Monday, February 7, 2011

'इंदिरा शेट्टी' की यादों में बसा....तालेगांव

एक शाम अपनी सहेली  इंदिरा शेट्टी के घर पर, हम सब चाय के लिए इकट्ठे हुए थे. पुट्टू...अप्पम...इश्टू, वडा साम्भर का स्वाद...इंदिरा के अनुभवों के खजाने में से निकलते यादों के मोतियों के आलोक में कुछ और बढ़ गया था. किसी भी घटना का वर्णन इंदिरा कुछ इतने रोचक अंदाज़ से करती है कि लगता है...हम उस कालखंड में पहुँच गए हैं और सबकुछ हमारी आँखों के सामने घटित हो रहा है. और उस दिन तो वे एक बीहड़ गाँव में अपनी पोस्टिंग का किस्सा बता रही थीं और हम सब आश्चर्य कर रहे थे कि बचपन से चेन्नई और मुंबई जैसे महानगर में पली-बढ़ी, महानगरीय जीवनचर्या की आदी इंदिरा ने कैसे वहाँ एडजस्ट किया होगा. 
पर ये किस्सा  सुनते हुए मेरे दिमाग में कुछ और ही चल रहा था. इंदिरा बैंक में कार्यरत थीं. अभी हाल में ही उन्होंने VRS लिया है. वैसे वे काफी घूमती रहती हैं,(और हर जगह..दुबई...मिस्त्र..सिंगापुर..केरल...आदि से हमारे लिए नायाब तोहफे लाना नहीं भूलतीं...एक बार हम सब सहेलियों को एक सी केरल  की परम्परागत साड़ी भेंट की थी...जिनकी तस्वीरें यहाँ हैं ) फिर भी जब उनके पति टूर पर होते हैं तो काफी समय उन्हें अकेले बिताना पड़ता है. मैं यह सोच रही थी कि क्या ही अच्छा हो अगर वे अपने इन सारे अनुभवों को कलमबद्ध कर डालें...मैने  उन्हें एक अंग्रेजी ब्लॉग बनाने की सलाह दे डाली. उस वक्त तो उन्होंने टाल दिया..'अच्छा सोचूंगी'. पर बाद में भी कह दिया ब्लॉग  बनाना उनके वश का नहीं. तो मैने कहा , आप अपना यह अनुभव लिख कर मुझे भेज दीजिये. मैं अनुवाद करके अपने ब्लॉग पर 'अतिथि पोस्ट' के रूप में प्रकाशित करुँगी.

यह फरमाइश भी कई तकाजों के बाद पूरी हुई. जो लोग नहीं लिखते...उन्हें लगता है,जैसे लिखना कितना कठिन कार्य है...खैर एक दिन इंदिरा ने बस कलम उठायी और बेहद सहज और रोचक शैली में लिख डाला. वह रोचक संस्मरण उन्ही के शब्दों में.


अतिथि पोस्ट : इंदिरा शेट्टी

मेरी पदोन्नति बैंक मैनेजर के पोस्ट पर हो गयी थी और मैने इस पोस्ट पर काम करना शुरू ही किया था कि अचानक ट्रांसफर का फरमान आ गया. वह भी एक गाँव  'तालेगांव दाभाडे' में, जिस जगह का नाम मैने कभी सुना तक नहीं था. यह मुंबई से १३५ किलोमीटर दूर था. मेरे लिए  यह बहुत ही मुश्किल घड़ी थी क्यूंकि मेरी बेटी मुंबई में कॉलेज में पढ़ रही थी,उसे अकेला छोड़ना पड़ता.

