Sunday, December 25, 2011

दोनों हाथों से किताबों का खजाना लुटाते, सूरज प्रकाश जी


सूरज प्रकाश जी..अपने खजाने के साथ 
अब तक सुन रखा था, कम्बल बँट रहे हैं...लड्डू बँट रहे हैं...भोजन बँट रहा है...पर पुस्तकें बँट रही हैं, वो भी साहित्यिक पुस्तकें..और अपनी पसंद की पुस्तकें चुन लेने की छूट भी है...यह एक अनोखी खबर थी. जब सतीश पंचम जी ने बताया तो सहसा विश्वास नहीं हुआ...पर उन्होंने जाने-माने साहित्यकार सूरज प्रकाश जी के आलेख का लिंक भी दिया...जिसमे उन्होंने जिक्र किया था कि वे अपनी चार हज़ार संग्रहित पुस्तकें इच्छुक पाठकों को देना चाहते हैं...उनकी इस दरियादिली पर मन नतमस्तक हो उठा. 

जब मैने ब्लोगिंग शुरू ही की थी....तभी सूरज प्रकाश जी से एक ब्लोगर मीट में मिलने का सुयोग प्राप्त हुआ था. पर उसके बाद उनसे कोई संवाद नहीं हुआ. सतीश जी....फेसबुक के माध्यम से उनके संपर्क में थे. पर मेरे मन में  पुस्तकें लेने की अदम्य इच्छा के साथ-साथ कुछ संकोच भी विद्यमान था. कोई परिचय नहीं...संवाद नहीं..और सीधा पुस्तकें लेने पहुँच जाऊं. सतीश जी से मैने सूरज जी के यहाँ जाने की इच्छा तो जताई पर कन्फर्म नहीं  किया था. कॉलेज में मुझे सब कहते थे, 'रश्मि को किताबों की खुशबू आती है'...किसी ने कितनी भी छुपाकर कोई किताब  रखी हो..मेरी नज़र पड़ ही जाती थी.. और यहाँ चार हज़ार किताबों की खुशबू ने तो जैसे दिल-दिमाग पर कब्ज़ा कर लिया था..पर हिचकिचाहट भी पीछा नहीं छोड़ रही थी. और जैसे मुझे इसी ऊहापोह से उबारने के लिए वंदना अवस्थी दुबे की इंदौर जाने वाली ट्रेन लेट हो गयी और वो चैट पर मिल गयी...जैसे ही उसे मैने सूरज जी के आलेख का लिंक दिया और अपने असमंजस का जिक्र किया, उसने तुरंत कहा..'तुम्हे जरूर जाना चाहिए..ऐसा अवसर नहीं छोड़ना चाहिए...मैं मुंबई में होती तो जरूर जाती'..और मैने जाने का निर्णय ले लिया ...(शुक्रिया सतीश जी और वंदना ..दोनों का..जिनके प्रोत्साहन से मुझे इतनी नायाब पुस्तकें मिलीं) 

जब सतीश जी को अपने निर्णय की जानकारी दी...तो उन्होंने सुबह दस बजे ही निकलने की बात की....अब हम गृहणियों के लिए जरा मुश्किल होता है, इतनी जल्दी घर से निकलना...जब सतीश जी से अपनी दुविधा बतायी तो वे बारह बजे चलने को तैयार हो गए.

दूसरे दिन मैं आराम से रोज की तरह घर के काम निबटा रही थी...और सतीश जी का फोन आ गया कि..उन्हें दोपहर को कुछ जरूरी काम आ गया है.....इसलिए उन्हें  तो दस बजे ही निकलना पड़ेगा ...फिर से मन  दुविधा में...सामने घर बिखरा  पड़ा था..पर नज़रों के सामने तो बार-बार शेल्फ में सजी पुस्तकें ही घूम  रही थीं. और मैने सोच लिया..'घर अपने संवरने का इंतज़ार कर सकता है..पर शेल्फ पर सजी पुस्तकें मेरा इंतज़ार नहीं करेंगी..' सबकुछ वैसा ही फैला हुआ छोड़ ,मैं झट से तैयार होकर निकल पड़ी ...और सतीश जी से पहले ही पहुँच गयी. सूरज जी बड़ी आत्मीयता से मिले..और बातों के दरम्यान उन्होंने बताया कि " अपनी 'चार हज़ार बेटियों' को उन्होंने अपने घर से विदा करने का निर्णय ले लिया है" बड़ी सटीक उपमा दी उन्होंने..सच ही तो है....इतने दिन किताबें उनके घर की  रौनक बनी रहीं...अब वे दूसरे लोगों को सीख देने..उनका जीवन संवारने जा रही थीं.' वे बता रहे थे...'बहुत ही कठिन निर्णय था यह...पर मैने  फैसला कर लिया...कि इन पुस्तकों का लाभ अब दूसरों को भी उठाने का मौका देना चाहिए '

मुझसे उन्होंने  मेरी रूचि की किताबें पूछीं..जाहिर था...कहानियाँ लिखती हूँ..तो मेरी रूचि कहानी संग्रह--उपन्यासों में ही थीं. अंदर के कमरे में चारों तरफ करीने से सजी किताबें रखी थीं.....शेल्फ पर...तख़्त पर...जमीन पर किताबों का अम्बार लगा हुआ था. मैं mesmerized सी खड़ी थी. दिनों बाद मैं हिंदी की इतनी सारी पुस्तकें एक साथ देख रही थी.{मुंबई में तो अंग्रेजी ..मराठी..गुजराती का ही बोलबाला है..:( } कई लेखकों के लेखन से 'धर्मयुग'  के जरिये परिचय हुआ था. प्रियंवद, गोविन्द मिश्र, संजीव, मिथिलेश्वर, सुषमा मुनीन्द्र, मंजूर एहतेशाम, मेहरुन्निसा परवेज, प्रियरंजन...आदि की  किताबें देख सब की सब पढ़ने का मन हो रहा था. एकाध पलट कर देखा...और लिखा हुआ पाया..'इनकी पहली कहानी धर्मयुग में प्रकाशित हुई थी' . प्रेमचंद,जयशंकर प्रसाद इलाचंद्र जोशी, मोहन राकेश...जैसे लेखकों की किताबें तो मैने कॉलेज की लाइब्रेरी में ही खंगाल डाली थीं. पर इन लेखकों को पत्रिकाओं में ही पढ़ा था.  सबकी किताबें सामने थीं और चुनना मुश्किल हो रहा था. सतीश पंचम जी भी पधार चुके थे और जमीन पर आसान जमाये...मनोयोग से पुस्तकें चुनने में व्यस्त थे. उन्हें भी वही मुश्किल  हो रही थी...कौन सी चुनें, कौन सी छोड़ें.

सूरज जी, मुझे किताबों का ज़खीरा दिखा कर अन्य लोगो की सहायता करने चले गए. लाइब्रेरी के लिए भी लोग पुस्तकें लेने आए थे....सूरज जी पुस्तकें चुनने में , उनकी मदद कर रहे थे . कौन सी किताबें बच्चों के लिए अच्छी रहेंगी..कौन सी शिक्षकों के लिए...उन्हें बता रहे थे.

कुछ बांगला भाषी लोग भी थे...हिंदी साहित्य में उनकी रूचि देख बहुत ही अच्छा लग रहा था. उन्हें धर्मवीर भारती की 'अंधायुग ' चाहिए थी...सूरज जी ने अपने हाथों से एक-एक किताब रखी थी...उन्हें पता था, वो पुस्तक वहीँ कही हैं...पर मिल नहीं रही थी..मुझे भी मन्नू भंडारी की 'आपका बंटी' फिर से एक बार पढ़ने का मन था...सूरज जी ने बताया कि वो पुस्तक भी है...पर पुस्तकों के अम्बार में कहीं गुम हो गयी थी. उनलोगों के चले जाने के बाद...' अंधा युग' दो किताबों के बीच दबी हुई मिल गयी....क्या पता मेरे जाने के बाद 'आपका बंटी' भी मिल गयी हो. :(:(

वहाँ अंग्रेजी की भी काफी किताबें थीं...पर उनमे मेरी कोई रूचि नहीं थी...मुंबई में अंग्रेजी की किताबें तो आसानी से मिल जाती हैं...एक सज्जन अंग्रेजी के प्रख्यात लेखकों की किताबें ढूंढ रहे थे...सूरज जी उनकी सहायता कर रहे थे. मैने भी सबसे ऊपर वाली शेल्फ में एक किनारे..'बोरिस पेस्टर्नेक' की 'डा. जीवागो' रखी देखी थी..झट से बता दिया. सूरज जी ने थोड़े संकोच से कहा, 'वो किसी ने फोन करके कहा है...अलग रखने को' उन्हें लगा, शायद मेरी भी रूचि है...पर मैने ये किताब अपने ग्रेजुएशन के इम्तहान के दिनों में पढ़ी थी...और डांट भी खाई थी..' कहानी थोड़ी थोड़ी भूल भी गयी हूँ..पर डांट पूरी की पूरी याद है..:) एक तिपाई पर भी कुछ किताबें अलग कर के किसी के लिए रखी हुई थीं. मन बार-बार देखने को हो रहा था...कौन सी किताबें हैं..पर सख्ती से रोक लिया खुद को..क्या फायदा...मेरी पसंद की कोई किताब होगी तो बेकार अफ़सोस होगा.

खजाने का अंश जो मैं ले आई. 
सूरज जी ने बताया था...प्रति व्यक्ति दस किताबें और पुस्तकालयों के लिए सौ किताबों की सीमा उन्होंने तय की है. ताकि ज्यादा से ज्यादा पुस्तक प्रेमी इस अवसर का  लाभ उठा सकें . दस किताबों की सीमा, हम कब का पार कर चुके थे...बार-बार किताबों की अदला बदली करते. एक निकालते दूसरी रखते. फिर मैं किताबों से अलग हट कर खड़ी हो गयी...जितना ही देखूंगी ,उतना ही मन में लालच आएगा. सतीश जी भी पेशोपेश में थे. उन्होंने अपनी किताबें गिनी और कहा...ये तो बारह हो गयीं...सूरज जी ने सदाशयता से कहा  'कोई बात नहीं..दो किताबें 'रूंगा' में ले लीजिये." अब 'रूंगा' मेरे लिए नया शब्द था. सूरज जी ने समझाया..'जैसे दुकान से हम सामान लेने के बाद कहते हैं..थोड़ा एक्स्ट्रा दे दो...इस एक्स्ट्रा को 'रूंगा' कहते है' . मैने तुरंत कहा, "मैने तो रूंगा लिया ही नहीं" सूरज जी ने हँसते हुए कहा.."आप भी ले लीजिये' और मैने जिन दो किताबों पर हाथ फेर फेर कर वापस रख दिया था..जल्दी से उन्हें भी अपनी जमा की पुस्तकों में शामिल कर लिया. सतीश जी ने कहा. हमारे गाँव में 'रूंगा' के लिए 'घलुआ' शब्द प्रयुक्त करते हैं. 'घलुआ' तो मैने सुन रखा था..पर मुझे लगता था...इसका अर्थ है 'मुफ्त में ले लेना..' आज सही अर्थ  पता चला...और 'घलुआ' और 'रूंगा' का सही अर्थों में प्रयोग करते हुए हमलोग दो किताबें ज्यादा ले आए.

