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| तंगम,अनीता,मैं और राजी |
'मैराथन' शब्द से परिचय ओलम्पिक का टेलीकास्ट देखते हुए हुआ था. देखती, छोटे-छोटे कदमो से लोग लम्बी दूरी तय करते हैं...बस इतना ही पता था 'मैराथन' के विषय में. फिर परिचय हुआ दुबई में रहनेवाले 'हिमांशु जोशी' से जो जल्द ही एक बहुत अच्छा दोस्त बन गया ...वैसे उसके सन्दर्भ में ये 'अच्छा' शब्द पहली बार प्रयोग कर रही हूँ....वरना उसने मुझे इतना चिढाया है...जितना मेरे दोनों छोटे भाइयों ने नहीं चिढाया होगा...और मुझसे डांट भी इतनी खाई है..जितनी अपनी दो बड़ी बहनों से नहीं खाई होगी.....मेरी हरेक पेंटिंग की बखिया उधेड़ देता..जैसे घोड़ों के हवा में उड़ते बालों को जनाब कहते कि लग रहा है घोड़ों को करेंट लग गया है...और उनके बाल खड़े हो गए हैं...(ये कथा फिर कभी..पूरी एक पोस्ट ही बनती है:)) हिमांशु को दौड़ने का शौक है और वो हमेशा मैराथन में हिस्सा लेता है. पूरे 42 किलो मीटर की रेस तय करता है . अक्सर मैराथन के मजेदार किस्से सुनाया करता.
मेरी सहेली शम्पा के पति 'अभिजीत' को भी दौड़ने का शौक है...पर शम्पा उनकी इस आदत से परेशान ही रहती है. एक बार अभिजीत, शम्पा को रिसीव करने गए और पता चला बस के आने में अभी देर है...उन्होंने कार में से अपने रनिंग शूज़ निकाले और दौड़ने चले गए. इधर शम्पा मय बच्चों और सामान सहित हाइवे पर अकेली खड़ी पति का इंतज़ार करती रही. हिमांशु को जब के 'अभिजीत' के विषय में बताया तो उसने कहा 'मैं जब मुंबई आऊं तो मेरी उनसे दोस्ती करवा दीजियेगा...हमलोग साथ दौड़ेंगे " मैने कहा .."ना बाबा मेरी सहेली मुझे काट डालेगी ( और इसमें मुझे जरा भी शंका नहीं थी )...पहले ही वो उनके इस शौक से परेशान है."
पर मैने देखा है...अनहोनी फिल्मो और कहानियों में कम होती है...वास्तविक जिंदगी में ज्यादा. एक साल के अंदर ही शम्पा के पति अभिजीत ने ONGC की नौकरी छोड़ कर एक मल्टीनेशनल कम्पनी ज्वाइन कर ली और उनकी पोस्टिंग दुबई में हो गयी. दौड़ने के शौक ने उन्हें हिमांशु से मिला दिया और अब दोनों एक ही 'रनिंग क्लब' के मेंबर हैं....बहुत अच्छे दोस्त हैं और दुबई-दोहा-शारजाह-अबू धाबी सब जगह के मैराथन में एक साथ हिस्सा लेते हैं. जनवरी में मुंबई भी आए थे मैराथन में भाग लेने.
जब मुंबई में मैराथन का आयोजन शुरू हुआ तो मेरे पूरे परिवार ने भाग लेने की सोची...पर हर साल कोई ना कोई अड़चन आ जाती...कभी बच्चों के एग्जाम...कभी पतिदेव का कोई जरूरी काम...कभी रिश्तेदारों का आगमन...और टलता ही रहा. मेरी सहेली राजी ने भी सोच रखा था...पर टल ही जाता और हर बार 'मैराथन' बीत जाने पर हम यही कहते.."इस साल भी भाग नहीं ले पाए..." इसीलिए इस बार जैसे ही राजी ने अखबार में पढ़ा कि 'DNA Women's Marathon ' का आयोजन हो रहा है..उसने तुरंत मुझे और तंगम को SMS किया...हमलोग सहर्ष तैयार हो गए.
