Monday, April 26, 2010

मुंबई ब्लॉगर्स मिले कुछ ऐसे, बहुत पुरानी पहचान हो जैसे

अभय तिवारी,युनूस खान,विवेक रस्तोगी, बोधिसत्व,विमल कुमार,
राज सिंहं, अनिल रघुराज,आभा मिश्र, विभारानी, ममता,अनीता कुमार

इस बार सोच रखा था, सिर्फ तस्वीरें लगा कर मुंबई ब्लॉगर्स मीट में सम्मिलित लोगों का परिचय करवा दूंगी. विवेक रस्तोगी जी विस्तारपूर्वक रिपोर्ट लिखेंगे.लेकिन मुश्किल ये थी कि फिर 'घुघूती-बासूती' जी को कैसे मिलवाऊं आपलोगों से ? क्यूंकि उन्होंने तो तस्वीरें लेने से मना कर दिया था. वे सिर्फ अपने लेखन में व्यक्त विचारों द्वारा ही अपना परिचय देने की इच्छुक हैं. अब हमारी
किस्मत पर रश्क कीजिये कि हमने उनके विचार सिर्फ पढ़े ही नहीं हैं बल्कि उनके मुखारविंद से सुनने का भी सौभाग्य प्राप्त हुआ. वैस इतना बता दूँ, वे बेहद ख़ूबसूरत हैं और तस्वीरें लेने से मना कर कैमरे को सजा ही दे रही हैं.

आयोजक दंपत्ति बोधिसत्व एवं आभा मिश्र

ये ब्लोगर्स मीट ,आभा मिश्रा जी के सद्प्रयास से आयोजित हुई और उनके पति बोधिसत्व जी ने भी पूरे उत्साह से उनका साथ दिया.जितने लोग मुंबई में थे और जितने लोगों से संपर्क हो सका ,उन्हें इत्तला कर दी गयी. "घुघूती-बासूती' जी एवं 'अनीता कुमार जी' नवी मुंबई से करीब दो घंटे का सफ़र तय कर सबसे मिलने के लिए पहुंची. विभारानी जी जिनके ब्लॉग को हाल में ही भोपाल में आयोजित समारोह में "लाडली मिडीया अवार्ड " सम्मान मिला है. वे भी अपनी बिटिया के साथ सम्मिलित हुईं .'कोशी' का भी अपना ब्लॉग है और आजकल
बारहवीं का इम्तहान देने के बाद वो काफी सक्रिय है.

स्टार ब्लॉगर जादू अपनी मम्मा की गोद में

ममता एवं युनुस जी भी छोटे स्टार ब्लोगर जादू को लेकर सम्मिलित हुए. और पूरे तीन घंटे जादू ने जरा भी परेशान नहीं किया...बस एक चॉकलेट बिस्किट कुतरते हुए पूरे समय चॉकलेट से अपनी दाढ़ी मूंछ बनाने में उलझा रहा. अभय तिवारी जी,अनिल रघुराज जी , और विवेक रस्तोगी जी सबसे पहले पहुँचने वालों में से थे.

महावीर सेमलानी जी,सतीश पंचम जी एवं पंकज उपाध्याय मुंबई से बाहर होने के कारण इस मीट में सम्मिलित नहीं हो पाए पर फ़ोन पर उन्होंने अपनी शुभकामनाएं दीं.

यह मीट बिलकुल ही अनौपचारिक रूप से चलती रही. ऐसा लगा जैसे कई सारे पुराने मित्र एक जगह इकट्ठे हो,विचारों का आदान-प्रदान कर रहें हों. और इसी वजह से औपचारिक रूप से परिचय का दौर तीन बार शुरू हुआ पर बीच में ही बातों का सूत्र कोई और थाम लेता और किसी दूसरे विषय पर विमर्श शुरू हो जाता. बातचीत के दरम्यान ही लोग अपने विचार रखते गए और एक दूसरे की शख्सियत से परिचित होते गए.


आभा जीएवं विवेक जी

अनीता कुमार जी ने बताया कि अपना ब्लॉग शुरू करने के बाद ही उन्हें लगा कि लोग स्वेच्छा से उनकी बातें सुनने को इच्छुक हैं.वरना उन्हें लगता था कॉलेज में छात्र उनके लेक्चर इसलिए सुनते हैं क्यूंकि वे बाध्य हैं. वे मानसिक रूप से खुद को अब ज्यादा एलर्ट समझती हैं और उन्हें ऐसा महसूस हो रहा है जैसे दिनोदिन उनकी उम्र घट रही है.(इस पर जोरदार तालियाँ बजीं :)) .लोग रिटायरमेंट से डरते हैं पर वे पांच साल बाद रिटायर होने की राह देख रही हैं ताकि वे ज्यादा समय ब्लॉग्गिंग को दे सकें.

घुघूती जी, को ब्लॉग्गिंग में आकर ऐसा लगा जैसे कोई नया दरवाजा खुल गया हो जिससे होकर वे कई सारे समान विचार वाले दोस्तों से मिल पा रही हैं . इसके पहले ज्यादातर उनके पति के मित्र की पत्नी या पडोसी ही उनके मित्र हुआ करते थे. पर अब उन्हें अपनी पहचान मिल गयी है. और लोग उनके विचारों की वजह से उनसे मिलने को इच्छुक हैं.उन्होंने ब्लॉग्गिंग से पहले के अपने जीवन की तुलना एक पत्तागोभी से की जो बढ़ तो रही थी पर अपने आप में पूरी तरह बंद.( हालांकि वे इतनी प्रबुद्ध महिला हैं कि उनसे मिलने वाले किसी को भी उनके विचारों से जरूर लाभ होता होगा.)
ममता एवं युनुस खान

उन्होंने आगे कहा कि बहुत हुआ तो वे लेडीज़ क्लब चली जाती थीं और थोड़ी गप्पें कर और समोसे खाकर चली आती थीं .समोसे के नाम से बोधिसत्व जी को फिर से याद आ गया कि समोसे ठंढे हो रहें हैं.इसके पहले भी उन्होंने धीरे से समोसे ठंढे होने का जिक्र किया था और मैंने कहा था, परिचय का दौर ख़त्म हो जाने दीजिये. पर अब उन्हें और सब्र नहीं था. और इसके बाद समोसे,केक,बिस्किट,मिठाइयों का दौर चलता रहा. बोधि जी ने चाय का भी इंतजाम कर रखा था .और सबके आते ही उन्हें ठंढा पानी और कोल्ड ड्रिंक भी सर्व कर रहें थे. मीट का आइडिया तो आभा जी का था पर उसके आगे की कमान बोधि जी ने संभाल ली थी.

अनीता जी एवं राज जी

अभय तिवारी जी ने बोधिसत्व एवं आभा मिश्र सहित करीब दस लोगों को अपना ब्लॉग बनाने के लिए प्रेरित किया है. अनीता जी ने कहा कि जब वे पहली बार अभय जी से मिली  थीं (यह उनकी तीसरी मुलाक़ात थी ) तो  ऐसा लग रहा था जैसे उनके विचारों के जरिये वे उनके सम्पूर्ण व्यक्तित्व से बहुत पहले से परिचित हैं क्यूंकि किसी से मिले बिना भी उसके लेखन से उसके व्यक्तित्व और विचारों को जाना जा सकता है. अनीता जी को तब भी बहुत आश्चर्यमिश्रित ख़ुशी हुई, जब राज सिंह जी ने उन्हें पहचान लिया जबकि वे राज सिंह जी को नहीं जानती थीं. मुझे भी ऐसा ही अनुभव हुआ जब,घुघूती जी ने बताया कि वे मेरी कहानियां पढ़ती हैं और मुझसे मिलने को इच्छुक थीं. मैंने भी घुघूती जी का ब्लॉग नियमित पढ़ा है और मिलकर ऐसा लगा कि मैं उनके व्यक्तित्व को अच्छी तरह जानती हूँ.

