सोमवार, 15 नवंबर 2010

"दिल तो बच्चा है,जी....किसका??..हमारे नामचीन ब्लॉगर..." (2)

(पिछली पोस्ट में आपने पढ़े, ज्ञानदत्तजी, इंदु जी,राज भाटिया जी, समीर जी, अनुराग जी, डा.दराल एवं अली जी के बचपने के किस्से....आज कुछ और ब्लोगर साथियों के कारनामे पढ़िए  )


पतिदेव का हाथों का ओक बना पानी लाना और साधना जी का घरौंदे बनाना


उम्र के इस मुकाम पर आकर बच्चों के साथ जब भी वक्त मिले, बाल-सुलभ क्रिया-कलापों में व्यस्त रहना, दीन-दुनिया की सुध भुलाकर बच्चों के साथ बच्चा बन जाना, उनसे छोटी-छोटी बातों पर स्पर्धा करना शायद सब बाबा-दादियों का सबसे ख़ूबसूरत समय होता है. बच्चों के साथ खेलते हुए इतना उत्साह भर जाता है मन में कि ना तो हाथ-पैर का दर्द याद रहता है ना ही कोई पारिवारिक समस्या ही मन को उद्वेलित करती है. आज आपको अपने उस अनमोल अनुभव के बारे में बता रही हूँ जब मैं ६-७ साल की बच्ची के चरित्र में पूरी तरह रूपांतरित हो गयी थी. और हर्ष उल्लास के समंदर में गोते लगा रही थी
(साधना  जी साड़ी में हैं )
.
इसी वर्ष, फ़रवरी माह में, मैं और मेरे पति ,अपने समधी और समधिन  श्री एवं श्रीमति प्रसाद के साथ  मांडवी बीच घूमने गए   आम तौर पर बीच पर जो  मनोरंजन के साधन होते हैं,वहाँ भी थे. सजे हुए हाथी घोड़े और ऊंट .हाथी -घोड़े पर तो क्या बैठते बस साथ खड़े हो फोटो खिंचवा ली. बीच पर लहरों का शीतल स्पर्श महसूस करने के लिए हमने चप्पल उतार हाथों में ले ली. लहरों के लौटने के साथ जब रेत पैरों के नीचे से खिसकती तो बहुत मजा आता. हम चार जन ही थे. तभी देखा, किनारे पर रेत के छोटे-छोटे घरौंदे बने हुए हैं. बस सारा शर्म संकोच त्याग, मैं भी घरौंदे  बनाने बैठ गयी. मेरा बचपना देख सब हैरान थे ,पर संकोचवश किसी ने कुछ नहीं कहा. गीली रेत में गहरे पैर जमा, हाथों से थपकना शुरू किया. जब पैर निकाला तो छोटी सी गुफा बन गयी थी. कुछ उत्साह और बढ़ा. और मैंने  कुछ और आकार बना अपनी वास्तु कला का परिचय देना शुरू किया. अब मिसेज़ प्रसाद को भी मजा आने लगा था. वे भी नीचे बैठ गयीं और मेरे आग्रह पर घरौंदे बनाना शुरू कर दिया. प्रसाद जी और वीरेंद्र पहले तो गप्पें लगाते रहें, पर जब देखा कि हम घरौंदे बनाने में तल्लीन हैं तो उन्होंने भी दिलचस्पी लेनी शुरू कर दी. बड़ी बारीकी से हम दोनों की हस्तशिल्प का जायजा लेने लगे. दिन चढ़ने पर धूप तेज हो रही थी और रेत सूख कर भुरभुरी होती जा रही थी. वीरेंद्र और प्रसाद जी हमारा उत्साह बढाने को चुल्लू में पानी भर-भर कर लाने लगे, रेत को गीला करने को. साथ ही सलाह भी दे रहें थे और उनकी कमेंटरी भी चालू थी.

