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गुरुवार, 27 अक्टूबर 2011

DDLJ : अच्छा है कि 'राज' हमारी यादों में जिंदा एक फिल्म किरदार है


आशा है,आप सबकी दीपावली...खुशियों से भरी गुजरी होगी...और दीपों के आलोक ने घर के साथ-साथ आपके जीवन को भी रौशन कर दिया होगा.

मुझे भी आज थोड़ी फुरसत मिली और टी.वी. ऑन किया तो देखा "दिल वाले दुल्हनिया ले जायेंगे' फिल्म पर एक प्रोग्राम आ रहा था. करीब सोलह साल पहले, दिवाली के दिन ही यह फिल्म रिलीज़ हुई थी..और तब से मुंबई के एक थियेटर 'मराठा मंदिर' में अब तक इस फिल्म का शो चल रहा है..पब्लिसिटी स्टंट ही लगती है....थियेटर के मालिक और निर्माता-निर्देशक की जरूर मिली-भगत होगी...वरना सोलह साल से रोज कहाँ से कोई दर्शक मिलता होगा?? (वैसे ये मेरे अपने विचार हैं..सच का पता नहीं) ...मन है, एक बार उस थियेटर में जाकर असलियत पता की जाए..पर कोई मेरा साथ नहीं देनेवाला ..और अकेले फिल्म मैं देखती नहीं...इसलिए सच  एक रहस्य ही रह जाएगा :(.  दो साल पहले DDLJ  के चौदह साल पूरे होने पर, 'अजय ब्रहमात्मज जी' ने अपने ब्लॉग 'चवन्नी चैप' पर इस फिल्म से जुड़े अपने अनुभवों पर कुछ लिखने को कहा था..तभी ये पोस्ट लिखी थी...तो आज मौका भी है..और दूसरे ब्लॉग से अपना लिखा यहाँ पोस्ट करने का दस्तूर भी...सो निभा देते हैं रस्म :)


DDLJ  से जुड़ी मेरी यादें कुछ अलग सी हैं. इनमे वह किशोरावस्था वाला अनुभव नहीं है,क्यूंकि मैं वह दहलीज़ पार कर गृहस्थ जीवन में कदम रख चुकी थी. शादी के बाद फिल्में देखना बंद सा हो गया था क्यूंकि पति को बिलकुल शौक नहीं था और दिल्ली में उन दिनों थियेटर जाने का रिवाज़ भी नहीं था.पर अब हम बॉम्बे (हाँ! उस वक़्त बॉम्बे,मुंबई नहीं बना था) में थे और यहाँ लोग बड़े शौक से थियेटर में फिल्में देखा करते थे. एक दिन पति ने ऑफिस से आने के बाद यूँ ही पूछ लिया--'फिल्म देखने चलना है?'(शायद उन्होंने भी ऑफिस में DDLJ की गाथा सुन रखी थी.) मैं तो झट से तैयार हो गयी.पति ने डी.सी.का टिकट लिया क्यूंकि हमारी तरफ वही सबसे अच्छा माना जाता था.जब थियेटर के अन्दर टॉर्चमैन ने टिकट देख सबसे आगेवाली सीट की तरफ इशारा किया तो हम सकते में आ गए.चाहे,मैं कितने ही दिनों बाद थियेटर आई थी.पर आगे वाली सीट पर बैठना मुझे गवारा नहीं था. यहाँ शायद डी.सी.का मतलब स्टाल था. मुझे दरवाजे पर ही ठिठकी देख पति को भी लौटना पड़ा.पर हमारी किस्मत अच्छी थी,हमें बालकनी के टिकट ब्लैक में मिल गए.



फिल्म शुरू हुई तो काजोल की किस्मत से रश्क होने लगा...सिर्फ सहेलियों के साथ लम्बे टूर पर जाना. साथ-साथ मेरी कल्पना के घोडे भी दौड़ने लगे,काश!हमें भी ऐसा मौका मिला होता तो कितना मजा आता. शाहरुख़ खान के राज़ का किरदार तो जैसे दिल मानने को तैयार नहीं--'ऐसे लड़के भी होते हैं? एक अजनबी लड़की का इतना ख्याल रखना ...आरामदायक कमरा छोड़ इतनी ठंड में बाहर सोना..और उस पर से होंठ सी कर उसकी इक्तनी सारी डांट सुनना .......ना,ऐसा तो सिर्फ फिल्मों में ही हो सकता है'.पर जब उनका टूर ख़तम हो गया तो उनके बीच जन्म लेते नए कोमल अहसास बिलकुल सच से लगे. 'तुझे देखा तो ये जाना सनम...."इस गीत के पिक्चाराइजेशन ने भी इस अहसास को बड़ी खूबसूरती से उकेरा है. कम ही रोमांटिक गीतों की पिक्ज़राइज्शन अच्छी लगती है..पर इसकी अच्छी लगी..
फिल्म जब पंजाब में काजोल की शादी की तैयारियों तक पहुंची तो 'राज' का चेहरा किसी के चेहरे के साथ गडमड होने लगा. वह चेहरा था मेरे छोटे भाई 'विवेक' का. बिलकुल 'राज' की तरह ही वह उस शादी के घर में बिलकुल अजनबी था. लेकिन छोटे-बड़े, नौकर-चाकर, नाते-रिश्तेदार सबकी जुबान पर एक ही नाम होता था--'विवेक'
 
विवेक मेरे दूर का रिश्तेदार है,मेरी मौसी के देवर का बेटा...पर है बिलकुल मेरे सगे छोटे भाई सा. मैं छुट्टियों में अपनी मौसी के यहाँ गयी थी,वहीँ विवेक से मुलाक़ात हुई. हम दोनों में अच्छी जम गयी. वह दिन भर मुझे चिढाता रहता और मैं किसी से भी उसका परिचय यूँ करवाती--"ये विवेक हैं,जिनकी विवेक से कभी मुलाक़ात नहीं हुई"

मैं अपने चाचा की बेटी की शादी में गयी थी . विवेक का घर चाचा के घर के बिलकुल करीब था. और वहां विवेक हमलोगों से मिलने आया. बिलकुल 'राज' की तरह वह बाकी लोगों से ऐसे घुल मिल गया जैसे बरसों की जान पहचान हो. मुझे याद नहीं कि किसी ने विवेक को शादी में फोर्मली इनवाइट किया हो पर किसी ने जरूरत भी नहीं समझी,जैसे मान कर चल रहें हों,वह तो आएगा ही. और शादी के दिन सुबह से ही विवेक तैनात. आजकल तो स्टेज,मंडप की साज सज्जा,खाना पीना सब contract पर दे देते हैं पर उन दिनों हलवाई के सामने बैठकर खाना बनवाना,बाज़ार से राशन लाना,मंडप सजाना सब घर के लोग मिलकर ही करते थे. ऐसे में विवेक के दो अतिरिक्त उत्साही हाथ बहुत काम आ रहे थे.भैया का तो वह जैसे दाहिना हाथ ही हो गया था.


DDLJ के राज की तरह वह किसी मकसद के तहत लोगों को खुश नहीं कर रहा था. बल्कि यह उसके स्वभाव में शामिल था. फिल्म की तरह गाना बजाना तो उन दिनों नहीं होता था. पर 'राज' की तरह ही वह जब मौका मिलता बच्चों से घिरा रहता और जहाँ कोई मामा,चाचा,दिख जाते कहता--"बच्चों, बोलो मामा की जय'. बच्चे भी गला फाड़ कर चिल्लाते. फिर वह मामा,चाचा से कहता,"पैसे निकालिए ,ये इतनी जयजयकार कर रहें हैं." वे लोग भी हंसते-हंसते सौ पचास रुपये पकडा देते और वह मुझे थमा देता,'जमा करो,सब मिलकर चाट खाने जायेंगे या सबके लिए चॉकलेट लाया जाएगा."


अमरीश पुरी की तर्ज़ पर  कई बड़े-बूढे उसे यूँ काम करता देख, ऐनक उठा,सीधे ही पूछ लेते."तुम किसके बेटे हो?"और वह मुझे इंगित कर कहता,"मैं इनका छोटा भाई हूँ"..क्या परिचय देता कि मैं लड़की की चाची की बहन के देवर का बेटा हूँ.


