बुधवार, 14 अगस्त 2013

जीना यहाँ,मरना यहाँ...इसके सिवा जाना कहाँ

मुम्बई एक happening city  तो है ही...हमेशा चर्चा में रहती है . कुछ लोगो को पसंद आती है कुछ लोगो को नहीं, कोई इस शहर से बेपनाह मुहब्बत  करता है तो कोई शिद्दत से नफरत तो किसी किसी के नफरत और मुहब्बत का पलड़ा बिलकुल बराबर का रहता है. इस शहर में कोई मजबूरीवश रहता  है  तो कोई शौक से रहता है . इस शहर के अन्दर भी हर तबके के लोगों के लिए जैसे एक अलग शहर बना हुआ है. और ये  सारे शहर समानांतर चलते हैं. और सब अपने अपने शहर में मगन रहते हैं.एक दुसरे के क्षेत्र  का अतिक्रमण नहीं करते. 

इस शहर में हज़ार कमियाँ हैं . सडकों की हालत खस्ता है . रोड पर गड्ढे हैं.( मुम्बई की सडकों से कहीं अच्छी तो मेरी गाँव की सड़कें हैं .मेरा बेटा  हैरान था ,वहाँ की सड़कों को देखकर..'माँ, एक भी गड्ढा नहीं है सड़क पर' ये उदगार थे उसके  ) भयंकर ट्रैफिक जैम है . एक जगह से दूसरी जगह पहुँचने में घंटो लगते हैं. बेतहाशा महंगाई है . लगातार होती बारिश है... बहुत भीड़ है..गंदगी है... ढूँढने बैठें तो शायद लिखते थक जाएँ पर कमियों की फेहरिस्त ख़त्म न हो.

 मुम्बई में कुछ महीने गुजार चुके एक मित्र ने एक दिलचस्प बात नोटिस की कि इस शहर में इतनी सारी कमियाँ होते हुए भी यहाँ रहने वाला  एक भी व्यक्ति,उन्हें  ऐसा नहीं मिला जिसे मुंबई से शिकायत हो, इस शहर को भला-बुरा कहे, कोसे ...यहाँ रहने वाले सभी को मुंबई पसंद है ....जबकि ऐसा किसी और शहर के लिए उन्होंने नहीं देखा ."

उनकी इस बात ने सोचने के लिए मजबूर कर दिया ,आखिर ऐसी क्या बात है, मुम्बई में ??
 बाहर से आनेवालों को मुम्बई पसंद नहीं आती पर वही बाहर से आये लोग जब यहाँ के बाशिंदे बन जाते हैं तो उन्हें मुम्बई रास आ जाती है. हालात वहीँ रहते हैं पर नज़रें बदल जाती हैं...भावनाएं अलग सी हो जाती हैं .

इसका मतलब यही होगा कि जब लोग यहाँ बसने की सोच लेते हैं तो फिर इस शहर को अपना लेते हैं... उसके अनुसार रहने की आदत डाल लेते हैं . इसकी अच्छाइयां-बुराइयां उनकी अपनी हो जाती हैं. और जब किसी को भी, चाहे वो शहर हो या व्यक्ति या कोई वस्तु ,अपना लो तो उसकी बुराइयां दिखती तो हैं पर खलती नहीं. कुछ देर के लिए खीझ भी जाएँ...परेशान भी हो जाएँ पर ये भाव स्थायी नहीं होते  क्यूंकि "जीना यहाँ,मरना यहाँ...इसके सिवा जाना कहाँ

अब जिन शहरों में रहते हुए भी लोग नाखुश रहते हैं, उस शहर से शिकायत होती है तो शायद यही वजह होती हो कि उनके सामने हमेशा ये विकल्प खुला होता है , "उस शहर को छोड़ कर चले जाने का " . दुसरे शहर में बसने का सपना पलता रहता है उनके मन में . इसमें कोई बुराई भी नहीं ,हर किसी  को बेहतर भविष्य के प्रयास का हक है. पर जिनलोगों ने उस शहर को अपना बसेरा बना लिया होगा, वे शायद शिकायत न करते हों, उस शहर को भला-बुरा न कहते हों  या करते भी हों तो खुद के लिए नहीं अपने बच्चों के लिए क्यूंकि उन्हें बच्चों के भविष्य के लिए शायद साधन सीमित लगते हों,वहाँ  .वरना अपनी पुरानी बनिए की दूकान, दूधवाला , सब्जीवाली , कपड़े की दूकान जिसे अब दादा के बाद पोता चला रहा हो..सब अपने से लगते होंगे .रास्ते में जमा  पानी और नियमित पावर कट भी जीवन का हिस्सा बन गए होंगे .और अपने हिस्से से शिकायत कैसी ? 
(वैसे कुछ लोगों की शिकायत की आदत ही होती है,  हर चीज़ से शिकायत होती है,उन्हें ...उनका जिक्र नहीं हो रहा ,यहाँ ) 
मेरा गाँव 

वरना मेरे गाँव में ज्यादा सुविधाएं नहीं थीं. बिजली नहीं रहती थी (अब भी नाम के लिए ही आती है ) ..शहर दूर था ,अच्छे डॉक्टर नहीं थे पर हमने अपने दादा जी को या गाँव के लोगो को कभी गाँव की बुराई करते नहीं सुना .क्यूंकि वो 'उनका गाँव' था .उस से अलग जीवन उन्होंने जिया नहीं था और ना ही जीने की इच्छा थी,इसीलिए उन्हें कोई शिकायत भी नहीं थी. 


रविवार, 14 जुलाई 2013

क़ानून को बदला लेने का हथियार न बनाएं


हाल में ही  एक ऐसी खबर पढ़ी जिसे पढ़कर सुकून आया . आजकल कई केस ऐसे देखने में आ रहे हैं जहां लड़के लडकियां लिव-इन-रिलेशनशिप में रहते हैं. और झगडे, ग़लतफ़हमी किसी भी वजह से आपसी अफेयर  ख़त्म हो जाता है तो लड़की, लड़के के ऊपर रेप का केस दर्ज कर देती है. पुलिस तो नियम के तहत बंधी है, वो लड़के को गिरफ्तार कर लेती  है और इस अपराध में जमानत भी नहीं होती . लड़के को जेल जाना पड़ता है. 

बॉम्बे हाई कोर्ट की जज साधना जाधव ने  ३९ वर्षीय मनेश कोटियन को उनपर तीन साल पहले लगे रेप  चार्ज से विमुक्त कर दिया है ...और तीन साल के बाद उन्हें जेल से रिहा करने के आदेश दे दिए गए हैं. महेश कोटियन का एक लड़की के साथ अफेयर था ,लड़की प्रेग्नेंट भी हो गयी पर फिर उनका सम्बन्ध टूट गया और लड़की ने मनेश पर केस कर दिया, और वे गिरफ्तार हो गए. 

मनेश पर धोखाधड़ी का मुकदमा कायम है क्यूंकि उन्होंने अपने शादी-शुदा और तीन बच्चे होने की बात छुपाई थी. लड़की से पूरी सहानुभूति होते हुए भी उसे दोषमुक्त नहीं कहा जा सकता .गलती उसकी भी बराबर की है क्यूंकि अदालत ने भी इस बात का उल्लेख किया है कि वह चीखी चिल्लाई नहीं और तुरंत उस पर रेप चार्ज नहीं लगाया बल्कि आपसी सम्बन्ध बिगड़ने के बाद  लगाया ,इसलिए लड़के को दोषी नहीं माना जा सकता.

ज़िया खान की ख़ुदकुशी से बहुत दुःख हुआ. एक उभरती हुई ज़िन्दगी असमय ही कालग्रसित  हो गए. पर जिया की  आत्महत्या के  लिए 'सूरज पंचोली' को दोषी ठहराना कहीं से भी उचित प्रतीत नहीं होता.  कच्ची  सी उम्र में उन्हें बीस दिन जेल  की सलाखों के पीछे रहना पड़ा. किस अपराध के तहत ?? अगर प्यार करने का अपराध  था तो ये दोनों ही भागीदार थे. सूरज ने अपनी ज़िन्दगी, जिया के नाम नहीं लिख दी थी कि उसके इशारों पर चले. क़ानून दोषियों को सजा देने के लिए बनाए जाते हैं न कि निरपराधों को परेशान करने के लिए.


