर  देखते हैं तो थोडा सा डर जाते हैं, थोड़े सशंकित होते हैं कि कहीं वो उनसे आगे न निकल जाए या फिर उनके घर की स्त्रियाँ जो अब तक उनके शासन में हैं, कहीं वे उक्त स्त्री का अनुकरण न करने लगें . और वे उसकी भरपूर आलोचना करते हैं, उसकी योग्यता को नकारने की पूरी कोशिश करते हैं। उसके कपड़ों पर , उसके काम पर , उसके घुमने-फिरने सब पर अंगुली उठायी जाती है। 

 इस तरह की सोच अकेले पुरुष की ही नहीं महिलाओं की भी हो सकती है जैसा हमने हाल में ही उनके बयान देखे किसी महिला वैज्ञानिक ने दामिनी के चुपचाप  आत्मसमर्पण नहीं करने के फैसले को गलत बताया था तो किसी महिला ने उसके शाम को घर से बाहर रहने को गलत ठहराया था। इन महिलाओं की सोच भी पुरुषवादी सोच ही होती है, वे भी हर बात में पुरुषों का वर्चस्व ही सर्वोपरि  मानती हैं। 

यह  पुरुषवादी सोच जल्दी नहीं बदलने वाली , ऐसी सोच का विरोध, इसकी आलोचना  जारी रहनी चाहिए  पर इस सोच के बदलने की स्त्रियों को धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा करनी पड़ेगी। और शायद पूरी तरह ये सोच तभी बदलेगी जब हमारे देश की एक -एक लड़की शिक्षित और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो जायेगी . हालांकि इस बात का संतोष और ख़ुशी भी है, गिने-चुने ही सही पर कुछ पुरुष हैं जो स्त्री का अलग अस्तित्व ,उनके अलग व्यक्तित्व को स्वीकार करते हैं और उनका सम्मान भी करते हैं। बस इनकी संख्या में लगातार इज़ाफे की ही तमन्ना है, हर स्त्री को। 

Friday, January 11, 2013

एक रोचक संवाद


बेटा अति उत्साहित स्वर में "पता है माँ,  आज क्या हुआ ?"
माँ --"कुछ बहुत इम्पोर्टेंट बात है ? "
बेटे के स्वर में थोड़े से उत्साह की कमी -- "नहीं इम्पोर्टेंट तो नहीं, इंटरेस्टिंग है "
"अभी टी वी पर कितना हीटेड डिस्कशन चल रहा है, ब्रेक में बात करें ?"
"हाँ ठीक है " बेटा भी टी वी पर नज़रें गड़ा  देता है .
ब्रेक में माँ को किचन का कोई काम ध्यान आ जाता है और वो उठ कर चली जाती है। 
प्रोग्राम ख़त्म होने पर बेटा थोड़े से शंका भरे स्वर में पूछता है ," अब सुनोगी ?"
"हाँ किचन में चलें, खाना लगाने की तैयारी करते हुए बता देना "

"ओके" कहते बेटा किचन में आकर पुनः उत्साह में बात शुरू करता है ," आज एक फ्रेंड के साथ एक छोटे से रेस्टोरेंट में गया था , हमारी बगल वाली टेबल पर एक आदमी अकेला बैठा था . तभी छह लोगो का एक बड़ा सा ग्रुप आया रेस्टोरेंट वालो ने हमसे रिक्वेस्ट किया कि उन अकेले बैठे आदमी की टेबल पर चले जाएँ। इनके लिए टेबल खाली  कर दें .हमें अच्छा नहीं लगा, फिर भी हम चले गए। वहां बैठे उस आदमी से इंट्रो हुआ, उसने बताया वो अमुक कंपनी ( एक मल्टी नेशनल ) में काम करता है। बहुत फ्रेंडली था, थोड़ी देर बातें की फिर वो अपनी सैंडविच ख़त्म कर चला गया। थोड़ी देर बाद हमने भी अपना सूप ख़त्म किया और जब वेटर से बिल लाने को कहा तो वेटर ने बोला  "आप दोनों का बिल तो उस व्यक्ति ने चुका  दिया है . हमें बड़ा अजीब लगा फिर हम भागते हुए होटल से बाहर आये तो देखा वो अपनी मोटरसाइकिल स्टार्ट करके जा रहा था . हमने उनसे थैंक्स कहा और ये भी कहा, 'ऐसा  क्यूँ किया आपने ?'

