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गुरुवार, 22 अप्रैल 2010

वक़्त का घूमता पहिया और ये पति परमेश्वर

पहली बार व्यंग्य -विधा को आजमाने की कोशिश की है और इसका श्रेय जाता है कुछ मित्रों को. सबसे पहले तो चंडीदत्त  शुक्ल जी ने कहा,आप व्यंग्य लिखने की भी कोशिश कीजिये. पर मैंने उनकी बात बिलकुल ही अनसुनी कर दी क्यूंकि अब तक  Jack of All Trades, Master of None पर ही अमल करती आई हूँ  और सोच रखा था,अब और प्रयोग नहीं. फिर अविनाश वाचस्पति जी ने अपने कमेन्ट में मेरी कहानी में से कुछ पंक्तियाँ उद्धृत  कर बताया कि आप व्यंग्य लिख सकती हैं. शरद कोकास जी का भी कहना था कि 'आपके लेखन में विट एवं सटायर की बहुतायत है' तो इन मित्रों के उत्साहवर्धन से कुछ आत्मविश्वास बढ़ा और कुछ लिखने की कोशिश की.' ताऊजी डौट  कॉम' के 'वैशाख्ननंदन सम्मान प्रतियोगिता' में यह प्रकाशित हो चुकी है. आज अपने ब्लॉग पर भी पोस्ट कर रही हूँ ताकि अपना लिखा एक जगह संकलित रहें.

पुरुषों के लिए, नौकरी मिलने से पति बनने तक के बीच के दिन बड़े  सुनहरे होते हैं और फिर कभी लौट कर नहीं आते. सैकड़ों फोटो देखी जाती हैं,दावतें उडाई जाती हैं और चुन कर सुन्दर,स्मार्ट, पढ़ी लिखी लड़की शादी कर घर लाई जाती है .और बस उसके बाद , आँखों पर पड़ा रंगीन पर्दा हट जाता है और खुरदरी  यथार्थ की जमीन  नज़र आने लगती है.

सुबह होती है,पति अखबार और चाय की तलाश में कमरे से बाहर आता है,देखता है ,पत्नी सामने टेबल पर पैर फैलाए,अखबार में नज़रें गडाए बैठी है. कोई सप्लीमेंट उठा चाय का आग्रह करता है,अब या तो वह इंतज़ार करे या खुद बना ले क्यूंकि पत्नी तो आर्टिकल पूरा कर के ही उठेगी.और नज़रों के सामने घूम जाता है,माँ का चेहरा,जिनके कान पिताजी के उठने की आहट पर ही लगे होते थे.बच्चों को सुबह से ही डांट पड़नी शुरू हो जाती थी,अख़बार इधर उधर मत रख दो,पापा को चाहिए होगी. और पापा फ्रेश होकर आए नहीं कि चाय और अखबार एक मुस्कान के साथ हाज़िर .बस साथ में एक ताजे फूलों के  गुलदस्ते की कमी रहती.वरना पूरा रेस्तरां  सर्विस ही लगता था.

पापा ने अखबार पढ़ते पढ़ते ही आवाज़ लगाई,जरा शेव का सामान और पानी दे जाना .और माँ नौकर के हाथों,बच्चों के हाथों या फिर खुद ही लिए हाज़िर हो जातीं.यहाँ , एक तो बाथरूम में खड़े होकर शेव करो और अगर गलती से कह दिया,शेविंग क्रीम या आफ्टर शेव ख़त्म हो गया है तो तुरंत सुनने को मिल जायेगा, "अब इतना तो अपनी चीज़ों का ख़याल रख ही सकते हो" या "फ्रिज पर जो कागज़ चिपका है उसपर लिख दो, माँगा दूंगी" .अब पति बाथरूम से उसी अवस्था में निकल कर जाकर लिख आए या फिर वैसे ही काम चलाता रहें.

पापा नहा कर निकलते थे और उनकी कमीज़, पैंट, रूमाल निकाल कर रखी होती थी. आजकल अपनी अलग आलमारी होने से यह काम भी खुद ही करना होता है. एक दिन हलके हरे रंग की शर्ट में देख,कलीग मिस गुप्ता ने काम्प्लीमेंट दे दिया था,"यह रंग आपको बहुत सूट करता है " पति पूरा बाज़ार छान उस रंग की टीशर्ट खरीद कर लाता है. और खुश खुश अपना आलमीरा खोलता है...आज तो शनिवार है,टीशर्ट पहन सकता है और किसी बहाने मिस गुप्ता के टेबल के पास से गुजरने के मंसूबे भी बना रहा है.पर टीशर्ट तो मिल ही नहीं रही .पूछने पर पत्नी कहती है...'हाँ वो मैंने अपने लिए रख ली ....इतना फेमिनिन कलर तुम पर अच्छा नहीं लगेगा."

