बुधवार, 13 फ़रवरी 2013

हमारी पीढ़ी की कशमकश

हमारी पीढ़ी बड़े कशमकश से गुजर रही है। वह नयी पीढ़ी के साथ कदम मिला कर चल रही है, लेकिन पुरानी पीढ़ी के रिवाजों रवायतों का दामन भी नहीं छोड़ना चाहती। पुरानी परम्पराओं को भी बड़े शौक से निभाती है या यूँ कहें  पुरानी पीढ़ी की भावनाओं को ठेस नहीं पहुंचाना चाहती। हाल में ही बहुत करीब से यह सब अनुभव हुआ जब अपनी फ्रेंड के बेटे के हल्दी की रस्म में शामिल हुई।

वही बचपन की सहेली 'सीमा', जो बारह साल बाद मुझे इंटरनेट के थ्रू मिली और उसके मिलने की पूरी दास्तान  मैंने यहाँ लिख दी थी। आप सबने जरूर पढ़ी होगी, और शायद याद भी हो फिर भी मुझे अपनी इस सहेली का परिचय देने में बहुत गर्व महसूस होता है।  बहुत लोगो के लिए वह उदाहरण स्वरुप है। बारहवीं के बाद ही उसकी शादी हो गयी। शादी के बाद उसने बी. ए. , एम. ए. , बी. एड. , एम. एड.  और पी एच डी भी किया। सेन्ट्रल स्कूल में टीचर बनी और अब कटिहार केन्द्रीय विद्यालय की प्रिंसिपल है . 

बेटे की बारात  तो भुवनेश्वर जानी थी, पर सीमा के भाई, माता -पिता मुंबई में ही हैं, बेटे की जॉब भी मुंबई में है, इसलिए शादी से पहले की रस्में यहाँ  करनी थी और मुझे उसमे शामिल होना ही था। (सीमा की ज़िद  तो भुवनेश्वर साथ चलने की भी थी ,पर कई कारणों से वह संभव नहीं हो पाया ) इसलिए समय से मैं, इन रस्मों में शामिल होने के लिए पहुँच गयी।
 सीमा के माता -पिता ,उसके छोटे भाई-बहनों से मिलने के लिए अति उत्साहित थी क्यूंकि सीमा से तो मुलाकात होती रही थी,पर उन सबसे मैं  करीब पच्चीस साल के बाद मिलने वाली थी। माँ ने देखते ही पहचान लिया और मुझे सुकून हुआ,चलो इतना भी नहीं बदली हूँ .

सीमा पूजा की तैयारियों में लगी थी । जैसे ही सीमा और उसके पति पूजा के आसन पर बैठने को हुए। उसकी माँ ने टोक दिया "अरे, दोनों के पैरों में आलता तो लगा ही नहीं है " दोनों ने कहा, 'अब जाने भी दो न " इस बार उसके पिता बोले, "ऐसे कैसे, बेटा का बियाह एक ही बार होता है  न, पैर तो रंगना ही पड़ेगा "
अब मुश्किल थी आलता लगाए कौन? शादी-ब्याह के घरों में ये काम 'नाउन' करती हैं (अब मैं कोई सेलिब्रिटी तो हूँ नहीं कि ऐसा लिखने पर कोई केस कर देगा, वरना जाति सूचक शब्दों का प्रयोग वर्जित है। शाहरुख खान को 'बिल्लू बार्बर' फिल्म में से ऐसे शब्द हटाने पड़े थे ) पर यहाँ तो खुद सीमा दो दिन पहले आयी थी। अकेले बैचलर लड़के के घर में तो कोई काम वाली बाई भी नहीं थी। सीमा की छोटी बहनें ,उसके भाई के फ़्लैट पर से अब तक आयी नहीं थीं। बड़ी बहन आलता लगाने बढ़ी तो माँ ने मना  कर दिया,'वो बड़ी होकर उनके पैर को कैसे हाथ लगाएगी ' .सीमा की बेटी श्रुति ने  रंग की शीशी हाथों में ली तो माँ ने फिर से कहा, "बेटी कहीं पैर रंगती है, थोडा रुक जाओ छोटी बहनें आती ही होंगी।" पर कई सारे रस्म करने थे,देर हो रही थी और सीमा की नज़र मुझ पर पड़ी, "अरे, रश्मि है न ,ये लगा देगी " मैंने भी ख़ुशी ख़ुशी सहेली के पैरों में आलता लगा दिया। पर उसके पति को बहुत झिझक हो रही थी । वे वहां से चले गए .जब बार बार उनकी पुकार होने लगी तो श्रुति ने राज़ खोला, 'वे रश्मि आंटी से आलता नहीं लगवाएंगे ' सीमा ने रौब जमाया 'क्यूँ नेग देने से डर रहे हैं क्या ?' मैं भी अड़ गयी, "ये मौका तो नहीं छोडूंगी ,मनपसंद नेग लूंगी " (शादी-ब्याह में ऐसे हलके-फुल्के मजाक बहुत चलते हैं, माहौल खुशनुमा बना रहता है ) बेचारे किसी तरह झेंपते हुए आकर सावधान की मुद्रा में खड़े हो दूसरी तरफ देखने लगे। वे बहुत ही असहज महसूस कर रहे थे और मैं उनकी असहजता को लम्बा खींचने के लिए और देर कर रही थी .:)

पूजा शुरू हुई तो पंडित जी ने बड़ी बहन से कहा,अगली रस्म के लिए चीज़ें इकठ्ठा कर लीजिये। थोडा 'गाय का गोबर' मंगवा लीजिये। अब तो सब सकते में आ गए .रात  के आठ बजे मुंबई में गोबर कहाँ से  मिलेगा ?
 सीमा ने कहा 'आपने पूजा की सामग्री में तो लिखवाया ही नहीं।, पंडित जी नाराजगी से बोले, 'कहीं गोबर भी लिखवाया जाता है वो तो बगल से कोई भी ले आता है।' अब पंडित जी गाँव से आये थे, उन्हें कोई क्या एक्सप्लेन करे। सीमा ने कहा, ' पूजा के सामान की दुकान पर उपले दिखे ,वो तो मैं अपने मन से ले  आयी,' मेरे  पतिदेव ने उपाय सुझाया," उसमे पानी डाल कर गीला कर दीजिये,वो गोबर बन जायेगा " पंडित जी ने कहा," नहीं, उसे दीवार पर पांच जगह चिपकाना होता है, वो नहीं चिपकेगा " ( मेरे मन में आया, कहूँ, उसके पांच टुकड़े कर फेविकोल से चिपका दिया जा सकता है,पर पता था यह आइडिया खारिज हो जाएगा, इसलिए चुप रही ) पंडित जी ने ऐलान कर दिया 'बिना गाय  के गोबर के 'घिउढारी ' की रस्म नहीं होगी '. इस रस्म में दीवार पर गोबर चिपका कर दूब ,अक्षत, रोली से उसकी पूजा की जाती है और फिर उसपर घी डाला  जाता है इसलिए कहते हैं 'घिउढारी' (घिउ =घी , ढारी =ढालना ) .इसके पीछे कोई कहानी  तो होगी पर मुझे नहीं पता (औरों को भी कितना पता है, ये भी नहीं पता )