शादी के दूसरे दिन, सुबह जब दूल्हा शेव कर तैयार होने लगा तो विवेक पहुँच  गया,"अरे आप दूल्हा हैं,खुद शेव करेंगे?..लाइए मैं शेव कर देता हूँ." और शेव करने के बाद बोला,"अब नेग निकालिए" लड़के ने भी मुस्कुराते हुए कुछ नोट पकडा दिए जो मेरे पास जमा हो गए. इस बार आइसक्रीम खाने के लिए.


मेरे चाचा दिखने में तो अमरीश पुरी की तरह रौबदार नहीं थे पर उनके बच्चों के साथ साथ हमलोग भी उनसे बहुत डरते थे. उस पर से जब बाराती छत पर पंगत में खाना खाने बैठे तो विवेक ने उनकी चप्पलें छुपा दीं. जब चप्पलें ढूंढी जाने लगी तो चाचा की क्रोधाग्नि में भस्म होने का हम सबको पूरा अंदेशा था. हमने विवेक को आगे कर दिया, "तुम्हारा आइडिया था,तुम भुगतो" और वह चाचा से बहस करता रहा,'इनलोगों ने जनवासे में हमें कितना परेशान किया है...समोसे गरम नहीं हैं...थम्स-अप ठंढा नहीं है.,...आइसक्रीम पिघली हुई है...इन्हें भी थोड़ा परेशान होने दीजिये "  पूरी शादी में पहली बार चाचा के चेहरे पर मुस्कान दिखी और उन्होंने विवेक को मनाया,चप्पलें वापस करने को.


विदा होते समय रूबी जोर-जोर से रो रही थी. भाई शायद पूरे साल बहन से झगड़ता हो,पर विदाई के समय बहन को रोते देख उसका दिल दो टूक हो जाता है, भैया ने विवेक को बोला,'तुम कार में साथ में बैठ जाओ,रास्ते में जरा उसे हंसाते हुए जाना." 
विवेक बोला..'अरे मेरे कपड़े नहीं हैं,कोई तैयारी नहीं है,ऐसे कैसे चला जाऊं?"
भैया ने बोला,'कोई बात नहीं,मैं कल लेता आऊंगा' 
और विवेक दुल्हन के साथ दूसरे शहर चला गया,जहाँ पहुँचने में कम से कम ८ घंटे लगते थे.

फिर बरसों बाद विवेक से मिलना हुआ. मेरे मन में उसकी वही शरारती छवि विद्यमान थी.पर १२वीं में पढने वाला वह लड़का, अब धीर गंभीर बैंक ऑफिसर बन चुका था,शादी भी हो गयी थी. बड़े अदब से मिला...मैंने पति से परिचय करवाया."ये विवेक है"(पर दूसरी पंक्ति कि 'जिसकी विवेक से कभी मुलाक़ात नहीं हुई' कहते कहते रुक गयी.) 

अच्छा है कि 'राज' एक फिल्म किरदार है और हमारी यादों में अपने उसी रूप में जिंदा है वरना सोलह साल बाद उसके हाथ में भी  'माऊथ ऑर्गन'की जगह एक लैपटॉप होता और चेहरे पर सदाबहार खिली मुस्कान की जगह होता चिंताओं का रेखाजाल.

बुधवार, 13 अप्रैल 2011

अब प्रस्तुत है मेरे और अरशद अली के कुछ शरारती कारनामे

फर्स्ट अप्रैल  से ही युवाओं की शरारतों के किस्से पोस्ट करने शुरू किए थे...अभी श्रृंखला जारी ही थी कि क्रिकेट में  विश्व कप की जीत और अन्ना हजारे के जन आन्दोलन जैसी महत्वपूर्ण घटनाएं घट गयीं...और सामयिक पोस्ट लिख डाला. पर मूर्ख दिवस भले ही बीत गया...उसके किस्से तो सालो भर लिखे -पढ़े जा सकते हैं . पहले प्रस्तुत है 'अरशद अली' के शरारती कारनामे और अब उनका साथ देने को किसी और का संस्मरण  था नहीं सो खुद के ही लिख डाले :)



स्मार्ट दिखने की कोशिश और फलों के प्यार ने क्या हाल किया अरशद अली का.

 
सपत्नीक अरशद
मुझे याद है जब मै बहुत छोटा था तो तो प्यार से मुझे छोटू बुलाया जाता था ..मुझमे और मेरे बड़े भाई में मात्र एक वर्ष का अंतर था और हम दोनों आस-पड़ोस के सबसे सुन्दर बच्चों में सुमार थे ...पापा जब भी बाज़ार जाते तो हम दोनों के लिए कोई न कोई फल ज़रूर लाते...मगर फलों की पूरी जानकारी उस वक़्त हम दोनों के पास नहीं थी ...मै झोला में कोई फल ढूंढने  में माहिर था..यहाँ तक की इतना उतावला रहता था की पापा के आने का इंतजार करते हुए कई बार मम्मी से पूछ लेता था "पापा कब आयेंगे ".एक बार नाना के घर पर नाना  बाज़ार से सब्जी लेकर जैसे  पहुंचे ...अपनी आदत के अनुसार  मै दौड़ कर उनके झोले में झाँकने लगा....मुझे अच्छे से याद नहीं मगर कोई सब्जी जो मुझे बार बार अपने फल होने का आभास करा रही थी ..क्योंकि वास्तव में नाना जी कोई फल नहीं लाये थे..(उन्हें पता ही  नहीं था कि  उनके नाती फल के दीवाने हैं)..नाना खड़े होकर सारे शैतानियों  को देख रहे थे ..इसी बीच  मै उस  फल जैसी सब्जी को लेकर माँ-माँ चिल्लाते हुए यही पूछा कि  "माँ या खाने का है या पकाने का" ये नाना जी को अचम्भे में डालने के लिए काफी था ...क्योंकि नाना के घर मै, भाई मम्मी पापा के साथ देर रात पहुंचा था और नाना मेरे मुख से पहली चालाकी भरे वाक्य सुन रहे थे ...उसके बाद तो फल खाते खाते मै तंग रहा क्योंकि नाना जी मेरे  फल की दिवानगी को समझ चुके थे.....इसी क्रम में एक बार माँ ओल काट कर किचन में सब्जी बनाने के लिए रखी थी...और मै जैसे किचन में गया तो मुझे वो एपल (कटे हुए सेव ) के जैसा लगा और मै उनसे बिना ये पूछे की "ये खाने का है या पकाने का "दो-तीन टुकड़े  खा लिया .फिर तो पूछिये मत मेरा पूरा चेहरा सूज  गया...मम्मी-पापा आस-पड़ोस सभी परेशान हो गए ...जाने कितने निम्बू के आचार को खिलाया गया..तब  जाकर मुझे आराम मिला ...

दूसरी एक घटना जो मै भुलाए नहीं भूलता ...मेरे पापा बेहद सलीके से रहने के कारण पूरे  आस पड़ोस में सबसे स्मार्ट दीखते थे 
मै और मेरे भाई में हमेशा पापा जितना स्मार्ट दिखने की होड़ लगी रहती थी...मुझे पापा ने इतना प्रभावित कर रखा था की उनके सभी हरकत  पर मै नज़र रखता था जैसे वो कब नहाते है कपडे कैसे पहनते हैं आदि आदि ....पापा रोज़  दिन शेविंग करते थे ..और अभी भी करते हैं ..उन्हें मै दो चार दिनों से नोटिस कर रहा था ..मुझे उनके स्मार्ट दिखने का कारण उनका शेविंग करना लगने लगा ...फिर क्या था एक मौके की तलाश में रहने लगा ...कुछ ही दिनों के बाद मुझे मौका मिल गया ,माँ पड़ोस की आंटियों के साथ बाहर बातें कर रही थी ..मै घर पर अकेले था ...पापा का शेविंग किट उठाया ,रेजर में ब्लेड लोड किया ..शेविंग क्रीम गालों पर लगाया ...और जैसे हीं गाल पर रगडा मुझे वो आवाज़ (किर-किर ) नहीं मिली जो पापा के शेविंग करने पर आती थी...मुझे लगा मुझसे कोई गलती हो गयी है शायद ब्लेड काम नहीं कर रहा ...चेक करने के लिए मैंने रेजर को अपने सर के दाहिने तरफ  के बाल पर रगडा..और रगड़ते हीं कुछ बाल बाहर आ गए ...किसी तरह आईने में अपने चेहरे को देखा और बहुत डर गया...मुझे लगने लगा अब मेरे सर के इस हिस्से पर बाल कभी नहीं आएगा....दौड़ कर पापा के टेबल से गोंद निकाल  कर बाल को सर पर साटने का अथक प्रयास किया मगर विफल   रहा ....धीरे धीरे ये बात मम्मी से पापा ...और बढ़ते बढ़ते पुरे आस पड़ोस में फ़ैल गयी ....पापा बड़े प्यार से समझाते हुए मेरे पुरे बाल को हज़ाम से उतरवा लाये....अब मै पूरा टकला था और कई  महीनों तक पापा जैसा स्मार्ट भी नहीं दिखा ....