एक लड़के और उसके परिवार की पीड़ा बहुत पास से देखी  है, मेरी एक परिचिता के छोटे भाई की शादी हुई पर दोनों की आपस में  नहीं बनी .दोनों ने  डिवोर्स का फैसला ले लिया पर केस तो सालों चलते हैं. इस बीच लड़के ने एक लड़की के साथ मिलकर कोई बिजनेस शुरू किया . दोनों के बीच  प्यार हुआ पर वह लड़की से शादी नहीं कर सकता था क्यूंकि डिवोर्स की कार्यवाई पूरी नहीं हुई थी और उसे अभी डिवोर्स नहीं मिला था. दोनों लिव-इन रिलेशन में रहने लगे . चार साल साथ रहने के बाद उनके आपसी  सम्बन्ध खराब हुए और उस लड़की ने लड़के के ऊपर रेप चार्ज लगा दिया. पुलिस ने लड़के को गिरफ्तार कर लिया. उस लड़की ने मेरी परिचिता ,उसके पति और  और उनके  बच्चों  का नाम भी पुलिस में दे दिया था (डोमेस्टिक वायलेंस या ऐसा ही कुछ चार्ज होगा ) परिचिता  के पति ने पुलिस को पचास हज़ार रिश्वत देकर अपने परिवार का नाम हटवाया. और इस बीच दस दिन तक एक अपराधी की तरह पूरा परिवार पुलिस से छुपता रहा . महीनों जेल में रहा वो लड़का. उसके क्लास वन ऑफिसर पिता जिन्हें रिटायरमेंट के बाद जहां सुकून से अपनी ज़िन्दगी बितानी चाहिए थी. नियमित रूप से बेटे से जेल में मिलने जाते. उनके घर में मातम का माहौल था . फिर आउट ऑफ कोर्ट सेटलमेंट हुआ. उस लड़की को अच्छे खासे पैसे दिए गए .तब उसने अपना चार्ज वापस लिया और लड़का जेल से रिहा हुआ .

अगर लडकियां लिव-इन-रिलेशन में रहना स्वीकार करती हैं या फिर प्यार में सारी  सीमाएं तोड़ देती हैं तो उन्हें इस सम्बन्ध के टूटने के अंदेशे  के लिए भी मानसिक रूप से तैयार रहना चाहिए. मात्र अफेयर में होने से  या लिव-इन -रिलेशनशिप  शिप में होने से वे शादी के लिए दबाव नहीं डाल सकतीं . और अफेयर ख़त्म हो जाने कि दशा में लड़के को सजा देने के लिए इस कानून को हथियार के रूप में इस्तेमाल नहीं कर सकतीं. 

यह एक बहुत ही जरूरी क़ानून है और हज़ारों लडकियां जो रेप का शिकार होती हैं ,उनके अपराधी को इस क़ानून के सहारे सजा दिलवाई जा सकती है. इस क़ानून को और सख्त बना कर इसका आतंक पैदा किया जा सकता है. लेकिन इसे बदला लेने का हथियार बना ,क़ानून का माखौल नहीं उड़ाने दिया जा सकता. बॉम्बे हाई कोर्ट का यह फैसला  स्वागतयोग्य है.

रविवार, 7 जुलाई 2013

ख़ामोश इल्तिज़ा

(मन हो तो ये कहानी पढ़ लें या फिर निलेश मिश्रा जी की गहरी भावभरी आवाज़ में सुन लें )

तन्वी बालकनी में खड़ी सामने फैले स्याह अँधेरे को घूंट घूंट पीने की कोशिश कर रही थी ,सोचती कुछ ऐसा जादू हो कि वो स्याह अँधेरे में गुम हो जाए और फिर कोई उसे देख न पाए. तभी मोबाईल पर मैसेज टोन बजावो चेक करने नहीं गयीपता था सचिन का मैसेज होगा, "पढ़ लिया न मेरा मैसेज ,अब जरा मुस्करा दो . सचिन का पहला मैसेज पढने के बाद ही बालकनी में आयी थी. और पता था वो दूसरा मैसेज यही भेजेगा . सचिन उसके ऑफिस में हाल में ही आया है ,पर अक्सर टूर पर रहता है. पूरे देश में घूमता रहता और जहां भी जाता है वहां से उसे मैसेज जरूर करता है, कुछ ख़ास नहीं बस उसकी खिडकी से जो भी नज़ारा उसे दिखता है ,वो लिख भेजता है .कभी लिखता , ‘बर्फीली चोटियों पर चाँद की किरणें ऐसे पड़ रही हैं कि सबकुछ नीले रंग में नहा उठा  है ,काश तुम देख पाती कभी राजस्थान के सैंड ड्यून्स का वर्णन करता , कभी काले घुमड़ते बादलों का ,कभी दहकते गुलमोहर का तो कभी पछाड़ खाती समुद्र की लहरों का . एक बार ताजमहल देखने गया तो सिर्फ इतना मैसेज लिखा...वाह ताज !!  ताजमहल को देखा और तुम याद आयी वो किसी मैसेज का जबाब नहीं देती .और सचिन ये बात जानता था .एक बार मैसेज में ही लिखा था , ‘मेरा फोन तो उठाओगी नहीं पर जानता हूँ मैसेज जरूर पढ़ोगी और पढ़ कर मुस्कुराओगी भी ‘.

सचिन बहुत ही जिंदादिल और हंसमुख लड़का था . जितने दिन भी ऑफिस में रहता रौनक आ जाती ऑफिस में. लडकियां तो उसके आस-पास ही मंडराती रहतीं. लड़के भी उसके अच्छे दोस्त थे. अक्सर शाम उन सबका  किसी पार्टी का प्लान बन जाता. वो हमेशा की तरह बस अपने काम से काम रखती और फिर ऑफिस के बाद सीधा घर . शुरू में सबने उसे भी शामिल करने की कोशिश की थी. पर हर बार उसकी ना सुन कर उसे अपने हाल पर छोड़ दिया था .सचिन ने भी हर संभव कोशिश की ,साथ चाय कॉफ़ी लंच का आग्रह ,उसे घर छोड़ देने की पेशकश पर हर बार वो सिर्फ हल्का सा मुस्कुरा कर सर हिला कर ना कर देती . एक बार सचिन ने उसे कह ही दिया , “आपको पता है, आपने अपने चारो तरफ एक  दीवार उठा रखी है, पर यह दीवार दूसरों  को बाहर रखने से ज्यादा आपको अन्दर बंद रखेगी...बहुत घुटन होगी...एक छोटी सी खिड़की तो खोलिए ,थोड़ी ताज़ी हवा आने दीजिये
आपकी बातें मेरी बिलकुल समझ में नहीं आ रहीं...ये काम निबटा लूँ ज़रा कब से पेंडिंग पड़ा है और तन्वी ने कंप्यूटर स्क्रीन पर नज़रें गड़ा दीं.
कोई बात नहीं ,हम भी छेनी हथौड़ा लेकर इस दीवार को गिरा कर ही रहेंगे .उसकी तरफ एक मुस्कुराहट उछालता सचिन चला गया वहाँ से .

वो बेतरह डर गयी , अगर सचिन ज्यादा से ज्यादा टूर पर नहीं होता तब शायद वो रिजाइन ही कर देती. अब किसी के करीब जाने या किसी को अपने करीब आने देने की हिम्मत नहीं बची थी उसमे. दो दो बार धोखा खा कर उसका दिल छलनी हो चुका था.

*** 

सिड तन्वी की बिल्डिंग में रहता था और उसके ही स्कूल में था . कब साथ खेलते पढ़ते उनके बीच प्रेम का अंकुर फूटा, अहसास भी नहीं हुआ. पर धीरे धीरे वो अंकुर एक पौधे का रूप ले चुका था और उसमे फूल खिल आये थे, जिसकी खुशबु पूरी बिल्डिंग में फ़ैल गयी थी . सबको पता चल गया था , बात तन्वी के माता-पिता तक भी पहुंची .लेकिन तन्वी की शादी को लेकर उसके माता- पिता ने बड़े बड़े ख्वाब बुन रखे . लम्बे बालों वाला, कलाई में ब्रेसलेट पहने ,हाथों पर टैटू बनवाये ,म्युज़िक को ही अपनी ज़िन्दगी समझने वाला सिड कहीं से भी उन सपनों पर खरा नहीं उतरता था .तन्वी ने हिम्मत दिखाई , ‘सिड के साथ भाग जाने को भी तैयार थी .पर सिड ने ही कदम खींच लिए .उलटा उसे समझाने लगा , ‘हम कहाँ रहेंगे ,कैसे घर चालायेंगे ,मेरे कैरियर  का क्या होगा?’ तन्वी ने कहा भी, ‘वो नौकरी कर लेगी, सिड आराम से अपना कैरियर बना सकता हैलेकिन सिड उलटा उसे समझाने लगा , “तुम कितना कमा लोगी कि हम अलग रह कर घर भी चला सकें और मैं अपने शौक भी पूरे कर सकूँ. एक गिटार की कीमत पता है?? और उसकी क्लासेज़ की फीस ?? मुझे अभी बहुत कुछ सीखना है तन्वी...कितनी मिन्नतें करनी पड़ती हैं ,तब जाकर पापा पैसे देते हैं. अगर तुम्हारे पैरेंट्स नहीं मान रहे तो फिर हमें एक दुसरे को गुडबाय कह देना चाहिए

सिड की ये बातें सुनकर तन्वी ने फिर कुछ नहीं कहा, ‘उसे भीख में प्रेम नहीं चाहिए था ‘ .पर इस घटना ने पता नहीं उसके पैरेंट्स पर क्या असर डाला कि वे तन्वी की शादी के लिए जल्दबाजी मचाने लगे. चुपचाप रिश्तेदारों से मिलकर एक लड़का ढूंढा गया और मुम्बई से बहुत दूर वह इस शहर में ब्याह दी गयी. तन्वी के एतराज जताने पर माँ से सुनने को मिला, “पहले ही बहुत गुल खिला चुकी हो...इसके पहले कि हमारे मुहं पर कालिख पुते, अपना घर –बार संभालो “.

