सत्यमेव जयते प्रोग्राम में जब differently abled (जब अंग्रेजी में disabled शब्द की जगह इस शब्द का प्रयोग होने लगा है तो हमें भी हिंदी में 'विकलांग' की जगह किसी दूसरे उपयुक्त शब्द की खोज और उसका प्रयोग शुरू कर देना चाहिए.) लोगों से सम्बंधित
प्रोग्राम देखा तो करीब तीन साल पहले ब्लोगिंग की शुरुआत में ही लिखी ..अपनी ये पोस्ट याद आ गयी .
पर SMJ के उक्त एपिसोड के प्रसारण के समय ही कहानी की समापन किस्त लिखी थी....और किसी भी गंभीर विषय से मन भाग रहा था सो एक हल्की-फुलकी पोस्ट लिख डाली..पर यह विषय मन में उथल-पुथल मचाता ही रहा. विकलांग लोगों की समस्या को उक्त प्रोग्राम में काफी संजीदगी से उठाया गया.
उस प्रोग्राम में एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात कही गयी कि हम ऐसे लोगों को किसी पब्लिक प्लेस पर या अपने आस-पास भी बहुत कम देखते हैं..और इसीलिए सहजता से उनकी उपस्थिति स्वीकार को नहीं कर पाते. और वे भी सामन्य लोगों की भीड़ में खुद को असहज महसूस करते हैं.
हालांकि एक स्कूल के प्रिंसिपल की कही बात बहुत ही नागवार लगी कि "दूसरे बच्चों के पैरेंट्स आपत्ति जताते हैं..इसलिए हम विकलांग बच्चों को अपने स्कूल में एडमिशन नहीं दे पाते ." इच्छा तो हो रही थी कि आमिर खान उन्हें ये क्यूँ नहीं कहते.."जो पैरेंट्स ऐसे बच्चों के एडमिशन पर आपत्ति जताएं...उनके बच्चों को स्कूल में लेने से मना कर देना चाहिए" पर शायद स्कूल के प्रिंसिपल्स को उस प्रोग्राम में निमंत्रित किया गया होगा..इसलिए उनसे रुखाई से पेश आना गलत होता. पर सच तो यह है कि इस निर्णय का अधिकार स्कूल के पास होना चाहिए. मेरे बच्चों के स्कूल में कई विकलांग बच्चे भी पढ़ते थे और अक्सर मैने बच्चों को ख़ुशी-ख़ुशी उन बच्चों की व्हील चेयर इधर उधर ले जाते हुए और उन्हें हर तरह की मदद करते हुए देखा है. अगर बचपन से ही वे उनके साथ बड़े होंगे तो जीवन में कभी भी उन्हें असामान्य या अपने से अलग नहीं समझेंगे.
एक बात और बहुत दिल दुखाती है...किसी विकलांग बच्चे के साथ उसकी माँ की जिंदगी भी एकदम सिमट कर रह जाती है. पहली बात तो उन्हें बच्चे की देखभाल में काफी समय देना पड़ता है...अपने लिए वक़्त नहीं मिल पाता. और वे वक़्त निकाल भी लें तो भी समाज में घुलने-मिलने से कतराने लगती हैं.
एक फ्रेंड की कजिन से एक बार मुलाकात हुई..जिनसे जल्द ही अच्छी दोस्ती हो गयी. वे जिंदगी से भरपूर थीं..किताबें पढ़ने..फिल्मे देखने.. घूमने का उन्हें बहुत शौक है...पर उनका बेटा एक स्पेशल चाइल्ड है. यूँ तो वह सामान्य है..पर उसे फिट्स पड़ते हैं...देश-विदेश में उसका इलाज करा चुकी हैं..पर पूरी तरह वह ठीक नहीं हो पाया. वे बताने लगीं..कि उनका लोगों से मिलना-जुलना ना के बराबर है क्यूंकि सबलोग अपने बच्चों...उनके स्कूल..उनकी पढ़ाई..उनकी शरारतों की बातें करते हैं. जिनमे वे भाग नहीं ले पातीं. और ज्यादातर लोग उत्सुकता में ऐसी बातें पूछ डालते हैं.,.और ऐसी ऐसी सलाह दे जाते हैं..जो उनका दिल दुखा जाती है.
यह तो सच है कि हमारा समाज ..इन लोगों के प्रति बहुत ही असंवेदनशील है. मेरी इस पुरानी पोस्ट में एक ऐसी ही घटना का जिक्र है...जिसमे शिक्षित और अपनी एक पहचान बना लिए लोगों की कमअक्ली और ह्रदयहीनता अचरज में डाल देती है.
