रविवार, 29 अगस्त 2010

एक ओणममय पोस्ट

पूकलम (रंगोली)

पिछले कुछ वर्षों से पूरे केरल की तरह हमें भी 'ओणम ' का उसी उत्साह से इंतज़ार रहता है क्यूंकि उस दिन मेरी सहेली 'राजी मेनन ' ओणासद्य' (ओणम का भोज) के लिए हमें, अपने घर बुलाती है. उसके घर के बाहर सुन्दर रंगोली सजी होती है और हमें जमीन पर बैठ, केले के पत्ते पर तरह तरह के व्यंजन परोसे जाते है. शुरू शुरू में बड़े मजेदार किस्से हुए. मैं हर व्यंजन का नाम पूछती और दूसरे ही पल भूल जाती. इतने वर्षों बाद भी बस, 'अवियल' 'साम्भर' 'रसम' ,पायसम और 'पापड़म' के सिवा कुछ याद नहीं. बच्चे जब छोटे थे, उनकी हरकतों पर सब हँसते रहते. छोटा बेटा अपूर्व, जमीन पर बैठ..पूरा शरीर उठा केले के पत्ते पर झुकता और फिर वापस बैठ जाता. पूरे खाने के दौरान उसकी उठक-बैठक चलती रहती. और सब अपना खाना छोड़ उसे देख हँसते रहते. बड़े बेटे अंकुर को जब राजी ने, चावल पर साम्भर डालने के लिए कहा, "मेक अ वेल"...तो वह अबूझ सा देखता रहा, "वेयर...हाउ"
तीन तरह के पायसम, तस्वीर में मिसिंग हैं.
फिर राजी ने अपने बेटे के पत्ते की तरफ इशारा किया, "लाइक आदित्य" और तब वह समझा...ओह्ह!! चावल के बीच में गड्ढा सा बनाना है, साम्भर के लिए. तब से अबतक, साम्भर परसने के पहले मजाक में सब एक दूसरे को कहते हैं.."मेक अ वेल"

ओणम पर परोसी जाने वाली चीज़ों की भी एक निश्चित जगह होती है. और खाने का तरीका भी. सबसे पहले थोड़े से चावल को दाल और घी के साथ खाया जाता है,उसके बाद साम्भर और दूसरे व्यंजनों की बारी आती है. केले के पत्ते बिछाने के तरीके भी, ख़ुशी में और गम में अलग अलग से होते हैं. एक अलग सी बात देखने को मिली. उत्तर भारतीयों में जबतक पूरी पंगत ना खा ले, नहीं उठते. और केरल में जूठे हाथ बिलकुल नहीं बैठते. चाहे किसी बुजुर्ग ने अपना खाना ना ख़त्म किया हो..आपको हाथ धोने उठ जाना पड़ेगा. जूठे हाथ बैठना बुरा माना जाता है.

पता नहीं क्या बात थी..अब याद भी नहीं :)

इस साल की ओणम कुछ ख़ास थी क्यूंकि हमारे ग्रुप की एक सहेली, इंदिरा शेट्टी ने सुनहरे बोर्डर वाली क्रीम कलर की ,एक जैसी केरल की पांच पारंपरिक साड़ियाँ हम सहेलियों को गिफ्ट की थी और ओणम के दिन पहनने का आग्रह किया था. कुछ ऐसा संयोग बना कि इंदिरा और वैशाली उस दिन हमारे साथ नहीं आ सकीं. इंदिरा को मैंगलोर जाना पड़ा और वैशाली को अपने भाई के एंगेजमेंट में. पर तंगम रोड्रिक्स, राजी अय्यर और मैने कुछ और सहेलियों के साथ बहुत एन्जॉय किया. तंगम, कैथोलिक है पर सारे हिन्दू त्योहार में बड़े शौक से शामिल होती है..सुबह सुबह वो ही गाड़ी लेकर हमारे लिए गजरे लाने गयी.

आकाशवाणी वालों को भी पता नहीं क्या इन्ट्यूशन हो गया, उनलोगों ने पिछली बार की तरह इस बार भी ओणम पर एक वार्त्ता का भार मेरे सर पर ही डाल दिया...इंदिरा और राजी ने मलयालम शब्दों के सही उच्चारण सिखाने में बहुत मेहनत की (वो अलग बात है कि जब रेडिओ पर सुना तो सर पीट लिया....कई शब्द मैं गलत बोल गयी :) पर भली हैं बिचारी...हिंदी बोलते बोलते अचानक मलयालम में स्विच करने की मजबूरी को समझ कर माफ़ कर दिया )...आप भी सुनिए..

और ये ऑडियो पोस्ट करने में , विवेक रस्तोगी जी और महफूज़ ने बहुत सहायता की. उनकी सहायता से ही कामयाबी मिली. गोनी भर के शुक्रिया आप दोनों को :)




  


राजी (अय्यर), तंगम , राज़ी  (मेनन) के साथ,


राजी,तंगम, सीमा, राज़ी, मैं
कैल्विन, अपूर्व,आदित्य,(बेचारे कैल्विन को चम्मच चाहिए )
कितने मगन हैं सब खाने में

सहेलियों ने नया नाम दिया,'रश्मिम रविजम '

शनिवार, 21 अगस्त 2010

भाई-बहन के निश्छल स्नेह के कुछ अनमोल पल

राखी का एक दिन तो ऐसा है जब भाई सात समंदर पार हो....कितना भी व्यस्त हो, किसी काम में आकंठ डूबा हो...बहन की याद आ ही जाती है और कैसे नहीं आएगी?? बहन इतने दिल से जो याद करती है :)

इस राखी  पर मैं भी , अपने ब्लॉग जगत में मिले  भाइयों ...खुशदीप भाई,शहरोज़ भाई, दीपक मशाल, अभी, सौरभ हूँका , प्रशांत  (PD ), रोहित, मिथिलेश , अरशद, चन्दन  ..के लिए दिल से दुआ करती हूँ कि 

सफलताओं के शिखर हो,उनके कदमो तले
हर डाली पर जीवन की,नव पुष्प खिले,
दीपों की माला सी, पाँत खुशियों की जगमगाए
सुख,समृधि, शांति ,से उनका दामन भर जाए
.

यह पोस्ट मेरे इन प्यारे भाइयों को समर्पित है.

