Tuesday, April 16, 2013

रश्मि प्रभा जी की माता जी की कलम से सोलह वर्षीया किशोरी के मन में उठते भावों का अनूठा चित्रण


{'पिया के घर में पहला दिन' परिचर्चा के लि रश्मि प्रभा जी ने अपनी माता जी 'सरस्वती प्रसाद जी ' का लिखा एक प्यारा सा संस्मरण  भेजा था. वह संस्मरण सबलोगों को बहुत भाया और उसे  पढ़कर अजित गुप्ता जी ने लिखा ," बहुत ही सशक्‍त लेखनी। माँ को प्रणाम। उनकी और रचनाएं भी प्रकाशित करें। " रश्मि प्रभा जी ने तुरंत ही माता जी का एक और प्यारा सा संस्मरण भेज दिया. और आग्रह (जो मेरे लिए आदेश जैसा ही  है ) किया कि अपने ब्लॉग पर ही पोस्ट करना .}

तो प्रस्तुत है सोलह वर्ष की एक बाला के मन में आलोड़ित भावों और उनके शमन के उपक्रम का सुन्दर चित्रण 

कहते हैं- इसकी सीढ़ी पर पाँव रखते ही बिना घुँघरू के पाँव छनक उठते हैं. ज़िन्दगी के आँगन में, रंग भरा मधुपात्र लेकर बसंत उतरता है. मधुमास के गीत-संगीत हवाओं में रस घोलने लगते हैं. धरती पर चलता हुआ मन-पाखी अनायास ही उड़कर किसी अनदेखे शिखर पर पहुँच जाने की कामना करता है और चाहता है किसी स्वप्निल प्रदेश में जाकर ऐसी दुनिया का निर्माण करे जहाँ कल्पना के कुसुम खिलते हो. लेकिन तब, मुझे यह सब मालूम ही कहाँ था! 

एक दिन बस यूँ ही पूछा था उसने, " तुम्हारे उम्र की  यह कौन सी कड़ी है?" मैंने जोड़ कर बताया, "सोलहवी, पर यह प्रश्न, बात क्या है...?" 
"अरे बस ऐसे ही, कोई ख़ास बात नहीं है. इधर एक कहानी पढ़ी है - उम्र के सोलहवे पड़ाव पर उसे प्यार हो जाता है, वह सजती है संवारती है, बार-बार आईने में खुद को देखती है. अपना चेहरा उसे अपना नहीं लगता, बावली होकर सोचती है - मैं फरहाद की शीरीं  हूँ,  माहिवाल की सोहनी, अलबेले रांझे की हीर, मजनू की लैला. सदवृक्ष ने सारे गीत मेरे लिए ही गाये होंगे, सारंगा तो मैं ही हूँ. "
सुन कर बहुत अच्छा लगा और मैंने जिज्ञासा व्यक्त की "उसके बाद क्या हुआ?" 
मेरी दोस्त ने एक लम्बी सांस लेते हुए कहा..."उसके बाद...उसके बाद वह कहीं खो जाती है. उससे कुछ नहीं भाता न खाना न पीना. बंद कमरे में बैठ कर वह कुछ लिखती रहती है, उसके आकुल मन की बातें इन गीतों में परिणत होती हैं, रात के सन्नाटे में बैठ कर वह उन्ही गीतों को गाती है. आसमान के तारों को अपनी बातें सुनती है - चाँद को राजदार बनाती है. चांदनी की नदी में ख्यालों की एक नाव छोड़कर उसमे बैठ जाती है और एक मनमोहक गाँव में पहुँचती है जहाँ उसका रांझा रहता है, उसका माहिवाल टीले पर बैठ कर बांसुरी बजाता है, वह राधा बन जाती है और बावली होकर सोचती है यह मेरा कृष्ण है....ओह! फिर तो गाँव-गाँव, गली-गली, दो पागल प्रेमियों की  चर्चा होती है, लोग उनके दुश्मन  बन जाते हैं."

