सोमवार, 2 जुलाई 2012

लड़कियों की उड़ान किसी इत्तफाक़ की मोहताज़ नहीं....


पिछली पोस्ट में जब कई  माताओं-पिताओं द्वारा अपने ही बच्चों के पालन-पोषण में विभेद पर आलेख लिखा तो लगा इस विषय पर भी लिख देना चाहिए जो मेरे मन में अक्सर हलचल मचाता है. 
और ब्लॉग तो है ही अपने मन का सबकुछ उंडेल देने के लिए...:)

इस बात से तो सभी सहमत हैं कि मुट्ठी भर जागरूक अभिभावकों को छोड़कर ज्यादातर लोग लड़की के जन्म पर ख़ुशी नहीं मनाते. 
पर जब इन्हीं माताओं-पिताओं को  पुत्र रत्न की प्राप्ति नहीं होती और लक्ष्मी या लक्ष्मियाँ  ही उनके घर की रौनक बढ़ाती है तब वे  इस सच को ख़ुशी-ख़ुशी स्वीकार कर, अपनी बेटी को हर सुख-सुविधा ..आगे बढ़ने का अवसर प्रदान करने का प्रयत्न करते हैं.

मैने एक  बात गौर की है......जितनी भी लडकियाँ सफलता के उच्च  शिखर तक पहुंची हैं, उनमें से ज्यादातर वे लडकियाँ हैं जिनके  पिता को कोई पुत्र रत्न नहीं है. यानि अगर उनके कोई बेटा नहीं है तो फिर वे अपनी बेटी को ही एक बेटे के रूप में पालते हैं . उस पर लड़कियों वाला कोई बंधन नहीं लगाते...उसे आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करते हैं...और किसी भी क्षेत्र में उन्हें आगे बढ़ने से नहीं रोकते....उनके अंदर ये भावना भी पलती है कि उनके सपनो को बेटियाँ ही पूरी करनेवाली हैं...उनकी आशाएं-आकांक्षाएं उनपर ही टिकी हैं. वे  अपने साथी -रिश्तेदार जो बेटे के पिता होते हैं ,उन्हें वे दिखा देना चाहते हैं कि मेरी बेटियाँ ,आपके बेटों से किसी मायने में कम नहीं हैं .और वे उन्हें बढ़िया मार्गदर्शन...हर सुविधा प्रदान करते हैं...और हर हाल में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं.
'किरण बेदी ' का भी कोई भाई नहीं है....उनके पिता ने उन्हें एक लड़के की तरह पाला..घुड़सवारी-तैराकी सब सिखाई और उन्हें आगे बढ़ने से नहीं रोका.फलस्वरूप वे पहली महिला IPS Officer    बनीं. लिखते वक़्त  कई नाम याद नहीं आ रहे ऐसी ही तीन बहनें है...एक प्रख्यात जर्नलिस्ट, रंगकर्मी और बड़ी ऑफिसर...उनके  इंटरव्यू और भी ऐसी कई लड़कियों के  इंटरव्यूज़ पढ़े/सुने हैं जो कहती हैं...'हमारे माता-पिता ने हम बहनों को बिलकुल बेटों की तरह पाला.....हमें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया और आज हम यहाँ हैं. " (हालांकि बेटों की तरह या बेटियों की तरह पालने के तरीके का वर्गीकरण क्यूँ किया जाता है??...एक बच्चे को उसके जेंडर से ऊपर उठा कर सिर्फ एक बच्चे की तरह  क्यूँ नहीं पाला जा सकता ?? )

कई उदाहरण अपने आस-पास भी देखे हैं. जिनकी सिर्फ बेटियाँ होती हैं..वे अपनी बेटियों को बिना हिचक वे सारे काम सौंपते हैं जो  जो अक्सर लड़के ही करते हैं...और वे अपनी इस आजादी का कोई अनावाशय्क फायदा नहीं उठातीं बल्कि कुछ ज्यादा अच्छी तरह ही उस कार्य का सम्पादन .करती हैं.  अगर सिर्फ बेटियाँ हों तो उन्हें दूसरे शहर..दूसरे देश भेजने में भी नहीं हिचकिचाते. पर यही अगर ईश्वर ने बेटा-बेटी दोनों का सुख प्रदान किया तब जैसे कार्य-विभाजन हो जाता है...बेटियों की तो शादी कर देनी है और बेटों को उनकी मनचाही उड़ान के लिए ढील देते रहना है.परंपरावादी  माओं की तरह यहाँ भी माँ बेटियों को सारे स्त्रियोचित गुण प्रदान करना चाहती होंगी...पर यहाँ पिता जरूर हस्तक्षेप करते हैं और बेटियों पर भरोसा कर उनपर किसी तरह का बंधन नहीं लगाने देते .

एक उड़ता हुआ ख्याल आता है क्या इंदिरा गांधी का कोई भाई होता तब भी 'नेहरु 'अपनी बिटिया को ही राजनीति  में आने के लिए प्रेरित करते ?? ..शायद नहीं. 

क्यूंकि उनकी अगली पीढ़ी यही कर रही है. हम सबने अपनी नज़रों के सामने प्रियंका और राहुल के व्यक्तित्व का विकास होते देखा है. प्रियंका  शुरू में राहुल से कहीं ज्यादा एक्स्ट्रोवर्ट और लोगों से जल्दी घुल-मिल जाने वाली थीं. राजीव गांधी की ह्त्या के बाद उनकी अंत्येष्टि का सीधा प्रसारण टी.वी. पर हुआ था. और वहाँ देखने से लग रहा था...उस छोटी सी उम्र में प्रियंका ही सारा इंतजाम देख रही हैं. नेताओं से बात करते...तेजी  से आते- जाते वही दिख रही थीं. सोनिया सदमे की हालत में थीं और राहुल एक तरफ हाथ बांधे खड़े थे. अंत्येष्टि के वक्त प्रियंका माँ के समीप  खड़े हो  कंधे से घेर उन्हें हिम्मत बंधाना  भी नहीं भूलीं.
 पर उनकी , इतनी सक्रियता के बाद भी राजनीति में किसे प्रमोट किया जा रहा है,सबके सामने है. ये भी कहा जा सकता है कि शायद, प्रियंका अपनी मर्जी से शादी और बच्चों को प्राथमिकता देना चाहती हों...पर सच कुछ और ही लगता है. क्यूंकि राजनीतिक सभाएं तो वे शादी-बच्चों के बाद भी लगातार अटेंड करती रही हैं. पर किसी जिम्मेवारी वाले पद से जरूर मरहूम रहीं...अब अपनी मर्जी से या माँ के निर्देश पर...यह तो पहेली ही बनी रहेगी और सब अटकलें ही लगाते रहेंगे. 

ऐसा नहीं है...कि जिनके बेटे होते हैं वे अपनी बेटियों को आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित नहीं करते . मातृवंशी  समाज में या आदिवासी समाज में...या कुछ जागरूक-उदारवादी-प्रबुद्ध जन लड़के/लड़कियों में ऐसा भेदभाव नहीं करते. पर व्यापक तौर पर ऐसी प्रवृत्ति नहीं देखी जाती है.
कहने का अर्थ यह है कि जब बेटियों को प्रोत्साहित किया जाता है...उनपर अनावश्यक बंधन नहीं लगाए जाते तो वे आसमान छू लेने की हैसियत रखती हैं. इसलिए उनपर भरोसा करें और उनकी उड़ान को ना रोकें. 

लडकियाँ ये गानें पर मजबूर ना हों..
"उड़ी उड़ी  मैं तो उड़ी..इत्तफाक़ से...."
ये इत्तफाक़ नहीं..उनकी नियति होनी चाहिए.

बुधवार, 27 जून 2012

इतना मुश्किल क्यूँ होता है "ना " कहना

इस लम्बी कहानी की कुछ किस्तों  पर कुछ  लोगों  ने कई  कई  बार यह कहा कि "जब किसी स्त्री पर उसका पति या ससुराल वाले अत्याचार करते हैं तो उसे पहली बार में ही इसका विरोध करना चाहिए "
बिल्कल सच है यह क्यूंकि अगर विरोध नहीं किया तो फिर उनकी हिम्मत बढती चली जाती है...लेकिन अधिकाँश स्त्रियाँ ऐसा नहीं कर पातीं...पर सोचने की बात ये है कि वो ऐसा क्यूँ नहीं कर पातीं??
इसकी प्रमुख वजह है...उनका पालन-पोषण. उन्हें बचपन से ही यही सिखाया-पढाया जाता है कि त्याग करो..एडजस्ट करो...जबाब ना दो..विरोध ना करो....ऊँचा मत बोलो..ये सब स्त्रियोचित गुण नहीं हैं...वगैरह वगैरह...फिर वे कैसे सीख पाएंगी ना कहना...विरोध करना..??

पहले ये स्पष्ट कर दूँ कि इस ब्लॉगजगत के अभिभावकों..या अन्य मुट्ठी भर अभिभावकों की बात नहीं कर रही जो लड़के/लड़कियों में विभेद नहीं करते. पर वृहद् परिप्रेक्ष्य में देखें तो ऐसे लोगों की संख्या सागर में बूँद जैसी नहीं भी तो.. एक बाल्टी भर जल जैसी ही है. अधिकाँश लोग ऐसे हैं जो  लड़कियों के जन्म के साथ ही भेदभाव शुरू कर देते हैं. लड़कियों का जन्मोत्सव नहीं मनाएंगे...आगे चलकर उसका जन्मदिन नहीं मनाएंगे..पर बेटों का जन्मोत्सव और उसका जन्मदिन धूमधाम से मनाएंगे. समाज के एक वर्ग में देखा..कि वहाँ बेटियों की छट्ठी (जन्म के छः दिन बाद मनाया  जाने वाला उत्सव ) का रिवाज़ नहीं है...अब ये रिवाज किसने बनाए??
 
