वही बचपन की सहेली 'सीमा', जो बारह साल बाद मुझे इंटरनेट के थ्रू मिली और उसके मिलने की पूरी दास्तान मैंने यहाँ लिख दी थी। आप सबने जरूर पढ़ी होगी, और शायद याद भी हो फिर भी मुझे अपनी इस सहेली का परिचय देने में बहुत गर्व महसूस होता है। बहुत लोगो के लिए वह उदाहरण स्वरुप है। बारहवीं के बाद ही उसकी शादी हो गयी। शादी के बाद उसने बी. ए. , एम. ए. , बी. एड. , एम. एड. और पी एच डी भी किया। सेन्ट्रल स्कूल में टीचर बनी और अब कटिहार केन्द्रीय विद्यालय की प्रिंसिपल है .
बेटे की बारात तो भुवनेश्वर जानी थी, पर सीमा के भाई, माता -पिता मुंबई में ही हैं, बेटे की जॉब भी मुंबई में है, इसलिए शादी से पहले की रस्में यहाँ करनी थी और मुझे उसमे शामिल होना ही था। (सीमा की ज़िद तो भुवनेश्वर साथ चलने की भी थी ,पर कई कारणों से वह संभव नहीं हो पाया ) इसलिए समय से मैं, इन रस्मों में शामिल होने के लिए पहुँच गयी।
सीमा के माता -पिता ,उसके छोटे भाई-बहनों से मिलने के लिए अति उत्साहित थी क्यूंकि सीमा से तो मुलाकात होती रही थी,पर उन सबसे मैं करीब पच्चीस साल के बाद मिलने वाली थी। माँ ने देखते ही पहचान लिया और मुझे सुकून हुआ,चलो इतना भी नहीं बदली हूँ .
सीमा पूजा की तैयारियों में लगी थी । जैसे ही सीमा और उसके पति पूजा के आसन पर बैठने को हुए। उसकी माँ ने टोक दिया "अरे, दोनों के पैरों में आलता तो लगा ही नहीं है " दोनों ने कहा, 'अब जाने भी दो न " इस बार उसके पिता बोले, "ऐसे कैसे, बेटा का बियाह एक ही बार होता है न, पैर तो रंगना ही पड़ेगा "
अब मुश्किल थी आलता लगाए कौन? शादी-ब्याह के घरों में ये काम 'नाउन' करती हैं (अब मैं कोई सेलिब्रिटी तो हूँ नहीं कि ऐसा लिखने पर कोई केस कर देगा, वरना जाति सूचक शब्दों का प्रयोग वर्जित है। शाहरुख खान को 'बिल्लू बार्बर' फिल्म में से ऐसे शब्द हटाने पड़े थे ) पर यहाँ तो खुद सीमा दो दिन पहले आयी थी। अकेले बैचलर लड़के के घर में तो कोई काम वाली बाई भी नहीं थी। सीमा की छोटी बहनें ,उसके भाई के फ़्लैट पर से अब तक आयी नहीं थीं। बड़ी बहन आलता लगाने बढ़ी तो माँ ने मना कर दिया,'वो बड़ी होकर उनके पैर को कैसे हाथ लगाएगी ' .सीमा की बेटी श्रुति ने रंग की शीशी हाथों में ली तो माँ ने फिर से कहा, "बेटी कहीं पैर रंगती है, थोडा रुक जाओ छोटी बहनें आती ही होंगी।" पर कई सारे रस्म करने थे,देर हो रही थी और सीमा की नज़र मुझ पर पड़ी, "अरे, रश्मि है न ,ये लगा देगी " मैंने भी ख़ुशी ख़ुशी सहेली के पैरों में आलता लगा दिया। पर उसके पति को बहुत झिझक हो रही थी । वे वहां से चले गए .जब बार बार उनकी पुकार होने लगी तो श्रुति ने राज़ खोला, 'वे रश्मि आंटी से आलता नहीं लगवाएंगे ' सीमा ने रौब जमाया 'क्यूँ नेग देने से डर रहे हैं क्या ?' मैं भी अड़ गयी, "ये मौका तो नहीं छोडूंगी ,मनपसंद नेग लूंगी " (शादी-ब्याह में ऐसे हलके-फुल्के मजाक बहुत चलते हैं, माहौल खुशनुमा बना रहता है ) बेचारे किसी तरह झेंपते हुए आकर सावधान की मुद्रा में खड़े हो दूसरी तरफ देखने लगे। वे बहुत ही असहज महसूस कर रहे थे और मैं उनकी असहजता को लम्बा खींचने के लिए और देर कर रही थी .:)
पूजा शुरू हुई तो पंडित जी ने बड़ी बहन से कहा,अगली रस्म के लिए चीज़ें इकठ्ठा कर लीजिये। थोडा 'गाय का गोबर' मंगवा लीजिये। अब तो सब सकते में आ गए .रात के आठ बजे मुंबई में गोबर कहाँ से मिलेगा ?