हम मध्यमवर्गियों का इतिहास में कहीं नाम नहीं होता पर रस्मो-रिवाज़,त्योहार,परम्पराएं..एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक इन्ही के द्वारा हस्तांतरित की जाती है. राखी में भी बहने बड़े शौक से राखी खरीदती हैं या खुद बनाती हैं, मिठाइयां  बनाती हैं,भाई शहर में हुआ तो राखी बाँधने जाती हैं  वरना दिनों पहले ,राखी पोस्ट की जाती है, भाई भी उसी स्नेह से इसका प्रतिदान करते हैं.

पर जब भाई -बहन का यही प्यार निम्न वर्ग और उच्च  वर्ग में देखने को मिलता है तो बड़ी सुखद अनुभूति होती है.

एक बार मैं अपने दादा जी के पास गाँव गयी हुई थी.देखा हमारी गायें चराने वाला चौदह -पंद्रह वर्ष का एक किशोर, मेरे दादा जी से सौ  रुपये मांग रहा है (तब वह एक बड़ी रकम थी ) कुछ दिन बाद उसकी माँ ने बताया कि शिवराम अपनी बहन 'प्रमिला' से मिलने पहली बार उसके ससुराल गया .प्रमिला चावल का पानी निकाल रही थी (भोजपुरी में कहें तो मांड पसा रही थी )..उसने जैसे ही सुना, भाई आया है, ख़ुशी में उसका ध्यान बंट गया और गरम पानी से उसका हाथ जल गया. शिवराम अंदर गया तो देखा,उसकी बहन पुआल पर सोती है. घर आकर वह अपनी माँ से बहुत झगडा कि ऐसी जगह उसकी शादी कर दी कि उसका हाथ जल गया और वह पुआल पर सोती है. उसने मेरे दादाजी से एडवांस पैसे लिए और एक चौकी खरीद,बैलगाड़ी पर लाद, अपनी बहन के ससुराल पहुंचा आया.

ऐसा ही प्यार हाल में देखा. मेरी कामवाली मराठी  बाई, 'माँ बीमार है' कहकर एक दिन अचानक गाँव चली गयी.उसकी बहन काम पर आने लगी तो बताया कि उसके पति ने बहुत मारा-पीटा है..इसीलिए वह चली गयी है. करीब दस दिन बाद वह वापस आई, उसने कुछ नहीं बताया तो मैने भी नहीं पूछा...अचानक उसके थैले में से मोबाइल बजने लगा.मैने यूँ ही पूछ लिया ,'नया मोबाइल लिया?"

तब उसने सारी बात बतायी कि यह सब सुनकर ,उसका भाई चार लोगों के साथ गाँव से आया और उसके पति की अच्छी धुनाई की (कितने मध्यमवर्गीय भाई हैं जिन्होंने यह सुन, अपने जीजाजी को दो झापड़ रसीद किए हों कि मेरी बहन पर हाथ क्यूँ उठाया ?..खैर..) एक कमरा किराये पर ले उसका सारा समान वहाँ शिफ्ट किया और बहन को एक मोबाइल खरीद कर दिया कि जब भी जरूरत हो,बस एक फोन कर ले .इसका  परिणाम भी यह हुआ कि उसका पति खुद माफ़ी मांगता हुआ साथ रहने आ गया.

भाई-बहन का ऐसा  ही निश्छल स्नेह ,उच्च वर्ग में देख भी आँखें नम हो जाती हैं.

अमिताभ बच्चन जब कुली फिल्म की शूटिंग के दौरान भयंकर रूप से बीमार  पड़े थे ,उन्हीं दिनों राखी भी पड़ी थी और डॉक्टर के मना करने के बावजूद ,अमिताभ बच्चन ने 'सोनिया गांधी' और रमोला (अजिताभ की पत्नी ) की राखी कलाई से नहीं उतारी थी. बाद में सोनिया गाँधी और अमिताभ बच्चन  के सम्बन्ध मधुर नहीं रहें.पर जब तक निश्छल प्रेम था,उसे नज़रंदाज़ कैसे किया जा सकता है? पता नहीं कितने लोगों को पता है,सोनिया गाँधी की शादी ,हरिवंश राय बच्चन के घर से हुई थी ,मेहंदी,हल्दी की रस्म वहीँ अदा की गयी थी और इसी नाते अमिताभ से भाई का रिश्ता बना.

संजय दत्त से सम्बंधित घटना बहुत ही द्रवित करनेवाली है. एक प्रोग्राम में उनकी बहन प्रिया बता रही थीं. संजय दत्त सबसे बड़े थे,इसलिए दोनों बहनों को हमेशा इंतज़ार रहता कि राखी पर क्या मिलेगा,वे अपनी फरमाईशें भी रखा करतीं.पर जब संजय दत्त जेल में थे,उनके पास राखी पर देने के लिए कुछ भी नहीं था. उन्हें  जेल में कारपेंटरी और बागबानी  कर दो दो रुपये के कुछ कूपन मिले थे. उन्होंने वही कूपन , बहनों को दिए. जिसे प्रिया ने संभाल कर रखा था और उस प्रोग्राम में दिखाया. सबकी आँखें गीली हो आई थीं.

ऋतिक रौशन का किस्सा कुछ अलग सा है. उनका और उनकी बहन सुनयना के कमरे तो अलग अलग थे पर उन्हें बाथरूम शेयर करना पड़ता था. ऋतिक रौशन को सफाई पसंद थी जबकि टीनएज़र लड़कियों सी सुनयना  के क्रीम, लोशन,क्लिप्स, नेलपौलिश इधर उधर बिखरे होते. उनका रोज झगडा होता. फिर सुनयना  की शादी हो गयी.ऋतिक जब दूसरे दिन  बाथरूम में गए तो एकदम साफ़ झक झक करता बाथरूम  देख हैरान रह गए.और इतनी  याद आई बहन  की कि तौलिया आँखों से लगाए बाथरूम के फर्श पर ही बैठ रोने लगे.

ये थे भाई बहनों के निश्छल स्नेह के कुछ खट्टे-मीठे पल.


एक बार फिर मेरे भाइयों को राखी की ढेर सारी  शुभकामनाएं

सोमवार, 16 अगस्त 2010

राखी का ऋण

काफी साल पहले,  धर्मयुग में एक कविता पढ़ी थी....और डायरी में नोट कर ली थी (अब अफ़सोस  हो रहा है,कवि का नाम क्यूँ नहीं नोट किया..)...और उसी हफ्ते अखबार में इसी कविता के भाव से सम्बंधित एक खबर पढ़ी कि एक भाई, अपनी बहन के पति को  मोटरसाइकिल देने के लिए कुछ पैसे जमा कर  बहन से राखी बंधवाने पहुंचा तो पता चला, एक दिन पहले उसी मोटरसाइकिल के लिए उसकी बहन  जला दी गयी है. उसके बाद से कोई राखी ऐसी नहीं गुजरी कि मुझे वो खबर और ये कविता याद ना आई हो. और ये ख़याल ना आया हो कि पता नहीं आज राखी के दिन कितने भाई पूरी बाहँ की कमीज़ पहने घूम रहें होंगे क्यूंकि दहेज़ की वेदी पर उनकी बहन की बलि चढ़ा दी गयी.

