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सोमवार, 7 फ़रवरी 2011

'इंदिरा शेट्टी' की यादों में बसा....तालेगांव

एक शाम अपनी सहेली  इंदिरा शेट्टी के घर पर, हम सब चाय के लिए इकट्ठे हुए थे. पुट्टू...अप्पम...इश्टू, वडा साम्भर का स्वाद...इंदिरा के अनुभवों के खजाने में से निकलते यादों के मोतियों के आलोक में कुछ और बढ़ गया था. किसी भी घटना का वर्णन इंदिरा कुछ इतने रोचक अंदाज़ से करती है कि लगता है...हम उस कालखंड में पहुँच गए हैं और सबकुछ हमारी आँखों के सामने घटित हो रहा है. और उस दिन तो वे एक बीहड़ गाँव में अपनी पोस्टिंग का किस्सा बता रही थीं और हम सब आश्चर्य कर रहे थे कि बचपन से चेन्नई और मुंबई जैसे महानगर में पली-बढ़ी, महानगरीय जीवनचर्या की आदी इंदिरा ने कैसे वहाँ एडजस्ट किया होगा. 
पर ये किस्सा  सुनते हुए मेरे दिमाग में कुछ और ही चल रहा था. इंदिरा बैंक में कार्यरत थीं. अभी हाल में ही उन्होंने VRS लिया है. वैसे वे काफी घूमती रहती हैं,(और हर जगह..दुबई...मिस्त्र..सिंगापुर..केरल...आदि से हमारे लिए नायाब तोहफे लाना नहीं भूलतीं...एक बार हम सब सहेलियों को एक सी केरल  की परम्परागत साड़ी भेंट की थी...जिनकी तस्वीरें यहाँ हैं ) फिर भी जब उनके पति टूर पर होते हैं तो काफी समय उन्हें अकेले बिताना पड़ता है. मैं यह सोच रही थी कि क्या ही अच्छा हो अगर वे अपने इन सारे अनुभवों को कलमबद्ध कर डालें...मैने  उन्हें एक अंग्रेजी ब्लॉग बनाने की सलाह दे डाली. उस वक्त तो उन्होंने टाल दिया..'अच्छा सोचूंगी'. पर बाद में भी कह दिया ब्लॉग  बनाना उनके वश का नहीं. तो मैने कहा , आप अपना यह अनुभव लिख कर मुझे भेज दीजिये. मैं अनुवाद करके अपने ब्लॉग पर 'अतिथि पोस्ट' के रूप में प्रकाशित करुँगी.

यह फरमाइश भी कई तकाजों के बाद पूरी हुई. जो लोग नहीं लिखते...उन्हें लगता है,जैसे लिखना कितना कठिन कार्य है...खैर एक दिन इंदिरा ने बस कलम उठायी और बेहद सहज और रोचक शैली में लिख डाला. वह रोचक संस्मरण उन्ही के शब्दों में.


अतिथि पोस्ट : इंदिरा शेट्टी

मेरी पदोन्नति बैंक मैनेजर के पोस्ट पर हो गयी थी और मैने इस पोस्ट पर काम करना शुरू ही किया था कि अचानक ट्रांसफर का फरमान आ गया. वह भी एक गाँव  'तालेगांव दाभाडे' में, जिस जगह का नाम मैने कभी सुना तक नहीं था. यह मुंबई से १३५ किलोमीटर दूर था. मेरे लिए  यह बहुत ही मुश्किल घड़ी थी क्यूंकि मेरी बेटी मुंबई में कॉलेज में पढ़ रही थी,उसे अकेला छोड़ना पड़ता.

