शुक्रवार, 11 फ़रवरी 2011

डायना के जमाने में डायन की खोज

कुछ दिनों पहले तक लगता था एक शब्द से मेरा परिचय नहीं है.....और वो है, नफरत....घृणा....Hate.  ....गिरिजेश जी की एक पोस्ट जिसपर उन्होंने लिखा था...

"दुनिया हसीन रहे,
इसके लिए घृणा भी उतनी ही आवश्यक है, जितना प्रेम।
गुनहगारों!
मैंने तुम्हारे लिए सहेज रखा है। भूलना मेरी फितरत नहीं। 
 
 

उस पर मैं अपना ऐतराज जता आई थी कि....घृणा बहुत ही strong emotion है ...और उसे खुद से दूर ही रखना चाहिए. कभी कहीं भी बातचीत में कोई कहता.."मुझे तो ये बिलकुल पसंद नहीं...ये तो मेरे बर्दाश्त  के बाहर है "  तो मैं यही सोचती कि मेरी इतनी strong disliking  नहीं है. इस हद तक मैं किसी को नापसंद नहीं करती. चाहे किसी ने मेरे साथ कुछ बुरा ही किया हो...मैं उसकी तरफ से इतनी निस्पृह हो जाती... जैसे मेरे लिए अब उसका अस्तित्व ही नहीं है. पर नफरत जैसी भावना नहीं आती.

लेकिन कल तो जैसे दिलो जान से मैने ,पूरे एक घंटे तक बेइंतहा नफरत की है,किसी से ....पता नहीं आगे शायद ये भाव मंद पड़ जाए पर लिखते वक्त तो भी रत्ती भर भी ये भावना कम नहीं हुई है.


टी.वी. सीरियल्स नहीं ही देखती  हूँ. कभी-कभार चैनल सर्फ़ करते नज़र पड़ जाती है. और देखती हूँ....चमकदार साड़ियों में ..जेवरों से  लदे...खुले बाल, रसोई में काम करती औरतें....हुक्का पीते और रौबीले  आवाज़ में  आदेश देते...अठारवीं सदी के पुरुष...किसी अबला को सताती उसकी सास...या फिर चालें चलती भाभियाँ....और तुरंत ही चैनल बदल  देती हूँ.

कल भी ऐसे ही  चैनल बदलते.
..'कलर्स  चैनल' पर एक दृश्य देखा...किसी गाँव का दृश्य था...दुल्हन के जोड़े में, बेसुध सी एक लड़की को थामे एक महिला बैठी थी और कई सारे लोग उन दोनों को  घेर कर खड़े थे. एक सरपंच फरमान सुना रहा था, "ये लड़की डायन है...कल सुबह इसे पत्थर मार-मार कर मौत के घाट उतार दिया जाएगा. सुबह सारे गांववासी एक टीले पर इस लड़की को पत्थर मारने के लिए एकत्रित  हो जाएँ. गांवालों को नाश्ता पानी पंचायत की तरफ से दिया जाएगा."

और मेरी उंगलियाँ ठिठक  गयीं...रिमोट किनारे रख देखने लगी...कि आखिर ये कौन सा सीरियल है?...निर्देशक-प्रोड्यूसर क्या दिखाना चाह रहे हैं? यह सीरियल है
,'फुलवा'.....'कलर्स' चैनल पर आता है... शायद डाकू 'फूलन देवी' के जीवन से प्रेरित है और शायद वे यह दिखाना चाहते हैं कि अपने परिवार पर जुल्म के बदले में एक लड़की बन्दूक उठा, डाकू  बन जाती है. 'फुलवा' उस दुल्हन की छोटी बहन का नाम है.

पर किसी गरीब पर जोर-जुल्म दिखाने के लिए ये सीरियल निर्माता,लेखक..अब ऐसी कल्पनाओं का सहारा लेने लगे हैं? मुझे उस सीरियल के लेखक का नाम  जानने की इच्छा हुई..आखिर ऐसे वाहियात दृश्य किस कलम के अपराधी की उपज हैं.लेखक के नाम के इंतज़ार में मैंने  बाकी के दृश्य भी देख लिए. और देखना भी चाहती थी कि आखिर इस सीरियल के लेखक-निर्देशक की मानसिक विकृति कितनी दूर तक जा सकती है? और क्या क्या दिखा कर दर्शकों की भावनाओं से खेलना चाहते हैं? शायद चार-पांच  चार एपिसोड  में समेटा गया है इस पूरे प्रकरण को.  उस परिवार की बेबसी...घर की  रखवाली करते. ठहाके लगाते गाँव के छोकरे.....आँसू पोंछते हुए गड्ढा  खोदते उस लड़की के चाचा (पत्थर मार कर मौत की घाट उतार देने के बाद ,उस लड़की को दफनाने के लिए गड्ढा खोदने का जिम्मा उसके चाचा को दिया गया था) ...सबकुछ विस्तार से दिखाया गया है. लड़की को सुबह गाँव की स्त्रियाँ..सफ़ेद वस्त्र लाकर देती हैं...कि उसे पहन कर वह पत्थर खाने को तैयार हो जाए.(लेखक के मानसिक दिवालियेपन का एक और सुबूत)


इस तरह की ख़बरें पढ़ी है कि सुदूर गाँव में किसी औरत को डायन करार देकर उसके बाल उतार दिए गए...या कभी कभी वस्त्रहीन परेड करवाई गयी. यह जिल्लत भी कोई मौत से कम नहीं...पर पत्थर मार-मार कर मौत देने  की घटना तो कभी नज़र में नही आई.


ये सउदी अरब  में होता है और
Princess of Saudi Arabia  किताब में एक ऐसे प्रकरण का आँखों  देखा हाल लिखा है कि कैसे शहर से दूर एक निर्जन स्थान पर उस लड़की को लेकर जाते हैं और ट्रक में  पत्थर भरकर बहुत सारे  लोग भी जाते हैं. साथ में एक डॉक्टर भी होता है...जो थोड़ी थोड़ी देर बाद जाकर उस लड़की की नब्ज़ चेक करता है कि उसकी साँसें और पत्थर का इंतज़ार कर रही हैं या नहीं. करीब चार साल पहले पढ़ी थी ये किताब पर आज भी  याद कर रोम-रोम सिहर जता है... कितनी  ही रातों की नींद ले गया था यह प्रकरण...