खैर फिर विमर्श हुआ कि वाचमैन से पूछा जाए, 'आस पास कहीं तबेला हो तो  ,वहां गोबर मिल जायेगा '. वाचमैन ने बताया, "पास ही एक गाँव है, वहां एक तबेला है ." चन्दा  दी और मैं गाडी ड्राइवर लेकर गोबर  की खोज में निकले। लोगों से रास्ता पूछते , अँधेरे में कच्ची सड़क पर काफी आगे निकल जाने पर एक मंदिर दिखा। हमारे चेहरे खिल गए ,वहां एक गाय बैठी थी। पर गाय को गन्दगी पसंद नहीं थी। वो बिलकुल साफ़-सुथरी जगह पर बैठी थी। गोबर वह तबेले में कर के आयी थी। अब जब हम तबेले तक पहुँच गए तब मुझे ख्याल आया, 'गोबर लेकर कैसे जायेंगे ? हमने तो कुछ लाया ही नहीं था ' ये मुंबई का ड्राइवर उस पर से फैशनेबल युवा (लम्बे बाल थे उसके, हाइलाइट किये हुए ) कहीं गाडी लगा कर कह दे 'आ गया तबेला ,जाइए  गोबर ले आइये ' कल्पना से ही मन सिहर गया। चन्दा दी बड़ी थीं उन्हें कैसे कहूँ, और मैं कोई फिल्म या रियलिटी शो तो नहीं कर रही थी जहाँ हिरोइन्स को ये सब करना पड़ता है (ओंकारा फिल्म में 'कोंकणा सेन' को गोबर से उपले पाथने थे और रिटेक पर रिटेक हुए जा रहे थे। रोते हुए अपनी माँ  'अपर्णा सेन' को फोन किया तो उन्होंने नसीहत दी ,' अभिनय का शौक अपनाया है तो ये सब झेलना ही पड़ेगा '.

मैंने ड्राइवर को मस्का लगाया और DDLJ फिल्म का डायलॉग मारा , "जरा आप  ही लेकर आओ न , कहते हैं शादी के घर में काम करने से सुन्दर लड़की मिलती है " ड्राइवर ने कहा, "मेरी शादी ऑलरेडी हो चुकी है " पर वो चला गया लेने और एक पौलिथिन भर के गोबर ले आया . अब घर पहुंचे तो मैंने कहा, 'दीवार पर पेपर चिपका देते हैं,उसके ऊपर गोबर लगा कर पूजा कर दी जायेगी '.(लड़के ने नया फ़्लैट लिया था , बल्कि पैरेंट्स ने खरीदवा दिया था कि  इधर-उधर पैसे न वेस्ट करे ) पंडित जी तैयार भी हो गए (और जगह भी लोगो ने ऐसा करवाया  होगा ) 
पर सीमा के पिताजी ने कहा, "नहीं, पूजा तो विधिवत दीवार पर ही होगी, क्या हुआ जो दीवार खराब हो जायेगी, फिर से पेंट करवा लेगा, शादी तो एक ही बार होती है ,ये सब शुभ है ' माता--पिता के बीच बैठा 'रिशु ' सर झुकाए बेबसी से सर हिला  रहा था। 

तब तक सीमा की छोटी बहने भी आ गयीं, उनलोगों ने भी मुझे पहचाना लिया था पर हैरान हो गयी थीं, मुझे वहाँ देख। जबकि मैंने तो किसी को नहीं पहचाना . सबको फ्रॉक में देखा था। 'सुषमा' जो तब नवीं कक्षा में थी ,आज उसका बेटा नवीं  में है। डिम्पल पांचवी में थी,और आज एक बेटे को गोद में लिए दुसरे की ऊँगली थामे खड़ी  थी। सब पुराने दिन याद  कर रहे थे। डिम्पल बता रही थी," हमेशा सीमा दी एक चिट्ठी लेकर आपके यहाँ दौड़ा देती .(तब फोन तो थे नहीं,छोटे भाई बहन ही सन्देश पहुंचाने  का काम किया करते थे )  एक बार बारिश हो रही थी,सीमा दी बीमार थी  और मैं छाता लेकर सीमा दी की चिट्ठी आपको देने  आयी थी। मैंने आपसे कहा था, 'सीमा दी अपनी किताबों पर सुन्दर सुन्दर हीरो हिरोइन, फूलो के कवर लगाती है, मुझे नहीं देती 'और आपने धर्मयुग और साप्ताहिक हिन्दुस्तान से कई पेज निकाल कर मुझे दिए थे "(तब हमलोग ब्राउन पेपर खरीद कर किताब कॉपियों पर कवर नहीं लगाते थे) 
सुषमा ने अटकते हुए कहा, "आप रश्मि रवि...रविजा नाम से मैगजीन में लिखती थीं न, अब भी लिखती हैं ?" अच्छा हुआ तीन साल पहले वो नहीं मिली वरना मुझे होंठ बिसूर कर जबाब देना पड़ता ," वो सब तो कब का छूट गया " 

हमलोग बातों में ही थे कि सीमा की भाभी आयी, "चलिए सबलोग 'मटकोर' की रस्म करनी है " इस रस्म में वर, वर की माँ और बाकी महिलायें ,तालाब या नदी के किनारे पूजा करने जाती  हैं। उनमे से दो औरतें सर पर घड़ा लेकर जाती हैं और नदी/तालाब से पानी भरकर सर पर रखकर लाती हैं। सबने मुझे आगे कर दिया। आप सीमा दी की सहेली  हैं,आपको तो सर पर घड़ा लेकर जाना ही होगा। सीमा की भाभी हाथों में सिंदूरदान लेकर आयी और नाक से लेकर सर तक सिंदूर लगा दिया। मैं प्लीज़ प्लीज़ कहती रह गयी पर सबका कहना था, फ्रेंड का बेटा यानि आपका बेटा , ये सब तो करना ही पड़ेगा। 
अब यहाँ नदी तालाब कहाँ, स्विमिंग पूल के किनारे पूजा करना तय हुआ। स्विमिंग पूल भी गैरेज के ऊपर बना हुआ है ,जहाँ कई सीढियां चढ़ कर जाना पड़ता है। स्विमिंग पूल के किनारे पूजा संपन्न हुई। वहीँ पास लगी फूलों की क्यारियों से थोड़ी मिटटी निकाल कर 'मटकोर' की रस्म पूरी की गयी। और स्विमिंग पूल से घड़े में पानी भरकर सर पर लिए हम लिफ्ट से बारहवीं मंजिल पर पहुंचे। 
यह अनुभव भी क्यूँ बाकी रहे, नदी-कुआँ-तालाब से घड़ा भर कर पानी लाना किस्से कहानियों फिल्मो में होता है . हकीकत में तो स्विमिंग पूल से भरा जाता है। :)

एक धान कूटने की रस्म भी होती है। जिसमे वर के साथ पांच औरतें आँगन में ओखली में मूसल  से धान कूटती हैं। यहाँ, बालकनी में स्टील की छोटी सी ओखली मूसल  रखी गयी  जो हर किचन में होती है, उसे छह लोग पकड़ें कैसे? एक ने दो ऊँगली से पकड़ा और बाकी लोगों ने उसके ऊपर अपनी अपनी ऊँगली रख दी। छह लोगों का छोटी सी बालकनी में खड़ा होना ही मुश्किल हो रहा था। चाहे जिस रूप में हो पर रस्में  सारी करनी थीं। बस मंगल गीतों की कमी खल रही थी। किसी को गीत आते ही नहीं। रिशु भी अच्छा बच्चा बने औरतों से घिरा सर झुकाए सारे रस्म चुपचाप किये जा रहा था . हमें तो बहुत मजा आ रहा था . पर ये सब शायद हमारी पीढ़ी तक ही सीमित रह जाए . न तो हमें इतने डिटेल में रस्में याद रहने वाली हैं कि अगली पीढ़ी को बताएं और न ही वो सब ये सारी  बातें मानने वाले हैं। 

