पिछले कुछ दिन काफी व्यस्तता भरे थे , एक तो बच्चों की छुट्टियाँ,उनकी फरमाईशें और उनमें आकाशवाणी से एक कहानी की फरमाईश भी शामिल .कई मित्र नाराज़ भी होंगे...उनलोगों के इतने शौक और मेहनत से लिखे पोस्ट्स भी नहीं देख पायी. ब्लॉगजगत में भी रेडियो से जुड़े कई लोग हैं उन्हें पता होगा..कि कहानी लिखना कोई मुश्किल कार्य नहीं पर उसे दस मिनट की समय सीमा में समेटना महा दुष्कर है.कभी कहानी ग्यारह मिनट की हो जाती है तो कभी नौ मिनट की .खैर राम राम करके निर्धारित समय सीमा में कहानी पूरी हो गयी और कल उसकी रेकॉर्डिंग भी, संपन्न हो गयी.
रेकॉर्डिंग रूम में ही मैंने सुना, प्रोग्राम प्रोड्यूसर अपने असिस्टेंट को निर्देश दे रहें थे कि चार बजे,'कैलाश सेंगर' का इंटरव्यू है, अमुक जन इंटरव्यू लेंगे ,अमुक रेकॉर्डिंग करेंगे ...सब देख लेना. उन्हें कहीं बाहर जाना था. मुझे नाम जाना -पहचाना सा लगा लेकिन स्पष्ट कुछ याद नहीं आ रहा था. बार बार 'कैलाश खेर ' का नाम ही ध्यान में आ जाता.लेकिन वे तो गायक हैं और ये लेखक. पर मेरे 'अवचेतन मन' ने काम करना शुरू कर दिया था. और जैसे ही, मैं बाय कह कर निकलने को हुई, 'अवचेतन मन' ने 'चेतन मन ' को नाम के साथ सारी रूप रेखा थमा दी और मुझे याद आ गया कि बरसों पहले मैंने कैलाश सेंगर जी की एक कहानी 'धर्मयुग' में पढ़ी थी. मुझे बहुत पसंद आई थी और पूरी कहानी भी मुझे याद आ गयी. मैंने उलोगों से पूछा ' मैं मिल सकती हूँ,उनसे" और सबने ऐसी नज़रों से मुझे देखा मानो 'कितना बेवकूफी भरा सवाल हो'. पर प्रकट में बस यही कहा..'हाँ हाँ क्यूँ नहीं'
और हम सब ऑफिस में बैठे उनका इंतज़ार करने लगे. दो युवा अनाउंसर भी थे. वे लोग जितना भी कैलाश जी के बारे में जानते थे,बताने लगे कि कैसे 'धर्मवीर भारती जी' को उनकी कहानियाँ इतनी पसंद आई थीं कि उन्होंने एक ही महीने में उनकी दो कहानियाँ छाप दीं और उन्हें पत्र लिखा कि आप वहाँ क्या कर रहें हैं, मुंबई आकर 'धर्मयुग' के साथ जुड़ जाइए .और तब से वे यहीं हैं. एक ने बताया कि अपनी पत्नी की मृत्यु के बाद काफी दिन तक वे लेखन से दूर रहें. उन्होंने बताया शायद उनकी पत्नी का नाम 'सुमन सरीन' था. मैं फिर से चौंकी 'ओह! तो सुमन सरीन की शादी कैलाश जी से हुई थी'. 'सुमन सरीन 'भी धर्मयुग की एक जानी मानी लेखिका थीं. पर उनके लिए 'थी' शब्द के प्रयोग से मन बहुत आहत भी हुआ. बात 'धर्मयुग' की चली और वे सब मुझसे पूछने लगे आखिर ऐसा क्या था ;धर्मयुग 'में जो पुराने लोग इतना नाम लेते हैं उसका .(अपने लिए ये 'पुराने' शब्द का प्रयोग कितना दंश दे गया,उन्हें क्या पता :( पर सच भी तो था,नयी युवा पीढ़ी ने बस नाम भर सुना है ) मैं और ऑफिस में उपस्थित एक और महिला 'धर्मयुग 'का गुणगान करने लगे तो एक युवक ने बताया कि उसने धर्मयुग' पर phd करने की सोची थी. खुद 'पुष्पा भारती' जी ने मुंबई यूनिवर्सिटी के हिंदी विभागाध्यक्ष को यह सलाह दी थी कि किसी छात्र से इस विषय पर phd करवाएं. लेकिन उक्त युवक ने जिसका नाम संतोष था कई जगह धर्मयुग के पुराने अंकों की खोज की पर उसे नहीं मिले. सिर्फ पुष्प भारती जी के पास ही हैं जिसे उन्होंने अमूल्य धरोहर की तरह संभाल कर रखा है. पुष्पा जी ने संतोष को अपने घर आकर जितनी देर मर्ज़ी हो 'धर्मयुग' पढने की इजाज़त दे दी. अपने सुझाव और मदद की भी पेशकश की. पर धर्मयुग के अंक अपने घर ले जाने की अनुमति नहीं दी.और उनका यह फैसला सही भी था .कोई दूसरा उसका मूल्य नहीं समझ सकता और उतनी हिफाज़त नहीं कर सकता. पर कितने दिन उनकर घर जाकर पढूं...यह सोच संतोष ने phd करने का ख्याल ही छोड़ दिया.