वे हँसते हुए कहने लगे ,"कोई बात  नहीं मैं अक्सर यहाँ आता हूँ अगली बार आप हमारा बिल दे देना, हम मिलते रहेंगे ." उसने फिर से गर्मजोशी से हाथ मिलाया और चला गया . तुरंत मैंने और मेरे फ्रेंड ने उसका नाम गूगल किया तो पता चला वो तो बिग शॉट है।  अपने डिपार्टमेंट का हेड है " 

अब एक बड़ी मल्टीनेशनल कम्पनी के एक डिपार्टमेंट के हेड ने एक स्टूडेंट से इतनी आत्मीयता से बात की , बेटा इस बात से रोमांचित था। पर माँ उसके रोमांच पर ठंढा पानी डालने के लिए ग्लास ही नहीं पूरा जग लिए बैठी थी। 

"तुम्हे कैसे पता वह आदमी सच बोल रहा है , कहीं उसने अपने डिपार्टमेंट के हेड का नाम ले लिया होगा "
" माँ , नेट पर उसके प्रोफाइल के साथ  उसकी तस्वीर भी थी, ये वही आदमी था " बेटा  जोर देकर कहता है .
"तो फिर वह बाइक पर क्यूँ  सवार था ,उसे तो किसी  फैंसी कार में होना चाहिए था ?"
"वो फैंसी बाइक ही थी, पता है वो बाइक कितने की आती है? पंद्रह लाख की "

माँ ने खुद को घिरता हुआ पाकर दूसरा पॉइंट  ढूंढ लिया "वो इतने छोटे रेस्टोरेंट में क्यूँ  आया था  ?"

"इस रेस्टोरेंट का चिकन सूप और सैंडविच बहुत मशहूर है, दूर दूर से लोग आते हैं, हो सकता है वो अपने स्टूडेंट डेज़ से यहाँ आता हो ,पता है कितने बड़े बड़े लोग कैसी कैसी जगहों पर अपने टेस्ट का खाने के लिए जाते हैं? पढ़ा था मैंने मुकेश अम्बानी, सलमान खान वगैरह  कहाँ जाते हैं ,पर जाने दो नहीं बताऊंगा वरना फिर कुछ सवाल शुरू हो जाएगा। कुछ कहना ही बेकार है " और बेटा मुहं फुला कर चला गया।

अब वो माँ  इस रूठे बेटे को कैसे मनाये  :):)

{अब पढ़कर ये मत कहियेगा  कि रश्मि रविजा  तो कुछ भी लिखती है .  PD का कहना है, मेरा ब्लॉग है, मैं उसमे बस इतना लिखुं  "आज मैंने एक ग्लास पानी पिया " तो :):) }

Saturday, January 5, 2013

संवेदनाएं जगाने के लिए किसी क़ानून की जरूरत नहीं

दामिनी / निर्भया के साहस और बलिदान ने हमारे देशवासियों को जैसे सोते से जगा दिया है। अब ये बात दीगर है कि कब तक ये आँखें खुली रह पाती  है। नए क़ानून का निर्माण , मौजूद कानूनों को सख्ती से लागू करना, दोषियों  को कड़ी सजा देना , महिला पुलिस की नियुक्ति जैसी बातें हो रही हैं .कितनी तत्परता से इन्हें  लागू किया जाएगा , ये कितनी सफल होगीं .यह तो आने वाला वक़्त ही बतायेगा। 

पर इस आन्दोलन ने इतना जरूर किया है कि जो विषय परिवार के बीच  वर्जित था। जिस पर बात  करने से लोग कतराते थे। चर्चा करते भी थे तो बड़े  ढंके छुपे शब्दों में ,अब खुलकर इस पर बात हो रही है। कम से कम समाज यह स्वीकार तो कर रहा है कि इस तरह की व्याधि समाज में व्याप्त है। रुग्ण  मानसिकता वाले लोग समाज में हैं। लडकियां यह सब झेल रही हैं। अगर किसी लड़की के साथ छेड़छाड़ होती है तो दोष उस लड़की का नहीं है, चुप उसे नहीं रहना है बल्कि उस अपराधी को चुप कराना  है . पर अब तक बिलकुल उल्टा होता आया है। लडकियां भी इसे शर्म का विषय मान कर चुप रहती आयी हैं और दुराचारियों की हिम्मत इस से बढ़ी ही है। 

