Thursday, November 11, 2010

सुन्दर पुस्तक पर बनी एक साधारण फिल्म "Eat ,Pray and Love"

ब्लॉग पर लिखना शुरू किया तो अपनी कुछ पसंदीदा किताबों का जिक्र करने की सोची थी. उसमे से ही एक किताब थी "Eat , Pray, and Love " जो एक महिला पत्रकार के सच्चे अनुभवों पर आधारित है. इस किताब पर फिल्म बनने की घोषणा हुई. प्रसिद्द हॉलीवुड अभिनेत्री 'जूलिया रॉबर्ट्स' शूटिंग के लिए भारत आयीं., हिन्दू धर्म से प्रभावित हो हिन्दू धर्म अंगीकार कर लिया और अब वे अपने पति और तीनो बच्चों के साथ नियमित मंदिर जाती हैं और प्रार्थना भी करती हैं. उनके भारत भ्रमण के दौरान स्वामी धरम देव ने  उनके तीनो बच्चों को नए हिन्दू नाम दिए, 'लक्ष्मी', 'गणेश' और 'कृष्ण' . फिल्म पूरी हो कर प्रदर्शित भी हो गयी...और मैने देख  भी ली, अब जाकर उसपर कुछ लिखने का सुयोग जुटा. लेखन और फिल्मांकन , दोनों अलग माध्यम हैं और अक्सर फिल्म, पुस्तक के साथ पूरा न्याय नहीं कर पाती. यहाँ भी यही अनुभव हुआ. किताब तो बहुत अच्छी लगी पर फिल्म साधारण ही रही.

अमेरिका में रहने वाली ,एलिज़ाबेथ गिल्बर्ट , एक सफल पत्रकार है, शादी शुदा है...पर उसे लगता है कि ज़िन्दगी एक बंधी बंधाई लीक पर चल रही है और वह इस रुटिनी ज़िन्दगी से खुश नहीं है. जब वह तलाक की मांग  करती  है तो पति को आश्चर्य होता है कि,'नाम, पैसा, शोहरत सब तो है...उसे और क्या चाहिए .पर वो इतनी दुखी है कि,बस वीकडेज़ में ऑफिस, और वीकेंड्स पर पार्टी...यही उसकी ज़िन्दगी हो कर रह गयी है. इस आत्मा विहीन ज़िन्दगी से तंग आ चुकी है. आखिरकार तलाक ले कर स्वतंत्र  रूप से रहने लगती है. थोड़े समय के लिए एक एक्टर के साथ उसका अफेयर होता है.जो एक भारतीय गुरु (महिला) का बहुत बड़ा भक्त है. एक बार लिज़ को उसका एक दोस्त कहता है पहले तुम अपने पति की तरह दिखती थी,बातें करती थी,कपड़े पहनती थी अब अपने बॉय फ्रेंड की तरह.
तब लिज़ को अहसास होता है कि वह एक चक्रव्यूह से निकल कर  दूसरी में फंस गयी है और उसके स्वयम से साक्षात्कार का मिशन अधूरा ही रह गया है. फिल्म में इस भाग को बहुत अच्छी तरह फिल्माया गया है. लिज़ का कशमकश और उसके पति की हताशा..सब बहुत ही अच्छे ढंग से उभर कर आए हैं.

लिज़ पूरे एक साल  का प्लान बनाती  है,जिसमे चार महीने इटली  में जी भर कर खाने का (EAT ), अगले चार महीने भारत के एक आश्रम  में बिताने का (PRAY ) और फिर अंतिम चार महीने बाली में ज़िन्दगी को भरपूर एन्जॉय करने का (LOVE)

 इतने वर्षों से अपने आपको मेंटेन रखने  के लिए की गयी डायटिंग छोड़, इटली में  वह जगह जगह पिज्जा का लुत्फ़ उठाती है...खूब घूमती है, वहाँ की भाषा सीखती है, स्थानीय लोगों से मिलती  है और एक बेफिक्र ज़िन्दगी जीती है. फिल्म में यह भाग बहुत जल्दी में समेटा गया लगता है.

