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बुधवार, 2 जनवरी 2013

माँ नी मेरी मैं नई डरना....


नया साल आ गया, तारीख बदल गयी, उम्मीद है, इस वर्ष कुछ तो बदलेगा 

31दिसंबर 2012 को You Tube पर कड़वी सच्चाई बयान करता हुआ एक जोशीला गीत रिलीज़ हुआ . इस गीत को बनाने वालों (Swangsongs ) ने अपनी पहचान नहीं बतायी है बल्कि सिर्फ गीत के जरिये दिया सन्देश ही महत्वपूर्ण माना है।

 इस गीत का एक एक शब्द बहुत ही प्रभावी है। 
माँ नी मेरी मैं नई डरना .                                                                                                                                                                                                                                                                                         




 




जावेद अख्तर  की ये ग़ज़ल बड़ी मौजूं लग रही है ,इस माहौल में 

वो  ढल  रहा  है  तो  ये  भी रंगत बदल रही है 
जमीन, सूरज की उँगलियों से फिसल रही है 

जो मुझे जिंदा जला रहे हैं, वे बेखबर हैं 
 कि मेरी ज़ंजीर धीरे धीरे पिघल रही है 

 मैं क़त्ल तो हो गया, तुम्हारी गली में लेकिन 
 मेरे लहू से तुम्हारी दीवार गल रही है 

 न जलने पाते थे ,जिनके चूल्हे भी हर सवेरे 
सुना है, कल रात से वो बस्ती भी जल रही है 

 मैं समझता हूँ कि खामोशी में ही समझदारी है 
 मगर यही समझदारी मेरे दिल को खल रही है 

 कभी तो इंसान ज़िन्दगी की करेगा इज्ज़त 
 ये एक उम्मीद आज भी दिल में पल रही है

बुधवार, 21 जुलाई 2010

जावेद अख्तर की तरकश से एक और ख़ूबसूरत तीर

अब जबतक जावेद अख्तर की 'तरकश' मेरे पास रहेगी और दूसरे ब्लॉग पर कहानी चलती रहेगी आपलोगों  को उसमे की चुनिन्दा नज्में पढवाती रहूंगी


मुअम्मा ( पहेली )

हम दोनों जो  हर्फ़  थे

हम इक  रोज़ मिले

इक लफ्ज़ बना

और हमने इक माने पाए

फिर जाने क्या हम पर गुजरी

और अब यूँ है

तुम इक हर्फ़ हो

इक खाने में

मैं इक हर्फ़ हूँ

इक खाने में

बीच में

कितने लम्हों के खाने खाली हैं

फिर से कोई लफ्ज़ बने

और हम दोनों इक माने पायें

ऐसा हो सकता है

लेकिन सोचना होगा

इन खाली खानों में हमें भरना क्या है

(हर्फ़- अक्षर) (लफ्ज़ -शब्द) (माने-अर्थ)

मंगलवार, 18 मई 2010

जावेद अख्तर की एक प्यारी सी नज़्म

,


अक्सर मेरे एक  ब्लॉग का मूड  दूसरे ब्लॉग पर भी परिलक्षित होता है, 'मन का पाखी' पर  कहानी ने कुछ गंभीर मोड़ लिया तो बैलेंस करने को यहाँ कुछ  हल्का फुल्का लिखना पड़ा.यहाँ निरुपमा के बहाने लड़कियों के प्रति माता-पिता की उदासीनता के विषय में लिखा तो मन इतना खिन्न हो गया कि एक  हफ्ते तक ,कहानी की अगली किस्त नहीं  लिख पायी...(ढेर सारी शिकायतें भी सुननी पड़ीं :)) अब वहाँ कहानी एक सुखद मोड़ पर समाप्त हो गयी है, तो कुछ गंभीर लिख, मूड बिगाड़ने का मन नहीं हो रहा....

अपने कॉलेज के दिनों में ही वो लम्बी कहानी लिखी थी और उन्ही दिनों...उन्हीं पन्नो के बीच  'जावेद अख्तर'  की ये  नज़्म भी कहीं से नोट की थी,जो मुझे काफी पसंद थी...सोचा आपलोगों को भी पढवा दी जाए और जिन लोगों ने पढ़ रखी हो,उन्हें उसकी याद दिला दी जाए

नज़्म

मैं भूल जाऊं तुम्हे
अब यही मुनासिब है .
मगर भुलाना भी चाहूँ तो किस तरह भूलूँ
कि तुम तो फिर भी हकीकत हो
कोई ख्वाब नहीं.
यहाँ तो दिल का ये आलम है ,क्या कहूँ
कमबख्त !!
भुला ना पाया ये, वो सिलसिला
जो था ही नहीं
वो इक ख़याल
जो आवाज़ तक गया ही नहीं
वो एक बात
जो मैं कह नहीं सका तुमसे
वो एक रब्त
जो हम में कभी रहा ही नहीं
मुझे है याद वो सब
जो कभी हुआ ही नहीं.

फिल्म The Wife और महिला लेखन पर बंदिश की कोशिशें

यह संयोग है कि मैंने कल फ़िल्म " The Wife " देखी और उसके बाद ही स्त्री दर्पण पर कार्यक्रम की रेकॉर्डिंग सुनी ,जिसमें सुधा अरोड़ा, मध...