अमेरिका में रहने वाली एक भारतीय लड़की ने बहुत ही व्यथित और आक्रोशित होकर  अपने अनुभव शेयर किये हैं। वह उन्नीस वर्ष की थी, एक शाम बस से घर लौट रही थी। पास खड़े एक आदमी ने उसे हाथ लगाया उसने जोर से चिल्ला कर विरोध प्रकट किया और उस आदमी को डांटा . उसके साथ पहले भी जब किसी ने ऐसी हरकत की थी ( पब्लिक ट्रांसपोर्ट में यह आम है ) उसके चिल्लाने पर कंडक्टर उस आदमी को बस से उतार देता था। वह खुश हो जाती  कि 'उसने विरोध किया, उस आदमी को सजा मिली और अब वह ऐसी हरकत नहीं करेगा।'

 इस बार भी वह लड़की कुछ ऐसी ही अपेक्षा कर रही थी पर इस कंडक्टर ने कहा, "दूसरी जगह जाकर खड़ी  हो जाओ"
उस लड़की ने कहा, "मैं क्यूँ दूसरी जगह जाऊं?? आप इसे बस से उतरने के लिए कहिये" और उसी वक़्त पास खड़े उस आदमी ने उस लड़की को चूम लिया " पूरी बस चुपचाप तमाशा देखती रही . ये लड़की गुस्से में चिल्लाती रही,वह आदमी  मुस्कुराता  रहा और बस के लोग चुपचाप देखते रहे (उसमें महिलायें भी होंगी ) पर यह उनकी बहन या बेटी नहीं थी ,इसलिए सब चुप थे। उसके लगातार गुस्सा करने  पर कंडक्टर ने उस लड़की को ही  बस से उतार दिया। 

इस लड़की ने बस का नंबर  नोट किया। घर आकर पिता को बताया .पिता उसे लेकर पुलिस स्टेशन जाना चाहते थे पर उसकी माँ ने कहा 'एक टीनेज लड़की को लेकर पुलिस स्टेशन जाना ठीक नहीं, और फिर लोग पता नहीं क्या बातें बनाएं' (माँ का सोचना भी गलत नहीं था, समाज ही ऐसा है ) पुलिस स्टेशन फोन किया गया कि उनके पास बस का नंबर है वे ड्राइवर और कंडक्टर के खिलाफ रिपोर्ट लिखाना चाहते हैं . पिता को बार बार अपने 'गजटेड अफसर' होने का जिक्र करना पड़ा तब उनकी बात सुनने  को कोई तैयार हुआ। दस मिनट बाद एक महिला पुलिस ऑफिसर ने फोन करके कहा, " अगर हम FIR फाइल करते हैं तो वो आदमी तो पकड़ा नहीं जाएगा, हमें ड्राइवर और कंडक्टर को सस्पेंड करना पड़ेगा . ड्राइवर और पुलिस ने अपने युनियन में शिकायत कर दी तो वे स्ट्राइक पर चले जायेंगे .फिर स्ट्राइक  की बात  अखबारों में आएगी, आपका नाम आएगा, बेकार बदनामी होगी ,मेरी सलाह है भूल जाइये इस घटना को "