वैसे भी यह शादी बहुत अलग सी है। शादी की रस्मों की शुरुआत सीमा ने अपने ससुराल 'दरभंगा' से की। वहां कुल देवता की पूजा की। मुंबई में 'हल्दी - मटकोर' की रस्म की .प्लेन से बारात भुवनेश्वर गयी, जहाँ शादी की रस्में होंगी । और शादी के बाद की रस्मे और रिसेप्शन 'कटिहार' में 

आज 14 फ़रवरी को प्रेम दिवस के दिन दोनों बच्चे विवाह सूत्र में बंधने जा रहे हैं। उन्हें ढेरों आशीर्वाद और असीम शुभकामनाएं .

बुधवार, 6 फ़रवरी 2013

क्या हम पीछे की तरफ लौट रहे हैं ??

कुछ मित्रों ने अपने अनुभव शेयर किये . एक मित्र दफ्तर से छुट्टी ले ,पहाड़ों की तरफ अकेले निकल गए। कोई प्लान नहीं, कोई शेड्यूल नहीं। शिमला, मसूरी, नैनीताल, ऋषिकेश  जिस जगह जब तक मन हुआ रुके और फिर आगे चल दिए। एक और मित्र हैं जो हर सन्डे आस-पास के गाँवों की तरफ निकल जाते हैं। खेतों में घूमते हैं, किसी किसान के साथ हल चलाते हैं, किसान के घर उसके परिवार संग उनका सादा सा भोजन करते हैं। गाँव के बच्चों के साथ पतंग उड़ाते हैं, कंचे खेलते हैं और शाम तक घर वापस।  

इस तरह के शौक बहुत कम लड़कों में ही होते हैं। पर वे अपने शौक पूरे कर तो पाते हैं। ऐसे ही ख्याल आया अगर किसी लड़की के भी ऐसे शौक हों तो क्या वह ऐसे बेधड़क, बेखटके, निडर होकर घूम पाएगी ?? अपनी यह उलझन फेसबुक पर लिख दी और फिर कई लोगो ने तो कहा यह संभव नहीं, वो ज़माना जाने कब आएगा .
 कुछ का यह भी कहना था कि सोचना  नहीं चाहिए निकल जाना चाहिए .अनुराधा मंडल जी ने कहा कि  वे तो अकेले निकल जाती हैं। मनीषा पांडे ने अपनी एक दोस्त के विषय में बताया कि  साइकिल से वो आधा राजस्थान घूम चुकी है।

एक सहेली से चर्चा की तो उसने अपने अनुभव बताये कि आज से बीस साल पहले कॉलेज के दिनों में वो ,उसकी छोटी बहन और दो और सहेलियां कुल चार लडकियां कहीं भी घुमने चली जाया करती  थीं। अचानक प्रोग्राम  बना और बैग उठा धर्मशाला, चंडीगढ़, शिमला ..कहीं भी जाने के लिए वो दिल्ली के बस स्टॉप की तरफ चल देती थीं। उक्त शहर में जाकर भी वे किसी बड़े या फ़ाइव स्टार होटल में नहीं ठहरती थीं बल्कि छोटे होटलों में रुकतीं ,आराम से तीन चार दिन तफरीह करतीं और फिर घर वापस। उनके माता -पिता ने भी उन्हें कभी नहीं रोका . उनके पैरेंट्स को उनपर पूरा विश्वास था। , वे लोग भी उनसे कुछ भी छुपाती नहीं थीं। उन दिनों मोबाइल फोन्स भी नहीं थे . पर पैरेंट्स उनकी सुरक्षा को लेकर आश्वस्त थे। 

पर अब पता नहीं यूँ बेफिक्र हो चार  टीनेज़ लडकियां किसी अनजान शहर में घूम सकती हैं या नहीं। क्या उनके पैरेंट्स उनकी सुरक्षा को लेकर उतने  ही आश्वस्त होंगे ?
तो क्या आज से बीस साल पहले लडकियां ज्यादा सुरक्षित थीं?
 क्या हम पीछे की तरफ लौट रहे हैं ??
जिन हब्बा खातून की शायरी से कश्मीर की वादियाँ गूंजती थीं अब तीन  बच्चियों का  एक बैंड 'प्रगाश ' का निर्माण कुफ्र हो गया। लड़कियों के मोबाइल रखने ,शाम को घर से बाहर निकलने पर पाबंदी। स्कूल के यूनिफॉर्म स्कर्ट और फ्रॉक की जगह सलवार कुर्ते दुपट्टे में बदल गए . लड़कियों पर अंकुश के रोज नए फरमान। 

कुछ लडकियां हिम्मत वाली होती हैं, अकेले कहीं भी चली जाती हैं। किसी ने चूं चपड़ की तो थप्पड़ जड़ देती हैं। ऐसी लड़कियों से सब डरते भी हैं। सीधी सादी लड़कियों को ही छेडछाड, फिकरों का ज्यादा सामना करना पड़ता है ( अपवादों को छोड़कर ) यह बात मैंने भी बहुत पहले ही जान ली थी। सत्रह वर्ष की उम्र में जो कहानी लिखी थी,उसमे भी जिक्र है ," उसे आत्मविश्वास दिया था उसकी ‘जूडो कराटे‘ की ट्रेनिंग ने...इनका इस्तेमाल करने की जरूरत तो नही ंपड़ी लेकिन इसने इतनी हिम्मत जरूर दे दिया कि ईंट का जवाब पत्थर से दे सके। और तब जाना कि लड़के भी छुई-मुई सी कतरा कर निकल जाने वाली... लेकिन इस कतराने के क्षण में भी जतन से सँवारे अपने रूप की एक झलक देने का मोह रखनेवाली लड़कियों को ही निशाना बनाते हैं। किसी ने स्वच्छंदता से खुल कर सामना करने की कोशिश की नहीं कि भीगी बिल्ली बन जाते हैं। 

आज सभी लड़कियों से अपील की जाती है कि वे बहादुर बने, किसी से डरें नहीं, सताने वाले को थप्पड़ जड़ दें, वगैरह वगैरह . पर हर लड़की एक सी नहीं होती। सबका स्वभाव एक जैसा नहीं होता। बस में धक्का लगने पर जहाँ एक लड़की पलट कर एक झापड़ रसीद कर देती है, वहीँ एक दूसरी लड़की खुद में ही और सिमट जाती है। और उसे और भी धक्के खाने पड़ते हैं। पर इसलिए कि वह आगे बढ़कर चिल्ला नहीं सकती, उल्टा थप्पड़ नहीं जड़ सकती ,उसे यह सब सहना पड़ेगा ?? 