जाने ऐसी कितनी और बातें है ...मगर ये दो घटनाएं हमेशा मुझे गुदगुदा जाती हैं ....पापा-मम्मी भी हँसे बिना नहीं रह पाते.
सरिता, मैं, सोना और रेखा


उम्र के हर मोड़ पर की गयी कुछ शरारतें


पिछली बार जब बाल-दिवस पर और इस बार मूर्ख दिवस पर लोगो को परिचर्चा का आमंत्रण  भेजा तो कुछ लोगो का उत्तर आया..."मैं तो बड़ा सीधा- साधा था...पढ़ने-लिखने वाला...अनुशासनबद्ध छात्र...कभी कोई शरारत की ही नहीं." और फिर मैं सोचने लगी...मैं भी पढ़ने में अच्छी ही थी {अब मौके का फायदा उठा कर बता ही दूँ  कि हमेशा क्लास में फर्स्ट आती थी....दो बार स्कॉलरशिप भी मिली :)} कभी अनुशासन  भी नहीं तोडा..पर शरारतें तो खूब कीं....सबने किए होंगे....शायद फर्क ये है कि..मैने याद रखे हैं वे लोग जरूर भूल गए होंगे.

जब पांचवी या छठी कक्षा में थी..तभी मुझे पहली बार फर्स्ट अप्रैल की खासियत पता चली. उन दिनों पापा, लंच टाइम में  ऑफिस से घर खाना खाने आया करते थे. उन्होंने खाना शुरू ही किया था कि पड़ोस वाली आंटी का नौकर साफ़ कपड़ों से बंधी एक  नई मिटटी की हांडी लेकर आया और बोला...कि "उनके गाँव से ताज़ा दही आया है". पापा खुश होकर मम्मी से बोले.."एकदम सही समय पर लाया है जल्दी से कटोरी में डाल, ताज़ा दही ले आओ" पर उस मिटटी की हांडी में था चावल का मांड और सब्जियों के छिलके. मम्मी ने फिर से हांडी के मुहँ पर कपड़ा बाँध 'रामबिहारी' के हाथों दूसरी आंटी के यहाँ भिजवा दिया...और फिर तो वो हांडी शाम तक घर-घर घूमती रही.

बड़ों की ये शरारत देख मुझे भी एक आइडिया आया. उन दिनों क्रीम बिस्किट इतना आम नहीं हुआ था. पापा जब पास के बड़े शहर जाते, तब लेकर आया करते थे. मैने बड़ी सफाई से उन बिस्किट्स का क्रीम निकाल कर उसपर मिटटी का लेप लगा कर रख दिया. शाम को कॉलोनी के सारे बच्चे इकट्ठे होकर खेलते थे और किसी ना किसी के घर पानी पीने के लिए जाया करते. उस शाम मैने उन्हें घर पे क्रीम बिस्किट की बात बतायी और सब बड़े खुश-खुश चले आए...पर एक बाईट लेने के बाद ही उनकी  थू थू करती  हुई  अजीब सी मुखाकृति और अपना पेट पकड़ कर हँसना अब तक याद है...(पता नहीं अब वो रीता,अक्षय, मिथिलेश, सीमा, अनीता, मोहन,प्रतिमा, कहाँ होंगे .)

फिर मैं हॉस्टल में चली आई. हॉस्टल में हमलोगों को  नाश्ते में रोज़ अलग-अलग चीज़ें मिलती थी. उस फर्स्ट अप्रैल को शायद बुधवार था और उस दिन हमें कुरमुरे  और जलेबी मिला करते  थे. मैं किसी काम से बाहर आई तो देखा मेट्रन दी, प्यून को ...जलेबी लाने के लिए पैसे दे रही हैं. प्यून के गेट से बाहर जाते ही मुझे शरारत सूझी और मैने जाकर नाश्ते की घंटी बजा दी . मेस से महाराज और प्रमिला, कामख्या (मेस में काम करने वालीं ) निकल  कर देखने आयीं कि जलेबी तो अभी आई नहीं...घंटी कैसे बज गयी. मैने उन्हें चुप रहने का इशारा करते हुए बताया कि आज पहली तारीख है,..आज के दिन लोगो को बुद्धू  बनाते हैं. सारी लडकियाँ खुश होते हुए बातें करती हुई आ रही थीं कि आज तो जलेबी है नाश्ते में. पर जब इंतज़ार करना पड़ा तो सबने कटोरी चम्मच बजा और मेज़ थपथपा कर इतना शोर मचाया और 'रश्मि जलेबी लाओ...' का इतना नारा  लगाया कि मेट्रन आ गयीं. पर उन्होंने भी sportingly लिया और मुझे डांट नहीं पड़ी.

लेकिन हमारी कॉलेज की लेक्चरर इतनी sporting नहीं थीं. बी.ए. में इंग्लिश के लेक्चर में दो सेक्शन एक साथ क्लास अटेंड करते. पहली मंजिल पर क्लास होती थी. मुझे और मेरी फ्रेंड प्रियदर्शिनी ने एक आइडिया सोचा जिस से लेक्चरर और स्टुडेंट्स दोनों को एक साथ बुद्धू बनाया जाए. हमने  मेज पर चढ़कर  ऐलान कर दिया कि मैडम के पैरों में दर्द है...वो सीढियाँ नहीं चढ़ पाएंगी...इसलिए क्लास नीचे लेंगीं. सारी लडकियाँ गिरती-पड़ती नीचे भागीं. थोड़ी देर बाद हमने पिलर के पीछे से छुपकर देखा, मैडम बड़ा सा रजिस्टर उठाये उपरी मंजिल की तरफ जा रही हैं. पर पूरी क्लास खाली देखते ही उनका पारा चढ़ा गया और लौटती हुई उनकी तेज चाल ने ही उनके मूड का रहस्य  खोल दिया. काफी देर इंतज़ार करने के बाद दो लडकियाँ स्टाफ रूम में देखने  गयीं कि मैडम क्यूँ नहीं आ रहीं? बाद में पता चला,उन्हें बहुत डांट पड़ी...लेकिन हमारी एकता ऐसी थी कि उनलोगों ने हम दोनों का नाम नहीं बताया.

श्रावणी, बबिता, कविता और सुष्मिता
स्कूल-कॉलेज के बाद घर- गृहस्थी में जुट गयी...पर पुरानी  आदत तो आसानी से जाती नहीं. कुछ साल पहले जब टाटा स्काई और डिश टी.वी. का चलन नहीं था..सबके यहाँ केबल टी.वी ही था. यहाँ मुंबई में पाइरेटेड सी..डी. के लिए बहुत ही सख्त नियम हैं. अगर केबल पर नई फिल्म दिखाई गयी तो पुलिस केबल वाले को पकड़ कर ले जाती है. फिर भी हमारा  केबल वाला दर्शकों के डिमांड पर रिस्क लेकर कभी-कभी फ़िल्में दिखा दिया करता था. उन दिनों 'ब्लैक' रिलीज़ ही हुई थी. और हम सब सहेलियों का देखने का मन था.  पास की ही एक बिल्डिंग में मेरी कई  फ्रेंड्स रहती हैं..सोना, रेखा, शशि, सुष्मिता, कविता...मैने ग्यारह बजे के करीब सबको फोन करके कहा कि "टी.वी. ऑन करो....केबल पर  'ब्लैक'  आ रही है " सोना की  बेटी आनंदिता  ने फोन उठाया और ख़ुशी से चीख पड़ी..और अपने भाई को डांटने लगी..."जल्दी चैनल चेंज करो " सुष्मिता ने अफ़सोस से कहा.."मेरा खाना नहीं बना नहीं बना रे अभी तक "...मैने कहा "अरे बाहर से मंगवा लो...ये मौका निकल जाएगा.." हाँ, ऐसा ही  कुछ करुँगी..." कहते फोन रख दिया उसने. शशि की बेटी तो तुरंत फोन पटक कर बगल में अपनी  सहेली को बताने के लिए भाग गयी. कुछ देर बाद सबके  फोन भी आए..."नहीं आ रहा.." मैने कहा.."अभी हटा दिया है ...थोड़ा इंतज़ार करो फिर से लगाएगा"

शाम को वे  सारी सहेलियाँ अपनी बिल्डिंग के गार्डेन में मिलती हैं...जब शाम को मिलीं तो पता चला कि सबके पास ही मेरा फोन  गया था. वे सब मेरे घर पर धावा  बोलने वाली थीं कि अब कहीं से भी सी.डी. मँगा  कर दिखाओ...पर रहम करके मुझे छोड़ दिया.