मुझे विश्वास था कि आफिसर्स यूनियन जरूर हस्तक्षेप करेंगे, जिसके जेनरल सेक्रेटरी मेरे पति थे. क्यूंकि मेरे साथ ही दो और महिलाओं की पदोन्नति हुई थी और उन्हें अच्छी जगह पोस्टिंग मिली थी. और महिलाओं को अमूमन बीहड़ गाँव में नहीं भेजा करते. पर मेरी पोस्टिंग के पीछे कुछ पौलिटिक्स भी थी. मैनेजमेंट इस इंतज़ार में थी कि यूनियन अच्छी जगह पर पोस्टिंग का अनुरोध करें. पर मेरे सिद्धांतवादी पति ने कहा कि वे इसकी सिफारिश नहीं करेंगे ,और मुझे वहीँ ज्वाइन करना होगा.

परिवार को छोड़कर एक बिलकुल अनजान गाँव में जाना एक बहुत
ही कष्टदायक अनुभव था. मुंबई में रहकर भी...मलयालम..तमिल...अंग्रेजी पर ही मेरा अच्छा अधिकार है...मराठी तो ठीक से समझ में भी नहीं आती थी और..उस गाँव में सिर्फ मराठी ही बोली  और समझी जाती थी.
आज पुणे एक्सप्रेस हाइवे और वहाँ एक  मेडिकल कॉलेज खुलने की वजह से, तालेगांव बिलकुल एक शहर में तब्दील हो गया है पर १९९९ में, वहाँ सड़कें भी नहीं थीं. वहाँ ऑफिसर्स क्वार्टर नहीं थे. मुझे एक किराए के मकान में ठहराया गया, जहाँ कोई भी फर्नीचर नहीं था और पानी की सप्लाई तक नहीं थी. दरवाजे और खिड़कियाँ पूरी तरह बंद भी नहीं हो पाते थे .वहाँ अकेले रहना एक बहुत ही डरावना,अनुभव था..रात मेरी आँखों में कट जाती. एक महीने बाद मैने खुद ही एक कुछ ढंग का मकान ढूँढा और एक टेलीफोन भी लगवाया.पर वो ज्यादातर डेड ही रहता. बिजली अक्सर नहीं रहती. मेरे जैसे बात करने की शौक़ीन के लिए वो एक काले-पानी की सजा से कम नहीं था. शाम होते ही सबकुछ शांत और स्तब्ध हो जाता,रात के सन्नाटे में सिर्फ झींगुर की आवाजें गूंजती  रहतीं.

बैंक  का ब्रांच भी, वॉल्यूम, बिजनेस और मेरे ग्रेड के हिसाब से बहुत छोटा था.पर मैं धीरे-धीरे एडजस्ट  करने लगी थी. मुंबई में घर जाना भी महीने में एक बार ही हो पाता  क्यूंकि वहाँ तक की यात्रा बहुत ही कष्टदायक थी. ब्रांच बहुत ही इंटीरियर में था और वहाँ से, पुणे हाइवे तक आना पड़ता और फिर किसी भी सवारी को हाथ दिखा,लिफ्ट लेनी होती. उन दिनों एक्सप्रेस हाइवे नहीं शुरू हुई थी और खंडाला घाट में ट्रैफिक जैम में घंटो फंसे रहना पड़ता था.घर पहुँचने में कभी-कभी रात के बारह भी बज जाते.

इन सबका असर मेरे स्वास्थ्य पर भी पड़ने लगा, मेरा ब्लड प्रेशर बहुत ही हाइ रहने लगा. वहाँ मेडिकल फैसिलिटी बिलकुल ना के बराबर थी. एक गन्दा सा सरकारी अस्पताल था. दो बार मेरा ब्लड प्रेशर खतरनाक रूप से बढ़ जाने के कारण, उसी अस्पताल में एडमिट भी होना पड़ा.