यह सही नहीं है। यह स्थिति ही बदलनी चाहिए . लड़कियों के लिए सुरक्षित माहौल होना चाहिए .वे जहाँ चाहें बेखटके आ जा सकें। अंकुश अगर जरूरी है तो लड़के लड़कियों दोनों पर। इन सब बातों पर भी मेरी उस फ्रेंड का कहना था कि तब मोबाईल , टी वी , इंटरनेट का ज़माना नहीं  था। इन सबने युवाओं को और भी करप्ट कर दिया है। कच्चे मस्तिष्क पर इन सबका बहुत ही गलत प्रभाव पड़  रहा है। लड़के/लडकियां दोनों  फिल्मों , सीरियल्स में देखे प्रसंगों को अपने जीवन में उतारने की कोशिश करते हैं। और फिर खामियाजा भुगतते हैं। अदा ने अपनी पोस्ट में एक प्रकरण का जिक्र किया है ,जहाँ लड़कियों ने एक दुसरे की वस्त्रहीन तस्वीरें खींची थीं। उनकी किस्मत अच्छी थी कि उन्होंने एक भले लड़के को मोबाइल रिपेयर करने के लिए दिया और उसने वो तस्वीरें डीलीट कर दीं .किसी गलत हाथों में वो मोबाइल पड़ जाता तो वे लडकियां मुसीबत में पड़ सकती थीं। 

ऐसी हरकतों की एक और वजह हो सकती है, बंधन से आजादी महसूस करने कोशिश। जब ढेर सारे बंधन लगाए जाते हैं तो उन बंधनों के ज़रा सा ढीले पड़ते ही ऐसी हरकतें सामने आ जाती हैं। भेड़ बकरियों को भी अगर बाँध कर रखा जाता है तो दडबा खुलते ही वे सीधी सामने वाले रास्ते पर नहीं चलतीं, इधर उधर भागने लगती हैं। यही बात मानव स्वभाव के लिए भी कही जा सकती है .अगर उन पर विश्वास किया जाए, अनावश्यक बंधन न लगाएं जाएँ तो शायद वो अपना सही गलत खुद तय करें। विद्रोह जताने या यह महसूस करने के लिए कि वे कुछ भी करने के लिए आज़ाद हैं,  कुछ उल्टा-सीधा न करें। क्यूंकि कुछ लोग तो ऐसे होते  हैं जिन्हें बंधन की इतनी आदत पड़  जाती है कि बंधन खोल भी दिए जाएँ फिर भी वे उसी दायरे में घूमते हैं पर कुछ ऐसे भी हैं, जो सरपट भाग  निकलते हैं और नहीं देखते कि राह में खाई है या बड़े बड़े  गड्ढे। 

हालांकि जब कोई हादसा होता है तो उसे अंजाम देने वाले विकृत मनोवृत्ति के होते हैं। हाल में  जो दामिनी के साथ हुआ उन छह नरपिशाचों में से कोई भी इंटरनेट से प्रभावित तो नहीं था। वे स्वभाव से ही अधम थे। 
नयी नयी चीज़ों का आविष्कार होता रहेगा। विकास को तो अवरुद्ध नहीं किया जा सकता . लेकिन उसके इस्तेमाल के लिए बहुत ही सावधानी बरतने की जरूरत है। अगर लापरवाही बरती गयी तो उससे होने वाले फायदे के साथ नुकसान का खतरा भी उठाना ही पड़ेगा। 

बुधवार, 30 जनवरी 2013

पैसा क्या याददाश्त और संवेदनशीलता का इरेज़र है..

सबलोगो ने अपने जीवन में कुछ चरित्र ऐसे जरूर देखे होंगे जिन्होंने हमेशा दुसरो का भला किया , परिवार वालों के लिए खून-पसीना एक किया पर जब उन्हें जरूरत पड़ी तो परिवारवालों ने मुहं मोड़ लिया। ऐसा होता तो अक्सर है पर क्यूँ होता है? आखिर लोग इतने कृतघ्न क्यूँ हो जाते हैं, उनकी आँखों का पानी क्यूँ मर जाता है? आखिर इसके पीछे कैसी मानसिकता काम करती है ?क्या वे समझते हैं, उनका हक़ सिर्फ लेना है, और दुसरे का कर्तव्य उन्हें  देने का है ? जब उसे जरूरत पड़ी तो ये तो असमर्थ हैं क्यूंकि इन्हें देना तो आता ही नहीं इन्होने तो सिर्फ लेना ही सीखा है।


एक परिचिता  हैं। उनके पति पिछले  तीस साल से सऊदी अरब में काम कर रहे हैं। पिता की मृत्यु के बाद बहुत कम उम्र में ही वे 'सऊदी अरब' नौकरी पर चले गए। खुद को हर ख़ुशी से महरूम रखकर , दिन रात खून पसीने बहा कर  रुपये कमा कर भेजे और अपने दोनों भाईयों को पढाया -लिखाया, तीन बहनों की शादी की। खुद भी शादी की पर अपनी पत्नी और दोनों बेटों से दूर रहे। उनकी पत्नी और बच्चों ने भी साल  में बस एक महीने के लिए ही पति और पिता का प्यार जाना। दोनों भाइयों की शादी हो गयी, बहनें ससुराल चली गयीं। फिर भी जब भी जिसे जरूरत पड़ी, ये बड़े भाई हमेशा सहायता को तत्पर रहे।

 एक भाई को फ़्लैट  बुक करना है तो एक भाई के बेटे को इंटरनेशनल  स्कूल में पढ़ाना है, सबसे बड़े भाई ने मदद की । इनके बेटे को बाइक का शौक था, बेटे के लिए बाइक बुक भी कर दी। पर उनकी माँ  ने कहा छोटे भाई को गाडी लेनी है, उसे लोकल ट्रेन से ऑफिस आने-जाने में  दिक्कत होती है। बेटे को बाइक नहीं दिलाकर छोटे भाई के लिए गाड़ी खरीद दी।
सिर्फ पैसो से ही नहीं, मन से भी पिता सा स्नेह दिया। छोटी बहन को जब बार बार मिसकैरेज हो जा रहे थे तो पैदल चल कर 'सिद्धि विनायक मंदिर' गए और मन्नत मांगी । बहन के बेटे के जनम पर धूम धाम से पार्टी दी।

और आज वे कैंसर से जूझ रहे हैं। हॉस्पिटल में हैं। तो भाई-बहन कभी ऑफिस से छुट्टी न मिलने का, कभी बुखार का तो कभी  बच्चों के इम्तहान का बहाना बना कभी कभार घंटे भर के लिए हॉस्पिटल में झाँक लेते हैं। डॉक्टर ने उनके बीस वर्षीय बेटे को अपने केबिन में बुला कर बीमारी  की गंभीरता से अवगत करवाया। दो महीने में ही वह बीस साल का लड़का उम्र की कई सीढियां पार कर गया है। जहाँ उसके चाचा को पिता की जगह खड़े हो जाना चाहिए था, यह लड़का, अपनी माँ और अपने छोटे भाई को संभाल रहा है। उनकी पत्नी कहती हैं, हमें इनके भाई-बहनों से रुपये-पैसे नहीं चाहिए, बस प्यार और सांत्वना के दो बोल चाहिए, वो भी वे लोग नहीं दे सकते। जो ननदें कल तक बहनों जैसी थीं, फरमाइश करते नहीं थकती थीं, 'भैया से ये मंगवा दो ,वो मंगवा दो' आज भाई को देखने  की भी फुर्सत नहीं है उनके पास।
 पत्नी के  भाई गाँव में रहते हैं, खेती पर निर्भर हैं और अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ा रहे हैं, कभी अपनी  बहन और जीजाजी से एक पैसे की मदद नहीं ली . वे बारी बारी से आकर बहन को सहारा दे रहे है, उसे आश्वासन दे रहे हैं, रुपये-पैसे की फ़िक्र न करें ,इलाज में कमी नहीं होनी चाहिए , जरूरत पड़ने पर वे जमीन बेच देंगे। 
क्या पैसा धीरे -धीरे जमीर को खा जाता है, कोई संवेदना शेष नहीं रहती न ही याददाश्त में ही कुछ बचा रहता है?? पैसा सबकुछ इरेज़ कर देता है?  