{ अब बच्चे  और पतिदेव कैसे बाकी  रहते बेवकूफ बनने से....पर उनलोगों को बनाने की जरूरत पड़ती है क्या?? :):) ....लिख तो दिया ये, अब प्रार्थना कर रही हूँ कि ये पंक्तियाँ  वे लोग ना पढ़ें }
अगली पोस्ट में वे अनुभव 

रविवार, 12 दिसंबर 2010

'.गे' का रोल करना क्या कोई अपराध है??

युवराज पाराशर
ज्यादातर लिखने-पढनेवाले लोंग छोटे शहरो से ही आते हैं...और बड़े गर्व से कहते हैं...'मैं तो छोटे शहर का हूँ' या किसी की तारीफ़ में भी कहते हैं..'उसके अंदर एक छोटे शहर का आदमी है'. मैं भी यह जुमला जब-तब अपने महानगर में जन्म-पले बढे दोस्तों के ऊपर फेंक देती हूँ. वे लोंग कहते/कहती भी  हैं, इतने वर्ष  महानगर में रहने के बाद भी खुद को छोटे शहर का कहती हो...मेरा  रेडीमेड जबाब होता है..' ग्रोइंग एज' तो वहीँ गुजरा .पर कभी -कभी छोटे शहर की  कुछ मानसिकता बहुत दुखी कर जाती है और सोचने पर मजबूर  कर देती है क्या छोटे शहर का सब-कुछ उजला-साफ़-धुला-पुंछा  ही है?

कुछ दिनों पहले 'आगरा' शहर की  एक खबर पढ़ी. वहाँ  का एक नवयुवक, मुंबई के ग्लैमर वर्ल्ड में अपनी जगह बनाने आया. उसने प्रतिष्ठित 'Gladrags competition भी जीता. यह प्रतियोगिता सर्वश्रेष्ठ पुरुष मॉडल  के चुनाव के लिए की जाती है. (लड़कियों के लिए सुपर मॉडल  प्रतियोगिता  होती है जिसे सबसे पहले 'विपाशा बसु' ने जीता था और आज वे एक सफल अभिनेत्री  हैं) उसने कई बड़ी कंपनियों  के लिए मॉडलिंग  की परन्तु अंततः फिल्मो में काम करना ही उनका लक्ष्य होता है.
युवराज  पाराशर को भी एक फिल्म मिली, "डोंट नो वाई, ना जाने क्यूँ. " यह फिल्म 'गे रिलेशनशिप' पर आधारित थी. इसी विषय पर एक अंग्रेजी फिल्म बनी थी." ब्रोकबैक माउन्टेन" इस फिल्म को पूरी दुनिया में बहुत सराहा गया. इसे  कई ऑस्कर अवार्ड भी मिले. यह हिंदी फिल्म भी इसी पर आधारित थी.

भारत में 'गे संबंधो' पर बनी यह पहली सीरियस फिल्म थी. 'दोस्ताना' वगैरह में भी इस विषय को लिया गया है,पर वहाँ कॉमेडी है और उसके नायक सचमुच 'गे' नहीं हैं. इस फिल्म को सिडनी फिल्म फेस्टिवल,लंडन फिल्म फेस्टिवल, न्यूयार्क फिल्म फेस्टिवल में दिखाने के लिए चुना गया. सिडनी फिल्म फेस्टिवल में इसे "viewer's choice award ' भी मिला.स्वीडन,आयरलैंड,
नॉर्वे, टर्की, फिलिपिन्स आदि कई  देशों में इसे वहाँ की  भाषा में डब करके दिखाया गया. फिल्म के दोनों हीरो, युवराज पाराशर और कपिल शर्मा को कोलंबिया यूनिवर्सिटी में लेक्चर के लिए भी बुलाया गया.

लेकिन  युवराज पाराशर के घरवालो को उसकी इस सफलता से किंचित भी प्रसन्नता नहीं हुई. युवराज पाराशर  ने पहले तो अपने घरवालो से यह बात छुपाये रखी कि वह एक 'गे' का रोल कर रहा है. पर जब फिल्म रिलीज़ होने के बाद घर वालो को पता चला कि उसने एक 'गे' का रोल किया है तो वह बहुत नाराज़ हुए. अपने बेटे से सारे नाते तोड़ लिए, यही नहीं उसके पिता ने एक कदम आगे जाकर कोर्ट में  'युवराज पाराशर ' को बेदखल भी कर दिया. पिताजी ने अखबार को दिए अपने इंटरव्यू में कहा कि ,"उसकी माँ रो रो कर बेहाल हो गयी है...वो डिप्रेशन में है. रिश्तेदार और पड़ोसी हमारा मजाक उड़ाते हैं. हमारा घर से बाहर निकलना मुश्किल हो गया है. अब कोई लड़की उस से शादी नहीं करेगी. इसीलिए मैं यह कदम उठाने को मजबूर हो गया हूँ" और अपने ही बेटे का परित्याग  कर दिया. वे चाहते तो गर्व से अपने बेटे की सफलता से लोगो को अवगत करवा सकते थे. उन्हें सच्चाई बता सकते थे. बाकी लोगो के मस्तिष्क  पर छाया भ्रम दूर कर सकते थे.


सर्वप्रथम तो उनकी अनुमति से या फिर अपनी मर्जी से ही बेटे ने जब ग्लैमर वर्ल्ड में कदम रख ही दिया तो इस तरह की बातों के लिए उन्हें मानसिक रूप से तैयार रहना चाहिए था. और बेटे को बेदखल करते वक्त उन्होंने यह भी नहीं सोचा, कि उसकी दुनिया वैसे ही कठिन और संघर्ष भरी है. उसपर से उन्होंने उसका एक मानसिक सहारा भी छीन लिया. वह भी बिना किसी अपराध के. एक 'गे लड़के' का रोल करना क्या अपराध की  श्रेणी में आता है?


वैसे भी इस विषय को लेकर लोगो में बहुत भ्रांतियां हैं. मैने कई लोगो को कहते सुना है कि यह सब पश्चिम की देन है..हमारी संस्कृति में यह सब कभी नहीं था. पर अगर नहीं था तो 'समलैंगिक' शब्द कैसे बना? एक बार एक सहेली से बात हो रही थी, वो कैथोलिक है और 'रायपुर' से है. उसका कहना था, कि उसके माता-पिता और उसके सास-ससुर जानते ही नहीं कि इस तरह के सम्बन्ध भी होते हैं या ऐसे शब्द भी हैं. मुझे लगता है,अवगत तो सब हैं पर इसके बारे में बात नहीं करते या फिर ना जानने का दिखावा करते हैं. यानि कि पाखण्ड . इस्मत चुगताई ने शायद १९४० में लेस्बियन संबंधो  पर आधारित एक कहानी लिखी थी 'लिहाफ' उसके लिए उन्हें काफी विरोध सहने पड़े. पर अब 2010 है...और मानसिकता वहीँ की
वहीँ .