बैंक में वर्कलोड भी बहुत ज्यादा था. पर अच्छी बात ये थी कि स्टाफ बहुत ही स्नेहिल और मदद करनेवाले थे. हालांकि शुरू-शुरू में एक महिला के अंडर में  काम करने में  उन्हें थोड़ी परेशानी हुई क्यूंकि अब तक कोई महिला अफसर उस बैंक में नहीं आई थी (और मेरे बाद कोई आज तक आई भी नहीं) लेकिन धीरे- धीरे  उन्होंने मुझे स्वीकार कर लिया और मेरा काफी ध्यान भी रखा. रोज मेरे लिए  कोई ना कोई लंच लेकर आता क्यूंकि उन्हें पता था, अकेली रहने के कारण, मैं अपने लिए कुछ ज्यादा बनाती नहीं थी. सारे कर्मचारी आपस में बहस करते कि 'आज तुमने लाया ना मैडम के लिए...कल मैं लेकर आऊंगा.' 

हमारे कार्यक्षेत्र में ग्यारह गाँव थे और मुझे नियमित रूप से हर गाँव में विजिट  करना पड़ता था. कई गाँव में सड़कें  नहीं थी और कोई पब्लिक ट्रांसपोर्ट भी नहीं. जहाँ पब्लिक ट्रांसपोर्ट थे भी, वहाँ  उस बस में बकरियाँ...मुर्गियाँ..साइकिल सब साथ में सवार होते.
दूसरा ऑप्शन था, अपने  ऑफिसर के जर्जर M 80 स्कूटर के पीछे बैठ कर  जाना. जिसपर मुझे और भी डर लगता. कुछ गाँवों में नाव से जाना पड़ता. आज यह सब लिखते वक्त, सब बहुत एडवेंचरस  लग रहा है...पर उस समय तो यह सब एक दुस्वप्न जैसा गुजरा.

गाँव वासी  मुझे बहुत ही स्नेह देते और आदर करते थे. मुझे  बिलकुल VVIP की तरह ट्रीट करते थे. सारे बच्चे और महिलाएँ मेरे इर्द-गिर्द जमा हो जाते थे. वहाँ बैठने के लिए एक कुर्सी भी नहीं होती थी. पर प्यार से चाय जरूर पेश करते थे. अक्सर चाय के कप टूटे हुए होते और उनके हैंडल  गायब..पर प्याला उनके स्नेह से लबालब भरा होता. उनका प्यार और स्नेह भावविभोर कर देने वाला था.

 कुछ गांववालों की मिटटी की झोपड़ी होती थी और उसी बरामदे  में उनके साथ उनके मवेशी भी रहते थे. एक बार मैं एक क्लाइंट से बात कर रही थी, अचानक लगा..मेरी साड़ी का पल्लू कोई खींच रहा है. मुड कर देखा तो एक गाय का बछड़ा मेरा आँचल चबा रहा था.:)

एक दिन मैं ऑफिस जा रही थी तो देखा, चौराहे  पर एक ब्लैक बोर्ड पर लिखा है..."इंदिरा शेट्टी के हाथों, नेत्र शिविर का उदघाटन " तालेगाँव में कोई भी कार्यक्रम हो तो चौराहे पर एक ब्लैकबोर्ड  लगा कर उस पर सूचना  लिख दी जाती थी. मैं हैरान हुई. पर ऑफिस में आकर लोगो ने बहुत आग्रह  दिया कि आपको चलना ही पड़ेगा. मुझे मराठी नहीं आती थी.....किसी तरह हिंदी-अंग्रेजी मिश्रित भाषा में दो शब्द कहे, जिसका  मेरे बैंक कर्मचारी ने मराठी  में अनुवाद कर दिया.


इन सारी दिक्कतों के बावजूद , मेरा कार्य-प्रदर्शन बहुत  अच्छा रहा. और मेरे कार्यकाल के दौरान, उस ब्रांच का बहुत ही बढ़िया ग्रोथ हुआ. इसका इनाम ये मिला कि तीन साल  वहाँ काम करने के बाद, मुझे प्रमोट करके चीफ मैनेजर (एक्जक्यूटिव लेवल) के पद पर मुंबई में वापस स्थानांतरित कर   दिया गया.