ये पोस्ट उन सभी भाइयों को समर्पित है जन्होने किसी ना किसी कारण अपनी बहन को खो दिया है.

राखी के अवसर पर सबका मन  ख़राब ना हो,इसलिए ये कविता काफी पहले ही पोस्ट कर रही हूँ. राखी पर एक खुशनुमा पोस्ट लिखूंगी....वादा :)




राखी का ऋण


पूरी बाहँ की कमीज़ पहने घूमा  मैं,रक्षा बंधन के दिन,
बहना तुम बिन

बचपन बीता ,
सुहाग का जोड़ा ओढ़े
चली गयी तुम
संबंधों की मरीचिका में ,वहाँ
मृगी सी छली गयी तुम

धूप ने जब जब तुम्हारा
मन सुलगाया
लिखा तुमने
सकुशल हो
पत्र तुम्हारा जब भी आया

दुर्गन्ध, ओह! वह दुर्गन्ध
जली हुई देह की
होठों पे
अम्मा का नाम
आँखों में याद
बाबूजी के नेह की

किंकर्त्तव्यविमूढ़ सा
खड़ा हूँ, चुपचाप

यही सोच कटेंगे,अब
हर पल छिन
चुका नहीं पाया ,मैं
राखी का ऋण

सोमवार, 9 अगस्त 2010

जंगल में मंगल


मुम्बई की बारिश तो मशहूर हो चली है. बाहर से आकर बसे लोग भी नही डरते तो यहाँ की आबोहवा में पले-बढे बच्चे क्या डरेंगे. मेरी बिल्डिंग में एक लड़का है जॉन मैथ्यू  . बहुत ही एडवेंचरस. आम मुम्बईया लड़कों से बिलकुल अलग.  बस पढ़ना  और जी भर कर खेलना ,यही दो शौक हैं उसके. फुटबाल का दीवाना है. अच्छी बात ये है कि पढने में भी उतना ही अच्छा है, उसे B Sc .में फर्स्ट क्लास मिली,अभी Geology  में M Sc कर रहा  है.

अक्सर मेरे बेटे भी उसके साथ, सुबह सुबह कभी फुटबाल खेलने जाते हैं कभी साइक्लिंग के लिए तो कभी ट्रेकिंग पर.

दो दिनों से घनघोर बारिश हो रही थी, और उसमे इनलोगों ने नेशनल पार्क जाने का प्लान बनाया. नेशनल पार्क,इस कंक्रीट जंगल के मध्य बसा एक घनघोर जंगल है,जहाँ कई जंगली जानवर विचरते  हैं और रात में अक्सर तेंदुआ निकलता है जो कुछ  लोगों का शिकार भी कर चुका है.

मैं दुविधा में थी, एक मन होता मना कर दूँ,फिर ये भी सोचती...रोक कर रखना कहाँ तक ठीक है? पति की भी रजामंदी थी.सो बिल्डिंग के पांच बच्चे बिना किसी एस्कॉर्ट के सुबह छः बजे निकल पड़े. मुझे लगा ग्यारह-बारह बजे तक लौट  आयेंगे .पर आने में ३ बजा दिए इनलोगों ने. उस बारिश में कभी नेटवर्क ना मिले और कभी वे सेल ना उठायें , वैसे भी  उस मस्ती में फोन उठाने का ख़याल भी कहाँ रहता? इन सबका रिंगटोन भी है.
My mom is calling back
For no reason
Just to chat...  

आपलोग भी जरा देखिए इनकी मस्ती

सुनील,अंकुर,अपूर्व और जौन
पता नहीं क्या शैतानी चल रही है
.
जौन और अंकुर ..
सुनील

उनके हमशक्ल भी मिले.
और रास्ते में मिला अजगर
बहता पानी..
घना जंगल
घनघोर बारिश
सुनील,अंकुर,सुशील,अपूर्व 
 और अब विडियो भी, क्वालिटी तो अच्छी नहीं...बच्चों का कामचलाऊ सेल है...:)

एक हफ्ते के लिए मैं मुंबई से बाहर जा रही हूँ.....नेट से दूर रहनेवाली हूँ, मुझे मिस करना ...आई मीन मेरे कमेंट्स को मिस करियेगा  सबलोग...:)...अब जबरदस्ती ही सही...इतना कहने का हक़ तो ब्लॉगजगत पर बनता है...बाय बाय

गुरुवार, 5 अगस्त 2010

फिल्म 'उड़ान' : एक नई ज़िन्दगी की, नए सपने की

फिल्म उडान देखने की योजना तीन बार बनी पर हर बार कुछ ना कुछ अड़चन आती गयी आखिरकार आज देख ही ली,और मन को झकझोर गयी यह फिल्म. कई लोगों ने समीक्षा की होगी और अपनी अपनी नज़र से देखा होगा.

पर मुझे पूरी फिल्म में यही लगता रहा,अगर माँ ना हो तो एक बच्चे की ज़िन्दगी कैसी अज़ाब हो जाती है.१७ वर्षीय रोहन आठ साल तक हॉस्टल में अकेला रहता है और उसके पिता उस से मिलने नहीं जाते.माँ जिंदा होती तो यह संभव था? वो और उसके चार दोस्त हॉस्टल से भागकर सिनेमा देखने जाते हैं. वहाँ एक उम्रदराज़ व्यक्ति को एक स्त्री के साथ प्रेम प्रदर्शन करते देख आवाजें कसते हैं और वह आदमी उनका वार्डेन निकलता है,ये दोस्त भागते हैं, एक दोस्त के पैर में मोच आ जाती है ,पर उसके कहने पर भी ये उसे छोड़ कर नहीं भागते और पकडे जाते हैं. स्कूल से इन्हें  निकाल दिया जाता है.

