Friday, May 21, 2010

सरोगेट मदर्स क्या सचमुच एक 'अवन' की तरह हैं??

एक विषय कुछ ऐसा है, जिसपर मैं अपना मत नहीं बना पायी हूँ, कि यह सही है या नहीं और इसे बढ़ावा देना चाहिए या नहीं .और वो है सरोगेट मदर्स  का. भारत, दुनिया भर के माता-पिताओं के चेहरे पर मुस्कान लाने में सक्षम हुआ है.दुनिया भर से लोग यहाँ आते हैं.पैसे के बल पर एक कोख किराए पर लेते हैं और गुलगोथाने से बच्चे को गोद में लिए वापस अपने देश चले जाते हैं.

भारत के लिए बच्चे के जन्म लेने की ये प्रक्रिया कोई नई नहीं है. प्राचीन धर्मग्रंथों में भी इसका जिक्र है. और Gestational surrogacy का सबसे अच्छा उदहारण है भगवान कृष्ण के बड़े भाई बलराम का जन्म. राजा कंस के डर से देवकी के गर्भ से उनका प्रतिरोपण रोहिणी देवी के गर्भ में कर दिया गया. वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो sperm donor हुए वासुदेव,egg donor देवकी और उन्हें जन्म दिया रोहिणी देवी ने. बाइबल में भी इसका जिक्र है और चैप्टर १६ में अब्राहम और सारा का उल्लेख है कि 'सारा' बंध्या थीं और उन्होंने अपनी दासी 'हैगर' से आग्रह किया था कि वो उनके और अब्राहम के बच्चे को जन्म दे.

Surrogacy दो तरह की  होती है Traditional surrogacy  और Gestational surrogacy .Traditional surrogacy में sperm पिता के ही होते हैं पर egg किसी दूसरी महिला का और इसे ट्यूब में fertilize कर और इसे जन्म देने वाली माँ  के गर्भ में प्रतिरोपित  कर दिया जाता है. Gestational surrogacy में पिता के sperm और माँ के egg को fertilize कर किसी अन्य महिला (सरोगेट मदर) के गर्भ में प्रतिरोपित  कर दिया जाता है.

आधुनिक युग  में अमेरिका में १९७८ में IVF पद्धति से पहले  टेस्ट ट्यूब बेबी लुइ ब्राउन का जन्म हुआ और कुछ ही महीनो बाद ३ अक्टूबर १९७८ को कलकत्ता में भारत की पहली टेस्ट ट्यूब बेबी का जन्म हुआ,जिसका नाम रखा गया 'दुर्गा' .पर जिस घटना ने अंतर्राष्ट्रीय समाचार पत्रों में स्थान बनाया वह थी.२००४ में ,गुजरात के 'आनंद' नमक एक छोटे से शहर की एक महिला का लन्दन में रहने वाली अपनी बेटी के बच्चे को जन्म देना.

डॉक्टर  का कहना है, हर वर्ष  विश्व भर में  करीब ५०० बच्चे ,सरोगेसी की प्रक्रिया से जन्म लेते हैं.उनमे करीब २०० बच्चे भारत में जन्म लेते हैं.जाहिर है,भारत की गरीबी और इसी सहारे अपना जीवन सुधारने की आकांक्षा लोगों को इसके लिए प्रेरित करती है. हर IVF क्लिनिक एक सरोगेसी  एजेंसी से जुड़ी होती है. इसके एजेंट ,झुग्गी झोपड़ियों में रहने वाली गरीब महिलाओं से संपर्क करते हैं और अपने जीवन स्तर सुधारने ,अपने बच्चों का भविष्य बनाने का एक अवसर मिलता देख,ये लोग एक अच्छी रकम ले  बच्चे को जन्म देने को तैयार हो जाती हैं. क्लिनिक वाले इन महिलाओं का पूरा ख्याल रखते हैं पर  पति की रजामंदी  जरूरी होती है.उन्हें भी बुलाकर काउंसिलिंग की जाती है. फिर भी उन्हें परिवार के अन्य सदस्यों की नाराजगी और पड़ोसियों की तानाकशी तो सुननी ही पड़ती है. लेकिन जब वे उन्हें एक साल के बाद अपनी झोपड़ी छोड़, अपने फ़्लैट में शिफ्ट होते और जीवन स्तर में सुधार देखते हैं तो कई अन्य महिलायें भी यह राह अपना लेती हैं.

भारत की तरफ आकृष्ट होने की कुछ वजहें और हैं. इस प्रक्रिया का कम खर्चीला होना. यहाँ एक बच्चे के जन्म में १० लाख से २५ लाख तक का खर्च आता है जबकि अमेरिका में यही खर्च बढ़कर ५५ लाख का  हो जाता है. वैसे जन्म देने वाली माँ के हिस्से २,३ लाख रुपये ही आते हैं. ५०,००० एजेंट ले लेते हैं और बाकी पैसे प्रतिरोपण,दवाइयां और माँ की देखभाल में खर्च होते हैं.भारत में कानून भी उनके पक्ष में है वह सरोगेट माँ को नहीं बल्कि donors को ही बच्चे का कानूनी संरक्षक मानता है. इंगलैंड और ऑस्ट्रेलिया में जन्म देने वाली माँ को ही यह अधिकार प्राप्त है.फिर भारत में लोग बच्चे को सौंपने से इनकार नहीं  करते.जबकि कई बार विदेशों में माँ ने बाद में इनकार कर दिया है,बच्चे को सौंपने से.

