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बुधवार, 13 अप्रैल 2011

अब प्रस्तुत है मेरे और अरशद अली के कुछ शरारती कारनामे

फर्स्ट अप्रैल  से ही युवाओं की शरारतों के किस्से पोस्ट करने शुरू किए थे...अभी श्रृंखला जारी ही थी कि क्रिकेट में  विश्व कप की जीत और अन्ना हजारे के जन आन्दोलन जैसी महत्वपूर्ण घटनाएं घट गयीं...और सामयिक पोस्ट लिख डाला. पर मूर्ख दिवस भले ही बीत गया...उसके किस्से तो सालो भर लिखे -पढ़े जा सकते हैं . पहले प्रस्तुत है 'अरशद अली' के शरारती कारनामे और अब उनका साथ देने को किसी और का संस्मरण  था नहीं सो खुद के ही लिख डाले :)



स्मार्ट दिखने की कोशिश और फलों के प्यार ने क्या हाल किया अरशद अली का.

 
सपत्नीक अरशद
मुझे याद है जब मै बहुत छोटा था तो तो प्यार से मुझे छोटू बुलाया जाता था ..मुझमे और मेरे बड़े भाई में मात्र एक वर्ष का अंतर था और हम दोनों आस-पड़ोस के सबसे सुन्दर बच्चों में सुमार थे ...पापा जब भी बाज़ार जाते तो हम दोनों के लिए कोई न कोई फल ज़रूर लाते...मगर फलों की पूरी जानकारी उस वक़्त हम दोनों के पास नहीं थी ...मै झोला में कोई फल ढूंढने  में माहिर था..यहाँ तक की इतना उतावला रहता था की पापा के आने का इंतजार करते हुए कई बार मम्मी से पूछ लेता था "पापा कब आयेंगे ".एक बार नाना के घर पर नाना  बाज़ार से सब्जी लेकर जैसे  पहुंचे ...अपनी आदत के अनुसार  मै दौड़ कर उनके झोले में झाँकने लगा....मुझे अच्छे से याद नहीं मगर कोई सब्जी जो मुझे बार बार अपने फल होने का आभास करा रही थी ..क्योंकि वास्तव में नाना जी कोई फल नहीं लाये थे..(उन्हें पता ही  नहीं था कि  उनके नाती फल के दीवाने हैं)..नाना खड़े होकर सारे शैतानियों  को देख रहे थे ..इसी बीच  मै उस  फल जैसी सब्जी को लेकर माँ-माँ चिल्लाते हुए यही पूछा कि  "माँ या खाने का है या पकाने का" ये नाना जी को अचम्भे में डालने के लिए काफी था ...क्योंकि नाना के घर मै, भाई मम्मी पापा के साथ देर रात पहुंचा था और नाना मेरे मुख से पहली चालाकी भरे वाक्य सुन रहे थे ...उसके बाद तो फल खाते खाते मै तंग रहा क्योंकि नाना जी मेरे  फल की दिवानगी को समझ चुके थे.....इसी क्रम में एक बार माँ ओल काट कर किचन में सब्जी बनाने के लिए रखी थी...और मै जैसे किचन में गया तो मुझे वो एपल (कटे हुए सेव ) के जैसा लगा और मै उनसे बिना ये पूछे की "ये खाने का है या पकाने का "दो-तीन टुकड़े  खा लिया .फिर तो पूछिये मत मेरा पूरा चेहरा सूज  गया...मम्मी-पापा आस-पड़ोस सभी परेशान हो गए ...जाने कितने निम्बू के आचार को खिलाया गया..तब  जाकर मुझे आराम मिला ...