और अब असली कहानी शुरू होती है, रोहन घर आता है तो पता चलता है उसका छः साल का एक छोटा भाई भी है. जिसे शायद जन्म देते ही उसकी माँ गुज़र गयी थी. राम कपूर रोहन के स्नेहिल चाचा हैं.उनके घर पर रोहन के भविष्य की बात होती है और उसके पिता अपना फैसला सुनाते हैं कि उसे आधे दिन उनकी फैक्ट्री में काम करना होगा और उसके बाद इंजीनियरिंग कॉलेज में पढाई करनी होगी .रोहन कहता है, उसे इंजिनियर नहीं बनना ,वह साहित्य पढना चाहता है  और उसके पिता उसपर हाथ उठाते हैं...कि 'एक तो स्कूल से निकाल दिया गया,अब जबाब देता है'. वह भागता है तो उसे गिराकर उसके पिता मारते हैं .चाचा किसी तरह बीच-बचाव करते हैं.

उसके पिता बहुत सख्त हैं वे कुछ नियम समझाते हैं...घर में रहना है तो उन्हें पापा की जगह सर कह कर बुलाना होगा, नीची नज़र कर बात करनी होगी, किसी बात का उल्टा जबाब नहीं देना होगा और फैक्ट्री में काम और इंजीनियरिंग कॉलेज में   पढ़ाई करनी होगी (यहाँ निर्देशक  ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि बिना बारहवीं पास किए कोई बच्चा कैसे इंजीनियरिंग में  कॉलेज में दाखिला ले सकता है?? उसके पिता कहते हैं  ,उन्हें कई जगह हाथ जोड़ने पड़े,सिफारिश करनी पड़ी...फिर भी यह नामुमकिन सा लगता है. इतनी ख़ूबसूरत और यथार्थवादी फिल्म के निर्माता-निर्देशक से इस चूक की उम्मीद नहीं थी हालांकि इस से फिल्म के कथानक पर कोई असर नहीं पड़ता)

सुबह सुबह वे रोहन को उठा जॉगिंग के लिए ले जाते हैं, पुश-अप्स करवाते हैं और छोटा बेटा अर्जुन, स्टॉप वाच लिए अकेला गेट पर खड़ा उनकी टाइमिंग पर नज़र रखता है. यह फिल्म मुख्य पात्र 'रोहन' के गिर्द घूमती है पर वह छोटा मासूम अर्जुन काफी सहानुभूतियाँ  बटोर ले जाता है.रोहन के तो फिर भी हॉस्टल में मित्र थे पर यह छोटा बच्चा तो अकेला, उस तानाशाह पिता की ज्यादतियां सहता रहा.

रोहन को कवितायेँ और कहानियाँ लिखनी पसंद थीं.जो कि अक्सर अपने बेटे के लिए बड़ा सपना देखने वाले मध्यमवर्गीय पिता को नागवार गुजरता है. बस यहाँ रोहन के पिता कुछ ज्यादा सख्त हैं और उसके बचाव या उसके मन की बात समझने वाली माँ भी नहीं है.रोहन फैक्ट्री में काम करता है और कॉलेज में अकेला इधर उधर बैठा ,कविताएँ लिखा करता है.या फिर एक बड़े से मैनहोल में सर घुसा अपने पिता की बातें जोर जोर से दुहरा कुछ सुकून पाने की कोशिश करता है.

एक बार चाचा के साथ,ये लोग पिकनिक पर जाते हैं और चाचा  रोहन के लेखन की  तारीफ़ करते हुए उसे  इक कविता सुनाने के लिए कहते हैं.रोहन के पिता मना करते हैं फिर भी वे सिफारिश करते हैं कि,"भैया वह इतना अच्छा लिखता है , उसने नॉवेल भी लिख रखी है." रोहन अपने मन की बात कविता में ढाल कर बहुत सुन्दर ढंग से कहता है...जिसका सार यही है कि "आपने आँखों के परदे हटाकर कभी देखने की कोशिश ही नहीं की  कि मैं क्या चाहता हूँ " पर उसके पिता कहते हैं .."यह कविता 'सरिता' या 'गृहशोभा' में छप जाएगी या कोई अठन्नी देकर चला जायेगा ,इस से ज्यादा कुछ नहीं होगा " हर लिखने-पढने वाले का शौक रखनेवालों को जीवन के किसी मोड़ पर ऐसी बातें सुनने को मिल ही जाती हैं. हर मध्यमवर्गीय माता-पिता को यह डर लगा रहता है कि कहीं उनका बच्चा ,कविता-कहानी में उलझ कर अपना कैरियर ना चौपट कर ले.

जहाँ इतनी कठोरता ,इतनी बंदिशें होती हैं वहाँ कुंठा भी अपने रास्ते ढूंढ लेती  है और रोहन पिता के पर्स से पैसे चुराकर रात में कार निकाल एक बार में चला जाता है,वहाँ उसके कुछ सीनियर उसकी रैगिंग करना शुरू करते हैं पर फिर दोस्त बन जाते हैं. (यह दृश्य कुछ कमजोर लगा...हंसी भी नहीं आई) दोस्तों के साथ अक्सर वह रात में घूमना शुरू कर देता है.एक बार बार में मार-पीट भी कर लेता है और अपने पुराने दोस्तों को फोन करके  बताता है. इस उम्र में यह थ्रिल शायद   सबसे अच्छी लगती है. एक दोस्त कहता है.."पापा तो कुछ बोलते ही नहीं,न्यूजपेपर पढ़ते रहते हैं और माँ,मुहँ फुलाए रहती है...बात ही नहीं करती ' यह स्थिति किसी भी बच्चे के लिए बहुत त्रासदायक है.

रोहन अपने दोस्तों से कहता  भी है, कि वह जब हर सब्जेक्ट में फेल हो जायेगा तो उसे इंजिनियर कैसे बनायेंगे? और वह सचमुच फेल हो जाता है.इधर उसका छोटा भाई स्कूल में चिढाये जाने पर दो लड़कियों को मारता है. उसकी कुंठा भी तो कहीं निकलेगी? प्रिंसिपल उसके पिता को फोन करती है कि उसे आकर घर ले जाएँ.पिता की बिजनेस मीटिंग चल रही है और लाखों की डील फाइनल होनेवाली है.पर उसे छोड़ उन्हें स्कूल जाना पड़ता है,उस बच्चे को वह इतना मारते हैं कि वह बेहोश हो जाता है और उसे हॉस्पिटल में भरती करना पड़ता है.पर वह रोहन से और डॉक्टर से झूठ कहते हैं कि वह सीढियों से गिर गया है. (निर्देशक ने इतनी मेहरबानी की कि यह दृश्य दिखाए नहीं,उसकी पीठ पर पड़े निशानों से पता चला) पर रोहन वह निशान देख,समझ जाता है. उसके पिता रोहन को छोटे भाई का ख्याल रखने को कह 3 दिन के लिए कलकत्ता चले जाते हैं.हॉस्पिटल में रोहन , छोटे भाई को कविताएँ,कहानियाँ सुनाया करता है और धीरे धीरे दूसरे पेशेंट्स, नर्स,डॉक्टर,तमाम लोग रूचि से उसकी कहानियाँ सुनने लगते हैं. इसी बीच उसके पिता उसका रिजल्ट लेकर आते हैं और उसे खींच कर उठा कर  ले जाते हैं और बहुत बुरा-भला कहते हैं.

