बुधवार, 28 जुलाई 2010

आवाज़ देकर क्यूँ छुप जाती है, ज़िन्दगी....



सबसे पहले तो यह स्पष्ट कर दूँ...कि  अपने आलेख में ,समाज में व्याप्त किसी समस्या,  कुरीतियों, भेदभाव का जिक्र अगर मैं करती हूँ तो व्यापक रूप में जो मेरी नज़रों से जो गुजरता  है वही लिखती हूँ....अपवाद तो सौ साल पहले भी होते थे और सौ साल बाद भी होते रहेंगे.

पिछली पोस्ट में मैने एलेक्स का जिक्र किया और आज सचमुच अधिकाँश नवयुवक उस जैसे ही हैं. जबकि आज से 15,20 साल पहले,
युवक युवतियां प्रेम तो करते थे पर माता-पिता की इच्छा के विरुद्ध जाने की हिम्मत उनमे नहीं होती थी. और वे इसमें गौरवान्वित महसूस करते थे कि
माता-पिता की  इच्छा को  सर्वोपरि माना. पर यह बात तो कदम बढाने के पहले सोचनी थी.

करीब 18 साल   पहले का वाकया है. मैं अपने तीन महीने के बेटे को लेकर पापा की पोस्टिंग पर  गयी हुई थी. उसी कालोनी  में एक नए नए डॉक्टर भी रहने आए. उनकी भी चार महीने  की बेटी थी जो अपनी नानी के पास रहती थी. क्यूंकि उनकी पत्नी मेडिकल के थर्ड इयर में थी. अक्सर वे मेरे बेटे के साथ खेलने आ जाया  करते. उसका ख़याल भी रखते. उसकी टॉनिक,दवाइयां  भी बताते रहते.

एक दिन बातों बातों में उन्होंने अपनी शादी की बात बतायी. उनका  अपनी एक बैचमेट के साथ अफेयर था, शादी भी पक्की हो गयी. डॉक्टर साहब के पिता की  मृत्यु इस से दो वर्ष पूर्व हो गयी थी. सारा इंतज़ाम हो गया.शादी की तैयारियों की खबर सुन, उनके पिता के एक मित्र, उनके घर आए. उन्होंने उनकी माँ से बोला, " आपके पति ने मुझसे वादा किया था  कि वे अपने बेटे की शादी मेरी बेटी से करेंगे."
माँ ने कहा "अगर ऐसा है तो ठीक है....आपकी बेटी से ही मेरे बेटे की शादी होगी...आप तैयारियां शुरू कीजिये"
जब ये महाशय कॉलेज से छुट्टी लेकर घर पहुंचे तो इनके बड़े भाई,रिश्तेदार सबलोग डर रहें थे कि शायद ये बगावत कर दें, और माँ की बात ना माने .

पर उन्होंने  बड़े शहीदाना भाव अख्तियार करते हुए हमें  बताया," मैने कहा, 'ना...अब माँ ने कह दिया है और पिताजी ने वादा कर दिया था, फिर तो मैं वहीँ शादी करूँगा. मैने अनु (उस लड़की का नाम ) को फोन करके बता दिया कि मैं शादी नहीं कर सकता. और मैने पिताजी के मित्र की लड़की से शादी कर ली."
मैं तो गुस्से से मुट्ठियाँ भींचे बैठी थी और वो महाशय  सोच रहें थे, हमलोग बहुत इम्प्रेस हो रहें हैं. उन्होंने कहना जारी रखा, "कॉलेज में गया तो एक फ्रेंड ने जो शादी में नहीं आया था,उसे लगा मेरी शादी अनु से ही हुई है. मुझे बधाई देने लगा, जब मैने उसे सच बताया तो बोला..'अभी मैं अनु को भी कौन्ग्रेचुलेट करके आ रहा हूँ"

बस अब मेरा चुप रहना मुश्किल हो गया, ( अभी भी, वही हाल है...ये चुप रहना ही कठिन है, सिर्फ weighing  scale पर digit बढ़ रहें हैं...बाकी कुछ नहीं बदला :( ) मैने उन्हें काफी कुछ सुना डाला शब्द तो नहीं याद..भाव यही होंगे..कि "आपने बहुत गलत किया, उस लड़की का क्या कुसूर"..वगैरह वगैरह.
बाद  में ममी से बहुत डांट भी खाई कि इतना हार्श होने की क्या जरूरत थी??  उस दिन के  बाद से उन्होंने मेरे रहते मेरे घर का रुख नहीं किया.( वैसे भी पता नहीं क्यूँ ज्यादातर ,डॉक्टर लोगों से मेरी नहीं जमती :)) जब pram में मेरे बेटे को लेकर प्यून घुमाने ले जाता तो वे कभी कभी बाहर ही बेटे के साथ खेल लेते. मुझे थोड़ी और डांट पड़ती, "बेचारा अपनी बेटी को याद करके खेल लेता था थोड़ी देर." पर ममी लोगों  का तो काम ही है डांटना. कितनी परवाह करे कोई.