पर हमारे देश में कम से कम ऐसी जघन्यता तो नहीं है. अब ये सीरियल लेखक 
क्या पूरे विश्व में से कहीं भी किसी कुरीति... किसी भी जघन्य  कृत्य को देखेंगे तो उसे हमारे जनजीवन में उतार देंगे?? और विद्रूपता ये कि प्रोग्राम के नीचे ये डिस्क्लेमर आ रहा था कि ' हम अंधविश्वास को बढ़ावा नहीं देना चाहते...केवल  दर्शकों के मनोरंजन के लिए  ये दृश्य प्रस्तुत  किए जा रहे हैं" इन पत्थर मारने के दृश्यों से दर्शकों का मनोरंजन हो रहा है?? इन्होने दर्शकों को इतना जाहिल समझ रखा है?? और यह कोई हमारी संस्कृति में भी नहीं था कि ये सब दिखा वे दर्शकों की जानकारी बढ़ा रहे हैं.
 

इस सीरियल के लेखक , 'सिद्धार्थ कुमार तिवारी' को गूगल  में सर्च किया. जनाब ने कई डिग्रियां ले रखी हैं. कई सारे अवार्ड जीते हैं...यानि कि सरस्वती माँ  की कृपा है, उनपर...लेकिन  इस तरह तो वे अपमान ही कर रहे हैं, उनका. (वो लिंक और तस्वीर जानबूझकर नहीं दे रही...किसी भी तरह का कोई प्रचार उन महाशय  को मिले...दिल गवारा नहीं करता) .एक सीरियल को बनाने में निर्माता-निर्देशक..कलाकार सबका सहयोग होता है.पर इस सीरियल का Concept and Story  इन्ही महाशय का है. और वे एक युवा हैं,जिनके कंधे पर देश का भविष्य होता है.

हमारे देशवासियों का एकमात्र प्रमुख मनोरंजन है, टी.वी. सीरियल्स. और पैसों की लालच में इस तरह की कहानियाँ लिख कर वे उनकी मासूम भावनाओं से खिलवाड़ कर रहे हैं, ये लेखक गण. सीरियल की टी आर पी अच्छी ही होगी....क्यूंकि .ढेर सारे विज्ञापन मिल रहे हैं, क्या इस लिए अब इस तरह के crude  scene डाले जाएँ. लगता  है जैसे एक , होड़ लगी हुई है,
मेरे सीरियल के चरित्र तेरे सीरियल के चरित्र से कम  क्रूर कैसे?? और इस तरह की क्रूरता के दृश्य कहीं से भी इम्पोर्ट किए जा रहे हैं.

एक बार लगा, मुझे ये सब नहीं लिखना चाहिए...व्यर्थ का प्रचार मिल जायेगा...पर इतना आक्रोश था...इस तरह, लेखनी के दुरूपयोग पर कि बच्चो जैसा मन किया  इन 'सिद्धार्थ कुमार तिवारी' के विरुद्ध एक "Hate Club " ही बना लूँ...तब शायद उसके कानो तक यह बात पहुंचे. पर फिर वही,बात ...जो लोग इस तरह के सीरियल्स देखते हैं...वे फेसबुक और ऑर्कुट पर नहीं होंगे...शायद हों भी.आजकल महिलाओं के दो अच्छे  टाइम-पास है...नेट और टी.वी. सीरियल्स. हो सकता है...पक्ष और विपक्ष में एक  अच्छी बहस हो जाती,वहाँ .
पर समय की बर्बादी होती..उन लेखक (?) महोदय को प्रचार मिल जता...निगेटिविटी आती सो अलग....इसलिए  बस ब्लॉग पर ही लिख कर संतोष कर लिया.

पर सचमुच किसी गाइड लाइंस की जरूरत अब इन टी.वी.सीरियल को जरूर है..पता नहीं हमारी सभ्यता-संस्कृति के प्रति किस तरह लोगो को गुमराह कर रहे हैं, ये .जिनकी मातायें ऐसे सीरियल्स देखती हैं , उनके छोटे-छोटे बच्चे भी साथ में देखते हैं...और उनके कच्चे मन पर यही प्रभाव पड़ता है कि हमारे देश के रीती-रिवाज़..परम्पराएं ऐसी ही हैं. क्यूंकि किताबें पढने का शौक तो अब बच्चों  में रहा नहीं. वे सीरियल  और फिल्मो में दिखाए गए गाँव को ही भारत की असली  तस्वीर समझ लेते हैं. 

ऐसा नहीं है  कि ये सब बातें ये सीरियल निर्माता नहीं जानते...पर उनकी आत्मा ही मर चुकी है. ये किसी अपराधी से कैसे कम हैं जो हमारी सभ्यता-संस्कृति के साथ ही खिलवाड़ कर रहे हैं??

57 टिप्‍पणियां:

  1. रश्मि तुमने कल देखा है ये और ऐसा ही वाकया ना आना इस देस मेरी लाडो मे भी दिखा चुके हैं…………अभी 2 दिन पहले एक और सीरियल मे अपनी सगी माँ और पत्नी को ज़िन्दा गाड दिया एक बेटे ने जिसके लिये माँ सब कुछ करती थी उसी ने………किस किस सीरियल का हाल पुछोगी……………हर सीरियल मे यही सब दिखाया जा रहा है सिर्फ़ टी आर पी के लिये ………………बेशक हम आज के ज़माने मे रह रहे है मगर आदिवासी और पिछडे क्षेत्रो मे हालात आज भी काफ़ी हद तक ऐसे ही है जैसा दिखा रहे हैं जोकुछ हद तक तो सही हैं मगर सिर्फ़ टी आर पी के लिये कुछ भी दिखाना सही नही है…………हर सीरियल मे ऐसा ही देखने को मिलेगा ।

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  2. आपने बिलकुल सही मुद्दा उठाया है रश्मि , टीवी चैनल्स जो चाहे दिखा सकते हैं जिसका सिर पैर हो न हो....ये समझ में नहीं आता कि ये लोग जी कौनसे युग में रहे हैं

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  3. ऐसा नहीं है कि ये सब बातें ये सीरियल निर्माता नहीं जानते...पर उनकी आत्मा ही मर चुकी है. ये किसी अपराधी से कैसे कम हैं जो हमारी सभ्यता-संस्कृति के साथ ही खिलवाड़ कर रहे हैं??
    ..सच कहा आपने सीरियल तो देखने लायक रहे कहाँ! फिर भी लोग चिपके रहते हैं. हँसाने के बहाने दोगली बातें.... टाइम पास भर है.. जिसके पास टाइम है वह सुनता कहाँ है...
    सार्थक जागरूक चिंतनप्रद प्रस्तुति के लिए आभार

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  4. आक्रोश जायज़ है ...हो सकता है कि किसी पिछड़े इलाके में इस तरह की घटना देखी जाती हो परन्तु फिर भी.जिम्मेदारी तो यह बनती है कि इन कुप्रथाओं को सुधारने के लिए प्रेरणादायक कार्यक्रम बनाये और दिखाए जाएँ.