"देखिए, मिसेज़ वैद्य ने तो बाउंडरी भी बनायी है "

"मिसेज़ प्रसाद के घर का ले-आउट बहुत बढ़िया है "

तारीफ़ के बोल सुन उत्साह से हम फूले नहीं समा रहें थे और दूने उत्साह से अपनी कलाकारी दिखाने में जुटे थे. दोनों, एक दूसरे का घरौंदा भी गौर  से देख  रहें थे कि कौन सी नई चीज़ है जिसे कॉपी करके बनाया जा सके. शिल्प के दृष्टि से कोई भी उन्नीस नहीं था. पर बाल-सुलभ स्पर्धा मन में हिलोरें ले रही थी कि मेरा घरौंदा दूसरे के घरौंदे से ज्यादा अच्छा होना चाहिए. जीतने के लिए कुछ तो नया करना था. तभी थोड़ी दूरी पर मुझे एक सींक पड़ा दिखाई दिया. हमारे खाने में आधा कटा नीबू बचा हुआ था . उसे ही  मैने उस सींक पर लगा कर घरौंदे के बुर्ज़ पर लगा दिया तो सबने जोर से ताली बजाकर मेरा उत्साहवर्द्धन किया. उस समय जिस प्रसन्नता और सुख का अनुभव किया, वह अनिवर्चनीय है. सारी सांसारिक चिंताएं भुला,हम चारो लोंग बिलकुल बच्चे बन गए थे.और अपनी उम्र को सालों पीछे धकेल ,घरौंदे बनाने में इतने मस्त हो गए थे कि अगर हमारे पोते-पोती  हमें देखते तो विश्वास ही नहीं कर पाते कि ये उनके ही बाबा-दादी और नाना-नानी हैं

.

  जीवन की आपा-धापी में यह सुख-संतोष, ये खुशियाँ , उत्साह-उमंग कब-कहाँ हमसे हाथ छुड़ा गायब हो जाते हैं, हम जान भी नहीं पाते. साथ रह जाती हैं सिर्फ निर्मम जिम्मेवारियां, कर्त्तव्यों के निर्वहन की चिंताएं और शुष्क सी नीरस ज़िन्दगी. अगर थोड़े से ख़ुशी के पल चुरा लें
तो ज़िन्दगी खुशनुमा हो जाएगी.


ऐसा भी क्या रूठना ,सलिल जी

ये तब की बात है,जब हम शारजाह में थे .मेरी बिटिया उस समय, पांच या छः साल की थी. घर पर मनोरंजन के नाम पर एक टी.वी. था, जिस पर कुछ हिन्दुस्तानी चैनल्स आते थे. बाकी अरबी में ख़बरें आती रहती थीं.

उस रोज जब मैं ऑफिस से लौटा तो किसी ख़ास घटना की खबर आई थी और उसे देखने, बिना कपड़े बदले ही टी.वी. के सामने बैठ गया. अभी समाचार शुरू हुआ ही था कि मेरी बेटी ने रिमोट हाथ में ले लिया. और कोई कार्टून चैनल लगा दिया. मैने कहा, "झूमा, मुझे न्यूज़ देखने दो "मैने रिमोट लेकर दुबारा चैनल बदल दिया.

बेटी ने फिर से कार्टून लगा दिया तो मैने डांट कर कहा, 'मुझे देख लेने दो फिर तुम देख लेना.' तो उसने जिद पकड़ ली और बार-बार चैनल बदलने लगी. मैने गुस्से में रिमोट छुपा दिया तो उसने टी.वी. का स्विच ही ऑफ कर दिया. अब मेरा गुस्सा सातवें आसमान पर था. लेकिन आदत से मजबूर मुझे गुस्सा आने पर हंसी आ जाती है. पत्नी ने किचन से ही हम दोनों को समझाने की कोशिश कि. फिर कोई असर ना होता देख, किचन में व्यस्त हो गयी.

मैने गुस्से पर नियंत्रण रखते हुए बोला, "प्लीज़ मुझे देख लेने दो...फिर तुम देख लेना" पर उसने भी अपनी आँखें लाल कर रखीं  थीं. मुझसे ज्यादा गुस्से में वो थी. उसका यह रूप पहले कभी नहीं देखा था और बाद में भी देखने को नहीं मिला.

मेरे सब्र का बाँध टूट चुका था . हमारे घर में पिटाई का चलन नहीं है . ना ही मेरे माता-पिता ने कभी हमारी पिटाई की ना मैने ही कभी बिटिया को एक थप्पड़ भी मारा हो. मैने आव देखा ना ताव. दरवाज़ा खोल कर बाहर  निकल आया और जोर से दरवाज़ा बंद कर दिया. मेरी पत्नी आवाज़ सुनकर बाहर आयीं और आवाज़ भी दी कि ,"कहाँ जा रहें हो?" पर तब तक लिफ्ट आ चुकी थी और मैं लिफ्ट से नीचे.

घर से निकल कर सीधा समंदर के किनारे  (वहाँ इस जगह को कोर्निश कहते हैं ) चला गया. वहाँ आधी रात को भी रौनक रहती है. मैं सारी रात वहाँ, समंदर की लहरों को देखता रहा.मुझे यह भी चिंता नहीं हुई, घर पर पत्नी परेशान होगी.