हो सकता है कुछ लोग सचमुच उन्हें श्रद्धा  की दृष्टि से देखें, कि इतना लायक लड़का था , बिलकुल श्रवण कुमार , पिताजी के वायदे का , माँ की बात का कितना मान रखा .पर मुझे अच्छा नहीं लगा. वो लड़की किस  मानसिक यंत्रणा से गुजरी होगी??  आज जरूर वो भी कहीं सुखी वैवाहिक जीवन गुजार रही होगी. पर कुछ महीने या साल जो वज्र बनकर टूटे होंगे उस पर,उसका हिसाब कौन देगा?? ये महाशय तो नई पत्नी के साथ खुश हो गए. श्रवण कुमार होने का तमगा अलग से मिल गया. घरवालों, रिश्तेदारों की नज़रों में ऊपर उठ गए. पर उस  लड़की को क्या मिला??

ऐसा नहीं कि पहले सिर्फ लड़के ही दोषी होते थे. कई बार डर कर लडकियाँ भी पीछे हट जाती थीं. एक महाशय थे, माता-पिता के इकलौते सुपुत्र. बड़ी मुश्किल से माँ-बाप को बंगाली लड़की से शादी करने को राजी किया पर बाद में लड़की ही डर कर पीछे हट गयी.

कभी कभी लगता है क्या ,प्रेम विवाह ही इस दहेज़ , जाति, दिखावे ,पैसे की बर्बादी से बचने का हल है?? क्यूंकि महानगर में मैं देख रही हूँ हर परिवार के बच्चे,दक्षिण भारतीय, बंगाली,मराठी, पंजाबी , जाति-प्रदेश कोई बंधन नहीं मान रहें. पर हमारा देश सिर्फ चार महानगरों से तो नहीं बना.  ऐसा नहीं कि छोटे शहरों और कस्बों  में अब लड़के लडकियाँ साथ, नहीं पढ़ते  या काम नहीं करते. यहाँ तक कि छोटे शहरों से आए नवयुवक भी ज्यादातर  अरेंज्ड मैरेज ही करते हैं.पता नहीं हिम्मत की कमी है या मिस्टर/मिस राईट उनकी आँखों के सामने होते हैं और वे पहचान नहीं पाते.या फिर किसी परफेक्ट  मिस/मिस्टर राईट की प्रतीक्षा में होते हैं. पर हाँ, मिस/मिस्टर राईट मिल भी गए तो युवजनों को अपने संबंधों को गंभीरता से लेना होगा और अपने वचन के प्रति सच्चाई बरतनी होगी.

29 टिप्‍पणियां:

  1. pyaar ? ab to saudebazi hai--- bank balance se prem , jati se upar paisa to sab sweekar ! ab to wo din n rahe apne raaten n rahi wo

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  2. बात तो सही है लेकिन फैसला परिस्थिति पर निर्भर करता है |

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  3. हम्म ये आपके डॉ साहब की बात तो हमें भी नहीं पची ..कमिटमेंट तो होना ही चाहिए फिर लव मेरिज हो या अरेंज ..उन श्रीवान कुमार का फैसला हमें तो गर्व करने लायक न लगा ..
    हाँ जहाँ तक
    .कभी कभी लगता है क्या ,प्रेम विवाह ही इस दहेज़ , जाति, दिखावे ,पैसे की बर्बादी से बचने का हल है??
    का सवाल है तो ..मेरे ख्याल से प्रेम विवाह इन समस्यायों का हल नहीं है .प्रेम विवाह के तहत भी ये सभी समस्याएं देखने में आ ही जाती हैं.
    बदलनी होगी तो सोच...शादी करने का तरीका नहीं ..
    अच्छा आलेख ..

