फुलवा' लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
फुलवा' लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शुक्रवार, 11 फ़रवरी 2011

डायना के जमाने में डायन की खोज

कुछ दिनों पहले तक लगता था एक शब्द से मेरा परिचय नहीं है.....और वो है, नफरत....घृणा....Hate.  ....गिरिजेश जी की एक पोस्ट जिसपर उन्होंने लिखा था...

"दुनिया हसीन रहे,
इसके लिए घृणा भी उतनी ही आवश्यक है, जितना प्रेम।
गुनहगारों!
मैंने तुम्हारे लिए सहेज रखा है। भूलना मेरी फितरत नहीं। 
 
 

उस पर मैं अपना ऐतराज जता आई थी कि....घृणा बहुत ही strong emotion है ...और उसे खुद से दूर ही रखना चाहिए. कभी कहीं भी बातचीत में कोई कहता.."मुझे तो ये बिलकुल पसंद नहीं...ये तो मेरे बर्दाश्त  के बाहर है "  तो मैं यही सोचती कि मेरी इतनी strong disliking  नहीं है. इस हद तक मैं किसी को नापसंद नहीं करती. चाहे किसी ने मेरे साथ कुछ बुरा ही किया हो...मैं उसकी तरफ से इतनी निस्पृह हो जाती... जैसे मेरे लिए अब उसका अस्तित्व ही नहीं है. पर नफरत जैसी भावना नहीं आती.

लेकिन कल तो जैसे दिलो जान से मैने ,पूरे एक घंटे तक बेइंतहा नफरत की है,किसी से ....पता नहीं आगे शायद ये भाव मंद पड़ जाए पर लिखते वक्त तो भी रत्ती भर भी ये भावना कम नहीं हुई है.


टी.वी. सीरियल्स नहीं ही देखती  हूँ. कभी-कभार चैनल सर्फ़ करते नज़र पड़ जाती है. और देखती हूँ....चमकदार साड़ियों में ..जेवरों से  लदे...खुले बाल, रसोई में काम करती औरतें....हुक्का पीते और रौबीले  आवाज़ में  आदेश देते...अठारवीं सदी के पुरुष...किसी अबला को सताती उसकी सास...या फिर चालें चलती भाभियाँ....और तुरंत ही चैनल बदल  देती हूँ.

कल भी ऐसे ही  चैनल बदलते.
..'कलर्स  चैनल' पर एक दृश्य देखा...किसी गाँव का दृश्य था...दुल्हन के जोड़े में, बेसुध सी एक लड़की को थामे एक महिला बैठी थी और कई सारे लोग उन दोनों को  घेर कर खड़े थे. एक सरपंच फरमान सुना रहा था, "ये लड़की डायन है...कल सुबह इसे पत्थर मार-मार कर मौत के घाट उतार दिया जाएगा. सुबह सारे गांववासी एक टीले पर इस लड़की को पत्थर मारने के लिए एकत्रित  हो जाएँ. गांवालों को नाश्ता पानी पंचायत की तरफ से दिया जाएगा."

और मेरी उंगलियाँ ठिठक  गयीं...रिमोट किनारे रख देखने लगी...कि आखिर ये कौन सा सीरियल है?...निर्देशक-प्रोड्यूसर क्या दिखाना चाह रहे हैं? यह सीरियल है
,'फुलवा'.....'कलर्स' चैनल पर आता है... शायद डाकू 'फूलन देवी' के जीवन से प्रेरित है और शायद वे यह दिखाना चाहते हैं कि अपने परिवार पर जुल्म के बदले में एक लड़की बन्दूक उठा, डाकू  बन जाती है. 'फुलवा' उस दुल्हन की छोटी बहन का नाम है.

पर किसी गरीब पर जोर-जुल्म दिखाने के लिए ये सीरियल निर्माता,लेखक..अब ऐसी कल्पनाओं का सहारा लेने लगे हैं? मुझे उस सीरियल के लेखक का नाम  जानने की इच्छा हुई..आखिर ऐसे वाहियात दृश्य किस कलम के अपराधी की उपज हैं.लेखक के नाम के इंतज़ार में मैंने  बाकी के दृश्य भी देख लिए. और देखना भी चाहती थी कि आखिर इस सीरियल के लेखक-निर्देशक की मानसिक विकृति कितनी दूर तक जा सकती है? और क्या क्या दिखा कर दर्शकों की भावनाओं से खेलना चाहते हैं? शायद चार-पांच  चार एपिसोड  में समेटा गया है इस पूरे प्रकरण को.  उस परिवार की बेबसी...घर की  रखवाली करते. ठहाके लगाते गाँव के छोकरे.....आँसू पोंछते हुए गड्ढा  खोदते उस लड़की के चाचा (पत्थर मार कर मौत की घाट उतार देने के बाद ,उस लड़की को दफनाने के लिए गड्ढा खोदने का जिम्मा उसके चाचा को दिया गया था) ...सबकुछ विस्तार से दिखाया गया है. लड़की को सुबह गाँव की स्त्रियाँ..सफ़ेद वस्त्र लाकर देती हैं...कि उसे पहन कर वह पत्थर खाने को तैयार हो जाए.(लेखक के मानसिक दिवालियेपन का एक और सुबूत)


इस तरह की ख़बरें पढ़ी है कि सुदूर गाँव में किसी औरत को डायन करार देकर उसके बाल उतार दिए गए...या कभी कभी वस्त्रहीन परेड करवाई गयी. यह जिल्लत भी कोई मौत से कम नहीं...पर पत्थर मार-मार कर मौत देने  की घटना तो कभी नज़र में नही आई.


