गुरुवार, 12 जुलाई 2012

वे ट्रेन के सहयात्री और फिल्म 'मिस्टर एंड मिसेज़ अय्यर'

एक बार अदा से बात हो रही थी और अदा ने कहा...'तुम फिल्मो पर इतना लिखती हो..मेरी फेवरेट फिल्म पर भी लिखो ना"..और एक पल को मेरी सांस रुक गयी..'राम जाने किस फिल्म का नाम लेगी और अगर वो फिल्म मेरी  पसंद की नहीं हुई तो?..पर दोस्त का मन  रखने को तो लिखना ही पड़ेगा.....फिर कैसे लिखूंगी उस फिल्म के बारे में ' पल भर में ही  दिमाग यह सब सोच गया और मेरे पूछने पर जब अदा ने फिल्म का नाम बताया तब तो हंसी ही आ गयी मुझे, 'इस फिल्म पर तो मैं एक अरसे से लिखना चाह रही थी. खासकर इसलिए कि फिल्म से मिलती  जुलती घटना, फिल्म देखने से पहले ही  मेरी आँखों के समक्ष घट चुकी थी.' जब रेल-यात्रा से सम्बंधित अपने संस्मरण लिख रही थी..उसी वक़्त इसे भी लिखना था...पर कुछ समसामयिक विषय ने बीच में सर उठा  इसे परे धकेल दिया होगा. 


फिल्म से पहले वो घटना ही लिखती हूँ. बच्चे छोटे थे तो अक्सर गर्मी की छुट्टियों में अकेले ही उन्हें लेकर मुंबई से पटना तक की लम्बी यात्रा पर जाया करती थी. (कुछ मजेदार अनुभव भी हुए थे..जिन्हें यहाँ लिखा है ) अब अकेली होती थी इसलिए ढेर सारी खडूसियत  ओढ़ लेती थी. हाथों में अंग्रेजी की मोटी मोटी किताबें...भृकुटी हमेशा चढ़ी हुई..और उसपर बच्चों को रास्ते भर डांटते रहना (छोटे थे, तो मिलकर उधम भी बहुत मचाते थे ). सहयात्री डर कर बात करने की हिम्मत ही नहीं करते थे..सोचते होंगे जीवन में ये कभी हंसी ही नहीं है..:) पर मैं किताबों के पीछे से उन सबका निरीक्षण करती रहती थी. 

पटना से मुंबई वापस लौट  रही थी. सामान व्यवस्थित कर ,बच्चों को डांट-डपट कर शांत  बिठा..किताब आँखों के सामने कर आस-पास का जायजा लेना शुरू किया तो देखा, साइड वाली बर्थ पर एक स्टुडेंट जैसा दिखता  लड़का..और एक शादी शुदा लड़की बैठी है. मुझे लगा देवर-भाभी होंगे. देवर ,भाभी को मुंबई पहुंचाने जा रहा होगा. पर जब टी.टी...टिकट चेक करने  आया तो पता चला..दोनों केवल  सहयात्री ही हैं. लड़का MBA  करने जा रहा था और लड़की अपने पति के पास. पर थोड़ी ही देर में दोनों में बातचीत शुरू हुई जो धीरे-धीरे गहरी दोस्ती में बदल गयी. दोनों का व्यवहार शालीन ही था. पर खूब गप्पें चल रही थीं...समवेत हंसी भी सुनायी दे जाती...लड़की बैग से कुछ निकालती और फिर दोनों मिल बाँट कर खाते...एक बार तो वो लड़की कोई गाना भी गा कर सुना रही थी...और लड़का गंभीरता से सर हिला रहा था. ट्रेन की स्टौपेज़  कम थी पर जब भी ट्रेन रूकती..लड़का भागता हुआ जाता और स्टेशन से कुछ खरीद कर ले आता. एक बार वो ऊपरी बर्थ पर सो रहा था...और ट्रेन एक स्टेशन पर रुकी तो लड़की ने बड़ा साधिकार उसे जगाया...'प्लेटफॉर्म पर इतने गरम गरम भजिये तले जा रहे हैं और आप सो रहे हैं...जल्दी से लेकर आइये.."..और वो लड़का आधी नींद में आँखें मलता उठा..पैरों में चप्पल अटकाए और ट्रेन से उतर गया. पर एक चीज़ मैने नोटिस की..उस लड़की ने कभी पैसे निकाल कर नहीं दिए...लड़का अपने पैसों से ही खरीद कर लाता रहा...मुझे हंसी भी आ रही थी..अपनी पॉकेट मनी लुटाये जा रहा है...पता नहीं मुंबई में कैसे काम चलाएगा.