कुछ करणवश हमारी और सहेलियों ने तो भाग नहीं लिया पर एक सहेली 'अनीता' ने बड़ी हिम्मत दिखाई. मुझे, तंगम और राजी को तो मॉर्निंग वॉक की आदत है. पर अनीता ने करीब साल भर से मॉर्निंग वॉक नहीं किया.... और मैराथन के लिए एक महीने से भी कम का समय था. पर उसने निश्चय किया उसे भाग लेना ही है और उसपर दृढ भी रही. पहले दिन से ही पूरे एक घंटे का वॉक शुरू किया. उसे बीच में घुटनों में दर्द की वजह से डॉक्टर के पास भी जाना पड़ा...पर डॉक्टर ने भी दवा दी और आश्वस्त किया...कि वो प्रैक्टिस जारी रख सकती है . वो घुटनों की मालिश करती...नी-पैड पहनती ..पर प्रैक्टिस में कोई कोताही नहीं की.
धीरे धीरे लोगो को पता चलने लगा...और हम सहेलियों को अजीबोगरीब प्रतिक्रियाएँ मिलतीं...कोई कहता.."पागल हो गयी हो..इस उम्र में दौड़ने की सोच रही हो??"..कोई कहता.."दूसरा कोई काम नहीं है क्या??"...तो कोई कहता.."अरे !! हम तो ये सुनकर हँसते हँसते लोटपोट हो गए." पर हमलोग पर कोई असर नहीं होता कहने वाले को ही कह देते.."आपलोगों को भी भाग लेना चाहिए "
अब तक तो हम तेज-तेज चलते थे पर अब दौड़ने की प्रैक्टिस करनी थी. पहले कभी हम सोचते भी कि थोड़ा दौड़ना भी चाहिए क्यूंकि शरीर को किसी भी व्यायाम की आदत पड़ जाती है...और कोई असर नहीं होता...इसलिए बीच-बीच में व्यायाम में फेर बदल कर शरीर को शॉक देना जरूरी है. पर फिर भी हमें झिझक सी होती और हम दौड़ नहीं पाते. पर अब तो जैसे कोई परवाह ही नहीं थी...बिंदास सड़क के किनारे दौड़ने का अभ्यास किया जाता . हम सोचते भी देखने वाले शायद सोच रहे हों..."ये अचानक क्या हो गया है..इन सबको.." पर कोई पूछता भी नहीं कि बताएँ.."मैराथन में भाग लेने जा रहे हैं...:)..तंगम ने मजाक में कहा भी.."हमें अपनी टी शर्ट पर लिख लेना चाहिए "Training for Marathon "
अपने मित्र हिमांशु जोशी को जब बताया तो उसका रिएक्शन था..."woww.. 42 kms ??"
"नहीं पागल हो क्या..."
"woww 21 kms ?"
"जी नहीं...इतना हमारे वश का नहीं.."
"तो क्या आप बिल्डिंग का चक्कर लगाने जा रही हैं..." चिढाने का ऐसा नायाब मौका भला वे कैसे छोड़ते .
यह पहला मौका था और हमने 5 किलो मीटर के "Fun Run " में भाग लेने की सोची . यहाँ कोई कम्पीटीशन नहीं था...बस भाग लेना ही महत्वपूर्ण था. कई लोगो को लगता है...5 किलोमीटर तो कुछ भी नहीं...पर तेज चलना और दौड़ना दोनों बिलकुल अलग चीज़ें हैं. अनुभव से कह रही हूँ...भले ही दो घंटे आप ब्रिस्क वॉक कर लें...पर पाँच मिनट के लिए दौड़ने में भी बुरा हाल हो जाता है.
खैर चिढाने का कोटा पूरा हो जाने के बाद हिमांशु ने काफी उपयोगी टिप्स दिए..प्रैक्टिस करने का तरीका भी बताया...जो हमारे बहुत काम आया.