 ये दुनिया सचमुच जीने लायक नहीं है। कहते हैं,नेकी कर दरिया में डाल . पर जो नेकी कर के दरिया में डाल  आता है, उसके साथ दुसरे भी नेकी कर दरिया में क्यूँ नहीं डाल आते ?
क्या नेकी करने का ठेका सिर्फ एक के पास ही होता है??

जाने क्यूँ प्यासा  का ये गीत बहुत याद आ रहा है 



शनिवार, 19 जनवरी 2013

अभी वक्त लगेगा, दिमाग की खिड़कियाँ खुलने में

हाल ही में कुछ दरिंदो द्वारा दामिनी की नृशंस हत्या ने पूरे देश को आंदोलित कर दिया है। और टी वी , पत्रिकाओं, फेसबुक और हमारे ब्लॉगजगत में भी समाज में स्त्रियों के स्थान , उनकी सुरक्षा, उनके अधिकार और कर्तव्य  पर जम कर चर्चा  हो रही है। 


जब भी ऐसी कोई घटना घटती है, कई चेहरों से मुखौटे  उतर जाते हैं। और उनकी सोच देख कर हैरानगी होती है। उच्च शिक्षित ,उच्च पद पर आसीन लोगों की सोच इतनी सतही कैसे हो सकती है? इसमें स्त्री-पुरुष दोनों शामिल हैं। लोग ऐसी ऐसी प्रतिकियाएं देते हैं कि उनकी बुद्धि पर तरस ही खाया जा सकता है। और यह भी आशंका होती है कि ऐसी सोच रखने वाले लोग,अपने घर की स्त्रियों की कितनी सहायता कर पाते होंगे ?, उन्हें आगे बढ़ने के कितने मौके देते होंगे ?

पर ऐसा है क्यूँ ? मुश्किल ये है कि समाज में पुरुषों के स्थान, उनके अधिकार-कर्तव्य ,उनकी जीवन शैली में समय के साथ कोई बदलाव नहीं आया है। आज भी घर के मुखिया वही होते हैं। घर से या के घर सदस्यों से सम्बंधित महत्वपूर्ण निर्णय लेने का अधिकार उनके पास ही होता है। घर की देखभाल,वे अपना कर्तव्य मानते हैं। और उनकी जीवनशैली होती है, घर से बाहर  जाकर पैसे कमा कर लाना और फिर घर में आराम फरमाना, उनके खाने-पीने, कपडे लत्ते  का ख्याल घर की महिलायें ही रखती  हैं चाहे वे माँ हो या फिर पत्नी।

लेकिन महिलाओं की जीवन शैली में आमूल चूल परिवर्तन आ चुका  है। आज भी अधिकाँश महिलायें, घर का ख्याल रखते हुए गृहणी का ही रोल अदा  करती हैं। पर पहले जहाँ वे लकड़ी के चूल्हे पर काम करती थी, फिर कोयले के चूल्हे, मिटटी तेल के स्टोव पर काम करने लगीं। पर अब गाँव गाँव में भी गैस के चूल्हे का प्रवेश हो चुका  है। अब बिना धुएं के बिना हकलान हुए बस नॉब घुमाती हैं और चूल्हा जल जाता है। मिक्सर  में सेकेण्ड भर में मसाला पिस जाता है, वाशिंग मशीन में कपड़े  धुल जाते हैं। 

पुरुषों को सुबह का चाय-नाश्ता, दोपहर का खाना, रात्रि-भोजन  हमेशा से सामने परस कर मिलता है। अब ये खाना, लकड़ी के चूल्हे पर बना है या गैस के इस से उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। इसी तरह उनके कपडे भी धुले- प्रेस किये हुए आलमारी में सहेजे हुए मिलते हैं . अब वे कपडे जमीन पर पटक पटक कर धोये गए हैं, या वाशिंग मशीन में ,लोहे वाली इस्त्री से आयरन किये गए हैं या बिजली वाले, इस से उन्हें क्या मतलब? उनकी दिनचर्या तो सदियों से वही चली आ रही है। टेबल पर खाना हाज़िर ,  आलमारी में तहाये हुए कपड़े, व्यवस्थित .
सुबह उठे, अखबार पढ़ा, इंटरनेट पर समय बिताया, नहा  धोकर गंदे कपड़े बदल कर इस्त्री किये हुए कपडे पहने ,काम पे गए ,शाम को वापस आये, चाय पी, धुले हुए कपडे पहने ,टी वी देखा ( पहले रेडियो पर समाचार सुनते थे ),खाना खाया , नींद आयी तो साफ़-सुथरा बिस्तर भी सामने।

अगर स्त्री भी घर से बाहर जाकर काम करती  है , फिर भी पति की दिनचर्या में कोई बदलाव नहीं होता। स्त्री सुबह उठ  कर वैसे ही  किचन में जाती है, कपड़ो का ख्याल रखती है, बच्चो का ख्याल रखती है, शाम को फिर से किचन का रुख करती है । हाँ, जहाँ दिन में ,थोड़ी देर आराम कर लिया करती  थी, अब सारा दिन ऑफिस में  काम करती है।
स्त्रियों के पहनावे में भी बदलाव आया है। अब सर पर पल्लू नहीं है, साड़ी की जगह सलवार-कमीज़ और जींस ने ले ली है . पर पुरुषों के लिए वही पैंट कमीज़। 

इन सबसे इतर, घर में पुरुषों के नाज़-नखरे (pampering ) भी उठाये जाते हैं। बढ़िया भोजन, दूध-फल ,उन्हें देने के बाद ही  स्त्री खाती है बल्कि अक्सर नहीं ही खाती है। और बहुत कम घरों में ऐसा होता  है कि पुरुष भी स्त्री के खाने-पीने का उतना ही ख्याल रखें। और यह सब पुरातन जमाने से चला आ रहा  है। 

तो कहने का अर्थ यह है कि जब पुरुषों के जीवनचर्या में कोई बदलाव आया ही नहीं तो एकाएक उनके विचार, उनकी मानसिकता कैसे बदल जायेगी?? उनका रोल नहीं बदला है और इसी तरह वे स्त्री को भी बदले हुए रोल में स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं।  अब स्त्रियाँ,आँखें मूँद कर उनकी बात नहीं मान रही हैं। वे भी अपनी इच्छा-अनिच्छा जाहिर कर रही हैं। उनकी गलत बातों का विरोध कर रही हैं। तो पुरुषों के अहम् को ठेस लग रही है। जो स्त्री अब तक चारदीवारी में कैद थी। उनका हर कहा मानती थी। पति-बेटे ने जैसा कपडा ला दिया, पहन लिया। जहाँ घुमाने ले गए चली गयीं  .अब वे अपनी पसंद-नापसंद  बताती  हैं। इनकार भी कर देती हैं, कहीं जाने से। 

