गुरुवार, 27 जून 2013

मुस्कुराने का कर्ज़

आज Zee tv पर एक सीरियल या कहें रियलिटी शो देख रही थी Connected HUM TUM ...ये वही शो है ,जो मुझे भी ऑफर हुई  थी और मैंने मना कर दिया था {अब ये बताने से क्यूँ चूकें हम :)} खैर, हमें अपने निर्णय पर अफ़सोस  तो पहले भी नहीं था और अब ये शो देखकर तो जैसे एक सुकून की सांस ले ली ,यूँ कैमरे का हर वक़्त अपनी ज़िन्दगी में झाँक कर देखना मंजूर नहीं था, मुझे . वैसे, जैसा मुझे बार बार आश्वस्त करने की कोशिश की थी उन्होंने... सच में इस शो में कोई मिर्च मिसाले नहीं हैं बल्कि औरतों के मन में क्या चलता रहता है ,वे क्या सोचती हैं, उनकी ज़िन्दगी क्या है ,किसी सिचुएशन पर कैसे रिएक्ट करती हैं...यही सब है. 

साथ में इस शो के होस्ट 'अभय देओल ' पुरुषों के व्यक्तित्व का भी विश्लेषण करते जाते हैं.  एक मजेदार बात कही उन्होंने कि "पुरुषों की 'सेलेक्टिव हियरिंग पावर' होती है यानी अगर उनसे तीन वाक्य कहा जाए तो वे उसमें से दो शब्द अपने मतलब का या अपने मन से चुन कर बस उसी पर प्रतिक्रया देंगे " और उसी शो में से कुछ दृश्य रीपीट कर वे, इसे दिखाते भी हैं .खैर ये उस शो के होस्ट का कहना है, गलत भी हो सकता है सही भी...हमें स्त्री-पुरुष के विवाद में नहीं पड़ना ..आज देखा और याद रह गया सो जिक्र कर दिया (अब ब्लॉग तो है ही इसीलिए ) 

मैं, इस शो के विषय में नहीं..पर इस शो के बहाने कुछ और चर्चा करना चाहती थी . इस शो की एक प्रतिभागी पल्लवी बर्मन है . सुन्दर है...स्मार्ट है..एक कंपनी में ऊँचे पद पर काम करती है. (और बहुत मेहनत से काम करती है ,अक्सर रात के दस बज जाते हैं, काम ख़त्म करते ) शो की शुरुआत में वो एक चहकती हुई, ज़िन्दगी से भरपूर लड़की थी जो अपने प्रेम विवाह  को लेकर बहुत उत्साहित थी. हर वक़्त मुस्कुराती रहती थी और अपनी शादी के लिए  जेवर, लहंगे, कपड़े की ही शॉपिंग में व्यस्त रहती.

अब शादी हो गयी है . रोज ऑफिस से घर आते वक़्त गिल्ट महसूस करती है कि 'रात के दस बज गए, बाकी सबलोग घर पर आ गए हैं ,मुझे आज भी देर हो गयी .' 

पति अक्सर देर रात तक अपने दोस्तों और उनकी पत्नियों के साथ पार्टी में शरीक होता है, वीकेंड्स पर लोनावाला, खोपोली ,फार्महाउस पर  जाता है और पल्लवी से पूछे बिना, उसकी तरफ से भी 'हाँ' कर देता है. सारे दिन ऑफिस में थकी पल्लवी मन न होते  हुए भी पति के साथ देर रात पार्टी में जाती है कि कहीं उसे बुरा न लगे .

पति और ससुर का बिजनेस है ...घर  में ऐशो आराम की चीज़ें , नौकर चाकर सब हैं .फिर भी वो घर की थोड़ी साफ़-सफाई करती है और पूरे वक़्त कोशिश में लगी रहती है कि कोई ये न कह दे कि वो नौकरी के चक्कर में घर का अच्छी  तरह ध्यान नहीं रख रही. ससुर को खुश करने के लिए उनके बर्थडे पर एक शानदार पार्टी का आयोजन करती है, सबको आमंत्रित कर लेती है . ढेर सारी शॉपिंग करती है ,पर जन्मदिन वाले दिन की सुबह ससुर बताते हैं कि ,वे कल रात डॉक्टर के पास गए थे और डॉक्टर ने उन्हें परहेज करने के लिए कहा  है. पार्टी कैंसल हो जाती है .

पल्लवी के पति और ससुर ,पल्लवी से अपनी नौकरी छोड़, उनका बिजनेस ज्वाइन करने के लिए कहते हैं. पल्लवी दुविधा में है कि अपनी नौकरी छोड़े या नहीं? पति उसके तुरंत 'हाँ' न कहने से नाराज़ है, और कहता है 'वो पैसों के पीछे भाग  रही है ' दोनों में तनाव बढ़ता जा रहा है, और अब हर वक़्त पल्लवी की आँखें आंसू भरी होती हैं.

ये हंसती- मुस्कुराती पल्लवी के जीवन को क्या हो गया ? और ये सिर्फ अकेली पल्लवी की ही कहानी नहीं है. मैं अपने बच्चों को लेकर एक डॉक्टर के पास जाती थी. वो डॉक्टर भी बहुत खुशमिजाज़ थी. हर वक़्त कलफ लगी कॉटन की कड़क साड़ी पहने अपनी  उजली हंसी के साथ मिलती.  कुछ दिनों बाद उसकी शादी हुई...वो थकी थकी सी बुझी बुझी सी रहने लगी. चेहरे की  उदासी ,उसके कपड़ों तक फ़ैल गयी थी. कभी कभी बुझी सी मुस्कान लिए कह भी देती.."शादी नहीं करनी चाहिए " उसे क्या परेशानी थी ,यह तो नहीं पता पर कुछ तो था, जिसने उसकी हंसी  गुम कर दी. 

पर इन सब परेशानी की वजह क्या ये खुद नहीं  है? क्यूँ ये अपने को सुपरवुमैन समझती  हैं? क्यूँ इस कोशिश में रहती हैं कि वे खुद को एक अच्छी बहू,एक अच्छी गृहणी, एक अच्छी पत्नी , एक अच्छी माँ साबित करें . जबकि उनके पास भी वही दो हाथ,दो पैर और दिन के चौबीस घंटे होते हैं. क्यूँ वे सबको खुश रखना चाहती हैं और नहीं रख पातीं तो फिर उदास रहने लगती हैं. 

वैसे नए परिवेश, नए घर, नए व्यक्ति के साथ ज़िन्दगी शुरू करने में कुछ समझौते तो करने ही पड़ेंगे ,पर ये समझौते ऐसे तो न हों कि इनकी हंसी ख़ुशी ही उसकी भेंट चढ़ जाए . पर लगता है, अगली दो तीन पीढ़ी की स्त्रियों को ये कुर्बानी देनी ही पड़ेगी. आज भी किसी भी स्त्री से सबसे पहले एक अच्छी  गृहणी, बहू , पत्नी, माँ बनने की ही अपेक्षा  की जाती है .इसके साथ ही वो एक सफल डॉक्टर, इंजिनियर, टीचर, अफसर  हो तो सोने पर सुहागा. वरना 'खरा सोना' तो उनका 'घरेलूपन' ही है. 