शिकागो के बेनहूर सैमसन ने २००६ में सरोगेसी कंसल्टेंसी शुरू की ,वे अमेरिका,इंग्लैण्ड  ,कनाडा से इच्छुक दंपत्ति को भारत लाते हैं.उनका कहना है ४ साल में उनका बिजनेस ४०० गुणा  बढ़ गया है.

यहाँ, बिलकुल गहरे श्याम वर्ण की लडकियां, विदेशी नाक नक्श के सफ़ेद गुलाबी बच्चों को जन्म देती हैं. डॉक्टर यशोधरा म्हात्रे का कहना है, 'गर्भ एक अवन की तरह है ,इसमें काला चॉकलेट केक बेक करना है या सफ़ेद वनिला केक यह आपकी मर्ज़ी पर है". पर यह सुन.मन थोड़ा सशंकित हो जाता है. बच्चे को जन्म देने की प्रक्रिया क्या इतनी मेकैनिकल हो सकती है.? अजन्मे बच्चे से भी माँ का एक जुड़ाव होता है.पर यहाँ अगर भावनाएं जुड़ी रहेंगी तो फिर माँ बच्चे से अलग कैसे हो पायेगी?



एक विचार यह भी सर उठाता है कि अपने बच्चे के इच्छुक माता-पिता के लिए इस से बड़े पुण्य का  काम और क्या हो सकता है कि आप उनका ही अंश  उनके गोद में सौंप सकें. चाहे हम एडॉप्शन की कितनी भी वकालत करें.पर इस से इनकार नहीं कर सकते कि हर स्त्री-पुरुष में अपने बच्चे को गोद में खिलाने की आकांक्षा होती है. कितने ही निःसंतान दंपत्ति की ज़द्दोज़हद देखी है.बरसों इलाज. स्त्रियों का अनेकों शारीरिक कष्ट से गुजरना और अगर विज्ञान उन्हें यह सुविधा मुहैया  करवा रहा है. और इसी बहाने वह किसी के जीवन में सुधार लाने में भी सक्षम होते हैं तो क्या गलत है इसमें? पर भविष्य की एक भयावह तस्वीर भी खींच जाती है कि यह चलन आम ना हो जाए.और कहीं इसका दुरुपयोग ना शुरू हो जाए.आज मजबूरी में वे यह प्रक्रिया अपना रहें हैं,भविष्य में यह शौक  ना बन जाए.

48 comments:

वन्दना said...

ye bhi ek prakriya hai aur aaj ke zamane mein ek jaroorat ban kar bhi ubhri hai to ise bhi sweekara hi jayega kam se kam un logon ke liye to aasha ki ek kiran hai jo santan sukh se vanchit rahte hain...........ismein koi kisi ko badhya to nahi karta magar apni apni jarooratein hi insaan ko ek doosre ke pas lati hain .........aur vaise bhi har achchayi ke sath burayi ka to choli daman ka sath hota hai isliye hamein iske sirf sahi pahlu pa rhi gaur karna chahiye .

प्रवीण शुक्ल (प्रार्थी) said...

बहुत ही गंभीर विषय उठाया है आप ने ,,,, अगर मेरे व्यक्ति गत नजरिये की बात की जाए तो (भले ही भारत सरकार ने क्यूँ न इसके लिए क़ानूनी मान्यता दे रखी हो ) मै इसे गलत ही मानता हूँ और आने वाले समय में ये बहुत भयावाह समस्या के रूप में सामने होगा ,,,, जाने कितनी ही मओं की समस्या मीडिया में उछल चुकी है जिन्हें जिन्हें वादे के मुताबिक राशि नहीं मिली ,,,,,,मै तो इसे मानव तस्करी के रूप में ही देखता हूँ ,,, जिसे क़ानूनी मान्यता मिली हुई है ,,,,मेरा तो यह मानना है की अगर येसा कानून है तो ये केवल भारतीय लोगो के लिए ही होना चहिये ,,,, जिससे पूंजी वादी लोगो के द्वारा इंसानों की खरीद फरोक्त बंद हो ,,,

rashmi ravija said...

@प्रवीण जी,
विषय तो गंभीर है,इसीलिए मैं भी कोई 'मत' नहीं बना पा रही...बस यही ख़याल आता है...हमारा देश इतना गरीब क्यूँ है???

दिलीप said...

iske baare me kuch keh nahi sakta ...kunki kuch pata nahi...aapke aalekh se kuch seekhne ko mila...aapse bhi kuch seekhne ko milega...

Amitraghat said...

"बेहद गम्भीर मसला है और ये सब हिन्दुस्तान में पूँजी के असमान वितरण के कारण हो रहा है....

दीपक 'मशाल' said...

एक बहुत ही सार्थक लेखन का उदाहरण.. तथ्यपरक और रोचक जानकारी के साथ बस १९७८ दोनों के जन्म के एक ही वर्ष हैं इस पर कुछ संदेह है दी..
जरूर अखबार में आना चाहिए इस आलेख को..

rashmi ravija said...

@दीपक मुझे पता तो था ..पर पोस्ट करने के पहले मैने नेट पर चेक किया है..ये देखो..
While the west proudly boasted about Louise Brown, the first IVF baby born in the United States of America in 1978, in the far quiet east, the first in-vitro fertilization experiment was successfully carried out at Calcutta on October 3, 1978, by which Indias first and the worlds 2nd IVF baby, Kanupriya alias Durga was born.