घुघूती जी ने सभी उपस्थित पुरुष ब्लॉगर्स से एक सवाल किया कि "क्या ब्लॉग्गिंग में स्त्रियों के मन के विचार पढ़ कर उन्हें स्त्रियों को समझने में कुछ सहायता मिली है?" अनीता जी ने कहा कि यहाँ सारे पुरुष ब्लोगर्स मुंबई में काफी दिनों से हैं, इसलिए महिलाओं से  विचारों के आदान-प्रदान के वे अभ्यस्त हैं. बोधिसत्व जी ने भी कहा कि "यहाँ सब प्रगतिशील विचारों के समर्थक हैं.वे महिलाओं का लेखन बचपन से ही पढ़ते आ रहें हैं.,इसलिए उनका मन अच्छी तरह समझते हैं परन्तु उनका सपना है कि भारत की प्रत्येक स्त्री सिर्फ घर की चहारदीवारी तक ही सीमित ना रहें और इसके साथ उसे अपने विचारों को भी व्यक्त करने की पूरी स्वतंत्रता मिले तभी सच्ची स्त्री मुक्ति संभव है." वैसे सबका यह मत था कि घुघूती जी को पूरे ब्लॉग जगत के पुरुषों से यह सवाल जरूर पूछना  चाहिए.
अनिल रघुराज जी एवं विवेक रस्तोगी जी ने फाइनेंस और बैंकिंग की जटिलताओं को अपने ब्लॉग के जरिये सरल भाषा में समझाने के अपने प्रयास का उल्लेख किया. विवेक जी से सबने जिज्ञासा भी व्यक्त की कि एक तरफ
बैंकिंग जैसी व्यावहारिक बातें और आध्यात्म जैसे विषय का सही सामंजस्य वे कैसे कर लेते हैं?
विभा जी, युनुस जी ,विमल जी

राज सिंह ने अपने एक निर्माणधीन फिल्म के विषय में जानकारी दी.

युनुस खान एवं ममता शायद पहली बार खुद को श्रोता की भूमिका में देखना ज्यादा पसंद कर रहें थे. हमेशा वे बोलते हैं और विविधभारती के श्रोता उनकी बातों का लुत्फ़ लेते हैं आज वे ज्यादातर सबको सुन रहें थे. फिर भी ममता जी को अपने मधुर स्वर में अपने और स्टार ब्लॉगर जादू के बारे में दो बातें करनी ही पड़ीं.

युनुस खान के ब्लॉग की चर्चा भी हुई. अनीता जी ने बताया कि कैसे नियमित रूप से उनका ब्लॉग पढने के बाद वे म्युज़िक ज्यादा एन्जॉय करने लगी हैं. अब वे कोई गाना सुनती हैं तो उसमे बजने वाले वाद्य-यंत्रों को भी पहचान लेती हैं.

विमल जी
के बहुआयामी व्यक्तित्व से भी सबका परिचय हुआ कि कैसे वे थियेटर, ब्लॉग्गिंग, लेखन सब एक साथ सुचारू रूप से सँभालते हैं.

इन सब बातों में कब साढ़े तीन घंटे बीत गए पता ही ना चला, सबको IPL का फाइनल देखने के लिए घर पहुँचने की जल्दी थी. अभय जी ने एक विषय "अपनी रचना अपनी कलम और ब्लॉग की दुनिया" पर सबको अपने विचार रखने के लिए कहा था. खुद भी वो एक आलेख तैयार करके लाये थे. पर समय नहीं मिल पाया. विमल जी का गाना और विभा जी की कहानी सुनने का भी समय नहीं निकल पाया. यह सब अगली मीट में पूरी करने की योजना के साथ
सभी ब्लॉगर्स ने एक दूसरे को विदा कहा

Thursday, April 22, 2010

वक़्त का घूमता पहिया और ये पति परमेश्वर

पहली बार व्यंग्य -विधा को आजमाने की कोशिश की है और इसका श्रेय जाता है कुछ मित्रों को. सबसे पहले तो चंडीदत्त  शुक्ल जी ने कहा,आप व्यंग्य लिखने की भी कोशिश कीजिये. पर मैंने उनकी बात बिलकुल ही अनसुनी कर दी क्यूंकि अब तक  Jack of All Trades, Master of None पर ही अमल करती आई हूँ  और सोच रखा था,अब और प्रयोग नहीं. फिर अविनाश वाचस्पति जी ने अपने कमेन्ट में मेरी कहानी में से कुछ पंक्तियाँ उद्धृत  कर बताया कि आप व्यंग्य लिख सकती हैं. शरद कोकास जी का भी कहना था कि 'आपके लेखन में विट एवं सटायर की बहुतायत है' तो इन मित्रों के उत्साहवर्धन से कुछ आत्मविश्वास बढ़ा और कुछ लिखने की कोशिश की.' ताऊजी डौट  कॉम' के 'वैशाख्ननंदन सम्मान प्रतियोगिता' में यह प्रकाशित हो चुकी है. आज अपने ब्लॉग पर भी पोस्ट कर रही हूँ ताकि अपना लिखा एक जगह संकलित रहें.

पुरुषों के लिए, नौकरी मिलने से पति बनने तक के बीच के दिन बड़े  सुनहरे होते हैं और फिर कभी लौट कर नहीं आते. सैकड़ों फोटो देखी जाती हैं,दावतें उडाई जाती हैं और चुन कर सुन्दर,स्मार्ट, पढ़ी लिखी लड़की शादी कर घर लाई जाती है .और बस उसके बाद , आँखों पर पड़ा रंगीन पर्दा हट जाता है और खुरदरी  यथार्थ की जमीन  नज़र आने लगती है.

सुबह होती है,पति अखबार और चाय की तलाश में कमरे से बाहर आता है,देखता है ,पत्नी सामने टेबल पर पैर फैलाए,अखबार में नज़रें गडाए बैठी है. कोई सप्लीमेंट उठा चाय का आग्रह करता है,अब या तो वह इंतज़ार करे या खुद बना ले क्यूंकि पत्नी तो आर्टिकल पूरा कर के ही उठेगी.और नज़रों के सामने घूम जाता है,माँ का चेहरा,जिनके कान पिताजी के उठने की आहट पर ही लगे होते थे.बच्चों को सुबह से ही डांट पड़नी शुरू हो जाती थी,अख़बार इधर उधर मत रख दो,पापा को चाहिए होगी. और पापा फ्रेश होकर आए नहीं कि चाय और अखबार एक मुस्कान के साथ हाज़िर .बस साथ में एक ताजे फूलों के  गुलदस्ते की कमी रहती.वरना पूरा रेस्तरां  सर्विस ही लगता था.

पापा ने अखबार पढ़ते पढ़ते ही आवाज़ लगाई,जरा शेव का सामान और पानी दे जाना .और माँ नौकर के हाथों,बच्चों के हाथों या फिर खुद ही लिए हाज़िर हो जातीं.यहाँ , एक तो बाथरूम में खड़े होकर शेव करो और अगर गलती से कह दिया,शेविंग क्रीम या आफ्टर शेव ख़त्म हो गया है तो तुरंत सुनने को मिल जायेगा, "अब इतना तो अपनी चीज़ों का ख़याल रख ही सकते हो" या "फ्रिज पर जो कागज़ चिपका है उसपर लिख दो, माँगा दूंगी" .अब पति बाथरूम से उसी अवस्था में निकल कर जाकर लिख आए या फिर वैसे ही काम चलाता रहें.

पापा नहा कर निकलते थे और उनकी कमीज़, पैंट, रूमाल निकाल कर रखी होती थी. आजकल अपनी अलग आलमारी होने से यह काम भी खुद ही करना होता है. एक दिन हलके हरे रंग की शर्ट में देख,कलीग मिस गुप्ता ने काम्प्लीमेंट दे दिया था,"यह रंग आपको बहुत सूट करता है " पति पूरा बाज़ार छान उस रंग की टीशर्ट खरीद कर लाता है. और खुश खुश अपना आलमीरा खोलता है...आज तो शनिवार है,टीशर्ट पहन सकता है और किसी बहाने मिस गुप्ता के टेबल के पास से गुजरने के मंसूबे भी बना रहा है.पर टीशर्ट तो मिल ही नहीं रही .पूछने पर पत्नी कहती है...'हाँ वो मैंने अपने लिए रख ली ....इतना फेमिनिन कलर तुम पर अच्छा नहीं लगेगा."