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  5. सीरियल तो अफ़ीम हैं.देखो और संसार की चिंताओं से मुक्त हो यहाँ के पात्रों के दुखों को जियो. स्वयं सीरियल मल्लिका 'केकता' हिंदी सीरियल नहीं देखतीं .यह काम तो हम मंदबुद्धि करते हैं.
    हाल ही में अफ़गानिस्तान में एक स्त्री की ऐसे ही हत्या की गई.
    हत्यारों को नए नए तरीके सुझाना तो इनका पवित्र धर्म है.
    घुघूती बासूती

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  6. क्या-क्या देख लेती हैं आप, और कहां-कहां?!!
    और उस पर इतना अच्छा लिख देती हैं कि पढना मज़बूरी हो जाती है। वरना ...!
    ‘सब’ देखिए, ‘सब’ के साथ देखिए। और ‘सब’ को उलट के बाक़ी को ‘बस’ कर दीजिए।

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  7. रश्मी जी बस एक ही उपाय है शुतुरमुर्ग की तरह आँखें बंद कर लीजिये.. कभी कोई आवाज़ उठी है इन सीरियल के खिलाफ... कोई धरने हुए हैं... किसी ने सरकार को लिखा है.. नहीं.. सरकार जब मीडिया के कंटेंट पर नियंत्रण की बात करती है तो पूरा मीडिया समाज एक जुट हो जाता है... अब लेखक कहाँ रहे .. ये तो टी आर पी की टीम स्टोरी लाइन नियंत्रित करती है.. जिम्मे एक दल पर होता है जिसे क्रिएटिव टीम कहते हैं... लेखक से तो मजदूरों सा काम लिया जाता है.. एक अच्छे विषय को उठाया है आपने.. सांस्कृतिक पतन की जिम्मेदारी इन टी वी सीरियल को लेनी ही होगी..

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  8. सब टी आर पी का मामला है । हालाँकि यह समझ नहीं आता कि लोग इन्हें देखते ही क्यों हैं ।
    शायद हम अंध विश्वास से ऊपर उठाना ही नहीं चाहते । इसीलिए आज भी समाज में व्याप्त है ।

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  9. आपकी उम्दा प्रस्तुति कल शनिवार (12.02.2011) को "चर्चा मंच" पर प्रस्तुत की गयी है।आप आये और आकर अपने विचारों से हमे अवगत कराये......"ॐ साई राम" at http://charchamanch.uchcharan.com/
    चर्चाकार:Er. सत्यम शिवम (शनिवासरीय चर्चा)

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  10. सिद्धार्थ कुमार तिवारी' को मुबारकबाद वो अपने काम में सफल हो गये उनका काम था की दृश्य ऐसे लिखे जाये की दर्शक रिमोर्ट बगल में रख पुरा एपिसोड देखे वो आप ने किया भले नफरत से गलिया देते हुए | टीवी चैनल यही चाहते है और निर्माताओ से ऐसे ही दृश्यों की मांग करते है भाई सभी को पैसे कमाने है और लोगों का मनोरंजन इसी से होता है तभी तो इन सब की टी आर पी इतनी अच्छी होती है | इन धारावाहिकों से मेरे पति बहुत खुश होते है कहते है भला हो इन धारावाहिकों का जो देश के उन गिने चुने पतियों में हूं जिनके पास टीवी का रिमोर्ट रहता है और खाना पानी जब चाहो मिल जाता है नहीं तो लोगों को धरावाहिक ख़त्म होने या ब्रेक तक रुकना पड़ता है |

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  11. रश्मि जी जैसा कि आपने लिखा कि मैं कभी घृणा नहीं करती, मुझे लगा कि मेरे ही शब्‍द हैं। मैं मेरे दुश्‍मन के लिए भी कभी मन में घृणा को स्‍थान नहीं दे पाती। लेकिन आप सच कह रही हैं कि इन सीरियलों ने घृणा तो क्‍या एक घिनौना सा भाव मन में भर दिया है और शायद दो वर्ष से मैं इन्‍हें कभी भी नहीं देखती। वास्‍तव में डायन की कल्‍पना यूरोप से आयी है और भारतीय संस्‍कृति पर भी लाद दी गयी है। ये जितने भी लेखक हैं इन्‍होंने कभी भी भारतीय समाज को निकटता से नहीं देखा है इसलिए कुछ भी उल-जलूल कहानी बना देते हैं। दुर्भाग्‍य है इस देश का कि ऐसे घटिया सीरियलों को हमारा समाज देखता है।

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  12. vastav me bade afsos ki baat hai.
    aise kayi serials aate hain ...
    sencor board aur sarkar ki bhoomik bhi nindniy hi hai .
    aise serials par rok lagaya jana anivary ho gaya hai.

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  13. हमने तो सीरियल देखा नहीं, किस तरह प्रस्‍तुत किया गया है दृश्‍य. लेकिन यदि यह देखकर प्रताडि़त के प्रति सहानुभूति उमड़ती हो तो दृश्‍य की व्‍याख्‍या एकदम अलग तरीके से भी संभव है. यानि पत्‍थर मारने का दृश्‍य, पत्‍थर मारने को ही प्रेरित करेगा, ऐसा जरूरी नहीं.

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  14. आपकी पोस्ट में मुझे तीन बातें मिली...

    १. गिरिजेश राव जी की पोस्ट की पंक्तियाँ...

    खण्डों में यह पोस्ट आई थी न ...उस पोस्ट को भूलना नामुमकिन है..आपने पूरी पोस्ट पढी थी ??? उसमे काश्मिरी शरणार्थियों के शिविरों की नारकीय स्थिति का चित्रण था...दिल दहला देने वाली पोस्ट थी...

    उस पोस्ट को पढ़ मेरी मोवस्था भी ऐसी ही थी कि उसमे घृणा और चीत्कार के अलावा और कुछ भी नहीं बचा था काफी समय के लिए..