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  4. इस तरह के श्रवण कुमारों से मुझे भी सख्त नफ़रत है, लोग भले ही उन्हें आदर्श बालक मानें. सिविल की तैयारी करने वाले लड़के इसी तरह भावनात्मक ज़रूरत के लिए प्यार का ढोंग करते हैं और सेलेक्शन हो जाने पर आदर्श बेटे बन जाते हैं...
    मेरे ख्याल से जिसे अपने माँ-बाप की मर्ज़ी से ही शादी करनी हो, उसे प्यार ही नहीं करना चाहिए. अगर किया है तो निभाना भी चाहिए.

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  5. सच है यदि प्यार किया है तो निबाहना चाहिए....अन्यथा इस बारे में सोचें ही नहीं ....अच्छा लेख...विचारणीय

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  6. हम्म.. बहुत सही खिंचाई चल रही है यहाँ रूढ़िवादी कायरों की.. :) लड़कियों के पीछे हटने का एक केस मैं भी सुना ही देता हूँ.. क्या करुँ अब रहा नहीं जा रहा.. मेरे एक करीबी हैं जिनको पीएच.डी. के दौरान अपनी ही लैब में रिसर्च करने वाली एक एम.डी. लड़की से प्यार हो गया. मतलब दोनों को एक दूसरे से हो गया.. अब लड़का यू.पी. से और लड़की बंगाल से २ साल तक पपियाँ-झपियाँ चलने के बाद जब शादी की बात चली तो लड़के के घरवाले तो किसी तरह मान भी गए पर लड़की के पिताश्री अड़ गए कि ''या तो घर छोड़ दो या उस यू.पी. के भैये को.. हम बंगाली हैं और यू.पी. वाले बहुत बदमाश और निकृष्ट होते हैं.'' सारे यू.पी वालों को गालियों से नवाज़ डाला श्रीमान ने.
    मजबूर होकर उस लड़की को माँ-बाप की मर्जी से किसी दूसरे शहर में रहने वाले एक हमपेशे डॉक्टर से विवाह रचना पड़ा.. उधर कुछ महीने बाद लड़के की भी एक यू.पी. वाली से शादी हो गई. अब कहानी में ट्विस्ट ये है कि बंगाली लड़की अभी भी अपने पति के साथ ना रह के अपने प्रेमी के घर के पास ही रहती है और उनका प्रेम-प्रसंग जारी है.. जबकि यू.पी. वाले भाई के साथ उनकी बीवी श्री भी रहती हैं.. उधर वो बेचारा बंगाली जी का पति शादी करके भी कुंवारों की तरह रह रहा है.. भाई जब यही सब करना था तो ज़रा सी बगावत नहीं कर सकती थीं क्या? कैसे मैनेज कर रहे हैं ये घटिया काम भगवान् जाने. लेकिन किसी दिन भांडा फूटने पर चैनल वाले ना बुलाये जाएँ मुझे ये डर लगा रहता है...

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  7. वैसे तो लव मैरिज के फेवर में तो मैं भी नहीं हूँ... हाँ! यह है की ...कभी किसी लड़की का दिल नहीं दुखाना चाहिए... अरेंज मैरिज के अपने फायदे हैं... और लव के अपने... पर एक बात है की दोनों मैरिजेज़ का बेस फाइनैंस ही है... फाइनैंस है तो सब कुछ सही है... पर लव मैरिजेज़ ... में इगो और विचारों का कौनकीटीनेशन का सिन्क्रोनाइज़ैशन होना ज़रूरी है... जो की मुश्किल ही होता है... अल्टिमेट रिज़ल्ट ... साइकोपौम्प... में ही लैंड करता है.... अगर मिस /मिस्टर राईट मिल जाए तो... नो क्वेश्चन हो आर्गुमेंट विल अराइज़... आलमा मैटरली ... पार्टनर ... पर भरोसा कम ही लोग कर पाते हैं.... बहुत अच्छी लगी आपकी यह पोस्ट...

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  8. यह विषय कि किसकी इच्छानुसार विवाह किया जाये, थोड़ा जटिल है। माता पिता भी अन्ततः अपने बेटे बेटियों का सुख ही चाहते हैं। एक दूसरे के निर्णयों का सम्मान भी करते हैं। आप विश्वास नहीं करेंगी पर युवाओं का एक नया वर्ग पनप रहा है जो प्रेम भी अपनी जाति की लड़कियों से करते हैं जिससे आगे समस्या न हो, दो को तो मैं जानता भी हूँ।

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  9. प्रेम विवाह को अगर परिवार वालो की स्वीकृति मिल जाये तो सोने पर सुहागा .