सुबह घर लौट तो बिटिया  नींद में थी, पत्नी रोने लगी. पता चला ,सारी रात वो जावेद भाई और शहजादी भाभी के साथ ,मुझे शारजाह की सडकों पर ढूँढती  रही.सिनेमा हॉल,पार्क सब जगह खोज आई. मोबाइल घर पर ही छोड़ आया था .इसलिए फोन भी नहीं कर सकी. कामलि और एजाज़ दुबई तक ढूंढ आए मुझे.

मुझे अपने किए पर शर्मिंदगी महसूस होने लगी. सच है, गुस्सा उस उबलते पानी की तरह है जिसमे आदमी अपनी शक्ल नहीं देख पाता. अलार्म घड़ी ने पांच बजने का ऐलान किया और बिटिया जग गयी,अपने स्कूल के लिए. अपनी दोनों बाहें फैला कर बोली, "गुड़ मॉर्निंग!! डैडी आप कहाँ चले गए थे, सॉरी ". मैने दोनों को अपनी बाहों में समेट लिया.
पत्नी ने कहा, "आप भी बच्चों के साथ बच्चा बन जाते हैं "


"तभी तो कहता हूँ कि बस एक ही ख्वाहिश है, तुम्हीं से जन्मूँ  तो शायद पनाह मिले."

"कपड़े बदलिए, चाय लाती हूँ "

और मैने वो शर्मिंदगी उतार दी और बेटी का माथा चूम लिया

कोई अनजान करे , इज़हार-ए-मुहब्बत   तो समझ लीजिये, सतीश जी की है करामात
   

इसी  अप्रैल की पहली तारीख को मैने और दो कलीग्स ने मिलकर अपने एक साथी के साथ शैतानी की थी।  एक नये नये लिए गए सिम कार्ड से उस साथी को बहुत ही नॉटी अंदाज में एक महिला कलीग से फोन करवाया गया। 

फोन पर महिला कलीग से कहलवाया कि -  आज मैं तुम्हारे घर आ रही हूं
मैं तुमसे प्यार करती हूं.....तुम बहुत हैंडसम हो.....आई लाईक योर स्माइल .... वगैरह..वगैरह। 
  
इतना सुनना था कि वह टेंशन में आ गया। हम लोग अपने अपने क्यूबिकल में बैठ कर मुँह नीचे कर हंस रहे थे और उचक कर बीच बीच में उस मित्र के रिएक्शन्स भी देख रहे थे। 
  
उस बंदे ने थोड़ी देर तो बर्दाश्त किया लेकिन फिर उठ कर बगल के एम्पटी मीटिंग रूम में मोबाइल लेकर चला गया। वहां जो कुछ बात चीत हुई सो तो हुई ही, बाहर आकर उसने सीधे वोडाफोन में फोन लगाकर पूछा कि यह नंबर किसका है ? 

वोडाफोन वालों ने जाहिर है  नहीं बताया....बिना किसी पुलिस कम्पलेंट के इस तरह की वो जानकारी भी नहीं दे सकते। सो बंदा पूरे दिन व्यग्र रहा और उधर उधर टहलता रहा। रह रह कर हम लोगों के फोन नंबर भी मिलान कर लेता कि कोई आसपास का तो नहीं मस्ती कर रहा है। 

खैर, शाम तक उसे बता दिया गया कि ये हम लोगों की ही शैतानी थी :)

वंदना दुबे  पूछ रही हैं, मैं बड़ी हो गई हूँ क्या??
  

क्या कहूं रश्मि?  बच्चों के बीच रहते रहते मुझ पर तो बचपना कुछ ज्यादा ही हाबी रहता है. बच्चों के साथ खेलना तो मेरा सबसे प्यारा  शगल है. सो ये कहना मुश्किल है, कि अंतिम बार कब बच्चा  बनी??? मैं तो लगभग रोज़ ही बच्चों जैसी हरकतें करती हूँ :) 