    और मुझे लगा था कि गलत और बुरे से घृणा कितना आवश्यक होता है....यदि घोर घृणा न हो तो क्रांति भी संभव नहीं..

    २. टी वी सीरियल -

    आज जो इनकी स्थिति है, घोर दुर्भाग्यपूर्ण कहा जाएगा...सचमुच एक होड़ सी मची हुई है,कि कौन कितना नीचे गिर सकता है..अश्लीलता , विभत्सता ,सनसनी फैला पैसा कमाना टीवी तथा फिल्म मनोरंजन का मूलमंत्र बन गया है...यहाँ कोई मूल्य नहीं बचा है और सेंसर नाम का कुछ तो भारत में अस्तित्व में है ही नहीं..

    इनको देखना अपने पतन को न्योतना है..इसलिए मैं तो इस बुद्धू बक्क्से से यथासंभव दूरी बनाये रखती हूँ...मुझे अपना मानसिक और शारीरिक स्वस्थ बड़ा प्यारा है...

    ३. डायन प्रताड़ना -

    सीरियल में क्या और कैसे दिखाया जा रहा है,यह तो नहीं जानती,पर झारखण्ड तथा आस पास के राज्यों में शायद ही कोई महीना ऐसा गुजरता है जब अखबार के पन्ने दो चार डायन हत्या के खबरों से नहीं रंगाता....सबसे दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि अधिकांश हत्याएं अंधविश्वास का परिणाम नहीं बल्कि आपसी विवाद का परिणाम होती हैं... डायन ठहरा लोग आपसी दुश्मनी फरिया लिया करते हैं...

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  15. मेरी समझ यह है कि फिल्‍म सेंसर बोर्ड की तरह टीवी कार्यक्रमों के लिए भी कोई बोर्ड तो जरूर होगा और उसके दिशा निर्देश भी होंगे जिनके तहत वे कार्यक्रम को पास करते होंगे। सवाल उन लोगों पर उठना चाहिए। और अगर अब तक नहीं है तो बनना चाहिए।

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  16. @अरुण जी,
    एक सीरियल को बनाने में कई लोगो का हाथ होता है. एक क्रिएटिव हेड होता है...जिसके अंडर में ढेर सारे लोग दृश्यों पर काम करते हैं. हर पल कहानी बदलती रहती है...नए पात्र लाए जाते हैं...

    पर किसी के तो दिमाग की उपज होगी..इस तरह की विभीत्सता??...as a story writer and concept....इन महाशय का नाम था....इसलिए इनका ही जिक्र किया..वैसे भी ये महोदय इस तरह के कई सीरियल के लेखक-निर्देशक रह चुके हैं.

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  17. आजकल के सीरियल्स का ना तो साहित्य से कोई लेना-देना है और ना ही यथार्थ से.. लगता है कोई उल-जलूल सपना देख रहे हैं.. ना ही किसी को अभिनय आता है ना पात्र के अनुसार वेश-भूषा का चयन होता है.. यहाँ तक कि एक ज़माने में भारत एक खोज, तमस, मालगुडी डेज, चाणक्य और व्योमकेश बख्शी जैसे धारावाहिकों में काम कर चुके रंगमंचीय अभिनेता भी पेट पालने के लिए बेवकूफ निर्माता-निर्देशकों के कहने पर कोल्हू के बैल की तरह सर झुकाए कुछ भी कह-कर देते हैं परदे पर.
    आप कहीं भी देख लीजिये.. जिस महिला पात्र को इन्हें बदसूरत दिखाना हो, उसे सांवला सा रंग दे देते हैं लेकिन हीरोइन रहती वही है कोई खूबसूरत सी मॉडल.. जाने इनके लिए बदसूरत और खूबसूरत होता क्या है. कई तो प्रधान व्चरित्र ऐसे हैं जिनके चेहरे पर भाव ही नहीं आते और संवाद भी सपाट बोले जाते हैं. मन तो मेरा भी यही करता है कि हर सीरियल की कास्ट और क्रू को बाहर निकाल कर जीभर के अपशब्द सुनाएँ. पर आजकल शायद लोग भी यही देखना चाहते हैं.. मगर वो लोग हैं कहाँ और कौन हैं ये नहीं पता..

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  18. मुझे तो घृणा वाली बात पर कहना है. 'हमें दूर रहना चाहिए' ये तो सही है पर ये एक ऐसी मानव प्रक्रिया है जिसपर हम चाह कर भी कुछ अधिक नहीं कर पाते... वैसे ही जैसे प्रेम !
    और जैसे जरूरी नहीं कि अच्छी चीजों/बातों से ही प्रेम हो वैसे ही ये भी जरूरी नहीं की बुरी चीजों से ही घृणा भी हो... अपने अपने लिए चीजें अच्छी बुरी होती है.

    बाकी सीरियलों से तो महाभारत के बाद किसी से भी नाता हो या कुछ देखा हो याद नहीं. साउथ पार्क जरूर देख लेता हूँ कभी कभी :) आपकी बातों से सहमत हूँ...! कभी कभी पुणे के हमारे फ़्लैट पर इंडिया टीवी दिन रात चलता. जब हम घर पर नहीं होते तो हमारे यहाँ काम करने वाले अंकल जो एक दोस्त के गाँव से आये थे और हमारे यहाँ रहते थे... दिन भर वही देखते. फिर हर बात हमें समझाते (खासकर मुझे क्योंकि मैं डांट नहीं पाता और भगवान् ने गलती से पेसेंस भी दे रखा है :) )... 'आपलोग पढ़ लिख गए हैं लेकिन होता तो है ही देखिये टीवी पर भी आता है.' मजे की बात ये है कि हम हंसते तो उन्होंने ये बातें लिखनी चालु कर दी थी... इससे पहले कभी चिट्ठी भी शायद ही उन्होंने लिखी हो !

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  19. चरित्र निर्माण से निर्देशकों कों कोई मतलब ही नहीं रह गया है । सस्ती लोकप्रियता के लिए कुछ भी दिखा रहे हैं आजकल ।

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  20. @अंशुमाला जी,
    और लोगों का मनोरंजन इसी से होता है

    ये कौन तय करता है??...जब ये निर्देशक-निर्माता यही परोसेंगे तो ...दर्शक क्या करें?? मनोरंजन के साधनों की कमी की वजह से अधिकाँश लोग टी.वी. सीरियल पर ही निर्भर हैं. अब सबकी पढने-लिखने...में रूचि नहीं होती. और पिकनिक-पार्टी- कैम्पिंग का कितना चलन है,हमारे यहाँ ..ये सबको मालूम है...ले द एके बच गया टी.वी...और वहाँ ये विभीत्सता...
    कुछ तो अपनी जिम्मेवारी समझें, ये लोग..

