Thursday, March 16, 2017

"काँच के शामियाने " पर मेरी पुष्पा मौसी की टिप्पणी

'घर की मुर्गी दाल बराबर' कहावत हर बार सही सिध्द होती है . मेरा उपन्यास 'काँच के शामियाने ' काफी लोगों ने पढ़ा और उसपर लिखा भी, किताब के साथ तस्वीरें भी खिंचवा कर भेजीं. पर घर वालों ने चार लाइन में प्रतिक्रिया देकर छुट्टी पा ली. तस्वीर भी नहीं भेजी कोई. लेकिन मेरी सबसे छोटी 'पुष्पा मौसी' ने काफी देर से पढ़ा पर पढ़कर मुझे फोन किया और कहा,मैंने किताब पढ़कर कुछ लिखा है, तुम्हे सुनाती हूँ. सुनने में मुझे कविता सरीखी लगी. मैंने फरमाईश की कि टाइप कर के भेज दो. पर मौसी के लिए देवनागरी में टाइप करना मुश्किल था .फिर मैंने कहा,'पोस्ट कर दो' .वे भी खुश हो गईं कि बड़े दिनों बाद किसी को चिट्ठी भेजूंगी .मैंने भी शायद सदियों बाद कोई पाती पाई .

ये मौसी कम दोस्त ज्यादा हैं. आठ भाई बहनों में सबसे छोटी और अपनी बहन की बेटियों से थोड़ी ही बड़ी. गर्मी छुट्टियों में रात रत भर जागकर हम दोनों ने एक दूसरे को देखी गई फिल्म, पढ़े गए नॉवेल की कहानियाँ सुनाईं हैं. कॉलेज के दिनों में मेरी लिखी कहानियाँ ,इन्होने ही सबसे पहले सुनी हैं. मुझे इनकी एक बात हमेशा याद आती , जब रात के अँधेरे में बिस्तर पर लेटे, हम एक दूसरे को कहानियाँ सुनाते थे तो वे कहतीं, ' कुछ सुनाने में चेहरे के एक्सप्रेशन का भी बहुत महत्व होता है, अँधेरे में तुम चेहरे के भाव नहीं देख पा रही....वरना ज्यादा रोचक लगती कहानी' :)
बहुत शुक्रिया मौसी जी ( शायद पहली बार उन्हें शुक्रिया कह रही हूँ :) )

"कहानियों और कविताओं' की फिसलन भरी घाटी में तुम पूरी तैयारी के साथ उतर गई और 'काँच के शामियाने' उपन्यास की रचना कर दिल की गहराइयों को छू गई .हर महिला कहीं ना कहीं उस किरदार में अपने को ढूँढने लगती है. तुम्हारे उपन्यास में मनुष्यत्व की खोज और बचाव के लिए निकली किरदार जया दिल में उतर जाती है.
सच कहा है --
"भरोसा खुदा पर है, तो जो लिखा है तकदीर में वही पाओगे.
भरोसा खुद पर है तो खुदा वही देगा, जो तुम चाहोगे ."
रश्मि तुम एक सजग लेखिका हो, जो अपने आसपास की चीजों को, संबंधों को बहुत सूक्ष्मता से पकडती हो .और तुम्हारे भीतर का कथाकार उसे बारीकी से चित्रित करता है. अपने पहले उपन्यास 'काँच के शामियाने' में स्त्री-पुरुष के जटिल संबंधों तथा पुरुष के अभिमान की गहरी मनोवैज्ञानिक पड़ताल कर डाली .अपनी सधी हुई लेखनी से लेखिका किसी मनोवैज्ञानिक की तरह जया के भीतर उतरने लगी और पाठक की आँखों से अपने आप आंसू गिरने लगे. तुम पात्रों के भीतर साहसपूर्वक उतरती हो ,कारण ढूंढ लाती हो औए उसका व्यक्तित्व उभार देती हो. तुम्हारे उपन्यास से महिलाओं को एक बड़ी सीख मिलती है. अपने को बचाते हुए वो समाज में क्या कुछ नहीं कर सकती. जज्बा और जरूरत ही किसी स्त्री को महान बनाता है.
रीना (रश्मि ) तुम्हारा लेखिका होना ही तुम्हारा इच्छित संसार है. ढेर सारा आशीर्वाद .
जया के लिए :
"दिन सपनों को सजाने, घर को बचाने में रह गई
रात पति धर्म निभाने, बच्चों को सुलाने में रह गई
जिस घर में अपने नाम की तख्ती भी नहीं
सारी उम्र उस घर को सजाने में रह गई "
(टाइप करते वक्त ध्यान गया ,मनोवैज्ञानिक शब्द दो बार आया है...उन्होंने मनोविज्ञान में एम.ए. किया है, इस शब्द से लगाव लाज़मी है :) )

3 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (19-03-2017) को

    "दो गज जमीन है, सुकून से जाने के लिये" (चर्चा अंक-2607)

    पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. बहुत अच्छा और सच्चा लिखा है मौसी ने. मेरा प्रणाम कहना उन्हें.

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