तन्वी को भी अपने पैरेंट्स पर बहुत गुस्सा आया और उसने भी सोच लिया..ठीक है वह ,अब अपना घर बार ही संभालेगी ,पलट कर उन्हें नहीं देखेगी उसने पूरे तन-मन से अपने पति को अपनाया . पर उसकी किस्मत ने यहाँ भी धोखा दिया. उसके पति को एक साथी नहीं एक केयर टेकर चाहिए थी. उनकी ज़िन्दगी शादी से पहले जैसी चल रही थी, उसमे शादी के बाद भी कोई बदलाव नहीं आया . वही ऑफिस के बाद दोस्तों के साथ समय बिताना . शनिवार की रात जमकर शराब पीना और फिर सारा सन्डे सो कर निकालना . अगर तन्वी कुछ कहती तो गालियाँ मिलतीं . एक बार तन्वी ने तेज आवाज़ में एतराज जताया तो पति ने हाथ भी उठा दिया . इसके बाद तन्वी सहम सी गयी , अपने माता-पिता से शिकायत की तो उन्होंने कहा , “वक़्त के साथ सब ठीक हो जाएगा थोड़ा बर्दाश्त करो पर वक़्त के साथ ठीक कुछ भी नहीं हुआ बल्कि पति और भी ढीठ हो गया . तन्वी के पति को खुद के एक छोटे शहर से होने का बहुत कॉम्प्लेक्स था .वे अक्सर तन्वी को बड़े शहर वाली , बॉम्बे वाली कहकर ताना दे जाते. फिर भी तन्वी इस शादी को कामयाब बनाने की कोशिश में जुटी रही. पर जब उसका मिसकैरेज हुआ और उसके बाद भी पति ने एक दिन भी छुट्टी नहीं ली, उसे हॉस्पिटल में छोड़ वैसे ही ऑफिस चला गया तब तन्वी बुरी तरह टूट गयी. उसे इस शादी से कोई उम्मीद नहीं बची.

दो तीन महीने तो वो डिप्रेशन में ही रही. फिर उसके बाद खुद को ही धीरे धीरे समेट कर ज़िन्दगी पटरी पर लाने की कोशिश करने लगी. रोज अखबार में नौकरी वाले कॉलम देखती,लाल निशान लगाती और बिना पति को बताये इंटरव्यू दे आती. पर कहीं उसे नौकरी पसंद नहीं आती कहीं क्वालिफिकेशन के अभाव में वो रिजेक्ट कर दी जाती. कहीं दोनों पसंद आते तो सैलरी इतनी कम होती कि इतना मर खप कर नौकरी करना उसे नहीं जमता. फिर उसे इस कंपनी में मनलायक नौकरी मिली.

पति से पूछा नहीं बस उन्हें बताया . सुनने को मिला, “हमारे खानदान की औरतें नौकरी नहीं करतीं

उसने पलट कर तुरंत ही कहा और हमारे खानदान के पुरुष शराब पीकर औरतों को नहीं पीटते
शायद नयी जॉब ने ही उसे इतना कहने की हिम्मत दे दी थी . पर पति का इगो बहुत हर्ट हुआ और वे रोज सुबह शाम ताने कस कर बदला लेने लगे , तैयार होते देख व्यंग्य करते ,”इतना सजा धजा किसके लिए जा रहा है ,बॉस  बहुत हैंडसम है क्या ?”
रोज देर से आने वाले पति अब जल्दी आने लगे थे . जिस दिन उसे देर हो जाती सुनने को मिलता, “ ऑफिस के बाद कॉफ़ी-शॉफी पीने चली गयी होंगी , नौकरी बचाए रखने को ये सब करना पड़ता है...रोज देखता हूँ मैं, यह सब  “

अपने होंठ सिल कर वो सारे काम किये जाती. अपने माँ-बाप के मन का हाल जानती थी . उन्हें अगर पता चल जाता कि उसके पति को उसका जॉब करना पसंद नहीं तो शायद जबरदस्ती छुड़वा देते. इसलिए बिना पति के किसी ताने  का जबाब दिए वह सारे काम करती और ज्यादा से ज्यादा उनसे दूर रहती. बस ऑफिस का काम ही उसके लिए जीने का सहारा था. उसने बहुत मन लगाकर काम सीखा. ऑफिस के पौलिटिक्स, गॉसिप से भी दूर रहती, मेहनत से काम करती. इस वजह से ऑफिस में उसकी बहुत इज्जत भी थी .

कभी कभी तलाक लेने के विषय में सोचती भी पर फिर खुद को ही समझा देती, “क्या फर्क पड़ जाएगा तलाक लेने से ,आज भी एक छत के नीचे अजनबी की तरह ही रह रहे हैं, आगे भी अजनबी ही रहेंगे पर एक दिन वो घर की चाबी ले जाना भूल गयी थी. ऑफिस में ऑडिट चल रहा था, उसे घर आने में देर हो गयी. कई बार घंटी बजायी पर उसके पति ने दरवाजा नहीं खोला. पूरी रात उसने सीढियों पर बैठ कर बिताई . और वहीँ बैठे बैठे एक निर्णय ले लिया. सुबह दूध वाले, पेपर वाले न देख लें इस डर से पति ने दरवाजा खोल दिया . वह अपने कमरे में जाकर सो गयी . उस दिन ऑफिस से छुट्टी ले ली. और सारा दिन घर ढूँढने में बिताया . शाम को सामान बाँधा पति के आने का इंतज़ार किया पति का रिएक्शन था ,“ हाँ ,ठीक है..जाइए जाइए..मैं भी डिवोर्स दे दूंगा..दूसरी शादी करूंगा

आप शौक से दूसरी तीसरी जीतनी मर्जी हो शादी कीजिये मुझे आपके डिवोर्स पेपर का इंतज़ार रहेगा “  कह वह बाहर निकल आयी.

उसके बाद से ही उसकी ज़िन्दगी एक शांत झील की तरह हो गयी है. सीमित दायरे में कैद...न उसमें कोई तरंग उठती है न किनारे  टूटने का कोई डर होता है. ऑफिस से आना देर रात किताबें पढना , गज़लें सुनना .इतना सुकून शायद उसकी ज़िन्दगी में कभी रहा भी नहीं. पर जब से सचिन ने ऑफिस ज्वाइन किया है वो लगातार इस शांत झील में कंकड़ फेंकता जा रहा  है. थोड़ी देर को तरंगें उठती हैं पर फिर झील की सतह वैसे ही शांत हो जाती है. पर अब झील के तल में इतने कंकड़ जमा हो गए थे कि उनकी चुभन , झील को तकलीफ दे रही थी .

***

सचिन भला लड़का था, तन्वी को उसका अटेंशन पाकर अच्छा लगता था.पर प्यार और शादी में दो बार धोखा खा चुकी तन्वी, सचिन को करीब आने देने से डर रही थी. उसे यह भी लगता, सचिन को उसके पास्ट के बारे में मालूम नहीं है, इसीलिए वह उसकी तरफ आकर्षित है. जैसे ही सचिन को सच्चाई पता चलेगी ,वह उस से खुद ब खुद दूर हो जाएगा ,इसीलिए वह सचिन से दूर दूर ही रहती पर सचिन के बार बार आते sms ने उसे उलझन में डाल दिया था. और उसने सचिन से मिलकर उसे सबकुछ साफ़ साफ़ बता देने का फैसला किया. उसे विश्वास था सचिन को उसके बारे में कुछ भी पता नहीं अगर वो अपना सारा पास्ट उसे बता देगी तो वो बात समझ जाएगा और फिर उस से दूर हो जाएगा . कुल जमा अपनी चौबीस साल की ज़िन्दगी में तन्वी ने इतना कुछ देख लिया था कि उसे अब अपनी ज़िन्दगी में और उथल-पुथल गवारा नहीं थे.