 कई बार सुनने में आता है, इतनी सफल  डॉक्टर/टीचर/अफसर  है पर सास-ससुर को देखते ही सर पर पल्लू रख कर पैर छूती है. पति से पूछे बगैर कोई काम नहीं करती, त्योहारों पर पकवान  खुद बनाती है ...आदि आदि . बड़ों को इज्जत देना , घर की  देखभाल करना प्रशंसनीय  है ..पर इस बात को इतना महत्व दिया जाता है कि उसके तले उनका दुसरा और असली रूप गौण हो जाता है. और अगर स्त्रियाँ ये सब न करें तो सुनने को मिलेगा, क्या फायदा  इस पढ़ाई-लिखाई का,अफसरी का ..घर पर तो ध्यान ही नहीं देती . 
यही वजह है कि आजकल की नौकरीपेशा महिलायें इस कदर पिस रही हैं. हर मोर्चे पर खुद को अव्वल साबित करने के चक्कर में उनका वजूद टुकड़े टुकड़े हुआ जा रहा है.
बस, अब आने वाली पीढियां उनका हाल देख यही तय करें कि अपनी ज़िन्दगी, वे अपनी मर्जी, अपनी ख़ुशी से जियेंगी , उन्हें किसी के सामने खुद को साबित करने की जरूरत नहीं है. उनके  पास भी सबकी तरह दो हाथ ,दो पैर और एक दिमाग है और वो दिमाग किसी मायने में कम नहीं है...अपने चौबीस घंटे वे  कैसे बिताएं ,ये वे खुद तय करेंगी. उनके होठों की मुस्कराहट कोई कर्ज़ नहीं , जिसे वे किस्तों में चुकाती रहें .

गुरुवार, 20 जून 2013

ख़ूबसूरत होने की सज़ा

ओमर बोरकन अल गाला 
यह खबर तो पुरानी हो गयी है, पर इसी खबर के बहाने कुछ लिखना चाह  रही थी, पर आजकल समय ज़रा रूठा रूठा सा है, हमसे और हमें उसे मनाने का भी समय नहीं मिल रहा :(
 खैर वैसे भी बहुत लोगों को इस खबर की खबर भी नहीं होगी. क्यूंकि यह  खबर बीस बाईस वर्ष की अंग्रेजीदां लड़कियों के बीच ज्यादा मशहूर हुई . 
"ओमर बोरकन अल गाला " का नाम अंतर्राष्ट्रीय  स्तर पर बहुत  प्रसिद्द हुआ .वे विशव के 'पोस्टर बॉय' बन गए . जब उन्हें "Jenadrivah Heritage & Cultural Festival in Riyadh. " में भाग लेने से रोक दिया गया .(  मीनाक्षी जी एवं दिगंबर नासवा जी जरूर अवगत होंगे इस खबर से ) 
पर उन्हें क्यूँ नहीं भाग लेने दिया गया ?? क्यूंकि वे बहुत ज्यादा ख़ूबसूरत हैं . हालांकि अगर वे इस फेस्टिवल में भाग ले ही लेते तो क्या हो जाता ? क्या लड़कियां/औरतें उनपर अटैक कर देतीं ??(वो भी सऊदी में ??)
पर इस तरह उस फेस्टिवल से निकाले जाने पर उन्हें फायदा ही  हुआ. नेट पर यह खबर आग की तरह फैली और वे रातों रात स्टार बन गए ...धडाधड उनकी तस्वीरें डाउनलोड की जाने लगीं. You tube पर उनके इंटरव्यू को लाखों हिट्स मिले. उनका एक फेसबुक पेज भी बन गया जिसे वन मिलियन लोगों ने लाइक किया . उन्हें स्त्रियों की प्रगति से सम्बंधित एक कैलेण्डर के लिए साइन कर लिया गया ,एक फिल्म में काम करने का मौक़ा मिल गया और जन्मदिन पर एक अनाम प्रशंसिका ने बिना सामने आये ,एक मर्सिडीज़ भी गिफ्ट कर दी. 

खैर यहाँ तो ख़ूबसूरत होने की सज़ा  एक वरदान ही साबित हुई. पर अक्सर ऐसा नहीं होता. सुन्दरता एक अभिशाप ही बन जाती है. या फिर कहें सुन्दरता एक दुधारी तलवार की तरह है. लोगों का अटेंशन ..उनकी प्रशंसा भी खूब मिलती है पर लोग प्रशंसा के साथ थोड़ी इर्ष्या का भी  मिला-जुला भाव रखते हैं. लेकिन  उसके दिल का हाल कोई नहीं जानता. 

मेरे हॉस्टल में एक बहुत ही सुन्दर लड़की थी . हम सब छुट्टियों में घर जाने को उत्सुक होते पर वो खुश तो होती साथ ही थोड़ी दुखी भी. कारण ??...उसकी जॉइंट फैमिली थी. एक तो वह बहुत सुन्दर थी, दूसरे  उसके  पिता उसे हॉस्टल में रखकर पढ़ा रहे थे. उसके  चाचा  की लडकियां, पूरे समय उसपर व्यंग्य  करती रहतीं, "अरे तुम्हे क्या तैयार होना है..तुम तो ऐसे ही अच्छी  लगोगी.." कपड़े चुनते वक्त भी उसकी बारी बाद में आती.."तुम पर तो कुछ भी अच्छा लगेगा ...हमें सोचना पड़ता है " वो कहती , "हर वक्त खुद को नीचा दिखाना पड़ता है....उनलोगों को खुश करने की कोशिश करनी पड़ती है, यह दिखाना पड़ता है कि हम तो कुछ भी नहीं."

एक सहेली है, जिसे कॉलेज में ब्यूटी क्वीन  कहा जाता था . अभी वो बी.ए. में ही थी, पर उसकी माँ को सुनना पड़ता ," आपको क्या फ़िक्र करनी...बेटी तो आपकी सुन्दर है...घर बैठे रिश्ता आ जायेगा " और जब उसने बी. ए. कर लिया तो माता-पिता को कोई जल्दी नहीं थी पर पूरे महल्ले के पेट में दर्द , "आपकी बेटी तो इतनी सुन्दर है इसकी शादी क्यूँ नहीं हो रही??" 

शादी के बाद के भी उसके अनुभव बहुत अच्छे नहीं रहे. ससुराल में ननदें खफा कि 'भाभी उनसे ज्यादा  रूपवती  है '. उसके हर काम में मीन मेख निकाली जाती और ताना दिया जाता  कि 'केवल रूप से क्या होता है' पति भी थोड़े शक्की निकले, वह देवरों से पति के  के दोस्तों से खुलकर हंस-बोल नहीं पाती थी. कोई भी उस से बात करता तो उसके पति को लगता, "उस व्यक्ति के मन में उनकी पत्नी के लिए कुछ  और भावनाएं हैं " अक्सर कहा जाता है कि "सांवली लड़कियों की किस्मत बहुत अच्छी  होती है, उनके पति उन्हें बहुत प्यार करते हैं." मेरी उस सहेली ने इस कथन पर बहुत सोच विचार कर के ये निष्कर्ष निकाला कि ये सच होता है पर इसके पीछे कारण ये है कि "पति ऐसी पत्नियों के लिए बहुत प्रोटेक्टिव होते हैं . उन्हें हमेशा ख्याल रहता है,उनकी पत्नी साधारण शक्ल-सूरत वाली है, उसे कोई कुछ न कह दे ,इसलिए उसके लिए ढाल बने खड़े रहते हैं .खुद ही तारीफ़ करते हैं. जबकि सुन्दर स्त्री के पति को मालूम है कि उनकी पत्नी को तो सबकी प्रशंसा ही मिलने वाली है ,इसलिए वे अक्सर उसकी आलोचना करते ही पाए जाते हैं. (अब ये उसके निजी विचार हैं , और मैंने इतना मनन  नहीं किया है,इस पर ) 
पर उसक बातों में सच्चाई झलकती है.