"पर वो तो तुम्हे काफी लूज़ होगा "...पति एक क्षीण आशा रखता है,टीशर्ट की आलमारी में पुनः वापसी की .पर सुनना को मिलता है.,

"'ना, अब शादी के बाद काफी पुट ऑन कर लिया है..." पति सोचता रह जाता है..उससे तो  हर बार यही कहने की आशा रखी जाती है कि , 'इस ड्रेस में बड़ी स्लिम लग रही हो'. पर जब उसकी टीशर्ट झटकने  की बारी आई तो खुद ही सच्चाई मान ली.

खाने के टेबल पर भी पापा की थाली,नज़र के सामने आ  जाती है.इतनी सारी कटोरियाँ होती थीं. मसाले तेल से भरपूर,कितने स्वाद वाली.उसपर माँ , सैकड़ों काम छोड़ पंखा झले ना झलें (वो शायद दादी झलती होंगी) पास जरूर बैठी होती थीं. और थाली पर ध्यान जरूर रखती थीं,ये तो खाया ही नहीं, ये तो छूट ही गया, ये और चाहिए?. यहाँ, अगर पति कह दे,"कितना ब्लैंड है, नमक मिर्च का पता नहीं",पत्नी का रेडीमेड जबाब होता है, "इतनी सीडेन्ट्री लाइफ स्टाइल है.वाक पे जाते नहीं,एक्सरसाइज़ करते नहीं.कम से कम खाना तो परहेजी खाया करो."


यहाँ अगर पत्नी गृहणी है तो टेबल पर खाना लगा, घर के बचे  कामो में उलझी होगी क्यूंकि इसके बाद का समय उसका अपना है, टी.वी. देखे,फ़ोन पर गप्पे मारे,शॉपिंग करे  या फिर नेट-सर्फिंग करे .पर उस समय में कोई कटौती नहीं होगी.और अगर पत्नी नौकरी पर जाती है तब तो सौ हिदायतें और मिल जाएँगी.कैसरोल का ढक्कन बंद करना मत भूलना,सब्जी फ्रिज में रख देना, और दूध  ठंढी हो जाए तो वो भी फ्रिज में रख देना और हाँ,पानी पीकर खाली बोतल वापस फ्रिज में मत रखना,भरी हुई बोतल ,उठाकर रख देना.और पति एक एक कर सारी हिदायतें याद करता रहता है.

शादी के पहले ऑफिस जाते समय, पत्नी को अलग अलग अंदाज़ से बाय करने  के सपने देख  रखे  थे.पर वे सपने ही क्या जो पूरे हो जाएँ. गृहणी है तो उसके सौ काम राह देख रहें होंगे और अब ऑटोमेटिक दरवाजे ने दरवाजा बंद करने की जहमत से भी मुक्ति दे दी है कि कम से कम दरवाजा बंद करने के बहाने ही पत्नी,दरवाजे तक छोड़ने तो आए.

अगर नौकरी वाली हो तो पति भले ही बाय कहने की राह देखता रहें .पर पत्नी सैंडल,पर्स,मोबाइल,गौगल्स में ही उलझी होती है,किस हाथ में क्या क्या  और कैसे संभाले. और उस पर से रोज "ओह फिर से लेट हो गयी, आज " की रट अलग.

पति का पुराना मित्र उसके शहर आया है.पति उसे गर्मजोशी से  कहता है, "ऑफिस के बाद तुम्हे पिक करता हूँ और फिर सारा शहर घुमाता हूँ". मन ही मन खुश हो रहा है, मित्र कॉम्पिटिशन में निकल तुरंत अच्छी सरकारी नौकरी में लग गया तो क्या,उसके पास तो सरकारी जीप ही है,ना. उसे काफी संघर्ष करना पड़ा पर अब तो अपनी होंडा सिटी है,  उसकी ए.सी. की जबरदस्त कूलिंग,उसका स्टीरियो,आरामदायक सीट सब दिखायेगा मित्र को. पर निकलते समय पत्नी कहती है, "आज कार छोड़ ऑटो या टैक्सी से चले जाओ,मुझे कार चाहिए, आज सहेलियों के साथ लंच है."

"तुम आज,ऑटो से चली जाओ मुझे अपने फ्रेंड को घुमाना है"

"कैसी बातें करते हो,ऑटो या टैक्सी में बालों का क्या हाल होता है,पता भी है. तुम ही आज चले जाओ टैक्सी या ऑटो से,तुम्हे क्या फर्क पड़ेगा, वैसे भी  बाल ही कितने बचे है." और पति सब भूल, आईना में अपने बाल निहारने लगता है,"हेयर थेरेपी ले ही ली जाए क्या?". एक ख्याल पत्नी को एक दूसरी गाड़ी खरीद कर देने का भी होता है, नैनो ही सही.पर पार्किंग की विकराल समस्या मुहँ बाए खड़ी होती है. रोज बिल्डिंग वालों से झगडा मोल लेने से तो अच्छा है,मित्र को टैक्सी में ही घुमा दिया जाए.