"पर वो तो तुम्हे काफी लूज़ होगा "...पति एक क्षीण आशा रखता है,टीशर्ट की आलमारी में पुनः वापसी की .पर सुनना को मिलता है.,

"'ना, अब शादी के बाद काफी पुट ऑन कर लिया है..." पति सोचता रह जाता है..उससे तो  हर बार यही कहने की आशा रखी जाती है कि , 'इस ड्रेस में बड़ी स्लिम लग रही हो'. पर जब उसकी टीशर्ट झटकने  की बारी आई तो खुद ही सच्चाई मान ली.

खाने के टेबल पर भी पापा की थाली,नज़र के सामने आ  जाती है.इतनी सारी कटोरियाँ होती थीं. मसाले तेल से भरपूर,कितने स्वाद वाली.उसपर माँ , सैकड़ों काम छोड़ पंखा झले ना झलें (वो शायद दादी झलती होंगी) पास जरूर बैठी होती थीं. और थाली पर ध्यान जरूर रखती थीं,ये तो खाया ही नहीं, ये तो छूट ही गया, ये और चाहिए?. यहाँ, अगर पति कह दे,"कितना ब्लैंड है, नमक मिर्च का पता नहीं",पत्नी का रेडीमेड जबाब होता है, "इतनी सीडेन्ट्री लाइफ स्टाइल है.वाक पे जाते नहीं,एक्सरसाइज़ करते नहीं.कम से कम खाना तो परहेजी खाया करो."


यहाँ अगर पत्नी गृहणी है तो टेबल पर खाना लगा, घर के बचे  कामो में उलझी होगी क्यूंकि इसके बाद का समय उसका अपना है, टी.वी. देखे,फ़ोन पर गप्पे मारे,शॉपिंग करे  या फिर नेट-सर्फिंग करे .पर उस समय में कोई कटौती नहीं होगी.और अगर पत्नी नौकरी पर जाती है तब तो सौ हिदायतें और मिल जाएँगी.कैसरोल का ढक्कन बंद करना मत भूलना,सब्जी फ्रिज में रख देना, और दूध  ठंढी हो जाए तो वो भी फ्रिज में रख देना और हाँ,पानी पीकर खाली बोतल वापस फ्रिज में मत रखना,भरी हुई बोतल ,उठाकर रख देना.और पति एक एक कर सारी हिदायतें याद करता रहता है.

शादी के पहले ऑफिस जाते समय, पत्नी को अलग अलग अंदाज़ से बाय करने  के सपने देख  रखे  थे.पर वे सपने ही क्या जो पूरे हो जाएँ. गृहणी है तो उसके सौ काम राह देख रहें होंगे और अब ऑटोमेटिक दरवाजे ने दरवाजा बंद करने की जहमत से भी मुक्ति दे दी है कि कम से कम दरवाजा बंद करने के बहाने ही पत्नी,दरवाजे तक छोड़ने तो आए.

अगर नौकरी वाली हो तो पति भले ही बाय कहने की राह देखता रहें .पर पत्नी सैंडल,पर्स,मोबाइल,गौगल्स में ही उलझी होती है,किस हाथ में क्या क्या  और कैसे संभाले. और उस पर से रोज "ओह फिर से लेट हो गयी, आज " की रट अलग.

पति का पुराना मित्र उसके शहर आया है.पति उसे गर्मजोशी से  कहता है, "ऑफिस के बाद तुम्हे पिक करता हूँ और फिर सारा शहर घुमाता हूँ". मन ही मन खुश हो रहा है, मित्र कॉम्पिटिशन में निकल तुरंत अच्छी सरकारी नौकरी में लग गया तो क्या,उसके पास तो सरकारी जीप ही है,ना. उसे काफी संघर्ष करना पड़ा पर अब तो अपनी होंडा सिटी है,  उसकी ए.सी. की जबरदस्त कूलिंग,उसका स्टीरियो,आरामदायक सीट सब दिखायेगा मित्र को. पर निकलते समय पत्नी कहती है, "आज कार छोड़ ऑटो या टैक्सी से चले जाओ,मुझे कार चाहिए, आज सहेलियों के साथ लंच है."

"तुम आज,ऑटो से चली जाओ मुझे अपने फ्रेंड को घुमाना है"

"कैसी बातें करते हो,ऑटो या टैक्सी में बालों का क्या हाल होता है,पता भी है. तुम ही आज चले जाओ टैक्सी या ऑटो से,तुम्हे क्या फर्क पड़ेगा, वैसे भी  बाल ही कितने बचे है." और पति सब भूल, आईना में अपने बाल निहारने लगता है,"हेयर थेरेपी ले ही ली जाए क्या?". एक ख्याल पत्नी को एक दूसरी गाड़ी खरीद कर देने का भी होता है, नैनो ही सही.पर पार्किंग की विकराल समस्या मुहँ बाए खड़ी होती है. रोज बिल्डिंग वालों से झगडा मोल लेने से तो अच्छा है,मित्र को टैक्सी में ही घुमा दिया जाए.


ऑफिस जा कर भी चैन नहीं अगर दिन में तीन बार फोन नहीं किया तो उलाहने सुनने को मिलेंगे, सुबह से सर में दर्द था,एक बार हाल भी नहीं पूछा, या बेटे/बेटी का रिज़ल्ट नहीं पूछा, बेटे/बेटी के हॉकी/फूटबाल के मैच का हाल नहीं पूछा. यह टेलीफोन  ईजाद ही क्यूँ हुआ.और ईजाद हुआ भी तो इतना आम क्यूँ हुआ? पिताजी को तो ये समस्याएं नहीं आयीं कभीं.

रात में पिता हमेशा रेडिओ पर समाचार सुनते या टी.वी. पर समाचार देखते हुए खाना खाते थे. पर यहाँ तो टेबल पर खाना लगा, टी.वी.पर  फैशन शो की झलकी आने ही वाली है कि पत्नीश्री रिमोट का बटन दबा देती हैं और किसी उद्घोषक की तरह अनाउंस करती हैं. "डिनर टाइम-- नो टी.वी." अब पति अगर चुपचाप खाए तो उलाहना मिलेगा सिर्फ इसी समय तो सारे परिवारजन एक साथ बैठते हैं, दिनभर की गतिविधियों पर बातचीत होनी चाहिए,अगर बातों में उलझा रहें तो सुनेगा, इतनी मेहनत से "पनीर पसंदा" बनाया है और तुम्हारा ध्यान भी नहीं. पति का मन होता है, कहे, "भाग्यवान,  किसने कहा इस एक्सपेरिमेंट के लिए? उसे तो पारंपरिक  आलू गोभी ही पसंद है."और अब वह  सोच सोच के बच्चों से सवाल पूछता रहता है,वरना चुप हुआ कि  सुनने को मिलेगा, अमुक के पति ने डायमंड रिंग गिफ्ट किया एनिवर्सरी  पे,अमुक सिंगापूर जा रहें हैं  वेकेशन में ,अमुक ने इम्पोर्टेड कार ली है. और तुर्रा ये कि ये सब शिकायत नहीं बस सूचना है.

बच्चों के बर्थडे पार्टी में हाजिरी जरूरी है,वरना नकारा बाप होने के तमगे से नवाज़ दिया जायेगा. पर अपने घर की पार्टी में ही बिन बुलाये मेहमान सा डोलना पड़ता है,ना तो बच्चों के दोस्त , उसे पहचानते हैं. ना ही बच्चों को खिलाये जाने वाले तरह तरह के गेम्स की कोई जानकारी है उसे. पत्नी कैमरा थमा देती है. पर बाद में फोटो में भी हज़ार मीनमेख एक भी फोटो सही नहीं है. पर फोटो ली कैसे जाए,बच्चे स्थिर रहते हैं क्या, एक मिनट भी?.याद आता है,पापा के हाथों में कैमरा देखते ही वे सब कैसे फ्रीज़ हो जाते थे,सांस लेना नहीं भूलते थे यही क्या कम है.


पति सोचता है,चलो घर के अंदर ये हाल हैं,ऑफिस की पार्टी में तो उसकी इतनी सुन्दर, स्मार्ट,वाक्पटु बीवी को देख सब जल कर राख हो जाएंगे.पर पता चलता है, यह जलने की  प्रक्रिया उसके हिस्से ही आती है. उसके सारे कलीग्स यहाँ तक कि बॉस भी उसकी पत्नी का अटेंशन पाने को आतुर हैं .वह तो बिलकुल साइड लाइन कर दिया गया है.