"ऐ सखी, थोड़ी देर को रुकना, हटने का मन नहीं कर रहा है पर चूल्हे पर राखी मेरी सब्जी जल जायेगी. ससुर जी को खाना भी देना है."
श्यामा मुस्कुराती है, "जा जल्दी काम से निपट ले, तो आगे की कहानी फिर कहूँगी."
जल्दी से थाली लगा कर ससुर जी को मैं खाना देती हूँ.सामने बैठ कर पंखा झलने में मन नहीं लगता है. सोचती है..."लोग उनके दुश्मन बन जाते है....फिर क्या हुआ? "
 ससुर जी चौंक कर मुँह  देखने लगते हैं - "क्या बोलती हो? रोटी लाओ." मैं चौंक कर दाँतों से जीभ दबाती रोटी लेने रसोई घर में चली जाती हूँ.

 फिर श्यामा को आवाज़ देकर बुला लेती हूँ, "अब आगे कि कहो, मेरा सारा काम समाप्त हो चुका है. "
"अब आगे की क्या सुनाऊँ, लोग-बाग़ उनके दुश्मन बन गए, दोनों की राह में कांटे उगाये गए, उन पर पहरे लगाये गए, दिनों-दिन उन पर सख्तियाँ बढती गयी- दोनों की दिशायें बदल दी गई....! बेचारी लड़की, देहरी पर खड़ी घंटो राह देखती है - शायद वो इधर से गुजरेगा- आज तो ज़रूर ही... लड़का सोचता है दुनिया से लोहा लेकर एक दिन मैं उसे जीत लूँगा. कैसी लगी कहानी? "

"बहुत अच्छी, पर लोग-बाग़ ऐसा क्यों करते हैं? मुझे किताब देना, रात में मैं इसे फिर से एक बार पढूंगी. हाँ एक बात बताना इस कहानी को शुरू करने के पहले तुमने उम्र क्यों पूछी? "
" उम्र की  बात है न, इसीलिए. तुम्हारी उम्र भी तो यही है..."
"और तुम भी तो..."
"यही तो बात है, लोग ठीक ही कहते हैं - उम्र की बात है. तभी मैं आजकल कहानियों से जुड़ने लगी हूँ, ऐसे ही बेमाने" 
और ऐसे ही बेमाने मैं भी प्रेम कहानियों में खोने लगी हूँ. उम्र के आसव का सुरूर... उन्ही दिनों मैंने "देवदास", "श्रीकांत", "गुनाहों का देवता" पढ़ा. बिना कुछ सोचे समझे बच्चन की  "मधुशाला " प्रसाद की  "कामायनी", महादेवी कि "यामा" पढ़ ली. गीतों और कविताओं की ख़ास ख़ास पंक्तियों से मेरी कॉपी भरने लगी. "ले चल मुझे भुलावा देकर मेरे नाविक धीरे-धीरे..." ,
 "रात आधी खींच कर मेरी हथेली एक ऊँगली से लिखा था प्यार तुमने....", 
"प्राण राम पथ झाड़ सखी अब नयन बसे बरसात री..."

एक दिन हमने प्लान बनाया घर के पिछवाड़े चलेंगे , उधर कोई नहीं रहता और शकुंतला दुष्यंत का नाटक खेलेंगे. नाटक करते करते हम हँसने लगे. हँसते -हँसते एक दुसरे को कहा, "हम पागल हैं क्या?" 
उन्ही दिनों हम दोनों ने चित्र बनाये और चित्रों में रंग भरे . पता नहीं ये सोलहवे पड़ाव का जादू था या क्या...इस उम्र की कोई परिभाषा होती है, यह भी हम नहीं जानते थे. ढेर सारी  बातों को समझने की  बुद्धि नहीं थी. 

मैं तो ससुराल में थी, मेरे जिम्मे घर के काम-काज और बूढ़े ससुर की  देख भाल थी. यह तो श्यामा थी की बगल में होने के कारण, किसी मस्त हवा के झोंके को आँचल में बाँध कर लाती थी और उसका जादू मुझे दिखा कर उड़ने को उकसा जाती थी. 
इस प्रक्रिया में मेरा मन उचटता गया . चूल्हे पर राखी डाल कई बार जली, सब्जी में नमक ज्यादा हुआ. रात की सब्जी जो रस्सेदार बनानी पड़ती थी, सूख गई. चूल्हे पर रखा अदहन खौलता रहा और बावरा मन चांदनी की नदी में ख्यालों की  नाव छोड़कर सपनो के देश को चल गया. 