उसके पिता कहते हैं,अब वे दूसरी शादी कर लेंगे, अर्जुन को हॉस्टल भेज देंगे और उसे कॉलेज के बदले पूरा समय अब फैक्टरी में बिताना होगा.

रोहन अपने दोस्तों को फोन करता है.वे बताते हैं कि तीनो दोस्त एक दोस्त के पिता के रेस्टोरेंट में काम करते हैंऔर काफी मुनाफा हो रहा है.वे उस से भी कहते हैं "तू भी बॉम्बे आ जा..सब मिलकर मजे करेंगे" वह दूसरे दोस्तों को भी बात करने को बुलाता है..पर रोहन अपनी ज़िन्दगी की परेशानियों से इतना दुखी है कि दोस्तों की ख़ुशी से चहकती आवाज़ सुन नहीं पाता और फोन रख देता है.यह दृश्य बहुत ही टचिंग है. और रजत बरमेचा ने बहुत ही मार्मिक अभिनय किया है.

पिता की  शादी की बात सुनकर छोटा भाई समझाने आता है और कहता है,अर्जुन को हॉस्टल मत भेजिए, हमें दे दीजिये.इसपर वह उन्हें बहुत भला-बुरा कहते हुए व्यंग्य कर देते हैं कि "तुम्हारा अपना बच्चा तो कोई है नहीं" छोटा भाई जाने लगता है तो रोहन उनके पीछे दौड़ता है, कि मुझे भी अपने साथ ले चलिए. पर वे उसे समझाते हैं कि उसे अर्जुन के लिए इस घर में रुकना चाहिए.अर्जुन का  और कोई नहीं. जब वह लौटता है तो देखता है...उसके पिता उसकी लिखी कविताओं और कहानियों की कॉपियाँ जला रहें हैं. (यह वो सीन था, जब मैने आँखों पर हाथ रख लिए ...नहीं देख पायी यह दृश्य ,अक्सर जब खून-खराबे का दृश्य हो तो मैं नहीं देख  पाती...पहली बार महसूस  हुआ कि लिखी इबारतें भी वही महत्त्व रखती हैं....हालांकि बाद में ख़याल आया कि उस बच्चे के चेहरे का एक्सप्रेशन देखना चाहिए था कि कितना निभा पाया  वह इस दृश्य  को...वैसे निराशा नहीं होती...उसने जैसे इस पात्र को जिया है )

उसके पिता,एक बच्ची की माँ से मिलवाते हैं कि वे उस से शादी करने जा रहें हैं. सब मिलकर रोहन की 18th birthday मनाते हैं. पिता , दादा जी की घड़ी रोहन को विरासत में देते हैं इस ताकीद के साथ कि वह हमेशा चलती रहें. रोहन के सीनियर्स उसे कहते हैं कि क्या वह ज़िन्दगी भर,अपने पिता की फैक्ट्री में नौकरी करेगा, छुप कर कवितायेँ लिखेगा और लड़कियों की तरह रोयेगा.रोहन एक झील के पास कार लेकर जाता है और एक रॉड  ले गाड़ी के सारे शीशे और गाड़ी को भी तोड़ डालता है.यहाँ एक भी डायलौग  नहीं है पर रोहन की पूरी body language   बोलती है कि "अब और उसे कोई क्या सजा देगा...कर लो जो करना है"

एक पुलिसमैन उसे पुलिस स्टेशन ले जाता है.उसके पिता आते हैं,पूछते हैं "वो कहाँ है? रोहन आशा भरी नज़रों से  उन्हें देखता है. पुलिसमैन उसकी तरफ इशारा करता है तो वे कहते हैं "ये नहीं...मेरी गाड़ी" रोहन को गंदे दीवारों और गंदे कम्बल में लॉक-अप में रात गुजारनी होती है.

सुबह उसे छोड़ दिया जाता है.वह अपने घर जाता है, तैयार होता है और बैग ले निकल पड़ता है. पिता की नई पत्नी और उसके रिश्तेदार घर में बैठे होते  हैं.पिता के पूछने पर कहता है ,"मैं घर छोड़ कर जा रहा हूँ"

"मेरी शादी से खुश नहीं हो ??"

" खुश हूँ कि अब आपकी भड़ास कहीं और निकलेगी ..और अर्जुन को बेल्ट से मार खाकर हॉस्पिटल नहीं जाना पड़ेगा " रोहन सबके सामने कह देता है.

पिता उसके पीछे दौड़ते है और सीढियों पर उसे मारते हैं,इस बार रोहन भी पलट कर एक जोर का पंच उन्हें देता है.पिता उसके पीछे दौड़ते हैं...और एक लम्बी चेज़  होती है,पिता-बेटे के बीच.आखिरकार इतने जॉगिंग के बाद भी पिता की उम्र सामने आ जाती है और वे रोहन को नहीं पकड़ पाते. रोहन दिन-भर घूमता हुआ,अपने चाचा के घर जाकर उन्हें बताता है...कि मैं बॉम्बे (हाँ,इस फिल्म में मुंबई नहीं कहा गया है..और लगता है..राज ठाकरे के कानों तक नहीं पहुंची )
  जा रहा हूँ,मैं चौकीदारी  कर लूँगा पर वापस घर नहीं  जाऊंगा"

वह माँ के साथ अपने बचपन की फोटो देखता है...सोचता रहता है और सुबह अपने घर की तरफ आता है.वहाँ अर्जुन हॉस्टल जाने के लिए तैयार बैठा है और उसके पिता ऑटो लाने गए हैं.रोहन  पिता की दी हुई घड़ी और एक चिठ्ठी रखता  है, जिसमे लिखा है
"मैं इस कूड़ेदान  में अर्जुन को नहीं छोड़ सकता, उसे अपने साथ ले जा रहा हूँ और उसका भविष्य उज्जवल बनाऊंगा.आप अपने नए परिवार के साथ खुश रहिये"
प्यार (पर इस शब्द का अर्थ तो आपको पता नहीं )
आपका बेटा
रोहन

और अर्जुन पहली बार हँसते, बात करते, उछलते हुए  सड़क पर अपने बड़े भाई का हाथ पकडे चल रहा है...यही है नई ज़िन्दगी की तरफ उनकी उडान.