ऑफिस जा कर भी चैन नहीं अगर दिन में तीन बार फोन नहीं किया तो उलाहने सुनने को मिलेंगे, सुबह से सर में दर्द था,एक बार हाल भी नहीं पूछा, या बेटे/बेटी का रिज़ल्ट नहीं पूछा, बेटे/बेटी के हॉकी/फूटबाल के मैच का हाल नहीं पूछा. यह टेलीफोन  ईजाद ही क्यूँ हुआ.और ईजाद हुआ भी तो इतना आम क्यूँ हुआ? पिताजी को तो ये समस्याएं नहीं आयीं कभीं.

रात में पिता हमेशा रेडिओ पर समाचार सुनते या टी.वी. पर समाचार देखते हुए खाना खाते थे. पर यहाँ तो टेबल पर खाना लगा, टी.वी.पर  फैशन शो की झलकी आने ही वाली है कि पत्नीश्री रिमोट का बटन दबा देती हैं और किसी उद्घोषक की तरह अनाउंस करती हैं. "डिनर टाइम-- नो टी.वी." अब पति अगर चुपचाप खाए तो उलाहना मिलेगा सिर्फ इसी समय तो सारे परिवारजन एक साथ बैठते हैं, दिनभर की गतिविधियों पर बातचीत होनी चाहिए,अगर बातों में उलझा रहें तो सुनेगा, इतनी मेहनत से "पनीर पसंदा" बनाया है और तुम्हारा ध्यान भी नहीं. पति का मन होता है, कहे, "भाग्यवान,  किसने कहा इस एक्सपेरिमेंट के लिए? उसे तो पारंपरिक  आलू गोभी ही पसंद है."और अब वह  सोच सोच के बच्चों से सवाल पूछता रहता है,वरना चुप हुआ कि  सुनने को मिलेगा, अमुक के पति ने डायमंड रिंग गिफ्ट किया एनिवर्सरी  पे,अमुक सिंगापूर जा रहें हैं  वेकेशन में ,अमुक ने इम्पोर्टेड कार ली है. और तुर्रा ये कि ये सब शिकायत नहीं बस सूचना है.

बच्चों के बर्थडे पार्टी में हाजिरी जरूरी है,वरना नकारा बाप होने के तमगे से नवाज़ दिया जायेगा. पर अपने घर की पार्टी में ही बिन बुलाये मेहमान सा डोलना पड़ता है,ना तो बच्चों के दोस्त , उसे पहचानते हैं. ना ही बच्चों को खिलाये जाने वाले तरह तरह के गेम्स की कोई जानकारी है उसे. पत्नी कैमरा थमा देती है. पर बाद में फोटो में भी हज़ार मीनमेख एक भी फोटो सही नहीं है. पर फोटो ली कैसे जाए,बच्चे स्थिर रहते हैं क्या, एक मिनट भी?.याद आता है,पापा के हाथों में कैमरा देखते ही वे सब कैसे फ्रीज़ हो जाते थे,सांस लेना नहीं भूलते थे यही क्या कम है.


पति सोचता है,चलो घर के अंदर ये हाल हैं,ऑफिस की पार्टी में तो उसकी इतनी सुन्दर, स्मार्ट,वाक्पटु बीवी को देख सब जल कर राख हो जाएंगे.पर पता चलता है, यह जलने की  प्रक्रिया उसके हिस्से ही आती है. उसके सारे कलीग्स यहाँ तक कि बॉस भी उसकी पत्नी का अटेंशन पाने को आतुर हैं .वह तो बिलकुल साइड लाइन कर दिया गया है.

उसकी माँ आनेवाली है,खुश होता है,चलो अब थोड़ा माँ शायद बहू की आलोचना करे  तो उसे संतुष्टि होगी. पर माँ पर तो आदर्श सास बनने का भूत सवार है. बहू की तारीफ़  करती नहीं अघाती. "बहू  घर का,बच्चों का पूरा ख्याल रखती हैं यहाँ तक कि हमें भी गाड़ी में बिठा शहर घुमा आती है.बेटे को तो फुर्सत ही नहीं." जाते वक़्त पत्नी उन्हें  डेढ़ हज़ार की साड़ी गिफ्ट कर के उसकी सारी उम्मीद ही खतम कर देती है मन होता है कहे, 'माँ मैं तीन हज़ार की साड़ी ला दूंगा,तुम एक बार पारंपरिक सास बन, बहू को सता कर तो देखो.'

और बेचारा पति उफ्फ्फ भी नहीं कर सकता. वरना उसके उदार विचारों वाले, स्त्री स्वतंत्रता के पक्षधर, नारी का सम्मान करने वाले इमेज को जबरदस्त ठेस पहुंचेगी

सोचता है, काश वह किसी गाँव की गोरी को शादी कर ले आता.जिसकी सारी दुनिया बस ,वह ही होता.उसे किसी के  स्वामी बनने के अहम् को कुछ तो संतुष्टि  मिलती .

फिल्म The Wife और महिला लेखन पर बंदिश की कोशिशें

यह संयोग है कि मैंने कल फ़िल्म " The Wife " देखी और उसके बाद ही स्त्री दर्पण पर कार्यक्रम की रेकॉर्डिंग सुनी ,जिसमें सुधा अरोड़ा, मध...