और स्त्रियों के इस बदले हुए रूप से पुरुष कैसे सामंजस्य करे ,समझ नहीं  पा रहा। पुरुषों को  मदद की जरूरत है। उनके दिमाग की खिड़कियाँ खुलने में अभी वक्त लगेगा। क्यूंकि यह सब उनके लिए बहुत ही असुविधाजनक भी है। वे स्त्रियों को घर के अन्दर सहमी-सिकुड़ी से देखने के आदी थे, अब सडकों पर यूँ बेख़ौफ़ घूमते देखेंगे तो असहज तो होंगे ही।

अगर वे किसी महिला को आत्मविश्वास से लबरेज़, आत्मनिर्भर  देखते हैं तो थोडा सा डर जाते हैं, थोड़े सशंकित होते हैं कि कहीं वो उनसे आगे न निकल जाए या फिर उनके घर की स्त्रियाँ जो अब तक उनके शासन में हैं, कहीं वे उक्त स्त्री का अनुकरण न करने लगें . और वे उसकी भरपूर आलोचना करते हैं, उसकी योग्यता को नकारने की पूरी कोशिश करते हैं। उसके कपड़ों पर , उसके काम पर , उसके घुमने-फिरने सब पर अंगुली उठायी जाती है। 

 इस तरह की सोच अकेले पुरुष की ही नहीं महिलाओं की भी हो सकती है जैसा हमने हाल में ही उनके बयान देखे किसी महिला वैज्ञानिक ने दामिनी के चुपचाप  आत्मसमर्पण नहीं करने के फैसले को गलत बताया था तो किसी महिला ने उसके शाम को घर से बाहर रहने को गलत ठहराया था। इन महिलाओं की सोच भी पुरुषवादी सोच ही होती है, वे भी हर बात में पुरुषों का वर्चस्व ही सर्वोपरि  मानती हैं। 

यह  पुरुषवादी सोच जल्दी नहीं बदलने वाली , ऐसी सोच का विरोध, इसकी आलोचना  जारी रहनी चाहिए  पर इस सोच के बदलने की स्त्रियों को धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा करनी पड़ेगी। और शायद पूरी तरह ये सोच तभी बदलेगी जब हमारे देश की एक -एक लड़की शिक्षित और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो जायेगी . हालांकि इस बात का संतोष और ख़ुशी भी है, गिने-चुने ही सही पर कुछ पुरुष हैं जो स्त्री का अलग अस्तित्व ,उनके अलग व्यक्तित्व को स्वीकार करते हैं और उनका सम्मान भी करते हैं। बस इनकी संख्या में लगातार इज़ाफे की ही तमन्ना है, हर स्त्री को। 

शुक्रवार, 11 जनवरी 2013

एक रोचक संवाद


बेटा अति उत्साहित स्वर में "पता है माँ,  आज क्या हुआ ?"
माँ --"कुछ बहुत इम्पोर्टेंट बात है ? "
बेटे के स्वर में थोड़े से उत्साह की कमी -- "नहीं इम्पोर्टेंट तो नहीं, इंटरेस्टिंग है "
"अभी टी वी पर कितना हीटेड डिस्कशन चल रहा है, ब्रेक में बात करें ?"
"हाँ ठीक है " बेटा भी टी वी पर नज़रें गड़ा  देता है .
ब्रेक में माँ को किचन का कोई काम ध्यान आ जाता है और वो उठ कर चली जाती है। 
प्रोग्राम ख़त्म होने पर बेटा थोड़े से शंका भरे स्वर में पूछता है ," अब सुनोगी ?"
"हाँ किचन में चलें, खाना लगाने की तैयारी करते हुए बता देना "

"ओके" कहते बेटा किचन में आकर पुनः उत्साह में बात शुरू करता है ," आज एक फ्रेंड के साथ एक छोटे से रेस्टोरेंट में गया था , हमारी बगल वाली टेबल पर एक आदमी अकेला बैठा था . तभी छह लोगो का एक बड़ा सा ग्रुप आया रेस्टोरेंट वालो ने हमसे रिक्वेस्ट किया कि उन अकेले बैठे आदमी की टेबल पर चले जाएँ। इनके लिए टेबल खाली  कर दें .हमें अच्छा नहीं लगा, फिर भी हम चले गए। वहां बैठे उस आदमी से इंट्रो हुआ, उसने बताया वो अमुक कंपनी ( एक मल्टी नेशनल ) में काम करता है। बहुत फ्रेंडली था, थोड़ी देर बातें की फिर वो अपनी सैंडविच ख़त्म कर चला गया। थोड़ी देर बाद हमने भी अपना सूप ख़त्म किया और जब वेटर से बिल लाने को कहा तो वेटर ने बोला  "आप दोनों का बिल तो उस व्यक्ति ने चुका  दिया है . हमें बड़ा अजीब लगा फिर हम भागते हुए होटल से बाहर आये तो देखा वो अपनी मोटरसाइकिल स्टार्ट करके जा रहा था . हमने उनसे थैंक्स कहा और ये भी कहा, 'ऐसा  क्यूँ किया आपने ?'

वे हँसते हुए कहने लगे ,"कोई बात  नहीं मैं अक्सर यहाँ आता हूँ अगली बार आप हमारा बिल दे देना, हम मिलते रहेंगे ." उसने फिर से गर्मजोशी से हाथ मिलाया और चला गया . तुरंत मैंने और मेरे फ्रेंड ने उसका नाम गूगल किया तो पता चला वो तो बिग शॉट है।  अपने डिपार्टमेंट का हेड है " 

अब एक बड़ी मल्टीनेशनल कम्पनी के एक डिपार्टमेंट के हेड ने एक स्टूडेंट से इतनी आत्मीयता से बात की , बेटा इस बात से रोमांचित था। पर माँ उसके रोमांच पर ठंढा पानी डालने के लिए ग्लास ही नहीं पूरा जग लिए बैठी थी। 

"तुम्हे कैसे पता वह आदमी सच बोल रहा है , कहीं उसने अपने डिपार्टमेंट के हेड का नाम ले लिया होगा "
" माँ , नेट पर उसके प्रोफाइल के साथ  उसकी तस्वीर भी थी, ये वही आदमी था " बेटा  जोर देकर कहता है .
"तो फिर वह बाइक पर क्यूँ  सवार था ,उसे तो किसी  फैंसी कार में होना चाहिए था ?"
"वो फैंसी बाइक ही थी, पता है वो बाइक कितने की आती है? पंद्रह लाख की "

माँ ने खुद को घिरता हुआ पाकर दूसरा पॉइंट  ढूंढ लिया "वो इतने छोटे रेस्टोरेंट में क्यूँ  आया था  ?"