एक और बहुत ही ख़ूबसूरत सहेली है, उसके पति साल में आठ महीने शिप पर रहते हैं. ज्यादातर पारिवारिक समारोह या दोस्तों की पार्टी , उसे अकेले ही अटेंड करनी पड़ती हैं. पर वह इच्छा होने पर भी ज्यादा सजती संवरती  नहीं. साधारण से कपड़े पहनती है, और  पार्टी में या किसी समारोह में अपने हमउम्र वालों से ज्यादा बातें नहीं करती,अक्सर बच्चों के बीच बैठी रहती  है. महिलायें खुले मन से नहीं मिलतीं और अगर  पुरुषों  से बात करती है तो उनकी पत्नियां असुरक्षित महसूस करने लगती हैं. 

और यह सब सदियों से चला आ रहा है. एक मेरे पहचान की महिला हैं , उम्र की  ढलान पर हैं पर पता चलता है कि अपने जमाने में बहुत  ख़ूबसूरत रहीं होंगी. जब भी कोई गेट टुगेदर होता है , इस बात का जिक्र करना कभी नहीं भूलतीं कि उनके पति उन्हें गहरे रंग के कपड़े नहीं पहनने देते थे कि कहीं वे और ज्यादा ख़ूबसूरत न लगने लगें हमेशा हलके, उदास रंग की साड़ियाँ ही लाते थे .जब उनकी बेटियाँ बड़ी हो गयीं तो पिता से जिद कर माँ के लिए  गहरे रंग की साड़ियाँ  लाने लगीं. उन्हें छत  पर जाने, बालकनी से झाँकने की इजाज़त नहीं थी. जबकि उनके पति बहुत पढ़े-लिखे और यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर थे (अब रिटायर हो गए हैं )

ऐश्वर्या राय को कोई पसंद करे या न करें पर उनकी खूबसूरती को कोई नकार नहीं सकता. कई बार जब टी.वी. पर फ़िल्मी पार्टियों  की झलकी दिखाई जाती थी उसमे बाकी हिरोइन्स तो एक ग्रुप बना कर आपस में हंसती बोलतीं नज़र आतीं थीं . ऐश्वर्या के साथ होते मोटे मोटे बदसूरत निर्माता .(आम तौर पर ऐसा मैं नहीं लिखती पर इस वक़्त यही लिखने का मन हो रहा है )(शादी के बाद तो खैर ऐश्वर्या को  अपने पति और ससुर की कम्पनी मिल जाती  है ) करण जौहर के शो "कॉफ़ी विद करण' में भी..अक्सर दो स्टार एक साथ आते  हैं, दीपिका- सोनम, रानी- प्रियंका ....शाहरुख़ -काजोल 'हेमा मालिनी -जीनत अमान' पर खबर थी कि ऐश्वर्या के साथ आने को कोई तैयार नहीं हुआ. ऐश्वर्या के साथ कोई स्टार नहीं आया ...बल्कि उनके साथ थे 'संजय लीला भंसाली '. 

एक उलझन  इन सुन्दर बालाओं के साथ यह भी है, कोई उनसे सच्ची दोस्ती या सच्चा प्रेम करे ,तब भी ये विश्वास नहीं कर पातीं कि उक्त व्यक्ति सचमुच अपनी भावनाओं के लिए ईमानदार है या सिर्फ उनकी खूबसूरती देख  उनकी तरफ आकृष्ट है.

यदा कदा विदेशी ख़ूबसूरत बालाओं के मन का दर्द भी पढने को मिला, वे कहती हैं, "Then there is the judgment that if a woman is beautiful she is dumb.But the bad side is that allot of people have the idea that you are stupid, self obsessed or conceited. Which is not true. "

एक ख़ूबसूरत लड़की जब चौदह पंद्रह साल की थी ,उसे इतने unwanted attention  मिले कि वो घबरा ही गयी, लोगों की हरकतों से घबराकर  वह डिप्रेशन में चली गयी .वो कहती है ," .  After that I went from 115 pounds to 145 in about 6 weeks ... Size 4 to size 14. It was a big change. All of a sudden I saw how superficial people were. Men were not nearly as nice to me. However, I found that girls liked me a whole lot more and when boys did give me their attention it was for what came out of my mouth not how I looked. I was this bigger person until about 18. It was an unconscious protection. Basically I just couldn't handle the attention and feel safe and secure with it. It was very hard to not be able to attract the boys I was interested in - no dates for school dances or really anything until 17 but it kept me safe - no more advances from creepy older men,  there were perks to being protected by fat and acne.

एक मॉडल ने कहा , "Most other people who work in the fashion industry (and there are exceptions, of course) treat these girls not only as if they have no brain, but as if they have no feelings."

ये सुन्दरता की देवियाँ भले ही लगें पर अन्दर से एक आम इंसान ही होती हैं. उन्हें भी सबके साथ मिलजुलकर हंसने बोलने  का मन  होता है .  बेफिक्र होकर  एक सामान्य सी ज़िन्दगी बिताने का मन होता है ,पर उन्हें अपने आस-पास के लोगों के प्रति,अपने व्यवहार के  प्रति चौकन्ना रहना पड़ता है. ये सुन्दरता उनके लिए वरदान कम अभिशाप ज्यादा बन जाती  है.

शुक्रवार, 14 जून 2013

आज पढने के बदले सुन लें कहानी

जब BIG FM 92.7  पर 'याद शहर' प्रोग्राम शुरू हुआ था तो एक ब्लॉगर  मित्र ने इसके विषय में बताया था .और मझसे कहा था 'आप कहानियाँ लिखती हैं यहाँ कहानी भेज सकती हैं ' पर मैंने प्रोग्राम सुना भी नहीं था और  मेरी कुछ समझ में नहीं आया . फिर ये प्रोग्राम काफी हिट हुआ . You Tube पर सारी प्रसारित कहानियाँ अपलोड की गयीं . 

'अनु सिंह चौधरी' से मुलाक़ात हुई और उन्होंने भी इस प्रोग्राम की चर्चा की और मुझसे कहानियाँ  भेजने के लिए कहा . तब मुझे ख्याल आया कि वे मित्र इसी प्रोग्राम के विषय में बात कर रहे थे . मेरी एक फ्रेंड भी ये प्रोग्राम बड़े शौक से सुनती है . कहानी  और उसके बीच बीच में कहानी  के कथ्य पर आधारित बजते दिलकश गाने उसे बहुत पसंद है. उसने भी बहुत उकसाया .

पर किसी भी प्रोग्राम में समय की सीमा  होती है . कहानी की भी शब्द सीमा निर्धारित होती है. और मैं कितना लम्बा लिखती  हूँ, ये मेरे पाठक जानते ही हैं . :) .शब्द सीमा में बंध कर लिखना  ,मेरे लिए एक बहुत बड़ी चुनौती है. और यहाँ कहानी  को छः भागों  में बांटना होता है, खैर खुद को डांट-डपट कर ये चुनौती भी स्वीकारी .कहानी भेज दी . उन्हें पसंद आयी  

पर एक मुश्किल पार्ट और है .इस प्रोग्राम के लिए कहानियां  लिखने वालों की एक बैठक होती है.जिसे मंडली कहते हैं. वहाँ लोग बारी बारी से अपनी  कहानियाँ पढ़ते हैं और फिर बाक़ी सब उस कहानी पर अपनी बेबाक राय देते हैं. और मुझसे चाहे जितनी कहानियां लिखवा लें ,किसी कहानी के दोष गुण बतलाना ,उसपर अपने विचार देना मेरे लिए बहुत कठिन  होता है. पर वहाँ, हर कहानी पर आपसे विचार पूछे ही जाते हैं...और बताना ही होता है  :( वहाँ 'सुन्दर प्रस्तुति'...'ख़ूबसूरत लेखन ' कह कर बचा नहीं जा सकता :)

आकाशवाणी पर मैं भी कहानियाँ पढ़ती हूँ .पर वहाँ समय सीमा और भी कम है .और आकाशवाणी में मुझसे कभी कुछ कहा नहीं  गया पर मैंने खुद के लिए ही अलिखित नियम बना लिये हैं वहाँ  मैं सिर्फ सामाजिक सरोकार से जुड़ी कहानियां ही पढ़ती हूँ . पर यहाँ तो इस प्रोग्राम में कहा ही जाता है , '92.7. BIG FM पर आप सुन रहे हैं "प्यार  के किस्से  यादो का इडियट बॉक्स विद निलेश मिश्रा ' यानि  अपनी कल्पना के घोड़े के लगाम को खुला छोड़ दीजिये पर हाँ, रोचक दौड़ होनी चाहिए ये तो पहली शर्त है ही. 