उसके बाद चार महीने के लिए वह भारत आती हैं. किताब में यह अध्याय बहुत ही रोचक है.(शायद अपने देश का जिक्र होने से मुझे ज्यादा अच्छी लगी) . पर जिन गुरु से मिलने वह आती है..वे उन दिनों न्यूयार्क के दौरे पर गयी होती हैं. फिर भी वह आश्रम में ठहर जाती है .यहाँ, वह सेवा कार्य में जमीन पर पोछा लगाती  है, हाथ से शाकाहारी  दाल-चावल खाती है. और ध्यान लगाती है. एक बार वह गार्डेन में ध्यान लगाती है और मच्छर  काटना शुरू कर देते हैं फिर भी बर्दाश्त कर बैठी  रहती है. करीब ३ घंटे तक वह ध्यान में बैठी रहती है और पाती है कि कुछ देर  बाद वह  मच्छर  काटने के अहसास से परे हो जाती है {अगर मलेरिया वाले  मच्छर ना हों तो लोग आजमा कर देख सकते हैं.:) }आश्रम में सुबह पांच बजे उठाकर प्रार्थना करना होता है और मेडिटेशन केव में ध्यान लगाना होता है. बीच में  कई दिन मौन-व्रत भी रखे जाते हैं. यहीं एक और विदेशी से उसकी मुलाक़ात होती है जो अरबपति था . शारब और जुए की  ज़िन्दगी से तंग आ यहाँ मन की  शान्ति की  खोज में आया था .और अब, बिना,मांस-मदिरा-सिगरेट के सात्विक जीवन जीना सीख गया था.

किताब में तो आश्रम का वर्णन देख एक दूसरी ही तस्वीर बनती है. पर फिल्म में भारत भ्रमण के पहले दृश्य में ही दिखते हैं, कचरा बीनते बच्चे, भिखारी, धूल भरी सड़कें, टैक्सी का रास्ता रोके खड़ी बैलगाड़ी और खिड़की के पास पैसे मांगता बच्चों का झुण्ड. आश्रम भी गन्दा सा था जबकि भारत में कई जगह हरियाली से घिरे साफ़-सुथरे सुन्दर आश्रम हैं. शायद राजस्थान के किसी गाँव में शूटिंग की गयी थी , चटख रंग के कपड़ों में स्त्रियाँ सड़क किनारे कपड़े सुखाती दिखती हैं. पर राजस्थान में अचानक आश्रम में एक हाथी भी आ जाता है. बस, एक सांप और संपेरे की कमी थी, वह भी दिखा देते. भारत का जिक्र हो..और भारतीय शादी ना दिखाएँ...ये तो संभव नहीं. पुस्तक में इसका जिक्र नहीं पर आश्रम के एक भक्त की बेटी की अरेंज्ड मैरेज होती है, लिज़ को इसपर भी आश्चर्य होता है. फिर शादी का नाच-गाना. दक्षिण भारतीय श्रृंगार है वधु का, पर बारात और भांगड़ा भी है साथ में. जूलिया रॉबर्ट्स, हरे रंग की बनारसी साड़ी और बिंदी में बहुत सुन्दर लगी.वो अरबपति विदेशी भी कुरते और साफे में जंच रहें थे.

चार महीने बाद वह बाली में चली आ जाती है. ज़िन्दगी को फिर से महसूस  करने के लिए. बाली की प्राकृतिक सुन्दरता को बहुत खूबसूरती से कैद किया गया है,कैमरे में. (मैं थियेटर में ही सोच  रही थी..हमारे यहाँ भी तो केरल,हिमाचल,सिक्किम आदि हैं...वहाँ आश्रम भी होंगे...वहाँ क्यूँ नहीं की शूटिंग??)  यहाँ, वह एक बहुत पुराने ज्योतिषी से मिलती है.और उसकी पाण्डुलिपि का अंग्रेजी अनुवाद करती है. यही एक होटल के मालिक से उसकी मुलाकात होती है और उसके साथ वह ज़िन्दगी का आकंठ रसास्वादन करती है. लिज़ की दोस्ती एक महिला डॉक्टर से होती है जो तलाकशुदा है और अपने लिए एक परमानेंट छत की तलाश में है. उसकी छः  साल की बेटी नीले रंग का एक टाइल्स सीने से चिपकाए घूमती रहती  है कि अपना घर होगा तो ऐसे ही टाइल्स लगवायेगी.