आज टी.वी.पर एक दृश्य देख मन परेशान हो गया.यूँ ही चैनल फ्लिप कर रही थी तो देखा सोनी चैनल पर IPL के तर्ज़ पर DPL यानि 'डांस प्रीमियर लीग' का ऑडिशन चल रहा था.म्यूजिक और डांस प्रोग्राम मुझे हमेशा अच्छे लगते हैं.ऑडिशन भी अक्सर रियल प्रोग्राम से ज्यादा मजेदार होते हैं,इसलिए देखती रही.
भुवनेश्वर शहर से एक विकलांग युवक ऑडिशन के लिए आया था. दरअसल मैं यह सोच रही थी,इसे विकलांग क्यूँ कह रहें हैं या किसी को भी विकलांग कहते ही क्यूँ हैं? क्यूंकि अक्सर मैं देखती हूँ,वे लोग भी वे सारे काम कर सकते हैं,जो हमलोग करते हैं. और कई बार तो ज्यादा अच्छा करते है और वो इसलिए क्यूंकि वे जो भी काम करते हैं पूरी दृढ़ता और दुगुनी लगन से करते हैं. साधारण भाषा में जिन्हें नॉर्मल या पूर्ण कहा जाता है,उनका ज़िन्दगी के प्रति एक लापरवाह रवैया रहता है. वे सोचते हैं,हम तो सक्षम हैं, हम सारे काम कर सकते हैं इसलिए ज्यादा मेहनत करने की जरूरत नहीं समझते जबकि जिन्हें हम विकलांग कहते हैं, वे अपनी एक कमी को पूरी करने के लिए पूरा जी जान लगाकर किसी काम को अंजाम देते हैं और हमलोगों से आगे निकल जाते हैं.
अभी हाल ही में ,अखबार में एक खबर पढ़ी कि एक मूक बधिर युवक ने
वह केस जीत लिया है,जो पिछले 8 साल से सुप्रीम कोर्ट में चल रहा था. उसने 8 साल पहले UPSC की परीक्षा पास की थी पर उसे नियुक्ति पत्र नहीं मिला था. अब उसे एक अच्छी पोस्ट पर नियुक्त कर दिया गया है. कितने ही हाथ,पैर,आँख,कान,से सलामत लोग आँखों में IAS का सपना लिए PRELIMS भी क्वालीफाई नहीं कर पाते. रोज सैकडों उदाहरण हम अपने आस पास देखते हैं या फिर अखबारों या टी.वी. में देखते हैं कि कैसे उनलोगों ने अपने में कोई कमी रहते हुए भी ज़िन्दगी की लड़ाई पर विजय हासिल की.
पर उनलोगों के प्रति हमारा रवैया कैसा है?हमलोग हमेशा उन्हें हीन दृष्टि से देखते हैं और कभी यह ख्याल नहीं रखते कि हमारे व्यवहार या हमारी बातों से उन्हें कितनी चोट पहुँचती है.
आज ही टी.वी. पर देखा,उस लड़के के दोनों हाथ बहुत छोटे थे.पर वह पूरे लय और ताल में पूरे जोश के साथ नृत्य कर रहा था. नृत्य गुरु 'शाईमक डावर' भी जोश में उसके हर स्टेप पर सर हिलाकर दाद दे रहे थे. पर जब चुनाव करने का वक़्त आया तो दूसरे जज 'अरशद वारसी' ने जो कहा, उसे सुन शर्म से आँखें झुक गयीं.
अभी हाल ही में ,अखबार में एक खबर पढ़ी कि एक मूक बधिर युवक ने
वह केस जीत लिया है,जो पिछले 8 साल से सुप्रीम कोर्ट में चल रहा था. उसने 8 साल पहले UPSC की परीक्षा पास की थी पर उसे नियुक्ति पत्र नहीं मिला था. अब उसे एक अच्छी पोस्ट पर नियुक्त कर दिया गया है. कितने ही हाथ,पैर,आँख,कान,से सलामत लोग आँखों में IAS का सपना लिए PRELIMS भी क्वालीफाई नहीं कर पाते. रोज सैकडों उदाहरण हम अपने आस पास देखते हैं या फिर अखबारों या टी.वी. में देखते हैं कि कैसे उनलोगों ने अपने में कोई कमी रहते हुए भी ज़िन्दगी की लड़ाई पर विजय हासिल की.
पर उनलोगों के प्रति हमारा रवैया कैसा है?हमलोग हमेशा उन्हें हीन दृष्टि से देखते हैं और कभी यह ख्याल नहीं रखते कि हमारे व्यवहार या हमारी बातों से उन्हें कितनी चोट पहुँचती है.
आज ही टी.वी. पर देखा,उस लड़के के दोनों हाथ बहुत छोटे थे.पर वह पूरे लय और ताल में पूरे जोश के साथ नृत्य कर रहा था. नृत्य गुरु 'शाईमक डावर' भी जोश में उसके हर स्टेप पर सर हिलाकर दाद दे रहे थे. पर जब चुनाव करने का वक़्त आया तो दूसरे जज 'अरशद वारसी' ने जो कहा, उसे सुन शर्म से आँखें झुक गयीं.