ट्रेन मुम्बई पहुँच गयी  तो लड़की का सूटकेस उस लड़के ने उतारा...एक बैग हाथों में थामे लड़की भी उतर आई...मेरा तो ढेरो सामान  उतारने का सिलसिला चल ही रहा था. वो लड़का...लड़की के पास ही खड़ा हो गया. उस  लड़की ने कहा.."अब आप जाइए...मेरे पति आते ही होंगे..." ..और लड़का हम्म ..कहता झेंपता सा चल दिया.

जब मैने फिल्म 'मिस्टर एंड मिसेज़ अय्यर' देखी..तो ये ट्रेन वाली घटना बार-बार याद आ रही थी. फिल्म में एक रुढ़िवादी  तमिल ब्राह्मण  मीनाक्षी ('कोंकणा सेन') को अकेले अपने एक साल के बेटे के साथ बस से सफ़र करना पड़ता है. बस स्टॉप पर उसके पिता के एक परिचित का दोस्त राजा चौधरी ('राहुल बोस') मिलता है, उसे भी इसी बस से जाना है. किसी भी चिंताग्रस्त माँ की तरह...मीनाक्षी  के कितना बरजने के  बावजूद उसकी माँ राजा  से मीनाक्षी  का सफ़र में ध्यान रखने के लिए कहती है...और बस का सफ़र ख़त्म होने के बाद..कलकत्ता जाने वाली ट्रेन में उसे अच्छे से बिठा देने का आग्रह करती है. राजा जो 'वाइल्ड लाइफ फोटोग्राफर' है..वो भी कलकत्ता ही जा रहा होता  है.  जब मीनाक्षी  को बच्चे के लिए सेरेलक बनाना पड़ता है ..तब वो बच्चे को बहला कर उसकी सहायता भी करता है. बस में सारे यात्रियों का बहुत ही बारीकी से विवरण है. कुछ युवा लड़के और लकडियाँ हैं जो पूरे रास्ते गाना गाते रहते हैं...एक बुजुर्ग मुस्लिम युगल हैं..जिन्हें आजकल के बच्चों के कपड़े पहनने का अंदाज़..यूँ शोर मचाना पसंद  नहीं आता. एक नव-विवाहित जोड़ा है...चार मित्र हैं जो बस में ही ताश खेलते हैं..और पानी की बोतल में शराब मिला कर पीते हैं. एक मेंटली चैलेंज्ड बच्चे के साथ एक अकेली माँ होती है...दो सरदार हैं..जिनमे एक के चाचा अब भी पकिस्तान में हैं.

