यह शिखा की पोस्ट का एक्सटेंशन भर है. विदेशों में वृद्धों के अकेलेपन की बातें पढ़ ,अपने देश में वृद्धों की अवस्था का ख्याल आ गया. विदेशों में बच्चों के व्यस्क होते ही ,उनसे अपना घर अलग बनाने की अपेक्षा की जाती है. हाल में ही एक अंग्रेजी फिल्म देखी,जिसमे एक लड़के का सबलोग बहुत मजाक उड़ाते हैं और हर लड़की, उसके साथ शादी के लिए सिर्फ इसलिए इनकार कर देती है क्यूंकि वह अब तक अपने माता-पिता के साथ रहता है. उसे अपने पैरेंट्स के साथ रहना पसंद है पर माता-पिता चिंतित होकर एक काउंसलर हायर करते हैं. जो उस लड़के के साथ प्रेम का अभिनय कर उसे ,अकेले अपना घर बनाने पर मजबूर कर दे. वहाँ इस तरह की प्रथा है फिर भी, बुढापे में अकेलापन खलता है क्यूंकि युवावस्था तो पार्टी, डांस, बदलते पार्टनर,घूमने फिरने,बियर में कट जाती है. पर बुढापे में शरीर साथ नहीं देता और अगर उसपर जीवनसाथी भी साथ छोड़ दे तो अकेले ज़िन्दगी काटनी मुश्किल हो जाती है.
वहाँ जब अकेले रहने की आदत के बावजूद बुढापे में अकेलेपन से त्रस्त रहते हैं तो हमारे देश में वृद्धों के लिए अकेले दिन बिताना कितना कष्टदायक है जब उनका बचपन और युवावस्था तो भरे-पूरे परिवार के बीच गुजरा हो.
पहले संयुक्त परिवार की परम्परा थी. कृषि ही जीवन-यापन का साधन था. जो कि एक सामूहिक प्रयास है. घर के हर सदस्य को अपना योगदान देना पड़ता है.अक्सर जमीन घर के सबसे बुजुर्ग व्यक्ति के नाम ही होती थी. और वो निर्विवाद रूप से स्वतः ही घर के मुखिया होते थे.इसलिए उनकी उपेक्षा नहीं की जा सकती थी. घरेलू कामों में उनकी पत्नी का वर्चस्व होता था.
पर घर से बाहर जाकर नौकरी करने के चलन के साथ ही संयुक्त परिवार टूटने लगे और रिश्तों में भी विघटन शुरू हो गया. गाँव में बड़े-बूढे अकेले पड़ते गए और बच्चे शहर में बसने लगे. अक्सर शहर में रहनेवाले माता-पिता के भी बच्चे नौकरी के लिए दूसरे शहर चले जाते हैं और जो लोग एक शहर में रहते भी हैं वे भी साथ नहीं रहते. अक्सर बेटे-बहू, माता-पिता के साथ रहना पसंद नहीं करते.या कई बार माता-पिता को ही अपनी स्वतंत्र ज़िन्दगी में एक खलल सा लगता है.
हमारी बिल्डिंग में एक नवयुवक ने फ़्लैट ख़रीदा और अपने माता-पिता के साथ रहने आ गया. बड़े मन से उसने अपने फ़्लैट की फर्निशिंग करवाई. मौड्यूलर किचन ...आधुनिक फर्नीचर..ए.सी...आराम और सुविधा की हर एक चीज़ जुटाई..हमलोग देखते और कहते भी, 'आखिर घर को कितने सजाने संवारने के बाद शादी करेगा.' और दो साल बाद घर पूरी तरह सेट कर लेने के बाद उसने शादी की. एक साल के अंदर ही बेरहम नियति ने अपने रंग दिखा दिए और पिता अचानक दिल का दौरा पड़ने से चल बसे.
अब घर में उसकी माँ और बेटा, बहू थे. बहू भी नौकरी वाली थी.पर पता नहीं ,सास-बहू दोनों के बीच क्या हुआ ,छः महीने में ही वह किराए का घर ले, थोड़ी दूर रहने चला गया. बेटा,बिना नागा रोज शाम को माँ से मिलने आता है. अब तो एक प्यारी सी बेटी का पिता है.उसे भी लेकर आता है पर बहू नहीं आती. सारा दिन उसकी माँ अकेले रहती हैं. कहीं भी नहीं आती-जातीं. पता नहीं कैसे दिन गुजारती हैं? उनकी ही आँखों का जिक्र मैने अपनी, इस कविता की भूमिका में किया था. आखिर ऐसा क्या हो गया कि सामंजस्य नहीं हो पाया? बहू सुबह आठ बजे के गए रात के आठ बजे आती थी. सिर्फ वीकेंड्स ही बिताने थे साथ..वह भी नहीं जमा. किसकी गलती ,कौन दोषी...नहीं कहा जा सकता. पर अकेलापन तो इन बुजुर्ग महिला के हिस्से ही आया. बेटी को बहू ,क्रेच में कहीं छोडती है. अगर दोनों साथ रहतीं तो उसकी देख-रेख में उनका दिन अच्छा व्यतीत हो जाता.
