हाल ही में कुछ दरिंदो द्वारा दामिनी की नृशंस हत्या ने पूरे देश को आंदोलित कर दिया है। और टी वी , पत्रिकाओं, फेसबुक और हमारे ब्लॉगजगत में भी समाज में स्त्रियों के स्थान , उनकी सुरक्षा, उनके अधिकार और कर्तव्य पर जम कर चर्चा हो रही है।
जब भी ऐसी कोई घटना घटती है, कई चेहरों से मुखौटे उतर जाते हैं। और उनकी सोच देख कर हैरानगी होती है। उच्च शिक्षित ,उच्च पद पर आसीन लोगों की सोच इतनी सतही कैसे हो सकती है? इसमें स्त्री-पुरुष दोनों शामिल हैं। लोग ऐसी ऐसी प्रतिकियाएं देते हैं कि उनकी बुद्धि पर तरस ही खाया जा सकता है। और यह भी आशंका होती है कि ऐसी सोच रखने वाले लोग,अपने घर की स्त्रियों की कितनी सहायता कर पाते होंगे ?, उन्हें आगे बढ़ने के कितने मौके देते होंगे ?
पर ऐसा है क्यूँ ? मुश्किल ये है कि समाज में पुरुषों के स्थान, उनके अधिकार-कर्तव्य ,उनकी जीवन शैली में समय के साथ कोई बदलाव नहीं आया है। आज भी घर के मुखिया वही होते हैं। घर से या के घर सदस्यों से सम्बंधित महत्वपूर्ण निर्णय लेने का अधिकार उनके पास ही होता है। घर की देखभाल,वे अपना कर्तव्य मानते हैं। और उनकी जीवनशैली होती है, घर से बाहर जाकर पैसे कमा कर लाना और फिर घर में आराम फरमाना, उनके खाने-पीने, कपडे लत्ते का ख्याल घर की महिलायें ही रखती हैं चाहे वे माँ हो या फिर पत्नी।
लेकिन महिलाओं की जीवन शैली में आमूल चूल परिवर्तन आ चुका है। आज भी अधिकाँश महिलायें, घर का ख्याल रखते हुए गृहणी का ही रोल अदा करती हैं। पर पहले जहाँ वे लकड़ी के चूल्हे पर काम करती थी, फिर कोयले के चूल्हे, मिटटी तेल के स्टोव पर काम करने लगीं। पर अब गाँव गाँव में भी गैस के चूल्हे का प्रवेश हो चुका है। अब बिना धुएं के बिना हकलान हुए बस नॉब घुमाती हैं और चूल्हा जल जाता है। मिक्सर में सेकेण्ड भर में मसाला पिस जाता है, वाशिंग मशीन में कपड़े धुल जाते हैं।
पुरुषों को सुबह का चाय-नाश्ता, दोपहर का खाना, रात्रि-भोजन हमेशा से सामने परस कर मिलता है। अब ये खाना, लकड़ी के चूल्हे पर बना है या गैस के इस से उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। इसी तरह उनके कपडे भी धुले- प्रेस किये हुए आलमारी में सहेजे हुए मिलते हैं . अब वे कपडे जमीन पर पटक पटक कर धोये गए हैं, या वाशिंग मशीन में ,लोहे वाली इस्त्री से आयरन किये गए हैं या बिजली वाले, इस से उन्हें क्या मतलब? उनकी दिनचर्या तो सदियों से वही चली आ रही है। टेबल पर खाना हाज़िर , आलमारी में तहाये हुए कपड़े, व्यवस्थित .