दूसरी एक घटना जो मै भुलाए नहीं भूलता ...मेरे पापा बेहद सलीके से रहने के कारण पूरे  आस पड़ोस में सबसे स्मार्ट दीखते थे 
मै और मेरे भाई में हमेशा पापा जितना स्मार्ट दिखने की होड़ लगी रहती थी...मुझे पापा ने इतना प्रभावित कर रखा था की उनके सभी हरकत  पर मै नज़र रखता था जैसे वो कब नहाते है कपडे कैसे पहनते हैं आदि आदि ....पापा रोज़  दिन शेविंग करते थे ..और अभी भी करते हैं ..उन्हें मै दो चार दिनों से नोटिस कर रहा था ..मुझे उनके स्मार्ट दिखने का कारण उनका शेविंग करना लगने लगा ...फिर क्या था एक मौके की तलाश में रहने लगा ...कुछ ही दिनों के बाद मुझे मौका मिल गया ,माँ पड़ोस की आंटियों के साथ बाहर बातें कर रही थी ..मै घर पर अकेले था ...पापा का शेविंग किट उठाया ,रेजर में ब्लेड लोड किया ..शेविंग क्रीम गालों पर लगाया ...और जैसे हीं गाल पर रगडा मुझे वो आवाज़ (किर-किर ) नहीं मिली जो पापा के शेविंग करने पर आती थी...मुझे लगा मुझसे कोई गलती हो गयी है शायद ब्लेड काम नहीं कर रहा ...चेक करने के लिए मैंने रेजर को अपने सर के दाहिने तरफ  के बाल पर रगडा..और रगड़ते हीं कुछ बाल बाहर आ गए ...किसी तरह आईने में अपने चेहरे को देखा और बहुत डर गया...मुझे लगने लगा अब मेरे सर के इस हिस्से पर बाल कभी नहीं आएगा....दौड़ कर पापा के टेबल से गोंद निकाल  कर बाल को सर पर साटने का अथक प्रयास किया मगर विफल   रहा ....धीरे धीरे ये बात मम्मी से पापा ...और बढ़ते बढ़ते पुरे आस पड़ोस में फ़ैल गयी ....पापा बड़े प्यार से समझाते हुए मेरे पुरे बाल को हज़ाम से उतरवा लाये....अब मै पूरा टकला था और कई  महीनों तक पापा जैसा स्मार्ट भी नहीं दिखा ....

जाने ऐसी कितनी और बातें है ...मगर ये दो घटनाएं हमेशा मुझे गुदगुदा जाती हैं ....पापा-मम्मी भी हँसे बिना नहीं रह पाते.
सरिता, मैं, सोना और रेखा


उम्र के हर मोड़ पर की गयी कुछ शरारतें


पिछली बार जब बाल-दिवस पर और इस बार मूर्ख दिवस पर लोगो को परिचर्चा का आमंत्रण  भेजा तो कुछ लोगो का उत्तर आया..."मैं तो बड़ा सीधा- साधा था...पढ़ने-लिखने वाला...अनुशासनबद्ध छात्र...कभी कोई शरारत की ही नहीं." और फिर मैं सोचने लगी...मैं भी पढ़ने में अच्छी ही थी {अब मौके का फायदा उठा कर बता ही दूँ  कि हमेशा क्लास में फर्स्ट आती थी....दो बार स्कॉलरशिप भी मिली :)} कभी अनुशासन  भी नहीं तोडा..पर शरारतें तो खूब कीं....सबने किए होंगे....शायद फर्क ये है कि..मैने याद रखे हैं वे लोग जरूर भूल गए होंगे.

जब पांचवी या छठी कक्षा में थी..तभी मुझे पहली बार फर्स्ट अप्रैल की खासियत पता चली. उन दिनों पापा, लंच टाइम में  ऑफिस से घर खाना खाने आया करते थे. उन्होंने खाना शुरू ही किया था कि पड़ोस वाली आंटी का नौकर साफ़ कपड़ों से बंधी एक  नई मिटटी की हांडी लेकर आया और बोला...कि "उनके गाँव से ताज़ा दही आया है". पापा खुश होकर मम्मी से बोले.."एकदम सही समय पर लाया है जल्दी से कटोरी में डाल, ताज़ा दही ले आओ" पर उस मिटटी की हांडी में था चावल का मांड और सब्जियों के छिलके. मम्मी ने फिर से हांडी के मुहँ पर कपड़ा बाँध 'रामबिहारी' के हाथों दूसरी आंटी के यहाँ भिजवा दिया...और फिर तो वो हांडी शाम तक घर-घर घूमती रही.