उसने सचिन को मैसेज किया , “कब वापस आ रहे हो टूर से ?”

वाsssऊ... कांट बीलीव, तुम पूछ रही हो...बस अभी एयरपोर्ट की तरफ निकलता हूँ , सुबह तक कोई न कोई फ्लाईट मिल ही जायेगी और फिर डेढ़ घंटे में आपके सामने हाज़िर
मजाक छोडो ..सच बताओ...तन्वी ने फिर से मैसेज किया .
आई शपथ...सच कह रहा हूँ
ठीक है मैं कल ऑफिस में पता कर लूंगी...
और इस बार सचिन ने मैसेज की जगह कॉल ही किया. थोड़ी देर फोन घूरती रही तन्वी फिर उठा कर जैसे ही हलोकहा, सचिन का चिंता भरा स्वर सुनायी दिया, “क्या बात है तन्वी...कुछ परेशानी है...मैं मजाक नहीं कर रहा ,सच में कल आ सकता हूँ “ 
दिल भर आया तन्वी का थोडा रुक कर बोली , कि कहीं आवाज़ का कम्पन पता न चल जाए . कोई परेशानी नहीं बाबा....बस ऐसे ही कुछ बात करनी है
आज तो मेरे सितारे खुल गए ...तुम्हे मुझसे बात करनी है ?? जो सामने देख कर भी मुहं घुमा लेती है आज उसे मुझसे बात करनी है...ओह!! सचमुच यकीन हुआ, खुदा है इस जहां में वरना मेरी दुआ कैसे क़ुबूल हो जाती...
अब ये डायलॉगबाज़ी बंद करो...तुम्हारे आने के बाद कॉफ़ी पर मिलते हैं..चलो गुडनाईट
अरे !! इतनी जल्दी क्या गुडनाईट...अभी तो बात की शुरुआत है..फिर मुलाक़ात होगी और फिर...
मैं सोने जा रही हूँ..गुडनाईट
मैं परसों आ रहा हूँ तन्वी...सीधा ऑफिस ही आउंगा उसके बाद मिलते हैं...गुडनाईट एन यू प्लीज़ टेक केयर...बाय इस बार सचिन का स्वर गंभीर था .
यू टू...बाय तन्वी ने फोन रख दिया पर अब आँखों में नींद कहाँ थी. पहली बार सचिन से इस  तरह खुलकर बात हुई थी और दोनों ही अपनेआप तुम पर आ गए थे . शायद उसके लगातार आते मैसेज ने आप वाली अजनबियत हटा दी थी .देर रात तक ताने बाने बुनती रही कि कैसे बात की शुरुआत करेगी क्या क्या बताएगी, सचिन का क्या रिएक्शन होगा.

सचिन दोपहर बाद ऑफिस में आया . बाल बिखरे हुए थे . चेहरे पर थोड़ी परेशानी की लकीरें दिख रही थीं अब वे सचमुच थीं या तन्वी की कल्पना कहना मुश्किल था. दूर से ही उसकी तरफ बड़ी गहरी नज़रों से देखते हुए बहुत ही अपनेपन से मुस्कुरा दिया .लेकिन उसकी डेस्क के पास नहीं आया ,शायद उसकी असहजता भांप रहा था . छः बजे के करीब उसके पास आकर धीरे से बोला, “कहीं इरादा बदल तो नहीं दिया ?”
उसने भी मुस्करा कर सर हिला कर कह दिया .
फिर कहाँ चले कॉफ़ी के लिए
वो बीन्स एंड बियोंड ‘ है न ..ऑफिस से ज्यादा दूर भी नहीं.
दूर के लिए कोई बात नहीं, कार लेकर आया हूँ...अब इतनी मुश्किल से मौक़ा मिला है ,जितनी देर का साथ मिल जाए ,घर भी  छोड़ दूंगा ..इसी बहाने घर भी देख लूंगा...फिर तो जब मन हुआ डोरबेल बजायी जा सकती है शरारत से मुस्कराया सचिन .
तन्वी ने त्योरियां चढ़ाईं तो हंस दिया  ,”मजाक था बाबा ..समझा करो .अब सब समेटो मैं बाहर इंतज़ार कर रहा हूँ .
सचिन के जाने के बाद तन्वी सोचती रह गयी, पहली बार ऐसे भरपूर नज़र डाली थी सचिन के चेहरे पर सचमुच दिलकश है मुस्कान उसकी..इसीलिए लडकियां मरी जाती हैं..फिर कंधे उचका दिए..उसे क्या , आज तो उसे सब बता देगी फिर सच जानकार सचिन खुद ही उस से सौ फीट की दूरी रखेगा

सचिन कार में वेट कर रहा था .जगजीत सिंह की नज़्म बज रही थी, “बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जायेगी...”तन्वी कहने वाली थी ,’मेरी फेवरेट नज़्म है यह ‘ फिर खुद को ही झिड़क दिया, “वह दोस्ती बढाने नहीं, ख़त्म करने आयी थी. फिर एक ठंढी सांस भी ली, “अब बात दूर तलक क्या जायेगी...हमेशा हमेशा के लिए ख़त्म हो जायेगी .सचिन ड्राइव करते हुए चुप सा था. शायद उसके भी मन में चल रहा था, क्या कहने वाली है वह रास्ते में बस ट्रैफिक मौसम की बाते होती रहीं. जब बीन्स एंड बियोंडनिकल गया तो तन्वी ने उसकी तरफ देखा .सचिन ने सड़क पर नज़रें जमाये हुए ही कहा, ‘यहाँ बहुत भीड़ होती है...आगे चलते हैं न सुकून से दो पल बैठेंगे