अगर बेटे/बेटी दोनों ही बहुत छोटे हैं ..रो रहे हैं तो अक्सर बेटे को पुचकार कर उठा लिया जाता है. बढ़िया चीज़ें...खिलौने..कपड़े..चॉकलेट  बेटों के लिए आते हैं. कितने ही घरों में ,बेटे को दूध का ग्लास दिया जाता है, उनकी दाल में घी जरूर डाला जाता है..पर बेटियों के  नहीं. दूरदर्शन पर बेटियों को भी उचित पोषण दिया जाना चाहिए के संदेश की शुरुआत ही यूँ हुआ करती थी.."बेटियाँ ना खाया करे हैं, घी "...शायद बहुत लोग एतराज जताएं..पर यह सब कटु सत्य है ...एक मेरी आँखों देखी घटना है...बचपन में हम कॉलोनी के बच्चे दशहरा में मूर्तियों के दर्शन के लिए जा रहे थे. एक अफसर पिता..अपने बरामदे में  से चिल्लाये..."मन्नू ने फटे हुए मोज़े पहने हैं" ..और उसकी बहन किट्टी ने अपराधी भाव से  कहा.."मैने मना किया था...इसने नहीं सुना.." और वहीँ झुक कर उसने छोटे भाई के फटे मोज़े उतार कर खुद पहने और अपने अच्छे मोज़े उसे पहना दिए." पिताश्री संतुष्ट हो गए. उस वक़्त भी मुझे यह बात बहुत बुरी लगी थी (तभी शायद अब तक याद है ) .भीड़ में कोई झुक कर मन्नू के फटे मोज़े नहीं देखने जा रहा था....पर उसके पिताजी को कैसे गवारा  हो ये. उनके घर में और भी ना जाने कितने ऐसे भेद-भाव किए जाते होंगे . 
लोग कह सकते हैं..'ये तो आपके बचपन की बात है...बड़ी पुरानी बात है..अब ऐसा नहीं होता ' तो वे ज्ञानदत्त पाण्डेय जी का मई महीने का ये फेसबुक स्टेटस  पढ़ सकते हैं .."सहयात्री ने दो लीटर के  ठंढे पानी की बोतल खरीदी .एक ग्लास खुद पिया..एक ग्लास बेटे को दिया और उसके बाद आधा  ग्लास बेटी को " ( आठ लोगों ने इस स्टेटस को लाइक भी किया है ) .अब इस छोटी सी बच्ची को तो अभी से इस विभेद को स्वीकार करने की आदत पड़ जायेगी .और इस तरह के भेदभाव करने वाले माताओं-पिताओं की संख्या बहतायत में है 

ये सब कहने का अर्थ ये है कि जब लडकियाँ बिलकुल नासमझ होती हैं...उनकी सोच विकसित नहीं हुई होती है..तभी से उनके साथ ये भेदभाव शुरू हो जाता है और उसे ये अपनी नियति समझ  स्वीकार 
  करती  जाती  हैं ..इसे ही सही समझने लगती है क्यूंकि अपने पालनकर्ता को तो वे गलत नहीं समझ सकतीं. जैसे ये समझती हैं कि माता-पिता का आदर करना चाहिए वैसे ही ये भी समझती हैं कि भाई  यानि पुरुष को हर चीज़ में  ज्यादा  महत्व  देना है. आज कई भाई बड़े भावुक होकर संस्मरण लिखते हैं कि उनकी बहनों ने अपने पैसे बचा कर उनके लिए कितना  कुछ किया...इतना त्याग  किया...भाई-बहन का प्रेम तो इसमें है ही..पर साथ में ये भी है...कि लड़कियों की मेंटल कंडिशनिंग ही ऐसी हो जाती है कि खुद के लिए नहीं,..हमेशा दूसरों के लिए सोचना है.वरना उनकी भी उम्र भाई के आस-पास की ही होती है..पर उनमें समझदारी बहुत जल्दी आ जाती है. स्त्रियों में प्रेम-त्याग के कुछ अन्तर्निहित गुण होते हैं. पर उनके इस गुण की इतनी बढ़ा-चढ़ा कर तारीफ़ की जाती है कि वे भी उन्हीं गुणों को संवारने में लग जाती हैं..उनके बाकी सारे गुण गौण हो जाते हैं.

जब लडकियाँ बड़ी होती हैं...तो फिर वही शिक्षा में भेदभाव ..अच्छे स्कूल कॉलेजों में बेटों का दाखिला...मेडिकल -इंजीनियरिंग...की पढ़ाई उसकी कोचिंग के लिए लाखों खर्च करने को तैयार पर बेटियों को आर्ट्स पढ़ने की हिदयात .इसके  साथ ही उन्हें तमाम किस्से सुनाए  जाते हैं...'सीता के त्याग के.'..'शिव को पाने के लिए पार्वती की तपस्या के'....'कुंती के  अनजाने में ही कह देने पर पांच पतियों में बंट जाने वाली द्रौपदी के'...'उन पतिव्रताओं के जो वेश्यागामी..अत्याचारी पति के बीमार पड़ने पर उन्हें कंधे पर लाद...लहु-लुहान घुटनों से देवी माँ के दर्शन के लिए दुर्गम पर्वत पर चढ़ जाती हैं...कि उनके पति ठीक हो जाएँ'....तो ऐसी कहानियाँ सुन ..और ऐसे व्यवहार को झेलकर किसी भी लड़की की सोच कैसी होगी.?? यही कि उससे तो त्याग ही अपेक्षित है...उसे हर हाल में ससुराल में एडजस्ट करना चाहिए . उसे खुद के के लिए नहीं..दूसरों के लिए जीना है...और वे यही करती हैं. पति के अत्याचार के विरोध का ख्याल आने से पहले अपने माता-पिता ..अपने संतान का ख्याल  आ जाता है. आधुनिक पढ़ी-लिखी लड़कियों के भी माता-पिता ये कभी नहीं चाहते कि बेटी ससुराल छोड़ मायके वापस आए. तो जब लौट कर कहीं जाने का ठौर-ठिकाना ना हो तो वो झट से विरोध  कैसे करे?? हाँ ,जब सर से पानी ऊपर चला जाए..अत्याचार की परकाष्ठा हो जाए तब जरूरजरूर  धीरे धीरे उसमें हिम्मत आने लगती है..पर यह हिम्मत उसे असहनीय पीड़ा से  मिलती है अपने परिजनों से नहीं. 

लड़कों से राजनीति...देश की समस्याओं पर डिस्कशन किया जाता है. शायद ही इन मामा-चाचा -भतीजो-भांजों के संग पारिवारिक  बैठकों में लड़कियों को शामिल किया जाता हो. हाँ, इस विचार-विमर्श को और लज्जतदार बनाने के लिए लड़कियों से गरमागरम पकौड़ों और चाय की फरमाइश जरूर की जाती है. उसके बाद लड़कियों पर तोहमत लगा दिया जता है कि उनकी तो इन विषयों में कोई रूचि ही नहीं. ये मानसिकता इतनी गहरे पैठ गयी  है कि पुरुष सोच ही नहीं पाते..स्त्रियों की भी इन सबमें भागेदारी की इच्छा हो सकती है.
दो साल पहले की बात है.. एक रिश्तेदार के यहाँ गयी हुई थी. पति -पत्नी दोनों  उच्च पदासीन हैं . एक रविवार ..उसके पति स्नान करने जा रहे थे तभी टी.वी. पर एक विचारोत्तेजक कार्यक्रम आने लगा. वे टॉवेल  में ही आकर टी.वी. के सामने बैठ गए और पत्नी से कहा."तब तक तुम जाकर नहा लो.." जब उसने कहा ."क्यूँ ..मेरी भी इच्छा है देखने की ?" तब बड़े बेमन  से ''ओके...देखो.."कहकर मुहँ घुमा कर बैठ गए. 
एक बार ट्रेन में देखा एक पुरुष की एक सहयात्री से कुछ बहस हो रही थी..उनकी बेटी ने पिता का मंतव्य स्पष्ट करना चाहा...तो पिता ने तुरंत हाथ उठा कर मना कर दिया.."मैं बात कर रहा हूँ ना.." ऐसे एक नहीं कई उदाहरण हैं जहाँ .लड़कियों को अपनों के द्वारा ही चुप रहने की हिदायत दी जाती है. अगर ऐसा वे उनकी रक्षा के लिए करते हैं तो फिर उनके व्यक्तित्व का विकास कैसे होगा? वे तो दबी-ढंकी ही रह जायेगी...उन्हें अजनबियों के सामने बोलने की ..अपनी बात कहने की आदत ही नहीं रहेगी तो जब पिता/भाई  आस-पास नहीं होंगे तब भी वो अपनी बात कैसे कह पाएंगी ?? यही वजह है कि ऐसे माहौल में पली लडकियाँ जल्दी अपना मुहँ नहीं खोल पातीं...ना ही अपने ऊपर किए गए जुल्म का विरोध कर पाती हैं.

'सत्यमेव जयते'  के एक  कार्यक्रम में उस लड़की का इंटरव्यू  था..जिसने शादी में दहेज़ का विरोध करते हुए...भावी ससुराल वालों पर स्टिंग ऑपरेशन किए. पहले भी अखबार में विस्तार से ये रिपोर्ट पढ़ी थी   (मुंबई की ही घटना थी यह ) तब भी यही ख्याल आया था कि इसका क्रेडिट उस लड़की के माता-पिता को देना चाहिए जिन्होंने इतनी हिम्मत दी उस लकड़ी को . यह कहकर चुप नहीं करा दिया कि 'ये सब बड़ों के मामले हैं,हमारा काम है.....बीच में मत पड़ो...जाओ चाय बना के लाओ"  . 
मेरी इस कहानी को पढ़कर परिचित/अपरिचित लोगों के कई मेल/फोन  आए...सबने अपने अनुभव बांटे  (इतने कि चार,पांच कहानी का प्लाट  तैयार हो जाए ).एक लड़की ने अपना अनुभव बताया कि उसने ससुराल वालों की बढती मांगों को लेकर शादी के दो दिन पहले अपने पिता को फोन करके कहा (उसके पिता...उसके भावी ससुरालवालों के पास ही गए हुए थे ) कि "आप इस शादी से मना कर दीजिये ". पिता ने पूछा..."सच में तुम श्योर हो?" और लड़की के हाँ कहने पर पिता ने वहाँ शादी तोड़ दी. मैने उस लड़की की हिम्मत  की तारीफ़ तो की ही साथ ही उसके पैरेंट्स के प्रति भी अपनी श्रद्धा व्यक्त  की कि उन्होंने अपनी बेटी की इच्छा का मान रखा...उसका पालन-पोषण ऐसे  किया कि वो  ना कहने की हिम्मत  कर सके. 

तो आज जरूरत है..ऐसे ही माताओं-पिताओं की जो बचपन से ही अपनी लड़कियों का  ऐसे पालन-पोषण करें  कि वो अपनी आवाज़ पहचानें...'ना' कहना सीखें...विरोध करना जानें तब वे अपने ऊपर किए गए पहले जुल्म का विरोध कर  पाएंगीं...और किसी को ये नसीहत देने का मौका नहीं देंगी कि 'पहली बार  में ही किसी अत्याचार  का विरोध करना चाहिए "

मंगलवार, 19 जून 2012

मानसिक विकलांगता से कहीं बेहतर है,शारीरिक विकलांगता


सत्यमेव जयते प्रोग्राम में जब differently abled (जब अंग्रेजी में disabled शब्द की जगह इस शब्द का प्रयोग होने लगा है तो हमें भी हिंदी में 'विकलांग' की जगह किसी दूसरे उपयुक्त शब्द की खोज और उसका प्रयोग शुरू कर देना चाहिए.) लोगों से सम्बंधित 
प्रोग्राम देखा तो करीब तीन साल पहले ब्लोगिंग की शुरुआत  में ही लिखी ..अपनी ये पोस्ट याद आ गयी .

पर SMJ के उक्त एपिसोड के प्रसारण के समय ही  कहानी की समापन किस्त लिखी थी....और किसी भी गंभीर विषय से मन भाग रहा था सो एक हल्की-फुलकी पोस्ट लिख डाली..पर यह विषय मन में उथल-पुथल मचाता ही रहा. विकलांग लोगों की समस्या को  उक्त प्रोग्राम में काफी संजीदगी से उठाया गया.