अचानक बस एक जगह रुक जाती हैं...सारे यात्रियों के साथ मीनाक्षी  और राजा  भी उतर जाते हैं. पता चलता है...आगे  दंगा हो गया है. राजा, मीनाक्षी को बताता है कि वो एक मुस्लिम है.उसका पूरा नाम 'राजा जहाँगीर चौधरी' है. मीनाक्षी बहुत विचलित हो जाती है...उसे अफ़सोस होता है..उसने राजा के बॉटल से पानी क्यूँ पी लिया. वो मुहँ फेरे वापस बस में बैठ जाती है. कुछ दंगाई बस में चढ़ आते हैं..और सबसे नाम पूछने लगते हैं. उन बुजुर्ग युगल को बस से उतार लेते हैं. सारे बस के लोग चुप हैं पर उन युवाओं में से जिनकी वे बुजुर्ग आलोचना कर रहे थे...एक लड़की उठ कर विरोध करती है...चिल्लाती है..कि 'उन्हें क्यूँ ले जा रहे हैं' दंगाई उसे थप्पड़ मार कर गिरा देते हैं. जब राजा की सीट की तरफ आने लगते हैं तो मीनाक्षी अपने बच्चे को राजा की  गोद में दे देती है और दंगाइयों से कहती  है..'ये मेरे पति हैं..मिस्टर अय्यर ..सुब्रह्मण्यम  अय्यर और मैं मिसेज़ अय्यर.'. दंगाई बस से उतर जाते हैं. पर उस इलाके में कर्फ्यू लगा हुआ है..बस आगे नहीं जा सकती. सबलोग उस छोटे से कस्बे में रहने की जगह तलाशने लगते हैं. राजा और मीनाक्षी को कोई जगह नहीं मिलती,एक पुलिस ऑफिसर उनकी मदद करता है और दूर जंगल में एक टूटे-फूटे 'फ़ॉरेस्ट रेस्ट हाउस' में उन्हें पहुंचा देता है. वहाँ रहने लायक सिर्फ एक ही कमरा देख मीनाक्षी नाराज़ हो जाती है और खुद को कोसने लगती है..'मुझे बस में ही रुक जाना चाहिए था...एक अजनबी के साथ मैं  इतनी दूर क्यूँ चली आई....बड़ी गलती कर दी.' राजा कहता है कि 'ये सब उसे पहले सोचना चाहिए था '. मीनाक्षी के ये कहने पर कि   पता नहीं गेस्ट हाउस का कुक किस जाति का है..उसके हाथों का बना कैसे खाऊँगी ?' राजा और उसमे थोड़ी सी बहस भी होती है कि...'ये 2001 है (तभी इस फिल्म की शूटिंग हुई थी..पर आज ही क्या बदल गया है ) और इस जमाने में वो ये छुआछूत पर विश्वास करती है' . राजा अपना सामान लेकर कमरे से निकल जाता है.

सुबह जब चौकीदार से मीनाक्षी पूछती है..'साहब कहाँ हैं ?' तो वो कहता है..'वे तो रात को ही अपना सामान लेकर चले गए' अब वो बहुत परेशान हो जाती है..सोचती है 'बेकार ही उस आदमी की जान बचाई...ऐसे जंगल में एक छोटे बच्चे के साथ उसे छोड़कर चला गया.' उदास सी जंगल की तरफ देखती है तो पाती  है..राजा उन पेडों के नीचे अपने सामान के साथ सो रहा है. वो नंगे पैर अपने बच्चे को लेकर उसके पास भागती है..उसे सॉरी कहती है...और वहीँ से उनके बीच कोमल भावनाओं का जन्म होता है. निर्देशिका अपर्णा सेन और दोनों कलाकारों की तारीफ़ करनी होगी...दोनों के बीच बिना किसी शब्द या व्यवहार का सहारा लिए सारे अहसास आँखों से ही अभिव्यक्त होते हैं.राजा,बच्चे और मीनाक्षी की ढेर सारी तस्वीरें खींचता है. 

दोपहर में जब वे लोग कस्बे में जाते हैं तो बस के शेष सहयात्रियों से मुलाकात होती है..सब उन्हें पति-पत्नी ही समझते हैं. युवा लड़कियों का दल उन्हें घेर  कर तमाम प्रश्न पूछता है..'उनकी कैसे मुलाकात हुई...कब प्यार हुआ..हनीमून के लिए कहाँ  गए...' राजा उन्हें अपनी कल्पना से बताता रहता है...हम रेन फ़ॉरेस्ट  में एक ट्री हाउस में हफ्ते भर रहे...एक झील के बोट हाउस में रहे...चिदंबरम मंदिर में गए....मीनाक्षी उसे गौर से देखती रहती है...शाम को वही पुलिस ऑफिसर अपनी जीप में उन्हें गेस्ट  हाउस तक छोड़ने के लिए लिफ्ट देता है...रास्ते में वे पाते हैं...दंगा और भड़क गया है...कई घर जला दिए गए हैं..ऐसे ही एक जलते हुए घर के सामने एक बच्ची रो रही है..उसके माता-पिता की ह्त्या कर दी गयी है...उस रोती हुई नन्ही सी बच्ची को पता भी नहीं है...वो मुस्लिम है या हिन्दू.