अच्छी जगह चुनी थी सचिन ने, बड़े बड़े आरामदायक चेयर्स थे . हलकी सी रौशनी थी और लोग भी बहुत ज्यादा नहीं. वो भी पैर फैलाकर रिलैक्स होकर बैठी थी . बस बात कैसे शुरू करे यही सोच रही थी . 
सचिन ने मेन्यु कार्ड पर नज़र घुमाते हुए पूछा , “क्या लोगी...
बस कॉफ़ी...
चिली टोस्ट ट्राई करो बड़ी अच्छी होती है यहाँ की" कहते उसने चिली टोस्ट और और कॉफ़ी ऑर्डर कर दिया था .तन्वी ने बात जारी रखने को कहा, ‘अक्सर आते हो यहाँ ?”
अब कहाँ वक़्त मिलता है..महीनों बाद आया हूँ, कॉलेज के दिनों में अक्सर आता था
गर्ल फ्रेंड्स के साथ ?” उसने छेड़ा
हाँ, गर्लफ्रेंड्स के साथ...जलन हो रही है ? “ सचिन ने भी हंस कर उसी सुर में जबाब दिया .
मुझे क्यूँ जलन होगी ? “,उसने तेजी से कहा .
हाँ, तुम्हे क्यूँ जलन होगी...ऐसा है ही क्या हमारे बीच सचिन कुछ गंभीर हो गया था .
तन्वी को सूझा नहीं क्या जबाब दे ..अच्छा हुआ उसी वक़्त कॉफ़ी आ गयी.
टोस्ट कुतरते कॉफ़ी के घूँट भरते दोनों ही चुप थे सचिन शायद इंतज़ार कर रहा था ,वो अपनी बात शुरू करे
आखिर तन्वी ने बात शुरू की , “सचिन तुम्हारे एस.एम.एस आते हैं..मैं रिप्लाई नहीं करती...मुझे अच्छा नहीं लगता
मुझे भी ये अच्छा नहीं लगता ...सचिन ने कप रखते हुए उसकी आँखों में सीधा देख मुस्कराते हुए कहा. 
वो थोड़ी असहज हो गयी लेकिन फिर संभाल लिया खुद को , “ देखो इसकी एक वजह है ...मैं सिंगल नहीं हूँ
ओह! आई सी...
नहीं मेरा मतलब सिंगल तो हूँ..पर वैसी सिंगल नहीं ...एक्चुअली आयम अ डीवोर्सी
सो ??”..सचिन ने कंधे उचका दिए
तुम्हे कोई फर्क नहीं पड़ता ???” उसे अचरज हुआ
क्या फर्क पड़ना चाहिए ...और ये बात मुझे पता है “ सचिन ने कंधे उचका दिए .
क्याsss ??..वो जैसे आसमान से गिरी . तुम्हे कैसे पता ??”
मैडम हमलोग इन्डियन हैं और हमारा फेवरेट टाईमपास है गॉसिप...याद नहीं पर किसी ने बहुत पहले ही बताया था
और तुम्हे लगा ये तो अवेलेबल है ,इसपर चांस मारा जा सकता है ?“ ये जानकार कि सचिन को ये बात पहले से पता है तन्वी को बहुत गुस्सा आ रहा था
व्हाssट ??..सचिन इतने जोर से चौंका कि थोड़ी कॉफ़ी उसके पैंट पर छलक ही गयी .
हाँ !! तुमने यही सोचा ये तो डीवोर्सी है...अकेली रहती है....इसके साथ टाईमपास किया जा सकता है ...रात बिरात मैसेज भेजा जा सकता है ऑफिस में उसके पीठ पीछे लोग उसकी बातें करते हैं ये जान उसे बहुत गुस्सा आ रहा था और वो इसका बदला सचिन से ले रही थी.
तन्वी..आयम सॉरी... आयम रियली रियली सॉरी...मैं तुम्हें कैसे यकीन दिलाऊं मैंने ऐसा कभी नहीं सोचा...और मुझे भी नहीं पता तुम मुझे इतना अवॉयड करती थी फिर भी मुझे तुमसे बात करना ,अच्छा लगता था. पता नहीं तुम्हे देख कर क्यूँ लगता कि तुम एक शांत झील सी हो, एक सीमित दायरे में कैद जबकि तुम्हे एक चंचल नदी बनकर बहना चाहिए. मैसेज इसलिए भेजता कि कहीं भी कुछ अच्छा  देखता तो मुझे तुम्हारा ख्याल आ जाता. मन होता ,वो जगह तुम्हारे साथ देखूं, बस इतनी सी बात है तन्वी और कुछ नहीं
यही होता है... डीवोर्सी के साथ अवेलेबल का टैग अपने आप लग जाता है....इसीलिए मैं सबसे इतनी दूरी बना कर रखती हूँ और देखो तुम्हें भी मालूम था फिर भी तुम मेरे करीब आने की कोशिश करते रहे, मुझसे दोस्ती बढाते रहे तन्वी की आँखें छलछला आयीं .
सचिन कुछ कहने जा रहा था पर उसकी भीगी आँखें देख चुप हो गया , कुर्सी से पीठ टिका दी ...एक गहरी सांस ली...फिर पूछा , “तो तुम क्या चाहती हो...मैं तुमसे दूर रहूँ ??”
हाँ ..आँखों में जलते हुए आंसू लिए हुए जैसे बच्चों की तरह एक जिद से कहा .
ठीक है डन.... अब नो मैसेजेस...नो बातचीत.. दूर रहूँगा, तुमसे ..इतनी बड़ी बात कह दी...बहुत हर्ट किया है मुझे...ऐसा कैसे सोच लिया तुमने...सचिन ने हैरानी से सर हिलाया
क्यूंकि यही सच है ...वो कड़वी होती जा रही थी .
फिर सचिन ने वेटर के बिल लाने का भी इंतज़ार नहीं किया काउंटर पर जाकर बिल चुकाया . वो भी साथ ही उठ आयी.
 बाहर निकल कर तन्वी ने कहा ,”मैं ऑटो ले लूंगी..
ओके.. कहता सचिन आगे बढ़ कर ऑटो रोकने लगा . ऑटो में बैठते हुए , सचिन की तरफ देखने की हिम्मत नहीं हुई तन्वी की ..बाय भी नहीं कहा...उसकी आँखें तो गंगा जमुना बनी हुई थीं.
घर आकर भी देर तक रोती रही . पर समझ नहीं पा रही थी ,वो तो सचिन को खुद से दूर रहने के लिए कहने गयी थी. सचिन ने उसकी बात मान भी ली ,फिर भी क्यूँ उसके आंसू यूँ उमड़े चले आ रहे थे .
***

सचिन ने अपना वायदा निभाया भी. उसकी तरफ कभी देखता भी नहीं , ऑफिस में भी थोडा बुझा बुझा सा रहता, लोगो ने भी नोटिस किया तो उसने टाल दिया..अरे, इतना टूर रहता है,यार ...आज यहाँ, कल वहाँ थक जाता हूँ पर अब तन्वी की नज़रें हर वक़्त सचिन पर रहतीं. वो कब टूर पर जा रहा है, कब वापस आ रहा है, सारी  खबर रहती उसे. मोबाइल कंपनी वालों का भी कोई मेसेज आता तो चौंक जाती , और फिर सचिन के पुराने मैसेज कई कई बार पढ़ती. अपने उस दिन के व्यवहार का गिल्ट उसके मन में घर कर गया था . वो सचिन को कुछ और कहना चाहती थी पर कुछ और ही कह गयी. उसने सारा दोष सचिन पर डाल दिया ,जबकि इतना वो भी जानती थी ,सचिन के मन में ऐसा ख्याल नहीं रहा होगा. पर तन्वी को समझ नहीं आ रहा था, यह जानते हुए भी कि वह एक डीवोर्सी है सचिन उस से प्यार कैसे कर सकता है? जबकि वो हैंडसम है, काबिल है, उसे कितनी ही सिंगल लडकियां मिल जायेंगी. फिर ये भी सोचती ,अगर सचिन सचमुच सिर्फ उसके साथ टाइम पास करना चाहता था तो फिर उसके बात करने से मना करने पर इतना उदास क्यूँ रहने लगा है?और तन्वी ने सोचा, उस से मिलकर ,अपने उस दिन के व्यवहार के लिए माफ़ी तो मांग ही लेनी चाहिए. उसे अपनी बीती ज़िंदगी की सारी बातें बता देगी कि क्यूँ वह इतनी कड़वी हो गयी थी.
और उसने सचिन को मैसेज कर दिया..क्या बहुत नाराज़ हो ?“
मैं तुमसे कभी नाराज़ नहीं हो सकता...इस जनम में तो नहीं सचिन का जबाब पढ़ फिर से उसकी आँखें भर आयीं .
कल, चलें कॉफ़ी पीने ?“
ठीक है एक स्माइली के साथ सचिन का सादा सा जबाब आया ,फिर से कोई मजाक कर के वो रिस्क नहीं लेना चाहता था .

ऑफिस के बाद सचिन उस दिन की तरह ही कार में उसका वेट कर रहा था . पर आज गाड़ी में कोई ग़ज़ल या गाना नहीं बज रहा था हलके से मुस्कुरा कर उसने उसके लिए दरवाजा खोल दिया .
बैठते ही तन्वी ने कहा.. सॉरी मुझे वो सब नहीं कहना चाहिए था...मैं कुछ ज्यादा ही बोल गयी ..
कोई बात नहीं...मैं समझता हूँ ..
सचिन मुझे तुमसे ढेर सारी बातें करनी है...
बोलो..आयम ऑल इयर्स जरा सा मुस्कुरा कर उसकी तरफ देख फिर नज़रें सड़क पर जमा दीं.
छोडो कहीं नहीं जाते हैं ...लॉन्ग ड्राइव पर चलो..यहीं प्राइवेसी है ..मैं सब बताती हूँ
ठीक है..”..इतना बोलने वाले सचिन के दो दो शब्द के जबाब तन्वी को बड़े अजीब लग रहे थे पर वो समझ रही थी..वो बहुत हर्ट है और अब कुछ भी बोलकर मुसीबत में नहीं पड़ना चाहता .

वो चुन चुन कर सुनसान रास्ते पर धीरे धीरे गाड़ी घुमाता रहा और तन्वी परत दर परत अपनी ज़िन्दगी के गुजरे लम्हे उसके सामने खोलती गयी . सचिन ध्यान से सुन रहा था जब कभी उसकी तकलीफ से बहुत आहत होकर उसकी तरफ देखता तो तन्वी सामने नज़रें टिका देती. पति से अलग होकर अकेले रहने की बात तक पहुँचते पहुँचते तन्वी की आवाज़ आंसुओं में डूब चुकी थी . सचिन ने एक किनारे गाड़ी लगाकर, तन्वी का सर अपने कंधे से टिका लिया. आंसुओं से चिपके उसके बाल समेट कर पीछे कर दिए और उसका सर सहलाते हुए बस इतना कहा, “भरोसा कर सकती हो तो इतना भरोसा करो मुझपर, अब इसके बाद एक आंसू नहीं आने दूंगा तुम्हारी आँखों में ..बहुत झेल लिया तुमने, अब और नहीं, मेरे होते अब और नहीं ..तन्वी थोड़ी और पास सिमट आयी , आज तक सब कुछ उसने अकेले झेला था ,सारी लड़ाई अकेले लड़ी थी ,अब तक कोई उसकी तकलीफ को यूँ अपनी तकलीफ समझ दुखी नहीं हुआ था. और तन्वी ने अपनी आँखें मूँद लीं . सब कुछ कह कर उसका मन हल्का हो गया था .साड़ी कडवाहट आंसुओं में धुल चुकी थी और अब उसका मन बीते दिनों के गहरे अँधेरे से निकल कर ,इस निश्छल प्रेम की नर्म रौशनी के स्वागत के लिए तैयार था .