अमिताभ श्रीवास्तव said...

bharat ab is mamle me svarg banta jaa rahaa he, gujraat ke aanand shahr ko to vese bhi 'dunia ka garbh' kahaa jane lagaa he,kher.., me khud bhramit saa hu ki aakhir yah uchit he yaa nahi/ par is chinta me ham kyo pade, yadi kisi ko sukh milta he, to yah uchit hi hoga???/

राज भाटिय़ा said...

सब की अपनी अपनी सोच है, मेरे ख्याल से यह गलत है, अगर किसी को बच्चा चाहिये तो आनथालाय से ले ले, वहां कितने ही बच्चे वे मोत मरते है, अगर अपनी इज्जत बेच कर किसी को हीरे जबाहरात भी मिल जाये तो वो एक खाक के समान है, हमारे बुजुर कहते थे कि पेसा तो इन नाचने वालियो के पास भी कम नही, लेकिन इज्जत???
ओर जो इस इज्जत को समझता/ समझती है वो इस कार्य को कभी सही नही कहेगी/ कहेगा. बाकी सब की अपनी अपनी सोच
धन्यवाद

राज भाटिय़ा said...

बुजुर= बुजुर्ग

डॉ टी एस दराल said...

पहले तो बधाई स्वीकारें। आपने एक अत्यंत संवेदनशील विषय पर जिक्र छेड़ा है । साथ ही बहुत ही उपयोगी तथ्य और जानकारी भी दी है , सरोगेट प्रेगनेंसी के बारे में ।
आपकी शंका का निवारण आपने स्वयं ही कर लिया है , अंतिम पैरा में ।
बेशक सरोगेसी से यदि एक संतानहीन युगल अपनी ही संतान का मुख देख पाता है तो इससे बढ़िया बात और क्या हो सकती है । कुछ केसों में गर्भ धारण करने वाली महिला को भावनात्मक कष्ट हो सकता है बाद में ।
लेकिन कहते है न , अंत भला सो सब भला ।

rashmi ravija said...

@ डॉक्टर साहब ..आपने पास कर दिया....शुक्रिया ...मैं लिखते वक़्त डर रही थी कि कहीं मेरी सीमित जानकारी में कोई तकनीकी गलती ना हो जाए.

Arvind Mishra said...

किराए की कोख से जानी संतति के मुद्दे ने अनेक नैतिक प्रश्न खड़े किये हैं -अगर जैवीय माता पिता अलग है और केवल कोख ही मुहैया की गयी है तब तो ठीक भी है मगर ५० फीसदी डी एन ऐ योगदान के बाद बच्चे को माँ से अलग कर दिया जाना बहुत ही नैतिक और गैर जवीय भी है -मैं इसे आधुनिक जैविकी का धर्मसंकट भी मानता हूँ -केवल कुछ भौतिक सुविधाके लिए यह जघन्यता स्वीकार्य नहीं है -अब तो गे भी किराए की कोख ले रहे हैं -ये क्या पालेगें बच्चों को !
आभार इस विचारोत्तेजक पोस्ट के लिए !

ashish said...

किराये की कोख , व्याहरिकता एवं आदर्शवाद के तराजू में तोली जाती है , और अलग अलग मंतव्य पाए जाते है इसके बारे में. मुझे लगता है की इस मामले में व्याहारकिता भारी है आदर्शवाद और और भावनात्मक तथ्यों पर . . सामाजिक सरोकार से जुडी पोस्ट , आभार

Udan Tashtari said...

सार्थक अलेख और गंभीर विषय...निश्चित ही गरीबी एक बड़ा कारण तो है ही.

Rangnath Singh said...

आपने बहुत जरूरी विषय को पूरी संवदेनशीलता से सामने रखा है।

Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय) said...

हर वैज्ञानिक उपलब्धि के जैसे अगर सही से इसका इस्तेमाल किया जाए तो काफी परिवारों के लिये ये वरदान है.. मेरे एक दोस्त की बहन ने इस तरीके को अपनाया है.. कई साल तो दोनों मियाँ बीवी को ये बात मानसिक रूप से समझने में लगे की उन्हें इसकी जरूरत है की नहीं... जब मियाँ बीवी राजी हुए तो इस तरीके को अपनाया गया और तरीका सफल भी रहा है...

साइड इफेक्ट्स भी हैं.. उन्हें समझने के लिये कमेंट्स सब्सक्राईब कर रहा हूँ.. इस विषय चर्चा से शायद बहुत कुछ सीखने को मिले...

sangeeta swarup said...

बहुत गंभीर विषय है...विज्ञान अपनी खोज करता है...और खोज तभी होती है जब उसकी ज़रूरत महसूस की जाती है....पर हर वैज्ञानिक खोज से केवल लाभ ही नहीं होते...यदि भारत में इस लिए किराए की कोख ली जाति है की यहाँ पर गरीब हैं और वो अपनी आवश्यकता के लिए ऐसा करते हैं तो ये सोच एक तकलीफ दे रही है....लेकिन अब तो हर चीज़ बिकती है...शायद अब माँ के अंदर की भावनाएं किसी दिन यूँ ही दम तोड़ देंगी...सब व्यापार ही रह जायेगा...खैर ये होना चाहिए या नहीं....सबकी अपनी राय और ज़रूरत हो सकती है....मुझे तो किसी अनाथ बच्चे को पालना ज्यादा उचित लगता है....