उनका कहना था ''अगर भगवान कहीं मिले तो मैं उस से पूछूँगा,उसने आपको ऐसा क्यूँ बनाया ??(अगर कहीं हमें भगवान मिले तो हम पूछना चाहेंगे ,उसने 'अरशद वारसी' को इतना कमअक्ल क्यूँ बनाया.??)तुम हमलोगों से अलग हो और यह हकीकत है,इसलिए तुम्हे दूसरे राउंड के लिए सेलेक्ट नहीं कर सकते." बाकी दोनों जजों की भी यही राय थी. शाईमक ने उन्हें समझाने की बहुत कोशिश की पर नाकामयाब रहे.
सबसे अच्छा लगा मुझे,अरशद से उसका सवाल करना. उसने मासूमियत से पूछा-- "मैं साईकल,स्कूटी,कार,चला लेता हूँ,पढ़ा लिखा हूँ,एक डांस स्कूल चलाता हूँ,लोगों को डांस सिखाता हूँ,फिर आपलोगों से अलग कैसे हूँ?" अरशद के पास कोई जबाब नहीं था. वे वही पुराना राग अलापते रहें--"तुम इस प्रतियोगिता में आगे नहीं बढ़ सकते,इसलिए तरस खाकर तुम्हे नहीं चुन सकता"...किस दिव्यदृष्टि से उन्होंने देख लिया की वह आगे नहीं बढ़ सकता,जबकि शाईमक को उसमे संभावनाएं दिख रही थीं. और उन्हें तरस खाने की जरूरत भी नहीं थी क्यूंकि वह जिस कला को पेश करने आया था,उसमे माहिर था,अरशद ने एक और लचर सी दलील दी कि 'मैं नाटे कद का हूँ तो मैं ६ फीट वाले लोगों की प्रतियोगिता में नहीं जाऊंगा.इसलिए तुम भी प्रतोयोगिता में भाग मत लो...डांस सिखाते हो वही जारी रखो"..तो क्या उसे आगे बढ़ने का कोई हक़ नहीं? उसकी दुनिया भुवनेश्वर तक ही सीमित रहनी चाहिए?
सबसे अच्छा लगा मुझे,अरशद से उसका सवाल करना. उसने मासूमियत से पूछा-- "मैं साईकल,स्कूटी,कार,चला लेता हूँ,पढ़ा लिखा हूँ,एक डांस स्कूल चलाता हूँ,लोगों को डांस सिखाता हूँ,फिर आपलोगों से अलग कैसे हूँ?" अरशद के पास कोई जबाब नहीं था. वे वही पुराना राग अलापते रहें--"तुम इस प्रतियोगिता में आगे नहीं बढ़ सकते,इसलिए तरस खाकर तुम्हे नहीं चुन सकता"...किस दिव्यदृष्टि से उन्होंने देख लिया की वह आगे नहीं बढ़ सकता,जबकि शाईमक को उसमे संभावनाएं दिख रही थीं. और उन्हें तरस खाने की जरूरत भी नहीं थी क्यूंकि वह जिस कला को पेश करने आया था,उसमे माहिर था,अरशद ने एक और लचर सी दलील दी कि 'मैं नाटे कद का हूँ तो मैं ६ फीट वाले लोगों की प्रतियोगिता में नहीं जाऊंगा.इसलिए तुम भी प्रतोयोगिता में भाग मत लो...डांस सिखाते हो वही जारी रखो"..तो क्या उसे आगे बढ़ने का कोई हक़ नहीं? उसकी दुनिया भुवनेश्वर तक ही सीमित रहनी चाहिए?
अरशद वारसी ऐसी कोई हस्ती नहीं जिनका उल्लेख किया जाए.पर वह एक नेशनल चैनल के प्रोग्राम में जज की कुर्सी पर बैठे थे. इसकी मर्यादा का तो ख्याल रखना था. करोडों दर्शक उन्हें देख रहे थे.ज्यादातर ये प्रोग्राम बच्चे देखते हैं,उन पर क्या प्रभाव पड़ेगा? वो भी यहो सोचेंगे,ये लोग हमलोगों से हीन हैं,और ये हमारे समाज में शामिल नहीं हो सकते .
मुझे तो लगता है किसी विकलांग और नॉर्मल व्यक्ति में वही अंतर होना चाहिए जो किसी गोरे-काले, मोटे-पतले, छोटे-लम्बे, में होता है.जिनके पैर में थोडी खराबी रहती है वह ठीक से चल नहीं पाते. कई,बहुत मोटे लोग भी ठीक से चल नहीं पाते तो हम उन्हें विकलांग तो नहीं कहते?
अगर हम इनमे भेदभाव करते हैं और इन्हें हेय दृष्टि से देखते हैं तो ये हमारी 'मानसिक विकलांगता' दर्शाती है