लिज़ का जन्मदिन आ रहा है और वह दुनिया भर में फैले अपने दोस्तों (अमेरिका के दोस्त, इटली में बने दोस्त..भारत में मिला वह अरबपति)  से आग्रह करती है कि इस बार उसे जन्मदिन पर कोई तोहफा ना देकर. कुछ  राशि उस बच्ची के नाम भेज दें. और एक अच्छी रकम जमा हो जाती है ,जिस से वह उनके लिए एक घर खरीद देती है.

एक साल अपनी  मर्जी से ज़िन्दगी जीकर वो वापस अमेरिका लौट आती है. और वास्तविक जीवन में  , इसके बाद एलिजाबेथ गिल्बर्ट अपने अनुभवों पर आधारित एक किताब लिखती हैं .Eat, Pray and Love  जो पूरे साल  भर अमेरिकन बेस्ट सेलर में नंबर वन पर रहती है

35 comments:

  1. बहुत ही रोचक कहानी है। और बहुत बढिया ढंग से आपने उसके बारे में बताया भी है। अच्छा लगा जानकर।

    बढ़िया पोस्ट।

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  2. मैंने आज दोपहर में ही फिल्म देख ली..

    किताब तो मैंने नहीं पढ़ा अब तक लेकिन फिल्म अच्छी ही लगी...

    भारत में जो सीन्स दिखाए गए हैं उनपे मेरी भी बहुत ज्यादा आपत्ति है..ये लोग हर बार भारत की वही तस्वीर क्यों दिखाने पे तुले रहते हैं जो असल भारत से बहुत अलग है..

    आश्रम तो ऐसे ऐसे हैं जहाँ से लोग वापस आना नहीं चाहते..इतने खूबसूरत और अच्छे आश्रम हैं हमारे देश में...फिर ऐसे आश्रम दिखाने की क्या बात सूझी..वहीँ ये देखिये की "बाली" वाले पार्ट में कितना खूबसूरत आश्रम दिखाया गया है...

    इटली वाला पार्ट मुझे ज्यादा अच्छा लगा..

    और हाँ, वैसे जुलिया रोबर्ट्स तो मेरी फेवरिट है..और वो साड़ी में तो कहर ढा रही थी...इसमें कोई शक नहीं :)

    आप इतनी जल्दी इसपे पोस्ट लिख देंगी ये मुझे अंदाजा नहीं था :)

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  3. @अभी,
    मेरे हिसाब से तो बहुत देर हो गयी...पंद्रह दिन से ऊपर हो गए फिल्म देखे...कब से सोच रही थी,लिखना.

    भारत की ये तस्वीर दिखाने पर मैने मुंबई में पले-बढे फ्रेंड्स से डिस्कस किया ...तो उनका कहना था , "एक्चुअली ऐसा ही होता है..हमलोग भी नॉर्थ जाते हैं तो सबसे पहले,बढ़िया सी कार के आगे घूमते गाय-बैल...और बैलगाड़ी देख,आश्चर्य होता है"...और वे लोंग ऋषिकेश की बात कर रहें थे.

    खैर जो भी हो..पर ये विदेशी फिल्मकार की आदत हो गयी है.."ब्राइड एंड प्रेजुडिस' का पहला सीन ही बैलगाड़ी से शुरू होता है और गुरिंदर चड्ढा विदेशी भी नहीं.

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  4. बहुत बढ़िया जानकारी दे दी है ...कुछ इस तरह कि यदि पिक्चर नहीं भी देखी तो ऐसा नहीं लगेगा कि छुट गयी है ...वैसे भी आज कल पिक्चर देख नहीं पाती हूँ ..तो यहाँ सब जानकारी मिल गयी ....सब कुछ समेट लिया है ..

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  5. मेरे लिए ये एक नई जानकारी है।
    मैं जेनेरली अंगरेज़ी फ़िल्म नहीं देखता
    पर आपका विवरण रोचक लगा।

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  6. क्या फिल्म का नाम भी ईट प्रे एंड लव है? लगता है देखनी पड़ेगी पड़ेगी फिल्म और पढनी पड़ेगी बुक भी.इतनी उत्सुकता जो जगा दी है आपने.

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  7. @ शिखा,
    फिल्म का नाम भी Eat,Pray and Love ही है..अगर किताब ना पढ़ी हो तो फिल्म शायद अच्छी ही लगे...जैसे अभिषेक को अच्छी लगी.

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  8. हमने भी किताब पढ ली, तुम्हारे बहाने... सुन्दर समीक्षा.