विनोद कुमार पांडेय said...

इस विषय के बारे में मैं बहुत सुन चुका हूँ पर इस प्रकार की विवेचना पहली बार पढ़ा बहुत बढ़िया और गंभीर प्रसंग उठाया आपने और इस बारे में जो भी तथ्य प्रस्तुत किया आपने वो भी बेहतरीन..

अशोक कुमार पाण्डेय said...

'गर्भ एक अवन की तरह है ,इसमें काला चॉकलेट केक बेक करना है या सफ़ेद वनिला केक यह आपकी मर्ज़ी पर है". पर यह सुन.मन थोड़ा सशंकित हो जाता है. बच्चे को जन्म देने की प्रक्रिया क्या इतनी मेकैनिकल हो सकती है.?

यह तो भयावह कथन है…एक हृदयहीन तकनीशियन का कथन...

मेरा मानना है यह भी मानवता का आगे बढ़ा हुआ कदम है और बाज़ार ने इसे भी वैसे ही वस्तु में तब्दील कर दिया है जैसे तमाम दूसरी चीज़ों को…

हरि शर्मा said...

बांझ महिलाओं के लिए एक चिकित्सा आवश्यकता के विस्तार के लिये और उनकी ममता को सम्मान देने के लिये किराये की कोख का नया चलन जहा एक स्योवागत योग्य कदम है वही इससे जुडी हुई कुछ और बाते है जो गहन विवेचना का बिषय है.

सरोगेट मदर्स और नैतिक सरोकार
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यह धनबल और गरीबी के बीच एक सेतु के रूप मे दिखाई देता है. क्या कुछ पारिवारिक उदाहरणो को छोड दिया जाये तो क्या कोई सम्पन्न महिला किसी सम्पन्न या साधारण सम्पन्न या किसी गरीब के लिये अपनी कोख किराये पर देने का बिचार करेगी. अभे तक ऐसा नही हुआ है और दुनिया के किसी भी कोने मे ऐसा होने की कोई सम्भवना भी नही है. तो फिर हम ये मान ले कि सिर्फ़ गरीब ही धन और खुशहाली के लालच मे अमीरो के ऐसे प्रस्ताव को स्वीकार करती है. यानि उस महिला के लिये तो कोख जो कि शरीर का ही एक हिस्सा है को बेचकर धन कमाने का रास्ता चुन रही है. ये सही है कि जिनके लिये वो ये कर रही है उनका प्रयास कुत्सित नही है बल्कि अपनी मजबूरी है लेकिन जो कोख दे रही है वो तो अपनी कोख बेच ही रही है जो घोर नैतिक प्रश्न खदे करता है.

इसके ज्यादा प्रचलन से ये भी हो रहा है कि पैसा खर्च करके बहुत सी महिलाये ९ माह की प्रसव पीडा से मुक्ति पाने का तरीका निकाल रही है जो निन्दनीय है. विशेष रूप से पश्चिम की अमीर महिलाये जोड़ों के दर्द और तनाव की वजह से एक प्राकृतिक प्रसव पर किराये की कोख चुन रही है

नागरिकता और अन्य कानूनी सवाल
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गुजरात के आनन्द जिले मे एक महिल ने जर्मन जोडे को किराये के कोख दी. उन बच्चो को भारतीय नागरिकता मिली गुजरात उच्च न्यायालय की बेन्च ने किराये की कोख से संबंधित सवालों पर कहा " गुजरात उच्च न्यायालय के निर्णय पर भारत के माननीय सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी गै. मामला अभी भी भारत के उच्चतम न्यायालय के समक्ष लंबित है.

rashmi ravija said...

@हरि जी, आपने कहा :
"इसके ज्यादा प्रचलन से ये भी हो रहा है कि पैसा खर्च करके बहुत सी महिलाये ९ माह की प्रसव पीडा से मुक्ति पाने का तरीका निकाल रही है जो निन्दनीय है. विशेष रूप से पश्चिम की अमीर महिलाये जोड़ों के दर्द और तनाव की वजह से एक प्राकृतिक प्रसव पर किराये की कोख चुन रही है"
हरि जी, अभी तक तो ऐसा एक भी उदाहरण प्रकाश में नहीं आया है जहाँ किसी महिला ने प्रसव पीड़ा से बचने के लिए 'सरोगेट माँ' की सहायता ली हो. चाहें हॉलीवुड स्टार हों,या 'स्पाइस गर्ल ' या रॉक म्युज़िक की कोई प्रसिद्ध गायिका या कोई मॉडल, सबने अपने बच्चे को प्राकृतिक रूप से ही जन्म दिया है जबकि उनके पास अथाह पैसा है, वे ऐसा कर सकती थीं. किसी अरबपति की पत्नी या बेटी ने भी ऐसा नहीं किया है, क्यूंकि अगर ऐसा होता तो मीडिया की नज़रों से यह खबर कभी नहीं छुप सकती थी.
जो दंपत्ति अपने बच्चे की अदम्य इच्छा रखते हैं और इतने पैसे अफोर्ड कर सकते हैं,उनलोगों ने ही ये राह चुनी है. अब भविष्य में यह क्या रूप लेगा यह तो कोई नहीं जानता .
हाँ,गरीबी के कारण हमारे देश की कन्याएं ,ऐसा करने को मजबूर हैं यह जरूर सोचनीय है और निंदनीय भी.