किताबें चुनने के बाद उनपर स्टैम्प लगाने की बारी थी. स्टैम्प पर एक बहुत सुन्दर संदेश लिखा हुआ था..."ये किताब पढ़कर किसी और पुस्तक प्रेमी को दे दें" इसका अक्षरशः पालन करने का इरादा है. इस पोस्ट के साथ , मैने वहाँ से ली गयी पुस्तकों की तस्वीर लगाई है. आपलोगों को जो भी पुस्तक पढ़ने की इच्छा हो, बता दें...उन्हें वह किताब मिल जायेगी. {पर मेरे पढ़ने के बाद :)}


सुन्दर संदेश वाला स्टैम्प 
बातचीत भी चल रही थी और सूरज जी बता रहे थे कि अपने ब्लॉग पर लिखा उनका यह आलेख हिन्दुस्तान के 54 एडिशन में छपा है. और काफी प्रतिक्रियाएँ आ रही हैं. एक महिला ने लिखा है..'किताबें समेटने का इतना अच्छा मौका और मैं इस मौके से हज़ार किलोमीटर दूर :( :( काश मुझे कुछ किताबें मिल सकतीं !!"... सूरज जी ने मेल करके उक्त महिला से उनकी पसंद की किताबों के नाम मांगे और उन्हें भेजने के लिए किताबें अलग कर के रख दी हैं . मेरे घर आने के बाद वंदना अवस्थी का फोन आया...यह जानने के लिए कि 'मैं किताबें लेने गयी थी या नहीं?' और बातों  में पता चला..जिन महिला का जिक्र सूरज जी कर रहे थे...वो वंदना मैडम ही थीं. मैने उसे लिंक दिया और हज़ार मील दूर बैठे ही उसने मुझसे पहले ही मेल करके अपने नाम की किताबें बुक कर लीं और मुझे तिपाई पर अलग रखी किताबों को बस निहार कर ही संतुष्ट हो जाना पड़ा..:(:( {कोई नहीं...वंदना के पढ़ने के बाद उस से मैं वो किताबें मंगवा लूंगी, सतीश जी से भी किताबें एक्सचेंज करनी हैं.. :)}

सूरज प्रकाश जी के चेहरे पर संतुष्टि और प्रसन्नता के भाव देखकर अंदाज़ा हो रहा था कि 'लेने से कहीं ज्यादा ख़ुशी, देने में होती है' कोटिशः धन्यवाद सूरज जी..आपसे बहुत कुछ सीखने को मिला. 

लौटते हुए मैं सोच रही थी...फेसबुक पर किताबों की तस्वीर लगा कर एक थैंक्स का मैसेज लिख दूंगी...जो लोग ब्लॉग नहीं पढ़ते...उन्हें भी पता चल जाएगा और वे भी सूरज जी के इस महत्वपूर्ण  कार्य से प्रेरणा ले सकेंगे. पर मेरे इंटरनेट कनेक्शन ने ही धोखा  दे दिया...कल दिन भर गायब रहा..और पोस्ट लिखने में सतीश पंचम जी बाजी मार ले गए. उनकी पोस्ट यहाँ देखी जा सकती है. 

Thursday, December 22, 2011

एक ख़याल...बस यूँ ही सा...



कितना अच्छा होता
सपने बाजारों में बिका करते...
बड़े-बड़े शोरूम में सजे
चमकते शीशे की दीवारों के पीछे 
ए.सी. की ठंडक में महफूज़

रुपहले,सुनहले,चमकीले सपने
पास बुलाते...दूर से लुभाते..
पर,उनकी सतरंगी आभा से चकाचौंध  
आम लोग, 
अपनी  जेबें टटोल 
निराश मन 
मुहँ मोड़ आगे बढ़ जाते 

लेकिन  सपने तो पड़े  होते हैं 
हर कहीं
टूटी झोपडी के अँधेरे कोने में 
धूल भरी पगडंडियों  पर 
चीथड़े ढके तन पर
चोट खाए मन पर

बस उठा कर 
बसा लो, आँखों में 
पर टूटते सपनो की किरचें 
कर जाती हैं लहुलुहान 
तन और मन 

काश! होते सपने 
सबकी पहुँच से दूर 
बहुत दूर..
फिर हर कोई नहीं खरीद पाता उन्हें...

Sunday, December 18, 2011

नन्हा तोता - एक अतिथि...

GG Shaikh ब्लॉग जगत के लिए अनजाना नाम नहीं है. उनकी सारगर्भित टिप्पणियाँ हमेशा ही पोस्ट को विस्तार और एक नया आयाम देती हैं. वे सिर्फ खानापूर्ति के लिए टिप्पणी नहीं करते...पोस्ट को बहुत ही गंभीरता से पढ़ते हैं और फिर उस पर समीक्षात्मक  टिप्पणी करते हैं. कुछ दिनों पहले उन्होंने, मुझे  एक प्यारा सा आलेख मेल किया, इस संदेश के साथ कि 'चाहूँ तो अपने ब्लॉग पर अतिथि पोस्ट के रूप में पोस्ट  कर सकती हूँ.' मैने उल्टा उनसे फरमाइश कर डाली..'आप इतना अच्छा लिखते हैं...अपना एक ब्लॉग क्यूँ नहीं बना लेते ? और फिर उस ब्लॉग पर ये आलेख पोस्ट कर दीजिये' ..उन्होंने 'सोचूंगा...' कह कर बात टाल दी. पर शायद समय की कमी की वजह से उन्होंने अब तक अपना ब्लॉग नहीं बनाया है...जब मैने 'जया चेची की अतिथि' पोस्ट डाली तो मुझे  GG Shaikh  की पोस्ट भी याद आ गयी. इतने प्यारे से मासूम से तोते की कहानी से अपने पाठकों को इतने दिनों तक महरूम रखना ठीक नहीं. 

मैने आप सबसे परिचय करवाने को  GG Shaikh  से आग्रह किया कि कुछ पंक्तियों में वे अपना परिचय लिख कर भेज दें...क्यूंकि मैं तो उनका पूरा नाम भी नहीं जानती. प्रतिउत्तर में उनका मेल आया ,लिख दीजिये...


"Buzz/Blog के एक टिप्पणी कार ने  यह आलेख मुझे पढ़ने को  भेजा था. 
पसंद आया सो यहाँ अतिथि पोस्ट से भेज रही हूँ...बस, और क्या!"

हाँ..एक लेखक का असली परिचय तो उसका लेखन ही है...बस, और क्या !! 

तो लीजिये प्रस्तुत है एक प्यार से नन्हे अतिथि 'तोते' की कहानी GG Shaikh  की जुबानी 

जैसे  शाम अंधेरा होते ही पंछी अपने-अपने घोंसलों में, पेड़ो की शाखों  पर लौट  आते  है, इसके बिल्कुल उलट, इस तपते समर में,
शाम , सूरज के ढलने पर सोसाइटी  के बच्चे अपने-अपने घरों से निकल बाहर खेलने को  चले  आते हैं...
दिन का यही थोड़ा सा  शाम का वक़्त  बच्चों के साथ कभी-कभी बिताना मुझे अच्छा लगता है. बच्चे भी, मुझे लगे,
जैसे मेरी बाट  न जोहते  हो...! तभी तो मुझे  घर से बाहर निकलता  देख  शुरू हो जाते हैं, कुछ न कुछ बताने को. तब मैं सिर्फ उनकी प्राथमिकता  बन  जाता हूँ.  जेनब(छोटी सी लड़की) और अन्य बच्चे इतने ज़हीन है कि उन्हें मेरी बातों में कुछ न कुछ नयापन  सा ज़रुर  दिखता है  तभी तो  उन्हें मेरी बातें पसंद आती है. वैसे भी  रुढीगत ढर्रे मैं बंध ना शुरु से ही मुझे अरुचिकर लगा है. फिर इन बच्चों का मुझसे एक और आकर्षण भी है...दो-पांच रूपियोंवाला डेरी मिल्क चोकलेट्स...! जो में उन्हें कभी-कभी देता रहता  हूँ. फ़िर बच्चे तो  मासूम होते ही हैं क्योंकि वे  भूत-भविष्य की  सही-गलत  ख़याली  चिंताओं  से अछूते होते हैं और वर्तमान में ही जोश ख़रोश  से जीते हैं, खेलते हैं और  मिलते हैं...
  
अभी चार-पांच दिन की ही बात है. ऐसी ही एक  शाम  जब मैं घर से बाहर  निकला तो नन्हीं जेनब ने फौरन आकार  मुझे  बताया:
"अंकल ! अंकल ! सामने वाले  बंद घर के कम्पाउन्ड की लॉन  में एक नन्हा सा तोता  है"... "अच्छा...!"  कहकर जब मैं तोते को   देखने पहुंचा  तो देखा कि तोते  का एक छोटा सा  अधमरा बच्चा  बेतहाशा  उग आई जंगली घास में बिना हिले-डुले बेचारगी में उदास-सा बैठा है...जो उड़ 
नहीं पा रहा है. 


समझते मुझे  देर न लगी...हमारे घर के सामने वाला  वह   बड़ा सा मकान NRI का है, जो लंदन निवासी (अप्रवासी भारतीय) हैं और साल में एक बार, जब  विदेशों में ठंड असह्य हो जाती है तब  यहाँ भारत में,  अपने वतन में आ कर  एक-दो महीनों के लिए रुकते  हैं. फ़िर वहां मौसम सही होते ही वापस विदेश चले जाते हैं और उनके जाने के बाद  यह घर फ़िर से दस महीनों तक  सूना-सूना सा बंद  पड़ा  रहता है. 
इसी महल-नुमा NRI के   घर की  टेरेस पर पंद्रह-पच्चीस तोते-तोतियों के झुंड ने  एक अर्से से अपना बसेरा  बनाया हुआ है. जिनकी वजह से   हमारी भी रोज की  सुबह-शाम तोते-तोतियों की  हरी-हरी  प्रेज़ंस से, उनके चहचहाने से आबाद रहती है. इसी  दोमंजिला मकान की   टेरेस पर जहाँ बारिश के पानी के निकाल  के लिए एक पाईप का टुकड़ा  लगाया गया है, उस दो-ढाई फुट के  पाईप-टुकड़े के भीतर  इन तोतों  ने अपने  नवजात बच्चों को रखने को  घोंसला  बनाया है. तोतियाँ घोंसले में अंडे रख उन्हें सींचती  है, और सुबह-शाम उस घोंसले की देखरेख में तोते  लगे रहते हैं...उस छोटे से  पाईप से फिसल कर ही  शायद यह बच्चा नीचे गिर आया  होगा... 