मुझे विश्वास था कि आफिसर्स यूनियन जरूर हस्तक्षेप करेंगे, जिसके जेनरल सेक्रेटरी मेरे पति थे. क्यूंकि मेरे साथ ही दो और महिलाओं की पदोन्नति हुई थी और उन्हें अच्छी जगह पोस्टिंग मिली थी. और महिलाओं को अमूमन बीहड़ गाँव में नहीं भेजा करते. पर मेरी पोस्टिंग के पीछे कुछ पौलिटिक्स भी थी. मैनेजमेंट इस इंतज़ार में थी कि यूनियन अच्छी जगह पर पोस्टिंग का अनुरोध करें. पर मेरे सिद्धांतवादी पति ने कहा कि वे इसकी सिफारिश नहीं करेंगे ,और मुझे वहीँ ज्वाइन करना होगा.

परिवार को छोड़कर एक बिलकुल अनजान गाँव में जाना एक बहुत
ही कष्टदायक अनुभव था. मुंबई में रहकर भी...मलयालम..तमिल...अंग्रेजी पर ही मेरा अच्छा अधिकार है...मराठी तो ठीक से समझ में भी नहीं आती थी और..उस गाँव में सिर्फ मराठी ही बोली  और समझी जाती थी.
आज पुणे एक्सप्रेस हाइवे और वहाँ एक  मेडिकल कॉलेज खुलने की वजह से, तालेगांव बिलकुल एक शहर में तब्दील हो गया है पर १९९९ में, वहाँ सड़कें भी नहीं थीं. वहाँ ऑफिसर्स क्वार्टर नहीं थे. मुझे एक किराए के मकान में ठहराया गया, जहाँ कोई भी फर्नीचर नहीं था और पानी की सप्लाई तक नहीं थी. दरवाजे और खिड़कियाँ पूरी तरह बंद भी नहीं हो पाते थे .वहाँ अकेले रहना एक बहुत ही डरावना,अनुभव था..रात मेरी आँखों में कट जाती. एक महीने बाद मैने खुद ही एक कुछ ढंग का मकान ढूँढा और एक टेलीफोन भी लगवाया.पर वो ज्यादातर डेड ही रहता. बिजली अक्सर नहीं रहती. मेरे जैसे बात करने की शौक़ीन के लिए वो एक काले-पानी की सजा से कम नहीं था. शाम होते ही सबकुछ शांत और स्तब्ध हो जाता,रात के सन्नाटे में सिर्फ झींगुर की आवाजें गूंजती  रहतीं.

बैंक  का ब्रांच भी, वॉल्यूम, बिजनेस और मेरे ग्रेड के हिसाब से बहुत छोटा था.पर मैं धीरे-धीरे एडजस्ट  करने लगी थी. मुंबई में घर जाना भी महीने में एक बार ही हो पाता  क्यूंकि वहाँ तक की यात्रा बहुत ही कष्टदायक थी. ब्रांच बहुत ही इंटीरियर में था और वहाँ से, पुणे हाइवे तक आना पड़ता और फिर किसी भी सवारी को हाथ दिखा,लिफ्ट लेनी होती. उन दिनों एक्सप्रेस हाइवे नहीं शुरू हुई थी और खंडाला घाट में ट्रैफिक जैम में घंटो फंसे रहना पड़ता था.घर पहुँचने में कभी-कभी रात के बारह भी बज जाते.

इन सबका असर मेरे स्वास्थ्य पर भी पड़ने लगा, मेरा ब्लड प्रेशर बहुत ही हाइ रहने लगा. वहाँ मेडिकल फैसिलिटी बिलकुल ना के बराबर थी. एक गन्दा सा सरकारी अस्पताल था. दो बार मेरा ब्लड प्रेशर खतरनाक रूप से बढ़ जाने के कारण, उसी अस्पताल में एडमिट भी होना पड़ा.

बैंक में वर्कलोड भी बहुत ज्यादा था. पर अच्छी बात ये थी कि स्टाफ बहुत ही स्नेहिल और मदद करनेवाले थे. हालांकि शुरू-शुरू में एक महिला के अंडर में  काम करने में  उन्हें थोड़ी परेशानी हुई क्यूंकि अब तक कोई महिला अफसर उस बैंक में नहीं आई थी (और मेरे बाद कोई आज तक आई भी नहीं) लेकिन धीरे- धीरे  उन्होंने मुझे स्वीकार कर लिया और मेरा काफी ध्यान भी रखा. रोज मेरे लिए  कोई ना कोई लंच लेकर आता क्यूंकि उन्हें पता था, अकेली रहने के कारण, मैं अपने लिए कुछ ज्यादा बनाती नहीं थी. सारे कर्मचारी आपस में बहस करते कि 'आज तुमने लाया ना मैडम के लिए...कल मैं लेकर आऊंगा.' 