जबकि महानगरो में ,कम से कम से कम मुंबई में लोग खुले विचार के हैं. मेरे बेटे को नाटको का शौक  है. उसने एक नाटक फेस्टिवल में भाग लिया था. उसका रोल एक जमूरे का था. और तेल लगे बाल, घुटनों तक की पैंट पहने उसने बेलौस अच्छी एक्टिंग की थी. एक दूसरे नाटक में एक बच्चे ने एक 'गे' का रोल किया था.' गोल्ड मेडल ' उस 'गे' का रोल करनेवाले को मिला. कई लोगो में मतभेद था कि 'जमूरे' ने ज्यादा अच्छी एक्टिंग की थी.माँ होने के नाते स्वाभाविक है मुझे भी ऐसा ही लगता. पर फिर मैने सोचा,एक तो उस लड़के ने ऐसा रोल करने की हिम्मत की, जबकि वह बच्चा सिर्फ सत्रह साल का था. और दूसरे इस से जागरूकता भी बढ़ेगी और लोंग इसे अस्पृश्य नहीं मानेंगे. उसके मेडल रिसीव करते ही हॉल तालियों से गूँज  उठा और इसमें उसके माता-पिता की तालियाँ भी शामिल थीं

 

आखिर ऐसा क्या है कि एक ही तरह की घटना एक जगह तो माता-पिता से तालियाँ दिलवाती हैं और दूसरी तरफ बेदखली? जबकि आज संचार साधनों के माध्यम से पूरा विश्व ही एक गाँव बन गया है. फिर मानसिकता में यह अंतर क्यूँ है? जबकि मेरा निजी अनुभव यह है कि पत्र-पत्रिका, छोटे शहरो वाले लोग ज्यादा पढ़ते हैं. वहाँ हर नुक्कड़ कोने पर पत्रिकाओं की दुकान मिल जायेगी. जबकि यहाँ मुंबई में या तो स्टेशन पर मिलेंगी या कहीं दूर-दराज किसी एक जगह पर. पढने का कतई शौक नहीं है यहाँ के लोगो को. पर वह एक अलग मुद्दा है. छोटे शहरो में आज भी नवयुवक ज्यादातर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में लगे होते हैं और उसके लिए उन्हें पत्रिकाएं पढनी ही पढ़ती हैं. लेकिन जब वहाँ के लोंग , इतनी पत्रिकाएं पढ़ते हैं फिर वो जागरूकता  क्यूँ नहीं है? चीज़ों को स्वीकारने की विशाल हृदयता क्यूँ नहीं है?? आजकल तो टी.वी. के माध्यम से भी हर तरह की  खबर घर-घर पहुँच रही है. फिर भी इस तरह की घटनाएं देखने को मिलती हैं. यह बहुत ही दुखद है.

गुरुवार, 11 नवंबर 2010

सुन्दर पुस्तक पर बनी एक साधारण फिल्म "Eat ,Pray and Love"

ब्लॉग पर लिखना शुरू किया तो अपनी कुछ पसंदीदा किताबों का जिक्र करने की सोची थी. उसमे से ही एक किताब थी "Eat , Pray, and Love " जो एक महिला पत्रकार के सच्चे अनुभवों पर आधारित है. इस किताब पर फिल्म बनने की घोषणा हुई. प्रसिद्द हॉलीवुड अभिनेत्री 'जूलिया रॉबर्ट्स' शूटिंग के लिए भारत आयीं., हिन्दू धर्म से प्रभावित हो हिन्दू धर्म अंगीकार कर लिया और अब वे अपने पति और तीनो बच्चों के साथ नियमित मंदिर जाती हैं और प्रार्थना भी करती हैं. उनके भारत भ्रमण के दौरान स्वामी धरम देव ने  उनके तीनो बच्चों को नए हिन्दू नाम दिए, 'लक्ष्मी', 'गणेश' और 'कृष्ण' . फिल्म पूरी हो कर प्रदर्शित भी हो गयी...और मैने देख  भी ली, अब जाकर उसपर कुछ लिखने का सुयोग जुटा. लेखन और फिल्मांकन , दोनों अलग माध्यम हैं और अक्सर फिल्म, पुस्तक के साथ पूरा न्याय नहीं कर पाती. यहाँ भी यही अनुभव हुआ. किताब तो बहुत अच्छी लगी पर फिल्म साधारण ही रही.

अमेरिका में रहने वाली ,एलिज़ाबेथ गिल्बर्ट , एक सफल पत्रकार है, शादी शुदा है...पर उसे लगता है कि ज़िन्दगी एक बंधी बंधाई लीक पर चल रही है और वह इस रुटिनी ज़िन्दगी से खुश नहीं है. जब वह तलाक की मांग  करती  है तो पति को आश्चर्य होता है कि,'नाम, पैसा, शोहरत सब तो है...उसे और क्या चाहिए .पर वो इतनी दुखी है कि,बस वीकडेज़ में ऑफिस, और वीकेंड्स पर पार्टी...यही उसकी ज़िन्दगी हो कर रह गयी है. इस आत्मा विहीन ज़िन्दगी से तंग आ चुकी है. आखिरकार तलाक ले कर स्वतंत्र  रूप से रहने लगती है. थोड़े समय के लिए एक एक्टर के साथ उसका अफेयर होता है.जो एक भारतीय गुरु (महिला) का बहुत बड़ा भक्त है. एक बार लिज़ को उसका एक दोस्त कहता है पहले तुम अपने पति की तरह दिखती थी,बातें करती थी,कपड़े पहनती थी अब अपने बॉय फ्रेंड की तरह.
तब लिज़ को अहसास होता है कि वह एक चक्रव्यूह से निकल कर  दूसरी में फंस गयी है और उसके स्वयम से साक्षात्कार का मिशन अधूरा ही रह गया है. फिल्म में इस भाग को बहुत अच्छी तरह फिल्माया गया है. लिज़ का कशमकश और उसके पति की हताशा..सब बहुत ही अच्छे ढंग से उभर कर आए हैं.

लिज़ पूरे एक साल  का प्लान बनाती  है,जिसमे चार महीने इटली  में जी भर कर खाने का (EAT ), अगले चार महीने भारत के एक आश्रम  में बिताने का (PRAY ) और फिर अंतिम चार महीने बाली में ज़िन्दगी को भरपूर एन्जॉय करने का (LOVE)

 इतने वर्षों से अपने आपको मेंटेन रखने  के लिए की गयी डायटिंग छोड़, इटली में  वह जगह जगह पिज्जा का लुत्फ़ उठाती है...खूब घूमती है, वहाँ की भाषा सीखती है, स्थानीय लोगों से मिलती  है और एक बेफिक्र ज़िन्दगी जीती है. फिल्म में यह भाग बहुत जल्दी में समेटा गया लगता है.

उसके बाद चार महीने के लिए वह भारत आती हैं. किताब में यह अध्याय बहुत ही रोचक है.(शायद अपने देश का जिक्र होने से मुझे ज्यादा अच्छी लगी) . पर जिन गुरु से मिलने वह आती है..वे उन दिनों न्यूयार्क के दौरे पर गयी होती हैं. फिर भी वह आश्रम में ठहर जाती है .यहाँ, वह सेवा कार्य में जमीन पर पोछा लगाती  है, हाथ से शाकाहारी  दाल-चावल खाती है. और ध्यान लगाती है. एक बार वह गार्डेन में ध्यान लगाती है और मच्छर  काटना शुरू कर देते हैं फिर भी बर्दाश्त कर बैठी  रहती है. करीब ३ घंटे तक वह ध्यान में बैठी रहती है और पाती है कि कुछ देर  बाद वह  मच्छर  काटने के अहसास से परे हो जाती है {अगर मलेरिया वाले  मच्छर ना हों तो लोग आजमा कर देख सकते हैं.:) }आश्रम में सुबह पांच बजे उठाकर प्रार्थना करना होता है और मेडिटेशन केव में ध्यान लगाना होता है. बीच में  कई दिन मौन-व्रत भी रखे जाते हैं. यहीं एक और विदेशी से उसकी मुलाक़ात होती है जो अरबपति था . शारब और जुए की  ज़िन्दगी से तंग आ यहाँ मन की  शान्ति की  खोज में आया था .और अब, बिना,मांस-मदिरा-सिगरेट के सात्विक जीवन जीना सीख गया था.

किताब में तो आश्रम का वर्णन देख एक दूसरी ही तस्वीर बनती है. पर फिल्म में भारत भ्रमण के पहले दृश्य में ही दिखते हैं, कचरा बीनते बच्चे, भिखारी, धूल भरी सड़कें, टैक्सी का रास्ता रोके खड़ी बैलगाड़ी और खिड़की के पास पैसे मांगता बच्चों का झुण्ड. आश्रम भी गन्दा सा था जबकि भारत में कई जगह हरियाली से घिरे साफ़-सुथरे सुन्दर आश्रम हैं. शायद राजस्थान के किसी गाँव में शूटिंग की गयी थी , चटख रंग के कपड़ों में स्त्रियाँ सड़क किनारे कपड़े सुखाती दिखती हैं. पर राजस्थान में अचानक आश्रम में एक हाथी भी आ जाता है. बस, एक सांप और संपेरे की कमी थी, वह भी दिखा देते. भारत का जिक्र हो..और भारतीय शादी ना दिखाएँ...ये तो संभव नहीं. पुस्तक में इसका जिक्र नहीं पर आश्रम के एक भक्त की बेटी की अरेंज्ड मैरेज होती है, लिज़ को इसपर भी आश्चर्य होता है. फिर शादी का नाच-गाना. दक्षिण भारतीय श्रृंगार है वधु का, पर बारात और भांगड़ा भी है साथ में. जूलिया रॉबर्ट्स, हरे रंग की बनारसी साड़ी और बिंदी में बहुत सुन्दर लगी.वो अरबपति विदेशी भी कुरते और साफे में जंच रहें थे.