    और लेखक महोदय तब सफल कहलाते...अगर मुझे अपना सीरियल फॉलो करने पर मजबूर कर देते. ये सारा प्रकरण भी शायद चार एपिसोड का था..पर मैने एक ही एपिसोड देखे....उनका नाम देखा और टी.वी. बंद कर दिया.
    मुझे पता है...मेरे ये सब लिखने से ना तो ऐसे सीरियल बनना बंद होंगे ना ही लोग देखना छोड़ेंगे.
    फिर भी हम सब ऐसे विषयों पर तो लिखते ही हैं....नक्कारखाने में तूती की आवाज़ ही सही..आवाज़ है तो.

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  21. @राहुल जी,
    प्रताड़ित के प्रति सहानुभूति के लिए इतनी दूर तक जाना पड़ेगा??

    इन दृश्यों के परिणाम-दुष्परिणाम की बात तो अलग है...पर ऐसे दृश्य का विस्तार से दिखाना...कि सारे गाँव के लोग एक जगह एकत्रित हैं, उत्सव सा माहौल है....नाश्ता-पानी कर रहे हैं...और एक लड़की को दूर गड्ढे के पास बिठा दिया गया है कि सब लोग पत्थर मारें....और फिर उसे उसी में गड्ढे में दफना दिया जाए. पूरे गाँव के स्त्री-पुरुष...बूढे-बच्चों के सामने.

    ऐसा हुआ है...आज तक हमारे देश में??

    सउदी में जहाँ ऐसी सजा दी जाती है...वहाँ भी कुछ सेलेक्टेड लोग ही जाते हैं...स्त्रियाँ और बच्चे नहीं होते ,पत्थर मारनेवालों में.

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  22. @रंजना जी,
    मैने गिरिजेश जी की पोस्ट ही नहीं...वो पूरी किताब भी पढ़ी है.

    और मैं सहमत हूँ..आपसे कि आए दिन कमजोर पर अत्याचार...हत्याएं होती हैं. डायन का आरोप लगा कर भी हत्याएं हुई होंगी.

    मेरी आपत्ति सिर्फ इस बात से है कि National television पर इस तरह के दृश्य,इतने विस्तार से नहीं प्रसारित करने चाहिए...वो भी जब वो कपोल कल्पना हो.

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  23. यदि सीरियलों का समाज से जुड़ाव न हो तो व्यर्थ ही है उनको देखना।

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  24. रश्मि जी, या तो यह लोग यह सब दिखाते है या फिर किसी घर की माँ को किसी और घर और उस घर की माँ को इस घर माँ exchange के नाम पर या फिर emotional अत्याचार ... जब केवल दूरदर्शन था तब लगता था कुछ और भी होता ... अब लगता है ... जो था वह इससे तो बढ़िया ही था ... भारत एक खोज ... टरनिंग पॉइंट ... जैसे कार्यक्रम कहाँ दिखते है अब ... आप नहीं देखती है ... पर यकीन जानियेगा ... बाकी महिलायों को शायद इसमें ही सच्चा मनोरंजन मिलता है ... तभी तो रोज़ एक ना एक नया सीरियल ... मिलता है इन्ही सब मसालों के साथ सराबोर ... आखिर पूरा खेल है तो डिमांड और सप्लाई का !! बढ़िया पोस्ट !

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  25. रश्मि जी

    ये आप और हम भूल कर रहे है जो ये सोच रहे है की लोगों को ये पसंद नहीं है लोग मजबूरी में देख रहे है मैंने देखा है लोगों को इन धारावाहिकों और इनके बेतुके सी कहानियो को दिलो जान से चाहते और बिना पलक झपकाए देखते हुए | अच्छी कहानिया एक नहीं कई शुरू हो चुकि है टीवी पर किन्तु बंद हो गई जल्दी क्योकि टी आर पी के लिए उन्होंने कहानी से समझौता नहीं किया और जो कहानी ले कर चले थे उसी ही अंजाम तक ले कर गए बिना उल जलूल नए मोड़ के | पर किसी ने देखना पसंद नहीं किया क्योकि वो वास्तविकता के करीब थे और अति नाटकीयता से दूर |

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  26. @अंशुमाला जी,

    वे लोग क्यूँ पसंद करते हैं,देखना??...क्यूंकि उनके जीवन में हंसी-ख़ुशी..मनोरंजन का कोई साधन रह ही नहीं गया है. पहले,महीनो..शादी-ब्याह की...तीज-त्योहार की तैयारियाँ चलती थीं...लोग मिल कर गाते-बजाते थे...संयुक्त परिवार होते थे...मोहल्ले,पास-पड़ोस में आना जाना होता था...मिल-जुल कर हँसते-बोलते थे.अब महानगरों की तो छोड़ दें..छोटे शहरों में भी इस तरह से मिलना-जुलना नहीं होता.

    इसीलिए टी.वी. पर निर्भरता बढ़ गयी है . वे लोग उसी में खुशियाँ ढूंढ लेते हैं. जैसे कला-फिल्म सबको नहीं पसंद ..वैसे ही कुछ यथार्थ वादी कहानियाँ नहीं पसंद आती होंगी,आम-जनता को.
    पर इसका अर्थ ये तो नहीं कि इस तरह इसका फायदा उठाया जाए. अपने सीरियल में कुछ नया दिखाने के लिए, दूसरे देशों की कुरीतियाँ हमारे जन-जीवन में पिरो दी जाएँ और उसे भी इस तरह वीभत्स बना कर.

    भारी-साड़ी जेवर से लदी.... ढेरो चाल चलती नायिकाएं तो 'सास भी कभी बहू थी' सीरियल के जमाने से चली आ रही हैं.
    पर इस तरह के क्रूरता भरे दृश्य, नया ट्रेंड है शायद. (कई सीरियल का जिक्र वंदना ने किया है...जिसका मुझे पता नहीं था )

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  27. अजी मै नही देखता टी वी, फ़िल्म भी नही देखता, लेकिन कभी कभी नजर पड जाये तो अलग बात हे, बीबी जो देखती हे सब नाटक, एक दिन देखा की एक मंत्री के गह्र पुलिस वाले कुते की तरह से बेठे हे जमीन पर ओर मंत्री ओर उस के गुंडे ऊपर सोफ़े पर बेठे हे, ओर पुलिस का आफ़िसर उन मंत्री के पांव दबा रहा हे, मैने सोचा यह सिर्फ़ नाटको ओर फ़िल्मो मे ही होता हे, लेकिन दो दिन पहले यह हकीकत मे देखा.... अब इसे क्या कहे?