उस प्रोग्राम में एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात कही गयी कि हम ऐसे लोगों को  किसी पब्लिक प्लेस पर या अपने आस-पास भी  बहुत कम देखते हैं..और इसीलिए सहजता से उनकी उपस्थिति स्वीकार को नहीं कर पाते. और वे भी सामन्य लोगों की भीड़ में खुद को असहज महसूस करते हैं. 
हालांकि एक स्कूल के प्रिंसिपल की कही बात बहुत ही नागवार लगी कि "दूसरे बच्चों के पैरेंट्स आपत्ति जताते हैं..इसलिए हम विकलांग बच्चों को अपने स्कूल में एडमिशन नहीं दे पाते ." इच्छा तो हो रही थी कि आमिर खान उन्हें ये क्यूँ नहीं कहते.."जो पैरेंट्स ऐसे बच्चों के एडमिशन पर आपत्ति जताएं...उनके बच्चों को स्कूल में लेने से मना कर देना चाहिए" पर शायद स्कूल के प्रिंसिपल्स को उस प्रोग्राम में निमंत्रित किया गया होगा..इसलिए उनसे रुखाई से पेश आना गलत होता. पर सच तो यह है कि इस निर्णय का अधिकार स्कूल के पास होना चाहिए.  मेरे बच्चों के स्कूल में कई विकलांग बच्चे भी पढ़ते थे और अक्सर मैने बच्चों को ख़ुशी-ख़ुशी उन बच्चों की व्हील चेयर इधर उधर ले जाते हुए और उन्हें हर तरह की मदद करते हुए देखा है. अगर बचपन से ही वे उनके साथ बड़े होंगे तो जीवन में कभी भी उन्हें असामान्य या अपने से अलग नहीं समझेंगे. 

एक बात और बहुत दिल दुखाती है...किसी विकलांग बच्चे के साथ उसकी माँ की जिंदगी भी एकदम सिमट कर रह जाती है. पहली बात तो उन्हें बच्चे की देखभाल में काफी समय देना पड़ता है...अपने लिए वक़्त नहीं मिल पाता. और वे वक़्त निकाल भी लें तो  भी समाज में घुलने-मिलने से कतराने लगती हैं.
एक फ्रेंड की कजिन से एक बार मुलाकात हुई..जिनसे जल्द ही अच्छी दोस्ती हो गयी. वे जिंदगी से भरपूर थीं..किताबें पढ़ने..फिल्मे देखने.. घूमने का उन्हें बहुत शौक है...पर उनका बेटा एक स्पेशल चाइल्ड  है. यूँ तो वह सामान्य है..पर  उसे फिट्स पड़ते हैं...देश-विदेश में उसका इलाज करा चुकी हैं..पर पूरी तरह वह ठीक नहीं हो पाया. वे बताने लगीं..कि उनका लोगों से मिलना-जुलना ना के बराबर  है क्यूंकि सबलोग अपने बच्चों...उनके स्कूल..उनकी पढ़ाई..उनकी शरारतों की बातें करते हैं. जिनमे वे भाग नहीं ले पातीं. और ज्यादातर लोग उत्सुकता में ऐसी बातें पूछ डालते हैं.,.और ऐसी ऐसी सलाह दे जाते हैं..जो उनका दिल दुखा जाती है. 

यह तो सच है कि हमारा समाज ..इन लोगों के प्रति बहुत ही असंवेदनशील है. मेरी इस पुरानी पोस्ट में एक ऐसी ही घटना का जिक्र है...जिसमे शिक्षित और अपनी एक पहचान बना लिए लोगों की कमअक्ली और  ह्रदयहीनता अचरज में डाल देती है.


आज टी.वी.पर एक दृश्य देख मन परेशान हो गया.यूँ ही चैनल फ्लिप  कर रही थी तो देखा सोनी चैनल पर IPL के तर्ज़ पर DPL यानि 'डांस प्रीमियर लीग' का ऑडिशन चल रहा था.म्यूजिक और डांस प्रोग्राम मुझे हमेशा अच्छे लगते हैं.ऑडिशन भी अक्सर रियल प्रोग्राम से ज्यादा मजेदार होते हैं,इसलिए देखती रही.


भुवनेश्वर शहर से एक विकलांग युवक ऑडिशन के लिए आया था. दरअसल मैं यह सोच रही थी,इसे विकलांग क्यूँ कह रहें हैं या किसी को भी विकलांग कहते ही क्यूँ हैं? क्यूंकि अक्सर मैं देखती हूँ,वे लोग भी वे सारे काम कर सकते हैं,जो हमलोग करते हैं. और कई बार तो ज्यादा अच्छा करते है और वो इसलिए क्यूंकि वे जो भी काम करते हैं पूरी दृढ़ता और  दुगुनी लगन से करते हैं. साधारण भाषा में जिन्हें नॉर्मल या पूर्ण कहा जाता है,उनका ज़िन्दगी के प्रति एक लापरवाह रवैया रहता है. वे सोचते हैं,हम तो सक्षम हैं, हम सारे काम कर सकते हैं इसलिए ज्यादा मेहनत करने की जरूरत नहीं समझते जबकि जिन्हें हम विकलांग कहते हैं, वे अपनी एक कमी को पूरी करने के लिए पूरा  जी जान लगाकर किसी काम को अंजाम देते हैं और हमलोगों से आगे निकल जाते हैं.

अभी हाल ही में ,अखबार में एक खबर पढ़ी कि एक मूक बधिर युवक ने
वह केस जीत लिया है,जो पिछले 8 साल से सुप्रीम कोर्ट में चल रहा था. उसने 8 साल पहले UPSC की परीक्षा पास की थी पर उसे नियुक्ति पत्र नहीं मिला था. अब उसे एक अच्छी पोस्ट पर नियुक्त कर दिया गया है. कितने ही हाथ,पैर,आँख,कान,से सलामत लोग आँखों में IAS का सपना लिए PRELIMS भी क्वालीफाई नहीं कर पाते. रोज सैकडों उदाहरण हम अपने आस पास देखते हैं या फिर अखबारों या टी.वी. में देखते हैं कि कैसे उनलोगों ने अपने में कोई कमी रहते हुए भी ज़िन्दगी की  लड़ाई पर विजय हासिल की.

पर उनलोगों के प्रति हमारा रवैया कैसा है?हमलोग हमेशा उन्हें हीन दृष्टि से देखते हैं और कभी यह ख्याल नहीं रखते कि हमारे व्यवहार या हमारी बातों से उन्हें कितनी चोट पहुँचती है.
आज ही टी.वी. पर देखा,उस लड़के के दोनों हाथ बहुत छोटे थे.पर वह पूरे लय और ताल में पूरे जोश के साथ नृत्य कर रहा था. नृत्य गुरु 'शाईमक डावर' भी जोश में उसके हर स्टेप पर सर हिलाकर दाद दे रहे थे. पर जब चुनाव करने का वक़्त आया तो दूसरे जज 'अरशद वारसी' ने जो कहा, उसे सुन शर्म से आँखें झुक गयीं. 
उनका कहना था ''अगर भगवान कहीं मिले तो मैं उस से पूछूँगा,उसने आपको ऐसा क्यूँ बनाया ??(अगर कहीं हमें भगवान मिले तो हम पूछना चाहेंगे ,उसने 'अरशद वारसी' को इतना कमअक्ल क्यूँ बनाया.??)तुम हमलोगों से अलग हो और यह हकीकत है,इसलिए तुम्हे दूसरे राउंड के लिए सेलेक्ट नहीं कर सकते." बाकी दोनों जजों की भी यही राय थी. शाईमक ने उन्हें समझाने की बहुत कोशिश की पर नाकामयाब रहे.

सबसे अच्छा लगा मुझे,अरशद से उसका सवाल करना. उसने मासूमियत से पूछा-- "मैं साईकल,स्कूटी,कार,चला लेता हूँ,पढ़ा लिखा हूँ,एक डांस स्कूल चलाता हूँ,लोगों को डांस सिखाता हूँ,फिर आपलोगों से अलग कैसे हूँ?" अरशद के पास कोई जबाब नहीं था. वे वही पुराना राग अलापते रहें--"तुम इस प्रतियोगिता में आगे नहीं बढ़ सकते,इसलिए तरस खाकर तुम्हे नहीं चुन सकता"...किस दिव्यदृष्टि से उन्होंने देख लिया की वह आगे नहीं बढ़ सकता,जबकि शाईमक को उसमे संभावनाएं दिख रही थीं. और उन्हें तरस खाने की जरूरत भी नहीं थी क्यूंकि वह जिस कला को पेश करने आया था,उसमे माहिर था,अरशद ने एक और लचर सी दलील दी कि 'मैं नाटे कद का हूँ तो मैं ६ फीट वाले लोगों की प्रतियोगिता में नहीं जाऊंगा.इसलिए तुम भी प्रतोयोगिता में भाग मत लो...डांस सिखाते हो वही जारी रखो"..तो क्या उसे आगे बढ़ने का कोई हक़ नहीं? उसकी दुनिया भुवनेश्वर तक ही सीमित रहनी चाहिए?  
अरशद वारसी ऐसी कोई हस्ती नहीं जिनका उल्लेख किया जाए.पर वह एक नेशनल चैनल के प्रोग्राम में जज की कुर्सी पर बैठे थे. इसकी मर्यादा का तो ख्याल रखना था. करोडों दर्शक उन्हें देख रहे  थे.ज्यादातर ये प्रोग्राम बच्चे देखते हैं,उन पर क्या प्रभाव पड़ेगा? वो भी यहो सोचेंगे,ये लोग हमलोगों से हीन हैं,और ये हमारे समाज में शामिल नहीं हो सकते .
 
मुझे तो लगता है किसी विकलांग और नॉर्मल व्यक्ति में वही अंतर होना चाहिए जो किसी गोरे-काले, मोटे-पतले, छोटे-लम्बे, में होता है.जिनके पैर में थोडी खराबी रहती है वह ठीक से चल नहीं पाते. कई,बहुत मोटे लोग भी ठीक से चल नहीं पाते तो हम उन्हें विकलांग तो नहीं कहते? 
अगर हम इनमे भेदभाव करते हैं और इन्हें हेय दृष्टि से देखते हैं तो ये हमारी 'मानसिक विकलांगता' दर्शाती है

सोमवार, 11 जून 2012

कॉफी, सैंडविच और तन्हाई ....हाँ भी...नहीं भी..

दो चीज़ें सोचा था जिंदगी में कभी अकेले नहीं कर पाउंगी....अकेले किसी रेस्टोरेंट में जाना...या फिर अकेले कोई फिल्म देखना. लगता था दोनों ही चीज़ें कभी भी इतनी जरूरी नहीं होंगी कि उनके बिना काम ना चल सके. कभी किसी को रेस्टोरेंट में अकेले चाय-कॉफी पीते या खाना खाते देखती तो उस पर तरस ही खाती कि बेचारा पता नहीं किस मजबूरी के तहत अकेले बैठा है रेस्तरां में . किसी 'बेचारी' को काफी दिनों तक अकेले देखने का मौका मिला भी नहीं था.