शाम को बालकनी में बैठे दोनों बातें कर रहे हैं तभी चौकीदार दौड़ता हुआ आता है..और कहता  है..'कुछ लोग मेरी जान के पीछे पड़े हैं....आपलोग कमरे में जाकर कमरा लॉक कर लीजिये.' राजा बाहर रहना चाहता है तो मीनाक्षी उसे जबरदस्ती अंदर खींच कर सिटकनी लगा देती है. शोर सुनकर खिड़की से दोनों झांकते हैं..और अपनी आँखों से दंगाइयों द्वारा चौकीदार की ह्त्या करते हुए देख लेते हैं. यह सब देखकर ,मीनाक्षी की तबियत बहुत खराब हो जाती है...उसे उल्टियां होने लगती है..वो खुद को संभाल नहीं पाती...राजा  उसे बिस्तर पर लिटा कर खुद जमीन पर बैठ कर सारी रात गुजार देता है. मीनाक्षी रात में चौंक चौकं कर उठती है...और राजा को ढूंढती है...उसे पास पाकर उसका हाथ पकड़ कर सो जाती है.

दूसरे दिन पुलिस जीप से ही वे स्टेशन पहुँचते हैं...और जब ट्रेन में बैठते हैं तो दोनों पर यह ख्याल तारी रहता  है कि  अब उनका सफ़र अपनी मजिल तक पहुँचने वाला है..और अब वे  फिर कभी नहीं मिलेंगे. दोनों इधर उधर की बातें करने की कोशिश करते हैं और फिर...खडकी से बाहर देखने लगते हैं. यहाँ भी संवाद  बहुत कम है...पर उनके अभिनय से उनके दिल में उठते  तूफ़ान का आभास दर्शकों तक बखूबी पहुँचता है. ट्रेन जब कलकत्ता पहुंचती है तो मीनाक्षी के पति उसे लेने आए हुए हैं. फिल्म में अच्छी बात ये है कि  मीनाक्षी के पति को भी एक सहृदय भला आदमी दिखाया गया है..वो बार-बार राजा का शुक्रिया अदा करता है कि  उसने उसकी पत्नी और बच्चे की इतनी सहायता की. राजा उनसे विदा ले चला जाता है और मीनाक्षी बड़ी बड़ी कजरारी आँखों में आँसू लिए उसे देखती रहती है.

कोंकणा सेन अपनी माँ और निर्देशिका अपर्णा सेन के साथ 
फिल्म का निर्देशन और पात्रों का अभिनय कमाल का है. राहुल बोस का सिर्फ आँखों से ही सारी भावनाएं व्यक्त करना ,तारीफ़ के काबिल है. कोंकणा सेन ने बंगाली होते हुए एक तमिल ब्राह्मण के कैरेक्टर में खुद को ढालने के लिए बहुत मेहनत की है. कहीं पढ़ा था कि  वे एक महीना चेन्नई में एक तमिल परिवार के साथ रहीं थीं...उनके हाव-भाव..उनकी तरह साड़ी पहनना..बालों में फूल लगाना..उच्चारण सब बहुत ही अच्छी तरह आत्मसात किया है. वे टिपिकल दक्षिण भारतीय की तरह 'थैंक्यू ' बोलती हैं. फिल्म में छोटी छोटी डीटेलिंग पर बहुत मेहनत की गयी है. दर्शकों की संवेदनशीलता पर भी बहुत भरोसा किया गया है. जब राजा चौधरी के कैमरे की लेंस...पहाड़ों की चोटियों...पेडों..नदी से होते हुए ..नदी के किनारे पड़े उन बुजुर्ग के डेन्चर और चश्मे पर पड़ती है..तो  राजा को एकदम से चौंकते हुए नहीं दिखाया गया है...बल्कि विश्वास है कि दर्शकों ने इस  दृश्य की गहराई को महसूस कर लिया होगा. 
आज गैंग ऑफ वासेपुर फिल्म में गालियों की इतनी चर्चा है...इस फिल्म में भी दंगाई वैसी ही गालियाँ देते हैं...हो सकता है..तब सेंसर की कैंची उनपर चल गयी हो. पर सी.डी. में वे संवाद और कुछ जरूरी दृश्य..यथावत थे. छायांकन बहुत ख़ूबसूरत है..और प्रसिद्द तबलावादक जाकिर हुसैन द्वारा संगीतबद्ध किए गए गीत..बैकग्राउंड में बजते रहते हैं..और दृश्यों को एक नए अर्थ देते हैं. सुलतान खान का गाया सूफी गीत 'गुस्ताख अँखियाँ'..दिल में गहरे उतर जाने वाला है.