हमारी बातचीत चल ही रही थी कि कैलाश जी आ गए. अक्सर कहानी के नायक से ही, कहानी के लेखक की कल्पना कर ली जाती है. मुझे भी कुछ ऐसा ही लगा था कि दुबले पतले थोड़े निरीह से होंगे पर लम्बे छरहरे काफी प्रभावशाली व्यक्तित्व के धनी थे. पहले तो वे उन लड़कों की तरफ मुखातिब हुए और उनमे से एक ने कहा भी, चार साल पहले आपको एक कवि सम्मलेन में देखा था ,आज रूबरू देख रहा हूँ. फिर मुझसे परिचय करवाया और जब मैंने उन्हें बताया कि आपकी बीस साल पहले पढ़ी कहानी मुझे अब तक याद है तो वे आश्चर्य में डूब गए. कहानी का शीर्षक मुझे नहीं याद था लेकिन कथ्य बताने पर उन्होंने कहा,'जरूर 'रात' कहानी का जिक्र कर रही हैं.फिर उन्होंने पूछा कि इस कहानी पर बहुत अलग अलग प्रतिक्रियाएँ हुई थी. आप अपनी प्रतिक्रिया बताइए."उस कहनी की नायिका 'नीता' ट्रेन से अपनी बेटी के लिए लड़का देखने जा रही है.ट्रेन में ही एक दाढ़ी वाले व्यक्ति को देख,उसे अपने कॉलेज के एक सहपाठी की याद आती है. पर फिर सोचती है वह तो कितना सुदर्शन था यह इतने मरियल से हैं. और उसे कॉलेज के दिन याद आते हैं .उस लड़के का अव्यक्त आकर्षण था उसके प्रति.वह समझती थी.पर पढाई छोड़कर कभी कोई और बात नहीं हुई उनके बीच. ट्रेन में नायिका के पति की तबियत बहुत खराब हो जाती है और वो व्यक्ति उनकी बहुत सहायता करता है. जब वह अपने स्टेशन पर उतरने लगता है तो नायिका को ध्यान आता है कि उन्होंने तो उन सज्जन का नाम,परिचय तक नहीं पूछा.पूछने पर वे कहते हैं,"इसी जनम में दुबारा अपना परिचय देना अच्छा नहीं लगता " कैलाश जी जानना चाहते थे कि क्या पाठक को शुरू में ही पता चल जाता है कि वह दाढ़ीवाला व्यक्ति 'नायक' है? पर मुझे इतना नहीं याद था. मैंने कबूल लिया और साथ में स्टुपिड की तरह यह भी कह दिया कि 'मैंने आपकी कोई दूसरी कहानी नहीं पढ़ी' (सच, स्टुपिडीटी के लिए कोई उम्र तय नहीं है ) वे ओह! कह कर चुप हो गए पर मैंने उसकी क्षतिपूर्ति यह कह कर कर दी कि वह कहानी अब तक मेरे पास है. ( बचपन की मेरी आदत थी , जो भी कहानी अच्छी लगती उसके पन्ने अलग कर मैं मम्मी के बड़े से काले बक्से में छुपा देती,ताकि मेरे होस्टल चले जाने के बाद, गुम ना हो जाए. धीरे धीरे मेरा खज़ाना समृद्ध होता गया. उसमे वो कामना चंद्रा (कामना चंद्रा, की बड़ी बेटी,'विधु विनोद चोपड़ा' की पत्नी हैं. तनूजा चन्द्र उनकी छोटी बेटी हैं ) की वो कहानी भी है ,जिसपर चांदनी फिल्म बनी थी...कुछ साल पहले ,माँ ने कहा क्या करना है, ये इतने सारे कटिंग्स का ,कहीं दीमक ना लग जाएँ और मैं वो सब उठा कर यहाँ मुंबई ले आई ) यह सुन तो कैलाश जी को और भी आश्चर्य हुआ.(ख़ुशी भी हुई होगी,पक्का)
अब तक कमरे के और लोग उपेक्षित से महसूस करने लगे थे. एक युवक ने बातचीत में शामिल होने की गरज से जरा जोर से कहा 'सर आपने सुमन जी के निधन के बाद लिखना छोड़ ही दिया था'. उन्होंने कहा, 'हाँ ,वे पांच साल बड़े कठिन थे. उन्हें कोई ऐसी बीमारी थी जो करोड़ों में किसी एक को ही होती है'. मेरे यह बताने पर कि सुमन जी तो पटना की थीं और उनका लिखा भी मैंने काफी पढ़ा है फिर से थोड़ा चौंके वो. मैंने कहा जरूर आपलोग धर्मयुग में ही मिले होंगे.उन्होंने बताया कि 'धर्मयुग' में सह संपादक के लिए ढाई हज़ार आवेदन पत्र में से सिर्फ दो लोगों का चुनाव हुआ था,उनका और सुमन जी का. मैंने सोचा एक 'सुमन जी' का ही हुआ होगा. धर्मवीर भारती जी ने आपको तो पहले ही चुन लिया था. फिर से बात धर्मयुग की तरफ मुड़ती देख, अब असिस्टेंट का पेशेंस खत्म हो चुका था. वह राग अलापने लगा,'सर रेकॉर्डिंग' और बात सही भी थी. वे रेकॉर्डिंग के लिए ही आए थे,गप्प गोष्ठी के लिए तो नहीं. कैलाश जी ने बार बार कहा,'आपसे मिलकर बहुत अच्छा लगा'
क्यूँ नहीं अच्छा लगेगा...बरसों बाद कोई पाठक आपकी कहानी पात्रों के नाम और मय डायलॉग के याद रखे तो अच्छा तो लगना ही चाहिए.
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