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  28. धारावाहिकों की अतिनाटकीयता प्रबुद्ध दर्शकों में खीज ही पैदा करती है ...सिर्फ एक लाईन का नोटिफिकेशन देकर ये अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं ...मगर ये भी सच है कि ऐसे धारावाहिकों को पसंद करने वाले मंदबुद्धियों की देश में कमी भी नहीं है , इसलिए ये लोकप्रिय भी हो जाते हैं ...सन्देश परक धारावाहिक नेशनल चैनल पर आते हैं मगर उन्हें देखना कौन है ...
    हालाँकि डायन करार देकर लगभग देश निकाला देने जैसी स्थिति देश के कई प्रान्तों और दूर दराज के ग्रामीण इलाकों में आज भी कायम है ...यही काम शहरों में भी किया जाता है, बस इसका रंग रूप बदल गया है ...प्रेमचंदजी ने भी इस समस्या को अपनी एक पोस्ट में दर्शाया है ...

    तुम्हारी इस पोस्ट का रंग कुछ अलग सा है ...मेरे साथ और किसी ने महसूस किया या नहीं ...

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  29. आदरणीया रश्मि जी आपने बहुत सार्थक और सोचनीय विषय की ओर हम सबका ध्यान आकृष्ट किया है |अति भौतिकता की दौड में इंसानियत खत्म होती जा रही है पैसा बनाओ की सोच हम पर हावी होती जा रही है |आभार |

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  30. राजेश जोशी की एक कविता है .." घृणा यूँ तो कोई बहुत अच्छी चीज़ नहीं होती / बहुत सारा खून पी जाती है फेफड़ों का "
    इन लोगों से केवल घृणा करने से काम नहीं चलेगा । इस पूरी व्यवस्था में परिवर्तन की आवश्यकता है ।
    रही बात डायन सम्बन्धी अन्धविश्वास की .. हमारे राज्य में तो इसके खिलाफ कानून भी बन चुका है लेकिन स्थितियों में परिवर्तन नहीं है ।
    लीजिये एक कविता पढ़िये .. इसे पढ़्कर मन में क्या उपजता है बताइये ..?

    डायन

    वे उसे डायन कहते थे
    गाँव मे आन पडी़ तमाम विपदाओं के लिये
    मानो वही ज़िम्मेदार थी

    उनका आरोप था
    उसकी निगाहें बुरी हैं
    उसके देखने से बच्चे बीमार हो जाते हैं
    स्त्रियों व पशुओं के गर्भ गिर जाते हैं
    बाढ के अन्देशे हैं उसकी नज़रों में
    उसके सोचने से अकाल आते हैं

    उसकी कहानी थी
    एक रात तीसरे पहर
    वह नदी का जल लेने गई थी
    ऐसी खबर थी कि उस वक़्त
    उसके तन पर एक भी कपडा़ न था
    सर सर फैली यह खबर
    कानाफूसियों में बढती गई
    एक दिन डायरिया से हुई किसी बच्चे की मौत पर वह डायन घोषित कर दी गई

    किसी ने कोशिश नहीं की जानने की
    उस रात नदी पर क्यों गई थी वह
    दरअसल अपने नपुंसक पति पर
    नदी का जल छिडककर
    खुद पर लगा बांझ का कलंक मिटाने के लिये
    यह तरीका उसने अपनाया था
    रास्ता किसी चालाक मांत्रिक ने सुझाया था
    एक पुरुष के पुरुषत्व के लिए दूसरे पुरुष द्वारा बताया गया यह रास्ता था
    जो एक स्त्री की देह से होकर गुजरता था

    उस पर काले जादू का आरोप लगाया गया
    उसे निर्वस्त्र कर दिन-दहाडे़ गलियों बाज़ारों में घुमाया गया
    बच्चों ने जुलूस का समाँ बांधा
    पुरुषों ने वर्जित दृश्य का मज़ा लिया
    औरतों ने शर्म से सर झुका लिये

    एक टिटहरी ने पंख फैलाये
    चीखती हुई आकाश में उड़ गई
    न धरती फटी
    न आकाश से वस्त्रों की बारिश हुई ।

    ????????????????????????

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  31. न धरती फटी
    न आकाश से वस्त्रों की बारिश हुई ।


    शब्द नहीं हैं..शरद जी,...इस कविता पर कुछ कहने के लिए.
    बस मन को बींध कर रख दिया इन शब्दों ने

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  32. @ रश्मी जी
    आजकल के सीरियल्स का ना तो साहित्य से कोई लेना-देना है और ना ही यथार्थ से

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  33. रश्मि प्रभा जी की मेल द्वारा प्राप्त टिप्पणी

    आपने व्याख्या बहुत ही अच्छी की है रश्मि .... किसी भी नारकीय दृश्य को दिखाना मानसिकता को कुंद करना है , पर आज भी गांवों में, शहरों में ऐसे पाप हो रहे हैं ... और बड़े ही भयानक ढंग से.

    लोग इतने सारे कर्मकांड करते हैं , पर कभी भी खुद को नहीं देखते .... कुरीतियाँ किसने बनाई , क्यूँ बनाई , अपने बचाव या अपनी इच्छा पूर्ति के लिए . तकलीफें भगवान् नहीं देते , व्यक्ति खुद उसे बनाता है ! हमारे पास तो कलम है , कभी कल्पनाओं को लिखते हैं, कभी आँखों देखा लिखते हैं ,...

    इंडिया टीवी भी तो यही करता है .
    कभी भी समाज में आज तक चंडाल नहीं हुआ सिर्फ चुड़ैलें हुईं और उनको पत्थर मारा गया है .... यह भी एक सोचनेवाली बात है !

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  34. आपने सही लिखा....

    ‘सचमुच किसी गाइड लाइंस की जरूरत अब इन टी.वी.सीरियल को जरूर है.’