यह फिल्म कई अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सवों में दिखाई गयी है और कई अंतर्राष्ट्रीय और राष्ट्रीय अवार्ड भी जीते हैं.  गोविन्द निहलानी ने आवाज़ भी उठायी थी कि राजनीति से ऊपर उठकर इस फिल्म  को ऑस्कर में क्यूँ नहीं भेजा गया??

58 टिप्‍पणियां:

  1. हाय..मेरी पसंद की फिल्म की समीक्षा...
    मज़ा आ गया...मैं इस फिल्म को कभी भी, कहीं भी, कैसे भी देख सकतीं हूँ...
    सारी फिल्म दिख दी तुमने, बहुत अच्छा लिखा है..आज फिर देखना होगा मुझे ये फिल्म..
    तुम्हारा बहुत-बहुत धन्यवाद...

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    1. आपका आदेश..सर आँखों पर मैडम जी....कैसे ना लिखती इस फिल्म पर :)

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  2. दीदी आपने मस्त पोस्ट तो लिखा ही है, पुरानी पोस्ट का जिक्र कर के बहुत अच्छा काम किया...मैंने अभी दुबारा से वो पोस्ट पढ़ा..यादें ताज़ा हो गयी...ट्रेन के सफर के बारे में एक पोस्ट को लिख चूका हूँ, दूसरा भाग भी लाने का मन था लेकिन बिलकुल दिमाग से बात उतर गयी थी..अब याद आया तो कोशिश करूँगा जल्दी दूसरा पोस्ट भी लिख ही दूँ..

    और फिल्म की बात, तो राहुल बोस का मैं इसी फिल्म से फैन हो गया था..मेरी भी फेवरिट फिल्म में से आती है ये...बहुत अच्छा किया आपने इस फिल्म के बारे में लिख कर...देखता हूँ अपने कलेक्सन में, इसकी डी.वी.डी मिल गयी तो आज फिर से इसं फिल्म को देखूंगा..

    मस्त पोस्ट!!

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    1. फिल्म पर कोई पोस्ट लिखी जाए और तुम जल्दी से ना पढो...:)
      राहुल बोस की English August भी जरूर देखना....मैने किताब तो पढ़ी है...फिल्म अब तक नहीं देख पायी...बहुत पसंद आएगी, तुम्हे.

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    2. हाँ दीदी..नाम सुना है मैंने...देखता हूँ जल्द ही इस फिल्म को भी :)
      वैसे आजकल मैं कोरियाई फ़िल्में देख रहा हूँ...गज्ज़ब की फ़िल्में बनती हैं वहाँ..अब तक पांच उम्दा कोरियाई फिल्म देख चूका हूँ...दो और डाउनलोड कर के रखे हुए हैं...सोच रहा हूँ की उनपर भी कुछ लिखा जाए :)

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  3. yah film kabhi n bhulne waali film hai ...bahut acche se likha hai apne is par rashmi ..rahul bose kamaal ka actor hai ..

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  4. yah film kabhi n bhulne waali film hai ...bahut acche se likha hai aapne is ko apni yadon ke sath ..konkana sen aur rahul bose kamaal ke actor hai ..

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    1. सच में, रंजू जी...ये अपनी उनकी सबकी फेवरेट फिल्म है..:)

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  5. वास्तविकता को कितनी संवेदनशीलता से फिल्माया है ...पता ही नहीं चलता फिल्म देख रहे है

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  6. रश्मि जी , आपने तो फिल्म की बहुत गहराई में जाकर सुन्दर समीक्षा की है . हमने भी यह फिल्म देखी है . दोनों पात्रों से इतना घुल मिल जाते है की दोनों से प्यार सा हो जाता है . konkana बहुत अच्छी लगी दक्षिण भारतीय के रोल में . राहुल बोस की एक्टिंग भी बढ़िया रही . फिल्म में मानवीय रिश्तों को बहुत बारीकी से दिखाया गया है . बढ़िया फिल्म .