"इस रेस्टोरेंट का चिकन सूप और सैंडविच बहुत मशहूर है, दूर दूर से लोग आते हैं, हो सकता है वो अपने स्टूडेंट डेज़ से यहाँ आता हो ,पता है कितने बड़े बड़े लोग कैसी कैसी जगहों पर अपने टेस्ट का खाने के लिए जाते हैं? पढ़ा था मैंने मुकेश अम्बानी, सलमान खान वगैरह  कहाँ जाते हैं ,पर जाने दो नहीं बताऊंगा वरना फिर कुछ सवाल शुरू हो जाएगा। कुछ कहना ही बेकार है " और बेटा मुहं फुला कर चला गया।

अब वो माँ  इस रूठे बेटे को कैसे मनाये  :):)

{अब पढ़कर ये मत कहियेगा  कि रश्मि रविजा  तो कुछ भी लिखती है .  PD का कहना है, मेरा ब्लॉग है, मैं उसमे बस इतना लिखुं  "आज मैंने एक ग्लास पानी पिया " तो :):) }

शनिवार, 5 जनवरी 2013

संवेदनाएं जगाने के लिए किसी क़ानून की जरूरत नहीं

दामिनी / निर्भया के साहस और बलिदान ने हमारे देशवासियों को जैसे सोते से जगा दिया है। अब ये बात दीगर है कि कब तक ये आँखें खुली रह पाती  है। नए क़ानून का निर्माण , मौजूद कानूनों को सख्ती से लागू करना, दोषियों  को कड़ी सजा देना , महिला पुलिस की नियुक्ति जैसी बातें हो रही हैं .कितनी तत्परता से इन्हें  लागू किया जाएगा , ये कितनी सफल होगीं .यह तो आने वाला वक़्त ही बतायेगा। 

पर इस आन्दोलन ने इतना जरूर किया है कि जो विषय परिवार के बीच  वर्जित था। जिस पर बात  करने से लोग कतराते थे। चर्चा करते भी थे तो बड़े  ढंके छुपे शब्दों में ,अब खुलकर इस पर बात हो रही है। कम से कम समाज यह स्वीकार तो कर रहा है कि इस तरह की व्याधि समाज में व्याप्त है। रुग्ण  मानसिकता वाले लोग समाज में हैं। लडकियां यह सब झेल रही हैं। अगर किसी लड़की के साथ छेड़छाड़ होती है तो दोष उस लड़की का नहीं है, चुप उसे नहीं रहना है बल्कि उस अपराधी को चुप कराना  है . पर अब तक बिलकुल उल्टा होता आया है। लडकियां भी इसे शर्म का विषय मान कर चुप रहती आयी हैं और दुराचारियों की हिम्मत इस से बढ़ी ही है। 

अमेरिका में रहने वाली एक भारतीय लड़की ने बहुत ही व्यथित और आक्रोशित होकर  अपने अनुभव शेयर किये हैं। वह उन्नीस वर्ष की थी, एक शाम बस से घर लौट रही थी। पास खड़े एक आदमी ने उसे हाथ लगाया उसने जोर से चिल्ला कर विरोध प्रकट किया और उस आदमी को डांटा . उसके साथ पहले भी जब किसी ने ऐसी हरकत की थी ( पब्लिक ट्रांसपोर्ट में यह आम है ) उसके चिल्लाने पर कंडक्टर उस आदमी को बस से उतार देता था। वह खुश हो जाती  कि 'उसने विरोध किया, उस आदमी को सजा मिली और अब वह ऐसी हरकत नहीं करेगा।'

 इस बार भी वह लड़की कुछ ऐसी ही अपेक्षा कर रही थी पर इस कंडक्टर ने कहा, "दूसरी जगह जाकर खड़ी  हो जाओ"
उस लड़की ने कहा, "मैं क्यूँ दूसरी जगह जाऊं?? आप इसे बस से उतरने के लिए कहिये" और उसी वक़्त पास खड़े उस आदमी ने उस लड़की को चूम लिया " पूरी बस चुपचाप तमाशा देखती रही . ये लड़की गुस्से में चिल्लाती रही,वह आदमी  मुस्कुराता  रहा और बस के लोग चुपचाप देखते रहे (उसमें महिलायें भी होंगी ) पर यह उनकी बहन या बेटी नहीं थी ,इसलिए सब चुप थे। उसके लगातार गुस्सा करने  पर कंडक्टर ने उस लड़की को ही  बस से उतार दिया। 

इस लड़की ने बस का नंबर  नोट किया। घर आकर पिता को बताया .पिता उसे लेकर पुलिस स्टेशन जाना चाहते थे पर उसकी माँ ने कहा 'एक टीनेज लड़की को लेकर पुलिस स्टेशन जाना ठीक नहीं, और फिर लोग पता नहीं क्या बातें बनाएं' (माँ का सोचना भी गलत नहीं था, समाज ही ऐसा है ) पुलिस स्टेशन फोन किया गया कि उनके पास बस का नंबर है वे ड्राइवर और कंडक्टर के खिलाफ रिपोर्ट लिखाना चाहते हैं . पिता को बार बार अपने 'गजटेड अफसर' होने का जिक्र करना पड़ा तब उनकी बात सुनने  को कोई तैयार हुआ। दस मिनट बाद एक महिला पुलिस ऑफिसर ने फोन करके कहा, " अगर हम FIR फाइल करते हैं तो वो आदमी तो पकड़ा नहीं जाएगा, हमें ड्राइवर और कंडक्टर को सस्पेंड करना पड़ेगा . ड्राइवर और पुलिस ने अपने युनियन में शिकायत कर दी तो वे स्ट्राइक पर चले जायेंगे .फिर स्ट्राइक  की बात  अखबारों में आएगी, आपका नाम आएगा, बेकार बदनामी होगी ,मेरी सलाह है भूल जाइये इस घटना को "

जब उसने कॉलेज में इस घटना के बारे में बताया तो एक लड़के ने उसके पीठ पीछे कहा, "पागल है क्या ये लड़की, इस तरह की बातें कोई बाहर में करता है ??", यही सबसे बड़ी गलती है हमारे समाज की। जो ऐसी हरकते करे ,उसे कुछ न कहा जाए  बल्कि शायद वह अपने दोस्तों में शेखी भी बघारे 'आज तो उसने ऐसा किया' पर जिसके साथ ऐसी हरकत की जाए वह लड़की चुप रहे। उस लड़की ने ये भी लिखा है कि इसके पहले कि  ये पढ़ते हुए लोग सोचने लगें कि मैंने क्या पहना हुआ था जो उस आदमी ने ऐसी हरकत की तो ये बता दूँ कि  मैंने सलवार कुरता दुपट्टा पहना हुआ था " 
शायद ये सब पढ़ते हुए यह ख्याल भी आये लोगो के मन में कि वह लड़की , कंडक्टर की बात मान कर दूर क्यूँ नहीं खड़ी  हो गयी ? अब भुगते जैसा दामिनी के लिए भी लोगो ने कहा, उसे आत्मसमर्पण कर देना चाहिए था, उसने उस बस में लिफ्ट ही क्यूँ ली? लोग ये नहीं सोचते कि पूरी भरी बस में से लोगो ने उस आदमी को पीट क्यूँ नहीं दिया। कम से कम वह आगे ऐसी हरकत करने से तो डरता पर छोड़ देने से तो उसे और बढ़ावा ही मिल गया। 
 आखिर लडकियां कब तक ऐसी हरकतों को नज़रंदाज़ कर दूर जाकर खड़ी  होती रहें। अगले कितने साल, अगली कितनी सदी तक???