    दर्शक यदि नकारने लगें तो भी अंकुश लग सकता है।

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  35. पोस्ट और उस पर आई टिप्पणियां एकदम राप्चिक हैं। देरी से आने का लाभ मिला कि टिप्पणियों के जरिये विमर्श का आनंद दुगुना हो गया।

    मैं भी कई बार इन बजरबट्टुओं को देख कुढ़ जाता हूं.....कम्बख्त घर में रहेंगे लेकिन कोट पैंट हमेशा पहने रहेंगे....इन लोगों को गर्मी भी नहीं लगती क्या....हरदम शादी के सूट में ही नजर आते हैं....और महिलायें तो ओफ्फ.....हमेशा रोती ही नजर आएंगी लेकिन गहने एक भी कम नहीं....बल्कि जो पिछले सिरियल में ज्यादा रोती नजर आती है उसके अगली कड़ी में दो चार गहने ज्यादा पहने हुए नजर आती है....जाने कौन सा सत छुपा है इनके आंसुओं में कि गहने और साडियों की वेरायटी कड़ी दर कड़ी बढ़ती चली जाती है :)

    मैं ऐसे सिरियल चैनल बदलते वक्त अक्सर मौज लेने के लिये दो चार सेकंड के लिये देखता हूं और उसमें भी बैकग्राउंड में मरघट का म्यूजिक चल रहा होता है....आsss आssss करते हुए....मन करता है कि सालो और कोई धुन नहीं है क्या तुम्हारे पास.....अब तो वो रूदन माहौल वाली रिकार्ड की गई चिप भी चिपचिपाने लगी होगी तुम्हारें आंसुओ की वजह से .....अब तो बंद तो करो।


    एक और सिरियल थोड़ा सा देखा है जिसमें वो पुनपुन वाली आती है....पटना स्टाइल बोलने में ऐसा स्टाईल लेकर बोलती है कि देखकर खीझ होती है।

    इन सब सिरियल्स का एक पहलू यह भी है कि ऐसे ही सिरियलों की वजह से उत्तर भारत की छवि नकारात्मक बन रही है और नतीजतन राजनीतिक हेट....उपहास वाली बोली ठोली आदि का लोगों को सामना करना पड़ता है।

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  36. जिस माटी पर घृणा उगती है उसी धूल से ये बवंडर भी बनते हैं !
    वो धरती अब भी अबोध है ! उसे प्रेमानुभूति / ज्ञान और परिपक्वता की दरकार है !

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  37. अच्छा है की मैं सीरिअल्स नहीं देखता कोई सा भी...

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  38. आज आर्थिक नफ़े नुक्सान के आधार पर सब कुछ परोसा जाता है. चरित्र निर्माण जैसी बातो की अर्थ के आगे क्या महता है?

    सवाल ये है कि हम मे से ही कोई निर्देशक है कोई निर्माता है पर हम जहां आर्थिक रिस्क देखते हैं वहीं सब कुछ भूल कर भी वही परोसते हैं. कई निर्माता निर्देशकों से बात होती है वो भी यही सब रोना रोते हैं. भगवान जाने ये आर्थिक युग कब तक चलेगा?
    रामराम.

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  39. बहुत ही उम्दा आलेख.
    सलाम.

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  40. समय की कमी के कारण सिरियल के सन्दर्भ में क्या कहू? मगर ज्यादातर कहानियों में सास-बहू का झगडा या घर में भी राजनीति... गंदकी ही होती हैं | अंधश्रद्धा फ़ैलाने में न्यूज़ चेनल भी पीछे नहीं है |

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  41. होना तो यह चाहिये कि यदि कहीं ऐसी कुप्रथाएं चल भी रही हों तो इन सीरियलों के माध्यम से उनका मनोरंजक शैली में विरोध दिखाया जावे किन्तु हो यह रहा है कि जहाँ ये सब नहीं चल रहा है वहाँ भी इन्हें बढावा कैसे मिले ये दिखा रहे हैं और TRP बढा रहे हैं । जबकि TRP तो विपरीत दर्शन में भी बढ सकती है चाहे उसका अनुपात कुछ कम हो ।

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  42. एक सीरियल में (नाम याद नहीं आ रहा, चैनल क्लर्स ही था) तो लड़के व लड़की को फांसी पर लटका दिया था। बेहद खतरनाक सीन था वो। सोचकर ही सहम जाता हूं। एक सीरियल है ना आना इस देश लाडो। इतनी बकवास दिखाते हैं कि जी करता है कि टीवी तोड़ दूं...। अपना ही नुकसान होगा। ये चैनल जितना तेजी से उभरा था, उसी तरह नीचे भी गिर रहा है।

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  43. इसीलिए तो हम पहले ही तय कर लिये कि सीरियल बंद.............. अब तो टी बी न्यूज भी बंद है. अब जो भी एक्स्ट्रा टाइम मिलता है , सिर्फ और सिर्फ ब्लोगिंग.

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  44. लोग देखते हैं इसलिए वे दिखाते हैं -अगर इनसे मनुष्य की इंगित घृणास्पद वृत्तियाँ शमित हो जायं /जाती हों तो इन सीरियलों की भी उपयोगिता हो सकती है ...

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  45. तो क्या मैं टीवी नहीं खरीदूं?

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  46. जो बिकता है सो दिखता है...बस्स्स (इससे कम या ज़्यादा कुछ भी नहीं)

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  47. टीवी सीरियल्स तो वैसे भी अतिशयोक्ति से भरपूर होते हैं.. जो अच्छा है वो इतना अच्छा कि आँखों के सामने पानी मे ज़हर मिला दो पी जाए उठाकर,जो बुरा है वो इतना बुरा कि आँखों के सामने बच्चे के गले पर छुरी चलती रहे और वो हँसी बिखेरता रहे.. साज़िशें ऐसी कि सब सामने और कुछ पता न चले जबतक सूत्रधार न चाहे.. ऐसे में येसब देखना भी अतिशय ही है.. संगसारी का इतिहास बहुत पुराना है, ईसा के ज़माने सए (पहला पत्थर वो मारे जिसने कभी कुछ भी ग़लत न किया हो).
    अपुन तो चंद्रमुखी चौटाला के दीवाने हैं, उसके बिंदास हरियाणवी सम्वाद और बरसते हुए चाँटों और बाकी कलाकारों के बेतुके तकियाकलाम.. विशुद्ध मनोरंजन!!