गिर आए  बच्चे के इर्दगिर्द हैरान-परेशान  से कई  तोते  'टर्र-टर्र' की रट लगाए  इधर-उधर उड़ रहे थे...पर लग रहा था कि बेचारों को  इस बात का इल्म न था  कि कैसे बच्चे को उठाए  और घोंसले में वापस रख दें...     
अब  इस  सोच से  मेरी चिंता बढी जा  रही थी कि हमारी सोसाइटी  में काफी बिल्लियाँ इधर-उधर घूमती रहती है और अगर कहीं इस बच्चे की  भनक भी उन्हें लग  गई  तो नन्हे तोते का  ज़िंदा   रहना मुश्किल हो जाएगा...पर इतने लिजलिजे, पंख- झडे कमज़ोर बच्चे को उठा कर सुरक्षित  जगह पर रखना कुछ मुश्किल  सा  लग रहा  था. बहरहाल, सोसाइटी   के  वाचमैन को बच्चे ही बुला कर  ले आए, जो अभी  तक
देख-सोच  रहे थे कि आखिर  अंकल अब  क्या करनेवाले  हैं...! 


वाचमैन आया. मिसेज़  ने उसे एक कॉटन  के  कपड़े  का टुकड़ा  दिया. फ़िर घर में रखे जूने-पुराने  सामान से बहुत पहले ख़रीदा हुआ  एक जूना-पुराना धातु के तारों से बना  पंखी-पिंजरा निकाला गया जो लाल-सफ़ेद रंगों से रंगा हुआ था ...वाचमैन ने नन्हे तोते  को कपड़े में लपेट कर सिफत से  पकड़ा और धीरे से लाकर  पिंजरे में छोड़  दिया...और हमने पिंजरे का मुख्य  द्वार बाहर से बंद  कर दिया.


वह पूरी शाम आसपडोस के नन्हे बच्चों के लिए एक अनूठे उत्सव की सी शाम थी...फिर इस बारे में, सोसाइटी में जो भी बच्चा सुनता वह चला आता मेरे घर के कम्पाउंड में...जहाँ दीवार में लगी मोटी सी खूंटी में पिंजरा लटक रहा था...जिस में नन्हा तोता  उदास बैठा था... 


शाम ढली, बच्चे भी अपने-अपने घरों को हो लिए...मिसेज़  ने हरी मिर्च और एपल के कुछ  टुकड़े पिंजरे में डाले और  पिंजरे के अंदर लगी  हुई   दो  कटोरियों में पानी भरा...पर हमने देखा, हमारी इस मेहमाननवाज़ी  का  उस  नन्हे तोते पर  कोई  असर न हुआ...वह अनमने  भाव से  खामोश बैठा रहा...रात सोने से पहले हमने उसे हिफाज़त वाली जगह पर रख दिया. घर के पीछे वाले बंद दरवाज़े के  स्टोर-रूम में, जहाँ हवा के  आवन-जावन के लिए  वेंटीलेसन भी था...


सुबह नींद में ही कई तोतों के चीखने-चिल्लाने की आवाजें सुनी...घर के पीछे जाकर देखा तो सात-आठ  तोते  स्टोर-रूम के बंद द्वार  पर अपनी टांगों  व  चोंचों के बल  लटक रहे हैं, और अंदर बैठा  नन्हा तोता भी  बार-बार निरंतर  अपनी टिपीकल बच्चों वाली आवाज़ में अपने गार्डीअंस को  पुकारे जा  रहा है... बाहर उड़ रहे तोते उसे खाना चुगाने को और  मुक्त कराने  को बेताब हो  इधर-उधर उड़े जा रहे  थे...


फ़िर  हमने पिंजरे को उसी बाहर  वाली  खूंटी  में लाकर टाँग दिया जहाँ बाद में उसके परिजनों ने नन्हे तोते को  भर पेट सुबह का नाश्ता करवाया.
पत्नी  रोज  सुबह तोते-बच्चे को पिंजरे में  ही नहलाती, नन्हे तोते को  नहाना बड़ा अच्छा लगता...इस नित्यक्रम के बाद पिंजरे को फ़िर बाहर खूंटी   पर  टाँग दिया जाता. सुबह  हमें  यह  देख  अफ़सोस होता  कि सारी रात  नन्हे तोते ने  हमारा पिंजरे में रखा  न कुछ  खाया है  और न  ही पानी पिया है, सबकुछ वैसा का वैसा ही पिंजरे में धरा पड़ा  है. पर घर के भीतर से  हम देखते  कि कुछ तोते-तोतियां,  आस-पास की जगह से चौकन्ने हो, इधर-उधर के  खतरे को भांपकर  बच्चे  को, शायद अपने मुंह में ही तैयार किया हुआ  कुछ सफेद दानों  सा खाना, पिंजरे के  तारों में अपनी चोंचें डाल खिला जाया करते थे  और वह नन्हा  भी बड़ी आश्वस्तता के साथ लाड-दुलार से दानें खाता रहता .


एक  दिन सुबह मैंने पाया  कि पिंजरे के कम अंतर  वाले तारों की वजह से तोतों को खिलानें  में और नन्हे  को खाने में दिक़्क़त हो रही है...मिसेज़  के मना करने पर भी मैंने पिंजरे का  मुख्य  द्वार ज़रा-सा  खोल दिया...ताकि तोते अपना पूरा मुंह पिंजरे में डाल बच्चे को सहूलियत के साथ खिला सके. मुझे विश्वास था कि बच्चा उस थोड़े से खुले द्वार से नहीं निकल पाएगा...फ़िर में शेविंग करने को  घर में लौट  आया...थोड़ी देर बाद आकर  देखा तो अपनी आँखों पर विश्वास ही न हुआ...पिंजरा ख़ाली था !  बाद में देखा तो बच्चा सामने वाले घर की गेट पर बैठा हुआ दिखा. उसके नातीन  उसे भगा ले जाने की पैरवी में चिल्लाते हुए  इधर-उधर उड़े जा रहे थे...मिसेज़ उसे पकड़ने दौड़ी तो वह नन्हा   दबंग  नीचे-नीचे उड़ता हुआ सोसाइटी के चौथे मकान के बागीचे में जा बैठा..


वहां काम कर रहे एक माली की मदद से मिसेज़  ने उसे फिर से पकड़वाया और ला कर वापस  पिंजरे में बंध  किया. नन्हा  तोता निराश और पस्त हुआ और बाहर उसके परिजनों  का आक्रंद भी बहुत देर तक न थमा...


इस दौरान  आसपडोस और सोसाइटी के बच्चे भी शाम को नियत समय पर नन्हे तोते की  मुलाक़ात लेते और हमारा भी ध्यान दिन भर नन्हे  तोते की ओर लगा रहता... 


नन्हा तोता  रोज़   सुबह नहाता. पर  खाता कुछ न था.  बाहर खूंटी पर टंगे पिंजरे पर तोते-तोतियां नियमानुसार आते और  उसे खिला जाते...हमने देखा, नन्हा तोता  मनुष्य  बच्चों  जैसा डेलिकेट न था...वह इन तीन दिनों में खासा निखर उठा था. शरीर की ख़ाली जगहों पर नए-नए  हरे  पर  उग  आए  थे...वह स्वस्थ  तरोताज़ा और सुंदर लगने लगा था. उसके  जन्मगत जीवन घटक  काफी साबुत  थे. मेरे लिए इस नौनिहाल का इस तरह दो-तीन दिनों में तरोताज़ा हो जाना  अचरज से कम न था. अभी तीन दिन पर तो वह पर-झडा मरियल सा पस्त हाल था...अब के उसका गोलमटोल चेहरा, चमकीली आंखे और हरा-भरा रेशम सा मुलायम  तन देखते ही बनता...बाद में मैंने फील किया  कि  उसके परिजन जो  सुबह-शाम उसे खिला जाते थे वे सफ़ेद  दाने नन्हे तोते के लिए काफी सत्वशील रहे  होंगे...
   
उसकी वैसी सुंदरता देख हम भी उसकी मोह-माया में धीरे-धीरे बंध ने लगे थे. उसे अपने पास रख लेने को ललचा रहे थे. मैं सोच  रहा था, कहीं हमारा यह मोह उसकी रिहाई में बाधा न बन जाए. हमारा हेतु तो उसे बिल्लियों से  बचाना था न कि उसे आजीवन का कारावास देना...  वह उड़ना सीख जाए,  शक्तिशाली  हो जाए तो उसे उड़ा देना था...


बहरहाल अगर हम उसे सदा अपने पास रखना चाहते भी,  उसे पिंजरे में बंद  रखना चाहते तब भी हम वैसा न कर पाते.  वैसा सोचना  भी  हमारी भूल ही होती, क्योंकि उसके परिजन हमें वैसा कतई करने न देते...उनकी जान इस बच्चे में बसी थी और जिसकी  मुक्ति उनका एक मात्र हेतु था...वे सुबह-शाम आ  धमकते और इतना शोरगुल मचाते कि आसपडोस वालों को भी  अब के दिक्कत  होने लगी थी, और वे भी हमें  सलाह देने लगे थे कि तोते-बच्चे को ऊंची जगह पर जाकर छोड़ दी जिए, उसके परिजन आकर उसे उड़ा ले जाएंगे...


फ़िर हम  यह  भी देख रहे थे  कि जितनी मोह-माया हमें उस बच्चे से थी उतनी उस बच्चे को हमसे  न थी. वह तो पहले दिन से ही  हमसे निःसंग चला आ रहा था...चिडचिडा  और डरा-डरा सा...उसकी मंशा तो  मुक्ति के अलावा और कुछ भी न थी. वह तो बस चाहता था मुक्त आकाश में उड़न छू होना, अपने साथियों के संग...पर उस तोते-बच्चे ने  अपना  यह गोपनीय भाव  हम पर कभी व्यक्त होने नहीं  दिया...
   
आख़िरकार वह मुक्ति-दिन भी आ ही गया... 
एक दिन सुबह, जब उसके परिजन तोते-तोतियां  पिंजरे  के आसपास हस्बेमामूल  मंडरा रहे थे, तब मैं, मिसेज़  और कुछ बच्चे हमारे  घर के  सेकंड फ्लोर  की लोबी में पिंजरा ले आए. जहाँ ऊपर स्वच्छ  खुला आसमां था.  नन्हे  तोते  को तो  इस बात का गुमां ही न था कि क्या होने जा रहा है...हमारी  लौबी के सामने इलेक्ट्रिक-तारों पर कितने ही तोते आ धमके  थे जिनकी पैनी नज़र सिर्फ और सिर्फ अपने वंशज  पर लगी हुई थी...वहां लोबी में, जो सभी मेरे साथ मौजूद  थे, उन सभी की मौजूदगी में मैंने पिंजरे का  मेन  डोर खोल दिया...नन्हा तोता पहले तो कुछ पल सकते में रहा...पर फिर खुला दरवाज़ा देख उसे यह समझने में ज़रा सी भी देर न लगी कि...कि... भागो...!