उस गाँव की बहुत सारी मीठी यादें हैं. और आज पलट कर देखने पर लगता है...तालेगांव की पोस्टिंग ने मुझे बहुत ही आत्मविश्वास दिया और मेरे व्यक्तित्व को  मजबूती प्रदान करने में एक अहम् भूमिका निभाई.

36 comments:

  1. शहर से बाहर भी जीवन है.. और वह अधिक मनोहारी है... बहुत सुन्दर रचना !

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  2. इंदिरा शेट्टी जी का परिचय अच्छा लगा। गाँव की बातें पढ़कर हमें भी nostalgia हो गया।

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  3. आपकी महिला मित्र मण्डली बहुत अच्छी लगी ।
    एक महिला का दूर दराज़ के गाँव में काम करना वास्तव में कठिन काम रहा होगा ।
    अच्छा संस्मरण ।

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  4. बधाई कि आपकी मित्र मण्‍डली में इंदिरा जी जैसे व्‍यक्ति हैं।
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    बधाई कि आपने उनके इस अनुभव को औरों के साथ साझा करने योग्‍य समझा।
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    बधाई कि आपने इंदिरा जी से उस अनुभव को लिखवा भी लिया।
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    बधाई इ‍ंदिरा जी को कि उन्‍होंने अपनी इस पोस्टिंग को काले पानी की सजा नहीं समझा।
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    बधाई इंदिरा जी को कि उन्‍होंने इन तीन वर्षों के अनुभव से अपने व्‍यक्तित्‍व में निखार होते देखा।
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    बधाई इंदिरा जी के श्रीमान जी को भी कि उन्‍होंने अपने रुतबे का गलत फायदा नहीं उठाया।
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    बधाई आपको भी कि आपकी मित्र मण्‍डली की फोटो देखकर,हरेक से मिलने की इच्‍छा हो रही है।
    *

    आग्रह आपसे कि इंदिरा जी के पास इन तीन सालों के दौरान हुए अनुभवों का खजाना होगा,उसे भी निकालिए।

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  5. रश्मि जी आपका तो हृदय से धन्यवाद करना चाहिए कि आपने इंदिरा जी से हमारा परिचय करवा दिया ! उनका संस्मरण लाजवाब है ! उनकी अनुभव यात्रा के साथ हमने भी तालेगांव के ग्रामीण अंचल की ना केवल सैर की बल्कि अपने ग्रामीण भारत के आर्थिक विपन्नता के बावजूद उसके विशाल हृदय के भी दर्शन कर लिये ! इतना प्यार, इतना सम्मान और इतना आतिथ्य सत्कार महानगरों की नकली, दिखावटी और ओढी हुई विनम्रता में कहाँ ! यह संस्मरण पढ़ कर मन सच में उत्फुल्ल हो गया ! आपका बहुत-बहुत आभार ! आशा है आप इंदिरा जी के संस्मरण एवं अनुभवों से हमें समय-समय पर लाभान्वित करती रहेंगी ! इंदिरा जी से हमारा नमस्कार कहना मत भूलिएगा !

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  6. सबसे पहले तो बसंत पंचमी की शुभकामनाएं।
    ईश्वर करें आप और आपका परिवार (ब्लॉग सहित) हमेशा खिलखिलाता रहे।
    आपकी ऊर्जा ऐसे ही कायम रहे ताकि हम झटपट-झटपट अच्छी-अच्छी पोस्ट पढ़ते रहें। इंदिरा जी का संस्मरण बेहद अच्छा था। गांव ही तो हैं, जिनसे हम कितना कुछ सीख सकते हैं। बिना किसी लोभ के कितना प्रेम लुटाते हैं वो।

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  7. indira ji ke aatmvishwaas ne apna ek khaas mukaam banaya ... unke parichay ne prabhawit kiya

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  8. हमारी सहकर्मी रह चुकीं हैं इंदिरा जी और इतना पक्का है कि मेरे ही बैंक में या उसकी दो कज़िंस में से किसी बैंक में रही होंगी. यह वो अनुभव है जिससे हर बैंककर्मी का सामना होता है. पर सारी कठिनाइयों के बावजूद भी पलटकर देखें तो यह अनुभव यादगार होता है.
    यह सचमुच पॉलिटिक्स का हिस्सा है कि कोई ग्रामीण पोस्टिंग करने मुम्बईं से विरार चला जाता है और किसी को तालेगाँव जाना पडता है!अच्छा और अनुकरणीय अनुभव!!