दो कहानियों को अब तक निलेश जी अपनी आवाज़ दे चुके हैं. और उनकी आवाज़ ,उनके पढने के अंदाज के कितने फैन हैं यह तो फेसबुक पर याद शहर के पेज पर एक नज़र डाल कर ही पता चल जाता है. कहानी में जैसे जान  आ जाती है और अपनी कहानी ही नयी सी लगने लगती है. 

ब्लॉग पर अपना देखा -लिखा-पढ़ा-छापा  सब कुछ सहेज कर रखने की आदत है. 
सो ये दोनों लिंक भी सहेज लिए . (आगे भी डालती रहूंगी ) फेसबुक पर तो मित्रो ने सुन ही ली है (जिन्होंने सुनना चाहा होगा )

और उन ब्लॉग दोस्तों के लिए ख़ास, जो मेरी लम्बी कहानियाँ पढने से घबराते  हैं....वे यहाँ सुन सकते हैं, यानि कि रश्मि रविजा की कहानी से बचना मुश्किल ही नही नामुमकिन है :) :)

अनकहा सच 



पहचान तो थी 

बुधवार, 15 मई 2013

तीन माताओं का दुलारा : किप्पर

यह एक अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त चित्र है, परिचय में लिखा है कि ये
शिशु गिलहरी  ,इस गिलहरी की संतान नहीं है,बल्कि अनाथ है. 
'मदर्स डे' बड़े धूमधाम से संपन्न हुआ .अखबार टी.वी. फेसबुक सब जगह बड़ी धूम रही. लोगों ने अपने प्रोफाइल फोटो कवर फोटो पर अपनी माँ की तस्वीरें लगाईं. माँ  से जुड़े संस्मरण लिखे गए ,कवितायें लिखी गयीं,  बहुत अच्छा लगा देख, यूँ तो माँ हमेशा यादों में रहती ही है एक दिन सबने साथ मिलकर शिद्दत से अपनी  अपनी माँ को याद कर लिया तो इसमें क्या हर्ज़. कोई भी 'स्पेशल डे' हो या कोई त्यौहार ,मुझे हमेशा ही मनाना बहुत अच्छा  लगता है. उस दिन सामान्य रोजमर्रा  से अलग हट कर कुछ होता है. वैसे भी हमारे देश में मनोरंजन को बहुत कम महत्व दिया जाता है. जबकि अच्छे ढंग से कर्तव्य पालन के लिए मनोरंजन भी उतना ही जरूरी है . मनोरंजन दिमाग को तरोताजा कर देता है, काम की तरफ से ध्यान हटाता है तो मन को ज़रा सुकून मिलता है और फिर दुगुने उत्साह से काम को अंजाम दिया जाता है तो परिणाम भी अच्छे मिलते हैं. 

खैर,  बात यहाँ 'मदर्स डे' की हो रही थी. सबलोग अपनी अपनी माँ को  अपने अपने तरीके से थैंक्स बोल रहे थे ...अपनी कृतज्ञता प्रगट कर रहे थे . एक उड़ता सा ख्याल आया ये ममता की भावना क्या सिर्फ  'जन्मदात्री माँ' में ही होती है . प्यार दुलार ,ममता ,सिर्फ माँ का अपने बच्चों  के लिए  ही नहीं होता, किसी के अन्दर भी किसी के लिए हो सकता है. कई पुरुष भी ऐसे हैं जिन्होंने माँ की अनुपस्थिति में अपने बच्चों को माँ बनकर पाला है. मेरे एक परिचित हैं . उनकी बेटियाँ आठ वर्ष और चार वर्ष की थीं जब उनकी पत्नी की मृत्यु हो गयी. उन्होंने दूसरी शादी नहीं की , नौकरी में प्रमोशन नहीं लिया कि कहीं ट्रांसफर न हो जाए और नए स्कूल, नयी जगह बच्चियों को एडजस्ट करने में परेशानी न हो. सुबह पांच बजे उठते, बेटियों का टिफिन तैयार करके उन्हें स्कूल भेजते, लंच टाइम में आकर उन्हें खाना खिलाते . उनकी पढाई, स्कूल की पैरेंट्स मीटिंग,स्पोर्ट्स डे अटेंड करना ,बीमारी में उनकी देखभाल,रात रात भर जागना किसी माँ  से कम नहीं था .हमारे ब्लॉगजगत में भी एक नामचीन ब्लॉगर हैं जिन्होंने अपने बच्चों को अकेले बड़ा किया है. ऐसे कई लोग होंगे समाज में उनके भीतर भी ममत्व की भावना उतनी ही हिलोरें मारती हैं. 

और सिर्फ वे ही क्यूँ...कई लोग जानवरों को भी एक माँ की तरह पालते हैं. एक किसान अपने बैलों को, गाय भैंस को एक माँ बनकर ही पालता है. उनके खाने-पीने , उनकी सुविधा, उनके आराम का ख्याल रखता है. बीमार पड़ जाने पर उनकी सेवा करता है. और सिर्फ गाय भैंस ही क्यूँ, कुत्ते -बिल्ली भी लोग पालते हैं . और उसकी एक माँ की तरह ही देखभाल करते हैं. मेरे घर में ही इसका ज्वलंत उदाहरण है . तीन तीन माओं का दुलारा ,' किप्पर'  '

मुझे कुत्ते पालना कभी पसंद नहीं रहा. शायद दिनकर जी की ये कविता ,'श्वानों को मिलते दूध वस्त्र  ..भूखे बच्चे अकुलाते हैं "'अवचेतन में इतने गहरे पैठ गयी थी कि किसी पालतू कुत्ते को देख यही ख्याल आता. पर शादी के बाद ससुराल पक्ष का जो भी मिलता उसके पास पतिदेव के श्वान प्रेम की कोई न कोई कथा साथ होती. 'कैसे छोटे छोटे कुत्ते के पिल्लों  को कभी छत पर कभी कबाड़ वाले कमरे में छुपा कर रखते और अपने हिस्से का  दूध उन्हें पिला आते.' महल्ले के कुत्ते रोज सुबह दरवाजे के बाहर डेरा डाले रहते और जब तक नवनीत उन्हें आटे की तरह गींज नहीं देते वे बरामदे से नहीं हटते. (मेरी सासू जी का कथन था ) 
शादी के बाद भी  घर में एक कुत्ता पालने की बात हमेशा उठती पर मैं सख्ती से मना कर देती. 'दो बच्चों को पाल कर बड़ा कर दिया, अब एक और किसी को नहीं पालना '. 
बच्चे बड़े हुए तो इन्हें भी पिता से श्वान प्रेम विरासत में मिला. बड़ा बेटा अंकुर का प्रेम तो कभी इतना मुखर नहीं रहा पर छोटा बेटा अपूर्व, करीब करीब रोज ही जिद करता. उसे अपने जैसे दोस्त  भी मिल गए थे. एक बार बिल्डिंग के बच्चे एक टोकरी में  फटे पुराने कपड़ों के बीच दो कुत्ते के पिल्लों को लेकर हर फ़्लैट की घंटी बजाते ,  मेरे फ़्लैट में भी आये ,"आंटी प्लीज़ इसे पाल लो न..वरना वाचमैन इन्हें कहीं दूर छोड़ आएगा " उनपर दया भी आती पर अपनी मजबूरी थी .एक बार कहीं से ये  लोग दो तीन पिल्ले  उठा लाये और उसे गैरेज में पालने लगे .बिल्डिंग वालों ने जब उन्हें दूर भिजवा दिया ,उस दिन अपूर्व डेढ़ घंटे तक लगातार रोया. शाम को सारे बच्चे खेलना छोड़ ऐसे मायूस बैठे थे ,जैसे कितना  बड़ा मातम हो गया हो.