रश्मि प्रभा... said...

कई बुझती आँखों की रौशनी ये है, पर अक्सर मेरे अन्दर भी यह प्रश्न उठता है...
भविष्य की एक भयावह तस्वीर न हो जाये यह , यह चलन आम ना हो जाए.और कहीं इसका दुरुपयोग ना शुरू हो जाए.आज मजबूरी में वे यह प्रक्रिया अपना रहें हैं,भविष्य में यह शौक ना बन जाए.

वाणी गीत said...

मुझे ये कांसेप्ट बिलकुल अच्छा नही लगता , बल्कि अन्यायपूर्ण लगता है , जन्म देने वाली माँ के लिए ...और आर्थिक स्तर सुधारने के लिए तो और भी वाहियात ...इसकी बजाय अनाथालय से बच्चे गोद ले लिए जाने चाहिए ..कितने बच्चे तरसते हैं एक गोद के लिए ...!!

Deepak Shukla said...

नमस्कार॥

श्रीमती रश्मि रविजा जी ने आज पुनः अपनी सुपरिचित शैली में एक विचारोतेज्जक लेख प्रस्तुत किया है।
surrogate माँ की यह नयी प्रणाली, महिलाओं का आर्थिक, मानसिक और भावनात्मक शोषण कर रही है... ठीक है वीर्य या डिम्ब दुसरे का है पर जन्म देने वाली माँ ही तो है और पैसे के लिए वो बच्चे जनने का कार्य करने लगे ये मुझे उचित नहीं लगता... भले इसको क़ानूनी मान्यता ही क्यों न हो पर मेरे विचार में ये सर्वथा गलत है...

भारत में ये नयी प्रणाली विकसित होने के मुख्या कारण हैं:-
१ भारत में विश्व स्तरीय उन्नत चिकित्सा प्रणाली की सस्ती दरों पर उप्ल्भ्धता;

२ इसी महिलाओं का आसानी से मिलना जो पैसे के लिए अपना गर्भ किराये पर देने के लिए तैयार हों; और

३ इस प्रणाली की क़ानूनी मान्यता।

भारत में यूँ तो चिकत्सा tourism काफी समय से पैर पसारे है पर धीरे धीरे यह नयी प्रथा, इसे सामाजिक मान्यता न होने के बावजूद सर उठाने लगी है और इसका मुख्य कारण "आसन पैसे (easy money) " की चाह है... हालांकि इसे गरीबी से जोड़ कर देखा जा रहा है पर सत्य तो ये है की आज इस उपभोक्ता वादी संस्कृति में हर व्यक्ति पैसे की अंधी दौड़ में दौड़ रहा है और इस दौड़ में महिला, पुरुष सब शामिल हैं...इसी के चलते समाज में ऐसी surrogate माओं की कोई कमी नहीं जो अपना गर्भ बेचने या किराये पर देने में कोई संकोच नहीं समझ रहीं हैं...जब तक बाज़ार में माल बिकने को मौजूद रहेगा खरीदारों की कोई कमी नहीं होगी...और जो खरीदने को तैयार है उसके लिए क्या भारत, क्या नेपाल.... अविकसित और विकासशील राष्ट्रों की लम्बी सूची मौजूद है...

विचारोत्तेज़क लेख....

दीपक...
www.deepakjyoti.blogspot.com

रेखा श्रीवास्तव said...

बहुत ज्वलंत विषय चुना है, मेरे विचार से इसे व्यापार बना देना गलत है. अब ये व्यापार बनाता चला जा रहा है और वाकई ये हमारे देश की गरीबी है. विषय को तकनीकी ज्ञान से बहुत अच्छी तरह से प्रस्तुत किया है. इस विषय में सारी बैटन की जानकारी सबको नहीं है.
एक सार्थक लेख. बधाई हो.

Sanjeet Tripathi said...

lekh aur us par aaye comments se kafi kuchh jan ne samajhne ko mila, shukriya

Vivek Rastogi said...

जो माँ अपने कोख से बच्चा जनती है कभी कोई उसकी भावनाओं को नहीं समझता है, जो उदाहरण आपने पौराणिक पात्रों के दिये हैं तो वे मजबूरी के चलते हुए थे इसलिये नहीं कि वे अपनी कोख से बच्चा नहीं जन सकती थीं।

केवल उदाहरण के लिये देख सकते हैं, परंतु हमारी तकनीकी शायद अभी भी उतनी समृद्ध नहीं हुई है जितनी पौराणिक काल में थी।

आज जो "अवन" है, सरोगेट मदर्स किसी युगल की मजबूरी होती है, जो चाहकर भी अपना बच्चा नहीं कर पा रहे हैं, उसके पीछे बहुत सारे कारण हो सकते हैं।

हाँ ये सरोगेट मदर्स का बिजनेस बनाना बहुत ही गलत है, क्योंकि ये भावनात्मक रुप से माँ और बाप दोनों से जुड़ा होता है।

रचना said...