जब कभी अकेले शॉपिंग के लिए जाती हूँ तो लौटते समय बच्चों के लिए कुछ पैक करवाना ही होता है (ये टैक्स हर माँ को देना पड़ता है...बच्चे चाहे कितने बड़े हो जाएँ..पर माँ  के घर आने पर पूछते ही हैं.."क्या लाई मेरे लिए.?"..) पार्सल का इंतज़ार करते दुखते पैर पास पड़ी कुर्सी पर बैठने को मजबूर तो कर देते...पर  नज़र इधर उधर दौड़ती रहती..'कोई परिचित देख ले तो क्या सोचेंगे कि अकेले  बैठ कर खा रही है' . {जैसे कोई  गुनाह कर रही है :)} ) इसलिए मैं टेबल की तरफ करीब-करीब पीठ करके बैठती कि कोई ये ना समझ ले, मेरा यहाँ कुछ खाने का इरादा है ( वैसे कोई ऐसा समझ भी लेता तो क्या...कोई पैसे उन्हें तो नहीं देने होते :)}.पर इस बेवकूफ मन का क्या कहें कुछ भी उटपटांग सोचता है....वैसे शुक्र है कि मन ही बेवकूफ है...दिमाग नहीं {अब ये मुगालता भी सेहत के लिए कोई नुकसानदेह नहीं  :)}  .
एक बार अपनी मुम्बई वाली सहेलियों से भी पूछा क्यूंकि ये सब पहले जॉब में थी. बच्चों की देखभाल के लिए स्वेच्छा से नौकरी  छोड़ी है...सोचा इन्हें तो कभी ना कभी अकेले किसी रेस्तरां  में चाय के घूँट भरने ही पड़े  होंगें . पर इन सबने भी बहुत सोचा...और फिर बताया...'ना ऐसा मौका  तो नहीं आया कभी..कलीग साथ होते ही थे.' 
लड़के/पुरुषों के लिए यह कोई ख़ास बात नहीं...पर हम महिलाओं  के लिए जरूर बहुत अलग सा अनुभव है.

जब आकाशवाणी जाना शुरू किया...तब भी लौटते हुए स्टेशन से एक सैंडविच  और कॉफी लेती और लोकल ट्रेन में चढ़ जाती.(जिसकी गाथा मैं यहाँ लिख चुकी हूँ. ) आकाशवाणी जाने के रास्ते में एक कैफे पड़ता है....वहाँ कॉफी की इतनी स्ट्रॉंग खुशबू आती है..कि कदम जिद्दी बच्चे सा अड़ जाते और उन्हें ठेल कर वहाँ से हटाना पड़ता. 

एक दिन हुआ यूँ कि सुबह की रेकॉर्डिंग थी और हम महिलाएँ..घर के सारे काम सही समय पर सुचारू रूप से पूरा कर देंगी..अपनी मैचिंग इयर रिंग्स..बैंगल्स..सैंडल..सबके लिए हमारे पास समय होगा...बस नहीं होगा समय, तो कुछ उदरस्थ करने का . हर महिला के लिए ये काम बस सेकेंडरी ही नहीं ..अंतिम स्थान  पर होता है .( महिलाओं  की इस लापरवाही पर एक पोस्ट कब से लिखने की सोच रखी  है ) .तो मैं अपनी बिरादरी से अलग  कैसे हो सकती हूँ. 
सारे काम निबटाए...औरकुछ खाने का वक़्त तो बचा ही नहीं..किसी तरह एक  बिस्किट मुहँ में डाल पानी पिया और निकल पड़ी. हमेशा की तरह...रेकॉर्डिंग लम्बा खींच गया..और मेरे पेट में चूहे कबड्डी-खो-खो...सब एक साथ खेलने लगे. आकाशवाणी भवन से निकली तो इस बार तो बस कदम उस कैफे के सामने चिपक  ही  गए..मैने भी उनका कहा नहीं टाला. और एक ग्रिल्ड सैंडविच और कॉफी ली. सेल्फ सर्विस थी. सो एक ट्रे में कॉफी और सैंडविच सजाए एक खाली टेबल ढूंढ कर बैठ गयी. 

पहले तो अपनी मोबाइल निकाल थोड़ी देर तक उसे घूरने का नाटक किया..फिर धीरे से इधर उधर नज़र दौडाई तो पाया सब अपने में गुम हैं...यहाँ मुंबई में किसी को फुरसत नहीं कि देखे बगल वाले टेबल पर कोई क्या कर रहा है ...{बस मुझ अकेले को  छोड़ कर :) } और किसी महिला का अकेले कॉफी पीना भी उनके लिए कुछ अनहोनी नहीं थी. अब मैने जरा कॉन्फिडेंस से सर उठा कर मुआयना करना शुरू किया तो भांति भांति के दृश्य मिले. बिलकुल बगल वाली टेबल पर एक लद्धड़ सा आदमी..मतलब  कि मैली सी सिंथेटिक  शर्ट  ( अब या तो उसका  रंग ही ऐसा था या फिर उसे शर्ट बदलने का मौका नहीं मिला होगा) ...धूसर से रंग की पैंट और पैरों में चप्पल पहने, चेहरे पर थोड़ी उगी दाढ़ी और बिखरे बाल लिए  बैठा था. पर उसके आजू-बाजू में दो कमाल की ख़ूबसूरत बलाएँ  बैठीं थीं. ब्लो ड्राई  किए हुए बाल..कानों में, कंधे छूते लम्बे इयर रिंग्स, शॉर्ट  ड्रेस  और बित्ते भर की ऊँची सैंडल...बता रही थी, दोनों या तो कोई मॉडल हैं या मॉडल बनने का सपना संजोये हुए हैं. और दोनों लडकियाँ झुक कर उस आदमी से जिस तरह  बात कर रही थीं...मुझे लगा वो जरूर मॉडल को-ऑर्डिनेटर होगा या फिर कोई फोटोग्राफर होगा...तभी वे उसे इतना भाव दे रही थीं.

कैफे के आस-पास ही दो मशहूर कॉलेज हैं...'जय हिंद कॉलेज' और 'के.सी. कॉलेज ' (तमाम बौलीवुड के सितारे यहाँ के स्टुडेंट रह चुके हैं ). उनके स्टुडेंट्स का तो यहाँ होना लाज़मी ही था. बस रूप-रंग से ही  सब भारतीय दिख रहे थे...वरना पहनावा और बोली तो पश्चिमी ही था. लड़के थ्री  फोर्थ में और लडकियाँ बस केप्री..या स्कर्ट  में थीं.यानि कि जींस भी यहाँ ओल्ड फैशन  में शुमार हो गया था.
एक लड़के और लड़की हाथ में हाथ डाले आए (वेरी कॉमन साइट )..लड़का ऑर्डर करने गया और इसी बीच उस लड़की ने बड़ी सफाई से गले तक के अपने टॉप को धीरे से खिसका कर ऑफ शोल्डर  कर लिया.और फिर नज़रें घुमा  कर चारों तरफ देखने लगी कि  लोग उसे नोटिस  कर रहे हैं या नहीं..मैने झट अपनी नज़र दूसरी तरफ फेर ली. और कई बार हम देख कर ये सोचते हैं कि  पैरेंट्स ऐसे कपड़े पहन कर घर से निकलने कैसे देते हैं.?

एक टेबल पर दो लड़के और एक लड़की बैठे थे. उसमे एक तो गर्लफ्रेंड बॉयफ्रेंड  थे..क्यूंकि उनका PDA   ( Public  display of affection )चल रहा था लैपटॉप पर झुके दोनों कुछ देख रहे थे....{अब लैपटॉप का स्क्रीन मुझे नहीं दिखा :)} दूसरा लड़का उदासीन सा सडक निहार रहा था...पर लैपटॉप उसी का था क्यूंकि बीच बीच में दोनों प्रेमी उस से कुछ पूछते...वो लैपटॉप अपनी तरफ कर ठीक कर देता और फिर...फिर उनकी तरफ खिसका वीतराग सा बाहर देखने लगता...मुझे लगा ..ये बस एक्टिंग कर रहा है..और उसके कान खड़े हैं..दोनों की बात सुनने के लिए.

पास में ही हाईकोर्ट भी है..तो वकीलों का दिख जाना भी मामूली बात है. दो वकील अपना काला  कोट पहने..जबकि उसे उतारकर  हाथों में ले सकते थे. बहुत गर्मी नहीं थी..पर सर्दी भी नहीं थी. दोनों जन एक टेबल पर उत्तर-दक्षिण की तरफ मुहँ करके बैठे थे. अब या तो दोनों विरोधी वकील थे ..या फिर कोर्ट में बहस करने के बाद vocal chord को आराम देना चाहते थे या फिर...स्ट्रेटेजी सोचने में .... या फिर कौन सा झूठ कैसे बोला जाए यह तय करने में व्यस्त थे (वकीलों से क्षमायाचना सहित...खाली दिमाग का महज एक खयाल भर है ).पर जितनी देर बैठे रहे...एक शब्द नहीं बात की आपस में.

मेरी ही तरह  एक अकेली लड़की ने एक पूरी टेबल घेर रखी थी. एक तरफ बैग पटका हुआ था...और कुछ कागज़ बिखरे हुए  थे...वो कागज़ पर लिखे जा रही थी..अब या तो कोई जर्नलिस्ट थी या कोई स्टुडेंट...पर अच्छा लग रहा था...आज के जमाने में भी किसी को कलम से यूँ कागज़ रंगते देख. 

पर सबसे ख़ूबसूरत नज़ारा था..बीच वाली मेज का...तीन सत्तर से ऊपर की पारसी महिलाएँ...स्कर्ट पहने थीं. ..कंधे तक बाल सलीके से कंघी किए हुए थे. एक बाल भी अपनी जगह से इधर-उधर  नहीं था. चेहरा झुर्रियों से भरा हुआ  था
..पर आँखें  चमक रही थीं. होठों पर लिपस्टिक और सुन्दर सी चप्पलें थी पैरों में. तीनों कॉफी-पेस्ट्रीज़ -बिस्किट के साथ लगातार बातें किए जा रही थीं. अब या तो तीनो फ्रेंड थीं...या रिश्तेदार..पर पूरे कैफे में यही तीनो सबसे ज्यादा एन्जॉय कर रही थीं. मैने बड़ी मुश्किल से एक फोटो लेने की इच्छा पर काबू पाया...वे लोग बिलकुल भी मना नहीं करतीं. पर मुझे बीच में घुसकर उनकी बातों का तारतम्य तोडना..गवारा  नहीं हुआ.