फिर भी मैं जी कडा कर अड़ी रही  कि कोई कुत्ता नहीं पालना है. पर पिछले साल तीनो (Three Men in my
किप्पर 
house ) की सीक्रेट  मीटिंग हुई और एक कुत्ता पालने का निर्णय ले लिया गया. नेट पर ढूंढ कर कौन सा ब्रीड लेना है. किस केनेल से लेना है, सब तय हो गया. मेरे कानों में भी बातें पड़ीं. और मैंने फिर से एतराज जताया पर इस बार किसी ने मेरी नहीं सुनी. मैंने भी ऐलान कर दिया कि 'मैं उसका कोई काम नहीं करुँगी ' .इसे भी सहर्ष मान लिया गया और एक दिन  एक महीने के Cocker spaniel का हमारे घर में पदार्पण हो गया. अंकुर बचपन में एक कार्टून देखा करता था जिसमे एक कुत्ते का नाम KIPPER  था. इसका नामकरण भी 'किप्पर' हो गया . घर में ये गाना समवेत स्वर में गाया  जाने लगा..."ब्रेव डॉग  
किप्पर' ,जो न पहने कभी स्लीपर ' अपूर्व  तो सातवें आसमान पर विराजमान हो गया, "एक तो उसके बचपन का उसका एक कुत्ता पालने का शौक पूरा  हुआ , उस से छोटा कोई घर मे आ गया और उसका नाम भी मिलता जुलता 'क ' से ही रखा गया,. किंजल्क, कनिष्क, किप्पर'  (ये महज संयोग ही था ) 

मैं 'उसका कोई काम न करने की' अपनी बात पर कायम रही. पर किसी को इसका ध्यान भी नहीं था क्यूंकि 'किप्पर'   का काम करने के लिए तीनो जन हर वक़्त तत्पर रहते. 
नवनीत जो हमेशा से  लेट राइज़र रहे हैं . किप्पर'  को घुमाने के लिए सुबह उठने लगे. ऑफिस जाने से पहले, उसे नहलाना ,हेयर ड्रायर से उसके बाल सुखाना ,फर्श पर लिटाकर  देर तक उसके बाल  ब्रश करना . सब करने लगे. शैम्पू, कंडिशनर डीयो तो लगाया ही जाता है उसका टूथपेस्ट और टूथब्रश भी है. उसके दांत भी साफ़ किये जाते हैं. जबतक  उसकी 'टॉयलेट ट्रेनिंग '  पूरी नहीं हुई थी. तीनो में से कोई भी सफाई  कर देता . बहुत जल्दी ही वो ट्रेंड भी हो गया. (होता भी कैसे नहीं ,वो घर से ज्यादा बाहर ही रहता था, तीनो लोग उसे घुमाने के शौक़ीन ) पर अभी हाल में ही उसने एक बार उलटी कर दी और मेरा बड़ा बेटा अंकुर जो घर के सिर्फ शोफियाने काम  ही करता है (रंगोली बनाना , घर सजाना  आदि ) उसने बेझिझक सफाई कर दी. 

नवनीत का इतनी अच्छी तरह उसकी  देखभाल करते देखकर मैं अक्सर कहती हूँ ,"'पुरुषों को चालीस के बाद ही पिता बनना चाहिए." तब वे कैरियर में थोड़े सेटल हो गए होते हैं और पहले जैसी भागम भाग नहीं लगी होती. आज जब देखती हूँ, नवनीत ऑफिस में फोन कर देते हैं, आज 'किप्पर'  का वैक्सीनेशन है , देर से ऑफिस आउंगा (कभी कभी तो छुट्टी भी ले ली है ) तब मुझे याद आता है कि बच्चे जब छोटे थे , इनके ऑफिस जाने के बाद घर का काम ख़त्म कर एक बच्चे को गोद में उठाये दुसरे की  ऊँगली पकडे डॉक्टर के यहाँ जाती और वहां घंटों  इंतज़ार भी करना पड़ता था . किप्पर'  की ज़रा सी तबियत खराब हुई और तीनो के मुहं लटक जाते हैं . उसे गोद में  में ही उठाये फिरते हैं ये लोग. एक दिन भी अगर उसने ठीक से खाना नहीं खाया और नवनीत तुरंत उसे डॉक्टर  के पास ले जाते हैं. डॉक्टर भी एक महंगा 'टिन फ़ूड' थमा देता है, 'इसे खिलाकर देखिये' और किप्पर'  उसे सूंघ कर छोड़ देता है. 'टिन फ़ूड' के डब्बे सजते जाते हैं. क्यूंकि हर कुछ दिन बाद  नवनीत की रट शुरू हो जाती है, 'ये ठीक से खा नहीं रहा, दुबला होता जा रहा है '( जबकि किप्पर' अपनी उम्र से दो साल बड़ा दिखता है ) 

 
अंकुर की  गोद में किप्पर 
वो अगर  नहीं खाता तो हथेली पर पेडिग्री  ले कर उसे हाथ से खिलाया जाता है वो भी पूरे धैर्यपूर्वक देर तक. .घर के लिए कभी नवनीत ने एक ब्रेड भी न लाई हो पर 
किप्पर'  के लिए रोज अंडे, पनीर. और शाम को आइसक्रीम लेकर आते हैं. और उसे आइसक्रीम खिलाते हुए जो तृप्ति का भाव चेहरे पर होता है, वो तो बस अवर्णनीय ही है. डॉक्टर को फोन करके उसके जन्मदिन की भी जानकारी ली गयी, और दस दिन पहले से ही घ रमें उसके बर्थडे मनाने की धूम. मजे की बात ये कि पहले जन्मदिन के बाद ही झट से डॉग मेट्रीमोनियल इण्डिया 'पर उसका रजिस्ट्रेशन भी हो गया .(हाँ कुत्तों की मेटिंग के लिए भी एक साईट है ) सारे शौक जल्दी जल्दी पूरे कर लेने हैं पता नहीं, बेटे ये मौक़ा दें या नहीं :) (पर एक सोचनीय बात है कि उस साईट पर भी male dogs की तुलना में female dogs बहुत कम हैं .)

 आजकल पतिदेव मुम्बई से बाहर गए हुए हैं . मेरे पूछने पर कि "अब 'किप्पर'  का ख्याल कौन रखेगा ?",दोनों बेटों ने एक सुर  में कहा, "हमलोग हैं न.." उसका ख्याल रखा भी जा रहा है और कुछ ज्यादा ही. एक सुबह चार बजे ही ,अपूर्व उसे घुमाने ले गया क्यूंकि वह कूं कूं कर रहा था .उसे नहलाना, उसके बाल ब्रश करना , खिलाना तो सब  कर ही रहे हैं, एक दिन अंकुर ने उसके लिए रोटी भी बनाई और मदर्स डे था इसलिए मुझ पर भी  कृपा हो गयी. मेरे लिए लिए भी पराठे बनाए. पहली बार के हिसाब से ठीक ही बने थे . 