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  9. स्‍थान परिवर्तन/प्रवास अनुभव संपन्‍न करता ही है और ज्‍यादातर मीठी यादों सहित.

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  10. छोटी छोटी जगहों की यादें बड़ी हो जाती हैं।

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  11. इंदिरा शेट्टी जी के द्वारा प्राप्त अनुभव तो वाकई रोचक हैं। एक महिला द्वारा दूर दराज के ग्राम्य परिवेश में अकेले जाकर रहना बड़े साहस का काम है।

    इस पोस्ट के जरिये धड़क खुल जाने से इंदिरा जी को अब सतत लेखन शुरू कर देंना चाहिए। उम्मीद है इंदिरा जी अपने अनुभव बांटेगीं

    रश्मि जी, इंदिरा शेट्टी जैसी शख्सियत से परिचय कराने हेतु शुक्रिया।

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  12. यह प्रेरणादायक एवं रोचक संस्मरण साझा करने के लिए आपका धन्यवाद।

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  13. बहुत ही अच्छा संस्मरण .
    पढ़ कर बहुत मज़ा आया.
    आभार.

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  14. रश्मि जी शुक्रिया आपका इस साहसी महिला से मिलवाने का ....
    इंदिरा जी आपका आत्मविश्वास देख अच्छा लगा .....
    देश को आप जैसी महिलाओं की ही जरुरत है ....

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  15. रश्मि जी
    नमस्कार !
    प्रेरणादायक एवं रोचक संस्मरण
    इंदिरा जी का संस्मरण लाजवाब है !

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  16. अब तो इंदिरा जी को अपन ब्लॉग बना ही लेना चाहिए उनका संस्मरण तो अच्छा लगा | जब वो अपन ब्लॉग बना ले तो हमें उनका लिंक दीजियेगा |

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  17. गाँवों में जाकर वहाँ के जीवन से आत्‍मसात होने पर बहुत कुछ सीखने को मिलता है। अच्‍छे संस्‍समरण के लिए बधाई।

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  18. रश्मिजी
    सबसे पहले आपको बधाई एक जीवट महिला इंदिराजी से मिलवाने के लिए |
    कहते है न की आग में तपकर ही सोना कुंदन बनता है |घर और बाहर की चुनोतियो को स्वीकार कर ही इंदिराजी ने अपने को मजबूत बनाया |गाँव में काम करना ,विपरीत परिस्थितियों में सचमुच साहस का काम है |
    फल की आशा किये बिना ही उन्होंने जो कर्म किया उससे उन्हें निश्छल प्रेम और अतिरिक्त परिवार भी मिला जिसे उन्होंने वहां की उपलब्धि माना |ये अनुकरणीय है |
    राजेश जी ने टिप्पणी में सब कुछ बहुत ही अच्छे ढंग से कह दिया है उससे पूरी तरह सहमत |
    बहुत बहुत आभार |

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  19. इंदिराजी को बहुत बधाई, यह संस्मरण शायद उनके ब्लॉग निर्माण की पहली सीढ़ी बन जाए ...
    सिद्धांतों से समझौता ना करने वालों को कई तरह के पीड़ादायक अनुभव होते हैं , मगर इंसान वाही जो उसमे भी कोई राह ढूंढ ले ...
    ऐसी जगहों पर वी आई पी ट्रीटमेंट पाना भी तो एक उपलब्धि ही है ...जब प्रमोशन के साथ हो तो कहना ही क्या ...all is well !

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  20. @ रश्मि जी ,
    प्लीज उनका ब्लॉग मत बनवाइयेगा वर्ना ...