सुबह उठे, अखबार पढ़ा, इंटरनेट पर समय बिताया, नहा धोकर गंदे कपड़े बदल कर इस्त्री किये हुए कपडे पहने ,काम पे गए ,शाम को वापस आये, चाय पी, धुले हुए कपडे पहने ,टी वी देखा ( पहले रेडियो पर समाचार सुनते थे ),खाना खाया , नींद आयी तो साफ़-सुथरा बिस्तर भी सामने।
अगर स्त्री भी घर से बाहर जाकर काम करती है , फिर भी पति की दिनचर्या में कोई बदलाव नहीं होता। स्त्री सुबह उठ कर वैसे ही किचन में जाती है, कपड़ो का ख्याल रखती है, बच्चो का ख्याल रखती है, शाम को फिर से किचन का रुख करती है । हाँ, जहाँ दिन में ,थोड़ी देर आराम कर लिया करती थी, अब सारा दिन ऑफिस में काम करती है।
स्त्रियों के पहनावे में भी बदलाव आया है। अब सर पर पल्लू नहीं है, साड़ी की जगह सलवार-कमीज़ और जींस ने ले ली है . पर पुरुषों के लिए वही पैंट कमीज़।
इन सबसे इतर, घर में पुरुषों के नाज़-नखरे (pampering ) भी उठाये जाते हैं। बढ़िया भोजन, दूध-फल ,उन्हें देने के बाद ही स्त्री खाती है बल्कि अक्सर नहीं ही खाती है। और बहुत कम घरों में ऐसा होता है कि पुरुष भी स्त्री के खाने-पीने का उतना ही ख्याल रखें। और यह सब पुरातन जमाने से चला आ रहा है।
तो कहने का अर्थ यह है कि जब पुरुषों के जीवनचर्या में कोई बदलाव आया ही नहीं तो एकाएक उनके विचार, उनकी मानसिकता कैसे बदल जायेगी?? उनका रोल नहीं बदला है और इसी तरह वे स्त्री को भी बदले हुए रोल में स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं। अब स्त्रियाँ,आँखें मूँद कर उनकी बात नहीं मान रही हैं। वे भी अपनी इच्छा-अनिच्छा जाहिर कर रही हैं। उनकी गलत बातों का विरोध कर रही हैं। तो पुरुषों के अहम् को ठेस लग रही है। जो स्त्री अब तक चारदीवारी में कैद थी। उनका हर कहा मानती थी। पति-बेटे ने जैसा कपडा ला दिया, पहन लिया। जहाँ घुमाने ले गए चली गयीं .अब वे अपनी पसंद-नापसंद बताती हैं। इनकार भी कर देती हैं, कहीं जाने से।
और स्त्रियों के इस बदले हुए रूप से पुरुष कैसे सामंजस्य करे ,समझ नहीं पा रहा। पुरुषों को मदद की जरूरत है। उनके दिमाग की खिड़कियाँ खुलने में अभी वक्त लगेगा। क्यूंकि यह सब उनके लिए बहुत ही असुविधाजनक भी है। वे स्त्रियों को घर के अन्दर सहमी-सिकुड़ी से देखने के आदी थे, अब सडकों पर यूँ बेख़ौफ़ घूमते देखेंगे तो असहज तो होंगे ही।
अगर वे किसी महिला को आत्मविश्वास से लबरेज़, आत्मनिर्भर देखते हैं तो थोडा सा डर जाते हैं, थोड़े सशंकित होते हैं कि कहीं वो उनसे आगे न निकल जाए या फिर उनके घर की स्त्रियाँ जो अब तक उनके शासन में हैं, कहीं वे उक्त स्त्री का अनुकरण न करने लगें . और वे उसकी भरपूर आलोचना करते हैं, उसकी योग्यता को नकारने की पूरी कोशिश करते हैं। उसके कपड़ों पर , उसके काम पर , उसके घुमने-फिरने सब पर अंगुली उठायी जाती है।
इस तरह की सोच अकेले पुरुष की ही नहीं महिलाओं की भी हो सकती है जैसा हमने हाल में ही उनके बयान देखे किसी महिला वैज्ञानिक ने दामिनी के चुपचाप आत्मसमर्पण नहीं करने के फैसले को गलत बताया था तो किसी महिला ने उसके शाम को घर से बाहर रहने को गलत ठहराया था। इन महिलाओं की सोच भी पुरुषवादी सोच ही होती है, वे भी हर बात में पुरुषों का वर्चस्व ही सर्वोपरि मानती हैं।
यह पुरुषवादी सोच जल्दी नहीं बदलने वाली , ऐसी सोच का विरोध, इसकी आलोचना जारी रहनी चाहिए पर इस सोच के बदलने की स्त्रियों को धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा करनी पड़ेगी। और शायद पूरी तरह ये सोच तभी बदलेगी जब हमारे देश की एक -एक लड़की शिक्षित और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो जायेगी . हालांकि इस बात का संतोष और ख़ुशी भी है, गिने-चुने ही सही पर कुछ पुरुष हैं जो स्त्री का अलग अस्तित्व ,उनके अलग व्यक्तित्व को स्वीकार करते हैं और उनका सम्मान भी करते हैं। बस इनकी संख्या में लगातार इज़ाफे की ही तमन्ना है, हर स्त्री को।