उसकी माँ आनेवाली है,खुश होता है,चलो अब थोड़ा माँ शायद बहू की आलोचना करे  तो उसे संतुष्टि होगी. पर माँ पर तो आदर्श सास बनने का भूत सवार है. बहू की तारीफ़  करती नहीं अघाती. "बहू  घर का,बच्चों का पूरा ख्याल रखती हैं यहाँ तक कि हमें भी गाड़ी में बिठा शहर घुमा आती है.बेटे को तो फुर्सत ही नहीं." जाते वक़्त पत्नी उन्हें  डेढ़ हज़ार की साड़ी गिफ्ट कर के उसकी सारी उम्मीद ही खतम कर देती है मन होता है कहे, 'माँ मैं तीन हज़ार की साड़ी ला दूंगा,तुम एक बार पारंपरिक सास बन, बहू को सता कर तो देखो.'

और बेचारा पति उफ्फ्फ भी नहीं कर सकता. वरना उसके उदार विचारों वाले, स्त्री स्वतंत्रता के पक्षधर, नारी का सम्मान करने वाले इमेज को जबरदस्त ठेस पहुंचेगी

सोचता है, काश वह किसी गाँव की गोरी को शादी कर ले आता.जिसकी सारी दुनिया बस ,वह ही होता.उसे किसी के  स्वामी बनने के अहम् को कुछ तो संतुष्टि  मिलती .

Monday, April 19, 2010

इस बार का संस्मरण 'विदाउट टिकट यात्रा' का

पिछली पोस्ट में अपने 'विदाउट रिजर्वेशन ' यात्रा का जिक्र किया था,इस बार सोचा 'विदाउट टिकट' वाली कहानी भी सुना ही दी जाए. वैसे भी  यह संस्मरण अपने कॉलेज के दिनों में ही मैंने 'साप्ताहिक हिन्दुस्तान' के 'याद आते हैं, वे क्षण ' कॉलम के लिए लिखा था. साइड बार में उस रचना के कटिंग की तस्वीर भी है. जो  'रोमांचकारी सफ़र' शीर्षक से  प्रकाशित हुई थी  .

"मेरे छोटे भाई 'नीरज' की माइनिंग इंजीनियरिंग' की प्रवेश परीक्षा में उत्तीर्ण होने की सूचना कुछ इतनी देर से मिली थी कि धनबाद जाकर 'इन्डियन स्कूल ऑफ माइन्स' में एडमिशन लेने में बस एक दिन का समय था और  नीरज गाँव में अपनी छुट्टियाँ बिता रहा था. उन दिनों फोन की  सुविधा तो थी नहीं कि उसे तत्काल खबर पहुंचाई जा सके. लिहाजा पापा ने मुझे ,मेरे छोटे भाई को चाची जी के साथ गाँव के लिए प्रस्थान करने को कहा.उन दिनों हमलोग समस्तीपुर में थे. सुबह छः बजे हमलोग बस से मुजफ्फरपुर के लिए रवाना  हो गए .जहाँ से हमें अपने गाँव जाने के लिए ट्रेन पकडनी थी. बस, अभी रेलवे स्टशन के पास वाले क्रॉसिंग पर पहुंची ही थी कि मोतीहारी जाने वाली ट्रेन स्टेशन पर नज़र आई. बस के कंडक्टर सहित,सहयात्रियों ने सलाह दी कि यहीं से उतर कर ट्रेन पकड़ लें और अगले स्टेशन पर टिकट ले लें. हमें समय की बचत भी करनी थी ताकि नीरज उसी दिन वापस समस्तीपुर आ सके. सो हम भी जल्दी से बस से उतर कर ट्रेन पर सवार हो गए.

पर ट्रेन तो अगले स्टेशन पर रुकी ही नहीं. इसके बाद कई स्टेशन पर ट्रेन नहीं रुकी. हमारे तो होश फाख्ता हो गए कि अगर टिकट चेकर आ गया तो कितनी बेइज्जती होगी. मैं उस समय ग्रेजुएशन कर रही थी,भाई छोटा था ,चाची जी ज्यादातर गाँव में ही रहती थीं .उन्हें अकेले यात्रा करने का अनुभव नहीं था. सबसे ज्यादा जिम्मेदारी  मुझे ही  महसूस हो रही थी और इसीलिए सबसे अधिक चिंतित भी मैं ही थी.

अब हमें यकीन हो गया था कि यह ट्रेन हमारे  गाँव के छोटे स्टेशन पर भी नहीं रुकेगी.पर अब हमें इंतज़ार था बीच के एक बड़े स्टेशन 'चकिया' का. जहाँ हर फास्ट ट्रेन रूकती थी. हमने तय किया वहीँ उतर जायेंगे और फिर किसी अन्य  साधन से गाँव जाने की सोचेंगे. वहाँ के स्टेशन मास्टर भी पहचान के थे. जो भी फाइन होगा हम दे देंगे और बाकी चीज़ें  वे संभाल लेंगे.

पर यह ट्रेन तो फास्ट ही नहीं सुपर फास्ट निकली और वहाँ भी नहीं रुकी. अभी तक हम थोड़ा बहुत मजाक भी कर रहें थे कि टी.टी. के आने पर बाथरूम में छुप जाएंगे या फिर और कई बहाने सोच रहें थे. अब तो सबकी बोलती बंद हो गयी. सैनिक स्कूल में पढने वाला तेरह वर्षीय 'निशित' अपनी बहादुरी के कुछ जौहर दिखाने की जुगत सोचने लगा. चाची जी अपने छत्तीस करोड़ देवी देवताओं की मनौतियाँ मनाने लगीं. मैं गहन चिंता में डूब गयी. पता नहीं कितना फाइन लेंगे? हमारे पास उतने पैसे हैं भी या नहीं? कहीं जेल ही ना ले जाएँ.? हमें कोई अनुभव ही नहीं था इस तरह बेटिकट यात्रा का. और ना किसी से ऐसे किस्से कभी सुने थे क़ि ज्ञानवर्धन हुआ हो.  यह ट्रेन कहीं दूर से आ रही थी लिहाजा बिलकुल खाली थी. कोई अन्य  पैसेंजर भी नहीं था साथ. जो किसी तरह की कोई सलाह भी दे सके. बस इन सबसे बेफिक्र चाची  की गोद में बैठी एक साल  की 'मीतू' किलकारियां भर रही थी और हैरान-परेशान थी कि कोई उसके साथ खेल क्यूँ नहीं रहा.

हमारे गांव का स्टेशन भी आया और हम खाली खाली निगाहों  से अपने लहलाहते खेत-खिलहान और बाग़-बगीचे देखते रहें. पर उनके बीच हमें अब जेल की सलाखें और हथकड़ियां नज़र आ रही थीं. किन्तु भगवान को भी अब शायद हम पर तरस आ गया और उन्होंने हमारा और इम्तहान  लेना स्थगित कर दिया. अगले ही स्टेशन पर ट्रेन रुक गयी. यहाँ क्रॉसिंग  था और दूसरी तरफ से कोई ट्रेन आ रही थी. ट्रेन के रुकते ही हम ताबड़तोड़ कूद पड़े. किसी तरह इस ट्रेन से तो पीछा छूटे. स्टेशन पर खड़े लोग भी आवाक रह गए क़ि इस ट्रेन से लोग यहाँ क्यूँ उतर रहें हैं ? खैर, शायद जिसने पूछा हमने थोड़ा बहुत बताया और उनलोगों से पता चला क़ि दूसरी तरफ से पैसेंजर ट्रेन आ रही है. हमलोगों ने ५० पैसे के टिकट कटाए और शान से उस ट्रेन पर सवार हो अपने गाँव के स्टेशन वापस चले आए.

वहाँ से तांगे से अपने गाँव पहुंचे. नीरज को खुशखबरी सुनायी और वह तुरंत ही समस्तीपुर के लिए निकल गया जहाँ से रात को पापा के साथ धनबाद के लिए रवाना हो गया.

दोनों भाई अब जिम्मेदार अफसर हैं. मीतू भी अब एम.ए में है. मैंने  तब ये संस्मरण किसी पत्रिका के लिए लिखा था जिसके पाठक अलग थे और अब यहाँ लिख रही हूँ, अपने मित्रों के लिए जो पाठक भी हैं.