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  7. ऐसी फ़िल्में सच में प्रभावित करती हैं | बहुत बढ़िया समीक्षा की ..... मुझे भी यह फिल्म बहुत पसंद आई थी....

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  8. बढ़िया समीक्षा. पढ़कर आनंद आ गया... ये फिल्म मेरे लैपटॉप में पढ़ी है लेकिन देखने से बच रहा था पता नहीं कैसी होगी... तीन घंटे ख़राब न कर दे...
    लेकिन अब जल्द ही देखता हूँ...

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  9. आपकी मेहनत सफल सी लगे यहाँ, रश्मि जी...
    शुरु में आपकी ज़िंदगी की डायरी का, बच्चों के साथ रेल यात्रा वाला पन्ना भी अती
    वास्तव व जीवंत...
    अपर्णा सेन के direction की खूबी जैसेकि थिक जंगल की वह सीन-री और वे रात का दृश्य
    जब स्वर्णमृगों का एक झुंड पैड़ों की घनी छाया में कुछ ही दूरी से गुजरता हुआ. .calmly ...
    और नेपथ्य में नीला गहन आसमां और गहन निस्तब्ध मध्य रात्रि...और
    इसी दृश्य को उतनी ही तन्मयता से निहारते राजा चौधरी और मीनाक्षी...और फिल्म
    का वह आखिरी सीन रेलवे प्लेटफ़ॉर्म का, जिसकी उज्ज्वल सौंदर्य आभा से जैसे आँखें
    चौंधिया जाए...

    Communal climax में उस भले मुस्लिम राजा जहांगीर चौधरी की इन्सानियत,
    शालीनता और संवेदनशीलता पर आपके आलेख में कुछ और प्रकाश डाला सकता था...
    फिल्म में उनके और मीनाक्षी के किरदार के उत्कट प्रेम भाव को सही मानवीय धरातल
    पर दर्शाया गयाहै...विशुद्ध बिनसाम्प्रदायिक दृष्टिकोण से...अपर्णा सेन द्वारा...

    स्क्रिप्ट सा आलेख आपका टची बन पड़ा है...और बीच-बीच में जो फिल्म से कन्सर्न जानकारियाँ
    है, बहुत ही दिलचस्प है... फिल्म का background संगीत,सुफी गीत...और गोविंद निहलानी जी के विचार...आलेख की in depth विस्तृतता लिए हुए हैं...!

    एक मंझी हुई कलम का परिचय भी है यहाँ...

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया Gg
      वो रात वाला दृश्य तो बहुत ही खूबसूरती से फिल्माया गया है.
      फिल्म और उसके पात्रों के विषय में तो और क्या क्या ना लिख दूँ...पर पोस्ट पहले ही बहुत लम्बी हो चुकी थी.
      राजा चौधरी की शालीनता...संवेदनशीलता के साथ-साथ..उसके अक्खडपन को भी बखूबी दर्शाया गया है...यह दिखाने को कि वह एक आम इंसान है...कोई देवता नहीं.जब मीनाक्षी के यह कहने पर कि..' I am strict vegetarian " राजा कहता है.."well am not कुक ,मेरे लिए चिकन करी बनाओ'

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    2. फिल्म की बुनियाद ही इंसानी है और
      अक्खडपन भी नितांत इंसानी...
      मानवीय खूबी को आपने बुनियादी
      बारीकी से समझा है...