सीमा ने कहा 'आपने पूजा की सामग्री में तो लिखवाया ही नहीं।, पंडित जी नाराजगी से बोले, 'कहीं गोबर भी लिखवाया जाता है वो तो बगल से कोई भी ले आता है।' अब पंडित जी गाँव से आये थे, उन्हें कोई क्या एक्सप्लेन करे। सीमा ने कहा, ' पूजा के सामान की दुकान पर उपले दिखे ,वो तो मैं अपने मन से ले आयी,' मेरे पतिदेव ने उपाय सुझाया," उसमे पानी डाल कर गीला कर दीजिये,वो गोबर बन जायेगा " पंडित जी ने कहा," नहीं, उसे दीवार पर पांच जगह चिपकाना होता है, वो नहीं चिपकेगा " ( मेरे मन में आया, कहूँ, उसके पांच टुकड़े कर फेविकोल से चिपका दिया जा सकता है,पर पता था यह आइडिया खारिज हो जाएगा, इसलिए चुप रही ) पंडित जी ने ऐलान कर दिया 'बिना गाय के गोबर के 'घिउढारी ' की रस्म नहीं होगी '. इस रस्म में दीवार पर गोबर चिपका कर दूब ,अक्षत, रोली से उसकी पूजा की जाती है और फिर उसपर घी डाला जाता है इसलिए कहते हैं 'घिउढारी' (घिउ =घी , ढारी =ढालना ) .इसके पीछे कोई कहानी तो होगी पर मुझे नहीं पता (औरों को भी कितना पता है, ये भी नहीं पता )
खैर फिर विमर्श हुआ कि वाचमैन से पूछा जाए, 'आस पास कहीं तबेला हो तो ,वहां गोबर मिल जायेगा '. वाचमैन ने बताया, "पास ही एक गाँव है, वहां एक तबेला है ." चन्दा दी और मैं गाडी ड्राइवर लेकर गोबर की खोज में निकले। लोगों से रास्ता पूछते , अँधेरे में कच्ची सड़क पर काफी आगे निकल जाने पर एक मंदिर दिखा। हमारे चेहरे खिल गए ,वहां एक गाय बैठी थी। पर गाय को गन्दगी पसंद नहीं थी। वो बिलकुल साफ़-सुथरी जगह पर बैठी थी। गोबर वह तबेले में कर के आयी थी। अब जब हम तबेले तक पहुँच गए तब मुझे ख्याल आया, 'गोबर लेकर कैसे जायेंगे ? हमने तो कुछ लाया ही नहीं था ' ये मुंबई का ड्राइवर उस पर से फैशनेबल युवा (लम्बे बाल थे उसके, हाइलाइट किये हुए ) कहीं गाडी लगा कर कह दे 'आ गया तबेला ,जाइए गोबर ले आइये ' कल्पना से ही मन सिहर गया। चन्दा दी बड़ी थीं उन्हें कैसे कहूँ, और मैं कोई फिल्म या रियलिटी शो तो नहीं कर रही थी जहाँ हिरोइन्स को ये सब करना पड़ता है (ओंकारा फिल्म में 'कोंकणा सेन' को गोबर से उपले पाथने थे और रिटेक पर रिटेक हुए जा रहे थे। रोते हुए अपनी माँ 'अपर्णा सेन' को फोन किया तो उन्होंने नसीहत दी ,' अभिनय का शौक अपनाया है तो ये सब झेलना ही पड़ेगा '.
मैंने ड्राइवर को मस्का लगाया और DDLJ फिल्म का डायलॉग मारा , "जरा आप ही लेकर आओ न , कहते हैं शादी के घर में काम करने से सुन्दर लड़की मिलती है " ड्राइवर ने कहा, "मेरी शादी ऑलरेडी हो चुकी है " पर वो चला गया लेने और एक पौलिथिन भर के गोबर ले आया . अब घर पहुंचे तो मैंने कहा, 'दीवार पर पेपर चिपका देते हैं,उसके ऊपर गोबर लगा कर पूजा कर दी जायेगी '.(लड़के ने नया फ़्लैट लिया था , बल्कि पैरेंट्स ने खरीदवा दिया था कि इधर-उधर पैसे न वेस्ट करे ) पंडित जी तैयार भी हो गए (और जगह भी लोगो ने ऐसा करवाया होगा )
पर सीमा के पिताजी ने कहा, "नहीं, पूजा तो विधिवत दीवार पर ही होगी, क्या हुआ जो दीवार खराब हो जायेगी, फिर से पेंट करवा लेगा, शादी तो एक ही बार होती है ,ये सब शुभ है ' माता--पिता के बीच बैठा 'रिशु ' सर झुकाए बेबसी से सर हिला रहा था।