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  48. वास्तव में छोटे परदे पर जिस तरह के सीरियल्स इन दिनों दिखाए जा रहे है वह चिंतनीय विषय है सीरियल तो सीरियल रियेलिटी शो के नाम पर जिस तरह के प्रोग्राम आ रहे है शर्मनाक है

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  49. बहुत संवेदनशील ह्रदय की हो ...प्यार बांटने वाले ऐसे लोग घ्रणा चाहते हुए भी नहीं कर सकते ! यह लेख पढ़ते हुए ऐसा लग रहा था कि मैं अपनी आदतों के बारे में पढ़ रहा हूँ !
    कुछ लोग किसी भी कीमत पर केवल नाम की तलाश में रहते हैं चाहे उन्हें गालियाँ ही क्यों न मिलें मगर लोग जानेंगे तो जरूर !
    ऐसे लोगों पर पोस्ट लिखना भी उन्हें लोकप्रियता देना है ! ये वाकई अपराधी हैं !
    शुभकामनायें

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  50. ऐसा नहीं है कि ये सब बातें ये सीरियल निर्माता नहीं जानते...पर उनकी आत्मा ही मर चुकी है. ये किसी अपराधी से कैसे कम हैं जो हमारी सभ्यता-संस्कृति के साथ ही खिलवाड़ कर रहे हैं??
    बोलकुल सही कहा है। अपने स्वार्थ के लिये देश के भविष्य के साथ खिलवाड कर रहे हैं ये लोग।

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  51. बहुत बढिया मुद्दा उठाया है रश्मि तुमने. मेरी सास जी लगभग सारे सीरियल्स देखतीं हैं, सो उस दिन वे फ़ुलवा भी देख रही थीं. जब डायन जैसे शब्द का शोर सुनाई दिया तो मैं भी कमरे में पहुंची और अवाक रह गई. तमाम चैनल्स ने देश की संस्कृति को गर्त में पहुंचाने की ठान ली है. हिन्दी साहित्य में एक से बढ कर एक उपन्यास भरे पड़े हैं, जिन पर सीरियल्स बनाये जाने चाहिये, पर पता नहीं इन निर्माताओं की समझ को क्या हुआ है? दूरदर्शन ने बहुत शानदार धारावाहिक हमें दिये थे, लेकिन जब से इतने सारे चैनलों की बाढ आई है, तब से कार्यक्रमों का स्तर निरन्तर गिर रहा है. ऐसी अमानवीय घटनाओं को दिखाये जाने का विरोध होना ही चाहिये.

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  52. ha ha ha...sabhi manoj kumar se kochh na kuchh seekhein hain....writer bechara kabhi kabhi channel ke jhanse mein aa jata hai......

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  53. ha ha ha...sabhi manoj kumar se kochh na kuchh seekhein hain....writer bechara kabhi kabhi channel ke jhanse mein aa jata hai......

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  54. चार दिन के लिये पतिदेव के साथ एक कोंफ्रेंस में बाहर गयी थी ! आज ही लौटी हूँ ! इसलिए देर से पहुँचने के लिये क्षमाप्रार्थी हूँ ! इतने विचारोत्तेजक आलेख के लिये धन्यवाद रश्मि जी ! इन चैनल्स वालों ने भारतीय संस्कृति को नहीं वरन् कपोल कल्पित, मिथ्या एवं घोर निंदनीय अपसंस्कृति को लाइम लाईट में लाने की कुचेष्टा की है जिसे मैं जघन्य अपराध की श्रेणी में रखती हूँ ! एक अरब से अधिक की आबादी वाले देश में कतिपय स्वार्थी, अंधविश्वासी एवं निपट मूर्ख लोगों द्वारा जो इक्का दुक्का काण्ड कर दिए गये हैं या किये जा रहे हैं उन्हें सारे ग्रामीण भारत का प्रतिनिधित्व करने का अधिकार नहीं दिया जा सकता ! ऐसी कहानियाँ लिखने वाले लेखक, ऐसी कहानियों पर सीरियल बनाने वाले निर्माता, ऐसे सीरियल्स में अभिनय करने वाले कलाकार तथा ऐसे सीरियल्स को दिखाने वाले सभी चैनल्स पर तत्काल प्रभाव से आपराधिक मामला दर्ज किया जाना चाहिए ताकि वे समाज में लोगों को कुमार्ग पर चलने के लिये उकसावा ना दे और गलत परम्पराओं की जड़ें मजबूत ना कर सकें ! सार्थक लेखन के लिये आपका बहुत बहुत साधुवाद एवं अभिनन्दन !

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  55. इधर शादियों की व्यस्तता के चलते पढना बहुत कम हुआ \आज आपका लेख पढ़ा और टिप्पणिया भी जिसमे सभी तरह के विचार थे |घ्रण करके हम क्या हासिल कर सकते है ?बाकि साधना जी की टिप्पणी से पूर्णत सहमत |
    अगर ब्लाग के जरिये एकजुट होकर कोई रिपोर्ट कर सकते है तो हम साथ है |
    बहुत ही सही विषय पर जो की हमे धीमा जहर दे रहा है खुलकर लिखा है अपने साधुवाद |

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  56. रश्मि जी...

    आपकी पोस्ट देर से पढ़ी...और देर से पढने के कारण ही में इतने लोगों की टिप्पणियां पढ़ सका...जो आपकी पोस्ट की सार्थकता को और बढा गए हैं....बरहाल देर से पढने की क्षमा चाहता हूँ...

    लोग कहते हैं सीरियल समाज का आइना होते हैं.,..पर मेरा कहना है की बुधू बक्से के धारावाहिकों का वास्तविकता से कुछ भी लेना देना नहीं है....वास्विक जीवन में कहाँ ऐसा सब होता है....पर जब तक किसी भी खाने को मिर्च मसाला डाल कर पेश न किया जाए लोगों को खाने में कहाँ अच्छा लगता है...सो इन धारावाहिकों में भी लेखक और निर्देशक अपनी योग्यता के अनुसार कल्पनाओं में दर्शकों को गोते लगवाते हैं....पर जब तक इस तरह की बे-सर-पैर की कहानियां दर्शक स्वीकारते रहेंगे तब तक धारावाहिक बनते रहेंगे....हमें ही इन्हें सिरे से नकारना होगा....तभी शायद समाज को इनसे निजात मिल सके....

    बरहाल विचारोत्तेजक विषय पर आपने आलेख लिखा है...इसके लिए हार्दिक बधाई....

    दीपक....

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