    @ ऐसा नहीं कि पहले सिर्फ लड़के ही दोषी होते थे. कई बार डर कर लडकियाँ भी पीछे हट जाती थीं. एक महाशय थे, माता-पिता के इकलौते सुपुत्र. बड़ी मुश्किल से माँ-बाप को बंगाली लड़की से शादी करने को राजी किया पर बाद में लड़की ही डर कर पीछे हट गयी .


    ऐसी एक घटना का मै भी चश्मदीद गवाह हूँ.

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  10. रश्मि जी , ऐसे किस्से कम ही सुनने में आते हैं । अजीब सा लग रहा है यह सोचकर कि ये महाशय दो साल से क्या कर रहे थे । फिर शादी के वक्त आकर बता रहे हैं , रंग में भंग डालने के लिए । और डॉक्टर साहब भी , एक नमूना ही निकले ।
    खैर उम्मीद है कि शायद सब सुखी ही होंगे ।
    लेकिन ये डॉक्टर्स वाली बात कुछ समझ नहीं आई जी ।

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  11. रश्मि प्रभा जी से सहमत ...
    ऐसे श्रवण कुमारों पर सौ लानतें ...
    भरण पोषण और मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति पैसे के बिना संभव नहीं है मगर किसी भी रिश्ते की दृढ़ता को पैसा निर्धारित नहीं कर सकता ...और यदि पैसा ही रिश्तों का कारण है तो जैसे ही पैसा ख़तम (जो कभी भी किसी भी कारण से हो सकता है )....सब ख़तम ...
    इसलिए यथासंभव रिश्ते प्रेम और विश्वास की नींव पर ही टिके होने चाहिए ...विवाह प्रेम के कारण हो या अरेंज ...दोनों पक्षों को इसे निभाने की काबिलियत और इच्छा होनी चाहिए ...!

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  12. शादी का रास्ता कोई भी हो मगर उसमे आपसी समझदारी की ही ज्यादा जरूरत होती है उसके बिना शादी कोई भी कर लो चाहे अरेंज्ड या लव सफ़ल होना मुश्किल ही होता है……………बस थोडा सा सोच और नज़रिया बदलो और फिर उसके साथ समझदारी की चाशनी मे डुबो दो तो सफ़लता मिल ही जायेगी।

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  13. di ye love marriages ke liye hamesha hi ek virodhabhas sa dekha gya hia samaj me...aur aaj bhi ye vyapat hai...mere kai parichit aaj isi jugad me lage hai ladka ladki ek hi cast ke hai fir bhi gharwale taiyar nahi aur virodh dono paksho ko hai...aaj se lagbhag 30 saal pahle mere maa-papa ko bhi aise hi virodho ka samna karna pada tha lekin aaj hume bahut garv hai. unhone commitment kiya aur tamam virodho ke bavjud itne achche se haste muskurate apni zindgi ji rhe hai. so bus ek baar himmat karne ki jarurat hai pyar sachcha hai to sab sahi hoga hi hoga :)

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  14. एक तरफ दलित मासूम बच्चों को 40-40 रूपये में पेट की खातिर बाजार में बेच देते हैं वहीं इन हिन्दुओं के अपने मसाजघर, मनोरंजन थियेटर, नाचघर, जुआघर और मयखाने हैं जहां जीवित मांस का व्यापार होता है।

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  15. सभी ने अपनी अपनी बात कह ली. सत्य गौतम जी भी अपनी बात कह गए. उनसे ही थोडा साहस उधर ले मैं भी अपने मन कि बक ही देता हूँ. मेरे विचार से सभी लडके और लड़कियों के बीच जो खिचड़ी पकती है जिसे लोग प्यार कहते हैं वो ९९.९९ प्रतिशत प्यार ना होकर सिर्फ शारीरिक आकर्षण होता है. कहीं कहीं इस आकर्षण कि परिणिति विवाह में होती है कभी कभी नहीं भी होती. जब यह तथाकथित प्यार शुरू होता है तब इसे शादी तक पहुचाने कि सोच दोनों प्रेमियों में से किसी के मन में नहीं होती. विवाह एक जिम्मेदारी भरी सामाजिक चुनोती है जिसे सही ढंग से निबाहने के लिए दो लोगों के बीच के शारीरिक आकर्षण मात्र को आधार नहीं बनाया जा सकता. जिस भाई या बहन को ये बात समझ आती है तो वो अपने प्रेमी से विवाह करने से पीछे हट जाता है.