बड़ों की ये शरारत देख मुझे भी एक आइडिया आया. उन दिनों क्रीम बिस्किट इतना आम नहीं हुआ था. पापा जब पास के बड़े शहर जाते, तब लेकर आया करते थे. मैने बड़ी सफाई से उन बिस्किट्स का क्रीम निकाल कर उसपर मिटटी का लेप लगा कर रख दिया. शाम को कॉलोनी के सारे बच्चे इकट्ठे होकर खेलते थे और किसी ना किसी के घर पानी पीने के लिए जाया करते. उस शाम मैने उन्हें घर पे क्रीम बिस्किट की बात बतायी और सब बड़े खुश-खुश चले आए...पर एक बाईट लेने के बाद ही उनकी  थू थू करती  हुई  अजीब सी मुखाकृति और अपना पेट पकड़ कर हँसना अब तक याद है...(पता नहीं अब वो रीता,अक्षय, मिथिलेश, सीमा, अनीता, मोहन,प्रतिमा, कहाँ होंगे .)

फिर मैं हॉस्टल में चली आई. हॉस्टल में हमलोगों को  नाश्ते में रोज़ अलग-अलग चीज़ें मिलती थी. उस फर्स्ट अप्रैल को शायद बुधवार था और उस दिन हमें कुरमुरे  और जलेबी मिला करते  थे. मैं किसी काम से बाहर आई तो देखा मेट्रन दी, प्यून को ...जलेबी लाने के लिए पैसे दे रही हैं. प्यून के गेट से बाहर जाते ही मुझे शरारत सूझी और मैने जाकर नाश्ते की घंटी बजा दी . मेस से महाराज और प्रमिला, कामख्या (मेस में काम करने वालीं ) निकल  कर देखने आयीं कि जलेबी तो अभी आई नहीं...घंटी कैसे बज गयी. मैने उन्हें चुप रहने का इशारा करते हुए बताया कि आज पहली तारीख है,..आज के दिन लोगो को बुद्धू  बनाते हैं. सारी लडकियाँ खुश होते हुए बातें करती हुई आ रही थीं कि आज तो जलेबी है नाश्ते में. पर जब इंतज़ार करना पड़ा तो सबने कटोरी चम्मच बजा और मेज़ थपथपा कर इतना शोर मचाया और 'रश्मि जलेबी लाओ...' का इतना नारा  लगाया कि मेट्रन आ गयीं. पर उन्होंने भी sportingly लिया और मुझे डांट नहीं पड़ी.

लेकिन हमारी कॉलेज की लेक्चरर इतनी sporting नहीं थीं. बी.ए. में इंग्लिश के लेक्चर में दो सेक्शन एक साथ क्लास अटेंड करते. पहली मंजिल पर क्लास होती थी. मुझे और मेरी फ्रेंड प्रियदर्शिनी ने एक आइडिया सोचा जिस से लेक्चरर और स्टुडेंट्स दोनों को एक साथ बुद्धू बनाया जाए. हमने  मेज पर चढ़कर  ऐलान कर दिया कि मैडम के पैरों में दर्द है...वो सीढियाँ नहीं चढ़ पाएंगी...इसलिए क्लास नीचे लेंगीं. सारी लडकियाँ गिरती-पड़ती नीचे भागीं. थोड़ी देर बाद हमने पिलर के पीछे से छुपकर देखा, मैडम बड़ा सा रजिस्टर उठाये उपरी मंजिल की तरफ जा रही हैं. पर पूरी क्लास खाली देखते ही उनका पारा चढ़ा गया और लौटती हुई उनकी तेज चाल ने ही उनके मूड का रहस्य  खोल दिया. काफी देर इंतज़ार करने के बाद दो लडकियाँ स्टाफ रूम में देखने  गयीं कि मैडम क्यूँ नहीं आ रहीं? बाद में पता चला,उन्हें बहुत डांट पड़ी...लेकिन हमारी एकता ऐसी थी कि उनलोगों ने हम दोनों का नाम नहीं बताया.