(समाप्त )

गुरुवार, 27 जून 2013

मुस्कुराने का कर्ज़

आज Zee tv पर एक सीरियल या कहें रियलिटी शो देख रही थी Connected HUM TUM ...ये वही शो है ,जो मुझे भी ऑफर हुई  थी और मैंने मना कर दिया था {अब ये बताने से क्यूँ चूकें हम :)} खैर, हमें अपने निर्णय पर अफ़सोस  तो पहले भी नहीं था और अब ये शो देखकर तो जैसे एक सुकून की सांस ले ली ,यूँ कैमरे का हर वक़्त अपनी ज़िन्दगी में झाँक कर देखना मंजूर नहीं था, मुझे . वैसे, जैसा मुझे बार बार आश्वस्त करने की कोशिश की थी उन्होंने... सच में इस शो में कोई मिर्च मिसाले नहीं हैं बल्कि औरतों के मन में क्या चलता रहता है ,वे क्या सोचती हैं, उनकी ज़िन्दगी क्या है ,किसी सिचुएशन पर कैसे रिएक्ट करती हैं...यही सब है. 

साथ में इस शो के होस्ट 'अभय देओल ' पुरुषों के व्यक्तित्व का भी विश्लेषण करते जाते हैं.  एक मजेदार बात कही उन्होंने कि "पुरुषों की 'सेलेक्टिव हियरिंग पावर' होती है यानी अगर उनसे तीन वाक्य कहा जाए तो वे उसमें से दो शब्द अपने मतलब का या अपने मन से चुन कर बस उसी पर प्रतिक्रया देंगे " और उसी शो में से कुछ दृश्य रीपीट कर वे, इसे दिखाते भी हैं .खैर ये उस शो के होस्ट का कहना है, गलत भी हो सकता है सही भी...हमें स्त्री-पुरुष के विवाद में नहीं पड़ना ..आज देखा और याद रह गया सो जिक्र कर दिया (अब ब्लॉग तो है ही इसीलिए ) 

मैं, इस शो के विषय में नहीं..पर इस शो के बहाने कुछ और चर्चा करना चाहती थी . इस शो की एक प्रतिभागी पल्लवी बर्मन है . सुन्दर है...स्मार्ट है..एक कंपनी में ऊँचे पद पर काम करती है. (और बहुत मेहनत से काम करती है ,अक्सर रात के दस बज जाते हैं, काम ख़त्म करते ) शो की शुरुआत में वो एक चहकती हुई, ज़िन्दगी से भरपूर लड़की थी जो अपने प्रेम विवाह  को लेकर बहुत उत्साहित थी. हर वक़्त मुस्कुराती रहती थी और अपनी शादी के लिए  जेवर, लहंगे, कपड़े की ही शॉपिंग में व्यस्त रहती.

अब शादी हो गयी है . रोज ऑफिस से घर आते वक़्त गिल्ट महसूस करती है कि 'रात के दस बज गए, बाकी सबलोग घर पर आ गए हैं ,मुझे आज भी देर हो गयी .' 

पति अक्सर देर रात तक अपने दोस्तों और उनकी पत्नियों के साथ पार्टी में शरीक होता है, वीकेंड्स पर लोनावाला, खोपोली ,फार्महाउस पर  जाता है और पल्लवी से पूछे बिना, उसकी तरफ से भी 'हाँ' कर देता है. सारे दिन ऑफिस में थकी पल्लवी मन न होते  हुए भी पति के साथ देर रात पार्टी में जाती है कि कहीं उसे बुरा न लगे .

पति और ससुर का बिजनेस है ...घर  में ऐशो आराम की चीज़ें , नौकर चाकर सब हैं .फिर भी वो घर की थोड़ी साफ़-सफाई करती है और पूरे वक़्त कोशिश में लगी रहती है कि कोई ये न कह दे कि वो नौकरी के चक्कर में घर का अच्छी  तरह ध्यान नहीं रख रही. ससुर को खुश करने के लिए उनके बर्थडे पर एक शानदार पार्टी का आयोजन करती है, सबको आमंत्रित कर लेती है . ढेर सारी शॉपिंग करती है ,पर जन्मदिन वाले दिन की सुबह ससुर बताते हैं कि ,वे कल रात डॉक्टर के पास गए थे और डॉक्टर ने उन्हें परहेज करने के लिए कहा  है. पार्टी कैंसल हो जाती है .

पल्लवी के पति और ससुर ,पल्लवी से अपनी नौकरी छोड़, उनका बिजनेस ज्वाइन करने के लिए कहते हैं. पल्लवी दुविधा में है कि अपनी नौकरी छोड़े या नहीं? पति उसके तुरंत 'हाँ' न कहने से नाराज़ है, और कहता है 'वो पैसों के पीछे भाग  रही है ' दोनों में तनाव बढ़ता जा रहा है, और अब हर वक़्त पल्लवी की आँखें आंसू भरी होती हैं.

ये हंसती- मुस्कुराती पल्लवी के जीवन को क्या हो गया ? और ये सिर्फ अकेली पल्लवी की ही कहानी नहीं है. मैं अपने बच्चों को लेकर एक डॉक्टर के पास जाती थी. वो डॉक्टर भी बहुत खुशमिजाज़ थी. हर वक़्त कलफ लगी कॉटन की कड़क साड़ी पहने अपनी  उजली हंसी के साथ मिलती.  कुछ दिनों बाद उसकी शादी हुई...वो थकी थकी सी बुझी बुझी सी रहने लगी. चेहरे की  उदासी ,उसके कपड़ों तक फ़ैल गयी थी. कभी कभी बुझी सी मुस्कान लिए कह भी देती.."शादी नहीं करनी चाहिए " उसे क्या परेशानी थी ,यह तो नहीं पता पर कुछ तो था, जिसने उसकी हंसी  गुम कर दी. 

पर इन सब परेशानी की वजह क्या ये खुद नहीं  है? क्यूँ ये अपने को सुपरवुमैन समझती  हैं? क्यूँ इस कोशिश में रहती हैं कि वे खुद को एक अच्छी बहू,एक अच्छी गृहणी, एक अच्छी पत्नी , एक अच्छी माँ साबित करें . जबकि उनके पास भी वही दो हाथ,दो पैर और दिन के चौबीस घंटे होते हैं. क्यूँ वे सबको खुश रखना चाहती हैं और नहीं रख पातीं तो फिर उदास रहने लगती हैं. 

वैसे नए परिवेश, नए घर, नए व्यक्ति के साथ ज़िन्दगी शुरू करने में कुछ समझौते तो करने ही पड़ेंगे ,पर ये समझौते ऐसे तो न हों कि इनकी हंसी ख़ुशी ही उसकी भेंट चढ़ जाए . पर लगता है, अगली दो तीन पीढ़ी की स्त्रियों को ये कुर्बानी देनी ही पड़ेगी. आज भी किसी भी स्त्री से सबसे पहले एक अच्छी  गृहणी, बहू , पत्नी, माँ बनने की ही अपेक्षा  की जाती है .इसके साथ ही वो एक सफल डॉक्टर, इंजिनियर, टीचर, अफसर  हो तो सोने पर सुहागा. वरना 'खरा सोना' तो उनका 'घरेलूपन' ही है. 