दुसरे दिन अपूर्व ,किप्पर' के लिए चिकन लेकर आया  और जो कभी चाय भी नखरे के साथ बनाता है. ख़ुशी ख़ुशी उसके लिए चिकन बनाया . ' {अच्छा है, मेरी बहुएं शिकायत नहीं करेंगी :)} .
बस  अपूर्व की एक बात का मैं उत्तर नहीं दे पाती .एक दिन उसने कहा, "सबलोग कहते हैं,  मेहनत के बिना कुछ नहीं मिलता,  मेहनत करो तभी  किस्मत साथ देती  है . ये 'किप्पर'  क्या करता  है जो इसकी किस्मत इतनी चमकी हुई है?? " 

अराधना भी अक्सर अपनी गोली और सोना की तस्वीरें पोस्ट करती रहती है...उनकी बातें शेयर करती रहती है, अराधना की गोली का परिचय है 
नाम- गोली 
मम्मा का नाम- आराधना 
रंग- गोरा 
आँखों का रंग- काला 
ऊंचाई- एक फुट 
लम्बाई- दो फुट
उम्र- एक साल तीन महीने 
मनपसंद काम- कोल्ड ड्रिंक की बोतलों को काट-कूटकर चपटा कर देना :) बाल खेलना और मम्मा को काटना :)
खाने में- डॉग फ़ूड, दही, अंडे, पपीता, संतरा और आम। कच्चा आलू, नूडल्स और आलू भुजिया भी पसंद है, पर मम्मी देती नहीं :(

आराधना ने अपनी 'सोना' का बहुत ही प्यारा वीडियो पोस्ट किया है ,जिसे यहाँ  देखा जा सकता है 

पाबला जी के मैक की कारस्तानियाँ सब जानते हैं. Mac Singh का अपना फेसबुक अकाउंट है .उनके रोज के अपडेट्स और बेशुमार तस्वीरें यहाँ  देखी जा सकती हैं. 
मैक के  पहले जन्मदिन की तस्वीर पर पाबला जी ने 
उसका परिचय कुछ ऐसे लिखा ,"अभी तो माशा अल्लाह 1 साल के हैं ज़नाब
तो 5 फीट की लम्बाई है
जब जवां होंगे तो गज़ब ही ढाएँगे
 — 

वंदना अवस्थी दुबे के पास भी एक प्यारा सा नन्नू है जिसके खाने में बड़े नखरे हैं ,वन्दना कहती हैं..."नन्नू खाना खा ले, इसके लिये भारी जतन करना पड़ता है अब घर ले आये हैं तो पालेंगे भी बच्चे की तरह, कोई कुछ भी कहे " 


ये सब देखकर तो यही लगता है कि ममत्व की भावना ,ममता की अनुभूति पर सिर्फ जन्मदात्री माँ का ही हक़ नहीं .यह भावना सर्वव्यापी है. .  


आराधना अपनी गोली के साथ 

गोली के ठाठ 


पाबला जी का हैंडसम मैक

ध्यान से ख़बरें पढता मैक 


क्यूट नन्नू 
नन्नू के नखरे 


अपूर्व के साथ पढ़ाई करता किप्पर 



अपनी माताजी के साथ किप्पर 



गुरुवार, 9 मई 2013

बातों के शेर


चार दिन पहले बीस- पच्चीस साल पूर्व लिखी एक कविता पोस्ट की...जो उस वक़्त के हालात बयान करती थी. पर आज भी कुछ नहीं बदला ...हालात वैसे के वैसे ही हैं. कुछ महीने पहले भी कॉलेज के दिनों की लिखी एक रचना पोस्ट की थी, उसे पढ़कर भी सबने कहा, बिलकुल सामयिक रचना है .आज की परिस्थितियों का चित्रण . देश के हालात, गरीबी, बेरोजगारी, भ्रष्ट्राचार स्वार्थलिप्तता ,कालाबाजारी  सब कुछ आज भी वैसा ही है...जैसा पच्चीस साल पहले था .बल्कि हालात और  बुरे ही हुए हैं .


अभी हाल में ही 'प्रवीण पाण्डेय जी' की पोस्ट पढ़ी "कृपया घंटी बजाएं " इस पोस्ट पर आयी टिप्पणियों में सबने कहा, "बहुत ही उत्तम विचार है. ऐसा अवश्य करना चाहिए. यह एक अच्छी पहल होगी. आदि आदि ." प्रवीण जी ने ये पोस्ट लिखी २०१३  में और मैंने भी २०१० में इसी विषय पर एक पोस्ट लिखी थी "प्लीज़ रिंग द बेल "  . वहाँ भी सबने शब्द अदल-बदल कर यही विचार रखे थे .मैंने पोस्ट में ये जिक्र किया था कि दो साल पहले मुंबई में Please ring the bell  मूवमेंट की जानकारी हुई थी यानि २००८ से यह मुहिम चल रही है .यानि पांच साल से हम यही आग्रह कर रहे हैं कि अपने आस-पास ऐसा कुछ देखें तो जरूर घंटी बजाएं .और सबलोग सर हिला कर कहते हैं ,"हाँ जरूर करना चाहिए. " शायद पांच साल बाद भी कुछ लोग ,यही पोस्ट लिखेंगे और फिर से घंटी बजाने का आग्रह किया जाएगा. और फिर सबलोग सर हिलाकर कहेंगे "बहुत सार्थक पहल है, जरूर करना चाहिए" पर अगर यह मूवमेंट सफल होता, इस से प्रेरित होकर लोगो ने ऐसे कदम उठाने शुरू किये होते  तो फिर बार-बार आग्रह की जरूरत ही क्यूँ पड़ती ?? 

पच्चीस साल पहले लिखी कविता,आज भी उतनी ही प्रासंगिक है .पांच साल पहले शुरू हुआ मूवमेंट ,वहीँ का वहीँ खडा है, घुटनों बल भी चलना शुरू नहीं किया . 
यानि कि कहीं कुछ भी नहीं बदल रहा . बदल भी रहा है तो कछुए की रफ़्तार से नहीं घोंघे की गति से . हाँ, भौतिक रूप से काफी कुछ बदल रहा है . टेलिग्राम से इंटरनेट की दूरी ,हाथ पंखे से ए.सी. की दूरी तो हम छलांग लगाकर पूरी कर रहे हैं पर  ईमानदारी, लगन, मेहनत , संवेदनशीलता ,त्याग जैसे मानवीय गुण और विकसित क्या विलुप्त होते जा रहे हैं. लोग ज्यादा से ज्यादा आत्मकेंद्रित होते जा रहे हैं. 

अपने नजदीकी परिवार से आगे बढ़कर न कोई सोचता है न देखता तो फिर किसी दुसरे से कैसी आशा  ?? क्यूँ कोई महिला आशा करे कि कोई दूसरी स्त्री या पुरुष उसके घर की घंटी बजाकर उसे अपने पति से पिटने से बचाएगी/बचाएगा ?? उन्हें खुद ही कदम उठा कर खुद को इस जलालत भरी ज़िन्दगी से मुक्त करना होगा .पर वही, कहना आसान है. जो स्त्रियाँ आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर नहीं होतीं और जिनके पिता-भाई उन्हें आश्रय देने को तैयार नहीं होते, उनके लिए तो ऐसे कदम उठाना बहुत मुश्किल है क्यूंकि एक अकेली औरत तो छोटी मोटी नौकरी कर अपनी रोटी और सर पर  छत का इंतजाम कर सकती है. पर उसके साथ बच्चे जुड़े होते हैं ,उनकी परवरिश, शिक्षा बहुत सारी चीज़ें होती हैं जिन्हें उनकी माँ की छोटी सी नौकरी पूरा नहीं कर सकती. यही वजह है कि घर छोड़ बहार निकल जाने का निर्णय वे नहीं ले पातीं. इसीलिए महिला का शिक्षित और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होना बहुत जरूरी है.