विज्ञान के फायदे और नुकसान दोनों हैं । सरोगेट मदर्स किसी के लिये वरदान हो सकती हैं लेकिन हमारे याहाँ अब कोख को बेचने का काम शुरू हो चुका हैं । मुंबई मे बाकायदा एजन्सी खुल चुकी हैं । एक बार सरोगेट मदर्स बन चुकी महिला को दूसरी सरोगेट मदर्स खोजने का काम भी करना होता हैं । एक महिला को २ -३ बार भी सरोगेट मदर्स के लिये इस्तमाल कर रहे हैं अस्पताल ।
विदेशो मे अब इन बच्चो को नागरिकता ना देने का निर्णय किया गया हैं क्युकी विदेशी हिन्दुस्तान मे आ कर कोख खरीद रहे है

सतीश पंचम said...

देर से पोस्ट पढ़ने का एक फायदा यह होता है कि कमेंट के जरिए पूरा सब्जेक्ट बढ़िया तरीके से, सबके मत और विचारों से अवगत होने का अवसर मिलता है।

डॉ टी एस दराल जी की बात से पूरी तरह सहमत हूँ। और भी ढेरों कमेंट है जो इस गंभीर मुद्दे को समझने में बहुत ही सहायक रहे।

और यह विषय ऐसा है कि इस पर जरूरतमंद के हिसाब से बातें सही या गलत तय होंगी।

यदि महिला अक्षम है अपनी कोख से जनने के लिए तो ऐसे में उसका सरोगेट मदर की सुविधा उठाना गलत नहीं है। और यदि यह केवल इसलिए उपयोग में लाया जाय ताकि फिगर मेंटेन रहे तो इससे दुखद बात और नहीं हो सकती।

मुंबई में एलफिंस्टन ब्रिज के पास एक लेडी डॉक्टर के यहां अक्सर भीड़ लगी देखी है । यह भीड काफी दूर दूर से आती है। पूछने पर पता चला कि उस महिला डॉक्टर के हाथ में लोग जस मानते हैं। कई लोगों की कोख उसने हरी की है। अब कितनी सच्चाई है मैं नहीं जानता लेकिन भीड दूसरे दूसरे प्रदेशों से भी आती देखी है।

अक्सर उस ब्रिज के पास से मेरा गुजरना होता था और उन लोगों के सूखे, मुरझाए चेहरे कुछ अजीब सा भाव मन में लाते थे।

बच्चों को पढ़ाई के लिए डांट डपट लगाने पर एक दिन मेरी श्रीमती जी मुझे उलाहना दे रही थी कि मैं अपने बच्चों को यूं ही डांट डपट लगाता रहता हूँ....इतने आसानी से बच्चे पा गया हूँ इसलिए उनकी कद्र नहीं करता...... जरा उनसे पूछो जो दूर दूर से बच्चे के लिए न जाने कितना कुछ दौड धूप कर रहें हैं, झेल रहे हैं। पैसे खर्च कर रहे हैं।

अब इस पर क्या कहूँ । चुप रह सुनने में ही भलाई समझता हूँ।

बाकि आपने मुद्दा गंभीर और बहुत ही अच्छे तरीके से सामने रखा है।

और हां, यह ऐसा सब्जेक्ट है जिसपर मुद्दों की टोह लेते फिल्म वाले एक बेहतरीन फिल्म बना सकते हैं। न जाने उनका ध्यान इस ओर गया है या नहीं।

rashmi ravija said...

ओह!! सतीश जी , इस विषय पर मेघना गुलज़ार ने एक बड़ी ख़ूबसूरत फिल्म बनायी है "फिलहाल' 'सुष्मिता सेन' और' तबू' ने मुख्य भूमिकाएं निभाई हैं.आज की सर्वाधिक चर्चित 'यूफोरिया बैंड' के पलाश सेन की पहली फिल्म थी ये. इसमें सुष्मिता सेन ने अपनी सहेली 'तबू' के लिए 'सरोगेट मदर' बनाना स्वीकार किया था. मानवीय भावनाओं को पूरी संवेदनशीलता के साथ दर्शाया गया है,इस फिल्मे में...और गीत-संगीत भी बहुत ही मधुर है.

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey said...

सरोगेसी में मुझे कुछ भी गलत नहीं लगता। कुछ इमोशनल मुद्दे हो सकते हैं। पर उनका समाधान समय कर सकता है। और इमोशनल मुद्दे तो कितनी तरह से बन सकते हैं।

Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय) said...

इस पर एक मूवी और भी है.. नाम मुझे याद नही है लेकिन वो ’फ़िलहाल’ जितनी खूबसूरत तो नही लेकिन ठीक ठाक है.. उस मूवी मे प्रीती ज़िन्टा, रानी मुखर्जी के लिये कोख किराये पर देती है.. लेकिन बाद मे उसे खुद उस बच्चे से प्यार हो जाता है और वो उसे देना नही चाहती जबकि कोन्ट्रेक्ट के अनुसार बच्चा रानी का है.. अच्छा इमोशनल थाट था लेकिन उसके साथ मूवी बनाने वाले लोग इन्साफ़ नही कर पाये... नीचे दिये गये एक निबन्ध मे भी एक पैरा ऐसे ही हालात को डिसकस करता है..

This essay seems nice to me: http://www.essay-911.com/samples/surrogacy.htm

"Surrogacy opponents are concerned with the rights of the surrogate mothers. They state that surrogates should have the right not to give child to the intended parents if she changes her mind during the process of the pregnancy. They speak about exploitation of the surrogate and getting profit of the unawareness of poor surrogates about their rights."

Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय) said...