उधर अपने घर में सभी बहनों में मेरा नंबर तीसरा है,  सो मम्मी और दीदियों को मैं हमेशा छोटी ही लगती हूँ. छोटी बहनों ने मुझे कभी दीदी कहा नहीं, नाम ही लेती रहीं, लिहाजा बड़े होने का  मौका ही नहीं मिला. यहाँ ससुराल में मैं बड़ी हूँ, लेकिन सासू माँ के पास अकेली ही हूँ, बाकी सब बाहर हैं, ज़ाहिर है, उनका पूरा दुलार मुझ पर ही निकलता है :). बच्चा बनने के बहुत मौके हैं मेरे पास. आज ही स्टोर रूम कि सफाई करवा रही थी, तो वहां विधु के पुराने किचेन-सेट, टी-सेट निकले, जो कि एक बड़े से कनस्तर में भर के रखवा दिए गए थे. बस मेरा बचपना मुझे चुनौती देने लगा. मैं भी कहाँ कम थी? सफाई माया के भरोसे छोड़, पूरा सामान  बाहर निकाला, अन्दर बरामदे में जमाया और मैं, विधु, और माया की दोनों बेटियां खेलते  रहे :). लो... तुम्हारे टॉपिक के मुताबिक़ तो मैं आज ही बच्चा बनी थी :) .छुट्टियों में तो मैं बच्चों के साथ क्या नहीं खेलती? छुपा-छुपी, आँख मिचौली, इक्की -दुक्की, लूडो, कैरम , गुड्डे-गुडिया की शादी...... सब.  मेरी बहनों के बच्चे मेरे इंतज़ार में रहते हैं, कि कब मैं आऊं, और उनका खेल जमे  छुट्टियों में हम सब बहने अपने घर यानि माँ-पापा के पास इकट्ठे होते ही हैं, जो बहनें  पहले आ जातीं हैं, उनके बच्चे इंतज़ार करने लगते हैं. 

तो भाई, मैं तो हर दिन बच्चा बनती हूँ, कभी अम्मा से जिद करके कुछ  खरीदवाती हूँ,तो कभी विधु की चॉकलेट चुरा के, तो कभी छुड़ा के खा लेती हूँ :)  अब कितना  लिखूंगी? यहाँ तो किस्से भरे पड़े

अरविन्द  जी को अभी से डर है,अगली होली का.


वाकया पिछली होली का है ..बच्चों से ज़रा मेरी ज्यादा पटती है . जब भी मैं अपने पैतृक गाँव जाता हूँ वे मुझे खुशी से  घेर लेते हैं ..चाहे होली हो या दीवाली मैं बच्चों के साथ हिल मिल कर इन त्योहारों को कैसे और बेहतर तरीके से मनाया जाय यह रणनीति बनाते हैं ....मजाक मस्ती में कभी कभी अनजाने ही ऐसी घटनाएं हुई हैं कि मुझे शर्मिन्दगी उठानी पडी है -बच्चे तो बच्चे हैं वे सहज ही माफ़ कर दिए जाते हैं  ,मुझे माफी नहीं मिलती बल्कि मुझे बड़े लोगों का कोप भाजन होना पड़ता है .

अब पिछली होली का ही वाकया है .बच्चों के साथ मिलकर हमने पिचकारियों से गुब्बारों में रंग भर भर कर रंग भरे गुब्बारे तैयार किये .. इस बार का अजेंडा यह था कि सुबह सात बजे के बाद से बच्चा बड़ा या बूढा जो भी दिखे उस पर गुब्बारे फेंकने हैं .अब मेरी किस्मत ही खराब थी उस दिन हमारे बचपन के गुरु जी ही जिनकी उम्र इस समय ७५ वर्ष है आते दिख गए ...मैं उस समय बच्चों की टोली से थोड़ी देर का टाईम आउट ले रखा था ..खेल का समय पहले से तय था ..बच्चों ने आव न देखा ताव गुब्बारे गुरु जी पर चला ही दिए -वे बिचारे भौचक , रंग से पूरी  तरह सराबोर  -गाँव में ताजिंदगी उनके साथ ऐसी होली नहीं खेली गयी थी ....अब वे गरज पड़े ..बच्चों को डाटा तो उन्होंने भोलेपने से बता दिया कि अरविन्द भैया ने ही तो कहा था आपके ऊपर फेंकने को ...मेरी पेशी हो ही गयी उन तक -पूरे परशुराम बने हुए थे गुरु जी ..मैं उनके पैरों पर साक्षात दंडवत हो गया ...बच्चों को क्या कहता ..उनसे ही गिडगिडा के क्षमा माँगी ...लेकिन उनकी डांट    तो  भुलाए नहीं भूलती ...अरविन्द अब बड़े हो गए हो कब तक बच्चे  बने रहोगे ...

अब पता नहीं मेरी अगली होली कैसी बीतेगी ..