 सुनने में बहुत कड़वा लगेगा पर या तो महिला को इसकी आदत पड़ जाती है या फिर बच्चे बड़े होकर उसके रक्षक बन खड़े हो जाते हैं पर किसी बाहर वाले से ऐसी आशा रखना व्यर्थ ही है. हाल में ही एक परिचिता मिली. उसने दूसरा फ़्लैट ले लिया है और अब वहीँ शिफ्ट हो गयी है. बातों  बातों में कहने लगी," पहले जहां रहती थी,वहाँ मेरे सामने वाले फ़्लैट से बहुत आवाजें आती थी, उस घर का आदमी अपनी पत्नी को बुरी तरह पीटता था. " 
मैंने कहा "और बिल्डिंग के लोगों ने कभी कुछ नहीं किया, कोई विरोध नहीं किया ?" 
वो बोली, "कोई क्या कहता , वो सबसे लड़ लेता. बिल्डिंग में किसी से मिलता-जुलता नहीं था " फिर खुद की सफाई देने लगी. "मैं तो अकेली दो छोटे बच्चों के साथ रहती हूँ, पति विदेश में है ,मैं क्या कर सकती थी. अभी दो दिनों पहले वो महिला मिली, अपने चेहरे पर के  निशान छुपाने की कोशिश कर रही थी तो मैंने कहा ,"आखिर कब तक ये सब चलेगा ??" 
तो कहने लगी.."अब तो आदत पड़ गयी है " 

बहुत पहले जब 'बोमन ईरानी ' फिल्मो में नहीं आये थे तब वे थियेटर में काम करते थे. 'एम.टी.वी.' वालो ने एक एक्सपेरिमेंट किया था . बोमन ईरानी और उनकी एक सहभिनेत्री पति-पत्नी के रूप में मुंबई के एक पॉश  इलाके के रेस्टोरेंट में गए  .वहां दोनों ने झगड़ने का नाटक किया. बोमन ईरानी ऊँची आवाज़ में पत्नी  को डांटने लगे ,ग्लास का पानी उसके मुहं पर फेंक दिया..पत्नी रोने लगी, उसे थप्पड़ मारने का भी नाटक किया . पूरा  रेस्टोरेंट भरा हुआ था . लोग नीचे सर किये खाना खाते रहे .कुछ के साथ बच्चे भी थे, उनलोगों ने भी नहीं सोचा कि बच्चों पर क्या असर पड़ेगा, उठ कर उस पति को रोकें. 
केवल एक लड़की उठी ,उसने बोमन ईरानी को कुछ कहा तो पलट कर उसने भी जबाब दिया. दूसरा कोई भी स्त्री या पुरुष  उस लड़की का साथ देने के लिए नहीं उठा .वह बाहर चली गयी .अगर लोगों को शुरुआत करने में झिझक हो रही थी...तो कम से कम उस लड़की के स्वर में स्वर मिलाकर तो विरोध करते. पर सब समझते हैं यह पति-पत्नी के बीच का मामला है .पत्नी, पति की प्रॉपर्टी  है,वो उसके साथ जो चाहे कर सकता है. लोग अपने संस्मरण में भी लिखते हैं  कि एक रेस्टोरेंट में पति  ने पत्नी को चांटा मार दिया ,ये देखकर उनका मन खराब हो गया और वे अपने दोस्त के साथ बाहर निकल गए. 
यही होता है, कोई भी उनके बीच हस्तक्षेप नहीं करता. क्यूंकि पत्नी सिर्फ पत्नी होती है एक इंसान नहीं. 
{ प्रसंगवश एक बात  याद आ रही है ,एक फ्रेंड ने अपने बैंक की एक सहकर्मी के विषय में बताया था .वे ऊँची पोस्ट पर हैं. पचास वर्ष से ऊपर की हैं,पर हाल  में ही उनका तलाक हो गया है और उन्हें कोई फ़्लैट किराए पर नहीं मिल रहा. एक बिल्डिंग में फ़्लैट एक मिला भी तो तीन महीने के अन्दर छोड़ना पड़ा क्यूंकि बिल्डिंग वालों  ने आपत्ति की कि ये अकेली रहती हैं,पर इनके घर में लोग आते हैं, पार्टी होती है .एक अकेली औरत का पिटना समाज बड़े मजे में बर्दाश्त कर लेता है पर एक अकेली औरत का हँसना -बोलना उस से  बर्दाश्त नहीं हो पाता }

हाँ, जिन लोगों को  अपने आस-पास घट रही ऐसी घटना नागवार गुजरती है  ,वे अपने अंतर्मन  की सुन यूँ भी उस महिला की सहायता के लिए आते हैं  और जो लोग निस्पृह बने रहते हैं ,चाहे उनके सर पर ही जोर जोर से घंटी क्यों न बजायी जाए ,उन्हें कुछ सुनाई न देगा...वे क्या किसी के घर की घंटी बजायेंगे . 

बस एक काम में हम बहुत आगे बढ़ गए हैं. बक बक करने में. चाहे एफ.एम. की आर.जे. की रात-दिन  की चकर चकर हो या  चौबीसों  घंटे चलने वाले सैकड़ों टी.वी. चैनल्स के एंकर्स की. बातें ..बातें और सिर्फ बातें . 
किसी भी सोशल साइट्स पर  नज़र डालो ,फेसबुक हो या ट्विटर लोग लगे हुए हैं बौद्धिक जुगाली करने में . हम भी ब्लॉग पर यही  कर रहे हैं. मेरे ब्लॉग  का तो नाम ही है ,'अपनी उनकी सबकी बातें' .बस अब बातों के ही शेर रह गए हैं हम. 

शनिवार, 4 मई 2013

ऊसर भारतीय आत्माएं (कविता )


आजकल फिजाएँ कोयल की कूक से गूँज रही है. रोज सुबह कभी लम्बी, कभी बहुत तेज तो कभी धीमी सी कूक सुनाई दे जाती है, कभी-कभी तो पेड़ के नीचे  खड़ी हो कोयल को ढूँढने की कोशिश भी करती हूँ,पर वो पत्तों में छिपी नहीं दिखती .और मुझे अपनी ये पुरातन कविता याद आ जाती है, जो तीन साल पहले पोस्ट की थी . आज रीपोस्ट कर रही हूँ.

एम.ए. की परीक्षा की तैयारियों में व्यस्त थी. अंग्रेजी में कहें तो 'बर्निंग मिड नाइट आयल' जैसा कुछ और उसी 'मिड नाइट'  में एक कोयल की कुहू सुनाई दी. बरबस ही माखनलाल चतुर्वेदी (जिनका उपनाम 'एक भारतीय आत्मा' था) की कविता "कैदी और कोकिला' याद हो आई....ऐसे ही उन्होंने भी स्वतंत्रता संग्राम के दौरान, जेल के अन्दर एक कोयल की कूक सुनी थी और उन्हें लगा था कोयल, क्रांति का आह्वान  कर रही है.

कुछ अक्षर कागज़ पर  बिखर गए जो अब तक डायरी के पीले पड़ते पन्नों में कैद थे. आज यहाँ हैं.

ऊसर भारतीय आत्माएं

रात्रि की इस नीरवता में
क्यूँ चीख रही कोयल तुम
क्यूँ भंग कर रही,
निस्तब्ध निशा को
अपने अंतर्मन की सुन

सुनी थी,तेरी यही आवाज़
बहुत पहले
'एक भारतीय आत्मा' ने
और पहुंचा दिया था,तेरा सन्देश
जन जन तक
भरने को उनमे नयी उमंग,नया जोश.