Wednesday, April 14, 2010

इस बार की ट्रेन यात्रा कुर्ला से पटना तक....

कुछ गंभीर विषयों पर लिखने की सोच रखी थी.पर दूसरे ब्लॉग पर कहानी ने ऐसा मोड़ ले लिया है कि unwind होना बहुत जरूरी है .और  उसे बैलेंस करने के लिए कुछ हल्का-फुल्का लिखने का मन हो आया. मेरी एक पोस्ट पीक आवर्स" में मुंबई लोकल ट्रेन में यात्रा लोगों को पसंद आई थी. उस  समय  ट्रेन से सम्बंधित तीन संस्मरणों   की सीरीज लिखने  की सोची थी.पर  एकरसता से मुझे बोरियत भी बहुत जल्दी हो जाती है सो टलता गया .

एक और वजह है,आजकल नौस्टेल्जिया ने भी परेशान कर रखा है. अप्रैल की इन्हीं तारीखों में मेरी पटना यात्रा हुआ करती थी. बच्चों के इम्तहान ख़त्म हुए और दूसरे दिन ही मैं ट्रेन पर सवार. उनके रिजल्ट का भी इंतज़ार नहीं करती थी.(पतिदेव को दस बार फोन करके याद दिलाना,पड़ता था यह दीगर बात है) पर अब बच्चों के  ऊँची कक्षाओं में आ जाने से जाना मुल्तवी हो गया है.

कुछ साल पहले,जब मेरा बड़ा बेटा ५ साल का और छोटा २ साल का था. मैंने पटना जाने का  प्लान बनाया. कुर्ला स्टेशन से ,रात के साढ़े  ग्यारह बजे की ट्रेन थी और  मेरी टिकट वेटिंग लिस्ट में एक और दो नंबर पर आकर रुक गयी थी.  पतिदेव के ऑफिस से किसी ने VIP कोटा में भी ट्राई किया था और  हमें आश्वस्त किया था कि आप स्टेशन पहुँचिये .एक घंटे पहले कन्फर्म  हो जायेगा. प्लेटफ़ॉर्म पर पहुँच कर पाया कि लोगबाग़ बदहवास से इधर उधर भाग रहें हैं क्यूंकि ए.सी. बोगी कैंसल हो गयी थी और ए.सी.वालों को कहीं, कहीं थ्री टियर में एडजस्ट किया गया था. लिहाज़ा ए.सी. बोगी की कोई लिस्ट नहीं लगी थी. पतिदेव ने कहा मैं स्टेशन मास्टर के केबिन में चार्ट देखकर आता हूँ कि कन्फर्म हुआ है या नहीं. वे उधर गए और इधर ट्रेन आ गयी और लोगबाग चढ़ने लगे. मुझे मय समान के यूँ खड़ी देख सहयात्रियों ने पूछा" आप क्यूँ नहीं चढ़ रहीं ?" और मेरे ये बताने  पर कि पतिदेव  पता करने गए हैं कि टिकट कन्फर्म भी हुई है या नहीं.एक ने सलाह दी कि यहीं पर तो टी.टी.खड़े हैं.उनके पास लिस्ट है आप पूछ लें. और जब मैंने टी.टी. से पूछा तो उन्होंने लिस्ट में देखकर कहा ,हाँ आर. वर्मा और के. वर्मा.(मेरे बड़े बेटा का नाम ) की टिकट कन्फर्म है. मैंने तुरंत कुली से कहा,'सामन चढाओ ' और गेट पर ही खड़े होकर नवनीत  का इंतज़ार करने लगी. इधर ट्रेन ने सीटी देना शुरू कर दिया और नवनीत का कुछ पता ही नहीं. आखिर थोड़ी दूर पर वे आते दिखे.और उन्होंने चिल्ला कर कहा,"तुम्हारा टिकट कन्फर्म नहीं हुआ है" टी.टी. मेरे साथ दरवाजे पर ही खड़े थे. मैंने उन्हें एक बार फिर से लिस्ट चेक करने को कहा और फिर से उन्होंने कहा,हाँ... हाँ आर.वर्मा ,के वर्मा का नाम लिखा है. मैंने नवनीत को अस्श्वस्त  किया, टिकट कन्फर्म है. तब तक ट्रेन सरकने लगी थी. और पति भी निश्चिंतता से हाथ हिलाते हुए चले गए.

अब मैंने टी.टी. से कहा,हमारी बर्थ नंबर बताइए. और जब मैं उक्त बर्थ के पास गयी तो देखा लोग बैठे हुए हैं. मैंने उनसे कहा कि ये बर्थ तो आर.वर्मा और के.वर्मा के नाम की है उन्होंने कहा, "हाँ सही है..मेरी पत्नी का नाम आर वर्मा है और बेटी का के.वर्मा. " अब तो मेरी हालत का अंदाजा लगाया जा सकता है. दो छोटे बच्चे, ३० घंटे का सफ़र और रिजर्वेशन नहीं. मैंने जल्दी से कहा जंजीर खींचिए,इस तरह तो मैं नहीं जा सकती. इतने लोगों  में, एक महिला ने ही उठकर जंजीर खींची पर हमारी उत्कृष्ट रेल सेवा ,जंजीर उनकी हाथ में ही आ गयी. ट्रेन नहीं रुकी. पर बाद में मैंने सोचा ,अगर ट्रेन रुक जाती तो मैं वहीँ ट्रैक के पास सामान और बच्चों सहित उतर जाती .क्यूंकि ट्रेन ने प्लेटफ़ॉर्म तो छोड़ ही दिया था.  पर मेरे पास उस वक़्त मोबाइल फोन भी नहीं था,नवनीत के पास था,पर मैं उनसे संपर्क कैसे करती? इसलिए उस जंजीर का टूट जाना और ट्रेन का नहीं रुकना,मेरे हक में अच्छा ही हुआ.

मैंने टी.टी. से कहा  ..."अब देखिये कोई बर्थ खाली हो तो..." उन्होंने दो बर्थ खाली होने की सूचना तो दी, लेकिन सिर्फ आधी दूरी तक और कहा," उसके  बाद किसी और का रिजर्वेशन है और मेरी ड्यूटी भी वहीँ तक है. उसके आगे की जिम्मेवारी मैं नहीं ले सकता." उसके बाद भी पूरी एक रात का सफ़र बचता था जो  छोटे बच्चों के साथ मुमकिन नहीं था कि बैठ कर रात गुजारी जाए. तय किया कि एक घंटे बाद,अगला स्टेशन 'कल्याण' है जहाँ उतर जाउंगी और नवनीत को फोन कर दूंगी.

पर इतना सारा समान,कहाँ पब्लिक  बूथ मिलेगा.और तब तक रात के एक  बज  जाएंगे. नवनीत को भी आने में ३ घंटे तो लग ही जाएंगे. तब तक स्टेशन पर रुकना ठीक होगा, .बाकी सहयात्री बातचीत में मशगूल थे. साइड वाले बर्थ पर बैठी,मैं यही सब सोच रही थी. कि सामने बैठे एक व्यक्ति जिसे god send ही कहेंगे , ने सलाह दी कि आप आधी दूरी तक का रिजर्वेशन ले लीजिये. उसके बाद दिन का सफ़र रहता है,कोई परेशानी नहीं होगी और रात के दस बजे ट्रेन इलाहाबाद पहुँचती है. काफी लोग वहाँ उतर जाते हैं और आपको जरूर रिजर्वेशन मिल जायेगा. मुझे भी यह सलाह सही लगी वरना मैंने तो 'कल्याण' उतरने का मन बना ही लिया था.