श्रावणी, बबिता, कविता और सुष्मिता
स्कूल-कॉलेज के बाद घर- गृहस्थी में जुट गयी...पर पुरानी  आदत तो आसानी से जाती नहीं. कुछ साल पहले जब टाटा स्काई और डिश टी.वी. का चलन नहीं था..सबके यहाँ केबल टी.वी ही था. यहाँ मुंबई में पाइरेटेड सी..डी. के लिए बहुत ही सख्त नियम हैं. अगर केबल पर नई फिल्म दिखाई गयी तो पुलिस केबल वाले को पकड़ कर ले जाती है. फिर भी हमारा  केबल वाला दर्शकों के डिमांड पर रिस्क लेकर कभी-कभी फ़िल्में दिखा दिया करता था. उन दिनों 'ब्लैक' रिलीज़ ही हुई थी. और हम सब सहेलियों का देखने का मन था.  पास की ही एक बिल्डिंग में मेरी कई  फ्रेंड्स रहती हैं..सोना, रेखा, शशि, सुष्मिता, कविता...मैने ग्यारह बजे के करीब सबको फोन करके कहा कि "टी.वी. ऑन करो....केबल पर  'ब्लैक'  आ रही है " सोना की  बेटी आनंदिता  ने फोन उठाया और ख़ुशी से चीख पड़ी..और अपने भाई को डांटने लगी..."जल्दी चैनल चेंज करो " सुष्मिता ने अफ़सोस से कहा.."मेरा खाना नहीं बना नहीं बना रे अभी तक "...मैने कहा "अरे बाहर से मंगवा लो...ये मौका निकल जाएगा.." हाँ, ऐसा ही  कुछ करुँगी..." कहते फोन रख दिया उसने. शशि की बेटी तो तुरंत फोन पटक कर बगल में अपनी  सहेली को बताने के लिए भाग गयी. कुछ देर बाद सबके  फोन भी आए..."नहीं आ रहा.." मैने कहा.."अभी हटा दिया है ...थोड़ा इंतज़ार करो फिर से लगाएगा"

शाम को वे  सारी सहेलियाँ अपनी बिल्डिंग के गार्डेन में मिलती हैं...जब शाम को मिलीं तो पता चला कि सबके पास ही मेरा फोन  गया था. वे सब मेरे घर पर धावा  बोलने वाली थीं कि अब कहीं से भी सी.डी. मँगा  कर दिखाओ...पर रहम करके मुझे छोड़ दिया.


{ अब बच्चे  और पतिदेव कैसे बाकी  रहते बेवकूफ बनने से....पर उनलोगों को बनाने की जरूरत पड़ती है क्या?? :):) ....लिख तो दिया ये, अब प्रार्थना कर रही हूँ कि ये पंक्तियाँ  वे लोग ना पढ़ें }
अगली पोस्ट में वे अनुभव 

बुधवार, 16 मार्च 2011

डोर को सुलझाने का यत्न....पर सिरा है कि मिलता नहीं


होली पास है...लोगो में उमंग और उत्साह है...वहीँ कुछ घर ऐसे हैं...जिनकी होली अब कभी भी पहले जैसी नहीं रहेगी.

(जापान  पर आई प्राकृतिक आपदा तो सदियों तक मन दुखायेगी. पता नहीं कितने लोगो ने अपना  सब कुछ खो दिया और कितने लोगो ने अपनों के साथ अपनी ज़िन्दगी भी  खो दी...हम उनका दुख महसूस कर बस अपनी श्रद्धांजलि  अर्पित कर सकते हैं )

यहाँ मुंबई में ही दो दिन के अंतराल पर घटी दो घटनाओं की खबर ने अंतस को झकझोर डाला है. और सामने  कई सवाल ला खड़े किए है. (होली पर संस्मरण वाली दो पोस्ट और लिखने की योजना थी...पर अब सारा मूड गया )
इस वक्त ऐसी ग़मगीन पोस्ट, शायद नहीं लिखनी चाहिए....पर हमारे तो कुछ पल ही उदासी में गुजरेंगे...पर उन आँखों का क्या जहाँ उदासी ने ही घर बना लिया...और जो अब शायद कभी मुस्कुरा ना सकें.