एक पहचान का युवक भी अपने माता-पिता का इकलौता बेटा है. अच्छी नौकरी में है. फ़्लैट खरीद लिया है. चीज़ें भी जुटा ली हैं. शादी के प्रपोज़ल्स आ रहें हैं.पर बात एंगेजमेंट तक आते आते रह जाती है.लडकियाँ कुछ दिन बात-चीत करने के बाद इशारे में कह देती हैं कि सास -ससुर के साथ रहना गवारा नहीं होगा.आगे पता नहीं कोई लड़की तैयार हो भी जाए तो फिर उक्त युवक जैसी समस्या ना आ जाए.
पर कई बार बुजुर्ग भी अपनी ज़िन्दगी अकेले बिताना चाहते हैं. पोते-पोतियों की देखभाल को एक अतिरिक्त भार की तरह समझते हैं. उन्हें लगता है, अपने बच्चों की देख-भाल की,घर संभाले अब क्या सारी ज़िन्दगी यही करें. एक आंटी जी हैं,पटना में. बेटा, बड़े मनुहार-प्यार से माँ को अपने पास ले गया. बेटे- बहू..पोते पोती सब इज्जत-प्यार देते थे.पर कहने लगीं.वहाँ वे बस एक केयर टेकर जैसी बन कर रह गयी थीं.(बहू भी नौकरी पर जाती थी ) पोते-पोतियों को उनके हाथ का बना खाना अच्छा लगता तो सारा समय किचन में ही बीतता था.अब बड़े से बंगले में अकेली रहती हैं. सत्संग में जाती हैं. अक्सर गायत्री पूजा में शामिल होती हैं और अपनी मर्जी से अपने दिन बिता रही हैं.
एक पोस्ट (गीले कागज़ से रिश्ते...लिखना भी मुश्किल, जलाना भी मुश्किल)पहले भी मैने लिखी थी कि सास की बहू से नहीं जमी और बहू अलग मकान लेकर अपने बच्चों के साथ रहने लगी. दोनों पति-पत्नी अकेले दिन गुजार रहें थे.घर में शान्ति छाई रहती. .सास की मृत्यु के बाद ससुर की देखभाल के लिए बहू वापस इस घर में आकर रहने लगी और घर में रौनक हो गयी. दिन भर बच्चों की चहल-पहल से घर गुलज़ार लगता. मुझे ऐसा लगता था पर अब सोचती हूँ,क्या पता उन्हें अपना शांतिपूर्ण जीवन ही ज्यादा पसंद हो.
कई बार यह भी देखा है कि शुरू में सास ने एक आदर्श सास की इमेज के प्रयास मे बहू को इतना लाड़-प्यार दिया कि बहू ने घबरा कर किनारा कर लिया. एक आंटी जी,बहू को बेटी से भी बढ़कर मानतीं. उसे तरह -तरह के टिफिन बना कर देतीं. ऑफिस से आने पर कोई काम नहीं करने देतीं. सारे रिश्तेदारों में उसकी बड़ाई करती नहीं थकतीं. फिर पता नहीं क्या हुआ... कुछ दिनों बाद बहू से बात-चीत भी नहीं रही. और जाहिर है बहू अलग रहने चली गयी और आना-जाना भी नहीं रहा.
एक किसी मनोवैज्ञानिक द्वारा लिखे आलेख में पढ़ा था कि ऐसा करने पर बहू के अवचेतन मन में लगने लगता है कि उसकी सास उसकी माँ की जगह लेने की कोशिश कर रही हैं. जबकि उसकी अपनी माँ तो है ही. और इसलिए उसका मन विद्रोह कर उठता है.
यह अजीब दुविधा की स्थिति है. बिलकुल कैच 22 सिचुएशन. प्यार दो तो मुसीबत,ना दो तो मुसीबत. ये रिश्ते तलवार की धार पर चलने के समान हैं. जरा सी गफलत हुई और रिश्ते लहू-लुहान हो उठे, कई बार तो क़त्ल ही हो जाता है रिश्तों का.
यहाँ महानगरों में एक चलन देख रही हूँ. अक्सर बेटे या बेटियाँ माता-पिता का पुराना घर बेच कर , उन्हें अपनी बिल्डिंग में या बिल्डिंग के पास ही एक छोटे से फ़्लैट में शिफ्ट करवा दे रहें . दोनों पक्ष की आज़ादी भी बनी रहती है और जरूरत पड़ने पर माता-पिता की भी देखभाल हो जाती है और बेटे-बेटियां भी जरूरत पड़ने पर बच्चों को अकेला घर मे छोड़ने के बजाय माता-पिता के पास छोड़ देते हैं यह लिखते हुए रेखा और राज-बब्बर की फिल्म 'संसार' (शायद यही सही नाम है ) याद हो आई जिसमे कुछ ऐसा ही हल बताया गया था.
पर यह सब तो मध्यमवर्गीय परिवार की बातें हैं जहाँ कम से कम बुजुर्गों को आर्थिक और शारीरिक कष्ट नहीं झेलना पड़ता (अधिकतर, वरना ..अपवाद तो यहाँ भी हैं,) लेकिन निम्न वर्ग में तो रिश्तों का बहुत ही क्रूर रूप देखने को मिलता है.वहाँ लोकलाज की भावना भी नहीं रहती.आज ही वंदना दुबे अवस्थी की यह पोस्ट पढ़, रिश्तों पर से विश्वास ही उठता सा लगा.
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शुक्रवार, 17 सितंबर 2010
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