मैंने टी.टी. से बात करके अपना समान ज़माना शुरू किया.और एक बात लिखने से नहीं रोक पा रही खुद को. प्लेटफ़ॉर्म पर आते ही बिहार में  बोली जाने वाली विभिन्न बोलियाँ भोजपुरी,मैथिलि,मगही सुन अपनापन की अनुभूति हुई थी क्यूंकि मुंबई में तो कान मराठी,गुजरती,मलयालम,तमिल सुनने के आदी हो चुके थे. पर यहाँ इतना भारी बैग,अटैची मैं  अकेली खींच खींच कर ला रही थी लेकिन किसी भी एक बन्दे ने उठकर सहायता के लिए हाथ नहीं बढाया. ऐसे अनुभव मुझे कई बार हो चुके हैं. लोगबाग अपने पैर उठा लेंगे ,किनारे हो   जाएंगे,पर हेल्प नहीं करेंगे.खैर हमलोग तो सक्षम हैं ही. यहाँ साथ वाली बर्थ पर वही महिला थीं जिसने मेरे लिए चेन खींची थी.उसका भी ५ साल का एक बेटा था. एक और बुजुर्ग पति-पत्नी थे. हमारा सफ़र बहुत अच्छा कटा,बिलकुल एक पिकनिक के जैसा.कोई किसी स्टेशन पर ठंढा पिलाता,कोई समोसे खिलाता. बातचीत करते,हँसते-बोलते रास्ता कटता गया.

एक स्टेशन पर बनारस जाने वाली ट्रेन 'महानगरी' लगी थी. कुछ लोगों ने उतर कर वो ट्रेन पकड़ ली.और मुझे आराम से पटना तक के लिए बर्थ मिल गयी. उन सबके जबलपुर उतर जाने के बाद यात्रा थोड़ी मायूसी में गुजरी. उस पर से एक जगह रात में ट्रेन करीब एक घंटे के लिए रुक गयी और ट्रेन की बिजली भी चली गयी.बच्चे गर्मी से परशान हो रोने लगे और कहते जाते, "गन्दी ट्रेन ..गन्दी ट्रेन" .सामने वाली बर्थ पर जाने वह कोई औटोवाला था,फलवाला या सब्जीवाला.पर भीषण गर्मी की वजह से  उसने भी अपनी शर्ट उतार दी और उसके बनियान के अनगिनत सूराख  किसी डिज़ाईनर बनियान का भ्रम दे रहें थे. मेरी सहेलियां  यह सब सुन आश्चर्य में पड़ गयीं  ,कैसे हिम्मत कर लेती हो.यूँ अकेली सफ़र करने का. अब मजबूरी तो है पर पिछले १५ बरस से अकेले आती जाती हूँ,कभी किसी अप्रिय घटना का सामना नहीं करना पड़ा.

खैर ट्रेन चली और सुबह का इंतज़ार होने लगा. पर हमारा ordeal अभी ख़त्म नहीं हुआ था. दानापुर से  आधे घंटे लगते हैं,पटना पहुँचने में. मैं इधर उधर बिखरे  सामान  इकट्ठा करने लगी. घर पहुँचने की ख़ुशी से ज्यादा  सुकून इस बात का था कि इस ट्रेन से तो निजात मिलेगी. पर ट्रेन को हमारा साथ कुछ ज्यादा ही पसंद आ गया था और करीब ४ घंटे तक ट्रेन वहीँ रुकी रही. कई लोग वहाँ से उतर कर टैक्सी से अपने गंतव्य तक चले गए. पर मेरे लिए यह मुमकिन नहीं था.एक तो अकेली ,साथ में बच्चे और उसपर से 'travel light " मैंने अब तक नहीं सीखा और खासकर जब घर जाना हो. हमेशा मेरे साथ ढेर सारा सामान होता है.

पापा मुझे स्टेशन लेने आ चुके थे और मम्मी घर पर परेशान हो रही थीं  क्यूंकि railway inquiry में कोई फोन ही नहीं उठा रहा था . कुछ ही दिन पहले एक ट्रेन दुर्घटनाग्रस्त हो गयी थी .तब भी inquiry में फोन रिसीव नहीं कर रहें थे, बस मम्मी ने घबरा कर मामा वगैरह को बुला लिया.और वे लोग दानापुर के लिए निकलने ही वाले थे कि हमलोग पहुँच गए.

एक बात का जिक्र और करना चाहूंगी.हमलोग सोचते हैं कि २,३ साल के बच्चों को क्या समझ होती है, उनके सामने कुछ भी कह लो. पर मेरे पति ने जब फोन किया और छोटे बेटे से बात करना चाहा तो उसने पहला सवाल यही किया ,"आपने मम्मी को क्यूँ डांटा ?"

जब मैं ट्रेन में थी और पति ने प्लेटफ़ॉर्म से चिल्ला कर कहा था कि 'तुम्हारा टिकट कन्फर्म नहीं हुआ है' तो उसे लगा कि वे डांट रहें हैं ,और यह बात उसने दो दिन तक याद रखी थी.

Thursday, April 8, 2010

एक मुख़्तसर सी मुलाकात....'कैलाश सेंगर' के साथ

पिछले कुछ दिन काफी व्यस्तता भरे थे , एक तो बच्चों की छुट्टियाँ,उनकी फरमाईशें और उनमें आकाशवाणी से एक कहानी की फरमाईश भी शामिल .कई मित्र नाराज़ भी होंगे...उनलोगों के इतने शौक और मेहनत से लिखे पोस्ट्स भी नहीं देख पायी. ब्लॉगजगत में भी रेडियो से जुड़े कई लोग हैं उन्हें पता होगा..कि कहानी लिखना कोई मुश्किल कार्य नहीं पर उसे दस मिनट की समय सीमा में समेटना  महा दुष्कर है.कभी कहानी ग्यारह मिनट की हो जाती है तो कभी नौ मिनट  की .खैर राम राम करके निर्धारित समय सीमा में कहानी पूरी हो गयी और कल उसकी रेकॉर्डिंग भी, संपन्न हो गयी.

रेकॉर्डिंग रूम में ही मैंने सुना, प्रोग्राम प्रोड्यूसर अपने असिस्टेंट को निर्देश दे रहें थे कि चार बजे,'कैलाश सेंगर' का इंटरव्यू है, अमुक जन इंटरव्यू लेंगे  ,अमुक रेकॉर्डिंग करेंगे ...सब देख लेना. उन्हें कहीं बाहर जाना था. मुझे नाम जाना -पहचाना सा लगा लेकिन स्पष्ट कुछ याद नहीं आ रहा था. बार बार 'कैलाश खेर ' का नाम ही ध्यान में आ जाता.लेकिन वे  तो गायक हैं और ये लेखक. पर मेरे 'अवचेतन मन' ने काम करना शुरू कर दिया था. और जैसे ही, मैं बाय कह कर निकलने को हुई, 'अवचेतन मन' ने 'चेतन मन ' को नाम के साथ सारी रूप रेखा थमा दी और मुझे याद आ गया कि बरसों पहले मैंने कैलाश सेंगर जी की एक कहानी 'धर्मयुग' में पढ़ी थी. मुझे बहुत पसंद आई थी और पूरी कहानी भी मुझे याद आ गयी. मैंने उलोगों से पूछा ' मैं मिल सकती हूँ,उनसे" और सबने ऐसी नज़रों से मुझे देखा मानो 'कितना बेवकूफी भरा सवाल हो'. पर प्रकट में बस यही कहा..'हाँ हाँ क्यूँ नहीं'