सोनल रस्तोगी की टिप्पणी ने   ने याद दिलाया तो याद आया...एक लड़की का जिक्र भूल ही गयी थी...जो लॉंग  स्कर्ट पहने थी...स्लीवलेस टॉप और गले में लम्बी सी मोटे मोटे मोतियों की माला. ठीक एंट्रेंस  के सामने वाली टेबल पर एक मोटी सी किताब लिए बैठी थी..पर नज़रें किताब पर नहीं , दरवाजे से  लगी  थीं ...किसी के इंतज़ार में थी..और जब  वो शख्स आया तो उसने काफी बातें सुनाईं होंगी क्यूंकि वो लड़का हंस हंस कर सफाई दिए जा रहा था ....ऐसा लगता था जिस हिसाब से उसे डांट पड़ती...उस हिसाब से उसकी बत्तीसी दिखती :) 

 एक नज़ारा और देखने को मिला...अपने उत्तर -भारत का आम नज़ारा. लड़की देखने-दिखाने का   अब मुंबई में रहते हैं,तो क्या..किसी लड़की को I Luv   U बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पाए तो माता-पिता को ये कवायद तो करनी  ही पड़ेगी. पहले मुझे कुछ समझ  नहीं  आया....कुछ लड़के-लडकियाँ..महिलाएँ...आये और जोर जोर से बातें करते हुए, एक टेबल पर बैठ गए. कुछ मिसफिट से लग रहे थे,इस माहौल में ..मुझे लगा या तो ये लोग मुंबई घूमने आए हैं...या फिर शॉपिंग के लिए आए होंगे..कॉफी की तलब यहाँ खींच लाई होगी.  थोड़ी देर बाद उनमे से एक लड़की उठी...और मेरे पीछे की तरफ गयी वहाँ से एक लड़की को साथ  ले अपने टेबल पर चली गयी. तब मैने देखा..पीछे तरफ माता-पिता के साथ  वह लड़की पहले से बैठी हुई थी. अब ये लोग मेरे सामने थे...लड़की कुछ भी नहीं बोल रही थी...बस मुस्कुरा रही थी. वे लोग भी कुछ ज्यादा बातें नहीं कर रहे थे...बस उसे घूरे जा रहे थे. थोड़ी देर बाद सारी मण्डली उठ कर लड़की के माता-पिता के पास चली गयी और लड़की-लड़के को वहाँ छोड़ दिया....अब मुझे पता चला कि उनमें लड़का यानि भावी दूल्हा कौन है...बहुत ही कमउम्र का लड़का था..कानों में डायमंड और एम्ब्रॉयड्री वाली शर्ट पहन रखी थी. बिजनेसमैन की फैमली का लग  रहा  था..वरना नौकरीपेशा वाले घरों में इतनी जल्दी शादी नहीं करते. पर वे दोनों कुछ भी बात ही नहीं कर रहे थे...उनकी सामने पड़ी कॉफी भी ठंढी  होती जा रही थी...उन दो वकीलों की तरह दोनों उत्तर-दक्षिण की तरफ नहीं देख रहे थे बल्कि लड़की की नज़रें टेबल घूर रही थी और लड़के की सड़क. थोड़ी देर बाद एक लड़की (जरूर लड़के की बहन होगी..) ने  लड़के से इशारे से पूछा...और लड़के ने हाँ में सर हिलाया...लड़की(भावी दुल्हन)  की पीठ उस तरफ थी..इसलिए वो ये इशारे  नहीं देख सकी. पर लड़की के माता-पिता वाले टेबल पर सबके चेहरे खिल गए. लड़की के पिता..तुरंत काउंटर की तरफ चले गए..(शायद पेस्ट्री लाने ) . अब लड़की से पूछा गया था या  नहीं..ये तो पता  नहीं  लग पाया..पर हो सकता है...लड़की से पहले से ही पूछ लिया गया हो..अब पहले वाला ज़माना तो रहा नहीं कि  लड़की की राय लेना जरूरी ना समझा जाए.
 थोड़ी देर बाद वे लोग आकर लड़की/लड़के को भी अपनी टेबल पर ले गए.

मुझे भी लगा..इस सुखद नोट पर यहाँ से उठ जाना चाहिए.
कोई बुरा नहीं रहा..अकेले कॉफी पीने का अनुभव...यानि की फिर से अकेले पी जा सकती है,कॉफी .. :):)

रविवार, 22 अप्रैल 2012

हॉस्टल की कुछ शरारतें..

आजकल जो कहानी लिख रही हूँ...उसका कथानक कुछ इतना गंभीर और दर्द भरा है कि पढ़ने वालों का मन भारी हो जा रहा है...फिर लिखनेवाले पर क्या गुजरती होगी...इसकी सहज ही कल्पना की जा सकती है. सोचा अपने कहानी लेखन को एक ब्रेक दे दूँ...वैसे भी जब जब फिल्म 'थ्री इडियट्स' देखती हूँ...अपने हॉस्टल में की गयी कुछ ऐसी ही शरारतें याद हो आती हैं. जबकि स्कूल-कॉलेज में मैं कोई शरारती -शैतान लड़की नहीं थी...अब इस ब्लॉग जगत  में क्या इमेज है, पता नहीं. .जब कभी कोई कमेन्ट में 'झांसी की रानी' का तमगा दे जाता है .तो रुक कर एक बार सोचती हूँ..अच्छा तो ऐसा समझते  हैं लोग...कोई नहीं.. .

हॉस्टल में अकेले कभी कोई शरारत नहीं की..ना ही कभी सजा ही मिली...पर सामूहिक शरारतों का हिस्सा हमेशा ही रहती थी...और सामूहिक सजा भी भुगती है....पर अक्सर हम पकडे ही नहीं जाते   'थ्री इडियट्स'  फिल्म में चोरी चोरी प्रिंसिपल के कमरे में घुसने का जो दृश्य है..ऐसा ही कुछ हमने भी किया था.

हम देखते कि रिजल्ट के पहले अक्सर हमारी चेक की हुई कॉपियाँ प्रिंसिपल के रूम में रखी जातीं. कभी किसी चपरासी को  तो कभी किसी टीचर  को कॉपियों का गट्ठर प्रिंसिपल के रूम में ले  जाते देखते हम. स्कूल की छुट्टी हो जाने के बाद भी हम हॉस्टल में रहने वाली लडकियाँ स्कूल के बरामदे में टहलतीं रहती थीं   और प्ले ग्राउंड में खेला करतीं . उस समय स्कूल के प्यून क्लास रूम के दरवाजे बंद कर रहे होते .एक दिन हमने देखा हमारा प्यून भोला..प्रिंसिपल का केबिन बंद कर रहा है. 'भोला'..हम हॉस्टल की लड़कियों के लिए बाज़ार से सामान लाने के लिए नियुक्त था. (हमें गेट के बाहर पैर भी रखने की इज्जाज़त नहीं थी ) लिहाजा भोला से हमारा हमेशा  वास्ता पड़ता .सारी लडकियाँ उसे 'भोला जी' बुलातीं ..तब इतनी अक्कल नहीं थी..अब सोचती हूँ..जरूर बेचारा ब्लश कर जाता होगा..  

हमने उस से कहा...हमें जरा प्रिंसिपल के रूम में जाकर कॉपियाँ देखने दे कि हमें कितने नंबर मिले हैं (अब रिजल्ट के पहले नंबर जान लेने का अलग ही थ्रिल होता है) .पर भोला ने सख्ती से मना कर दिया और कमरे में ताला लगा चला  गया. हम भी मायूस हो लौट रहे थे कि पीछे से आकर उसने कहा...'एक दरवाजे की सिटकिनी उसने नहीं लगाई है...और दोनों पल्ले बस यूँ ही भिड़ा कर छोड़ दिया है.' पर उसने ताकीद की कि..शाम थोड़ी और गहरी हो जाए  तब जाएँ और तुरंत निकल आए कोई गड़बड़ ना करें. (प्रिंसिपल का केबिन काफी बड़ा था और उसमे दो दरवाजे थे .एक दरवाजे की अंदर से सिटकनी लगाकर दूसरे दरवाजे पर बाहर से ताला लगा दिया जाता था )

हम छः सात लडकियाँ चोरी चोरी उस दरवाजे से अंदर गयीं  और कॉपियाँ उलट-पुलट कर अपने अपने नंबर देखे...अपने नंबर बढ़ाने जैसा कोई ख्याल भी किसी को नहीं आया. (आजकल के बच्चे होते तो शायद ये भी कर गुजर गए होते ) वहाँ फोन रखा देख..अपने घर फोन करने के लालच पर काबू पाना भी मुश्किल था. पर अधिकाँश लोगो के यहाँ उन दिनों फोन नहीं था. मेरे यहाँ भी पापा के ऑफिस में ही था...जहाँ फोन करने की मेरी हिम्मत तो बिलकुल नहीं थी. इतने सवाल पूछे जाते कि सारा भेद खुल जाता. हमारी दो सीनियर उषा दी और लीना दी ने अपने अपने घर फोन किए..पर  डर के मारे दो लाइन बात करके ही फोन रख दिया...फोन पकडे  हुए उनके कांपते हाथ आज भी नज़रों के सामने हैं. 'थ्री इडियट्स' का ही एक और डायलॉग भी वहाँ फिट बैठता है...'जितना दुख अपने फेल होने का नहीं होता...उस से ज्यादा  दुख अपने दोस्त के फर्स्ट आने पर होता है.' मेरे क्लास की वैदेही और मैं दोनों ही अंदर जाते वक्त बड़े उत्साहित थे...साथ साथ अपने क्लास की कॉपी ..ढूंढी ...पर बाहर निकलते वक्त वैदेही का मुहँ सूजा हुआ था...वो बात भी नहीं कर रही थी क्यूंकि उसके नंबर मुझसे  कम आए थे. 

***
हमारे हॉस्टल के कैम्पस में फलों के भी ढेर सारे पेड़ थे...पीछे की तरफ एक लीची का भी पेड़ था...लाल लाल लीची हमें बड़े लुभाते पर मैट्रन दी की सख्त हिदायत थी...कोई लीची को हाथ भी नहीं लगाएगा..अभी खट्टी होगी...अच्छी तरह पक जाए तो तुडवा कर लड़कियों में भी बांटी जायेगी. एक चपरासी उसकी  पहरेदारी के लिए भी तैनात था. पर हमें  सब्र कहाँ...फिर एक रात मौका देखकर धावा बोला गया...और ढेर सारी लीची तोड़ कर हमने कमरे में छुपा दिए. दूसरे दिन मैट्रन दी ने बड़ा अफ़सोस  किया..पता नहीं कौन तोड़ कर ले गया इस से अच्छा वो हम लड़कियों को ही तोड़ लेने देतीं. हम भी चेहरा लटकाए पर नीची नज़रें किए एक दूसरे को इशारे कर मुस्कराते रहे. उस खट्टी मीठी लीची जैसा स्वाद फिर नहीं मिला .

***
एक बार पूनम की रात थी. पूरी सृष्टि ही चाँदनी से नहाई हुई थी. हमलोगों के कमरे के सामने फैले मैदान के हरे दूबों के सिरे चांदी से चमक रहे थे. मैं और सुधा देर रात तक पढ़ाई करने के बाद गप्पें मार रहे थे. हमारी नज़रें बार बार खिड़की से बाहर उस बिखरी चांदनी पर ठहर  जातीं और हमने कहा..'चलो बाहर एक चक्कर लगा के आते हैं'. दरवाज़ा खोल हम निकल पड़े...थोड़ी देर झूले पे बैठे निरखते रहे इस छटा को..फिर हमने सोचा उस ठंढी घास पर थोड़ा टहला  जाए....अभी एक चक्कर लगा...कमरे की तरफ आ ही रहे थे कि खट से मैट्रन के कमरे की बत्ती जल गयी....हम भाग कर दबे पाँव अपने कमरे में आ अपने अपने बिस्तर पर लेट गए. मैट्रन दी  ने बाहर निकल दरबान को पुकारा. फिर दोनों लोग काफी देर तक फील्ड का मुआयन करते रहे. 