राजी की एक सहेली 'भारती' जो "Health n Nutrition " मैगज़ीन की एडिटर है...वो भी हमेशा मैराथन में भाग लेती है. उसने भी काफी उपयोगी टिप्स दिए..जैसे च्युइंग गम चबाते रहना चाहिए ...जिस से गला नहीं सूखता...हिमांशु और भारती दोनों का बहुत बहुत शुक्रिया
एक बार फैसला ले लेने के बाद हमारी दौड़-भाग शुरू हो गयी...सुबह छः बजे प्रैक्टिस..फिर घर का काम ख़त्म कर...कभी तो रजिस्ट्रेशन के लिए जाना... कभी आयोजकों द्वारा दी हुई चीज़ें कलेक्ट करना. रजिस्ट्रेशन फी ३५० रुपये थी..और सारा पैसा चैरिटी में जाने वाला था.Cervical Cancer '..' Girl child education.'...'Violence against women " तीन मुद्दों में से एक का चयन करना था. और पैसे उसी चैरिटी को जाने वाले थे. इस मैराथन के स्पौन्सर्स ने भाग लेने वालों को एक सुन्दर सा थैला .उसमे एक बढ़िया टी-शर्ट...क्रीम..परफ्यूम..शुगर फ्री..एनर्जी ड्रिंक...हैण्ड सैनीटाईज़र "...तमाम तरह की चीज़ें दीं. हम सब, पारिवारिक और सामाजिक दायित्व भी बदस्तूर निभाते रहे...होली भी इसी बीच ही आनी थी. ८ मार्च को होली और ११ मार्च को मैराथन. प्रैक्टिस मिस करने का सवाल ही नहीं. और होली के दिन भी सुबह छः बजे मैं प्रैक्टिस करते हुए सोच रही थी..." कितनी तेजी से बदलाव आ रहा है.. "यहीं होली के दिन . मेरी नानी-दादी...मुहँ अँधेरे उठ कर बिना ब्रश किए ..लकड़ी के चूल्हे पर बड़ा सा कड़ाह चढ़ा कर पुए तलना शुरू कर देती थीं"....."माँ-मौसी-चाची...चाय पीते हुए गैस के चूल्हे पर पुए तलती हैं"....और यहाँ" मैं रात के साढ़े बारह बजे तक पुए तलने के बाद सुबह छः बजे पार्क में हूँ...घर जाकर फिर से पुए तलने हैं...होली खेलनी है...पारिवारिक मित्रों के साथ होली-लंच करना है" ....हम सब सहेलियाँ कभी कभी रात के दो बजे...पार्टी अटेंड कर लौटतीं पर एक दिन भी प्रैक्टिस नहीं छोड़ी...और लगने लगा..पढाई -लिखाई से ज्यादा कष्टदायक खेल-कूद और व्यायाम की गतिविधियाँ हैं.
११ मार्च २०१२ मैराथन का दिन भी आ पहुंचा. हमारी दौड़ "बान्द्रा - कुर्ला कम्प्लेक्स" से साढ़े आठ बजे शुरू होने वाली थी. हमारे परिवार जन और सहेलियाँ.. "कनिष्क, कृष्णदेवन , अनघा, शर्मिला,वैशाली ,सुरेश रोड्रिगो ,इन्गेल्बर्ट और आएशा" ...अपनी सन्डे की सुकून भरी सुबह की नींद का परित्याग कर हमें चीयर करने हेतु ...हमारे साथ साढ़े छः बजे ही घर से निकल पड़े. वहाँ पहुँच कर तो पाया एक उत्सव सा माहौल है. हमारी उम्र की महिलाओं की भी कमी नहीं थी. ब्रह्मकुमारियों का भी एक बड़ा सा दल था. जो सलवार कुरता और साड़ियाँ पहने थीं. स्टेज पर खड़े फिटनेस इंस्ट्रक्टर 'मिकी मेहता ' वार्म अप करवा रहे थे. हम सहेलियों ने भी थोड़ी स्ट्रेचिंग और प्राणायम किया. 'दीपिका पादुकोणे' झंडा दिखा कर रेस शुरू करने वाली थीं....पर ये हिरोइन्स समय पर पहुंची हैं कभी??...हालांकि ५ मिनट ही लेट थीं...पर भाग लेने वालों ने बहुत शोर मचाया..'हमें नहीं चाहिए दीपिका की मौजूदगी..रेस शुरू की जाए...." वैसे भी मुंबई में इन सितारों को ज्यादा भाव नहीं मिलता..वो स्टेज पर खड़ी हाथ हिलाती रहीं..और सारे प्रतिभागी नाक की सीध में चलते रहे..हाँ, हमारे साथ आए लोगो ने पास से खूब सारी तस्वीरें खींचीं. 'तारा शर्मा' और 'रागेश्वरी' ने हमारे साथ दौड़ में हिस्सा भी लिया.