 कई बार सुनने में आता है, इतनी सफल  डॉक्टर/टीचर/अफसर  है पर सास-ससुर को देखते ही सर पर पल्लू रख कर पैर छूती है. पति से पूछे बगैर कोई काम नहीं करती, त्योहारों पर पकवान  खुद बनाती है ...आदि आदि . बड़ों को इज्जत देना , घर की  देखभाल करना प्रशंसनीय  है ..पर इस बात को इतना महत्व दिया जाता है कि उसके तले उनका दुसरा और असली रूप गौण हो जाता है. और अगर स्त्रियाँ ये सब न करें तो सुनने को मिलेगा, क्या फायदा  इस पढ़ाई-लिखाई का,अफसरी का ..घर पर तो ध्यान ही नहीं देती . 
यही वजह है कि आजकल की नौकरीपेशा महिलायें इस कदर पिस रही हैं. हर मोर्चे पर खुद को अव्वल साबित करने के चक्कर में उनका वजूद टुकड़े टुकड़े हुआ जा रहा है.
बस, अब आने वाली पीढियां उनका हाल देख यही तय करें कि अपनी ज़िन्दगी, वे अपनी मर्जी, अपनी ख़ुशी से जियेंगी , उन्हें किसी के सामने खुद को साबित करने की जरूरत नहीं है. उनके  पास भी सबकी तरह दो हाथ ,दो पैर और एक दिमाग है और वो दिमाग किसी मायने में कम नहीं है...अपने चौबीस घंटे वे  कैसे बिताएं ,ये वे खुद तय करेंगी. उनके होठों की मुस्कराहट कोई कर्ज़ नहीं , जिसे वे किस्तों में चुकाती रहें .

गुरुवार, 20 जून 2013

ख़ूबसूरत होने की सज़ा

ओमर बोरकन अल गाला 
यह खबर तो पुरानी हो गयी है, पर इसी खबर के बहाने कुछ लिखना चाह  रही थी, पर आजकल समय ज़रा रूठा रूठा सा है, हमसे और हमें उसे मनाने का भी समय नहीं मिल रहा :(
 खैर वैसे भी बहुत लोगों को इस खबर की खबर भी नहीं होगी. क्यूंकि यह  खबर बीस बाईस वर्ष की अंग्रेजीदां लड़कियों के बीच ज्यादा मशहूर हुई . 
"ओमर बोरकन अल गाला " का नाम अंतर्राष्ट्रीय  स्तर पर बहुत  प्रसिद्द हुआ .वे विशव के 'पोस्टर बॉय' बन गए . जब उन्हें "Jenadrivah Heritage & Cultural Festival in Riyadh. " में भाग लेने से रोक दिया गया .(  मीनाक्षी जी एवं दिगंबर नासवा जी जरूर अवगत होंगे इस खबर से ) 
पर उन्हें क्यूँ नहीं भाग लेने दिया गया ?? क्यूंकि वे बहुत ज्यादा ख़ूबसूरत हैं . हालांकि अगर वे इस फेस्टिवल में भाग ले ही लेते तो क्या हो जाता ? क्या लड़कियां/औरतें उनपर अटैक कर देतीं ??(वो भी सऊदी में ??)
पर इस तरह उस फेस्टिवल से निकाले जाने पर उन्हें फायदा ही  हुआ. नेट पर यह खबर आग की तरह फैली और वे रातों रात स्टार बन गए ...धडाधड उनकी तस्वीरें डाउनलोड की जाने लगीं. You tube पर उनके इंटरव्यू को लाखों हिट्स मिले. उनका एक फेसबुक पेज भी बन गया जिसे वन मिलियन लोगों ने लाइक किया . उन्हें स्त्रियों की प्रगति से सम्बंधित एक कैलेण्डर के लिए साइन कर लिया गया ,एक फिल्म में काम करने का मौक़ा मिल गया और जन्मदिन पर एक अनाम प्रशंसिका ने बिना सामने आये ,एक मर्सिडीज़ भी गिफ्ट कर दी. 

खैर यहाँ तो ख़ूबसूरत होने की सज़ा  एक वरदान ही साबित हुई. पर अक्सर ऐसा नहीं होता. सुन्दरता एक अभिशाप ही बन जाती है. या फिर कहें सुन्दरता एक दुधारी तलवार की तरह है. लोगों का अटेंशन ..उनकी प्रशंसा भी खूब मिलती है पर लोग प्रशंसा के साथ थोड़ी इर्ष्या का भी  मिला-जुला भाव रखते हैं. लेकिन  उसके दिल का हाल कोई नहीं जानता. 

मेरे हॉस्टल में एक बहुत ही सुन्दर लड़की थी . हम सब छुट्टियों में घर जाने को उत्सुक होते पर वो खुश तो होती साथ ही थोड़ी दुखी भी. कारण ??...उसकी जॉइंट फैमिली थी. एक तो वह बहुत सुन्दर थी, दूसरे  उसके  पिता उसे हॉस्टल में रखकर पढ़ा रहे थे. उसके  चाचा  की लडकियां, पूरे समय उसपर व्यंग्य  करती रहतीं, "अरे तुम्हे क्या तैयार होना है..तुम तो ऐसे ही अच्छी  लगोगी.." कपड़े चुनते वक्त भी उसकी बारी बाद में आती.."तुम पर तो कुछ भी अच्छा लगेगा ...हमें सोचना पड़ता है " वो कहती , "हर वक्त खुद को नीचा दिखाना पड़ता है....उनलोगों को खुश करने की कोशिश करनी पड़ती है, यह दिखाना पड़ता है कि हम तो कुछ भी नहीं."

एक सहेली है, जिसे कॉलेज में ब्यूटी क्वीन  कहा जाता था . अभी वो बी.ए. में ही थी, पर उसकी माँ को सुनना पड़ता ," आपको क्या फ़िक्र करनी...बेटी तो आपकी सुन्दर है...घर बैठे रिश्ता आ जायेगा " और जब उसने बी. ए. कर लिया तो माता-पिता को कोई जल्दी नहीं थी पर पूरे महल्ले के पेट में दर्द , "आपकी बेटी तो इतनी सुन्दर है इसकी शादी क्यूँ नहीं हो रही??" 

शादी के बाद के भी उसके अनुभव बहुत अच्छे नहीं रहे. ससुराल में ननदें खफा कि 'भाभी उनसे ज्यादा  रूपवती  है '. उसके हर काम में मीन मेख निकाली जाती और ताना दिया जाता  कि 'केवल रूप से क्या होता है' पति भी थोड़े शक्की निकले, वह देवरों से पति के  के दोस्तों से खुलकर हंस-बोल नहीं पाती थी. कोई भी उस से बात करता तो उसके पति को लगता, "उस व्यक्ति के मन में उनकी पत्नी के लिए कुछ  और भावनाएं हैं " अक्सर कहा जाता है कि "सांवली लड़कियों की किस्मत बहुत अच्छी  होती है, उनके पति उन्हें बहुत प्यार करते हैं." मेरी उस सहेली ने इस कथन पर बहुत सोच विचार कर के ये निष्कर्ष निकाला कि ये सच होता है पर इसके पीछे कारण ये है कि "पति ऐसी पत्नियों के लिए बहुत प्रोटेक्टिव होते हैं . उन्हें हमेशा ख्याल रहता है,उनकी पत्नी साधारण शक्ल-सूरत वाली है, उसे कोई कुछ न कह दे ,इसलिए उसके लिए ढाल बने खड़े रहते हैं .खुद ही तारीफ़ करते हैं. जबकि सुन्दर स्त्री के पति को मालूम है कि उनकी पत्नी को तो सबकी प्रशंसा ही मिलने वाली है ,इसलिए वे अक्सर उसकी आलोचना करते ही पाए जाते हैं. (अब ये उसके निजी विचार हैं , और मैंने इतना मनन  नहीं किया है,इस पर ) 
पर उसक बातों में सच्चाई झलकती है.

एक और बहुत ही ख़ूबसूरत सहेली है, उसके पति साल में आठ महीने शिप पर रहते हैं. ज्यादातर पारिवारिक समारोह या दोस्तों की पार्टी , उसे अकेले ही अटेंड करनी पड़ती हैं. पर वह इच्छा होने पर भी ज्यादा सजती संवरती  नहीं. साधारण से कपड़े पहनती है, और  पार्टी में या किसी समारोह में अपने हमउम्र वालों से ज्यादा बातें नहीं करती,अक्सर बच्चों के बीच बैठी रहती  है. महिलायें खुले मन से नहीं मिलतीं और अगर  पुरुषों  से बात करती है तो उनकी पत्नियां असुरक्षित महसूस करने लगती हैं. 