शिखा वार्ष्णेय का दिल तो बच्चा है 24 X 7

बच्चों जैसा काम? ...कब किया था?....ये पूछो कब नहीं किया था ...रोज ही कुछ ना कुछ हो जाता है :( ....आवाज़ इतनी बच्चों जैसी है कि फ़ोन उठती हूँ तो सामने वाला बोलता है "बेटा जरा मम्मी को फ़ोन दो ":(... शकल ऐसी है कि बेटी कहती है स्किर्ट पहन कर मेरे स्कूल मत आना :(......वैसे चाहे कितनी भी थकान हो नींद आ रही हो .पर कहीं घूमने जाना हो तो रात को २ बजे भी सबसे पहले तैयार होकर हम तैयार ...कोई कपडा नया खरीदा तो इतनी बेसब्री कि उसी दिन पहन डाला ,कल हो ना हो ... .इटालियन फ़ूड देख कर उछलने लगती हूँ तो बच्चे हाथ पकड़ कर डपट देते हैं :( और आजू बाजु वाले घूरने लगते हैं .कहीं पार्टी में कोई साथ दे ना दे नॉन स्टॉप नाचती रहती हूँ ,पति देव पकड़ पकड़ कर लाते हैं कि खाना तो खा लो,वर्ना घर जाकर कहोगी भूख  लगी है  . और ये पूछतीं हैं कि कब ? कहाँ?...हुंह :(

वेस्टर्न ड्रेस ने रखा मीनू जी को कमरे में कैद


मै उन बेहद सौभाग्यशाली लोगों में से हूँ जिन्हें गार्जियन जैसे बॉस मिलते हैं.
जो मेरे प्रथम बॉस थे वों एक बहुत सोबर और
उदार व्यक्तित्व वाले थे, अपनेपन और रोबदाब का अनूठा मेल. उम्र और व्यवहार में पिता समान.


रेडियो की नौकरी बड़ी टेक्निकल होती है, ऊपर से प्रोडूसर का पद ! हर क्षेत्र के दिग्गजों से
काम करवाना आसान नही था हम जैसे नए लोगों के लिए पर सर की ट्रेनिंग ने चीज़ें बहुत
आसान कर दी. धीरे २ हमारी काम में पकड़ बढने लगी. हमें सर बहुत मानते थे पर हमे उनसे
डर भी बहुत लगता था.वों डाट भी बड़ी जोर से देते थे वों भी सबके सामने.वों भारतीयता के बड़े पक्षधर थे.

आमतौर पर हम सब लडकियां ऑफिस में साड़ी पहना करते थे पर जब सर छुट्टी पर होते थे तो हम लोग बहुत स्टायलिश वेस्टर्न कपड़े पहनते थे. सर ने कभी  कुछ कहा नही पर हम सब समझते थे कि सर के सामने कभी भी वेस्टर्न ड्रेस नही पहनना है. सर का छुट्टी पर जाना हम सबके लिए पिकनिक जैसा होता था खूब मज़े किये जाते थे.

एक बार सर छुट्टी पर थे सो मैंने टाईट जीन्स और टॉप पहना था. ऑफिस गई तो पता चला सर किसी काम से आये हैं और अपने कमरे में बैठे हैं. मै डर गई मेरा डरा चेहरा देख सबको मज़ा आ रहा था.मै स्टूडियो में थी, मैंने सोचा आज मै अपने कमरे में ही रहूंगी, सर के कमरे में जाऊंगी ही नही तो वों मुझे कैसे देख पायेंगे.

काम खत्म होते ही मै अपने कमरे में घुसी तो दरवाज़ा खोलते ही देखती हूँ सर मेरे कमरे में बैठे मेरा वेट कर रहे हैं...और वहाँ ऑफिस के और लोग भी हैं.वों  आज ऑफिस अपनी बेटी की शादी का कार्ड देने आए थे.उन्हें देखते ही मेरी हालत पतली हो गयी और मै बच्चों की तरह दौडती हुई उलटे पांव यूं भागी कि घर आकर ही सांस ली.लोगों का हंसते २ बुरा हाल था.शाम को सर कार्ड लेकर मेरे घर आए तो उनके चेहरे पर मुस्कान थी.कार्ड देते हुए बोले शादी में वेस्टर्न ड्रेस में भी आ सकती हो . बेटियाँ तो हर ड्रेस में भली लगती हैं.

शायद मै तुम लोगों को सही शिक्षा नही दे पाया तभी तुम लोग मुझसे डरती हो.यह बात आज से १० साल पहले की है पर आज भी हंसी आ जाती है. सर ५-६ साल पहले रिटायर हो चुके है.