उस दिन की रुष्टता आज तक मुझे ज्यों की त्यों याद है. मेरे ससुर जी की  रुष्टता के साथ साथ घर आँगन की दीवारें भी चीख रही थी " हमेशा सोती रहती हो या सपने देखती हो और वह लंगूरी श्यामा, उसका आना बंद करना पड़ेगा, कहाँ रहता है तुम्हारा ध्यान? " मारे गुस्से के वे काँप रहे थे -"नहीं नहीं ऐसे नहीं चलने का....क्या उम्र हुई होगी तुम्हारी?"

मैंने डरते हुए जवाब दिया "सोलह साल" "हुँह सोलह साल, यह एक उम्र होती है, परिपक्वता की, कोई बच्ची नहीं हो. सोलह के उम्र में बचकानी हरकतें अशोभनीय लगती हैं. तुम्हारी बात-बेबात की हँसी उस लड़की श्यामा के साथ पागलों जैसी बातें, रात गए तक किताबों में सर गडाए रहना, बहुत ख़राब लगता है...उम्र पहचानो लिहाज करना सीखो, बात-व्यवहार की कमी है तुम में...आगे कुछ नहीं कहना मुझे यह अंतिम चेतावनी है..सोलह की उम्र कोई कम नहीं होती!"

इस प्रांत ने मुझे जैसे झकझोर दिया. किसी नींद से जगा दिया, उस रात आईने में खुद को देखते हुए  मैं आँखें नहीं मिला सकी, सोलह साल-परिपक्वता की उम्र. लगा कि मैं बूढी हो गई. उफ़ इस उम्र में बचकानी हरकतें...हंसना  तो हँसते  चले जाना! बोलना तो दुनिया भर  की उल जलूल बातें...मैं अपने आप में ग्लानि से भर उठी. पुस्तकें जो मुझे बहुत प्रिय थी मैंने श्यामा को भिजवा दिया, कापियां जिसमे गीत और कवितायें थी, फाड़कर जला दिया! शकुन्तला-दुष्यंत का नाटक...छी !मैं उसकी याद से लज्जित हो उठी. 

दुसरे दिन मेरे उतरे चेहरे का कारण श्यामा ने जानना चाहा तो मैंने स्पष्ट कर दिया "देखो सोलह की उम्र हो जाने पर भी, बात बेबात हँसना, गाना, कहाँ कहाँ की बातें करना, दिवा सपनो में खोये रहना अच्छी बात नहीं..."
"कौन कहता है ऐसा?"
"मैं कहती हूँ, और कौन कहेगा? "
"वाह अचानक बड़ी समझदार हो गई, कैसे?"
" इसकी सफाई मुझे नहीं देनी - सोलह की उम्र कोई नासमझी की उम्र नहीं होती."

पता नहीं श्यामा ने क्या सोचा , क्या समझा , गंभीर मुख मुद्रा लिए चली गई. हम कई दिनों तक एक दुसरे से कतराते रहे. बीच की कपोल कल्पित बातों पर विराम ही लग गया. अब याद आता है उम्र का वह सोलहवा पड़ाव तो सोचती हूँ, क्या सच-मच मेरी ज़िन्दगी के इस पड़ाव में मधुमास उतरा था या बस यूँ ही ग्रीष्म की झुलसाने वाली तेज़ गर्म हवा चलती रही और हम ताप सहते रहे!

23 comments:

  1. यादों के सोलहवें पड़ाव की दुविधा . थोड़ी मुस्कान देती है और बहुत कुछ सोचने पर विवश करती है

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  2. सचमुच अगर सोलह की उम्र नासमझी की होती तो क्‍या प्‍यार जैसे अहसास समझ में आते...हां यह जरूर कह सकते हैं कि सोलह की उम्र अपने विवेक को बहुत सोच-समझकर इस्‍तेमाल करने की नहीं होती है..पर यह सब कई बार परिस्थितियों और परिवेश पर भी निर्भर करता है।

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  3. उम्र के सोलह वर्ष बहुत नाजुक होता है ,लोग उनको ना-समझ कहते है लेकिन वास्तव में इस उम्र में भावना और विवेक का द्वन्द चलता है जिस में अधिकतर भावना की ही जीत होती है.
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  4. सच ही कहा आपने ... बिल्‍कुल अनूठा चित्रण है ये सोलहवें साल का जहां एक ओर ... ज़िन्दगी के आँगन में, रंग भरा मधुपात्र लेकर बसंत उतरता है. तो वहीं जब ये कह दिया जाता है - सोलह की उम्र कोई नासमझी की उम्र नहीं होती."