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  9. " छः साल की बेटी नीले रंग का एक टाइल्स सीने से चिपकाए घूमती रहती है कि अपना घर होगा तो ऐसे ही टाइल्स लगवायेगी."

    is ek line ne mujhe bahut hi haunt kiya.... very touchy...

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  10. हम तो आपके अन्दाज़े-बयाँ पर फिदा हैं ।

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  11. समीक्षा के लिये धन्यवाद

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  12. फ़िल्म देखूंगा अवश्य

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  13. उपन्यास या फिल्म में जिंदगी जीने का शानदार फलसफा है ...मगर ये उपन्यास और फिल्म ही है ....क्या ईट प्रे और लव इतना आसान ही रह जाता होगा ...चलो कोई नहीं , दूसरों के जिन्दगी जीने के इस अंदाज़ को देखकर ही खुश हो लेने में क्या जाता है , मतलब तो अच्छे कारणों से खुश रहने में है ...
    राजस्थान के आश्रम में हाथी आ जाना कोई आश्चर्यजनक बात नहीं है , हाथी तो कही भी पाले जा सकते हैं ...हाँ इन्हें ऊंट या मोर भी दिखाने चाहिए थे ...सांप संपोले भी यहाँ दूसरे राज्यों की उत्लना में कम ही पाए जाते हैं ..
    @किसी गंदे से आश्रम में शूटिंग की गयी है और वो राजस्थान का लगता है ...क्या कह रही हैं आप ...
    राजस्थान में कई खूबसूरत हरियाली आच्छादित आश्रम हैं ,(हालाँकि मैं आश्रम और गुरुओं दोनों को दूर से ही प्रणाम करती हूँ ) और दूसरे प्रदेशों के मुकाबले यहाँ मक्खी-मछर भी कम है ,यहाँ कोई मछरदानी भी नहीं लगाता :):)..

    अच्छी हलकी -फुलकी सी कहानी लगी इसलिए देखने का भी मन है ..!

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  14. Eat, Pray and Love के प्रणयन की रोचक गाथा -शुक्रिया !

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  15. बहुत ही रोचक कहानी है। और बहुत बढिया ढंग से आपने उसके बारे में बताया भी है। अच्छा लगा जानकर।

    बढ़िया पोस्ट।

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  16. @वाणी....मैने गंदे आश्रम के साथ, राजस्थान को नहीं जोड़ा है....बल्कि चटख रंग के कपड़े पहने घूँघट काढ़े स्त्रियों से एसोसियेट किया है..ठीक से पढो ,बाबा
    "शायद राजस्थान के किसी गाँव में शूटिंग की गयी थी , चटख रंग के कपड़ों में स्त्रियाँ सड़क किनारे कपड़े सुखाती दिखती हैं."

    हाथी तो कहीं भी पाले जा सकते हैं सही कहा....पर जब विदेशी फिल्मकार भारत पर फिल्म बनाते हैं...तो हाथी, बैलगाड़ी, भिखारी और स्ट्रीट चिल्ड्रेन ...जरूर दिखाते हैं.
    इन सबसे परे भी बहुत कुछ है,भारत में दिखाने को

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  17. @संजीत
    वह भाग सचमुच इस फिल्म का सबसे संवेदनशील पक्ष है...वो लड़की हमेशा उस छोटे से टाइल्स के टुकड़े को नीचे रख कर बैठती थी और कल्पना करती थी कि वह अपने घर के फर्श पर बैठीं है.

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  18. great narration and presentation. u r master of such art, u can help many by inspiring in right direction

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  19. aapse sunna aur aapki aankhon se dekhna bahut achha lagta ...

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  20. बहुत रोचक पुस्तक के बारे मे बताया। देखते हैं फिल्म भी। धन्यवाद।

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  21. उत्सुकता जाग गई
    देखकर देखते (बताते) हैं

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  22. रोचक समीक्षा है
    हिन्दी में होती तो देख भी लेते। पुस्तक ढूंढनी पडेगी हिन्दी होगी तो