*ठीकठाक = बकवास :)

rashmi ravija said...

@पंकज उस फिल्म का नाम था "चोरी चोरी चुपके चुपके' अब्बास-मस्तान द्वारा निर्देशित सचमुच कुछ ख़ास नहीं थी ..बेकार ही लगी थी...विषय भी 'रियल सरोगेट मदर' का नहीं था..रूमानी बना दिया था इसे...पर वो कमर्शियल फिल्म थी और उसके निर्देशक में इस संवेदनशील विषय को निभाने की काबिलियत भी नहीं थी

रचना said...

agar film ki baat karey to is vishy par ek film thee jismae sharmila tagor aur shabana thee bahut pehlae aaii thee aaj kae sandarbh mae wahi vastvikta haen
Doosri Dulhan naam thaa

shikha varshney said...

bahut busy hoon yaar ..aaram se aakar padhti hoon ..dolchasp lag rahi hai post

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' said...

रश्मि जी, तथ्यपरक जानकारी देते इस आलेख के लिये बधाई स्वीकार करें.
एक सवाल परेशान कर रहा है.....बात भारत की गरीबी की नहीं, ये तो सीधे सीधे व्यवसाय बन गया है. एक निश्चित-तयशुदा रकम की एवज में महिलाएं खुद सहमति दे रही हैं. सरोगेट मदर्स का कोई भी मामला ऐसा प्रकाश में नहीं आया, जहां जबरन ऐसा किया गया हो.

वन्दना अवस्थी दुबे said...

देर से आई माफ़ किया न? इतना गम्भीर मुद्दा उठाया है तुमने ,जिस पर मैं भी कभी अपनी सहमति नहीं बना सकी. वैदिक काल में राजा-महाराजा संतान-प्राप्ति के लिये इस प्रकार के प्रयास किये जाते थे. महाभारत काल में ये प्रयोग सबसे अधिक हुए. पांडु, धृतराष्ट्र और विदुर तीनों औरस पुत्र थे. सरोगेट मदर की तरह वेदव्यास को आमंत्रित किया गया था. नाम न बताने और भविष्य में कोई सम्बन्ध न रखने की शर्त तब भी थी. मुझे तो ये काम उस काल में भी अनुचित लगा और आज भी. हां ,उस समय ये व्यवसाय नहीं था, बल्कि राजवंश को चलाने के लिये किया जाता था, लेकिन आज इसने व्यवसाय का रूप ले लिया है, कोई आश्चर्य नहीं, यदि धीरे-धीरे ये ब्लैकमेलिंग में तब्दील हो जाये तो.
कितना अच्छा हो यदि संतानहीन दम्पत्ति किसी अनाथ बच्चे को गोद लें, और उसे परिवार दें.

rashmi ravija said...

@वंदना, वाणी ने एवं कुछ और लोगों ने भी यही कहा है, पर हमारे लिए यह कहना आसान है क्यूंकि हम उनकी जगह पर नहीं हैं. उनके मन पे क्या गुजरती है और अपने बच्चे को गोद में खिलाने की इच्छा कितनी बलवती होती है,हम,तुम इसे कैसे महसूस कर सकते हैं??
मेरी तरह सबने निःसंतान दम्पत्तियों को बरसों तरह तरह के इलाज का सहारा लेते जरूर देखा होगा. लाखों रुपये वे खर्च करते हैं, कितनी मानसिक परेशानी झेलते हैं, स्त्रियाँ सैकड़ों तरह के टेस्ट और शारीरिक पीड़ा से गुजरती हैं. आखिर क्यूँ?? इसीलिए ना कि उनकी गोद में खुद उनका अंश हो.वे भी आसानी कोई बच्चा गोद ले सकते थे.पर वे अनवरत प्रतीक्षा करते हैं और हर तरह की उपलब्ध चिकित्सा पद्धति का सहारा लेते हैं.इसलिए हम उन्हें कोई सलाह देने की स्थिति में नहीं हैं.

rashmi ravija said...

@ शाहिद जी,
सबसे पहले तो आपका शुक्रिया अदा करूँ..आप पहली बार मेरे ब्लॉग पर आए हैं...पोस्ट भी पढ़ी और टिप्पणी करने की जहमत भी उठायी.
'सरोगेसी एजेंसी ' वालों के लिए तो यह व्यवसाय है ही. पर गरीब महिलायें मजबूरी में ही तैयार होती हैं.'नफीसा' का ही उदाहरण है, मुंबई में 'ब्रह्म्पाड़ा' की झुग्गी झोपडी वाली बस्ती जल कर राख हो गयी. एक अकेली औरत नफीसा, अपने छोटे से बच्चे के साथ फुटपाथ पर एक प्लास्टिक शीट की छत के नीचे रहती थी. उसे जब यह प्रस्ताव दिया गया तो वह इनकार नहीं कर सकी. और उसके सर पर एक पक्की छत और जीवन स्तर में सुधार होते देख, आस-पास की दूसरी महिलायें भी 'सरोगेसी एजेंसी' का यह प्रस्ताव स्वीकारने लगीं. इसलिए गरीबी एक मुख्य कारण तो है ही.

रवि धवन said...