तब तक सीमा की छोटी बहने भी आ गयीं, उनलोगों ने भी मुझे पहचाना लिया था पर हैरान हो गयी थीं, मुझे वहाँ देख। जबकि मैंने तो किसी को नहीं पहचाना . सबको फ्रॉक में देखा था। 'सुषमा' जो तब नवीं कक्षा में थी ,आज उसका बेटा नवीं में है। डिम्पल पांचवी में थी,और आज एक बेटे को गोद में लिए दुसरे की ऊँगली थामे खड़ी थी। सब पुराने दिन याद कर रहे थे। डिम्पल बता रही थी," हमेशा सीमा दी एक चिट्ठी लेकर आपके यहाँ दौड़ा देती .(तब फोन तो थे नहीं,छोटे भाई बहन ही सन्देश पहुंचाने का काम किया करते थे ) एक बार बारिश हो रही थी,सीमा दी बीमार थी और मैं छाता लेकर सीमा दी की चिट्ठी आपको देने आयी थी। मैंने आपसे कहा था, 'सीमा दी अपनी किताबों पर सुन्दर सुन्दर हीरो हिरोइन, फूलो के कवर लगाती है, मुझे नहीं देती 'और आपने धर्मयुग और साप्ताहिक हिन्दुस्तान से कई पेज निकाल कर मुझे दिए थे "(तब हमलोग ब्राउन पेपर खरीद कर किताब कॉपियों पर कवर नहीं लगाते थे)
सुषमा ने अटकते हुए कहा, "आप रश्मि रवि...रविजा नाम से मैगजीन में लिखती थीं न, अब भी लिखती हैं ?" अच्छा हुआ तीन साल पहले वो नहीं मिली वरना मुझे होंठ बिसूर कर जबाब देना पड़ता ," वो सब तो कब का छूट गया "
हमलोग बातों में ही थे कि सीमा की भाभी आयी, "चलिए सबलोग 'मटकोर' की रस्म करनी है " इस रस्म में वर, वर की माँ और बाकी महिलायें ,तालाब या नदी के किनारे पूजा करने जाती हैं। उनमे से दो औरतें सर पर घड़ा लेकर जाती हैं और नदी/तालाब से पानी भरकर सर पर रखकर लाती हैं। सबने मुझे आगे कर दिया। आप सीमा दी की सहेली हैं,आपको तो सर पर घड़ा लेकर जाना ही होगा। सीमा की भाभी हाथों में सिंदूरदान लेकर आयी और नाक से लेकर सर तक सिंदूर लगा दिया। मैं प्लीज़ प्लीज़ कहती रह गयी पर सबका कहना था, फ्रेंड का बेटा यानि आपका बेटा , ये सब तो करना ही पड़ेगा।
अब यहाँ नदी तालाब कहाँ, स्विमिंग पूल के किनारे पूजा करना तय हुआ। स्विमिंग पूल भी गैरेज के ऊपर बना हुआ है ,जहाँ कई सीढियां चढ़ कर जाना पड़ता है। स्विमिंग पूल के किनारे पूजा संपन्न हुई। वहीँ पास लगी फूलों की क्यारियों से थोड़ी मिटटी निकाल कर 'मटकोर' की रस्म पूरी की गयी। और स्विमिंग पूल से घड़े में पानी भरकर सर पर लिए हम लिफ्ट से बारहवीं मंजिल पर पहुंचे।
यह अनुभव भी क्यूँ बाकी रहे, नदी-कुआँ-तालाब से घड़ा भर कर पानी लाना किस्से कहानियों फिल्मो में होता है . हकीकत में तो स्विमिंग पूल से भरा जाता है। :)
एक धान कूटने की रस्म भी होती है। जिसमे वर के साथ पांच औरतें आँगन में ओखली में मूसल से धान कूटती हैं। यहाँ, बालकनी में स्टील की छोटी सी ओखली मूसल रखी गयी जो हर किचन में होती है, उसे छह लोग पकड़ें कैसे? एक ने दो ऊँगली से पकड़ा और बाकी लोगों ने उसके ऊपर अपनी अपनी ऊँगली रख दी। छह लोगों का छोटी सी बालकनी में खड़ा होना ही मुश्किल हो रहा था। चाहे जिस रूप में हो पर रस्में सारी करनी थीं। बस मंगल गीतों की कमी खल रही थी। किसी को गीत आते ही नहीं। रिशु भी अच्छा बच्चा बने औरतों से घिरा सर झुकाए सारे रस्म चुपचाप किये जा रहा था . हमें तो बहुत मजा आ रहा था . पर ये सब शायद हमारी पीढ़ी तक ही सीमित रह जाए . न तो हमें इतने डिटेल में रस्में याद रहने वाली हैं कि अगली पीढ़ी को बताएं और न ही वो सब ये सारी बातें मानने वाले हैं।
वैसे भी यह शादी बहुत अलग सी है। शादी की रस्मों की शुरुआत सीमा ने अपने ससुराल 'दरभंगा' से की। वहां कुल देवता की पूजा की। मुंबई में 'हल्दी - मटकोर' की रस्म की .प्लेन से बारात भुवनेश्वर गयी, जहाँ शादी की रस्में होंगी । और शादी के बाद की रस्मे और रिसेप्शन 'कटिहार' में
आज 14 फ़रवरी को प्रेम दिवस के दिन दोनों बच्चे विवाह सूत्र में बंधने जा रहे हैं। उन्हें ढेरों आशीर्वाद और असीम शुभकामनाएं .