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  16. ऐसे श्रवणकुमारों के कारण ही प्रेम दुख भरी दास्तान बन के रह जाता है. आज की युवा सोच ज़्यादा परिवक्व और व्यावहारिक है. रश्मि, मेरे तो अधिकांश दोस्त डॉक्टर ही हैं... किसी ज़माने में मैने खुद डॉक्टर बनना चाहा था लेकिन... :( तुम भी इस पूर्वाग्रह से बाहर आओ न..

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  17. विचारनीय लेख| जहां तक हमें लगता है बात प्रेम विवाह या अरेंज्ड विवाह की नहीं है बल्कि अपनी सोंच को बदलने की है| विवाह एक कमिटमेंट का नाम है जो विशवास की नींव पर टिका है| जहां समझदारी और निभाने की ताकत होती है वहां प्रेम विवाह हो या अरेंज्ड दोनों ही समाज को बदलने की ताकत रखते हैं, चूँकि विवाह एक सामाजिक संस्था है तो अगर समाज को बदलना है कुछ सुधार लाना है तो सबसे पहले इसी सोंच में परिवर्तन लाना होगा|
    हमारी शादी अंतर्जातिय और अन्तर्प्रदेशीय हुई है और वो भी अरेंज्ड| आज जब हमारी बेटी पूंछती है कि "Mom! I am south Indian or north Indian? " तो हमें बताते हुए गर्व होता है की "You are just Indian "

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  18. अब यह समस्या रही नहीं। कोरी भावुकता और कमिटमेण्ट जैसी चीज़ें भी अब रिश्ते-जज़्बात से ऊपर उठ चुकी हैं।
    बड़ी आसानी से ब्रेक-अप हो जाया करते हैं और उतनी ही सहजता से स्वीकृति भी मिल जाती है - उस नए समाज से जो अब के युवा वर्ग ने बनाना शुरू कर दिया है।
    विवाह जैसी संस्था ही नकार रही है लिव-इन रिलेशनशिप। बस ऐसे ही कहानियों-संस्मरणों में पढ़िए और खुश रहिए - कि ये सब भी महत्व रखता था कभी।

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  19. हिमांशु जी,
    पता नहीं मेरे ही सामने ऐसे उदाहरण आते हैं, क्या...समझ नहीं पाती....बस एक हफ्ते पहले की बात है.... सेना में एक मेजर और एक मल्टीनेशनल में कार्यरत लड़की के विवाह की अडचने सामने आयीं, दो साल पहले दोनों किसी कॉमन फ्रेंड के यहाँ मिले, नेट और फ़ोन के जरिये संवाद कायम रहा.इस बीच दो, चार बार मिले भी. जब शादी की बात आई, लड़के वाले पहले तो मान गए फिर लड़के ने लड़की से आग्रह किया कि वो अपने पैरेंट्स के साथ, उसके घर जाए,ताकि आमने-सामने बैठकर बात हो. संयोग से दोनों की जाति भी एक ही है. बस लड़की वाले ज्यादा अमीर हैं.

    वहाँ लड़के वालों ने मना कर दिया, बहाना ये बनाया कि जोड़ी ठीक नहीं, लड़का बहुत दुबला है और लड़की हेल्दी

    वापस आकर लड़के को फोन किया तो उसने भी यही कहा कि माता-पिता की इच्छा के विरुद्ध नहीं जा सकता.पता चला किसी ने लाखों का दहेज़ ऑफर किया है. और पैसे का मोह छोड़ना कठिन है.पता नहीं लड़के को भी कितना इमोशनली ब्लैकमेल किया हो.

    अब भी लड़की के हितैषी,लड़के को समझाने के प्रयत्न में लगे हैं...काश जैसी कि मेरी धारणा है,युवा पीढ़ी,ईमानदार है..... वह भी जितना अपने देश की रक्षा के प्रति प्रतिबद्ध है,इस लड़की को दिए वचन के प्रति भी हो.

    तो कहाँ रह गयीं ये सब कहानी और संस्मरण की बातें???...प्रत्यक्ष तो घटित हो रहा है...
    .

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  20. रश्मि जी,,, नमस्कार...