    वर्ना ...

    हमें पढ़ने कौन आएगा :)




    @ आदरणीय / प्रिय इंदिरा जी ,
    आपको पढते हुई कहीं भी ऐसा नहीं लगा कि आप पहले पहल अभिव्यक्त हो रही हैं आपने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ली और यायावरी पर ध्यान दे रही हैं यह एक सुखद संकेत है कि आप जीवन को जी रही हैं वर्ना रोटियां जुगाड़ते और भविष्य /बच्चों के नाम धन संचय करते ही इंसान अपनी जिंदगी खो देता है ! यायावरी जीवन को नये मायने देती है ,नये अनुभव भी ! स्वयं से बाहर के संसार को महसूस करना एक उपलब्धि मानूंगा !
    आपको नौकरी के दरम्यान पोलिटिक्स जैसी अनुभूति हुई कोई नई बात नहीं ,कड़वा सही पर सच तो है ही ! मेरा ख्याल है कि उस गांव की पोस्टिंग ने आपको नये संस्कार दिये ,भाषाई अपरिचय और कठिन हालात के बावजूद आपने जिस तरह से ग्रामीणों का विश्वास/प्रेम अर्जित किया,उसने ही आपकी यायावरी को परवान चढाया है और अपरिचय से परिचय की ललक में आपका छलकता आत्म विश्वास संभवतः उसी अनुभव की देन है !
    प्रस्तोता के मुख से सुना कि आप अपने मित्रों को नायब तोहफे देती हैं ! एक उम्मीद सी जागी कि भले ही नायब ना सही पर शायद मित्रों के मित्रों के हाथ भी कुछ लगे :)

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  21. कभी कभी ज़िन्दगी ऐसे इम्तिहान भी लेती है मगर उससे जीने का सबब सिखा जाती है …………सच ऐसा लगा जैसे आंखो के सामने घटित हो रहाहो…………बेहद रोचक ।

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  22. देरी से आने के लिए क्षमाप्रार्थी हूं. इंदिरा जी के प्रेरणादायक एवं रोचक संस्मरण को साझा करने के लिए आभार.
    आप सबको वसंत पंचमी की ढेरों शुभकामनाएं!
    सादर,
    डोरोथी.

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  23. रोचक संस्मरण। एक प्रभावशाली शख्सियत से परिचय कराने के लिए आपका आभार। ऐसे जुझारू और जीवट के लोगों से काफ़ी प्रेरणा मिलती है।

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  24. आदरणीया रश्मि जी आपने एक आदरणीय महिला और साहसी महिला के बारे में जो कुछ बताया बहुत अच्छा लगा |और इंदिरा शेट्टी जी सचमुच में इंदिरा जी से कम साहसी नहीं हैं |इस महिला की महानता की खुसबू हमारे जेहन में बहुत दिनों तक ताजगी भारती रहेगी |आपको भी बहुत बहुत धन्यवाद |

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  25. अच्छा लगा। लगभग उन्हीं दिनों मैं भी सातारा के एक पहाडी गाँव में अपनी पोस्टिंग का आनन्द ले रहा था। परिस्थितियाँ बिल्कुल ऐसी ही थीं। मगर यह सच है कि महाराष्ट्र के गांवों में अपनी भाषा से नितांत अपरिचित को भी जो अपनापन मिलता है वह अनूठा है।

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  26. उम्मीद रहेगी कि इंदिरा जी नियमित लिखें और आप अनुवादित अतिथि पोस्ट लगाने में कोताही न बरतें...बहुत अच्छा लगा उनका संस्मरण और परिचय!!