इस फिल्म का लेखन और निर्देशन बेमिसाल है. एडिटिंग  भी कमाल की है.एक भी सीन फ़ालतू नहीं लगता. कठोर पिता की भूमिका में "रोनित रॉय' का अब तक का सर्वश्रेष्ठ अभिनय है.राम कपूर अपनी छोटी सी भूमिका में फिल्म की बोझिलता कम करते हैं. रोहन के किरदार में "रजत बरमेचा' और अर्जुन के किरदार में 'आयान  बोरादिया' ने बहुत ही बढ़िया अभिनय किया है पर इसका श्रेय निर्माता 'अनुराग कश्यप' एवं निर्देशक 'विक्रमादित्य मोतवाणी' को जाता है. सुना है रजत को एक महीने तक टी.वी. ,मोबाइल और अपने दोस्तों से दूर रखा गया ताकि वह इस बच्चे रोहन जैसा महसूस कर सके. जो उसने बखूबी किया है.उसके चेहरे के भाव ही बोलते हैं.

शायद 'पिता' का इतना कठोर होना थोड़ी अतिशयोक्ति लगे .पर दुनिया में इतना कुछ घटता रहता है कि किसी बात पर अब हैरानी नहीं होती.बस यही दुआ है ईश्वर से कि किसी बच्चे की माँ छीन लें तो सिर्फ उसका शरीर ही ले जाएँ.उसका ह्रदय उसके पिता के दिल में स्थापित कर दें.

शनिवार, 31 जुलाई 2010

द डे व्हेन एवरीथिंग वेंट रॉंग.....वेल..नॉट एवरीथिंग :)

घड़ी पर नज़र डाली, छः बजकर बीस मिनट, और मैने मोबाइल हाथों में लिया,मेसेज टाइप करने को कि I  m ready  और तभी घंटी बज उठी. सहेली का मिस्ड कॉल था. मोबाइल वहीँ रखा, क्यूंकि तेज बारिश हो रही थी. घर की चाबी उठायी, छाता लिया और दरवाजा खींच कर निकल आई, मॉर्निंग वाक के लिए. गेट के सामने सहेली  की गाड़ी नहीं दीखी.सोचा, शायद अभी आई नहीं है. उसकी बिल्डिंग की तरफ बढ़ चली, पर ना रास्ते में उसकी कार दीखी ना अपने युज़ुअल पार्किंग प्लेस पर. वह हमेशा मेरा इंतज़ार करती है. फिर सोचा शायद बेटे को देर हो रही होगी,फूटबाल प्रैक्टिस के लिए.इसलिए निकल गयी होगी. अभी छोड़ कर आ जाएगी.मैं सड़क पर अकेले ही थोड़ा आगे निकल गयी. थोड़ी देर बाद लौट कर आई,अब तक नहीं आई थी वो. मैं फिर दूसरी तरफ निकल गयी. थोड़ी देर बाद फिर उसकी  बिल्डिंग में आकर देखा,अब तक नहीं. मैं तो मोबाइल घर पर छोड़ कर आई थी.सोचा उसकी बिल्डिंग में हूँ,उसके घर जाकर ही उसकी बेटी को कहती हूँ, उसे कॉल करके देखे. पर उसकी लिफ्ट बंद थी. सातवीं मंजिल तक  चढ़ कर जाना गवारा नहीं हुआ.
लौट कर आई  तो वाचमैन दिखा, बोला "हाँ, मैडम तो बेटे को लेकर उसे छोड़ने गयी हैं "
थोड़ी देर फिर मैं घूम कर आई, अब तक वह नहीं लौटी थी.

अब मुझे चिंता भी होने लगी. सात बज गए थे. घर आई ,उसका मिस्ड कॉल देख थोड़ी शांति मिली कि सब ठीक हैं पर गुस्सा बहुत आया.

उसे फोन मिलाया,मैं कुछ कहती इसके पहले ही वो बरस पड़ी, "
"अभी नींद खुली?? मैं फोन करके परेशान हूँ"

"मैं तुम्हारी बिल्डिंग के चार चक्कर लगा कर आ रही हूँ, हो कहाँ तुम?"

"मैने तो कितनी देर तुम्हारे गेट पर इंतज़ार किया"

"मैं तो तुम्हारा मिस्ड कॉल देखते ही निकल पड़ी"

"तुम्हे मेरी गाड़ी कैसे नहीं दीखी?"

"तुम्हे गेट से निकलती मैं, कैसे नहीं  दीखी?"
........
.......
बाय
बाय

दरअसल मुझे मिस्ड कॉल देने के बाद ,उसे थोड़ी देर लगी नीचे उतरने में और उसकी गाड़ी,दूसरी जगह पार्क थी. (ऐसा पहली बार हुआ था )मैं थोड़ी जल्दी निकल गयी और उसकी कार जगह  पर ना देख...यह सोचा कि वह चली गयी है. उसने गेट पर पहुँच कर मुझे फिर से फोन किया और सोचा शायद मै सो रही हूँ,इसलिए फोन नहीं उठा रही. और मैं सेल भी साथ में नहीं ले गयी थी.उसने बेटे को स्कूल छोड़ा और वहीँ पास के पार्क में ही घूमने चली गयी. और मैं उसका इंतज़ार करती रही.

दोनों को अपनी गलती का अहसास हुआ और फिर एक-एक सॉरी मेसेज भेजा.फिर थोड़ा रुक कर इन्बौक्स से ढूंढ अच्छे अच्छे दोस्ती के मेसेज भेजे एक दूसरे को और बारह बजते बजते हमलोग एक दूसरे से बात करते हंस रहें थे. हम दोनों के पतिदेव शहर से बाहर  गए हुए थे. बच्चों की कोचिंग क्लास थी .शनिवार का दिन हमारा ऐसा ही बेकार गुजरने वाला था.

उसने प्रस्ताव रखा,"चलो मूवी चलते हैं."

"पर इतनी बारिश हो रही है?"