(कल आपके चेहरों पर मुस्कान लायेंगी कुछ और गाथाएँ )

33 टिप्‍पणियां:

  1. वाह! बहुत सुन्दर अन्दाज़ रहा ये तो……………बचपन से रु-ब-रु करवा दिया।

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  2. साधना जी का संस्मरण बहुत अच्छा लगा ...समंदर किनारे रेत के घरौंदे बनाना ...कितना रूमानी और कितना बचपने भरा ...राजस्थान में कुछ मंदिरों में प्रथा सी है कि वहां जाने पर लोंग पत्थरों से घर बनाते हैं कि उनका भी घर बन जाए ...हम लोंग भी होड़ ही होड़ में कई तरह के घर बनाते हैं ..

    वंदना जी ने मेरी ही बात कह दी ...कई बार खुद से पूछ लेती हूँ कि बड़े कब होंगे हम ...

    सतीश जी का बचपना बड़ा गंभीर है ...किसी बेचारे को मुसीबत में डाल दे ...

    अरविन्दजी बड़े खुशकिस्मत हैं , बच्चे अब तक उन्हें भैया ही कहते हैं ...:)

    शिखा की चॉकलेट वाली कमजोरी मेरी भी है ...

    मीनू जी का संस्मरण भी अच्छा लगा ...सीधे घर ही भाग गयी ...:):

    सबको अपने बचपन/बचपने में पहुंचा दिया है ...अच्छी गुदगुदाती पोस्ट !

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  3. साधना जी का घरोंदा बनाना ,वंदना जी का छोटे बर्तनों से खेलना,अरविन्द जी का बच्चों की टोली में खेलना, मीनू जी का संस्मरण... सच एक बच्चा सबके अंदर होता है हमेशा.
    पर सलिल जी का बचपना बहुत खतरनाक है और बहुत क्यूट भी :)

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  4. समुद्र किनारे बैठकर पैरों से घरोंदे तो अभी सेनफ्रांसिको में हमने भी बनाए थे। अच्‍छा लग रहा है, बच्‍चों के करतब देखकर।

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  5. रश्मि जी,
    बचपन...
    और बचपन जैसे इन संस्मरण का ये प्रायोजन बहुत अच्छा लगा.
    बधाई.

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  6. बहुत मजा आया सबके बचपने पढ़कर!

    ये बच्चा बचा रहे सबके भीतर, बस यही दुआ है!

    -चैतन्य

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  7. rashmi , aapne bahut achha kiya sabke bachpan ko sametker ... dil karta hai ek baar rumaal chor khel lun , achhi toli hai

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  8. खूब रही ये बच्चा पार्टी तो ...एक से बढ़कर एक बच्चे ....रेत के घरौंदे ,इटैलियन खाने के लिये मचल जाना ,हर दिन हर रात नया बचपना ,टाप और जींस बनाम साड़ी..अब तो संयोजिका के बचपने की परीक्षा है ....जिहोने ये क्या कम बचपना दिखाया कि बड़े बड़ों को बच्चा का काशन बोल दिया और कमाल यह कि लोग बच्चा भी बन गए और खूब बने ,
    वाणी जी की नजर के हम कायल हुए .....हम ऐसे भैया भी नहीं ! भैया बोले तो .......

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  9. बचपन से एक मुलाक़ात का आपका प्रयोग बहुत अच्छा लगा .धन्यवाद.

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  10. आपका बहुत बहुत आभार है रश्मि जी कि आपने हमारे बोरिंग रूटीन में बचपन की याद दिला कर कितने ख़ूबसूरत रंग भर दिए ! आलेख लिखने के दौरान पूरे समय ना जाने कितनी मधुर यादों से रू ब रू करा दिया ! मुझे पूरा विश्वास है हर लेखक ने ऐसा ही अनुभव किया होगा ! सभी के अनुभव बहुत ही मनोरंजक और शानदार लगे ! इतने अच्छे आयोजन के लिये आपकी जितनी प्रशंसा की जाए कम ही होगी ! मेरी बधाई एवं आभार स्वीकार करें !

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  11. बहुत सुन्दर , मजा आ रहा है :)

    हम तो सारे दिन ही बच्चों के साथ बच्चा बन कर ही रहते हैं !