 वह इतनी  तेज़ी से पिंजरे से उड़ा कि जैसे खींची हुई गुलेल  से पत्थर छूटे...तीन तोते जो बिल्कुल सामने  इलेक्ट्रिक-तार पर  बैठे हुए थे वे भी उतनी ही तेज़ी  से  उसके  साथ हो लिए... और पायलोटिंग करते हुए नन्हे  तोते को अपने साथ आकाश में  उडा ले गए.  हमें अनुमान  ही न था  कि वे तीन तोते  इस तरह से तैयार बैठे होंगे,  नन्हे तोते को उड़ा ले जाने को...! यह सब  पलक झपकते ही हुआ. वे चारों आकाश  में, यकीन न आए  वैसी   अदभुत   गति से  कुछ ही सेकंडों में उतनी  ऊंचाई तक जा पहुँचे कि आकाश में  दूर होते-होते छोटे से   दिखने लगा...और वह नन्हा तोता हम सभी की नज़रों से  ऐसे ओझल हुआ कि आज के इस दिन के  बाद शायद  ही हम  कभी उसे  पहचान  पाएँ, उस जैसे एक  सरीखे अनेकों  हरे-हरे छोटे-बड़े  तोतों में...  


हम कुछ समय वहां सकते में रहे और  हतप्रभ भी लेकिन  फ़िर भी आश्वस्त तो  थे ही  कि चलो नन्हे तोते ने उड़ना तो सीख लिया...
इस पूरे एपिसोड के आरंभ से लेकर  अंत तक हमने देखा कि उस नन्हे तोते के परिजनों ने उसका जो  साथ बखूबी निभाया जिससे एक अहम   वास्तव हम पर  उजागर  हुआ कि उन  तोते परिवारों के सामाजिक सरोकार आज भी ख़ासे  जीवंत व सक्रिय है..

Monday, December 12, 2011

वह सब जो कहना बाकी रह गया, अच्चन --- जया मेनन (अतिथि पोस्ट)



'जया चेची' मेरी सहेली 'राजी' की कजिन हैं. हम सब भी उन्हें चेची ही कहते हैं...(मलयालम में दीदी को चेची कहा जाता  हैं.) .वे  'जया चेची' से ही इतनी प्रचलित हो गयी हैं कि  अब उनका नाम 'जया मेनन' की जगह 'जया चेची' ही हो गया है. उन्हें पढ़ने का अतिशय शौक है. वे इतनी घोर बुद्धिजीवी  हैं कि कई बार उनके फेसबुक स्टेटस पढ़ कर चुपचाप निकल आना पड़ता है..समझ में ही नहीं आता,वहाँ क्या लिखा जाए.:(. पिछले दो साल के लिए  वे हैदराबाद में थीं .वे बता रही थीं  कि वहाँ वक्त काटने के लिए उन्होंने ढेर सारी किताबें पढ़ीं. वे एक किताब ख़त्म करतीं और फिर उसके विषय में विस्तार से अपने विचार 'लैपटॉप ' पर लिखतीं.इस तरह कई किताबों के विषय में लिखा और एक दिन उनका 'लैपटॉप ' क्रैश हो गया. उनका सारा लिखा हुआ नष्ट हो गया. सच मानिए, जया चेची से कम अफ़सोस मुझे नहीं हुआ. (हम सब, अपना लिखा हुआ गुम हो जाने का दर्द समझते हैं ). और मैने उनसे कहा...'आपने मुझे क्यूँ नहीं मेल कर दिए वो सारे आलेख?". या खुद की आई  डी  पर ही मेल कर देतीं   ..कम से कम सुरक्षित तो रहता '. लगे हाथों  मैने फरमाइश  भी कर डाली  {एक सच्चे ब्लॉगर  की तरह :)} कि अब से वे कुछ भी लिखें  तो  मुझे मेल कर दें ..उसे मैं अपने ब्लॉग पर  डालूंगी . जया चेची ने  बताया , अपने पिता  से सम्बंधित एक संस्मरण उन्होंने लिख  रखा  है....उसे वे भेज  सकती  हैं' . जया चेची ने  तो वादा निभाते हुए तुरंत ही मुझे अंग्रेजी में लिखा वो आलेख मेल कर दिया....पर मै इतने  दिनों बाद उसका  अनुवाद कर पायी . इतनी गहरी संवेदनाओं से भरे इस आलेख का अनुवाद करना भी जैसे एक दर्द के दरिया से गुजरना था. जया चेची की लेखन शैली बहुत ही ख़ूबसूरत और प्रभावशाली है..पता नहीं कितना न्याय कर पायी हूँ...पर एक कोशिश जरूर की है.

हमारी गर्मी की छुट्टियाँ , हमेशा ननिहाल में गुजरती थी...जो एक द्वीप पर स्थित एक छोटा सा ऊंघता  हुआ सा शहर था .वहाँ सिर्फ नाव के द्वारा ही जाया  जा सकता था. मेरी माँ अपने माता-पिता की  इकलौती संतान थीं...वहाँ ना तो हमारे नाज़ नखरे उठाने वाले मामा-मौसी होते ना ही उनके उनके बच्चे जिनके साथ हम खेल सकते. ऊँची ऊँची दीवारों वाला बड़ा सा घर था, जहाँ शाम के सात बजते ही गहरा अन्धकार छा जाया  करता..ऊँचे ताखों पर रखे लैम्प की लम्बी लम्बी परछाइयां दीवारों पर गिरतीं और हम बच्चे सहम से जाते. हम बेसब्री से छुट्टियाँ ख़त्म होने का इंतज़ार करने लगते कि कब छुट्टियाँ ख़त्म हों...और कब हम अपने रेलवे कॉलोनी के दोस्तों संग धमाचौकड़ी मचा सकें.

परन्तु उसके पहले हम इंतज़ार करते, त्रिचूर  में स्थित अपने ददिहाल में कुछ दिन गुजारने का..जहाँ हमारी बुआ, चाचा और उनके बच्चों का एक  भरापूरा संयुक्त परिवार था. वहाँ हमलोग  बाहर घूमते,पहाड़ों पर चढ़ते ,तालाब में नहाते. गर्मी की दुपहरी लम्बी और उमस भरी होती,उसमे तालाब का शांत, नीला,शीतल पानी हमें जैसे इशारे से बुलाता और हम खिंचे चले जाते. घर की महिलाएँ दोपहर की नींद ले रही होतीं और हम बच्चों को पूरी आज़ादी होती,अपनी मर्जी अनुसार अपना समय बिताने की. वहाँ बच्चों पर पूरा भरोसा किया जाता. खाने..पहनने..घूमने में उनकी पसंद हमेशा सर्वोपरि रखी जाती...पर इस आज़ादी का कभी किसी बच्चे ने गलत फायदा नहीं उठाया. सारे बच्चों ने अच्छी शिक्षा ग्रहण की और ऊँची ओहदों पर कार्य करते हुए जिम्मेदार नागरिक बने. 

गर्मी की दोपहर में उस छोटे से तालाब से हमारा मन जल्दी ही ऊब गया और हम पास के नहर में तैरने जाने लगे. नहर में कई जगह शटर लगे हुए थे जो नहर में पानी के बहाव को नियंत्रित करते. एक दिन हमारे बड़े भाई को एक शरारत सूझी और उन्होंने एक शटर उठा दिया. थोड़ी ही देर में पानी का तेज बहाव मेरी छोटी बहन को बहा कर दूर ले गया....भाई तुरंत उसे बचाने को लपके. पानी के बहाव के साथ बहन तक पहुंचना तो आसान था. पर धारा की विपरीत दिशा में तैरते हुए बहन को खींच कर लाने में उन्हें बहुत मशक्कत करनी पड़ी. किनारे तक पहुँच कर वे बेदम से हो गए. पर घर पर किसी बच्चे ने इस घटना के बारे में मुहँ नहीं खोला....और हम फिर से छोटे से तालाब में ही तैरने जाने लगे परन्तु कुछ ही दिन बाद ऊब कर फिर से नहर में जाना शुरू कर दिया पर दुबारा शटर से छेड़खानी की हिम्मत किसी ने नहीं की.

मेरे पिता के घर में सबको किताबें पढ़ने का बहुत शौक था. घर के हर कमरे में किताबें बिखरी रहतीं, चाहे ड्राइंग रूम हो...किचन या फिर स्टोर रूम. किताबों से परिचय मेरा वहीँ हुआ.साहित्य वहाँ सबकी रगों में बसा हुआ था. मेरी बुआ लोग..दोपहर में सोने या यूँ ही गप्पे मारने की जगह 'वल्लतोल' और कुमारणआशन  को पढ़ा करतीं. घर में कागज़ के टुकड़े यहाँ-वहाँ पड़े होते जिसपर घर के सदस्यों ने 'हाइकु' लिखे होते. पतीले में कड़छी चलाती घर की महिलाएँ, कविताएँ गुनगुनाती रहतीं. ऐसे माहौल में रहते हुए भी 'अच्चन ' मेरे पिता दसवीं तक की ही शिक्षा प्राप्त कर पाए.

जबकि उन्होंने राज्य में तीसरा स्थान प्राप्त किया था. उन्हें स्कॉलरशिप मिलने वाली थी.पर नियमों में कुछ बदलाव हुए और स्कॉलरशिप की स्कीम में लड़कियों को वरीयता देने का नियम बना जिसके तहत छठी स्थान प्राप्त एक लड़की को वो स्कॉलरशिप दे दी गयी. पिता के ऊँची शिक्षा प्राप्त करने और अच्छी नौकरी पाने के सपने धराशायी हो गए. उन्हें रेलवे में एक बुकिंग क्लर्क के रूप में ज्वाइन करना पड़ा. अपनी तनख्वाह से ढेर सारी किताबें खरीदने की उनकी इच्छा भी सीमित रह जाती क्यूंकि उन्हें अपने माता-पिता की देखभाल भी करनी पड़ती . फिर भी जब भी थोड़े पैसे बचते ..वे किताबों पर खर्च कर देते. 

ऊँची शिक्षा का अवसर उन्होंने गँवा दिया था परन्तु अपनी इच्छा शक्ति और लगन से उन्होंने कई भाषाएँ सीखीं. रेलवे की नौकरी के दौरान उन्होंने हिंदी की प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा प्राप्त की. पचहत्तर साल की उम्र में कन्नड़ सीखी. वे कन्नड़ भाषा में छपी चंदामामा की कहानियाँ पढ़ते और कठिन शब्दों को समझने का प्रयास करते. अपने जीवन के अंतिम पड़ाव में वे अरबी सीख रहे थे क्यूंकि उनके दोनों बेटे खाड़ी के देशों में कार्यरत थे. मलयालम, हिंदी,अंग्रेजी,संस्कृत, कन्नड़ पर उनका सामान अधिकार था. पिताजी को नृत्य कार्यक्रम देखने का बहुत शौक था. उन्हें नृत्यकला की गहरी समझ थी. मेरे बेटे को उनसे यह शौक विरासत में मिला है. वह बचपन से ही आँखों में चमक लिए कथकली नृत्य बहुत ध्यान से देखता है. 