चार महीने बाद वह बाली में चली आ जाती है. ज़िन्दगी को फिर से महसूस  करने के लिए. बाली की प्राकृतिक सुन्दरता को बहुत खूबसूरती से कैद किया गया है,कैमरे में. (मैं थियेटर में ही सोच  रही थी..हमारे यहाँ भी तो केरल,हिमाचल,सिक्किम आदि हैं...वहाँ आश्रम भी होंगे...वहाँ क्यूँ नहीं की शूटिंग??)  यहाँ, वह एक बहुत पुराने ज्योतिषी से मिलती है.और उसकी पाण्डुलिपि का अंग्रेजी अनुवाद करती है. यही एक होटल के मालिक से उसकी मुलाकात होती है और उसके साथ वह ज़िन्दगी का आकंठ रसास्वादन करती है. लिज़ की दोस्ती एक महिला डॉक्टर से होती है जो तलाकशुदा है और अपने लिए एक परमानेंट छत की तलाश में है. उसकी छः  साल की बेटी नीले रंग का एक टाइल्स सीने से चिपकाए घूमती रहती  है कि अपना घर होगा तो ऐसे ही टाइल्स लगवायेगी.

लिज़ का जन्मदिन आ रहा है और वह दुनिया भर में फैले अपने दोस्तों (अमेरिका के दोस्त, इटली में बने दोस्त..भारत में मिला वह अरबपति)  से आग्रह करती है कि इस बार उसे जन्मदिन पर कोई तोहफा ना देकर. कुछ  राशि उस बच्ची के नाम भेज दें. और एक अच्छी रकम जमा हो जाती है ,जिस से वह उनके लिए एक घर खरीद देती है.

एक साल अपनी  मर्जी से ज़िन्दगी जीकर वो वापस अमेरिका लौट आती है. और वास्तविक जीवन में  , इसके बाद एलिजाबेथ गिल्बर्ट अपने अनुभवों पर आधारित एक किताब लिखती हैं .Eat, Pray and Love  जो पूरे साल  भर अमेरिकन बेस्ट सेलर में नंबर वन पर रहती है

शनिवार, 4 सितंबर 2010

'फिल्म' सी ही रोचक उसे देखने की कहानी

 जब अपनी सहेली के साथ ,'बरसात का एक दिन' गुजारा था...और उन यादों को यहाँ पोस्ट में बाँटा भी था, तभी उस जैसे ही गुजरे एक रोचक दिन की याद हो आई थी, अगली  पोस्ट ही लिखने की सोची थी पर बीच में ये फिल्म उड़ान, राखी,ओणम आ गयी....अभी भी गणपति की तैयारियों में व्यस्त हूँ फिर भी कुछ ना लिखूं तो खालीपन सा महसूस होता है (और कहीं आपलोग इस ब्लॉग का रुख ही ना भूल जाएँ... ये डर भी है :)  )

दो,तीन साल पहले की बात है...दोनों बेटों को स्कूल की तरफ से पिकनिक पर जाना था. उनकी तैयारियाँ चल रही थीं. पतिदेव घर आ चुके थे और अपने प्रिय सोफे  पर विराजमान हो टी.वी. पर नज़रें जमाये बैठे थे. उनकी नज़रों का अनुसरण करते हुए देखा तो पाया उनकी नज़रें 'ऐश्वर्या राय' पर जमी हैं. 'जोधा अकबर' का प्रोमो चल रहा था. मैने मौके का फायदा उठाया और पूछ डाला,"ये फिल्म देखनी है?"
"हूँ"
अब पति लोगों की इस 'हूँ' का अर्थ कुछ भी हो सकता है. या तो ये, कि 'बात सुन ली गयी है' या कि 'सोचेंगे' या 'हाँ' भी हो सकता है. तभी बेटा कुछ पूछने आ गया और मैं भी उसके साथ चली गयी.फिर सब कुछ भूल गयी.

दूसरे दिन दोनों बेटे सुबह साढ़े छः बजे ही चले गए और शाम छः के पहले नहीं आनेवाले थे. पूरे दिन का समय था मेरे पास. उन दिनों ब्लॉग्गिंग भी नहीं करती थी वरना कहानी की एकाध किस्तें ही लिख डालती. ग्यारह बजे के आस-पास एक सहेली का फोन आया जो कुछ महीने पहले काफी दूर शिफ्ट हो गयी थी. उसके बच्चे भी स्कूल पिकनिक पर गए थे.(जनवरी, फ़रवरी  यहाँ पिकनिक का मौसम होता है ). हम दोनों काफी दिनों से नहीं मिले थे. दोनों का एक दूसरे को अपने  घर बुलाने का सिलसिला शुरू हो गया. फिर हमने सोचा, एक चहारदीवारी से निकल दूसरी में जाने का कोई मतलब नहीं है. और अचानक उसने पूछा, "जोधा अकबर देखने  चलें? मुझे यहाँ अभी कम्पनी नहीं मिल रही." और मैं तैयार. जल्दी से अखबार निकाले गए और दोनों के घर से जो थियेटर ,पास था. वहाँ जाना तय किया. पतिदेव को फोन लगाया तो कनेक्ट नहीं हुआ.( हमेशा की तरह किसी मीटिंग में व्यस्त होंगे.) पंद्रह मिनट में तैयार हो हम थियेटर भी पहुँच गए. टिकट भी मिल गयी तो सुकून आया.

हम, काफी दिनों बाद मिले  थे तो जाहिर है फिल्म देखने से ज्यादा हम अपनी बातों में मगन थे. आस-पास बैठे मुंबई के दर्शकों को भी कठिन उर्दू शब्दों से भरी इस फिल्म से ज्यादा रोचक शायद हमारी बातें लग रही थीं .क्यूंकि किसी ने नहीं टोका. कभी अपनी आवाज़ जरूरत से ज्यादा तेज़ पाकर हम खुद ही चुप हो जाते.

फिल्म ख़त्म  होने के बाद, 'बरिस्ता ' का एक कप कॉफी का आमंत्रण ठुकराना संभव नहीं था. राज भाटिया जी और सतीश पंचम जी शायद इस बार हमें महाकंजूस की उपाधि से नवाज़ें क्यूंकि हमने एक ही प्लेट 'सिज़्लिंग ब्राऊनी' शेयर किया. अब असर हो ना हो पर कैलोरी का ध्यान तो रखना ही पड़ता है. वैसे भी  उनलोगों के टोकने पर ही मेरा ध्यान गया कि सचमुच शॉपिंग , फिल्म के साथ हम सहेलियों का खाने -पीने पर बहुत कम ध्यान रहता है. पर हाँ...महीने दो महीने में सब मिलकर लंच के लिए  जरूर जाते हैं और तब सिर्फ लंच ही करते हैं (महिलायें हमेशा organized  होती हैं. मिक्स नहीं करती चीज़ों को :) )

बच्चों के वापस आने से पहले हम अपने अपने घर पहुँच गए. गन्दी यूनिफॉर्म, गंदे जूतों, ढीली टाई,बिखरे बाल और अनछुई टिफिन के साथ बच्चे वापस आए. उनकी उत्साह से भरी बातें सुनने में व्यस्त थी कि पतिदेव ने प्रवेश किया और आते ही अनाउंस किया, "कल की 'जोधा-अकबर'  की चार टिकटें बुक कर दी हैं."

अभी तक तो मैं किसी को बता भी नहीं पायी थी कि मैने यह फिल्म देख ली है. और मैने होठ सी लिए.  लौटते समय, कार में जब मैने बताया कि मैने तो एक दिन पहले ही यह फिल्म देख ली थी. तो  बच्चे और पतिदेव आश्चर्य से मुझे घूरने लगे  कि ' चार घंटे की इतनी स्लो फिल्म ,दो दो बार झेलने की हिम्मत मुझे  कैसे हुई?' अब उन्हें क्या पता कि पहली बार तो बस हम बातें ही करते रहें. कितने सारे डायलॉग  और प्रसंग नज़रों से छूट गए थे,जिन्हें इस बार ध्यान से देखा.

