जब अपनी सहेली के साथ ,'बरसात का एक दिन' गुजारा था...और उन यादों को यहाँ पोस्ट में बाँटा भी था, तभी उस जैसे ही गुजरे एक रोचक दिन की याद हो आई थी, अगली पोस्ट ही लिखने की सोची थी पर बीच में ये फिल्म उड़ान, राखी,ओणम आ गयी....अभी भी गणपति की तैयारियों में व्यस्त हूँ फिर भी कुछ ना लिखूं तो खालीपन सा महसूस होता है (और कहीं आपलोग इस ब्लॉग का रुख ही ना भूल जाएँ... ये डर भी है :) )
दो,तीन साल पहले की बात है...दोनों बेटों को स्कूल की तरफ से पिकनिक पर जाना था. उनकी तैयारियाँ चल रही थीं. पतिदेव घर आ चुके थे और अपने प्रिय सोफे पर विराजमान हो टी.वी. पर नज़रें जमाये बैठे थे. उनकी नज़रों का अनुसरण करते हुए देखा तो पाया उनकी नज़रें 'ऐश्वर्या राय' पर जमी हैं. 'जोधा अकबर' का प्रोमो चल रहा था. मैने मौके का फायदा उठाया और पूछ डाला,"ये फिल्म देखनी है?"
"हूँ"
अब पति लोगों की इस 'हूँ' का अर्थ कुछ भी हो सकता है. या तो ये, कि 'बात सुन ली गयी है' या कि 'सोचेंगे' या 'हाँ' भी हो सकता है. तभी बेटा कुछ पूछने आ गया और मैं भी उसके साथ चली गयी.फिर सब कुछ भूल गयी.
दूसरे दिन दोनों बेटे सुबह साढ़े छः बजे ही चले गए और शाम छः के पहले नहीं आनेवाले थे. पूरे दिन का समय था मेरे पास. उन दिनों ब्लॉग्गिंग भी नहीं करती थी वरना कहानी की एकाध किस्तें ही लिख डालती. ग्यारह बजे के आस-पास एक सहेली का फोन आया जो कुछ महीने पहले काफी दूर शिफ्ट हो गयी थी. उसके बच्चे भी स्कूल पिकनिक पर गए थे.(जनवरी, फ़रवरी यहाँ पिकनिक का मौसम होता है ). हम दोनों काफी दिनों से नहीं मिले थे. दोनों का एक दूसरे को अपने घर बुलाने का सिलसिला शुरू हो गया. फिर हमने सोचा, एक चहारदीवारी से निकल दूसरी में जाने का कोई मतलब नहीं है. और अचानक उसने पूछा, "जोधा अकबर देखने चलें? मुझे यहाँ अभी कम्पनी नहीं मिल रही." और मैं तैयार. जल्दी से अखबार निकाले गए और दोनों के घर से जो थियेटर ,पास था. वहाँ जाना तय किया. पतिदेव को फोन लगाया तो कनेक्ट नहीं हुआ.( हमेशा की तरह किसी मीटिंग में व्यस्त होंगे.) पंद्रह मिनट में तैयार हो हम थियेटर भी पहुँच गए. टिकट भी मिल गयी तो सुकून आया.
हम, काफी दिनों बाद मिले थे तो जाहिर है फिल्म देखने से ज्यादा हम अपनी बातों में मगन थे. आस-पास बैठे मुंबई के दर्शकों को भी कठिन उर्दू शब्दों से भरी इस फिल्म से ज्यादा रोचक शायद हमारी बातें लग रही थीं .क्यूंकि किसी ने नहीं टोका. कभी अपनी आवाज़ जरूरत से ज्यादा तेज़ पाकर हम खुद ही चुप हो जाते.
फिल्म ख़त्म होने के बाद, 'बरिस्ता ' का एक कप कॉफी का आमंत्रण ठुकराना संभव नहीं था. राज भाटिया जी और सतीश पंचम जी शायद इस बार हमें महाकंजूस की उपाधि से नवाज़ें क्यूंकि हमने एक ही प्लेट 'सिज़्लिंग ब्राऊनी' शेयर किया. अब असर हो ना हो पर कैलोरी का ध्यान तो रखना ही पड़ता है. वैसे भी उनलोगों के टोकने पर ही मेरा ध्यान गया कि सचमुच शॉपिंग , फिल्म के साथ हम सहेलियों का खाने -पीने पर बहुत कम ध्यान रहता है. पर हाँ...महीने दो महीने में सब मिलकर लंच के लिए जरूर जाते हैं और तब सिर्फ लंच ही करते हैं (महिलायें हमेशा organized होती हैं. मिक्स नहीं करती चीज़ों को :) )
बच्चों के वापस आने से पहले हम अपने अपने घर पहुँच गए. गन्दी यूनिफॉर्म, गंदे जूतों, ढीली टाई,बिखरे बाल और अनछुई टिफिन के साथ बच्चे वापस आए. उनकी उत्साह से भरी बातें सुनने में व्यस्त थी कि पतिदेव ने प्रवेश किया और आते ही अनाउंस किया, "कल की 'जोधा-अकबर' की चार टिकटें बुक कर दी हैं."
अभी तक तो मैं किसी को बता भी नहीं पायी थी कि मैने यह फिल्म देख ली है. और मैने होठ सी लिए. लौटते समय, कार में जब मैने बताया कि मैने तो एक दिन पहले ही यह फिल्म देख ली थी. तो बच्चे और पतिदेव आश्चर्य से मुझे घूरने लगे कि ' चार घंटे की इतनी स्लो फिल्म ,दो दो बार झेलने की हिम्मत मुझे कैसे हुई?' अब उन्हें क्या पता कि पहली बार तो बस हम बातें ही करते रहें. कितने सारे डायलॉग और प्रसंग नज़रों से छूट गए थे,जिन्हें इस बार ध्यान से देखा.
पर इस से भी ज्यादा मजेदार वाकया, मेरी सहेली वैशाली के साथ हुआ. हमारे ग्रुप में बाकी सबने यह फिल्म अपनी बहन..कोई दूसरी सहेली या फिर अपने पति के साथ देख ली थी (ऐश्वर्या के नाम पर कईयों के पति मेहरबान हो गए थे :)). वैशाली ने पास में रहने वाली अपनी ननद से चर्चा की तो उन्होंने भी कहा, "हाँ देखते हैं" पर कुछ निश्चित नहीं हुआ था.
और एक दिन उसकी दिल्ली से आई एक सहेली ने फोन किया और साथ में यह फिल्म देखने का आग्रह किया. वैशाली भी उसके साथ 3 से 6 का शो देखने चली गयी. अभी फिल्म देखकर निकली ही थी कि उसकी ननद का फोन आया कि उन्होंने , 9 से 12 , नाईट शो की टिकटें बुक कर दी हैं. वैशाली ने मुझे फोन मिलाया और बताया कि उसने तो कपड़े तक नहीं बदले. घर आकर कुछ काम निपटाए और उसी ड्रेस में दुबारा चार घंटे की फिल्म देखने चली गयी.पर उसने भी दूसरी बार ही ध्यान से देखा, पहली बार तो गप्पें ही चल रही थीं.
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