    अम्‍मा की लेखनी को सादर नमन ... आपकी प्रस्‍तुति का आभार

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  5. प्रेम के लिए तो हर पढाव उमे का नाज़ुक होता है ...
    सोलहवें साल के मधुमास का ये संस्मरण सुगन्धित बयार की तरह उतरता जाता है दिल में ..

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  6. तितली सा उड़े रहना , कूदाफांदी ,मीठे सपने , आईने से दोस्ती , बिना बात हँसना-खिलखिलाना , उम्र का सोलहवां साल हर लड़की के लिए ख़ास होता है , लड़कियां सबसे खूबसूरत इसी उम्र में ही लगती है , मगर यही टर्निंग पॉइंट भी !
    बालिका वधू जैसा संस्मरण तो इतना सरस , कोमल होना ही था !!

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  7. अपना सोलहवां साल यद् दिला दिया ।सुन्दर चित्रण परिस्थितियों और काल का ।
    अम्माजी को प्रणाम

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  8. उम्र का अल्हड़पन गुदगुदा सा गया ...आखिर में संवेदनशीलता की अभिव्यक्ति उनके कवियत्री मन की पीड़ा का अहसास भी दे गई ...

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  9. कहते हैं, सोलह वर्ष की अवस्था में, सभी सोलह कलाएं पूर्ण रूप से विकसित हो जाती है। परन्तु यह भी सत्य है षोडषी होते ही, सोई अभिलाषायें जाग जातीं है, चित्त अनुरागी हो जाता है, जीवन मधुमास हो जाता है और होंठों पर वासंती गीत लहराने लगते हैं।

    बहुत ही दिलकश है ये अंदाज़-ए-बयाँ, माँ की लेखनी को नमन

    सोलह कलाएं क्या है, इटरनेट से लेकर यहाँ दे रही हूँ :
    सोलह कलाएं
    १.निश्चित रहने की कला
    २.मधुर बोलने की कला
    ३.दूसरों को अपनाने की कला
    ४.नेतृत्व की कला
    ५.सीखने की कला
    ६.परिवर्तन करने की कला
    ७.व्यर्थ को समर्थ बनाने की कला
    ८.प्रशासन की कला
    ९.समाने की कला
    १०.दिव्य व्यवहार की कला
    ११.स्वस्थ रहने की कला
    १२.सिखाने की कला
    १३.लेखन कला
    १४.आगे बढ़ने की कला
    १५.पालन करने की कला
    १६.विनोद कला

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    1. क्या बात है...बहुत ही उपयोगी टिप्स....ये सोलह कलाएं तो हर उम्र वालों के लिए जरूरी हैं.

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  10. रश्मि रविजा जी और रश्मिप्रभा जी दोनों का ही आभार। एक सशक्‍त लेखनी से परिचय कराने का। कभी-कभी आप लोग हीरे को गूदड़ी में छिपाकर रख लेते हैं। इतने साल से ब्‍लाग पर माथा मार रहे हैं और सरस्‍वती प्रसाद जी से आज मिलाया है। सच में उनकी लेखनी को नमन। उनका परिचय भी विस्‍तार से प्रकाशित करें। सोलहवें साल की अनुभूति और हमारे समाज की बुजुर्गीयत का अनूठा संगम है, यह रचना। एक तरफ उस आयु में आंखों में सपनों के अतिरिक्‍त कुछ नहीं होता और दूसरी तरफ सुनने को मिलता है कि अरे इतनी बड़ी-धींगडी हो गयी और होश ही नहीं। सच में मनुष्‍य ने कितनी कृत्रितमा ओढ़ रखी है। मां को नमन और सादर चरणस्‍पर्श।

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    1. अजित गुप्ता जी ,
      रश्मि प्रभा जी से निवेदन किया है कि वे माता जी के नाम से एक ब्लॉग ही बना दें और उनका लिखा वहाँ पोस्ट करती रहें . उनकी लिखी सारी सामग्री एक जगह एकत्रित रहेगी .वहाँ वे अपने पाठकों से भी सीधा संवाद कर सकेंगीं.