और हम सब ऑफिस में बैठे उनका इंतज़ार करने लगे. दो युवा अनाउंसर भी थे. वे लोग जितना भी कैलाश जी के बारे  में जानते थे,बताने लगे कि कैसे 'धर्मवीर भारती जी' को उनकी कहानियाँ इतनी पसंद आई थीं कि उन्होंने एक ही महीने में उनकी दो कहानियाँ छाप दीं  और उन्हें पत्र लिखा कि आप वहाँ क्या कर रहें हैं, मुंबई आकर 'धर्मयुग' के साथ जुड़ जाइए .और तब से वे यहीं  हैं. एक ने बताया कि अपनी पत्नी की मृत्यु के बाद काफी दिन तक वे लेखन से दूर रहें. उन्होंने बताया शायद उनकी पत्नी का नाम 'सुमन सरीन' था. मैं फिर से चौंकी 'ओह! तो सुमन सरीन की शादी कैलाश जी से हुई थी'. 'सुमन सरीन 'भी धर्मयुग की एक जानी मानी लेखिका थीं. पर उनके लिए 'थी' शब्द के प्रयोग से मन बहुत आहत भी हुआ. बात 'धर्मयुग' की चली और वे सब मुझसे पूछने लगे आखिर ऐसा क्या था ;धर्मयुग 'में जो पुराने लोग इतना नाम लेते हैं उसका .(अपने लिए ये 'पुराने' शब्द का प्रयोग कितना दंश  दे गया,उन्हें क्या पता :(  पर सच भी तो था,नयी युवा पीढ़ी ने बस नाम भर सुना है ) मैं और ऑफिस में उपस्थित एक और महिला 'धर्मयुग 'का गुणगान करने लगे तो एक युवक ने बताया कि उसने धर्मयुग' पर phd करने की सोची थी. खुद 'पुष्पा भारती' जी ने मुंबई यूनिवर्सिटी के हिंदी विभागाध्यक्ष को यह सलाह दी थी कि किसी छात्र से इस विषय पर phd करवाएं. लेकिन उक्त युवक ने जिसका नाम संतोष था कई जगह धर्मयुग के पुराने अंकों की खोज की पर उसे नहीं मिले. सिर्फ पुष्प भारती जी के पास ही हैं जिसे उन्होंने अमूल्य धरोहर की तरह संभाल कर रखा है. पुष्पा जी ने संतोष को अपने घर आकर जितनी देर मर्ज़ी हो 'धर्मयुग' पढने की इजाज़त दे दी. अपने सुझाव और मदद की भी पेशकश की. पर धर्मयुग के अंक अपने घर ले जाने की अनुमति  नहीं दी.और उनका यह फैसला सही भी था .कोई दूसरा उसका मूल्य नहीं समझ सकता और उतनी हिफाज़त नहीं कर सकता. पर कितने दिन उनकर घर जाकर पढूं...यह सोच संतोष ने phd करने का ख्याल ही छोड़ दिया.

हमारी बातचीत चल ही रही थी कि कैलाश जी आ गए. अक्सर कहानी के नायक से ही, कहानी के लेखक की कल्पना कर ली जाती है. मुझे भी कुछ ऐसा ही लगा था कि दुबले पतले थोड़े निरीह से होंगे पर लम्बे छरहरे काफी प्रभावशाली व्यक्तित्व के धनी थे. पहले तो वे उन लड़कों की तरफ मुखातिब हुए और उनमे से एक ने कहा भी, चार साल पहले आपको एक कवि सम्मलेन में देखा था ,आज रूबरू देख रहा हूँ. फिर मुझसे परिचय करवाया और जब मैंने उन्हें बताया कि आपकी बीस साल पहले पढ़ी कहानी मुझे अब तक याद है तो वे आश्चर्य में डूब गए. कहानी का शीर्षक मुझे नहीं याद था लेकिन कथ्य बताने पर उन्होंने कहा,'जरूर 'रात' कहानी का जिक्र कर रही हैं.फिर उन्होंने पूछा कि इस कहानी पर बहुत अलग अलग प्रतिक्रियाएँ हुई थी. आप अपनी प्रतिक्रिया बताइए."उस कहनी की नायिका 'नीता' ट्रेन से अपनी बेटी के लिए लड़का देखने जा रही है.ट्रेन में ही एक दाढ़ी वाले व्यक्ति को देख,उसे अपने कॉलेज के एक सहपाठी की याद आती है. पर फिर सोचती है वह तो कितना सुदर्शन था यह इतने मरियल से हैं. और उसे कॉलेज के दिन याद आते हैं .उस लड़के का अव्यक्त आकर्षण था उसके प्रति.वह समझती थी.पर पढाई छोड़कर कभी कोई और बात नहीं  हुई उनके बीच. ट्रेन में नायिका के पति की तबियत बहुत खराब हो जाती है और वो व्यक्ति उनकी बहुत सहायता करता है. जब वह अपने स्टेशन पर उतरने लगता है तो नायिका को ध्यान आता है कि उन्होंने तो उन सज्जन का नाम,परिचय  तक नहीं पूछा.पूछने पर  वे कहते हैं,"इसी जनम में दुबारा अपना परिचय देना अच्छा नहीं लगता " कैलाश जी जानना चाहते थे कि क्या पाठक को शुरू में ही पता चल जाता है कि वह दाढ़ीवाला व्यक्ति 'नायक' है? पर मुझे इतना नहीं याद था. मैंने कबूल लिया और साथ में स्टुपिड की तरह यह भी कह दिया कि 'मैंने आपकी कोई दूसरी कहानी नहीं पढ़ी' (सच, स्टुपिडीटी के लिए कोई उम्र तय नहीं है  ) वे ओह! कह कर चुप हो गए पर मैंने उसकी क्षतिपूर्ति यह कह कर कर दी कि वह कहानी अब तक मेरे पास है. ( बचपन की  मेरी आदत थी , जो भी कहानी अच्छी लगती उसके पन्ने अलग कर मैं मम्मी के बड़े से काले बक्से में छुपा देती,ताकि मेरे होस्टल चले जाने के बाद, गुम ना हो जाए. धीरे धीरे मेरा खज़ाना समृद्ध होता गया. उसमे वो कामना चंद्रा (कामना चंद्रा, की बड़ी बेटी,'विधु विनोद चोपड़ा' की पत्नी हैं. तनूजा चन्द्र उनकी छोटी बेटी हैं ) की वो कहानी भी है ,जिसपर चांदनी फिल्म बनी थी...कुछ साल पहले ,माँ ने कहा क्या करना है, ये इतने सारे कटिंग्स का ,कहीं दीमक ना लग जाएँ और मैं वो सब उठा कर यहाँ मुंबई ले आई ) यह सुन तो कैलाश जी को और भी आश्चर्य हुआ.(ख़ुशी भी हुई होगी,पक्का)

अब तक कमरे के और लोग उपेक्षित से महसूस करने लगे थे. एक युवक ने बातचीत में शामिल होने की गरज से जरा जोर  से कहा 'सर आपने सुमन जी  के निधन के बाद लिखना छोड़ ही दिया था'. उन्होंने कहा, 'हाँ ,वे पांच साल बड़े कठिन थे. उन्हें कोई ऐसी बीमारी थी जो करोड़ों में किसी एक को ही होती है'. मेरे यह बताने पर कि सुमन जी तो पटना की थीं और उनका लिखा भी मैंने काफी पढ़ा है फिर से थोड़ा चौंके वो. मैंने कहा जरूर आपलोग धर्मयुग में ही मिले होंगे.उन्होंने बताया कि 'धर्मयुग' में सह संपादक के लिए ढाई हज़ार आवेदन पत्र में से सिर्फ दो लोगों  का चुनाव हुआ था,उनका और सुमन जी का. मैंने सोचा एक 'सुमन जी' का ही हुआ होगा. धर्मवीर भारती जी ने आपको तो पहले ही चुन लिया था. फिर से बात धर्मयुग की तरफ मुड़ती देख, अब असिस्टेंट का पेशेंस खत्म हो चुका था. वह राग अलापने लगा,'सर रेकॉर्डिंग' और बात सही भी थी. वे रेकॉर्डिंग  के लिए ही आए थे,गप्प गोष्ठी के लिए तो नहीं. कैलाश जी ने बार बार कहा,'आपसे मिलकर बहुत अच्छा लगा'

क्यूँ नहीं अच्छा लगेगा...बरसों बाद कोई पाठक आपकी कहानी पात्रों के नाम और मय डायलॉग के याद रखे तो अच्छा तो लगना ही चाहिए.