दूसरे दिन हमें पता चला...हमारे टहलने से ओस से भीगी घास पर निशान बन गए थे...जिसकी तरफ हमारा ध्यान ही नहीं गया था. और मैट्रन , दरबान हैरान थे कि कौन आकर घास पर घूम रहा था. लड़कियों के बीच भूत का किस्सा भी खूब चला...कि जरूर भूत होंगे..कुछ लड़कियों ने तो दावा किया कि वे हर रोज़ सफ़ेद कपड़ों में घूमते हुए भूत को देखती हैं. 

किस्से तो अभी भी कितने सारे याद आ रहे हैं....पर और किस्से फिर कभी...



शुक्रवार, 23 मार्च 2012

अपने बच्चों से अलग किए जाने का चरम मानसिक तनाव झेलते नॉर्वे के भारतीय दम्पति

आने वाले दिन बहुत ही व्यस्तता भरे हैं... पारिवारिक  और  सामाजिक  जिम्मेवारियों के अलावा कहानी की अगली किस्त पोस्ट करनी है...आकाशवाणी से भी एक कहानी की फरमाइश है  और डेड लाइन है..२६ मार्च (एक महीना पहले ही उनलोगों ने बता दिया था...पर तब तो लगता है..अभी बहुत समय है..कहानी की रूप-रेखा तैयार है पर फिर भी 9 में  मिनट उसे फिट तो करना बाकी ही है ) फिर भी .एक विषय इतना मन में इतना उथल-पुथल मचा रहा है कि  उस पर लिखे बिना किसी और विषय पर लिखने से उंगलियाँ इनकार कर दे रही हैं.

शायद सबकी नज़र नॉर्वे में एक भारतीय दंपत्ति के बच्चों के कस्टडी की लड़ाई पर बनी हुई है. जहाँ आठ महीने पहले अनुरूप और सागरिका भट्टाचार्य के तीन वर्षीय बेटे 'अभिज्ञान' और एक वर्षीय बेटी ' ऐश्वर्या '  को अपने माता-पिता के संरक्षण से लेकर फ़ॉस्टर केयर में दे दिया गया था. टी.वी. अखबारों में इस केस के बहुत चर्चे रहे...भारतीय सरकार ने भी इस केस में रूचि ली और विदेश मंत्रालय के दो अधिकारी इस समस्या को सुलझाने नॉर्वे सरकार से बातचीत करने नॉर्वे जाने वाले थे. पर उन्हें अपनी यात्रा कैंसिल करनी पड़ी क्यूंकि दो दिन पहले...अनुरूप भट्टाचार्य ने मिडिया से यह कहा कि  उनकी पत्नी मानसिक रोगी है और उसपर हमला किया है. वे अपनी पत्नी से अलग होना चाहते  हैं. एक दिन बाद ही वे अपने बयान  से पलट गए और कहा कि ' वे बहुत मानसिक तनाव में थे इसलिए ऐसा कह डाला...पति-पत्नी में कोई मतभेद नहीं है"

यानि कि मानसिक तनाव हुआ...नाराज़गी हुई तो पत्नी को पागल करार दे दिया??. अखबारों में ये ख़बरें भी आ रही हैं कि पत्नी सचमुच डिप्रेशन में है. तो ऐसी स्थिति में कौन सी महिला डिप्रेशन में नहीं होगी? वो विदेश में है जहाँ उसके पास उसके अपने करीबी लोग नहीं हैं जिनसे  अपना दुख-दर्द बाँट सके. पिछले आठ महीने से उसके दुधमुहें बच्चे उस से अलग हैं. उसके बाद से ही अनिश्चय की स्थिति बनी हुई है कि बच्चे उसे मिलेंगे या नहीं? टी.वी. ..अखबारों से बातचीत में बार-बार उन्हीं बातों का दुहराव कि कैसे उस से बच्चे ले लिए गए....यह सब  उसे मानसिक तनाव नहीं देगा? 

कुछ दिन पहले बच्चों के नाना-नानी यानि कि सागरिका के माता-पिता ने दिल्ली में नॉर्वे के एम्बेसी के सामने प्रदर्शन भी किए थे और तब खबर यह थी कि बच्चे नाना-नानी को सौंपे जाएंगे. फिर खबर ये आई कि बच्चे अपने चाचा यानि अनुरूप के भाई को सौंपे जाएंगे. हो सकता है..सागरिका चाहती हों..बच्चे उनके माता-पिता को सौंपे जाएँ. और सागरिका  का कहना है कि उनसे कहा जा रहा है..वे एक एग्रीमेंट पर साइन कर दें कि बच्चों के चाचा ही उनके गार्जियन होंगें. सागरिका के इनकार करने पर अनुरूप ने उन्हें धमकी दी...घर से निकल जाने को कहा. और फिर मिडिया में सागरिका को मानसिक रोगी करार दिया. जबकि सागरिका और उसके पिता का कहना है ...सागरिका पर उसके पति अक्सर हाथ उठाते रहे हैं. 

अगर ये आरोप-प्रत्यारोपों की बात जाने भी दें. इतनी दूर से भी इतना तो समझ में आता है...कि वो औरत गहरे मानसिक तनाव में रहती होगी. भारत में नौकर-कामवालियों की सुविधा के बावजूद भी तीन साल और एक साल के बच्चों की देख-रेख में कितनी परेशानियां आती हैं. ये उस उम्र के बच्चों की माँ ही समझती है. जबकि यहाँ रिश्तेदारों का भी सहारा होता है. बच्चों को पालने  के साथ-साथ पड़ोसियों..सहेलियों..से गप-शप भी होती है..अपने अनुभव भी बांटे जाते हैं...जिस से निश्चय ही स्ट्रेस से मुक्ति मिलती है. पर विदेश में ऐसा माहौल मिलना मुश्किल है. और उस पर से तीन वर्षीय अभिज्ञान autism  का शिकार है. माँ को यह स्वीकारने में ही बरसों लग जाते हैं कि भगवान ने उनके बच्चे के साथ ही ऐसा क्यूँ किया?? अगर किसी माँ को  सिर्फ एक बच्चे की ही देखभाल करनी हो जो विकलांग हो फिर भी  सहेलियों- रिश्तेदारों की सहायता-सहानुभूति के बावजूद माँ चरम तनाव का शिकार हो जाती है. जबकि यहाँ सागरिका को ऐसे असंवेदनशील माहौल में अभिज्ञान के साथ एक वर्षीय ऐश्वर्या  की भी देखभाल करनी पड़ रही थी. 

इन सबके साथ एक अवस्था  होती है  post partum depression  की  जिसे भारत में कोई तवज्जो नहीं दी जाती. पर शरीर चाहे अमरीकी हो ब्रिटिश हो या भारतीय...उसे दर्द का अहसास तो एक सा ही होता है. कहते हैं प्रसव के बाद एक महिला ,महीनो तक डिप्रेशन की शिकार रह सकती है. शायद हमारी पिछली पीढ़ी इस बात को ज्यादा अच्छी तरह समझती थी और तभी...प्रसव के बाद, चालीस दिनों तक स्त्री को गृह-कार्य.. उसके झंझटों से अलग रखा जाता था. उसे बढ़िया  खानपान दिया जता था...उसके शरीर मालिश की जाती थी...यानि कि  उसकी अच्छी तरह देखभाल की जाती थी. परन्तु आज की स्थिति से सब अवगत हैं. हॉस्पिटल से घर आते ही स्त्रियाँ काम-काज में लग जाती हैं. सागरिका की भी बेटी एक साल की ही थी. निशचय ही ऐसी प्रतिकूल परस्थितियों में वो  post partum depression से भी गुजर रही होगी. कोई super woman या कहें super human being ही ऐसी प्रतिकूल परिस्थितयों में भी बिलकुल सामान्य रह सकता है. पर बिना औरत की स्थिति को समझे उसे मानसिक रोगी घोषित कर देना बहुत आसान है. 


अनुरूप ने पहले दिन ये भी आरोप लगाया कि सागरिका ने उसपर कई बार हमले किए...तस्वीरों में सागरिका ना तो इतनी शक्तिशाली दिखती हैं और ना अनुरूप पिद्दी से.  जरूर दोनों बहस करते  हुए आमने-सामने आए होंगें और हो सकता है दोनों ने ही एक दूसरे पर हमले किए हों. हाँ, यहाँ सागरिका सर झुकाकर चुप नहीं बैठी होंगी पर यह तो ऐसा ही हुआ कि किसी को धकेलते हुए दीवार तक ले जाओ..फिर वह बचाव के लिए कुछ करे तो उसे मानसिक रोगी घोषित कर  दो. 

खैर यहाँ अनुरूप भी कम मानसिक तनाव में नहीं हैं और शायद आवेश में सागरिका को सबक सिखाने की सोच मिडिया में पति-पत्नी के बीच तनाव की बात कह गए. अगले दिन ही अपनी बात से मुकर भी  गए पर इस क्रम में अपनी और भारत सरकार की सारी मेहनत पर पानी फेर गए. नॉर्वे ने कस्टडी केस की सुनवाई बंद कर दी और अब तो उनके पास कारण भी है कि बच्चों के माता-पिता में आपसी सौहार्द नहीं है और ऐसे माहौल में बच्चों का विकास सही तरह से नहीं हो सकता.

हालांकि बच्चों के माता-पिता की ऐसी मानसिक स्थिति तक पहुंचाने के जिम्मेवार नॉर्वे सरकार की CWS  ( child welfare services  ) ही है. एक अमेरिकन अखबार ने सही ही कहा है...'Norway Drives the Parents Crazy'.  उन्हें इस पहलू को भी ध्यान में रखना चाहिए. क्या नॉर्वे के दूसरे दम्पत्तियों के बीच आपसी तनाव नहीं होते? इस दंपत्ति का तनाव इस चरम अवस्था तक पहुँच गया कि मिडिया तक बात पहुँच गयी. 

नॉर्वे के ही एक पत्रकार का एक आलेख पढ़ा जिसमे उन्होंने लिखा है कि 'नॉर्वे में बच्चों के हित की रक्षा के कानून बहुत कड़े हैं परन्तु नॉर्वे सरकार की गलती ये है कि वे विदेशियों को इस क़ानून से सही तरीके से अवगत नहीं कराते. यही वजह है कि बहुत सारे विदेशी बच्चे नॉर्वे में 'फॉस्टर केयर' में दे दिए जाते हैं. करीब बीस रशियन बच्चे भी फ़ॉस्टर केयर में है. एक लड़का ८ वर्ष पूर्व माँ से छीन लिया गया और माँ को जबरदस्ती उसके स्वदेश वापस भेज दिया गया. नॉर्वे में रह रही ही एक विदेशी महिला दो साल से अपने बेटे से नहीं मिल पाई है. 