पिताजी के बचपन और स्कूल के कई किस्से हमेशा हमारी पारिवारिक महफ़िल में सुने सुनाए जाते. पिता जी बचपन से ही बहुत ही जिज्ञासु प्रवृति के थे. वे जिज्ञासावश अपने शिक्षकों से कई सवाल पूछते और शिक्षक इसे उनकी धृष्टता समझ सजा दे डालते. पिताजी के मजाकिया स्वभाव..सबकी मदद करने की प्रवृति के कई किस्से किवदंती की तरह हमारे परिवार में प्रचलित थे . 

छुट्टी के दिन 'अच्चन  'का ज्यादातर समय अपने टाइपराइटर  पर गुजरता. वे छद्मनाम से एक साप्ताहिक राजनितिक पत्रिका में नियमित आलेख लिखा करते थे. वे माँ के हाथों की मीठी चाय सिप करते रहते और बिजली की सी गति से शब्दों को टाइप करते जाते. फिर भी मेरी स्मृति  में, एक पत्रिका में आलेख लिखते लेखक की जगह महल्ले के बच्चों को पूरे मनोयोग से कहानी सुनाते पिता की छवि ही ज्यादा उज्जवल है. 

मेरी माँ और पिता में अद्भुत सामंजस्य था. माँ एक अनुशासन प्रिय अभिभावक की भूमिका निभातीं और पिता एक सहृदय काउंसिलर की. पिता में अपने विचारों के प्रति पूरी दृढ़ता थी  पर अपने बच्चों के मामले में वे बहुत कमजोर पड़ जाते. कॉलोनी  के लोग जब उन्हें तेज कदमो से घर के बाहर चहलकदमी करते देखते तो समझ जाते आज उनका कोई बच्चा अब तक घर नहीं लौटा है. उन्होंने कभी हमसे ऊँची आवाज़ में बात नहीं की ना ही कभी कोई सजा दी. पर अपने किसी कृत्य के लिए हम उनकी आँखों में इतनी निराशा देखते कि हम प्रतिज्ञा कर लेते कि अब ऐसी गलती फिर कभी नहीं करेंगे. 
माँ बहुत ही स्ट्रोंग थीं. माता-पिता दोनों का व्यक्तित्व बिलकुल ही अलग था. हमने कभी उन्हें झगड़ते या बहस करते नहीं देखा. प्राथमिक शिक्षा प्राप्त...साधारण रंगरूप....साधारण व्यकतित्व वाली माँ के प्रति पिता के मन में इतना आदर-सम्मान देखकर मैं हमेशा हैरान रह जाती. परन्तु यह माँ के अंदर की ही शक्ति थी जो पिता को सुदृढ़ रखने में सहायता करती. पिता जी के लिए माँ के मन में इतना आदर-सम्मान था कि पिता, उसके आलोक में खुद को ज्यादा सुदृढ़  महसूस कर पाते. अगर माँ को कभी पिता की तरफ से संवेदनाओं में कमी महसूस हुई भी हो तो उन्हें शिकायत करते कभी नहीं देखा. पिता जी की साहित्यिक अभिरुचि ने माँ को भी प्रभावित किया था और वे प्रचलित संगीत की जगह एम.एस. सुब्बुलक्ष्मी को सुनतीं और फिल्मों की जगह 'चित्रा विश्वेश्वरण 'के नृत्य कार्यक्रम देखा करतीं.

जब २००१ के अगस्त में पिता जी ,अपने बेटे के पास कुवैत जाने से मना करने लगे तो हमने इसे गंभीरता से नहीं लिया. हमें लगा उनकी छोटी-मोटी तकलीफें...बेटे के पास जाकर ठीक हो जायेंगी और फिर वहाँ वर्ल्ड क्लास मेडिकल फैसिलिटी भी है. किन्तु एक हफ्ते के बाद ही बड़े भाई ने फोन करके बताया कि 'डॉक्टर ने फेफड़ों के कैंसर' की शंका जताई है. मैं अपनी नासमझी में ये समझ बैठी कि इतनी बड़ी उम्र में कैंसर नहीं होता. डॉक्टर को ग़लतफ़हमी हुई है...'अच्चन '  को कोई छोटी-मोटी बीमारी होगी जो जल्दी ही ठीक हो जायेगी. पर कुछ जांच के बाद कन्फर्म हो गया कि उन्हें 'लंग्स कैंसर' ही था जो अंतिम स्टेज में था  

हमारे लिए ये गहरा सदमा था. बेटे तो उनके पास थे पर उनकी बेटियाँ उनसे बहुत दूर भारत में थीं. तीन महीने सिर्फ फोन के सहारे कट गए. वे दिन मेरी माँ और भाई के लिए दुस्वप्न जैसे थे. कीमोथेरेपी की वजह से वे बिस्तर से लग  गए थे. एक पैर के बाद अपना दूसरा पैर जमीन पर रखने से डरते. ठीक से देख नहीं पाते...उनकी आवाज़ लडखडाने लगी थी. उनकी याददाश्त कमजोर पड़ गयी थी. ८२ वर्ष की उम्र में वे पचास साल पहले पढ़ी कविता शब्दशः सुना देते . मलयालम,हिंदी, अंग्रेजी , संस्कृत के किसी  भी शब्द का अर्थ बता देते पर अब उनके दिमाग में कोई शब्द ही नहीं बचे थे.अपने फेवरेट बच्चे का नाम याद करने के लिए उन्हें संघर्ष करना पड़ता.

माँ के लिए वे बहुत ही कठिन दिन थे. उनका वजन लगातार गिरने लगा. आँखें कोटरों में धंस गयीं. सारे बाल सन से सफ़ेद हो गए. माँ एक रोबोट में बदल गयी थीं.

बड़ी मिन्नतों के बाद वहाँ के डॉक्टर ने पिताजी को केरल लाने की अनुमति दी. १८ नवम्बर २००१ को उन्हें 'अल हमरा' हॉस्पिटल कुवैत से डिस्चार्ज कर दिया गया. जब एयरपोर्ट पर मैने उन्हें स्ट्रेचर पर देखा तो मुझे गश आ गया. पिता जी मुझे पहचान नहीं पा रहे थे पर मेरा चेहरा देखते ही उनके चेहरे पर एक चमक आ गयी थी...और उनके मुहँ से बस इतना ही निकला..'ओs'. कुछ ही दिनों में ,'अमृता हॉस्पिटल' के डॉक्टर को ये विश्वास हो गया कि हॉस्पिटल में रहने के कोई सकारात्मक परिणाम नहीं निकलने वाले  बल्कि पारिवारिक माहौल में शायद उनकी याददाश्त लौट आए और वे शायद ज्यादा अच्छा महसूस कर सकें 

मेरी बड़ी बहन दिल्ली से आ गयी. भाइयों को कुवैत वापस लौट जाना था. उन्हें पता था कि अब वे दुबारा अपने पिता से नहीं मिल पायेंगे. जाते वक़्त उनका पिताजी से चिपट कर रोना...किसी पाषाण ह्रदय को भी पिघला देता. अब पिताजी की देखभाल उनकी बेटियों के जिम्मे थी.,मानो.. पिता कोई भेदभाव नहीं रखना चाहते थे और बेटों के साथ बेटियों को भी अपनी सेवा का पूरा मौका दिया. 
हम पिता की हर छोटी-मोटी जरूरत का ध्यान रखते .उन्हें स्नान कराते...उनकी दाढ़ी बना देते. माँ एक पल को भी उनके पास से नहीं हटतीं..जबकि उनका सारा काम मैं और मेरी बड़ी बहन ही  किया करते. बड़ी बहन, बिलकुल टूट सी गयी थी..वो पिता जी की सबसे लाडली थी और अपनी इमोशनल जरूरतों के लिए हमेशा पिता जी पर निर्भर करती थी. पिता उसके सपोर्ट सिस्टम जैसे थे. छोटी होने पर भी मुझे ही   मजबूती दिखानी पड़ती. पिता जी का आराम-चैन जैसे मेरे लिए एक ऑब्सेशन की तरह हो गया था. मैं दीन-दुनिया भुलाकर उनकी सेवा में लगी रहती. एक दिन ना जाने कैसे एक चींटी पिता जी की पीठ पर चढ़ कर काटती रही. पिता जी ने गले से तरह तरह की आवाजें निकाल कर हमें ध्यान दिलाना चाहा पर हमने समझने में बहुत देर लगा दी.  उस दिन मैने भगवान से पिता जी को इस पीड़ा से मुक्ति दिलाने की प्रार्थना तक कर डाली. 

ग्यारह  जनवरी को वे चुपचाप नींद में ही हमेशा के लिए चले गए...बिना किसी से विदा लिए. माँ से भी नहीं. अंतिम दिनों में वे बहुत कुछ कहने की कोशिश करते पर कह नहीं पाते. माँ रो पड़तीं. वो ओजस्वी वक्ता...जिसकी बातें..कहानियाँ..महल्ले के बच्चे...बड़े सब मंत्रमुग्ध होकर सुनते थे. उनके कहने का रोचक अंदाज़ और आवाज़ का उतार-चढ़ाव सुननेवालों को बाँध लेता था. पर अब उनकी बात कोई समझ नहीं पाता. 

पिताजी के जाने के बाद..माँ बिखर सी गयी थीं..जबकि उन्हें पता था...एक दिन ऐसा आने ही वाला था और शायद उन्होंने ईश्वर से उन्हें इस कष्ट से मुक्ति के लिए प्रार्थना भी की थी..फिर भी वे पिता जी का जाना स्वीकार नहीं कर पा रही थीं. उन्हें दवा देकर सुलाना पड़ा. अगली सुबह ही दोनों भाई कुवैत से आ गए. उन्होंने इस आघात को सहने के लिए खुद को मानसिक रूप से तैयार कर लिया था. पर मेरी बड़ी बहन खुद को नहीं संभाल पा रही थी. बार -बार मुझसे पूछती..'पिताजी को खाना खिला दिया...उन्हें दवा दे दी' उसके हाथ हवा में लहरा रहे थे और आँखें चढ़ी हुई थीं. आज उसे संभालने वाला उसका सपोर्ट सिस्टम चला गया था. आज भी वह,हर मौके पर उनकी कमी महसूस करती है. 

वे कई मायनों में एक legend  थे. एक साधारण मनुष्य पर एक असाधारण मस्तिष्क के स्वामी. नई  तकनीक उन्हें प्रभावित करती. हमेशा कुछ नया सीखने को तत्पर रहते. हर वस्तु में उनकी गहरी रूचि होती. जो आस-पास वालों को भी उसमे समाहित कर लेती. उनके मन में कभी किसी के लिए दुराव नहीं था...सबके लिए दया भाव रहता और हमेशा वे सबकी सहायता के लिए तैयार रहते. 

पर क्या यह सब कभी मैने उनसे कहा? कभी कहा कि मैं उन्हें कितना प्यार करती हूँ?? कितना आदर-सम्मान है उनके लिए मेरे मन में?? मुझे नहीं लगता..कभी मैने ये सब कहा,उनसे. काश.एक दिन और ईश्वर दे देता और मैं यह सब उनसे कह पाती.