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  11. एक गहरा एहसास था इस संस्मरण में... लगा जैसे कि हम भी उस उम्र में पहुंच गए जब बड़े समझदारी की बातें करने पर हमें बच्चा कहते और अल्हड़पन करने पर बड़ा। न तो हम छोटे में होते हैं न बड़े में। लेकिन भावनाओं का ज्वार इसी उम्र में उमड़ता है, पूरी दुनिया नई नई सी लगती है। इतना बढ़िया लेखन है, रश्मिप्रभा जी बहुत खुशकिस्मत हैं कि उन्हें इतनी प्रतिभाशाली मां की गोद मिली। तभी उनके संस्कार इनमें भी आए हैं।

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  12. आहा....कैसा मासूम, अल्हड़ संस्मरण है!!

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  13. solhava sal ka alhadpan ,jimmedari aur vivek ka ankush bahut kuchh hai is sansmaran me ..behatreen prastuti..

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  14. उस दौर में सोलवां साल बड़े मर्यादाओं के बीच से होकर गुजरा होगा
    आज तो पता ही नहीं चलता कि क्या सोला क्या बीस

    भावुक और उत्सुकता से भरा संस्मरण
    पढ़वाने का आभार

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  15. यह प्रकाशित करके अच्छा कार्य किया ..
    बधाई आपको !

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  16. महाकवि पन्त ने जिसके सिर पर हाथ रखा हो, उनकी लेखनी के विषय में कुछ भी कह पाने का साहस जुटा पाना असंभव है मेरे लिए.. जो भी लिखा है माँ ने वह सचमुच ह्रदय से अनुभूत करने योग्य है, कमेन्ट से परे!!
    मैं तो बस माँ के चरणों में अपना प्रणाम अर्पित करना चाहता हूँ ताकि उनके आशीष की छाँव भर मिले और मैं भी लाभान्वित हो सकूँ!! कुछ सीख सकूँ!!
    आभार रश्मि द्वय!!

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  17. हृदयस्पर्शी संस्मरण .... कितने मोड़ और हर मोड़ पर जीवन के कितने ही रंग ....

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  18. संस्मरण के हर शब्द से एक संवेदनशील दिल की हर धडकन साफ़ सुनाई देती है ! कोमल भावुक मन ससुर जी की रुष्टता के ताप से कैसे झुलसा होगा उसकी जलन भी जैसे अनुभव कर पा रही हूँ ! उसके बाद हाल के जन्मे सुकुमार सपनों कैसे मुरझाए होंगे और अंतर किस कदर छलनी हुआ होगा इसका अनुमान भी आँखों को गीला कर गया है ! इतना जीवंत संस्मरण बहुत दिनों के बाद पढ़ने को मिला ! किस किस का आभार करूँ दुविधा में हूँ ! सर्वप्रथम तो रश्मिप्रभा जी की माताजी की आभारी हूँ कि उनकी कलम का लिखा यह अनमोल संस्मरण पढ़ने का हमें सौभाग्य मिला ! फिर रश्मिप्रभा जी की आभारी हूँ कि उन्होंने अपनी माताजी की यह अनमोल कृति हम लोगों के लिये उपलब्ध कराई ! तदुपरांत आपकी भी आभारी हूँ कि आपने अपने ब्लॉग पर इसे पब्लिश कर हम लोगों को उपकृत किया ! बहुत-बहुत धन्यवाद आप सभीका !

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  19. @ Rashmi Prabha Ji:

    Achcha hai ye mujhse choota nahi....

    yon nahi nahi hote ham Ardhnaarishwar.... !


    aaj ka din safal raha....ye ehsaas bahut dino se kahin aur nahi mail raha tha.... tahe dil se shukriya.... bahut kuch aaga gaya par kuch choot bhi gaya.... kaash ki wo bhi mil jata... apni muraad poori ho jaati....

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  20. उतनी ही सुन्दर पोस्ट और उतने ही सुन्दर टिप्पणिया।।
    धन्य भाग मेरे ।।

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