उस लड़की ने आगे लिखा है, "पिछले आठ साल से वह इस घटना को भूलने की कोशिश कर रही है। पर उस आदमी  की वह हरकत और उपहास भरी हंसी वह भूल नहीं पायी है। उस आदमी को सजा देना चाहती है,उसकी हंसी छीन लेना चाहती है ". वह इतनी दुखी है कि कहती है ,'अच्छा है अब मैं अमेरिका में हूँ और मैं नहीं चाहती कि  वापस लौटूं और अपनी बेटी को ऐसे माहौल में बड़ा करूँ ?"
क्या हम उसे ऐसा सोचने के लिए स्वार्थी कह सकते हैं ? नहीं कह सकते क्यूंकि हम सब यहाँ स्वार्थी हैं। जब तक खुद पर न गुजरे निरपेक्ष बने रहते हैं।

उस लड़की को यह सब झेले तो आठ साल ही हुए हैं, इसके मुकाबले एक छोटी सी घटना ही है ,पर उस  घटना को पच्चीस साल हो गए हैं फिर भी मुझे  अक्सर ख्याल आता है कि लोग ऐसे उदासीन कैसे हो सकते हैं ? 

मैं कॉलेज में थी और 'तिलैया सैनिक स्कूल' में पढनेवाले अपने भाई से मिलकर माँ  के साथ बस से 'तिलैया'  से 'रांची'  जा रही थी। बस में चढ़ी तो बस बिलकुल खाली सी थी। बहुत कम लोग थे पर जितने भी लोग थे, पूरी बस में पसरे हुए थे। सबने विंडो सीट ली हुई थी। हर सीट पर अकेला आदमी बैठा था पर खिड़की के पास।माँ ने,  सबसे आग्रह किया कि किसी दूसरे  के साथ बैठ जाएँ . विंडो  सीट मुझे दे दें, मैं खिड़की के पास बैठ जाती , माँ मेरे बगल में बैठ जातीं तो मैं सुरक्षित रहती .पर एक आदमी भी अपनी सीट से नहीं उठा, उदासीन सा सर उठा कर दूसरी सीट की तरफ इशारा करता, 'उनसे कहिये न, उठने को ' वो आदमी दूसरे से कहता पर कोई अपनी जगह से नहीं हिला  क्यूंकि उनके घर की कोई लड़की तो थी नहीं, वे क्यूँ परवाह करें। कंडक्टर ने माँ से कहा ,आप बीच में बैठ जाइये  लड़की  को किनारे बिठा दीजिये "  पर मुझे उन सबको देख कर इतना गुस्सा आया था कि मैं बस से उतर गयी और दूसरे  बस का इंतज़ार करने लगी कि उसमें तो कोई महिला यात्री होगी। दूसरी बस में महिला यात्री भी मिल गयीं और मुझे विंडो सीट भी।  मेरे दो घंटे जरूर बर्बाद हो गए।
पर यह घटना मुझे अक्सर याद आती है, आखिर उस बस में  सवार लोग एक संस्कारवान मध्यमवर्गीय परिवार से ही होंगें पर इतने उदासीन  कैसे हो सकते हैं ? 

सरकार से नए कानून  बनाने की , दोषियों को कड़ी सजा देने की ,महिलाओं के सुरक्षित माहौल की मांग तो हम जरूर कर रहे हैं पर इस से पहले हमें एक समाज के रूप में जागना होगा। अपने परिवार से आगे बढ़कर सोचना होगा। 
यह प्रण  लेना होगा, किसी भी पब्लिक प्लेस पर किसी लड़की को कोई तंग करे तो गर्दन घुमा कर दूसरी तरफ नहीं देखने लगेंगे बल्कि चारों तरफ एक बार नज़र घुमा कर पहले ही देख लेंगे कि कोई लड़की अपने पास किसी की उपस्थिति से असुविधाजनक तो महसूस नहीं कर रही . 

रास्ते के किनारे किसी घायल को पड़े देख नज़रें फेर आगे नहीं बढ़ेंगे, ये नहीं सोचेंगे कि अभी घर जाकर जल्दी सोना है क्यूंकि कल ऑफिस जाना है, बच्चों को सुबह स्कूल भेजना है। एक दिन बच्चे स्कूल नहीं गए, बॉस की डांट खा ली तो ज़िन्दगी नहीं रुक जायेगी पर समय पर किसी की मदद नहीं की तो उनकी ज़िन्दगी जरूर चली जायेगी। जितने लोग इस आन्दोलन में शामिल हुए , अपनी प्रतिक्रियाएं दीं , दुखी हुए अगर उतने लोग ही अपने आस-पास का माहौल बदलने की शुरुआत कर दें तो कुछ तो बदलेगा .

इन सबके लिए कोई कानून बनाने की जरूरत नहीं है। 

हम थोड़ी सी अपनी संवेदनाएं जगायेंगे , दूसरों की मदद के लिए आगे आयेंगे ,अपनी सोच बदलेंगे तो  आस-पास अपने आप बदलने लगेगा। और दुनिया रहने लायक बनने लगेगी तब इस देश की कोई बेटी दुखी होकर नहीं कहेगी कि 'मुझे अपने वतन नहीं लौटना.'

बुधवार, 2 जनवरी 2013

माँ नी मेरी मैं नई डरना....


नया साल आ गया, तारीख बदल गयी, उम्मीद है, इस वर्ष कुछ तो बदलेगा 

31दिसंबर 2012 को You Tube पर कड़वी सच्चाई बयान करता हुआ एक जोशीला गीत रिलीज़ हुआ . इस गीत को बनाने वालों (Swangsongs ) ने अपनी पहचान नहीं बतायी है बल्कि सिर्फ गीत के जरिये दिया सन्देश ही महत्वपूर्ण माना है।

 इस गीत का एक एक शब्द बहुत ही प्रभावी है। 
माँ नी मेरी मैं नई डरना .                                                                                                                                                                                                                                                                                         




 




जावेद अख्तर  की ये ग़ज़ल बड़ी मौजूं लग रही है ,इस माहौल में 

वो  ढल  रहा  है  तो  ये  भी रंगत बदल रही है 
जमीन, सूरज की उँगलियों से फिसल रही है 

जो मुझे जिंदा जला रहे हैं, वे बेखबर हैं 
 कि मेरी ज़ंजीर धीरे धीरे पिघल रही है 

 मैं क़त्ल तो हो गया, तुम्हारी गली में लेकिन 
 मेरे लहू से तुम्हारी दीवार गल रही है 

 न जलने पाते थे ,जिनके चूल्हे भी हर सवेरे 
सुना है, कल रात से वो बस्ती भी जल रही है 

 मैं समझता हूँ कि खामोशी में ही समझदारी है 
 मगर यही समझदारी मेरे दिल को खल रही है 

 कभी तो इंसान ज़िन्दगी की करेगा इज्ज़त 
 ये एक उम्मीद आज भी दिल में पल रही है

फिल्म The Wife और महिला लेखन पर बंदिश की कोशिशें

यह संयोग है कि मैंने कल फ़िल्म " The Wife " देखी और उसके बाद ही स्त्री दर्पण पर कार्यक्रम की रेकॉर्डिंग सुनी ,जिसमें सुधा अरोड़ा, मध...