इकतीस वर्षीया  एक महिला, निधि गुप्ता ने अपने सात वर्षीय बेटे और तीन वर्षीया  बेटी के साथ, उन्नीसवीं मंजिल से छलांग लगा दी. निधि   CA थी. और एक कॉलेज में लेक्चरर भी. संयुक्त परिवार में रहती थी. शादी के बाद , उसने ससुराल वालों की मर्जी से नौकरी छोड़ दी और  सिर्फ घर की देखभाल  करने लगी..पति शराबी था और बिजनेस में ध्यान नहीं देता था....फिर वो पति के साथ सूरत शिफ्ट हो गयी...पति ने नया बिजनेस  शुरू किया...निधि ने भी  नौकरी कर ली...ज़िन्दगी पटरी पर आ ही रही थी
कि बड़े भाई को मुंबई में बिजनेस में घाटा हुआ और उसके माता-पिता ने जोर डाला कि निधि का पति,सूरत का अपना  बिजनेस बेच कर ,मुंबई आ,अपने भाई  की सहायता करे. यहाँ सारा फाइनेंस बड़े भाई की पत्नी के हाथों में था और निधि अपनी जरूरतों के लिए उन पर ही  निर्भर थी. (जरूर उसके लेक्चरर की तन्खवाह इतनी नहीं होगी कि वो अपने बच्चों की सारी जरूरतें पूरी  कर सके ) पति भी अपनी फ्रस्ट्रेशन उस पर निकालता ....जेठानी..और सास भी उसे मानसिक रूप से परेशान करती थीं. निधि के  माता-पिता भी मुंबई में रहते थे...उनसे निधि की रोज बात होती थी. आज उसके पिता कहते हैं...."हमने बेटी की परेशानी नहीं समझी" . अगर समझते  भी होंगे तो  हिन्दुस्तान के हर पिता की तरह यही निर्देश दिया होगा.."निभाओ...अब वही तुम्हारा घर है...." जबकि चाहते तो निधि की परेशानी जानकर उसे अपने साथ रहने को कह  सकते थे. पढ़ी -लिखी थी....माता-पिता के स्नेहिल छाया में शायद उसे जीने का संबल मिल जाता.  लेकिन पिताओं को अपनी इज्जत प्यारी होती है..समाज में साख की चिंता होती है. कुछ-कुछ ऐसी ही स्थिति से गुजरती लड़की को उसके पिता ने एक कोटेशन सुनाया था (इसपर मैंने एक पोस्ट लिखी थी) " धी धरणी को धीरज धरना ही पड़ता है" निधि के पिता ने भी शायद यही समझाया हो.

आज उनकी धी...धरणी में मिल गयी...और उन्होंने धीरज धरा हुआ  होगा. 

आज वे अफ़सोस कर कहते हैं..."We  failed to see the signs ,We let down our daughter " निधि के पिता अब शायद इस पश्चाताप से कभी ना उबरें...कि उन्होंने समय रहते अपनी बेटी की मदद नहीं की.
 
निधि बेशक कमजोर थी...चाहती तो हालात का सामना कर सकती थी.....हालांकि मुंबई जैसे शहर  में सिर्फ अपनी लेक्चरर की तनख्वाह पर दो बच्चों के साथ सर पे छत जुटाना, उनकी अच्छी शिक्षा- दीक्षा ,पालन-पोषण संभव नहीं.....हाँ, वो  ससुराल वालों  के ताने...उनकी उपेक्षा सहते हुए ,उस दमघोंटू वातावरण में ,अपने बच्चों को बड़ा कर सकती थी. आखिर  सदियों से अब तक कितने ही घरों में ऐसी स्थितियों का सामना स्त्रियाँ करती ही आई हैं. पर सबके दुख सहने की और परिस्थितयों का सामना करने की क्षमता अलग होती है..इसका अर्थ ये नहीं कि उसे मर जाना चाहिए. शायद  इस घटना से बाकी पिता भी सबक लें...और समय रहते अपनी बेटी की मदद के लिए आगे आएँ....क्यूंकि निधि की बड़ी बहन ने भी कहा.."निधि बहुत ही well behaved और सब कुछ सह कर मुस्कुराते  रहने वाली  लड़की थी...उसके ससुराल  वाले उसे फॉर ग्रांटेड लेने लगे और यही समझते रहे...'यह तो बिना प्रतिवाद किये सब कुछ सह लेगी"


दूसरी खबर भी कम दिल दहला देने वाली नहीं ..छठी कक्षा में पढनेवाली, एक ग्यारह वर्षीया  लड़की ने अपने क्लास के एक लड़के के लिए अपनी फीलिंग एक डायरी में लिखी थीं. उसकी अनुपस्थिति में उसकी माँ ने वह डायरी देख ली. उस से भी  जबाब तलब किया होगा...फिर इसकी शिकायत...उसकी क्लास टीचर और प्रिंसिपल से करने स्कूल गयीं. क्लास टीचर से तो शिकायत कर दी..लेकिन माँ प्रिंसिपल से भी मिलने के लिए अड़ी हुई थीं. बेटी बार-बार उन्हें प्रिंसिपल से मिलने को मना कर रही थी...जब माँ, प्रिंसिपल से मिलने के लिए स्कूल में ही रुकी रही तो बेटी स्कूल से घर  आ गयी और पंखे से....