अगर सभी राजी है तो किसी चौथे को शायद दिक्कत नहीं होनी चाहिए।

Shubhra said...

itane gambhir subject par bahut hi kam charcha hoti hai.bharat ma jaha ham darti ko bhi maa kah kar bulate hay oar uske sath ak bawnatmak lagao rackety hay,maa ko mamta kee murat manty hai,vaha aapka lekh oar uski jankari bahut hi achhi hai.ye mamta ke bajarikarn kee taraf bi ishara karta hai.
apke lekh padhti hamesha thee,paris lekh ni kuchh likhhany ko badhhya kar diya.

Shubhra said...

itane gambhir subject par bahut hi kam charcha hoti hai.bharat ma jaha ham darti ko bhi maa kah kar bulate hay oar uske sath ak bawnatmak lagao rackety hay,maa ko mamta kee murat manty hai,vaha aapka lekh oar uski jankari bahut hi achhi hai.ye mamta ke bajarikarn kee taraf bi ishara karta hai.
apke lekh padhti hamesha thee,paris lekh ni kuchh likhhany ko badhhya kar diya.

shikha varshney said...

रश्मि एक बहुत ही गंभीर मुद्दा उठाया है इस बार ..और इस बार देर से पढ़ पाई तो सारी टिप्पणियों से और ज्यादा समझने में मदद मिली..हर वैज्ञानिक प्रगति के पीछे उसके फायेदे के साथ साथ दुषपरिणाम भी होते हैं .उसका सही उपयोग करें तो वो वरदान साबित होते हैं और गलत प्रयोग किया जाये तो अभिशाप ..ये भी एक ऐसा ही है ..हर इंसान की ये तमन्ना होती है कि वह अपने बच्चे को अपनी गोड में खिलाये परन्तु जो लोग इसमें अक्षम होते हैं उनका दर्द सिर्फ वही समझ सकते हैं और इसमें कोई संदेह नहीं कि ये पद्धति उनके लिए भगवान् के दिए किसी वरदान से कम नहीं और जो इस कार्य में उनका सहायक होता है उसके लिए भी ये किसी पुन्य से कम नहीं ...मुझे इसमें कोई बुराई नहीं लगती .हाँ हो सकता है आगे जाकर इसके परिणाम कुछ सही न निकलें परन्तु इस तरह तो हर वैज्ञानिक आविष्कार के नेगेटिव पॉइंट हो सकते हैं.

कविता रावत said...

Gambhir vishya hai yah....
ek taraf to ek Maa ko mamta milti hai lekin dusari tarah yah soch kar ki kahin dheere-dheere yah ek prampara ka roop dharan kar desh ke ek samsya na ban jay...

शोभना चौरे said...

रश्मि
बहुत ही जरुरी विषय के बारे में जानकारी दी है आज के संदर्भ में यह तकनीक अपनाना चाहिए या नही ?आज हर
जरूरत को व्यापार बना लिया है मनुष्य के रोजमर्रा केउपयोग में आने वाली भौतिक वस्तुओ के बाजार तक तो ठीक है किन्तु जो संवेदनाओ से जुडी .ईश्वर प्रद्दत अनमोल उपहार है उसके साथ खिलवाड़ कर और पैसा कमाना एक निंदनीय कृत्य है जो की चिकित्सकीय पेशे की आड़ में धडल्ले से किया जा रहा है |और जो वास्तव में इस तकनीक को अपनाकर अपने घर में खुशहाली लाना चाहते है जरा उन महिलाओ का दर्द जानिए \मै इतने विश्वास से एसलिये कह रही हूँ मैंने बहुत ही निकट से देखा और महसूस किया है उनकी लाचारी और बेबसी को उनकी तकलीफ को क्योकि तीन - तीन बार भी इस तकनीक को अपनाने के बाद उनके हाथ कुछ भी नहीं आया है और बड़े शहरों के बड़ी नामी डाक्टरों के खाते में ये केस हुए है एक बार पूरी प्रक्रिया होने के बाद और पूरे पैसे लेने के बाद
मुख्य डाक्टर कभी नहीं देखते सिर्फ असिस्टेंट डाक्टर पर ही निर्भर होना पड़ता है \
ये भी इस टेक्नीक का एक पहलू है |
और भी अनिमित्ताये होती है बहरहाल आपने एक सामयिक विषय पर जानकारीपूर्ण आलेख लिखा है |
आभार

खुशदीप सहगल said...

देर से आने के लिए माफ़ी...
नहीं जानता कि क्या वजह है लेकिन भारत में संतानहीनता के केस बढ़ते जा रहे हैं...पढ़ाई और करियर का ज्यादा दबाव...बड़ी उम्र में शादी...शादी के झट बाद बच्चे के लिए पारिवारिक और सामाजिक दबाव...कुछ भी वजह हो सकती है...
लेकिन मातृत्व सुख क्या होता है ये एक मां ही सबसे बेहतर जान सकती है..संतान न होने का दर्द वो मां-बाप ही जान सकते हैं जिन्हें इस तरह के हालात से गुज़रना पड़ता है...संतानहीनता दूर करने के लिए आईवी टेक्नीक, सरोगेसी जैसे उपाय अपनाने में कोई बुराई नहीं है...लेकिन जेनेटिक साइंस जिस तरह क्लोन और आर्टिफिशियल लाइफ क्रिएट करने में जुटी है, वो दिन दूर नहीं जब डिजाइनर बेबी की परिकल्पना भी साकार रूप लेने लगे...मेरे विचार से वो मानव का विनाश की ओर सबसे बड़ा कदम होगा...

जय हिंद...