मुझे नहीं पता था, मैं अपने अच्चन  को इतना प्यार करती हूँ. अक्सर माता-पिता के प्यार पर हम अपना अधिकार समझते हैं और उसे फॉर ग्रांटेड ले लेते हैं. उसकी अहमियत नहीं समझते और मुझे लगता है , आगे भी हमेशा ऐसा ही चलता  जाएगा.  यह स्थिति ऐसी ही बनी रहेगी बिना किसी सुधार के....बिना किसी स्पष्टीकरण के..बिना कुछ कहे.

Sunday, December 4, 2011

भोपाल गैस त्रासदी और फिल्म एरिन ब्रोकोविच

3 दिसम्बर सन् 1984 को भोपाल स्थित यूनियन कार्बाइड नामक कम्पनी के कारखाने से मिथाइल आइसो साइनाइड नामक जहरीली गैस का रिसाव हुआ जिससे लगभग 15000 से अधिक लोगो की जान गई तथा हज़ारों लोग अंधेपन और अन्य विकलांगता के शिकार हुए. पीड़ितों को ना तो न्याय मिला और ना ही उचित मुआवजा.  
जब जब फिल्म 'एरिन ब्रोकोविच '  देखती हूँ (और Zee Studio n Star Movies की कृपा से कई बार देखी है ) मुझे 'भोपाल गैस त्रासदी ' याद आ जाती है और लगता है कोई मिस्टर या मिस ब्रोकोविच यहाँ क्यूँ नहीं हुए? जो इस बड़ी कम्पनी को घुटने टेकने पर मजबूर कर देते और पीड़ितों को कम से कम सही मुआवजा ही मिल पाता. इसे डेढ़ साल पहले पोस्ट किया था...आज री-पोस्ट कर रही  हूँ.

यह फिल्म 'एरिन ब्रोकोविच' की ज़िन्दगी पर आधारित है और यह दर्शाती है कि कैसे सिर्फ स्कूली शिक्षा प्राप्त तीन बच्चों की तलाकशुदा माँ ने सिर्फ अपने जीवट और लगन के सहारे अकेले दम पर 1996 में PG & E कम्पनी को अमेरिका के साउथ कैलिफोर्निया में बसे एक छोटे से शहर 'हीन्क्ले' के लोगों को 333 करोड़ यू.एस.डॉलर की क्षतिपूर्ति करने को मजबूर कर दिया,जो कि अमेरिकी इतिहास में अब तक कम्पेंसेशन की सबसे बड़ी रकम है.

फिल्म में एरिन ब्रोकोविच की भूमिका जूलिया रॉबर्ट ने निभाई है और उन्हें इसके लिए,ऑसकर, गोल्डेन ग्लोब, एकेडमी अवार्ड,बाफ्टा, स्टार्स गिल्ड ,या यूँ कहें सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का प्रत्येक पुरस्कार मिला .रोल ही बहुत शानदार था और जूलिया रॉबर्ट ने इसे बखूबी निभाया है.

स्कूली शिक्षा प्राप्त 'एरिन' एक सौन्दर्य प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार जीतती है. उसके बाद ही एक लड़के के प्यार में पड़कर शादी कर लेती है और दो बच्चों के जन्म के बाद उसका तलाक भी हो जाता है. वह छोटी मोटी नौकरी करने लगती है,फिर से किसी के प्यार में पड़ती है,पर फिर से धोखा खाती है और एक बच्चे के जन्म के बाद दुबारा तलाक हो जाता है. अब वह, ६ साल का बेटा और ४ साल और नौ महीने की बेटी के साथ अकेली है और अब उसके पास कोई नौकरी भी नहीं है. वह नौकरी की तलाश में है,उसी दौरान एक दिन एक कार दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल हो जाती है, कम्पेंसेशन के लिए वह एक वकील की सहायता लेती है जिनक एक छोटा सा लौ फर्म है. लेकिन वो यह मुकदमा हार जाती है क्यूंकि विपक्षी वकील दलील देता है कि "उस कार को एक डॉक्टर चला रहा था,वह लोगों को जीवन देता है,किसी का जीवन ले कैसे सकता है? और एरिन के पास नौकरी नहीं है इसलिए वह इस तरह से पैसे पाना चाहती है.यह दुर्घटना उसकी गलती की वजह से हुई"


नौकरी के लिए हज़ारो फोन करने के बाद हताश होकर वह उसी Law Firm में जाती है और जोर देती है कि वे उसका केस हार गए हैं,इसलिए उन्हें एरिन को नौकरी पर रख लेना चाहिए. बहुत ही अनिच्छा से वह बहुत ही कम वेतन पर , उसे 'फ़ाइल क्लर्क' की नौकरी दे देते हैं. फिर भी उसे ताकीद करते हैं कि वह अपने फैशनेबल कपड़े पहनना छोड़ दे.इस पर एरिन ढीठता से कहती है कि "उसे लगता है वह इसमें सुन्दर दिखती है" .एरिन की भाषा भी युवाओं वाली भाषा है,एक पंक्ति में तीन गालियाँ,जरा सा गुस्सा आता है और उसके मुहँ से गालियों की झड़ी लग जाती है. बॉस उसे हमेशा डांटा करता है पर एक बार गुस्से आने पर बॉस के मुहँ से भी गाली निकल जाती है और दोनों एक दूसरे को देखकर हँसते हैं.बॉस और एरिन में बॉस और कर्मचारी के अलावा कोई और रिश्ता नहीं दिखाया गया है.

एक दिन फ़ाइल संभालते समय एक फ़ाइल पर उसकी नज़र पड़ती है,जिसमे एक घर को बेचने सम्बन्धी कागजातों में घर में रहने वालों की बीमारी का भी जिक्र था. उत्सुक्तता वश वह उस परिवार से जाकर मिलती है.और उस पर यह राज जाहिर होता है कि उस इलाके में हर घर के लोग खतरनाक बीमारियों से ग्रस्त हैं क्यूंकि pG & E कम्पनी अपने Industrial waste वहाँ के तालाबों में डालते हैं ,जिस से वहाँ का पानी दूषित हो जाता है. और वहाँ के वासी उसी पानी का उपयोग करते हैं. पानी में chrome 6 का लेवल बहुत ही ज्यादा होता है,जो स्वास्थ्य के लिए बहुत ही खतरनाक है.एरिन उस इलाके के हर घर मे जाकर लोगों से मिलती है,उसके आत्मीयतापूर्ण व्यवहार से लोग, अपने दिल का हाल बता देते हैं.किसी का बच्चा बीमार है,किसी के पांच गर्भपात हो चुके हैं. किसी के पति को कैंसर है. वह डॉक्टर से भी मिलती है और उनसे विस्तृत जानकारी देने का अनुरोध करती है.

जब वह ऑफिस लौटती है ,तब पता चलता है इतने दिन अनुपस्थित रहने के कारण उसे नौकरी से निकाल दिया गया है. वह कहती है, मैने मेसेज दिया था,फिर भी बॉस नहीं पिघलते.घर आकर फिर वह अखबारों में नौकरी के विज्ञापन देखने लगती है,इसी दरम्यान उस हॉस्पिटल से सारी जानकारीयुक्त एक पत्र कम्पनी में आता है और उसके बॉस को स्थिति की गंभीरता का अंदाजा होता है.वे खुद 'एरिन' के घर जाकर उसकी investigation की पूरी कहानी सुनते हैं और उसे नौकरी दुबारा ऑफर करते हैं.इस बार 'एरिन' मनमानी तनख्वाह मांगती है,जो उन्हें माननी पड़ती है.

अब एरिन पूरी तरह इस investigation में लग जाती है.वह आंख बचा कर वहाँ का पानी परीक्षण के लिए लेकर आती है,मरे हुए मेढक, मिटटी सब इकट्ठा करके लाती है.और जाँच से पता चल जाता है,कि poisonous chromium का लेवल बहुत ही ज्यादा है. और यह बात कम्पनी को भी पता है,इसलिए वह लोगों के घर खरीदने का ऑफर दे रही है.

एरिन पूरी तरह काम में डूबी रहती है पर उसके तीन छोटे बच्चे भी हैं...शायद किसी अच्छे काम में लगे रहो तो बाकी छोटे छोटे कामों का जिम्मा ईश्वर ले लेता है, वैसे ही उसका एक पड़ोसी 'एड ' बच्चों की देखभाल करने लगता है और 'एरिन' के करीब भी आ जाता है. एरिन का बड़ा बेटा कुछ उपेक्षित महसूस करता है और उस से नाराज़ रहता है पर जब एक दिन वह 'एरिन' के फ़ाइल में अपने ही उम्र के एक बच्चे की बीमारी के विषय में पढता है और उसे पता चलता है की 'एरिन' उसकी सहायता कर रही है. तो उसे अपनी माँ पर गर्व होता है.

एरिन की पीड़ितों का दर्द समझने की क्षमता और उन्हें न्याय दिलाने का संकल्प और उसके बॉस 'एड' की क़ानून की समझ और उनका उपयोग करने की योग्यता ने PG & E को 333 करोड़ डॉलर क्षतिपूर्ति के रूप में देने को बाध्य कर देती है .

 Stiven Soderbergh द्वारा निर्देशित इस फिल्म, इस फिल्म का निर्देशन अभिनय,पटकथा तो काबिल-ए-तारीफ़ है ही. सबसे अच्छी बात है.कि नायिका कोई महान शख्सियत नहीं है,बिलकुल एक आम औरत है,सारी अच्छाइयों और बुराइयों से ग्रसित.

इस फिल्म के रिलीज़ होने के बाद 'एरिन ब्रोकोविच' अमेरिका में एक जाना माना नाम हो गयीं उन्होंने 'ABC परChallenge America with Erin Brockovich Lifetime. में Final Justice नामक प्रोग्राम का संचालन किया.आजकल वे कई law firm से जुडी हुई हैं. जहाँ पीड़ितों को न्याय दिलाने के कार्य को अंजाम दिया जाता है.

Wednesday, November 30, 2011

कौन तय करेगा...क्या लिखना सार्थक है..और क्या निरर्थक..



ये पोस्ट एक साल पहले ही लिखने की सोची थी...जब बाल श्रम की त्रासदियों पर लिखने पर मुझसे कुछ सवाल किए गए थे.पर फिर बाद में इरादा छोड़ दिया...हाल में ही जब इसी विषय से सम्बंधित एक पोस्ट लिखी तो मुझे आभास था कि फिर से इस पर आपत्ति दर्ज करते हुए कुछ सवाल उठाये जायेंगे. इसलिए इस बार पहले से ही तय कर लिया था कि अगली पोस्ट यही होगी...मेरे अंदेशे को सही ठहराते हुये, फिर से सवाल किए गए और मैने जबाब में लिख भी दिया...कि अगली पोस्ट में विस्तार से इस सम्बन्ध में लिखूंगी...लेकिन फिर से विचार त्याग दिया कि क्यूँ 'किसी एक के कथन  को इतनी तवज्जो दी जाए??'...लेकिन अब देख रही हूँ कि एक चर्चा सी ही निकल पड़ी है और कई सुर एक साथ मिलकर इसे महज 'आरामकुर्सी चिंतन' का नाम दे रहे हैं.