ये सउदी अरब  में होता है और
Princess of Saudi Arabia  किताब में एक ऐसे प्रकरण का आँखों  देखा हाल लिखा है कि कैसे शहर से दूर एक निर्जन स्थान पर उस लड़की को लेकर जाते हैं और ट्रक में  पत्थर भरकर बहुत सारे  लोग भी जाते हैं. साथ में एक डॉक्टर भी होता है...जो थोड़ी थोड़ी देर बाद जाकर उस लड़की की नब्ज़ चेक करता है कि उसकी साँसें और पत्थर का इंतज़ार कर रही हैं या नहीं. करीब चार साल पहले पढ़ी थी ये किताब पर आज भी  याद कर रोम-रोम सिहर जता है... कितनी  ही रातों की नींद ले गया था यह प्रकरण...

पर हमारे देश में कम से कम ऐसी जघन्यता तो नहीं है. अब ये सीरियल लेखक 
क्या पूरे विश्व में से कहीं भी किसी कुरीति... किसी भी जघन्य  कृत्य को देखेंगे तो उसे हमारे जनजीवन में उतार देंगे?? और विद्रूपता ये कि प्रोग्राम के नीचे ये डिस्क्लेमर आ रहा था कि ' हम अंधविश्वास को बढ़ावा नहीं देना चाहते...केवल  दर्शकों के मनोरंजन के लिए  ये दृश्य प्रस्तुत  किए जा रहे हैं" इन पत्थर मारने के दृश्यों से दर्शकों का मनोरंजन हो रहा है?? इन्होने दर्शकों को इतना जाहिल समझ रखा है?? और यह कोई हमारी संस्कृति में भी नहीं था कि ये सब दिखा वे दर्शकों की जानकारी बढ़ा रहे हैं.
 

इस सीरियल के लेखक , 'सिद्धार्थ कुमार तिवारी' को गूगल  में सर्च किया. जनाब ने कई डिग्रियां ले रखी हैं. कई सारे अवार्ड जीते हैं...यानि कि सरस्वती माँ  की कृपा है, उनपर...लेकिन  इस तरह तो वे अपमान ही कर रहे हैं, उनका. (वो लिंक और तस्वीर जानबूझकर नहीं दे रही...किसी भी तरह का कोई प्रचार उन महाशय  को मिले...दिल गवारा नहीं करता) .एक सीरियल को बनाने में निर्माता-निर्देशक..कलाकार सबका सहयोग होता है.पर इस सीरियल का Concept and Story  इन्ही महाशय का है. और वे एक युवा हैं,जिनके कंधे पर देश का भविष्य होता है.

हमारे देशवासियों का एकमात्र प्रमुख मनोरंजन है, टी.वी. सीरियल्स. और पैसों की लालच में इस तरह की कहानियाँ लिख कर वे उनकी मासूम भावनाओं से खिलवाड़ कर रहे हैं, ये लेखक गण. सीरियल की टी आर पी अच्छी ही होगी....क्यूंकि .ढेर सारे विज्ञापन मिल रहे हैं, क्या इस लिए अब इस तरह के crude  scene डाले जाएँ. लगता  है जैसे एक , होड़ लगी हुई है,
मेरे सीरियल के चरित्र तेरे सीरियल के चरित्र से कम  क्रूर कैसे?? और इस तरह की क्रूरता के दृश्य कहीं से भी इम्पोर्ट किए जा रहे हैं.

एक बार लगा, मुझे ये सब नहीं लिखना चाहिए...व्यर्थ का प्रचार मिल जायेगा...पर इतना आक्रोश था...इस तरह, लेखनी के दुरूपयोग पर कि बच्चो जैसा मन किया  इन 'सिद्धार्थ कुमार तिवारी' के विरुद्ध एक "Hate Club " ही बना लूँ...तब शायद उसके कानो तक यह बात पहुंचे. पर फिर वही,बात ...जो लोग इस तरह के सीरियल्स देखते हैं...वे फेसबुक और ऑर्कुट पर नहीं होंगे...शायद हों भी.आजकल महिलाओं के दो अच्छे  टाइम-पास है...नेट और टी.वी. सीरियल्स. हो सकता है...पक्ष और विपक्ष में एक  अच्छी बहस हो जाती,वहाँ .
पर समय की बर्बादी होती..उन लेखक (?) महोदय को प्रचार मिल जता...निगेटिविटी आती सो अलग....इसलिए  बस ब्लॉग पर ही लिख कर संतोष कर लिया.

पर सचमुच किसी गाइड लाइंस की जरूरत अब इन टी.वी.सीरियल को जरूर है..पता नहीं हमारी सभ्यता-संस्कृति के प्रति किस तरह लोगो को गुमराह कर रहे हैं, ये .जिनकी मातायें ऐसे सीरियल्स देखती हैं , उनके छोटे-छोटे बच्चे भी साथ में देखते हैं...और उनके कच्चे मन पर यही प्रभाव पड़ता है कि हमारे देश के रीती-रिवाज़..परम्पराएं ऐसी ही हैं. क्यूंकि किताबें पढने का शौक तो अब बच्चों  में रहा नहीं. वे सीरियल  और फिल्मो में दिखाए गए गाँव को ही भारत की असली  तस्वीर समझ लेते हैं. 

ऐसा नहीं है  कि ये सब बातें ये सीरियल निर्माता नहीं जानते...पर उनकी आत्मा ही मर चुकी है. ये किसी अपराधी से कैसे कम हैं जो हमारी सभ्यता-संस्कृति के साथ ही खिलवाड़ कर रहे हैं??

फिल्म The Wife और महिला लेखन पर बंदिश की कोशिशें

यह संयोग है कि मैंने कल फ़िल्म " The Wife " देखी और उसके बाद ही स्त्री दर्पण पर कार्यक्रम की रेकॉर्डिंग सुनी ,जिसमें सुधा अरोड़ा, मध...