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  10. मुझे इस फिल्म का सबसे अच्छा दृश्य तब लगा जब बुजुर्ग दंपत्ति में से पुरुष को दंगाई ले जा रहे होते है और महिला उनका डेन्चेर निकल कर देती है कि इसके बिना वो कुछ नहीं खा पाएंगे. बुजुर्ग महिला का रोल सुरेखा सिकरी(बालिका वधु की दादी सा)ने किया था. जो एक उम्दा कलाकार है

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  11. बहुत अच्छी फिल्म थी ... तुम्हारे लिखे की तरह

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  12. आपको बताया था कि मैं पिछले कई वर्षों से, फिल्में देखना छोड़ चुका हूं ! अब आपकी समीक्षा के लिए मेरी प्रतिक्रिया ये है कि मुझे यह फिल्म देखनी ही पड़ेगी !

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    1. अरे वाह..आपकी फिल्म देखने की इच्छा हो आई..तब तो ये पोस्ट लिखना सार्थक हो गया...:)
      हम पूछते रहेंगे कि आपने फिल्म देखी या नहीं...

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  13. मैं ने बहुत सारी फिल्में देखी हैं, देशी और विदेशी। लेकिन कुछ अच्छी फिल्में नहीं देख पाया। इस फिल्म की तारीफ बहुत सुनी है, पहले भी। और आज आपके खूबसूरत पोस्ट से भी। मजा आ गया। रविवार तक हर हाल में ये फिल्म देखूगा।

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    1. शुक्रिया मंजीत,
      ये फिल्म मिस करने वाली है भी नहीं..

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  14. वाणी गीत की ई-मेल से प्राप्त टिप्पणी...वे अपना कमेन्ट नहीं पोस्ट कर पा रही हैं.


    कुछ या फ़िल्में पूरी होने के बाद ही शुरू होती है , दर्शक उन दृश्यों को सोचता ही रह जाता है . मंथन के लिए अच्छी खुराक मिलती है इनसे ..कुछ सफ़र ऐसे होते हैं जो ख़त्म होने पर भी हमेशा याद आते हैं , ऐसी ही फिल्म लग रही है . मौका मिलते ही देखूंगी .
    कमेन्ट नहीं हो पा रहा है ब्लॉग पर ...

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    1. बिलकुल वाणी...कुछ दृश्य...कुछ लम्हे हमेशा के लिए दिल में जगह बना लेते हैं.

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  15. main to film ke badle aapke sansmaran me attak gaya, bechara....:)) par aisa hota hai.... ham males!! :-D
    main ye movie dekhi nhi aapke post ke bahane kahani ka pata chal gaya:)

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    1. शुक्रिया..चलिए आपने संस्मरण पर भी ध्यान दिया..:):

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  16. यह फिल्‍म पूरी तो नहीं देखी है लेकिन थोड़े बहुत अंश देखे है। अच्‍छी समीक्षा है और रेल यात्रा का संस्‍मरण तो खूब है।

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  17. न जाने कितने लोगों की यह पसंदीदा फिल्म होगी ...मुझे याद है ...इसे देखने के बाद बहुत देर तक किसी से कोई बात नहीं की थी ...इतना हौंट किया था फिल्म ने ...मेरी सबसे पसंदीदा फिल्मों में से एक ......थैंक्स रश्मि ...पूरी फिल्म एक बार फिर दोहरा ली......कितना सशक्त निर्देशन ....कहीं कहीं तो लगा ही नहीं की संवादों की कोई भी कोई ज़रुरत हो सकती है ....दोनों के बीच का मौन ....ही उनके बीच के संवाद थे ....और आँखों का बखूबी इस्तेमाल किया है ...निर्देशिका ने .......हर तरह से सशक्त फिल्म.....और अभिनय ...इस फिल्म से मैं कोंकणा और राहुल की मुरीद हो गयी ......और अपर्णा सेन तो मुझे हमेशा से ही पसंद थीं ....

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  18. सच में अपनी उनकी सबकी फेवरेट फिल्म है....:)
    लेकिन आपकी लेखनी और फेवरेट फिल्म बना दी .... :)
    लम्बी यात्रा में अक्सर ऐसी दोस्ती देखने के लिए मिलजाती है .... :)

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    1. शुक्रिया
      हाँ.. कभी कभी बड़े रोचक अनुभव होते हैं..लम्बी यात्रा में

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  19. मुझे भी बहुत भायी थी यह फिल्म..