सर्वप्रथम  तो ये सोचा जाए कि 'हम लिखते क्यूँ हैं?' हो सकता है, कुछ लोग समाज में एक जागरण..क्रांति लाने के लिए लिखते हों....लोगो को ज्ञान बांटने के लिए लिखते हों. खुद को कवि-कहानीकार-पत्रकार के रूप में स्थापित करने को लिखते हों. सबके अपने कारण होंगे...पर मैं अपने बारे में कह सकती हूँ , मैं कोई क्रान्ति लाने...या ज्ञान बांटने का दावा नहीं करती या कोई तमगा लगाने की इच्छा नहीं रखती... मुझे लोगों से संवाद स्थापित करना..उनके साथ अपने  विचार बांटना अच्छा लगता है. कोई किताब पढ़ती हूँ..फिल्म देखती हूँ...कोई खबर..या कोई सामाजिक समस्या उद्वेलित करती है...तो उस पर अपनी कहने और लोगो की सुनने की इच्छा होती है. जैसा हम अपने दोस्तों के बीच करते हैं....अपने सुखद-दुखद ..मजेदार संस्मरण भी सुनते सुनाते हैं.  (मेरे जैसे ,निश्चय ही कुछ और लोग भी होंगे ) मन में सैकड़ों तरह के विचार आते हैं....जिन पर चर्चा करने का मन होता है. अब इन विचारों पर पाबंदी लगा देना कि नहीं सिर्फ फलां-फलां विषय पर ही बात की जा सकती है...अमुक विषय पर नहीं क्यूंकि आप उस विषय पर कुछ कर नहीं सकते...उस समस्या का समाधान नहीं कर सकते तो आराम से कुर्सी पर बैठ कर उस विषय पर चिंतन  करना हास्यास्पद है.
 और रोचक बात यह है कि इस तरह की बातें  करने वालों की पोस्ट्स पर एक नज़र डाली तो पाया...उनलोगों ने भी तमाम तरह की समस्याओं पर मनन किया है...{जाहिर है कुर्सी पर बैठ कर ही किया होगा..ए.सी. ऑन किया था या नहीं..ये नहीं कहा जा सकता  :)} अब कोई उनसे पूछे...आपने तो अन्ना के साथ दस दिन का अनशन नहीं रखा...आप तो नहीं गए लाल चौक पर झंडा फहराने...फिर उन विषयों पर चर्चा कैसे कर सकते हैं?...आपको तो बस आह-कराह भरे प्रेम गीत लिखने चाहिए. :)

यहाँ बहुसंख्यक ब्लोगर ऐसे हैं जिनका प्रोफेशन लेखन नहीं है....अपनी नौकरी.....घर की जिम्मेदारियों...सामाजिक दायित्वों का निर्वाह करते हुए , थोड़ा सा समय निकाल कर अपने पसंदीदा विषयों पर वे लिखते हैं. कितने ही संस्मरण..कविताएँ...कहानियाँ पढ़कर लगता है...बिलकुल ऐसा ही तो हमने भी महसूस किया था. कई विषयों पर विस्तार से जानकारी मिलती है. जिन्हें पढ़कर पाठकों का भला अगर ना हो..तो कोई नुकसान तो नहीं ही होता. कितनी ही पोस्ट्स  के पीछे उस पर की गयी मेहनत नज़र आती है. लेखक कई सारे आर्टिकल्स पढ़कर उसका निचोड़ अपनी पोस्ट में प्रस्तुत कर देता है. अब लेखक ने भले ही वातानुकूलित कमरे में एक आरामकुर्सी पर बैठ कर यह सब किया हो...पर वह दस आर्टिकल  पढ़ने की हमारी मेहनत तो बचा लेता है....शायद  हम उतनी मेहनत करें भी ना...पर निश्चित रूप से लाभान्वित तो होते ही हैं. पढनेवाला भी शायद ए.सी. लगाकर , आराम से कुर्सी पर बैठ कर ही पढ़े...पर उसे यह अधिकार तो नहीं मिल जाता कि वो लिखने वाले पर सवाल खड़े करे कि उसने  तपती धूप में धूल भरी सड़कों की ख़ाक तो नहीं छानी...उनलोगों की मुश्किलें तो कम नहीं कर पाया...फिर उनकी मुश्किलों पर लिखने का क्या हक़ है?? 

टी.वी. चैनल्स पर सामाजिक विषयों पर लम्बे डिबेट्स..अखबारों में आलेख...सब कुर्सी पर और  वातानुकूलित कमरे में बैठकर ही किए/लिखे जाते हैं. जिसे बड़ी रूचि से बाकी सब अपने -अपने घर में  कुर्सियों पर बैठ कर { शायद ए.सी. भी लगाकर:)} देखते हैं...वहाँ तो सवाल नहीं उठाये जाते  कि क्या फायदा..इन सबसे??...समस्या का समाधान तो ये कर नहीं रहे??...फिर सिर्फ ब्लॉग पर लिखने वालों पर ही ये आपत्ति या छींटाकशी क्यूँ??

कितने ही लोगो की पोस्ट पढ़कर लोगो को नई जानकारी मिली होगी. मुझे अपनी पोस्ट्स याद हैं...जब २००९ में मैने सिवकासी के बाल -मजदूरों पर लिखा...कितने ही लोगो ने टिप्पणियों में कहा...कि उन्हें इसके विषय में नहीं मालूम था...दुबारा जब २०१० में उसे रिपोस्ट किया...तब भी ऐसी ही प्रतिक्रियाएँ  मिलीं...मेल में भी अक्सर लोग इसका जिक्र करते रहे...पूरे एक साल बाद अभी ४ नवम्बर को  हाल में ही फेसबुक पर एक लड़की की फ्रेंड रिक्वेस्ट आई....इस मेसेज के साथ
  • Hello mam, Aapka blog dekha hai kai bar, lekin us par deepawali ka ek sansmaran jo ki shivkashi ke durdant sach ko bayan karta hai, use padh kar aankh me aasu aa gaye. Fir wo din aur aaj ka din hai ki maine patakhon ke bare me socha bhi nahi, isne kitno ko prabhavit kiya nahi janti par meri aur mere 12 saal ke bhai ki to zindagi hi badal di, halanki ham aur kuch to nahi kar sake par apne hisse ki imandari ham nibha rahe hai aur ishwar ki kripa se kabhi koi parivartan kar sakun to bahut khushi hogi.

    aapne soye hue logon ko ek bar jhakjhorne ka jo kam kiya hai wo apne aap me sarahniy hai. 

अगर किसी एक को भी मेरा लिखना सार्थक लगता है और वह उसे एक साल के बाद भी याद रखता है तो चाहे हज़ारो लोग मुझसे सवाल करते रहें, कि "आपने लिखने के सिवा क्या किया??" मुझे फर्क नहीं पड़ता. पटाखा उद्योग हो जरी उद्योग या कोई अन्य उद्योग..उसमे शामिल बच्चों की दुर्दशा  के सम्बन्ध में किसी ने तो पहली बार लिखा होगा...अगर वो भी यही सोच कर रुक जाता कि मैं इन बच्चों को इस उद्योग से छुड़ा नहीं पा रहा....उनके पुनर्वास के लिए कुछ नहीं कर पा रहा फिर मुझे लिखने का क्या हक़ है?? तो दुनिया के सामने इन मासूमों की सच्चाई कभी आ पाती??
शर्मिला इरोम वाली पोस्ट जब लिखी थी...तब भी टिप्पणियों में कई लोगो ने स्वीकार किया कि उन्हें इसके बारे में नहीं पता था ...लेकिन मुझे तो चार दीवारों के अंदर महफूज़ होकर लिखना ही नहीं चाहिए था क्यूंकि मैं शर्मिला  के साथ अनशन पर तो नहीं बैठी ...ऐसे ही महिलाओं के ऊपर घरेलू हिंसा...वृद्ध जनों के प्रति लोगो की उपेक्षा.....पति को खोने के बाद स्त्रियों कि स्थिति...immigrant workers....समाज में उपस्थित तमाम विसंगतियों के प्रति लिखना ही नहीं चाहिए....क्यूंकि हम इसे दूर तो नहीं कर पा रहे....पर जैसा कि शिल्पा मेहता ने एक पोस्ट पर अपनी टिप्पणी में लिखा था...the first step to improvement in these situations is spreading awareness "... तो पोस्ट पर सवाल खड़े करने के बजाय या फिर 'आर्म चेयर आर्टिकल' कहकर माखौल  उड़ाने के बजाय शिल्पा की बात पर भी ध्यान दिया जा सकता है..हालांकि ये स्पष्ट कर दूँ...मैं सोए समाज को जगाने के उद्देश्य से किसी योजना  के तहत कुछ नहीं लिखती.....इसलिए लिखती हूँ क्यूंकि ये बातें मुझे व्यथित करती हैं.

और ये पूछना  भी फ़िज़ूल है कि ,"आगे आयें और बतायें कि आपने अपने बच्चों के अलावा और किसी बच्चे /बच्चों के लिए क्या किया है ?  संवेदना व्यक्त कर देने से ही एक इंसान के दायित्वों की पूर्ति नहीं हो जाती ....इस दिशा में -वचने का दरिद्रता वाले लोग बहुत हैं भारत में " चलो, मेरे पास इस सवाल का जबाब था...मैने दे दिया....पर जो लोग भी गहरी संवेदनाएं रखते है, वे जरूर कुछ ना कुछ करना चाहते हैं. लेकिन उन्हें मौका और माहौल नहीं मिलता. हर शहर में सेवा संस्थाएं नहीं हैं...या हैं भी तो उनकी जानकारी नहीं होती.  कई बार महिलाएँ  घर के कामों से समय नहीं निकाल पातीं....या फिर घर वाले पसंद नहीं करते...कई पुरुष भी नौकरी की व्यस्तता से समय नहीं निकाल पाते. पर उन्हें लिखने का शौक है...और वे अपने व्यस्ततम दिनचर्या से थोड़ा समय निकाल कर अपनी जानकारी, लोगो के साथ बाँटते हैं,तो इसमें बुरा क्या है??  जरी उद्योग में ज्यादातर बच्चे ,मधुबनी-सीतामढ़ी--दरभंगा जैसे शहरों से लाए जाते हैं...अगर नेट पर इसके विषय में पढ़कर...उसी  शहर  के किसी व्यक्ति ने अपने सामने किसी एजेंट को उन बच्चों के माता-पिता को लुभाते देखा तो उन्हें सच्चाई से अवगत तो करा  सकता है.इसलिए यह कहना....कि कुछ ठोस नहीं कर पाते..तो इनपर बात भी नहीं करनी चाहिए..लिखना भी नहीं चाहिए....सही नहीं लगता.