बस प्रार्थना है की अनुरूप-सागरिका के साथ ऐसा ना हो. शायद उन्हें  अपने बच्चे वापस मिल जाएँ. वे भारत लौट आएँ तो अनुकूल परिस्थितियों में अपने देश के माहौल .अपने करीबियों के बीच रहकर उनके आपसे रिश्ते भी सुधर जाएँ और बच्चों को भी अपने माता-पिता वापस मिल जाएँ.

इन सारी बातों ने मुझे अपने बचपन की एक घटना याद दिला दी. तब मैं स्कूल में थी. मेरी एक सहेली थी मीता . उसकी माँ एक हंसमुख महिला थीं. पड़ोसियों से.. हम बच्चों से बहुत ही प्यार से बात करती थीं. पिता कड़क  स्वभाव के लगते थे. बच्चों से ज्यादा बात नहीं करते थे. पर तब अक्सर सारे पिता ऐसे ही होते थे..घर में कम और बाहर ज्यादा बातें किया करते थे. इसलिए हमें कुछ अलग सा नहीं लगता .
एक दिन हम उसके घर के  पास ही खेल रहे थे कि उसके घर से ऊँची-ऊँची आवाजें सुनाई देने लगीं. मीता ..उसका छोटा भाई और हम कुछ बच्चे बाहर दरवाजे के पास दुबक कर सुनने लगे. मीता के नाना-नानी आए हुए थे . उसकी माँ जोर-जोर से ऊँची  आवाज़ में बोल रही थीं.." ये इतना  मारते-पीटते हैं...आपलोग कभी कुछ नहीं कहते..वगैरह वगैरह.." मीता के  पिता गरज रहे थे, "ये पागल हो गयी है..कुछ भी बोलती है..इसे पागलखाने में भर्ती  कराना पड़ेगा " मुझे लगा...उसके नाना-नानी उनका विरोध करेंगें...पर शब्दशः तो नहीं याद पर दोनों अपनी बेटी को ही दोषी ठहरा रहे थे कि "उसे गुस्सा क्यूँ दिलाती हो..आदि..आदि "...मीता की माँ के मन में शायद बहुत दिनों का गुबार जमा था..वे बोलती जा रही थीं...इस पर उसके माता-पिता भी उसके पति के सुर में सुर मिलाने लगे कि ऐसे बोलोगी तो सचमुच  तुम्हे पागलखाने में भर्ती कराना  पड़ेगा" ये सुनते ही...मीता और उसका छोटा भाई दौड़ कर अंदर जाकर माँ से लिपट कर रोने लगे.  उसकी माँ उन्हें लेकर भीतर चली गयीं. सब शांत हो गया. हम बच्चे लौट आए. कुछ दिनों बाद उसके  नाना-नानी चले गए और मीता की माँ हमसे वैसे ही प्यार से पेश आती रहीं.
कभी कभी कॉलोनी की  महिलाओं की खुस-फुस कानों में पड़ जाती कि बेचारी के मायके वाले ही साथ नहीं देते तो वो क्या करे ..पर वे दिन अपनी दुनिया में ही मगन रहने वाले थे .हम सब भूल गए. इतने दिनों बाद आज ये घटना याद आ गयी कि अगर स्त्री प्रतिकार करे...विरोध करे तो उसे झट से पागल घोषित कर दो. 

अंशुमाला की एक पोस्ट याद आ रही है जिसमे उन्होंने एक प्रसंग का जिक्र किया था 


अभी हाल में ही राजस्थान गई थी तो वहा जा कर ऊंट की सवारी तो करनी ही थी ,  मेरे बैठने के बाद जब पति देव अपने ऊंट पे बैठने लगे तो वो जोर जोर से चिल्लाने लगी और दोनों ऊँटो के मालिक हाथों से उसका मुंह बंद करने लगे जब मैंने कहा की ये क्यों चिल्ला रही 
"औरत है न इसलिए ज्यादा चिल्लाती है "
निश्चित रूप से ये सुनने के बाद मेरे अंदर की औरत या कह लीजिये नारीवाद को जागना ही था | मैंने भी जवाब दिया की "औरत यू ही नहीं चिल्लाती है ज़रुर कोई तकलीफ़ होगी तभी चिल्ला रही है , क्या भूखी है " 
"नहीं मैडम खाना तो खा चुकी है"
"तो ज़रुर उसके बच्चे से अलग किया होगा"
" तो क्या करे ,सारे दिन  बच्चे के पास ही बैठी रहेगी तो फिर आप लोगो को घूमने कौन ले जायेगा | 
देखा मैंने कहा न ज़रुर कोई तकलीफ़ होगी तभी वो चिल्ला रही है उसके बच्चे से उसे अलग करोगे तो क्या वोचिल्लाएगी नहीं | 

बुधवार, 14 मार्च 2012

सच हुआ मैराथन में भाग लेने का सपना !!


तंगम,अनीता,मैं और राजी  
'मैराथन' शब्द से परिचय ओलम्पिक का टेलीकास्ट देखते हुए हुआ था. देखती, छोटे-छोटे कदमो से लोग लम्बी दूरी तय करते हैं...बस इतना ही पता था 'मैराथन' के विषय में. फिर परिचय हुआ दुबई में रहनेवाले 'हिमांशु जोशी' से जो जल्द ही एक बहुत अच्छा दोस्त बन गया ...वैसे उसके सन्दर्भ में ये 'अच्छा' शब्द पहली बार प्रयोग कर रही हूँ....वरना उसने मुझे इतना चिढाया है...जितना मेरे दोनों छोटे भाइयों ने नहीं चिढाया होगा...और मुझसे डांट भी इतनी खाई है..जितनी अपनी दो बड़ी बहनों से नहीं खाई होगी.....मेरी हरेक पेंटिंग  की बखिया उधेड़ देता..जैसे घोड़ों के हवा में उड़ते बालों को जनाब कहते कि लग रहा है घोड़ों को करेंट लग गया है...और उनके बाल खड़े हो  गए हैं...(ये  कथा फिर कभी..पूरी एक पोस्ट ही बनती है:)) हिमांशु को दौड़ने का शौक है और वो हमेशा मैराथन में हिस्सा लेता है. पूरे 42 किलो मीटर की रेस तय करता है . अक्सर मैराथन के मजेदार किस्से सुनाया करता.  

मेरी सहेली शम्पा के पति 'अभिजीत' को भी दौड़ने का शौक है...पर शम्पा उनकी इस आदत से परेशान ही रहती है. एक बार अभिजीत, शम्पा को  रिसीव करने गए और पता चला बस के आने में अभी देर है...उन्होंने कार में से अपने रनिंग शूज़ निकाले और दौड़ने चले गए. इधर शम्पा मय बच्चों और  सामान सहित हाइवे पर अकेली खड़ी पति का इंतज़ार करती रही. हिमांशु को जब  के 'अभिजीत' के  विषय में बताया तो उसने कहा 'मैं जब मुंबई आऊं तो मेरी उनसे दोस्ती करवा दीजियेगा...हमलोग साथ दौड़ेंगे " मैने कहा .."ना बाबा मेरी सहेली मुझे काट डालेगी ( और इसमें मुझे जरा भी शंका नहीं थी )...पहले ही वो उनके इस शौक से परेशान है." 


पर मैने देखा है...अनहोनी फिल्मो और कहानियों में कम होती है...वास्तविक जिंदगी में ज्यादा. एक साल के अंदर ही शम्पा के पति अभिजीत ने ONGC  की नौकरी छोड़ कर एक मल्टीनेशनल कम्पनी ज्वाइन कर ली और उनकी पोस्टिंग दुबई में हो गयी. दौड़ने के शौक ने उन्हें हिमांशु से मिला दिया और अब दोनों एक ही 'रनिंग क्लब' के मेंबर हैं....बहुत अच्छे दोस्त हैं और दुबई-दोहा-शारजाह-अबू धाबी सब जगह के मैराथन में एक साथ  हिस्सा लेते हैं. जनवरी में मुंबई भी आए थे मैराथन में भाग लेने.

जब मुंबई में मैराथन का आयोजन शुरू हुआ तो मेरे पूरे परिवार ने भाग लेने की सोची...पर हर साल कोई ना कोई अड़चन आ जाती...कभी बच्चों के एग्जाम...कभी पतिदेव का कोई जरूरी काम...कभी रिश्तेदारों का आगमन...और टलता ही रहा. मेरी सहेली राजी ने भी सोच रखा था...पर टल ही जाता और हर बार 'मैराथन' बीत जाने पर हम यही कहते.."इस साल भी भाग नहीं ले पाए..." इसीलिए इस बार जैसे ही राजी ने अखबार में पढ़ा कि 'DNA Women's Marathon ' का आयोजन हो रहा है..उसने तुरंत मुझे और तंगम को SMS किया...हमलोग  सहर्ष तैयार हो गए.
कुछ करणवश हमारी और सहेलियों ने तो भाग नहीं लिया पर  एक सहेली 'अनीता' ने  बड़ी हिम्मत दिखाई. मुझे, तंगम और राजी को तो मॉर्निंग वॉक  की आदत है. पर अनीता ने करीब साल भर से मॉर्निंग वॉक नहीं किया.... और मैराथन के लिए एक महीने से भी कम का समय था. पर उसने निश्चय किया उसे भाग लेना ही है और उसपर दृढ भी रही. पहले दिन से ही पूरे एक घंटे का वॉक शुरू किया. उसे बीच में घुटनों में  दर्द की वजह से डॉक्टर  के पास भी जाना पड़ा...पर डॉक्टर ने भी दवा दी और आश्वस्त किया...कि वो प्रैक्टिस जारी रख  सकती है . वो घुटनों की मालिश करती...नी-पैड पहनती ..पर प्रैक्टिस में कोई कोताही नहीं की.