Friday, April 2, 2010

हास्य कलाकार जो सिर्फ पहली अप्रैल को ही नहीं..पूरे साल,हमें हंसाते हैं



यह पोस्ट कल डालने की सोची थी, कल हंसने हंसाने का दिन था. तो सोचा क्यूँ ना अपने प्रिय फिल्म कलाकारों वाली पोस्ट डाल दूँ,जो बरसों से बिना अप्रैल,या दिसंबर देखे हमें हंसाते आए हैं.पर कुछ दिन काफी व्यस्तता भरे थे और देर रात वक़्त मिला तो कहानी की अगली किस्त डालने में ही लगी रही...वहाँ भी जरा देर हुई कि  शिकायतें शुरू हो जाती हैं...आज ही पढ़ लीजिये,भाषा जरा किताबी है,वो इसलिए क्यूंकि किसी अखबार के लिए लिखी गयी थी :)


हमारे देश में मनोरंजन का सबसे सुलभ या कहें तो एकमात्र साधन है,हिंदी फ़िल्में. हिंदी फिल्मों के माध्यम से हम थोड़ी देर को अपनी रोजमर्रा की परेशानी भूल एक अलग ही काल्पनिक दुनिया में पहुँच जाते हैं .और अगर यह काल्पनिक दुनिया हमें हंसी ख़ुशी का तोहफा दे जाए तो इस से बेहतर और क्या होगा? पर फिल्म के माध्यम से कोई सन्देश देना, सोचने पर मजबूर कर देना, रुलाना या डराना  जितना आसान है किसी  के चेहरे पर हंसी की रेखा लाना, उतना ही मुश्किल. लेकिन फिल्म देखने के बाद भी अक्सर वही दृश्य और डायलॉग याद रह जाते हैं और बार बार दुहराए जाते हैं,जिनमे हंसी का पुट छुपा हो.इसलिए हर निर्माता निर्देशक की कोशिश होती है कि वे अपनी फिल्म में कोई हास्य दृश्य और डायलॉग जरूर डालें.क्यूंकि ये फिल्म को और भी आकर्षक बना देते हैं और दर्शकों को टिकट खिड़की तक खींचने में सक्षम होते हैं.

कई बार पूरी फिल्म ही हास्य प्रधान होती है. इन फिल्मों में अभिनय कर उन दृश्यों को साकार करना जिस से आज की हैरान-परेशान जनता के चेहरे पर हंसी लाई जा सके ,कोई आसान काम नहीं. कुछ ऐसे प्रसिद्ध हास्य कलाकार हिंदी फिल्म जगत में अवतरित हुए हैं ,जिन्होंने इस कठिन कार्य  को बखूबी अंजाम दिया है.उनके परदे पर आते ही दर्शकों की तनी हुई नसें ढीली पड़ जाती हैं और अनायास  ही मुस्कान आ जाती है, चेहरे पर ,इस उम्मीद में कि अब हंसी का पिटारा बस खुलने ही वाला है. इनमे कुछ all time ग्रेट कलाकार हैं, 'किशोर कुमार' , 'महमूद', जॉनी  वॉकर, परेश रावल, कदर खान आदि. इन कलाकारों ने दर्शकों को थोड़ी देर अपनी चिंता -परेशानी ताक पर रख खुल कर हंसने पर हमेशा मजबूर किया है.
(किशोर  कुमार  मेरे  सर्वाधिक  प्रिय  हास्य  कलाकारों में से हैं.उनकी कोई भी फिल्म टी.वी. पर आए मैं नहीं छोडती देखना.)


 'किशोर कुमार अपनी बेहतरीन गायकी के लिए मशहूर  हैं. पर वे एक अद्वितीय हास्य कलाकार भी थे. उनकी कॉमिक टाइमिंग लाजबाब थी.वे अपने बेमिसाल अभिनय , डायलॉग डिलीवरी और अपने हाव भाव से अपने किरदार में जान डाल देते थे. और दर्शक उनकी हरकतों पर बस लोट पोट होकर रह जाता था. उनकी कुछ अविस्मरनीय  कॉमेडी फ़िल्में  हैं, चलती का नाम गाड़ी, (१९५८), हाफ टिकट,(१९६२०, पड़ोसन (१९६८), बाप रे बाप (१९५५०, प्यार दीवाना (१९७३), हंगामा (१९७१), बढती का नाम दाढ़ी (१९७४)

महमूद कॉमेडी के सरताज कहे जा सकते हैं. उन्हें परदे पर देखते ही सबके चेहरे खिल उठते थे. क्या बच्चे क्या बूढे, महमूद हर दिल अजीज थे. वे अपने हर किरदार को कुछ इस तरह निभाते थे कि उस  किरदार को  दर्शक हाल से निकलने के बाद भी  भूल नहीं पाते थे.  फिल्मों का एक दौर था. जब महमूद का रोल निश्चित हुआ करता था और उनके लिए अलग से रोल निकाले जाते थे. महमूद भी हमेशा उस किरदार के साथ न्याय करते थे और दर्शकों के दिल पर एक अमिट छाप छोड़ जाते थे. अपने तीस दशक के फिल्म कैरियर  मे महमूद ने करीब ३०० फिल्मों में काम किया. पड़ोसन, कुंवारा बाप, बोम्बे टू गोवा, गरम मसाला, जौहर  महमूद इन हांगकांग , साधू और शैतान, मैं सुन्दर हूँ, इत्यादि.
उन्होंने कुछ  फिल्मे भी निर्देशित कीं जो काफी सफल रहीं.दुश्मन दुनिया का (१९९६), जनता हवलदार (१९७९), एक बाप छः बेटे (१९७८), कुंवारा बाप (१९७४)


(जॉनी वाकर भी मेरे फेवरेट हैं )
जॉनी वाकर के बोलने का स्टाईल उन्हें दूसरे हास्य कलाकारों से अलग कर देता था. उनके बोलने के स्टाईल  की सबसे ज्यादा नक़ल की जाती थी. उनका असली नाम 'बदरुद्दीन जमालुद्दीन क़ाज़ी 'था.वे  एक मिल वर्कर के बेटे थे. उनका नाम उस जमाने के प्रसिद्द स्कॉच व्हिस्की के नाम पर पड़ा और विडंबना ये कि वे शराब छूते भी नहीं थे. वे बहुत ही सरल इंसान थे. जब वे सफलता के शिखर पर थे तब भी उन्होंने विनम्रता का दामन नहीं छोड़ा. करीब ३०० फिल्मों में उन्होंने हास्य प्रधान भूमिका निभाईं . जिनमे प्रमुख गुरुदत्त द्वारा निर्मित और निर्देशित फिल्मे थें.

आज की फिल्मों के सर्वाधिक लोकप्रिय हास्य कलाकार हैं, परेश रावल. आज के दौर की फिल्मों में कॉमेडी उन्हीं से शुरू और उन्ही पे ख़तम  हो जाती है. उनकी डायलौग डिलीवरी, उनके चेहरे के हाव भाव ,दर्शकों को उनका दीवाना बना देते हैं.'हेराफेरी' फिल्म के बाबू राव गणपत का किरदार हो या 'आँखें' के नेत्रहीन बैंक लूटने वाले का ,वे हमेशा दर्शकों को हंसाने में सफल रहें हैं.



कादर खान ने भी अपनी कॉमेडी से दर्शकों को बहुत हंसाया है. अपने डायलॉग बोलने के अंदाज़ और परफेक्ट टाइमिंग के लिए वे मशहूर रहें हैं. गोविंदा के साथ उनकी ट्यूनिंग बहुत ही सफल रही.दोनों ने एक साथ बहुत सारी हिट फिल्मे दी हैं. डेविड धवन की फिल्मों में सलमान खान और गोविन्द के पिता के रूप में निभाये किरदार दर्शकों को ज्यादा पसंद आए.

आजकल तो नायक का रोल करने वाले स्थापित कलाकार भी हास्य कलाकरों की लोकप्रियता देख. कॉमेडी रोल करने का लोभ नहीं संवरण कर पाते.गोविंदा, सलमान खान, अजय देवगन आजकल कई हास्य प्रधान फिल्मों की मुख्य भूमिका में नज़र आते हैं. फिर भी हास्य कलाकारों ने अपनी जगह बरकरार रखी है. उपर्यक्त लिखित  प्रमुख कलाकरों के अलावा कुछ और मशहूर नाम हैं, भगवान दादा, उत्पल दत्त, असरानी, जौहर  महमूद, जगदीप, देवेन वर्मा, शक्ति कपूर, अनुपम खेर, जॉनी लीवर, केश्टो मुखर्जी, जूनियर महमूद, रघुवीर यादव, लक्ष्मीकाँट बेर्डे, सतीश शाह, राजपाल आदि, ये कलाकार दर्शकों का अच्छा मनोरंजन करते आए हैं और कर रहें हैं.


लाहुल स्पीती यात्रा वृत्तांत -- 6 (रोहतांग पास, मनाली )

मनाली का रास्ता भी खराब और मूड उस से ज्यादा खराब . पक्की सडक तो देखने को भी नहीं थी .बहुत दूर तक बस पत्थरों भरा कच्चा  रास्ता. दो जगह ...