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  27. इन्दिरा शेटी जी का परिचय बहुत अच्छा लगा। उनके पति का तबादले के लिये सिफारिश न करना अनुकरणीय है। औरत अब अबला कहाँ है हर विपरीत परिस्थिती मे काम कर सकती है। इन्दिरा जी से आग्रह है कि वो नियमित लिखें\ उनकी कलम मे प्रवाह है, सुन्दर शैली है। उनको बहुत बहुत शुभकामनायें।

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  28. बहुत रोचक लिखा है , ये भी सच है कि मुश्किल वक्त ही तो कुछ कर के दिखाने का सबब बनता है ...

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  29. I thank each one of you wholeheartedly for the good words you have spoken about me. your comments have humbled me. i give full credit to my friend rashmi for the article. though the thoughts were mine , she actually let it out. once again thank you all.

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  30. सच मे इतनी सुंदर पोस्ट तो मेरे से बच निकली थी, कल किसी मित्र के ब्लाग पर काम कर रहा था, इस लिये शायद.
    बहुत रोमांच कारी लगी यह पोस्ट एक अकेली महिला के लिये ओर वो भी इतने पिछडे हुये इलाके मे.लेकिन मैने देखा हे की गांव के लोग शहर वालो की तुलना मे ज्यादा इज्जत ओर प्यार देते हे, मुझे तो बहुत अच्छा लगता हे गांव मे जा कर रहना, लेकिन मच्छरो से बहुत डर लगता हे बाकी गांव की जिन्दगी मस्त ओर बेफ़्क्री की जिन्दगी हे, आप ने शुरु मे जो नाम गिनवाये हे, क्या वो सब खानो के नाम हे या इन सुंदरियो के, मै ओर मेरी बीबी ने इन्हे खानो के नाम ही समझा हे, मुश्किल नाम हे . धन्यवाद

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  31. @राज जी,
    वे सब दक्षिण भारतीय सुस्वादु व्यंजनों के नाम हैं :)
    बस इन नामो को गूगल करने की देर है......नेट पर ,सुन्दर तस्वीरों के साथ रेसिपी भी मौजूद है. पर नॉर्थ इंडियंस को इसे बनाना बहुत मुश्किल लगेगा...हाँ खाना जरूर अच्छा लगता है..

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  32. Hi...

    Smt. Indira Shetty ji ke sansmaran rochak laga..

    Kahte hain hum apne bure vakt ko bhi apni mehnat aur kartavya parayanta se achha sabit kar sakte hain.. Shetty ji ki mehnat aur lagan ne na sirf unki Branch ka naam roshan kiya balki unki lagan ne unhen ek padonnati ka bhi mauka diya, aur jaisa ki unhone likha hai ve punah Mumbai post kar di gayin..

    Humari taraf se unhen ek sukhad Sevanrivit jeevan ki shubhkamnayen..(halanki ye baat aur hai ki kam karne wala kabhi Sevanrivit nahin hota...so ve bhi nahin hui hongi...ye mera manna hai)..

    Chaha tha ki apni tippani hindi main hi deta par net ki dheemi gati se aisa sambhav nahin ho pa raha...eske liye kshma chahta hun...

    Deepak..

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  33. रश्मि जी , आपने इस पोस्ट के माध्यम से बहुत ही प्रेरणादायक व्यक्तित्व से मिलवाया. जिस तरह से इंदिरा जी ने इस चैलेन्ज को आत्मसाध किया और सामना किया वह काबिलेतारीफ है. प्रेरक व्यक्तित्व. .......... . सुंदर प्रस्तुति.

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  34. पढ़ते पढ़ते तो सही में लग रहा है की कितना एडवेंचरस रहा होगा वो सब अनुभव, लेकिन जैसा इन्होने कहा की उस समय दुस्वप्न जैसा ही था सब कुछ...तो वही रहा होगा..

    वैसे दो अथिति पोस्ट पढ़ चूका हूँ आपके ब्लॉग पे..एक आपकी भाभी वाली और दूसरा ये...और दोनों ही 'क्लास' पोस्ट लगे :)

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  35. gr8 post. Nothing lost in translation. Please persuade mom to write part 2 of the talegaon chronicles. there are several more interesting characters and amusing incidents.

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