हमारे कार्यक्षेत्र में ग्यारह गाँव थे और मुझे नियमित रूप से हर गाँव में विजिट  करना पड़ता था. कई गाँव में सड़कें  नहीं थी और कोई पब्लिक ट्रांसपोर्ट भी नहीं. जहाँ पब्लिक ट्रांसपोर्ट थे भी, वहाँ  उस बस में बकरियाँ...मुर्गियाँ..साइकिल सब साथ में सवार होते.
दूसरा ऑप्शन था, अपने  ऑफिसर के जर्जर M 80 स्कूटर के पीछे बैठ कर  जाना. जिसपर मुझे और भी डर लगता. कुछ गाँवों में नाव से जाना पड़ता. आज यह सब लिखते वक्त, सब बहुत एडवेंचरस  लग रहा है...पर उस समय तो यह सब एक दुस्वप्न जैसा गुजरा.

गाँव वासी  मुझे बहुत ही स्नेह देते और आदर करते थे. मुझे  बिलकुल VVIP की तरह ट्रीट करते थे. सारे बच्चे और महिलाएँ मेरे इर्द-गिर्द जमा हो जाते थे. वहाँ बैठने के लिए एक कुर्सी भी नहीं होती थी. पर प्यार से चाय जरूर पेश करते थे. अक्सर चाय के कप टूटे हुए होते और उनके हैंडल  गायब..पर प्याला उनके स्नेह से लबालब भरा होता. उनका प्यार और स्नेह भावविभोर कर देने वाला था.

 कुछ गांववालों की मिटटी की झोपड़ी होती थी और उसी बरामदे  में उनके साथ उनके मवेशी भी रहते थे. एक बार मैं एक क्लाइंट से बात कर रही थी, अचानक लगा..मेरी साड़ी का पल्लू कोई खींच रहा है. मुड कर देखा तो एक गाय का बछड़ा मेरा आँचल चबा रहा था.:)

एक दिन मैं ऑफिस जा रही थी तो देखा, चौराहे  पर एक ब्लैक बोर्ड पर लिखा है..."इंदिरा शेट्टी के हाथों, नेत्र शिविर का उदघाटन " तालेगाँव में कोई भी कार्यक्रम हो तो चौराहे पर एक ब्लैकबोर्ड  लगा कर उस पर सूचना  लिख दी जाती थी. मैं हैरान हुई. पर ऑफिस में आकर लोगो ने बहुत आग्रह  दिया कि आपको चलना ही पड़ेगा. मुझे मराठी नहीं आती थी.....किसी तरह हिंदी-अंग्रेजी मिश्रित भाषा में दो शब्द कहे, जिसका  मेरे बैंक कर्मचारी ने मराठी  में अनुवाद कर दिया.


इन सारी दिक्कतों के बावजूद , मेरा कार्य-प्रदर्शन बहुत  अच्छा रहा. और मेरे कार्यकाल के दौरान, उस ब्रांच का बहुत ही बढ़िया ग्रोथ हुआ. इसका इनाम ये मिला कि तीन साल  वहाँ काम करने के बाद, मुझे प्रमोट करके चीफ मैनेजर (एक्जक्यूटिव लेवल) के पद पर मुंबई में वापस स्थानांतरित कर   दिया गया.


उस गाँव की बहुत सारी मीठी यादें हैं. और आज पलट कर देखने पर लगता है...तालेगांव की पोस्टिंग ने मुझे बहुत ही आत्मविश्वास दिया और मेरे व्यक्तित्व को  मजबूती प्रदान करने में एक अहम् भूमिका निभाई.

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