 और क्या पता..अपने- अपने  स्तर पर सबलोग कुछ ना कुछ करते भी हों...क्यूंकि जो लोग सचमुच कुछ सेवाकार्य करते हैं..वे ढिंढोरा पीटना नहीं चाहते. मेरी एक सहेली है...हम रोज दिन में दो बार मिलते .हैं .साथ शॉपिंग जाते हैं...फिल्म जाते हैं पर उसने कभी नहीं बताया कि वो अपनी कामवाली के बेटे की दसवीं के किताबों और कोचिंग क्लास का पूरा खर्चा उठा रही है. हाल में ही उसकी बाई मेरे घर आई थी तो उसने बताया. ऐसे ही एक दूसरी सहेली ने नहीं कभी नहीं बताया कि एक सब्जीवाली के बेटे के ट्यूमर के टेस्ट-ऑपरेशन -हॉस्पिटल का सारा खर्च उसने दिया है. सब्ज़ीवाली ने बताया. ऐसे कई लोगो को जानती हूँ...जो अपने जन्मदिन पर उपहार नहीं लेते/लेतीं बल्कि...आग्रह करते हैं कि सड़क पर पल रहे बच्चों के लिए...चप्पलें...कपड़े...जरूरत के दूसरे सामान खरीद दिए जाएँ. बच्चों का जन्मदिन घर में नहीं मनाते  बल्कि अनाथालय के बच्चों के साथ मनाते हैं..(प्रसंगवश एक बात का उल्लेख कर रही हूँ . कई लोग  श्राद्ध के मौके पर या और मौकों पर गरीबों को हलवा -पूरी-खीर खिलाते हैं. लेकिन एक बार एक अनाथालय के संचालक ने आग्रह किया कि हलवा-पूरी की जगह सब्जियां डली सादी खिचड़ी खिलाना श्रेयस्कर होगा. क्यूंकि उन गरीबों को या अनाथालय में पल रहे बच्चों को घी-तेल-मसालों से युक्त गरिष्ठ भोजन की आदत नहीं होती. वे रुखी- सूखी खाते हैं इसलिए ऐसा खाना खाने के बाद...उनकी तबियत खराब हो जाती है. दस्त-उलटी-पेटदर्द की शिकायत होने लगती है. हमलोग रोज दाल-चावल -रोटी-सब्जी खाते हैं..इसलिए  हलवा-पूरी हमें विशेष लगता है..पर उन गरीबों के लिए हमारा सादा खाना ही स्वादिष्ट व्यंज्यन से कम नहीं...गरीबों को हलवा -पूरी खिला..लोग समझते हैं..बहुत पुण्य कमा लिया  पर बदले में वे उनका अहित ही कर जाते हैं...हाँ, कम घी -तेल वाली मिठाई  उन्हें दी जा सकती है ) 

जब इंसान के भीतर संवेदनाएं होंगी तो वह उन समस्याओं की चर्चा भी करेगा..उनपर लिखेगा भी....और अपने स्तर पर उसे दूर करने की भी कोशिश करेगा...इसलिए ये कहना कि 'बाल श्रम की चर्चा ही व्यर्थ है...इन सब विषयों पर लिखना ही निरर्थक  है'...कुछ अजीब सा लगता है...तो फिर सार्थक लेखन क्या है??...सिर्फ ,प्रेम और विरह के गीत....संस्मरण...प्रवचन.....फूल-तारे-चाँद-खुशबू की बातें??

Saturday, November 26, 2011

उम्र की सांझ का, बीहड़ अकेलापन

अक्सर मैं किसी विषय पर एक पोस्ट लिखती हूँ...पर पोस्ट पब्लिश करने के बाद भी कितनी ही बातें मन में घुमड़ती रह जाती हैं...और एक श्रृंखला सी ही बन जाती है. कई  बार टिप्पणियाँ भी विषय आगे बढाने को मजबूर कर देती हैं. 

पिछली पोस्ट में मैने लिखा था...
जो बुजुर्ग दंपत्ति अकेले अपने बच्चों से अलग जीवन बिताते हैं...अब शायद वे सहानुभूति  के पात्र नहीं हैं. अगर उन्होंने अपना भविष्य सुरक्षित रखा हो...और कुछ शौक अपना रखे हों तो उनकी वृद्धावस्था भी सुकून से कटती है. 

पर ये उन खुशनसीब बुजुर्गों के लिए सही है....जिन्हें जीवन की सांझ में भी एक-दूसरे का साथ प्राप्त हो...पर उनलोगों की स्थिति बहुत ही कारुणिक होती है...जो जीवन के इस मोड़ पर आकर बिछड़ जाते हैं. जिंदगी भर दूसरे    कर्तव्य निभाते एक-दूसरे के लिए समय नहीं निकाल पाते और जब सभी कर्तव्यों से निवृत हो उनके पास समय ही समय होता है तो एक दूसरे का साथ छूट जाता है और फिर से वे अकेले ही जीवन बिताने को अभिशप्त हो जाते हैं.

एक मनोवैज्ञानिक मित्र ने एक बार बताया था..उनके पास एक वृद्ध सज्जन आए जो पत्नी की मृत्यु के बाद आत्महत्या कर लेना चाहते थे .क्यूंकि वे गहन अपराधबोध से पीड़ीत थे. जीवन भर उन्होंने पत्नी की उपेक्षा की थी. उन्हें घर संभालने वाली एक हस्ती से अलग नहीं देखा था. अब सेवा निवृत हो वे पत्नी को मान-सम्मान देना चाहते थे. उनके साथ समय बिताना ..घूमना-फिरना चाहते थे. परन्तु पत्नी ही उन्हें छोड़ कर दूर जा चुकी थी. 

अक्सर किताबों में लोगो के संस्मरण या उनके अनुभवों  में सुना है...'पिता बहुत सख्त थे...हम उनसे बहुत डरते थे...उनके सामने बैठते नहीं थे...छोटी सी गलती की भी वे कड़ी सजा देते थे..' जाहिर है पिता यह सब बेटे के अच्छे भविष्य के लिए ही करते होंगे. पर इन सबमे वे बेटे के मन में एक कठोर पिता के रूप में ही जगह बना पाए...एक स्नेही पिता के रूप में नहीं. और अपनी वृद्धावस्था में जब वे बेटे से प्रेम की अपेक्षा करते हैं तो बेटा वह प्रेम दे ही नहीं पाता...क्यूंकि प्रेम का पौधा पिता ने उसके हृदयरूपी जमीन पर लगाया ही नहीं. जिंदगी कभी इतनी मोहलत नहीं देती कि कुछ काम हाशिए पर रखे जाएँ और समय आने पर उनका हिसाब-किताब किया जाए. कर्तव्य-देखभाल-अनुशासन-प्रेम-हंसी-ख़ुशी....सब साथ चलने चाहिए. जिंदगी के हर लम्हे में शामिल होने चाहिएँ . वरना अफ़सोस के सिवा कुछ और हाथ नहीं लगता.

अकेले पड़ गए माता या पिता को बच्चे, अकेले नहीं छोड़ सकते और नई जगह में ,ये किसी अबोध बालक से अनजान दिखते  हैं.यहाँ का रहन सहन,भाषाएँ सब अलग होती हैं. इनका कोई मित्र नहीं होता. बेटे-बहू-बच्चे भी सब अपनी दिनचर्या में व्यस्त होते हैं. इन्होने अपने पीछे एक भरपूर जीवन जिया होता है. पर उनके अनुभवों से  लाभ उठाने का वक़्त किसी के पास नहीं होता.

दिल्ली में मेरे घर के सामने ही एक पार्क था. देखती गर्मियों में शाम से देर रात तक और सर्दियों में करीब करीब सारा दिन ही,वृद्ध उन बेंचों पर बैठे शून्य निहारा करते. मुंबई में तो उनकी स्थिति और भी सोचनीय है. ये पार्क में होती तमाम हलचल के बीच,गुमनाम से बैठे होते हैं. कितनी बार बेंचों पर पास आकर दो लोग बैठ भी जाते हैं,पर उनकी उपस्थिति से अनजान अपनी बातों में ही मशगूल होते हैं. अभी हाल में ही एक शाम  पार्क गयी थी...इस पार्क में बीचोबीच एक तालाब  है. उसके चारो तरफ पत्थर की बेंचें बनी हुई  हैं..और बेंच के बाद एक चौड़ा सा जॉगिंग ट्रैक है. एक बेंच पर तालाब की तरफ मुहँ किए एक वृद्ध सज्जन बैठे थे और बार-बार रुमाल से अपनी आँखें पोंछ रहे थे. मन सोचने पर विवश हो उठा..पता नहीं...किस बात से दुखी हैं...पत्नी का विछोह है...या बेटे-बहू ने कोई कड़वी बात कह दी. 
जब भी बाहर से आती हूँ....पांचवी मंजिल की तरफ अचानक नज़र उठ ही जाती है.  शाम के  छः बज रहे हों...रात के नौ या दिन के बारह... एक जोड़ी उदास आँखें खिड़की पर टंगी होती हैं...और मैं नज़रें नीचे कर लेती हूँ. 
वृद्धावस्था  अमीरी और गरीबी नहीं देखती.सबको एक सा ही सताती है. एक बार मरीन ड्राईव पर देखा. एक शानदार कार आई. ड्राईवर ने डिक्की में से व्हील चेयर निकाली और एक वृद्ध को सहारा देकर कार से उतारा. समुद्र तट के किनारे वे वृद्ध घंटों तक सूर्यास्त निहारते रहें.

यही सब देखकर एक कविता उपजी थी,यह भी डायरी के  पन्नों में ही 
क़ैद पड़ी थी अबतक. दो साल पहले 'मन का पाखी' पर पोस्ट किया था . आज यहाँ शेयर कर रही हूँ.


जाने क्यूँ ,सबके बीच भी 
अकेला सा लगता है.
रही हैं घूर,सभी नज़रें मुझे
ऐसा अंदेशा बना रहता है.

यदि वे सचमुच घूरतीं.
तो संतोष होता
अपने अस्तित्व का बोध होता. 

ठोकर खा, एक क्षण देखते तो सही
यदि मैं एक टुकड़ा ,पत्थर भी होता.

लोगों की हलचल के बीच भी,
रहता हूँ,वीराने में
दहशत सी होती है,
अकेले में भी,मुस्कुराने में

देख भी ले कोई शख्स ,तो चौंकेगा पल भर 
फिर मशगूल हो जायेगा,निरपेक्ष होकर

यह निर्लिप्तता सही नहीं जायेगी.
भीतर ही भीतर टीसेगी,तिलामिलाएगी 

काश ,होता मैं सिर्फ एक तिनका 
चुभकर ,कभी खींचता तो ध्यान,इनका
या रह जाता, रास्ते का धूल ,बनकर
करा तो पाता,अपना भान,कभी आँखों में पड़कर

ये सब कुछ नहीं,एक इंसान हूँ,मैं
सबका हो ना, कहीं हश्र यही,
सोच ,बस परेशान हूँ,मैं.

(हालांकि अब थोड़े हालात बदल रहे हैं...पिछले कुछ वर्षों से इन एकाकी वृद्धों के साथ -साथ ये भी देखती  हूँ.. कुछ वृद्ध एक लाफ्टर क्लब बना जोर जोर से हँसते हैं..और व्यायाम भी करते हैं. शाम को भी वे एक-दो घंटे साथ बैठे बात-चीत करते हैं...इतना भी अगर उन्हें सुलभ हो तो जीने का बहाना मिल जाये

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