और यह सब सदियों से चला आ रहा है. एक मेरे पहचान की महिला हैं , उम्र की  ढलान पर हैं पर पता चलता है कि अपने जमाने में बहुत  ख़ूबसूरत रहीं होंगी. जब भी कोई गेट टुगेदर होता है , इस बात का जिक्र करना कभी नहीं भूलतीं कि उनके पति उन्हें गहरे रंग के कपड़े नहीं पहनने देते थे कि कहीं वे और ज्यादा ख़ूबसूरत न लगने लगें हमेशा हलके, उदास रंग की साड़ियाँ ही लाते थे .जब उनकी बेटियाँ बड़ी हो गयीं तो पिता से जिद कर माँ के लिए  गहरे रंग की साड़ियाँ  लाने लगीं. उन्हें छत  पर जाने, बालकनी से झाँकने की इजाज़त नहीं थी. जबकि उनके पति बहुत पढ़े-लिखे और यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर थे (अब रिटायर हो गए हैं )

ऐश्वर्या राय को कोई पसंद करे या न करें पर उनकी खूबसूरती को कोई नकार नहीं सकता. कई बार जब टी.वी. पर फ़िल्मी पार्टियों  की झलकी दिखाई जाती थी उसमे बाकी हिरोइन्स तो एक ग्रुप बना कर आपस में हंसती बोलतीं नज़र आतीं थीं . ऐश्वर्या के साथ होते मोटे मोटे बदसूरत निर्माता .(आम तौर पर ऐसा मैं नहीं लिखती पर इस वक़्त यही लिखने का मन हो रहा है )(शादी के बाद तो खैर ऐश्वर्या को  अपने पति और ससुर की कम्पनी मिल जाती  है ) करण जौहर के शो "कॉफ़ी विद करण' में भी..अक्सर दो स्टार एक साथ आते  हैं, दीपिका- सोनम, रानी- प्रियंका ....शाहरुख़ -काजोल 'हेमा मालिनी -जीनत अमान' पर खबर थी कि ऐश्वर्या के साथ आने को कोई तैयार नहीं हुआ. ऐश्वर्या के साथ कोई स्टार नहीं आया ...बल्कि उनके साथ थे 'संजय लीला भंसाली '. 

एक उलझन  इन सुन्दर बालाओं के साथ यह भी है, कोई उनसे सच्ची दोस्ती या सच्चा प्रेम करे ,तब भी ये विश्वास नहीं कर पातीं कि उक्त व्यक्ति सचमुच अपनी भावनाओं के लिए ईमानदार है या सिर्फ उनकी खूबसूरती देख  उनकी तरफ आकृष्ट है.

यदा कदा विदेशी ख़ूबसूरत बालाओं के मन का दर्द भी पढने को मिला, वे कहती हैं, "Then there is the judgment that if a woman is beautiful she is dumb.But the bad side is that allot of people have the idea that you are stupid, self obsessed or conceited. Which is not true. "

एक ख़ूबसूरत लड़की जब चौदह पंद्रह साल की थी ,उसे इतने unwanted attention  मिले कि वो घबरा ही गयी, लोगों की हरकतों से घबराकर  वह डिप्रेशन में चली गयी .वो कहती है ," .  After that I went from 115 pounds to 145 in about 6 weeks ... Size 4 to size 14. It was a big change. All of a sudden I saw how superficial people were. Men were not nearly as nice to me. However, I found that girls liked me a whole lot more and when boys did give me their attention it was for what came out of my mouth not how I looked. I was this bigger person until about 18. It was an unconscious protection. Basically I just couldn't handle the attention and feel safe and secure with it. It was very hard to not be able to attract the boys I was interested in - no dates for school dances or really anything until 17 but it kept me safe - no more advances from creepy older men,  there were perks to being protected by fat and acne.

एक मॉडल ने कहा , "Most other people who work in the fashion industry (and there are exceptions, of course) treat these girls not only as if they have no brain, but as if they have no feelings."

ये सुन्दरता की देवियाँ भले ही लगें पर अन्दर से एक आम इंसान ही होती हैं. उन्हें भी सबके साथ मिलजुलकर हंसने बोलने  का मन  होता है .  बेफिक्र होकर  एक सामान्य सी ज़िन्दगी बिताने का मन होता है ,पर उन्हें अपने आस-पास के लोगों के प्रति,अपने व्यवहार के  प्रति चौकन्ना रहना पड़ता है. ये सुन्दरता उनके लिए वरदान कम अभिशाप ज्यादा बन जाती  है.

शुक्रवार, 14 जून 2013

आज पढने के बदले सुन लें कहानी

जब BIG FM 92.7  पर 'याद शहर' प्रोग्राम शुरू हुआ था तो एक ब्लॉगर  मित्र ने इसके विषय में बताया था .और मझसे कहा था 'आप कहानियाँ लिखती हैं यहाँ कहानी भेज सकती हैं ' पर मैंने प्रोग्राम सुना भी नहीं था और  मेरी कुछ समझ में नहीं आया . फिर ये प्रोग्राम काफी हिट हुआ . You Tube पर सारी प्रसारित कहानियाँ अपलोड की गयीं . 

'अनु सिंह चौधरी' से मुलाक़ात हुई और उन्होंने भी इस प्रोग्राम की चर्चा की और मुझसे कहानियाँ  भेजने के लिए कहा . तब मुझे ख्याल आया कि वे मित्र इसी प्रोग्राम के विषय में बात कर रहे थे . मेरी एक फ्रेंड भी ये प्रोग्राम बड़े शौक से सुनती है . कहानी  और उसके बीच बीच में कहानी  के कथ्य पर आधारित बजते दिलकश गाने उसे बहुत पसंद है. उसने भी बहुत उकसाया .

पर किसी भी प्रोग्राम में समय की सीमा  होती है . कहानी की भी शब्द सीमा निर्धारित होती है. और मैं कितना लम्बा लिखती  हूँ, ये मेरे पाठक जानते ही हैं . :) .शब्द सीमा में बंध कर लिखना  ,मेरे लिए एक बहुत बड़ी चुनौती है. और यहाँ कहानी  को छः भागों  में बांटना होता है, खैर खुद को डांट-डपट कर ये चुनौती भी स्वीकारी .कहानी भेज दी . उन्हें पसंद आयी  

पर एक मुश्किल पार्ट और है .इस प्रोग्राम के लिए कहानियां  लिखने वालों की एक बैठक होती है.जिसे मंडली कहते हैं. वहाँ लोग बारी बारी से अपनी  कहानियाँ पढ़ते हैं और फिर बाक़ी सब उस कहानी पर अपनी बेबाक राय देते हैं. और मुझसे चाहे जितनी कहानियां लिखवा लें ,किसी कहानी के दोष गुण बतलाना ,उसपर अपने विचार देना मेरे लिए बहुत कठिन  होता है. पर वहाँ, हर कहानी पर आपसे विचार पूछे ही जाते हैं...और बताना ही होता है  :( वहाँ 'सुन्दर प्रस्तुति'...'ख़ूबसूरत लेखन ' कह कर बचा नहीं जा सकता :)

आकाशवाणी पर मैं भी कहानियाँ पढ़ती हूँ .पर वहाँ समय सीमा और भी कम है .और आकाशवाणी में मुझसे कभी कुछ कहा नहीं  गया पर मैंने खुद के लिए ही अलिखित नियम बना लिये हैं वहाँ  मैं सिर्फ सामाजिक सरोकार से जुड़ी कहानियां ही पढ़ती हूँ . पर यहाँ तो इस प्रोग्राम में कहा ही जाता है , '92.7. BIG FM पर आप सुन रहे हैं "प्यार  के किस्से  यादो का इडियट बॉक्स विद निलेश मिश्रा ' यानि  अपनी कल्पना के घोड़े के लगाम को खुला छोड़ दीजिये पर हाँ, रोचक दौड़ होनी चाहिए ये तो पहली शर्त है ही. 

दो कहानियों को अब तक निलेश जी अपनी आवाज़ दे चुके हैं. और उनकी आवाज़ ,उनके पढने के अंदाज के कितने फैन हैं यह तो फेसबुक पर याद शहर के पेज पर एक नज़र डाल कर ही पता चल जाता है. कहानी में जैसे जान  आ जाती है और अपनी कहानी ही नयी सी लगने लगती है. 

ब्लॉग पर अपना देखा -लिखा-पढ़ा-छापा  सब कुछ सहेज कर रखने की आदत है. 
सो ये दोनों लिंक भी सहेज लिए . (आगे भी डालती रहूंगी ) फेसबुक पर तो मित्रो ने सुन ही ली है (जिन्होंने सुनना चाहा होगा )

और उन ब्लॉग दोस्तों के लिए ख़ास, जो मेरी लम्बी कहानियाँ पढने से घबराते  हैं....वे यहाँ सुन सकते हैं, यानि कि रश्मि रविजा की कहानी से बचना मुश्किल ही नही नामुमकिन है :) :)

अनकहा सच 



पहचान तो थी 

फिल्म The Wife और महिला लेखन पर बंदिश की कोशिशें

यह संयोग है कि मैंने कल फ़िल्म " The Wife " देखी और उसके बाद ही स्त्री दर्पण पर कार्यक्रम की रेकॉर्डिंग सुनी ,जिसमें सुधा अरोड़ा, मध...