    यहाँ निकुंज की soccer क्लास के अंत के दिन (हर सीजन के ) ये लोग पेरेंट और बच्चों के बीच एक गेम रखते हैं, किसी का पिता तो किसी की माँ तो किसी के ग्रांड पेरेंट्स एक पक्ष में रहते हैं तो बच्चे दूसरे पक्ष में ! उस दिन बच्चों के उत्साह देखने का रहता है , और हम लोग भी अपनी पूरी ताकत जीत के लिए झोंक देते हैं पर बच्चों की टीम हमें जीतने ही नहीं देती एक भी बार - इस समय जब निकुंज (और अन्य) बच्चों की टीम जीतती है तो हार में भी खुशी का वो अहसास होता है जिसको शब्दों की सीमा में नहीं बाँध सकता !

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  12. कौन से किस्से को बेहतर कहूँ?? सभी एक से बढ़कर एक हैं..मस्त :)

    वैसे शिखा दी का पोस्ट देख के मुझे तो हैरानी हुई...देखिये वो खुद कह रही हैं की वो अभी भी बच्ची हैं, और आपने उन्हें लिखने का आमंत्रण दे दिया और हमें नहीं...आंखिर वो भी तो हमारे ही उम्र की हैं...है न शिखा दी :)

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  13. क्या कहूं रश्मि, कब से इस ताक में थी, कि कब कोई कहे, अरे, ये तो बिल्कुल बच्ची है :) लेकिन... :( कितना अच्छा किया तुमने जो हम सबओ एक बार फिर बच्चा बनने का मौका दिया. भगवान तुम्हें बचपने से भरपूर रखें, और तुम हम सब को :)
    साधना जी, सलिल जी, अरविन्द जी, शिखा जी, और मीनू जी के संस्मरण पढ के मज़ा आया. चॉकलेट तो मेरी भी कमज़ोरी है :)
    और हां, रविन्द जी को भी किसी का कोपभाजन बनना पड़ता है, पढ के मज़ा आ गया :):)

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  14. "और हां, रविन्द जी को भी किसी का कोपभाजन बनना पड़ता है, पढ के मज़ा आ गया :):)"
    यहां अरविन्द जी पढा जाये, गलती से रविन्द जी चला गया :( अरविन्द जी, सॉरी :(

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  15. मैं तो पहले ही आपको आइडिया के लिए बधाई दे चुका हूं। सभी के संस्मरण मजेदार और रोचक हैं।

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  16. बहुत बढ़िया रश्मि जी .
    कितना अच्छा हो अगर बचपन लौट आए
    और ये आप की हम सब का बचपन लौटाने की कामयाब कोशिश है
    बधाई

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  17. रश्मि जी..धन्यवाद..अब देखिये न इ बच्चा टी अपने नाम के साथ इ नामचीन सब्दवे सुनकर खुस हो गया.. मगर अच्छा आयोजन लगा आपका.. और सबका संस्मरण भी..

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  18. aapka yah prayog kafi accha raha, dono kishtein padhi, shandar, apne blogron ko is tarah se jan na bhi accha laga. sah kahne ki izazat ho to bas "शिखा वार्ष्णेय" ji ke kathan me thoda atishyokti alankar ka prayog ho gaya hai " शकल ऐसी है कि बेटी कहती है स्किर्ट पहन कर मेरे स्कूल मत आना ", ab ye jarur ho sakta hai ki unhone aisi apni taza photos blog pe na di ho, bt jo hai use dekh kar hi kah raha hu ye sab. baki sab ekdam changa, shandar, mast.....

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  19. सबके किस्से एक से बढ़कर एक हैं ।

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  20. शरारत से शिक्षा तक सभी रंग मिल गये आज के संस्मरणों में। सुन्दर शृंखला!

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  21. @संजीत
    इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं है.....शिखा सचमुच बच्ची सी ही दिखती है....मैं मिल चुकी हूँ ,उस से.

    आपको यह आयोजन अच्छा लगा....शुक्रिया....आप भी अभी बच्चे ही हैं..इसलिए आपको भी नहीं भेजा था इसका आमंत्रण :)

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  22. आपने ब्लॉगरों के बचपन को उभार कर बहुत अच्छा कार्य किया है। यह कोमल भावनायें संचारित करेगा ब्लॉग जगत में।

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  23. एक से बढकर एक संस्मरण ! सबको बहुत बहुत आशीर्वाद ! अब आपकी मेहरबानी से एक दिन बूढे जो हुए हम :)

    कुछ सवाल पहली नज़र में , जेहन में , उभरे ज़रुर पर अब मैं उनके वध का दोषी हूं :)

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  24. बहुत अच्छा लगा यह सब पढ़ना ..भले ही कितने ही बड़े हो जाएँ मन में कहीं न कहीं बच्चा होता है और मौका मिल जाये उसे बाहर झांकने का तो वो पल यादगार बन जाता है ....बहुत अच्छा प्रयास तुम्हारा ...आभार

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  25. सबसे पहले तो आपको इन खूबसूरत होती जा रही आपकी तस्वीरों की बधाई .....!!