जब उसने कॉलेज में इस घटना के बारे में बताया तो एक लड़के ने उसके पीठ पीछे कहा, "पागल है क्या ये लड़की, इस तरह की बातें कोई बाहर में करता है ??", यही सबसे बड़ी गलती है हमारे समाज की। जो ऐसी हरकते करे ,उसे कुछ न कहा जाए  बल्कि शायद वह अपने दोस्तों में शेखी भी बघारे 'आज तो उसने ऐसा किया' पर जिसके साथ ऐसी हरकत की जाए वह लड़की चुप रहे। उस लड़की ने ये भी लिखा है कि इसके पहले कि  ये पढ़ते हुए लोग सोचने लगें कि मैंने क्या पहना हुआ था जो उस आदमी ने ऐसी हरकत की तो ये बता दूँ कि  मैंने सलवार कुरता दुपट्टा पहना हुआ था " 
शायद ये सब पढ़ते हुए यह ख्याल भी आये लोगो के मन में कि वह लड़की , कंडक्टर की बात मान कर दूर क्यूँ नहीं खड़ी  हो गयी ? अब भुगते जैसा दामिनी के लिए भी लोगो ने कहा, उसे आत्मसमर्पण कर देना चाहिए था, उसने उस बस में लिफ्ट ही क्यूँ ली? लोग ये नहीं सोचते कि पूरी भरी बस में से लोगो ने उस आदमी को पीट क्यूँ नहीं दिया। कम से कम वह आगे ऐसी हरकत करने से तो डरता पर छोड़ देने से तो उसे और बढ़ावा ही मिल गया। 
 आखिर लडकियां कब तक ऐसी हरकतों को नज़रंदाज़ कर दूर जाकर खड़ी  होती रहें। अगले कितने साल, अगली कितनी सदी तक???

उस लड़की ने आगे लिखा है, "पिछले आठ साल से वह इस घटना को भूलने की कोशिश कर रही है। पर उस आदमी  की वह हरकत और उपहास भरी हंसी वह भूल नहीं पायी है। उस आदमी को सजा देना चाहती है,उसकी हंसी छीन लेना चाहती है ". वह इतनी दुखी है कि कहती है ,'अच्छा है अब मैं अमेरिका में हूँ और मैं नहीं चाहती कि  वापस लौटूं और अपनी बेटी को ऐसे माहौल में बड़ा करूँ ?"
क्या हम उसे ऐसा सोचने के लिए स्वार्थी कह सकते हैं ? नहीं कह सकते क्यूंकि हम सब यहाँ स्वार्थी हैं। जब तक खुद पर न गुजरे निरपेक्ष बने रहते हैं।

उस लड़की को यह सब झेले तो आठ साल ही हुए हैं, इसके मुकाबले एक छोटी सी घटना ही है ,पर उस  घटना को पच्चीस साल हो गए हैं फिर भी मुझे  अक्सर ख्याल आता है कि लोग ऐसे उदासीन कैसे हो सकते हैं ? 

मैं कॉलेज में थी और 'तिलैया सैनिक स्कूल' में पढनेवाले अपने भाई से मिलकर माँ  के साथ बस से 'तिलैया'  से 'रांची'  जा रही थी। बस में चढ़ी तो बस बिलकुल खाली सी थी। बहुत कम लोग थे पर जितने भी लोग थे, पूरी बस में पसरे हुए थे। सबने विंडो सीट ली हुई थी। हर सीट पर अकेला आदमी बैठा था पर खिड़की के पास।माँ ने,  सबसे आग्रह किया कि किसी दूसरे  के साथ बैठ जाएँ . विंडो  सीट मुझे दे दें, मैं खिड़की के पास बैठ जाती , माँ मेरे बगल में बैठ जातीं तो मैं सुरक्षित रहती .पर एक आदमी भी अपनी सीट से नहीं उठा, उदासीन सा सर उठा कर दूसरी सीट की तरफ इशारा करता, 'उनसे कहिये न, उठने को ' वो आदमी दूसरे से कहता पर कोई अपनी जगह से नहीं हिला  क्यूंकि उनके घर की कोई लड़की तो थी नहीं, वे क्यूँ परवाह करें। कंडक्टर ने माँ से कहा ,आप बीच में बैठ जाइये  लड़की  को किनारे बिठा दीजिये "  पर मुझे उन सबको देख कर इतना गुस्सा आया था कि मैं बस से उतर गयी और दूसरे  बस का इंतज़ार करने लगी कि उसमें तो कोई महिला यात्री होगी। दूसरी बस में महिला यात्री भी मिल गयीं और मुझे विंडो सीट भी।  मेरे दो घंटे जरूर बर्बाद हो गए।
पर यह घटना मुझे अक्सर याद आती है, आखिर उस बस में  सवार लोग एक संस्कारवान मध्यमवर्गीय परिवार से ही होंगें पर इतने उदासीन  कैसे हो सकते हैं ? 