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  20. फिल्म पूरी तो नहीं देखी है कुछ कुछ दृश्य देखे है जैसे की बस में दंगइयो का घुसना कोंकण का राहुल को बचना , और फार्म हॉउस में नौकर की हत्या जैसे कुछ दृश्य | किन्तु जहा तक मुझे पता है की दोनों के बीच बात बस आँखों तक ही सिमित नहीं थी बात कुछ आगे तक जाती है............. और करण के शो में राहुल ने बताया की उन्होंने वो दृश्य भी करने से मना कर दिया था जबकि कोंकण ने कहा की ये जरुरी है और उनके कहने पर दोनों की नजदिकिया दिखाई गई थी | लो जी मै बिना फिल्म देखे ही ये सब बोले जा रही हूँ |

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    1. ऐसा एक भी दृश्य नहीं है..अंशु जी,

      नजदीकियां सिर्फ इतनी ही दिखाई गयी हैं...जब उस चौकीदार की ह्त्या देखकर मीनाक्षी विचलित हो जाती है तो राजा उसका सर सहला..उसके कंधे थपक उसे बिस्तर पर सुला देता है...और नींद में भी मीनाक्षी उसका हाथ पकड़ कर सोती है...राजा जमीन पर ही बैठ कर पूरी रात गुजार देता है.
      और एक बार ट्रेन में कोंकणा उसके कंधे पर सर रख देती है तब भी राहुल सीधा ही बैठा रहता है...पलट कर उसके कंधे पर हाथ भी नहीं रखता.

      पता नहीं..राहुल बोस ने किस सन्दर्भ में किस सीन के लिए वो बात कही..

      आप नेट से ही डाउनलोड कर अब देख ही लीजिये...:)

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    2. रश्मि दीदी की बात से सहमत | एक बार अवश्य देखिएगा |

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  21. दीदी,
    मैंने ये मूवी सिर्फ आठ-दस बार ही देखी है :)
    बढ़िया मूवी है और आपकी समीक्षा भी |

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    1. गौरव,
      हमें तो एक 'मिस्टर एंड मिसेज अय्यर फैन क्लब' ही बना लेना चाहिए..
      BTW यहाँ असाधारण पाठक कौन है..:):)

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  22. वाणी जी की बात से पूरी तरह सहमत, कुछ फिल्में ख़त्म होने के बाद ही शुरू होती हैं - जब आप बैठे बैठे घंटों, दिनों उनकी जुगाली करते रहते हैं।
    राहुल बोस की बात करूँ तो 'मिस्टर एंड मिसेज़ अय्यर' और 'द जापानिज़ वाइफ' ऐसी ही फिल्में हैं।

    आपने शानदार समीक्षा की है, और संस्मरण भी बहुत बढ़िया लिखा है - ऐसा कहना रिपिटेटिव तो नहीं हो रहा? :)
    बहुत दिनों बाद आने पर यह पढना सुखद लगा।

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    1. @ऐसा कहना रिपिटेटिव तो नहीं हो रहा?

      ना ना..हमने तो पहली बार सुना/पढ़ा...बल्कि अभी भी ठीक से दिखाई नहीं दे रहा...एक बार फिर दुहराइए जरा...हा हा

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  23. आपकी समीक्षा बहुत सुंदर लगी क्योंकि मैंने फिल्म देखी भी है. फिल्म भी अच्छी थी फिर एक बार उसके बारे में पढकर फिर एक बार अच्छा लगा. वैसे आपकी फिल्म समीक्षा अच्छी ही होती है हर बार.

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  24. बहुत अच्छी समीक्षा की है आपने इस फिल्म की ... सहज ही बाँधने में कामयाब हो जाती है ये फिल्म शुरू से और फिर अंत तक बंधे रखती है .... राहुल बोल का अभिनय बहुत अच्छा है ...

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  25. बढ़िया समीक्षा.
    मैंने फिल्म देखी नहीं। कभी अवसर मिला तो अवश्य देखूँगी।
    घुघूती बासूती

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  26. दो तीन दिन से आपकी पोस्ट ब्राऊजर में खुली थी और अब जाकर पूरी पढ़ पाया, हम भी यह फ़िल्म देखते हैं ।

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