धीरे धीरे लोगो को पता चलने लगा...और हम सहेलियों को अजीबोगरीब प्रतिक्रियाएँ मिलतीं...कोई कहता.."पागल हो गयी हो..इस उम्र में दौड़ने की सोच रही हो??"..कोई कहता.."दूसरा कोई काम नहीं है क्या??"...तो कोई कहता.."अरे !! हम तो ये सुनकर  हँसते हँसते लोटपोट हो गए." पर हमलोग पर कोई असर नहीं होता कहने वाले को ही कह देते.."आपलोगों को भी भाग लेना चाहिए "


अब तक तो हम तेज-तेज चलते थे पर अब दौड़ने की प्रैक्टिस करनी थी. पहले कभी हम सोचते भी कि थोड़ा दौड़ना भी चाहिए क्यूंकि शरीर को किसी भी व्यायाम की आदत पड़ जाती है...और कोई असर नहीं होता...इसलिए बीच-बीच में व्यायाम में फेर बदल कर शरीर को शॉक देना जरूरी है. पर फिर भी हमें झिझक सी होती और हम दौड़ नहीं पाते. पर अब तो जैसे कोई परवाह ही नहीं थी...बिंदास सड़क के किनारे दौड़ने का अभ्यास  किया जाता . हम सोचते भी देखने वाले शायद सोच रहे हों..."ये अचानक क्या हो गया है..इन सबको.." पर कोई पूछता भी नहीं कि बताएँ.."मैराथन में भाग लेने जा रहे हैं...:)..तंगम ने मजाक में कहा भी.."हमें अपनी टी शर्ट पर लिख लेना चाहिए "Training  for Marathon "

अपने मित्र हिमांशु जोशी को जब बताया तो उसका रिएक्शन था..."woww.. 42 kms ??"
"नहीं पागल हो क्या..."
"woww 21 kms ?"
"जी नहीं...इतना हमारे वश का नहीं.."
"तो क्या आप बिल्डिंग का चक्कर लगाने जा रही हैं..." चिढाने का ऐसा नायाब मौका भला वे कैसे छोड़ते .
यह पहला मौका था और हमने 5 किलो मीटर के "Fun Run " में भाग लेने की सोची . यहाँ कोई कम्पीटीशन नहीं था...बस भाग लेना ही महत्वपूर्ण था. कई लोगो को लगता है...5 किलोमीटर तो कुछ भी नहीं...पर तेज चलना और दौड़ना दोनों बिलकुल अलग चीज़ें हैं. अनुभव से कह रही हूँ...भले ही दो घंटे आप ब्रिस्क वॉक कर लें...पर पाँच मिनट के लिए दौड़ने में भी बुरा हाल हो जाता है.

खैर चिढाने का कोटा पूरा हो जाने के बाद हिमांशु  ने  काफी उपयोगी टिप्स दिए..प्रैक्टिस करने का तरीका भी बताया...जो हमारे बहुत काम आया.
राजी की एक सहेली 'भारती' जो "Health n Nutrition "  मैगज़ीन की  एडिटर है...वो भी हमेशा मैराथन  में भाग लेती है. उसने भी काफी उपयोगी टिप्स दिए..जैसे च्युइंग गम चबाते रहना चाहिए ...जिस से गला नहीं सूखता...हिमांशु और भारती दोनों का बहुत बहुत  शुक्रिया 

एक बार फैसला ले लेने के बाद हमारी दौड़-भाग शुरू हो गयी...सुबह छः बजे प्रैक्टिस..फिर घर का काम ख़त्म कर...कभी तो रजिस्ट्रेशन के लिए जाना... कभी आयोजकों द्वारा दी हुई चीज़ें कलेक्ट करना. रजिस्ट्रेशन फी ३५० रुपये थी..और सारा पैसा चैरिटी  में जाने वाला था.Cervical Cancer '..' Girl child education.'...'Violence against women " तीन मुद्दों में से एक का चयन करना था. और पैसे उसी चैरिटी को जाने वाले थे. इस मैराथन के स्पौन्सर्स ने भाग लेने वालों को एक सुन्दर सा थैला .उसमे एक बढ़िया टी-शर्ट...क्रीम..परफ्यूम..शुगर फ्री..एनर्जी ड्रिंक...हैण्ड सैनीटाईज़र "...तमाम तरह की चीज़ें दीं. हम सब, पारिवारिक और सामाजिक दायित्व भी बदस्तूर निभाते रहे...होली भी इसी बीच ही आनी थी. ८ मार्च को होली और ११ मार्च को मैराथन. प्रैक्टिस मिस करने का सवाल ही नहीं. और होली के दिन भी सुबह छः बजे मैं प्रैक्टिस करते हुए सोच रही थी..." कितनी तेजी से बदलाव आ रहा है.. "यहीं होली के दिन .  मेरी नानी-दादी...मुहँ अँधेरे उठ कर बिना ब्रश किए ..लकड़ी के चूल्हे पर बड़ा सा कड़ाह चढ़ा कर पुए तलना शुरू कर देती थीं"....."माँ-मौसी-चाची...चाय पीते हुए गैस के चूल्हे पर पुए तलती हैं"....और यहाँ" मैं रात के साढ़े बारह बजे तक पुए तलने के बाद सुबह छः बजे पार्क में हूँ...घर जाकर फिर से पुए तलने हैं...होली खेलनी है...पारिवारिक मित्रों के साथ होली-लंच करना  है" ....हम सब सहेलियाँ कभी कभी रात के दो बजे...पार्टी अटेंड कर लौटतीं  पर एक दिन भी प्रैक्टिस नहीं छोड़ी...और लगने लगा..पढाई -लिखाई से ज्यादा कष्टदायक खेल-कूद और व्यायाम की  गतिविधियाँ  हैं.

११ मार्च २०१२ मैराथन का दिन भी आ पहुंचा. हमारी दौड़ "बान्द्रा - कुर्ला कम्प्लेक्स" से साढ़े आठ बजे शुरू होने वाली थी. हमारे परिवार जन और सहेलियाँ.. "कनिष्क, कृष्णदेवन  , अनघा, शर्मिला,वैशाली ,सुरेश रोड्रिगो ,इन्गेल्बर्ट और  आएशा" ...अपनी सन्डे की सुकून भरी सुबह की नींद का परित्याग कर हमें चीयर करने हेतु ...हमारे साथ साढ़े छः बजे ही घर से निकल पड़े. वहाँ पहुँच कर तो पाया एक उत्सव सा माहौल  है. हमारी उम्र की महिलाओं की भी कमी नहीं थी. ब्रह्मकुमारियों का भी एक बड़ा सा दल था. जो सलवार कुरता और साड़ियाँ पहने थीं. स्टेज पर खड़े फिटनेस इंस्ट्रक्टर 'मिकी मेहता ' वार्म अप करवा रहे थे. हम सहेलियों ने भी  थोड़ी स्ट्रेचिंग और प्राणायम किया. 'दीपिका पादुकोणे' झंडा दिखा कर रेस शुरू करने वाली थीं....पर ये हिरोइन्स  समय पर पहुंची हैं कभी??...हालांकि ५ मिनट ही लेट थीं...पर भाग लेने वालों ने बहुत शोर मचाया..'हमें नहीं चाहिए दीपिका की मौजूदगी..रेस शुरू की जाए...." वैसे भी मुंबई में इन सितारों को ज्यादा भाव नहीं मिलता..वो स्टेज पर खड़ी हाथ हिलाती रहीं..और सारे प्रतिभागी नाक की सीध में चलते रहे..हाँ, हमारे साथ आए लोगो ने पास से खूब सारी तस्वीरें खींचीं. 'तारा शर्मा' और 'रागेश्वरी' ने हमारे साथ दौड़ में हिस्सा भी लिया.

रास्ते पर जगह-जगह वौलेंटीयर्स .. पानी की बोतलें लेकर खड़े थे... एम्बुलेंस भी खड़ी  थी और मोबाइल टॉयलेट की भी व्यवस्था थी. प्रतिभागियों के रिश्तेदार भी रास्ते  में खड़े  हमारा हौसला बढ़ा रहे थे...'स्माइल'...'यू कैन डू इट'...'ब्रावो'..."जस्ट हाफ द रन लेफ्ट"..."जस्ट लास्ट लैप..." .कई  बहुत रोचक दृश्य भी मिल रहे थे...चटक गुलाबी साड़ी पहने एक लड़की भी साथ में दौड़ रही थी...एक पोलियो ग्रस्त लड़की भी थी...दो सत्तर के करीब महिलाएँ भी थीं...तस्वीरें लेने की इच्छा पर  किसी तरह काबू किया..वरना सहेलियों से बहुत पीछे रह जाती...मैं राजी और तंगम...साथ -साथ ही थे..कभी कोई जरा सा आगे हो जाता कभी कोई जरा सा पीछे...तंगम का आइडिया था...हम तीनो हाथ पकड़ कर फिनिशिंग लाइन पार करेंगे और और हमने ३५ मिनट से भी कम समय में ५ किलो मीटर पूरा कर लिया.( क्यूंकि शुरू में तो भीड़ में हमें तेज चलने की जगह ही नहीं मिल पा रही थी. ) तंगम के बच्चे 'इन्गेलबर्ट' और 'आएशा'...ने कई जगह हमारे साथ दौड़ते हुए हमारी तस्वीरें लीं. 'इन्गेल  ' ने तो फिनिशिंग लाइन के पास...हमारे सामने दौड़ते हुए वीडियो भी बनाया...वीडियो में देख कर लग रहा है...'हम सचमुच इतना तेज ..दौड़े' :) .फिनिशिंग लाइन के पास हमारे साथी..हमारे स्वागत के लिए खड़े  थे. वे सब भी आश्चर्यचकित थे...उन सबने भी सोच रखा था..एक घंटा तो हमें लग ही जाएगा. सबने कैमरा खटकाना  शुरू कर दिया. 

अनीता हमसे पीछे थी....हम उसका स्वागत करने के लिए किनारे खड़े हो गए...वो थकी मांदी चल कर आ रही थी...उसे देखते ही हम इतने जोर से चिल्लाये कि उसने भी जोश में दौड़ना शुरू कर दिया और मैं, तंगम,राजी उसका हाथ पकड़ कर फिनिशिंग लाइन तक उसके साथ दौड़े. ये देख  कर कुछ अखबार वाले भी कैमरा लेकर इस क्षण को कैद करने दौड़ पड़े. फिनिशिंग लाइन के पास बड़े अक्षरों में होर्डिंग लगी थी  "Congrats, You  have  created History !!  "  दूसरे  इतिहास की बात जाने  दें..पर अपने-अपने परिवार का इतिहास तो हमने जरूर बनाया. सबसे अच्छी बात लग रही थी...कई  सारी  महिलाओं  के पति छोटे छोटे बच्चों को गोद में उठाये या ऊँगली पकडे...अपनी पत्नी की तस्वीरें उतार रहे थे और  कहते नहीं थक रहे थे "I am proud of U " {ऐसा मौका औरतों की जिंदगी में  कम ही आता है :)} सबके परिवारजन बहुत खुश थे...सबके चेहरे गर्व से चमक रहे थे.


इसके बाद पार्टियों का दौर चल रहा है...रेस के बाद हमें एक मशहूर  कैफे में ट्रीट दी गयी. परिवार वाले लंच पर ले गए. योगा बैच ने अलग पार्टी दी. ..तो ब्लॉग दोस्त कब दे रहे हैं पार्टी :):)

हमारे चीयर लीडर्स  



ब्रह्मकुमारी का दल  

             चिथड़े पहने बेचारी अमीर लड़की  

परिवारजन और सहेलियाँ  

आएशा ,तंगम,इन्गेल,और सुरेश रोड्रिगो..तंगम का उत्साहित परिवार  

अनीता को चीयर करती शर्मिला,तंगम और राजी  

अनीता के रेस पूरी करने की ख़ुशी वैशाली के चेहरे पर  

माँ के प्रयास पर गर्वित कनिष्क  

फिल्म The Wife और महिला लेखन पर बंदिश की कोशिशें

यह संयोग है कि मैंने कल फ़िल्म " The Wife " देखी और उसके बाद ही स्त्री दर्पण पर कार्यक्रम की रेकॉर्डिंग सुनी ,जिसमें सुधा अरोड़ा, मध...