पर इस से भी ज्यादा मजेदार वाकया, मेरी सहेली वैशाली के साथ हुआ. हमारे ग्रुप में बाकी सबने यह फिल्म अपनी बहन..कोई दूसरी सहेली या फिर अपने पति के साथ देख ली थी (ऐश्वर्या के नाम पर कईयों के पति मेहरबान हो गए थे :)). वैशाली ने पास में रहने वाली अपनी ननद से चर्चा की तो उन्होंने भी कहा, "हाँ देखते हैं" पर कुछ निश्चित नहीं हुआ था.

और एक दिन उसकी दिल्ली से आई एक सहेली ने फोन किया और साथ में यह फिल्म देखने का आग्रह किया. वैशाली भी उसके साथ 3 से 6 का शो देखने  चली गयी. अभी फिल्म देखकर निकली ही थी कि उसकी ननद का फोन आया कि उन्होंने , 9 से 12 , नाईट शो की टिकटें बुक कर दी हैं. वैशाली ने  मुझे फोन मिलाया और बताया कि उसने तो कपड़े तक नहीं बदले. घर आकर  कुछ काम निपटाए और उसी ड्रेस में दुबारा चार घंटे की फिल्म देखने चली गयी.पर उसने भी दूसरी बार ही ध्यान से देखा, पहली बार तो गप्पें ही चल रही थीं.

शुक्रवार, 2 अप्रैल 2010

हास्य कलाकार जो सिर्फ पहली अप्रैल को ही नहीं..पूरे साल,हमें हंसाते हैं



यह पोस्ट कल डालने की सोची थी, कल हंसने हंसाने का दिन था. तो सोचा क्यूँ ना अपने प्रिय फिल्म कलाकारों वाली पोस्ट डाल दूँ,जो बरसों से बिना अप्रैल,या दिसंबर देखे हमें हंसाते आए हैं.पर कुछ दिन काफी व्यस्तता भरे थे और देर रात वक़्त मिला तो कहानी की अगली किस्त डालने में ही लगी रही...वहाँ भी जरा देर हुई कि  शिकायतें शुरू हो जाती हैं...आज ही पढ़ लीजिये,भाषा जरा किताबी है,वो इसलिए क्यूंकि किसी अखबार के लिए लिखी गयी थी :)


हमारे देश में मनोरंजन का सबसे सुलभ या कहें तो एकमात्र साधन है,हिंदी फ़िल्में. हिंदी फिल्मों के माध्यम से हम थोड़ी देर को अपनी रोजमर्रा की परेशानी भूल एक अलग ही काल्पनिक दुनिया में पहुँच जाते हैं .और अगर यह काल्पनिक दुनिया हमें हंसी ख़ुशी का तोहफा दे जाए तो इस से बेहतर और क्या होगा? पर फिल्म के माध्यम से कोई सन्देश देना, सोचने पर मजबूर कर देना, रुलाना या डराना  जितना आसान है किसी  के चेहरे पर हंसी की रेखा लाना, उतना ही मुश्किल. लेकिन फिल्म देखने के बाद भी अक्सर वही दृश्य और डायलॉग याद रह जाते हैं और बार बार दुहराए जाते हैं,जिनमे हंसी का पुट छुपा हो.इसलिए हर निर्माता निर्देशक की कोशिश होती है कि वे अपनी फिल्म में कोई हास्य दृश्य और डायलॉग जरूर डालें.क्यूंकि ये फिल्म को और भी आकर्षक बना देते हैं और दर्शकों को टिकट खिड़की तक खींचने में सक्षम होते हैं.

कई बार पूरी फिल्म ही हास्य प्रधान होती है. इन फिल्मों में अभिनय कर उन दृश्यों को साकार करना जिस से आज की हैरान-परेशान जनता के चेहरे पर हंसी लाई जा सके ,कोई आसान काम नहीं. कुछ ऐसे प्रसिद्ध हास्य कलाकार हिंदी फिल्म जगत में अवतरित हुए हैं ,जिन्होंने इस कठिन कार्य  को बखूबी अंजाम दिया है.उनके परदे पर आते ही दर्शकों की तनी हुई नसें ढीली पड़ जाती हैं और अनायास  ही मुस्कान आ जाती है, चेहरे पर ,इस उम्मीद में कि अब हंसी का पिटारा बस खुलने ही वाला है. इनमे कुछ all time ग्रेट कलाकार हैं, 'किशोर कुमार' , 'महमूद', जॉनी  वॉकर, परेश रावल, कदर खान आदि. इन कलाकारों ने दर्शकों को थोड़ी देर अपनी चिंता -परेशानी ताक पर रख खुल कर हंसने पर हमेशा मजबूर किया है.
(किशोर  कुमार  मेरे  सर्वाधिक  प्रिय  हास्य  कलाकारों में से हैं.उनकी कोई भी फिल्म टी.वी. पर आए मैं नहीं छोडती देखना.)


 'किशोर कुमार अपनी बेहतरीन गायकी के लिए मशहूर  हैं. पर वे एक अद्वितीय हास्य कलाकार भी थे. उनकी कॉमिक टाइमिंग लाजबाब थी.वे अपने बेमिसाल अभिनय , डायलॉग डिलीवरी और अपने हाव भाव से अपने किरदार में जान डाल देते थे. और दर्शक उनकी हरकतों पर बस लोट पोट होकर रह जाता था. उनकी कुछ अविस्मरनीय  कॉमेडी फ़िल्में  हैं, चलती का नाम गाड़ी, (१९५८), हाफ टिकट,(१९६२०, पड़ोसन (१९६८), बाप रे बाप (१९५५०, प्यार दीवाना (१९७३), हंगामा (१९७१), बढती का नाम दाढ़ी (१९७४)

महमूद कॉमेडी के सरताज कहे जा सकते हैं. उन्हें परदे पर देखते ही सबके चेहरे खिल उठते थे. क्या बच्चे क्या बूढे, महमूद हर दिल अजीज थे. वे अपने हर किरदार को कुछ इस तरह निभाते थे कि उस  किरदार को  दर्शक हाल से निकलने के बाद भी  भूल नहीं पाते थे.  फिल्मों का एक दौर था. जब महमूद का रोल निश्चित हुआ करता था और उनके लिए अलग से रोल निकाले जाते थे. महमूद भी हमेशा उस किरदार के साथ न्याय करते थे और दर्शकों के दिल पर एक अमिट छाप छोड़ जाते थे. अपने तीस दशक के फिल्म कैरियर  मे महमूद ने करीब ३०० फिल्मों में काम किया. पड़ोसन, कुंवारा बाप, बोम्बे टू गोवा, गरम मसाला, जौहर  महमूद इन हांगकांग , साधू और शैतान, मैं सुन्दर हूँ, इत्यादि.
उन्होंने कुछ  फिल्मे भी निर्देशित कीं जो काफी सफल रहीं.दुश्मन दुनिया का (१९९६), जनता हवलदार (१९७९), एक बाप छः बेटे (१९७८), कुंवारा बाप (१९७४)


(जॉनी वाकर भी मेरे फेवरेट हैं )
जॉनी वाकर के बोलने का स्टाईल उन्हें दूसरे हास्य कलाकारों से अलग कर देता था. उनके बोलने के स्टाईल  की सबसे ज्यादा नक़ल की जाती थी. उनका असली नाम 'बदरुद्दीन जमालुद्दीन क़ाज़ी 'था.वे  एक मिल वर्कर के बेटे थे. उनका नाम उस जमाने के प्रसिद्द स्कॉच व्हिस्की के नाम पर पड़ा और विडंबना ये कि वे शराब छूते भी नहीं थे. वे बहुत ही सरल इंसान थे. जब वे सफलता के शिखर पर थे तब भी उन्होंने विनम्रता का दामन नहीं छोड़ा. करीब ३०० फिल्मों में उन्होंने हास्य प्रधान भूमिका निभाईं . जिनमे प्रमुख गुरुदत्त द्वारा निर्मित और निर्देशित फिल्मे थें.

आज की फिल्मों के सर्वाधिक लोकप्रिय हास्य कलाकार हैं, परेश रावल. आज के दौर की फिल्मों में कॉमेडी उन्हीं से शुरू और उन्ही पे ख़तम  हो जाती है. उनकी डायलौग डिलीवरी, उनके चेहरे के हाव भाव ,दर्शकों को उनका दीवाना बना देते हैं.'हेराफेरी' फिल्म के बाबू राव गणपत का किरदार हो या 'आँखें' के नेत्रहीन बैंक लूटने वाले का ,वे हमेशा दर्शकों को हंसाने में सफल रहें हैं.