    @ एक दूसरे का घरौंदा भी गौर से देख रहें थे कि कौन सी नई चीज़ है जिसे कॉपी करके बनाया जा सके....

    हा....हा...हा....साधना जी बहुत खूब .....!!

    इस हंसी मजाक की पोस्ट ने यहाँ आकर गंभीर कर दिया .....

    जीवन की आपा-धापी में यह सुख-संतोष, ये खुशियाँ , उत्साह-उमंग कब-कहाँ हमसे हाथ छुड़ा गायब हो जाते हैं, हम जान भी नहीं पाते.

    @ अपनी दोनों बाहें फैला कर बोली, "गुड़ मॉर्निंग!! डैडी आप कहाँ चले गए थे, सॉरी ". मैने दोनों को अपनी बाहों में समेट लिया.

    एक संस्कारीय परिवार .....!!

    सतीश जी की बात पे अपना किस्सा याद हो आया ....
    मैंने भी अपनी सखी को इसी तरह नए सिम से खूब छकाया था ....इतनी तारीफ की की बेचारी फूल कर कुप्पा हो गई ....किसी मित्र से फोन भी करवा दिया ...पुरुष की आवाज़ सुन उसे पूरा विश्वास हो गया की मैं तो ही नहीं सकती ......जबकि वह बार बार मेरे दुसरे फोन पर फोन कर कन्फर्म हो लेती थी की मैं नहीं ....तीसरे दिन जब उसके पति के हाथ मोबाईल लग गया तो मुझे बताना पड़ा ......

    @ .छुट्टियों में तो मैं बच्चों के साथ क्या नहीं खेलती? छुपा-छुपी, आँख मिचौली, इक्की -दुक्की, लूडो, कैरम , गुड्डे-गुडिया की शादी...... सब. मेरी बहनों के बच्चे मेरे इंतज़ार में रहते हैं, कि कब मैं आऊं, और उनका खेल जमे ...

    वाह वंदना जी की जिन्दादिली देख अच्छा लगा .....!!

    बहुत ही अच्छी पोस्ट रश्मि जी .....
    अरविन्द जी , minu जी और शिखा जी पर फिर आती हूँ ....!!

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  26. सुन्दर परिकल्पना और सुन्दर निर्वाह।
    अनिवर्चनीय को अनिर्वचनीय कीजिए :)
    सभी बच्चों के नाम याद कर लिया हूँ। इनसे सतर्क रहना पड़ेगा, जाने कब बचपना कर बैठें।

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  27. @गिरिजेश राव
    गिरिजेश जी, अब इतना भी जुल्म ना कीजिये...सबके संस्मरण एक जगह इकट्ठे करो...लिंक लगाओ...फोटो लगाओ...और अब प्रूफ रीडिंग भी :( :(

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  28. रश्मि जी आपकी दोनों पोस्टों में संकलित संस्मरणों को पढ़ कर बड़ा मजा आया. सच में आपका ये प्रयास बहुत सुन्दर है. बहुत बहुत धन्यवाद.

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  29. बस रश्मि जी बस और कितना हंस्वाओगी...बहुत सी बचपन की बाते सुन मन झूम रहा है और शरारत करने की तिकडम लड़ा रहा है.

    सुंदर प्रस्तुति.

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  30. ओह, ऐसा क्या, अरे कोई वान्दा नई जी, अपन बच्चे हैं ( जैसा की आपने कहा) इसीलिए तो बेधड़क सच कह देते हैं ना .

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  31. @वंदना दुबे जी ,मैं खेतों में जानवरों और पक्षियों को भगाने वाला बबूका -पुतला (यही कहते हैं न उसे ) तो हूँ नहीं न जाने क्यों लोग मुझसे इतना खौफ खाते हैं ..रोने का मन हो रहा है !

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  32. " अपनी उनकी सबकी बातें " मैं बचपन के संस्मरण बहुत अच्छे लगे बधाई |
    साधना और सलिल जी के संस्मरण पर दिल तो बच्चा है जी का असली भाव समझ आया |उन्हें भी बहुत बहुत बधाई
    आशा

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