"इतने दिन मुंबई में रहकर भी बारिश से डरती हो ..लेट्स गो"

"हम्म ओक्के"

हम महिलाओं का फिल्म देखने जाना इतना आसान नहीं. एक तो बहुत कम फिल्मे ही अच्छी लगती है. फिर थियेटर पास होना चाहिए. टाइमिंग सूट करनी चाहिए. क्यूंकि शाम तक घर भी वापस आना होता है.
जल्दी जल्दी पेपर पलटे गए. थियेटर,फिल्म निश्चित की  पर बारिश बढ़ती  ही जा रही थी. दोनों जन आधी आधी छतरी में.....ना अपनी अपनी छतरी में भीगते हुए निकल पड़े. मुंबई की बारिश में छतरी और भीगने का अन्योन्याश्रय सम्बन्ध है.आप बारिश में निकलेंगे तो छतरी जरूर लेंगे और यहाँ की बारिश ऐसी होती है कि बिचारी छतरी कुछ नहीं कर पाती,और आप भीगने से नहीं बच सकते.

थियेटर पहुँचते -पहुँचते तो लगा,अब ये बारिश रुकने वाली नहीं. हम डर गए. कहीं ऐसा ना हो, हम तीन घंटे तक फिल्म देखते रहें और बाहर निकले तो पता चला,पूरी मुंबई डूब गयी. एक दूसरे का मुहँ देखा और सर हिलाया, "ना कभी और देखते हैं...आज तो घर वापस चले जाते हैं. " हमने टिकट नहीं लिया पर सोचा.एक एक कॉफी तो पी ली जाए कम से कम.
गीले कपड़ों में ठंढ भी लग रही थी.पर अंदर की ए.सी. में ठंढ और बढ़ गयी,कॉफी ने भी कुछ काम नहीं किया. कॉफी पीते हम निराश आँखों से बाहर देखते रहें. बारिश काफी कम हो गयी थी,सिर्फ हमारी फिल्म कैंसिल करवानी थी उसे. हमने तय किया 'लिंकिंग रोड' पर  थोड़ी शॉपिंग कर ली जाए.' पर जब कॉफी शॉप से बाहर  निकले तो इतने सुहाने मौसम में सेल्समैन से झिक झिक कर कुछ  खरीदने का मन नहीं हुआ.लिंकिंग रोड इसीलिए कुख्यात है.  आठ सौ की चीज़  दो सौ तक लाने में हमारे सौ दो सौ शब्द तो खर्च हो ही जाते हैं.

फिल्म भी कैंसल हो गयी. शॉपिंग का मूड नहीं और  बारिश  की रफ़्तार भी धीमी हो गयी और घर वापस जाने का भी मन नहीं हो रहा. हमने तय किया बैंड स्टैंड चलते हैं,वहाँ प्रेमी युगल ही जाते हैं तो क्या दो सहेलियां नहीं जा सकतीं?. फैमिली के साथ तो वहाँ से कार से गुजरने पर भी मन होता है मुहँ फेर लें..ऐसे दृश्य होते हैं.

और हम पहुँच गए ,उन पत्थरों पर सर पटकती लहरों की फ़रियाद  सुनने. जिसे ना वह बेजान पत्थर सुनता है और ना अहसास से धड़कते एक दूसरे में खोये दो दिल. पर हम भी ठीक से कहाँ सुन पाए. अपनी छतरी ही संभालने में लगे रहें. इतनी हवा थी कि छतरी ने भी नाराज़ होकर आकाश की तरफ मुहँ  मोड़ लिया. ऐसे में वो गाना जरूर याद आ जाता है ,"छतरी ना खोल...उड़ जाएगी..हवा तेज़ है...." अब  भी ये गाना उतना ही बेक्कार  लगता है,जितना पहले लगता था..पर याद जरूर आ जाता  है.

ब्लॉग पढनेवाले तो सब एडल्ट ही हैं इसलिए बताया जा सकता है ,पहली बार एक 'गे' कपल को भी देखा.और बेवकूफों की तरह कितना भी हम कोशिश करते  आकाश से गिरती बूंदे जो लहरों के पत्थर से टकराने के बाद उडती बूंदों से  एकाकार हो रही थीं,उन्हें देखें..पर नज़र  जिद्दी बच्चे सी बार बार उधर ही  लौट जाती.आखिर कार हमने नज़रों को सिगड़ी में सिकते भुट्टो का लालच दिया और कोशिश कामयाब हुई. जब भी समंदर  के किनारे भुट्टे खाने का आनंद उठाती  हूँ. दूर अमेरिका में बैठी अपनी कजिन से हुई बहस याद आ जाती है.वहाँ के 'बीचेज' की बड़ी बखान करती, इतना नीला पानी है,इतना साफ़ सुथरा....और मैं कहती.."वहाँ  धीमी आंच  में सिकते भुट्टे मिलते हैं??"और वह सबकुछ भूल ,भुट्टे के साथ,गोलगप्पे...भेलपूरी सब याद करने लगती.

दिन की शुरुआत तो बड़ी खराब हुई थी पर अंत उतना ही अच्छा रहा...
इसलिए भी कि दिन का अंत अपने ब्लॉग जगत के सभी साथियों को " Happy Friendship Day "  कह कर कर रही हूँ. वैसे तो दोस्ती का कोई ख़ास दिन मुक़र्रर नहीं पर ज़माने के साथ भी चलना है..तो ये रस्म भी क्यूँ ना निभाएं...एक सुन्दर सा मेसेज ,सबकी नज़र है
A quote said by a friend to his best friend after  both got busy in their lives and dnt contact each other..'I MISS UR SMILE ALLOT ......BUT I MISS MY OWN  SMILE EVEN MORE."

बुधवार, 28 जुलाई 2010

आवाज़ देकर क्यूँ छुप जाती है, ज़िन्दगी....



सबसे पहले तो यह स्पष्ट कर दूँ...कि  अपने आलेख में ,समाज में व्याप्त किसी समस्या,  कुरीतियों, भेदभाव का जिक्र अगर मैं करती हूँ तो व्यापक रूप में जो मेरी नज़रों से जो गुजरता  है वही लिखती हूँ....अपवाद तो सौ साल पहले भी होते थे और सौ साल बाद भी होते रहेंगे.

पिछली पोस्ट में मैने एलेक्स का जिक्र किया और आज सचमुच अधिकाँश नवयुवक उस जैसे ही हैं. जबकि आज से 15,20 साल पहले,
युवक युवतियां प्रेम तो करते थे पर माता-पिता की इच्छा के विरुद्ध जाने की हिम्मत उनमे नहीं होती थी. और वे इसमें गौरवान्वित महसूस करते थे कि
माता-पिता की  इच्छा को  सर्वोपरि माना. पर यह बात तो कदम बढाने के पहले सोचनी थी.