पर आज किसे होश???

क्या भर सकेगी,कोई उत्साह तेरी वाणी?
खोखले ठहाके लगाते, 
मदालस कापुरुषों में
शतरंज की गोट बिठाते,
स्वार्थलिप्त,राजनीतिज्ञों में

क्या जगा सकेगी कोई जोश तेरी कूक 

भूखे बच्चों को थपकी दे,सुलाती 
दुखियारी माँ में
नौकरी की तलाश में भटक , 
थके, निराश, निढाल बेटे में
दहेज़ देने की चिंता से ग्रसित पिता 
अथवा 
ना लाने की सजा भोगती पुत्री में

मौन हो जा कोकिल
मत कर व्यर्थ 
अपनी शक्ति,नष्ट
नहीं बो सकती, 
तू क्रांति का कोई बीज
ऊसर हो गयी है,'सारी भारतीय आत्मा' आज.

मंगलवार, 30 अप्रैल 2013

तपती धरती पर एक बूँद गिरी हो जैसे

फेसबुक और ब्लॉग्गिंग के विषय में बहुत कुछ लिखा जाता रहा है कि लोग ब्लॉग्गिंग से फेसबुक  की तरफ पलायन कर गए हैं ..और अब फेसबुक पर स्टेटस लिख कर ही संतुष्ट हो जाते हैं आदि आदि. पर मेरी यात्रा उलटी रही. फेसबुक पर मैंने 2006 में ही अकाउंट बनाया था जबकि ब्लॉगिंग  ज्वाइन की 2009  में . पहले फेसबुक पर मेरी फ्रेंड्स लिस्ट में सिर्फ जाने-पहचाने मित्र और रिश्तेदार ही थे पर  ब्लॉग्गिंग ज्वाइन करने के बाद काफी ब्लॉग दोस्त (कर्ट्सी शोभा डे ) भी फेसबुक पर मित्रों में शुमार हो गए .

फिर भी मैं बहुत कम लोगों को ही add करती हूँ . बहुत ज्यादा सक्रिय भी नहीं हूँ..कि सबकी स्टेटस पढूं, कमेन्ट करूँ लिहाजा मेरे स्टेटस पर ज्यादा likes  और कमेंट्स भी नहीं होते. वरना किसी  ने लिखा, " धूप कितनी खिली हुई है ..शाम कितनी सुहानी  है " और सौ दो सौ likes . किसी की बचकानी तुकबंदी पर भी लोग अश अश कर उठते हैं, और दो सौ से ऊपर लोग like कर जाते हैं. मेरी कोई स्टेटस बहुत पसंद की गयी हो तब भी चालीस से ज्यादा लोगों ने like  नहीं किया .पर अभी कुछ लिख कर पोस्ट किया और हैरान  रह गयी 320 likes और 29 शेयर . 

मैंने  लिखा था ,
"रेडियो एफ .एम. वाले पूछ रहे हैं ,"अगर आपको किसी को थैंक्यू कहना है तो हमारे माध्यम से अपना थैंक्स भेज सकते हैं "
एक लड़की का फोन आता है , " कल रात ऑफिस में बहुत देर हो गयी और मैरिन ड्राइव पर मैं टैक्सी के इंतज़ार में खडी थी .एक भी खाली टैक्सी नहीं आ रही थी. .तभी पास आकर एक टैक्सी रुकी उसमे एक लड़का बैठा था बोला , ,"आप टैक्सी में बैठ सकती हैं, जहां जाना होगा छोड़ दूंगा " पर मैं डर गयी ,उसके साथ टैक्सी में बैठने को तैयार नहीं हुई तो वह बाहर निकल आया और बोला , "आप इस टैक्सी से चले जाइये ,आपका इतनी देर रात, अकेले खड़े रहना ठीक नहीं . मैं दूसरी टैक्सी ले लूँगा ".मैं उस लड़के का नाम नहीं जानती ,उसकी शक्ल भी ठीक से नहीं देखी पर आपके माध्यम से अपना थैंक्स बोलना चाहती हूँ "

हमारी भी एक बिग थैंक्यू उस अनाम लड़के को. इतनी संवेदनशीलता सब में आ जाए फिर कैसी शिकायत रहे इस दुनिया से
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    खैर ये बात भी तारीफ़ के काबिल थी, पसंद करने के लायक थी.  लोगों ने जेनुइनली पसंद किया था. मुझे भी बहुत अच्छी  लगी थी तभी मैंने भी स्टेटस के रूप में लिखा.
    पर यह सब देख थोडा दुःख भी हुआ. इस किस्म की संवेदनशीलता, ऐसी सहृदयता, एक अनजान की मदद करने का ज़ज्बा इतना कम हो गया है कि जो भी पढ़ रहा है, अभिभूत हो जा रहा है. जैसे ये  कोई rarest of rare घटना हो.

    उस लड़के ने कोई अपनी जान पर खेल कर गुंडों से उस लकड़ी को नहीं बचाया था . एक छोटा सा  gesture था, एक अनजान लड़की को देर रात सड़क पर खडा देख चिंतित हो गया और अपनी टैक्सी से उतर कर उसे वो राइड ऑफर कर दी. हो सकता है, आधे घंटे बाद या एक घंटे बाद ही उसे दूसरी टैक्सी मिल गयी हो. पर आजकल किसी अनजान के लिए इतना सा भी कोई नहीं करता . सबलोग बस अपनी दुनिया में मगन रहते हैं. इस लड़के की  टैक्सी गुजरने से पहले और भी कई टैक्सियाँ गुजरी होंगीं. पर किसी ने चिंता नहीं की कि  देर रात एक लड़की सड़क पर यूं अकेली खड़ी है. कल को कुछ हादसा हो जाता तो जरूर खबरे देख कर अपना आक्रोश व्यक्त करते. शायद कैंडल और पोस्टर ले, मोर्चा भी निकालें. पर अपने आस-पास के प्रति ज़रा सी भी जागरूकता नहीं  जागती. 
    अगर हम सब अपनी आँखें थोड़ी सी खुली रखें. अपने आस-पास जो घट रहा है, उसके प्रति संवेदनशील रहें . इतने ज्यादा आत्मकेंद्रित न हों.  रिश्तेदारी और  मित्रता से अलग भी दूसरों  की मदद के लिए तत्पर रहें तो कितने ही हादसे टल जाएँ. 

     उस लड़के द्वारा किया गया सद्कार्य आम होना चाहिए कि लोग सुन कर इसे आम समझें और कहें ,"हाँ..ऐसा तो होता ही है ' .इसमें कुछ अनोखा नहीं लगना चाहिए . अभी तो ऐसा लगा, जैसे इस असंवेदनाशीलता की लपट से झुलसती धरा पर बारिश की एक बूँद सी थी,ये घटना जो  इस जलती धरती पर गिरी और विलीन हो गयी. लोग इस बूँद की शीतलता की खबर पर ही मुग्ध हैं पर ऐसी कई बूँदें मिलकर बारिश का रूप ले लें और हमारे आस-पास बरसें तो फिर हमारी धरा जरा हरी-भरी हो. 
    खैर, आशा है कि इन 320 लोगों ने जो ये स्टेटस पसंद किया है और जो लोग अब ये पोस्ट पढ़ रहे हैं, वे तो जरूर ऐसा कुछ करेंगे .

फिल्म The Wife और महिला लेखन पर बंदिश की कोशिशें

यह संयोग है कि मैंने कल फ़िल्म " The Wife " देखी और उसके बाद ही स्त्री दर्पण पर कार्यक्रम की रेकॉर्डिंग सुनी ,जिसमें सुधा अरोड़ा, मध...