माँ को इतने सेंसेटिव  इशु को बहुत ही कुशलता और संवेदनशीलता से हैंडल करना चाहिए था पर माँ ने भी शायद बदले हुए समय को नहीं समझा और उनके जेहन में अपने समय की ही किसी घटना की कोई स्मृति होगी और उन्होंने बस एक बने बनाये ढर्रे की तरह एक्शन ले डाला. 
 

इसी से मिलती जुलती एक घटना मेरे स्कूल होस्टल में घटित हुई थी. मुझसे सीनियर एक लड़की ने अपनी सहेली के भाई को एक ख़त लिखा था .उस वक्त उनकी उम्र चौदह-पंद्रह की होगी . उनके ही कमरे की एक लड़की ने सोने का बहाना कर दोनों सहेलियों को बातें करते,ख़त लिखते देख लिया था. उसने मेट्रन से ये शिकायत कर दी. जब वह ख़त एक डे स्कॉलर को पोस्ट करने के लिए वो दे  रही थी...तभी, उस लड़की के साथ मेट्रन ने उसे पकड़ लिया.(हमारे होस्टल में हर ख़त पहले मेट्रन की आँखों से सेंसर होकर गुजरता था...घर से आए पत्र भी हमें खुले हुए मिलते थे...उन्हें पहले मेट्रन पढ़ती थीं )
 

प्रिंसिपल को भी इसकी सूचना दी गयी....और पूरे हॉस्टल की लड़कियों के सामने उसकी बहुत बेइज्ज़ती की गयी. उस लड़की के पिता को बुलवाया गया  और उसे स्कूल से निकाल दिया गया. आज भी वो दृश्य आँखों के सामने है...वो रोते हुए मेट्रन का पैर पकडती,...वे जोर से पैर झटकतीं  तो वो प्रिंसिपल का पैर पकडती....पिता के सामने भी उसे बहुत  खरी-खोटी  सुनायी गयी.

पिता ने उसे दूसरे स्कूल के हॉस्टल में डाल दिया....वहाँ भी उसकी गाथा लोगों को पता चल गयी...यहाँ तक कि दो साल बाद उनकी छोटी बहन  भी हमारे हॉस्टल में ही आई ,उस पर  भी गाहे-बगाहे अपनी बड़ी बहन के कृत्य  को लेकर छींटाकशी  की जाती. उस वक्त तो मुझे भी उनका ये कृत्य ,अक्षम्य अपराध की श्रेणी में लगा था . पर बाद में अक्सर ये घटना मुझे याद आती...और मैं सोचती, किशोरावस्था में एक ऐसे निर्दोष से कृत्य की इतनी बड़ी सजा सुनायी गयी उन्हें.
 

पर तब और अब की घटना तो एक जैसी  है...पर इसके बाद लड़की द्वारा उठाये गए कदम में जमीन-आसमान का अंतर है.
इतनी जिल्लतें उठाने के बाद भी हमारी वो सीनियर आज कहीं बाल-बच्चे ..पति के साथ एक सुखी वैवाहिक जीवन  बिता रही होगी...और इस लड़की ने मात्र इसकी  आशंका  से अपनी इहलीला  ही समाप्त कर ली. 


आखिर क्यूँ सबकी सहनशक्ति शून्य से  भी कम हो गयी है. क्या पहले लडकियाँ/औरतें इसे अपना नसीब समझ लेती थीं? वे ये सोचती थीं...कि वे इसी काबिल हैं...उनके साथ ऐसा ही होना चाहिए और चुपचाप सब सह लेतीं थीं.  और आज वे अपने साथ किए गए ऐसे व्यवहार को गलत मानती हैं...लेकिन उस गलत को सही नहीं कर पातीं और पलायन का रास्ता अख्तियार कर लेती हैं ?

इसी विषय से सम्बंधित मेरी और दो पोस्ट

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