करीब 18 साल   पहले का वाकया है. मैं अपने तीन महीने के बेटे को लेकर पापा की पोस्टिंग पर  गयी हुई थी. उसी कालोनी  में एक नए नए डॉक्टर भी रहने आए. उनकी भी चार महीने  की बेटी थी जो अपनी नानी के पास रहती थी. क्यूंकि उनकी पत्नी मेडिकल के थर्ड इयर में थी. अक्सर वे मेरे बेटे के साथ खेलने आ जाया  करते. उसका ख़याल भी रखते. उसकी टॉनिक,दवाइयां  भी बताते रहते.

एक दिन बातों बातों में उन्होंने अपनी शादी की बात बतायी. उनका  अपनी एक बैचमेट के साथ अफेयर था, शादी भी पक्की हो गयी. डॉक्टर साहब के पिता की  मृत्यु इस से दो वर्ष पूर्व हो गयी थी. सारा इंतज़ाम हो गया.शादी की तैयारियों की खबर सुन, उनके पिता के एक मित्र, उनके घर आए. उन्होंने उनकी माँ से बोला, " आपके पति ने मुझसे वादा किया था  कि वे अपने बेटे की शादी मेरी बेटी से करेंगे."
माँ ने कहा "अगर ऐसा है तो ठीक है....आपकी बेटी से ही मेरे बेटे की शादी होगी...आप तैयारियां शुरू कीजिये"
जब ये महाशय कॉलेज से छुट्टी लेकर घर पहुंचे तो इनके बड़े भाई,रिश्तेदार सबलोग डर रहें थे कि शायद ये बगावत कर दें, और माँ की बात ना माने .

पर उन्होंने  बड़े शहीदाना भाव अख्तियार करते हुए हमें  बताया," मैने कहा, 'ना...अब माँ ने कह दिया है और पिताजी ने वादा कर दिया था, फिर तो मैं वहीँ शादी करूँगा. मैने अनु (उस लड़की का नाम ) को फोन करके बता दिया कि मैं शादी नहीं कर सकता. और मैने पिताजी के मित्र की लड़की से शादी कर ली."
मैं तो गुस्से से मुट्ठियाँ भींचे बैठी थी और वो महाशय  सोच रहें थे, हमलोग बहुत इम्प्रेस हो रहें हैं. उन्होंने कहना जारी रखा, "कॉलेज में गया तो एक फ्रेंड ने जो शादी में नहीं आया था,उसे लगा मेरी शादी अनु से ही हुई है. मुझे बधाई देने लगा, जब मैने उसे सच बताया तो बोला..'अभी मैं अनु को भी कौन्ग्रेचुलेट करके आ रहा हूँ"

बस अब मेरा चुप रहना मुश्किल हो गया, ( अभी भी, वही हाल है...ये चुप रहना ही कठिन है, सिर्फ weighing  scale पर digit बढ़ रहें हैं...बाकी कुछ नहीं बदला :( ) मैने उन्हें काफी कुछ सुना डाला शब्द तो नहीं याद..भाव यही होंगे..कि "आपने बहुत गलत किया, उस लड़की का क्या कुसूर"..वगैरह वगैरह.
बाद  में ममी से बहुत डांट भी खाई कि इतना हार्श होने की क्या जरूरत थी??  उस दिन के  बाद से उन्होंने मेरे रहते मेरे घर का रुख नहीं किया.( वैसे भी पता नहीं क्यूँ ज्यादातर ,डॉक्टर लोगों से मेरी नहीं जमती :)) जब pram में मेरे बेटे को लेकर प्यून घुमाने ले जाता तो वे कभी कभी बाहर ही बेटे के साथ खेल लेते. मुझे थोड़ी और डांट पड़ती, "बेचारा अपनी बेटी को याद करके खेल लेता था थोड़ी देर." पर ममी लोगों  का तो काम ही है डांटना. कितनी परवाह करे कोई.

हो सकता है कुछ लोग सचमुच उन्हें श्रद्धा  की दृष्टि से देखें, कि इतना लायक लड़का था , बिलकुल श्रवण कुमार , पिताजी के वायदे का , माँ की बात का कितना मान रखा .पर मुझे अच्छा नहीं लगा. वो लड़की किस  मानसिक यंत्रणा से गुजरी होगी??  आज जरूर वो भी कहीं सुखी वैवाहिक जीवन गुजार रही होगी. पर कुछ महीने या साल जो वज्र बनकर टूटे होंगे उस पर,उसका हिसाब कौन देगा?? ये महाशय तो नई पत्नी के साथ खुश हो गए. श्रवण कुमार होने का तमगा अलग से मिल गया. घरवालों, रिश्तेदारों की नज़रों में ऊपर उठ गए. पर उस  लड़की को क्या मिला??

ऐसा नहीं कि पहले सिर्फ लड़के ही दोषी होते थे. कई बार डर कर लडकियाँ भी पीछे हट जाती थीं. एक महाशय थे, माता-पिता के इकलौते सुपुत्र. बड़ी मुश्किल से माँ-बाप को बंगाली लड़की से शादी करने को राजी किया पर बाद में लड़की ही डर कर पीछे हट गयी.

कभी कभी लगता है क्या ,प्रेम विवाह ही इस दहेज़ , जाति, दिखावे ,पैसे की बर्बादी से बचने का हल है?? क्यूंकि महानगर में मैं देख रही हूँ हर परिवार के बच्चे,दक्षिण भारतीय, बंगाली,मराठी, पंजाबी , जाति-प्रदेश कोई बंधन नहीं मान रहें. पर हमारा देश सिर्फ चार महानगरों से तो नहीं बना.  ऐसा नहीं कि छोटे शहरों और कस्बों  में अब लड़के लडकियाँ साथ, नहीं पढ़ते  या काम नहीं करते. यहाँ तक कि छोटे शहरों से आए नवयुवक भी ज्यादातर  अरेंज्ड मैरेज ही करते हैं.पता नहीं हिम्मत की कमी है या मिस्टर/मिस राईट उनकी आँखों के सामने होते हैं और वे पहचान नहीं पाते.या फिर किसी परफेक्ट  मिस/मिस्टर राईट की प्रतीक्षा में होते हैं. पर हाँ, मिस/मिस्टर राईट मिल भी गए तो युवजनों को अपने संबंधों को गंभीरता से लेना होगा और अपने वचन के प्रति सच्चाई बरतनी होगी.

फिल्म The Wife और महिला लेखन पर बंदिश की कोशिशें

यह संयोग है कि मैंने कल फ़िल्म " The Wife " देखी और उसके बाद ही स्त्री दर्पण पर कार्यक्रम की रेकॉर्डिंग सुनी ,जिसमें सुधा अरोड़ा, मध...