कादर खान ने भी अपनी कॉमेडी से दर्शकों को बहुत हंसाया है. अपने डायलॉग बोलने के अंदाज़ और परफेक्ट टाइमिंग के लिए वे मशहूर रहें हैं. गोविंदा के साथ उनकी ट्यूनिंग बहुत ही सफल रही.दोनों ने एक साथ बहुत सारी हिट फिल्मे दी हैं. डेविड धवन की फिल्मों में सलमान खान और गोविन्द के पिता के रूप में निभाये किरदार दर्शकों को ज्यादा पसंद आए.

आजकल तो नायक का रोल करने वाले स्थापित कलाकार भी हास्य कलाकरों की लोकप्रियता देख. कॉमेडी रोल करने का लोभ नहीं संवरण कर पाते.गोविंदा, सलमान खान, अजय देवगन आजकल कई हास्य प्रधान फिल्मों की मुख्य भूमिका में नज़र आते हैं. फिर भी हास्य कलाकारों ने अपनी जगह बरकरार रखी है. उपर्यक्त लिखित  प्रमुख कलाकरों के अलावा कुछ और मशहूर नाम हैं, भगवान दादा, उत्पल दत्त, असरानी, जौहर  महमूद, जगदीप, देवेन वर्मा, शक्ति कपूर, अनुपम खेर, जॉनी लीवर, केश्टो मुखर्जी, जूनियर महमूद, रघुवीर यादव, लक्ष्मीकाँट बेर्डे, सतीश शाह, राजपाल आदि, ये कलाकार दर्शकों का अच्छा मनोरंजन करते आए हैं और कर रहें हैं.


मंगलवार, 16 मार्च 2010

'जब वी मेट' के निर्देशक 'इम्तियाज़ अली' एक फिल्म और बना सकते हैं 'जब वी फेल'


'जब वी मेट' फिल्म युवाओं और बच्चों की ख़ास पसंद है. मुझे भी बहुत अच्छी लगी थी, जाहिर है, कई महिलाओं को भी पसन्द आई होगी. तकरीबन हर उम्र के लोगों ने पसंद किया और इसी वजह से इतनी सुपर डुपर हिट हुई .और इसका सारा श्रेय उसके युवा डाइरेक्टर 'इम्तियाज़ अली' को जाता है.

'जब वी मेट' के पहले भी इम्तियाज़ अली ने एक फिल्म बनायी थी ,'सोचा ना था' यह सुपर हिट तो नहीं हुई पर कई लोगों के फेवरेट फिल्म की फेहरिस्त में शामिल है.(मेरे भी ) बॉलीवुड का रुख करने से पहले, 'इम्तियाज़ अली' सात साल तक टेलिविज़न से जुड़े रहें. जी.टी.वी. के लिए 'कुरुक्षेत्र और स्टार प्लस के लिए 'इम्तहान' सीरियल का निर्देशन किया था.

पर इन सारी कामयाबियों की जड़ में उनकी एक बहुत बड़ी असफलता भी दुबकी हुई है. और उनका जीवन 'असफलता ही सफलता की पहली सीढ़ी है' इस कथन को पूरी तरह चरितार्थ करता है.' बचपन में इम्तियाज़ पढने में बहुत अच्छे थे उन्हें डबल प्रमोशन भी मिला पर टीनेज़ आते ही पढाई की तरफ ध्यान कम हो गया और नवीं कक्षा में वे फेल हो गए. यह उनके ज़िन्दगी का 'टर्निंग पॉइंट' था.

टीनेज में वह बहुत ही शर्मीले और संवेदनशील किशोर थे. संवेदनशील तो अब भी हैं और यह उनकी बनाई फिल्मों से झलक जाता है. उस उम्र में नवीं में फेल हो जाना वो भी को-एड स्कूल में.बहुत बड़ा धक्का था ,उनके लिए. पर उनके माता-पिता ने उनको बहुत सहारा दिया. उनक मन बदलने को उन्हें 'कश्मीर' घुमाने ले गए. यहाँ माता-पिता की भूमिका बहुत अहम् हो जाती है. ऐसी स्थिति में किसी भी माता-पिता को कुछ ऐसे ही कदम उठाने चाहिए ना कि बच्चे को शर्मिंदगी महसूस करवाते रहना चाहिए.

काश्मीर ट्रिप के बावजूद..इम्तियाज़ अंदर से बिलकुल टूट गए थे. यह सोच कि सारे दोस्त अगली क्लास में चले गए होंगे और उन्हें अपने जूनियर के साथ,बैठना पड़ेगा और वे उन्हें एक फेलियर समझेंगे और वैसा ही व्यवहार करेंगे.यह ख़याल ही उन्हें कचोट डालता. स्कूल शुरू होने पर चार दिन तक वे स्कूल नहीं गए. फिर सर झुकाए क्लास में दाखिल हुए. नए क्लास में उनका कोई दोस्त नहीं था.
माता-पिता का सपोर्ट था और उस क्लास में बस एक दोस्त बना उनका.पर इम्तियाज़ को पता था,उन्हें अपनी मदद आप ही करनी है इम्तियाज़ अली ने एक और चीज़ की तरफ इशारा किया है.उनके रिपोर्ट कार्ड में लिख होता था,Imtiaz Ali ( R) यानि Repeater अगर ऐसी परंपरा आज भी कायम है तो स्कूल वालों को इसका ध्यान रखना चाहिए. हमेशा यह अहसास दिलाते रहना कि वह एक 'फेलियर'या 'रिपीटर' है...बच्चे के कोमल मन पर घातक प्रभाव डाल सकता है...

उनका कहना है कि फेल होने पर ही उन्हें समझ में आया कि उन्होंने अपना दिमाग कभी इस्तेमाल ही नहीं किया. एक रूटीन की तरह स्कूल जाते रहें. रूटीन की तरह होमवर्क करते रहें,खेलने जाते रहें. हर काम एक पैटर्न के तहत करते रहें. पर मन से उसे ही जीवन मान कभी कुछ नहीं किया. एक ही कक्षा में दुबारा पढने की मजबूरी ने उन्हें बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर दिया. और वह हर चीज़ को बहुत बारीकी से देखने लगे. अपने काम पर पूरी तरह ध्यान केन्द्रित कर लगन से उसे अंजाम देने लगे. उन्होंने एक बहुत ही सटीक बात कही है, "अगर आप पूरी लगन से कोई काम नहीं करते तो ज़िन्दगी उलझ सी जाती है.जिसे आपको ही सुलझाना पड़ता है. और यही सुलझाने की प्रक्रिया,आपकी ज़िन्दगी की कहानी बन जाती है " इम्तियाज़ ने अपनी ज़िन्दगी को बारीकी से परखा, अपनी कमियों को समझा और फलस्वरूप कॉलेज में तीन साल तक टॉप किया. तीन साल तक 'नेशनल जूनियर बास्केट बाल' टीम के सदस्य रहें. कॉलेज में कई नाटक किये और सबकी खूब प्रशंसा बटोरी.

इम्तियाज़ अली का कहना है कि अगर वे नवीं में फेल नहीं करते तो ज़िन्दगी को कभी इतनी गंभीरता से नहीं लेते,अपनी खूबियों को नहीं पहचान पाते और एक साधारण सी आम ज़िन्दगी जी रहें होते.

इतियाज़ अली की ज़िन्दगी के इस हिस्से के बारे में मैंने इसीलिए लिखा है कि हम भी ये सारी बातें जानते हैं पर जब अपने सामने कोई ऐसा उदाहरण देखते हैं तब जाकर इसे अच्छी तरह समझ पाते हैं कि कैसे कभी कभी असफलता हमारे व्यक्तित्व के पूर्ण विकास में सहायक हो जाती है. इसलिए असफल होने पर ना तो माता-पिता को बहुत चिंता करने की जरूरत है,ना ही बच्चों को परेशान होने की. बल्कि अभिभावकों के स्नेहिल हाथों का सहारा ले वे कदम ब कदम सफलता की सीढियां तय कर सकते हैं.

फिल्म The Wife और महिला लेखन पर बंदिश की कोशिशें

यह संयोग है कि मैंने कल फ़िल्म " The Wife " देखी और उसके बाद ही स्त्री दर्पण पर कार्यक्रम की रेकॉर्डिंग सुनी ,जिसमें सुधा अरोड़ा, मध...