सरकार से नए कानून  बनाने की , दोषियों को कड़ी सजा देने की ,महिलाओं के सुरक्षित माहौल की मांग तो हम जरूर कर रहे हैं पर इस से पहले हमें एक समाज के रूप में जागना होगा। अपने परिवार से आगे बढ़कर सोचना होगा। 
यह प्रण  लेना होगा, किसी भी पब्लिक प्लेस पर किसी लड़की को कोई तंग करे तो गर्दन घुमा कर दूसरी तरफ नहीं देखने लगेंगे बल्कि चारों तरफ एक बार नज़र घुमा कर पहले ही देख लेंगे कि कोई लड़की अपने पास किसी की उपस्थिति से असुविधाजनक तो महसूस नहीं कर रही . 

रास्ते के किनारे किसी घायल को पड़े देख नज़रें फेर आगे नहीं बढ़ेंगे, ये नहीं सोचेंगे कि अभी घर जाकर जल्दी सोना है क्यूंकि कल ऑफिस जाना है, बच्चों को सुबह स्कूल भेजना है। एक दिन बच्चे स्कूल नहीं गए, बॉस की डांट खा ली तो ज़िन्दगी नहीं रुक जायेगी पर समय पर किसी की मदद नहीं की तो उनकी ज़िन्दगी जरूर चली जायेगी। जितने लोग इस आन्दोलन में शामिल हुए , अपनी प्रतिक्रियाएं दीं , दुखी हुए अगर उतने लोग ही अपने आस-पास का माहौल बदलने की शुरुआत कर दें तो कुछ तो बदलेगा .

इन सबके लिए कोई कानून बनाने की जरूरत नहीं है। 

हम थोड़ी सी अपनी संवेदनाएं जगायेंगे , दूसरों की मदद के लिए आगे आयेंगे ,अपनी सोच बदलेंगे तो  आस-पास अपने आप बदलने लगेगा। और दुनिया रहने लायक बनने लगेगी तब इस देश की कोई बेटी दुखी होकर नहीं कहेगी कि 'मुझे अपने वतन नहीं लौटना.'

Wednesday, January 2, 2013

माँ नी मेरी मैं नई डरना....


नया साल आ गया, तारीख बदल गयी, उम्मीद है, इस वर्ष कुछ तो बदलेगा 

31दिसंबर 2012 को You Tube पर कड़वी सच्चाई बयान करता हुआ एक जोशीला गीत रिलीज़ हुआ . इस गीत को बनाने वालों (Swangsongs ) ने अपनी पहचान नहीं बतायी है बल्कि सिर्फ गीत के जरिये दिया सन्देश ही महत्वपूर्ण माना है।

 इस गीत का एक एक शब्द बहुत ही प्रभावी है। 
माँ नी मेरी मैं नई डरना .                                                                                                                                                                                                                                                                                         




 




जावेद अख्तर  की ये ग़ज़ल बड़ी मौजूं लग रही है ,इस माहौल में 

वो  ढल  रहा  है  तो  ये  भी रंगत बदल रही है 
जमीन, सूरज की उँगलियों से फिसल रही है 

जो मुझे जिंदा जला रहे हैं, वे बेखबर हैं 
 कि मेरी ज़ंजीर धीरे धीरे पिघल रही है 

 मैं क़त्ल तो हो गया, तुम्हारी गली में लेकिन 
 मेरे लहू से तुम्हारी दीवार गल रही है 

 न जलने पाते थे ,जिनके चूल्हे भी हर सवेरे 
सुना है, कल रात से वो बस्ती भी जल रही है 

 मैं समझता हूँ कि खामोशी में ही समझदारी है 
 मगर यही समझदारी मेरे दिल को खल रही है 

 कभी तो इंसान ज़िन्दगी की करेगा इज्ज़त 
 ये एक उम्मीद आज भी दिल में पल रही है

भारतीय घरों का सच दिखाती फिल्म : The great indian kitchen

  The great indian kitchen फिल्म देखते हुए कई चेहरों का आँखों के समक्ष आ जाना लाज़मी है। हर मध्यमवर्गीय भारतीय महिला अपनी जिंदगी में कभी न कभ...