    प्रणाम

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  23. आपने इतनी सुन्दर समीक्षा की है कि अब फिल्म देखने की और उपन्यास पढने की उत्सुकता डबल हो गयी है ! वैसे भी जूलिया रोबर्ट्स मेरी फेवरेट अभिनेत्री हैं ! इसमें कोई दो राय नहीं कि हॉलीवुड के फिल्मकार भारत की ऐसी ही घटिया छवि दिखाने के लिये तत्पर रहते हैं जबकि भारत में कई बहुत सुन्दर और दर्शनीय स्थान भी हैं ! लेकिन ऐसे दृश्य भी हमारे ही देश में दिखाई देते हैं इसे भी तो नकारा नहीं जा सकता ! उन्हें अपनी लकीर बड़ी दिखाने के लिये दूसरी लकीर को छोटा दिखाना लाजिमी है और इसीलिये उनका फोकस शायद ऐसे दृश्यों पर ही अधिक रहता है ! इतनी अच्छी फिल्म और उपन्यास के बारे में जानकारी देने के लिये धन्यवाद !

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  24. काफ़ी सजीव चित्रण किया है…………ना देखी ना पढी मगर तुमसे काफ़ी जानकारी मिल जाती है तो लगता है देख भी ली और पढ भी ली।

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  25. न तो मैंने किताब पढ़ी और न ही फ़िल्म देखी , लेकिन अब लग रहा है कि मैंने दोनों ही काम कर लिए हैं. जिस तरह से तुमने कहानी सुनाई और फ़िल्म दिखाई दोनों के लिए धन्यवाद! हम फ़िल्म न देखने वालों के लिए तुम बहुत उपयोगी काम कर देती हो. एक बार फिर से धन्यवाद !

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  26. ना पढ़ा और ना ही देखा पर आपके हवाले से जो भी जाना अच्छा लगा !
    देर से आ पाया हूं तो टिपियाने का चार्म खत्म हो चुका है :)

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  27. rashmi di,
    ek book,ek film,ek aapka post...
    post pahle padha..film aur book baki hay..dekhna ye hay ki story ki prastuti sabse achchhi kisme hay.. mujhe aapki prastuti sahaj saral aur shandaar lagi..book,film talash karunga.

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  28. सुन्दर पुस्तक पर बनी एक साधारण फिल्म।
    एकदम सही कहा है आपने। फिल्म अच्छी है, पर उम्मीदें ज्यादा थीं। खैर मैं तो आपकी समीक्षा पर मुस्कुराता ही रहा। बढिय़ा।

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  29. न तो किताब पढ़ने का मौका लगा, न ही अभी तक फ़िल्म ही देख पाई हूं. पर आपने इतनी बढ़िया समीक्षा करके, इसे देखने और पढ़ने की उत्सुकता बढ़ा दी है. हमेशा की तरह सहजता और रोचकता का अनूठा संगम लिए, इस सुंदर समीक्षा के लिए आभार.
    सादर,
    डोरोथी.

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  30. बहुत दिलचस्प तरीके से फिल्म की कहानी सुनाई आपने।
    अवसर मिला तो ज़रूर देखेंगे ।

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  31. विवरण रोचक.....अच्छी लगी समीक्षा....अब फिल्म देखने का मन बन रहा है....

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  32. एक जगह मन लगाने के लिये दूसरी जगह से उचटना आवश्यक है।

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  33. अपने व्यस्त समय में से कुछ फ्री समय निकाल कर इस फिल्म को देखने का प्रयास करूंगा.
    अच्छे विवरण के लिए धन्यवाद.
    WWW.CHANDERKSONI.BLOGSPOT.COM

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  34. अरे वाह ! दीदी,

    आपके ब्लॉग होलीवुड फिल्म समीक्षा भी पढने को मिलती है |

    आपकी लिखी समीक्षा पढ़ना सुखद है |अभी फिल्म नहीं देखी है

    एक बात तो माननी पड़ेगी "होलीवुड वाले" [मतलब अभिनेता , अभिनेत्री ,निर्देशक आदि ] जिस तरह से फिल्म तैयार करते हैं लीक से हट कर भी कोई फिल्म हो तो देखे बिना नहीं रहा जाता

    ऐसा लगता है गीता की सीख " कर्म करो [फिल्म बनाओ ] फल [प्रोफिट] की चिंता मत करो" इन्होने ने ही अपना लिया हो और हम लोग भूल रहे हों

    मैंने एलिजाबेथ टाउन फिल्म देखी थी , समीक्षा पढ़ कर पता नहीं क्यों ...एक दम से वही याद आ गयी

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