रास्ते पर जगह-जगह वौलेंटीयर्स .. पानी की बोतलें लेकर खड़े थे... एम्बुलेंस भी खड़ी थी और मोबाइल टॉयलेट की भी व्यवस्था थी. प्रतिभागियों के रिश्तेदार भी रास्ते में खड़े हमारा हौसला बढ़ा रहे थे...'स्माइल'...'यू कैन डू इट'...'ब्रावो'..."जस्ट हाफ द रन लेफ्ट"..."जस्ट लास्ट लैप..." .कई बहुत रोचक दृश्य भी मिल रहे थे...चटक गुलाबी साड़ी पहने एक लड़की भी साथ में दौड़ रही थी...एक पोलियो ग्रस्त लड़की भी थी...दो सत्तर के करीब महिलाएँ भी थीं...तस्वीरें लेने की इच्छा पर किसी तरह काबू किया..वरना सहेलियों से बहुत पीछे रह जाती...मैं राजी और तंगम...साथ -साथ ही थे..कभी कोई जरा सा आगे हो जाता कभी कोई जरा सा पीछे...तंगम का आइडिया था...हम तीनो हाथ पकड़ कर फिनिशिंग लाइन पार करेंगे और और हमने ३५ मिनट से भी कम समय में ५ किलो मीटर पूरा कर लिया.( क्यूंकि शुरू में तो भीड़ में हमें तेज चलने की जगह ही नहीं मिल पा रही थी. ) तंगम के बच्चे 'इन्गेलबर्ट' और 'आएशा'...ने कई जगह हमारे साथ दौड़ते हुए हमारी तस्वीरें लीं. 'इन्गेल ' ने तो फिनिशिंग लाइन के पास...हमारे सामने दौड़ते हुए वीडियो भी बनाया...वीडियो में देख कर लग रहा है...'हम सचमुच इतना तेज ..दौड़े' :) .फिनिशिंग लाइन के पास हमारे साथी..हमारे स्वागत के लिए खड़े थे. वे सब भी आश्चर्यचकित थे...उन सबने भी सोच रखा था..एक घंटा तो हमें लग ही जाएगा. सबने कैमरा खटकाना शुरू कर दिया.
अनीता हमसे पीछे थी....हम उसका स्वागत करने के लिए किनारे खड़े हो गए...वो थकी मांदी चल कर आ रही थी...उसे देखते ही हम इतने जोर से चिल्लाये कि उसने भी जोश में दौड़ना शुरू कर दिया और मैं, तंगम,राजी उसका हाथ पकड़ कर फिनिशिंग लाइन तक उसके साथ दौड़े. ये देख कर कुछ अखबार वाले भी कैमरा लेकर इस क्षण को कैद करने दौड़ पड़े. फिनिशिंग लाइन के पास बड़े अक्षरों में होर्डिंग लगी थी "Congrats, You have created History !! " दूसरे इतिहास की बात जाने दें..पर अपने-अपने परिवार का इतिहास तो हमने जरूर बनाया. सबसे अच्छी बात लग रही थी...कई सारी महिलाओं के पति छोटे छोटे बच्चों को गोद में उठाये या ऊँगली पकडे...अपनी पत्नी की तस्वीरें उतार रहे थे और कहते नहीं थक रहे थे "I am proud of U " {ऐसा मौका औरतों की जिंदगी में कम ही आता है :)} सबके परिवारजन बहुत खुश थे...सबके चेहरे गर्व से चमक रहे थे.
इसके बाद पार्टियों का दौर चल रहा है...रेस के बाद हमें एक मशहूर कैफे में ट्रीट दी गयी. परिवार वाले लंच पर ले गए. योगा बैच ने अलग पार्टी दी. ..तो ब्लॉग दोस्त कब दे रहे हैं पार्टी :):)
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| हमारे चीयर लीडर्स |
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| ब्रह्मकुमारी का दल |
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चिथड़े पहने बेचारी अमीर लड़की
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| परिवारजन और सहेलियाँ |
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| आएशा ,तंगम,इन्गेल,और सुरेश रोड्रिगो..तंगम का उत्साहित परिवार |
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| अनीता को चीयर करती शर्मिला,तंगम और राजी |
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| अनीता के रेस पूरी करने की ख़ुशी वैशाली के चेहरे पर |
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| माँ के प्रयास पर गर्वित कनिष्क |