    मुझे लगता है की आपकी सोच बिलकुल इस युग के अनुरूप है... शहर बड़ा हो या छोटा....लोगों की सोच बदल गयी है....अब लोग ज्यादा करियर के प्रति सजग हैं...सच तो ये है आजकल प्रेम विवाह नहीं बल्कि शुद्ध गणित विवाह होते हैं....बड़े शहरों के नवयुवक या युवती उसी को अपना जीवन साथी बनाना पसंद करते हैं जो उनके साथ कंधे से कन्धा मिलकर काम कर सके और आर्थिक रूप से सक्षम हो...जब तक उन्हें ऐसी कोई युवक/ युवती नहीं मिलती तब तक महाशय/महोदया सीरिअस नहीं दीखते/दिखतीं और जैसे ही कोई वैसा/वैसी मिला/ मिली, हो गया मिस राईट या मिस्टर राईट...हालांकि मेरा व्यक्तिगत रूप से ये मानना है की न तो प्रेम विवाह के सफल होने की कोई गारंटी है न arranged विवाह की...पर हाँ अधिकतर प्रेम विवाह ही जल्द टूटते हैं....उनकी सफलता का प्रतिशत बहुत कम रहता है....

    दीपक

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  21. @ शिखा एवं सारिका,
    यह सच है कि सोच बदलने की जरूरत है. पर निकट भविष्य में यह 'सोच' बदलती दिख रही है?? शायद सदियाँ लग जाएँ. क्यूंकि स्थिति बद से बदतर ही हो रही है. हमारे माता-पिता या उनसे ऊपर वाली पीढ़ी दादा-दादी के समय दहेज़ जैसे राक्षस का आतंक था?? नहीं था. उन दिनों शौक से जो बेटी को दे दिया, लड़केवालों ने ले लिया. पर धीरे-धीरे, इस राक्षस ने अपने पंजे फैलाने शुरू कर दिए. और ब्लैक मनी ने इसके लिए जमीन तैयार की.

    लोगों को सर उठा कर कहते सुना है, रिश्वत तो लेनी ही पड़ेगी. क्यूंकि तीन बेटियाँ हैं. एक साहब को जानती हूँ, जिनकी चार बेटियाँ हैं . पढने में और शक्ल सूरत में अति साधारण. पर एक से एक हैंडसम क्लास वन ऑफिसर ढूंढ कर लाये हैं. शादी की बातचीत करने जाते थे और 5 लाख रुपये ब्रीफकेस में भर उन्हें थमा देते थे.. साधारण घर के माता-पिता को ना कहते नहीं बनता.

    लड़के भी सोचते हैं, टी.वी. , फ्रिज, सारी सुख-सुविधा का समान मिल रहा है तो क्यूँ ना करें?

    इसीलिए मैने सोचा , शायद 'प्रेम-विवाह' ही इसका हल हो. वहाँ, मुहँ खोल कर दहेज़ तो नहीं मांग सकते. लड़के वाले की वरिष्ठता की बात भी नहीं उठती. जाति बंधन वैसे ही नहीं रहता.

    और शादी निभने की बात तो उसके बाद की है. वह तो 'अरेंज्ड' हो या 'प्रेम' कोई गारंटी नहीं ले सकता.

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  22. @सारिका
    तुम्हारे माता-पिता एवं सास-ससुर को नमन
    इतना अच्छा उदाहरण रखा उन्होंने समाज के सामने....काश और लोग भी कुछ सीखें....ताकि उनके बच्चे भी अपने बच्चों से कह सकें.."U r just Indian.."

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  23. काफी बातें कही जा चुकी हैं ... मगर संभव है कि कोई वह देखा हो जो और लोग न देखें हों और वह कहानी का विषय बन सकता है ! , वैसे यहाँ का विषय ऐसा भी असामान्य सा नहीं है इसलिए रचनाकार से सहमत हूँ ! .. ज़रा अतियथार्थ और जादुई यथार्थ तक का सफ़र भी देखिये ! .. आभार !

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  24. एक छोटी सी कहानी है मेरे मित्र की। वो जिससे प्रेम करता था, उस लड़की के परिजनों ने इनकार कर दिया। शायद वो पहली लड़की थी जो अपने परिवार में कॉलेज पढऩे गई थी। जब वो कॉलेज जाने लगी थी, तभी उसकी माता ने हिदायत दे दी थी कि अपनी सीमाओं में रहेगी। उसकी तीन छोटी बहनें भी हैं। कॉलेज में उसे प्रेम हो गया जब पढ़ाई खत्म हुई तो उसने घर पर शादी की बात की। माता पिता इतने क्रोधित हुए कि लड़की की जमकर पिटाई कर दी। अगर वो चाहती तो लड़के के साथ भागकर शादी कर सकती थी। मगर उसने सोचा कि अगर वो ऐसा कदम उठाएगी तो उसकी तीन छोटी बहनों को शायद स्कूल से भी निकाल लिया जाता। इसलिए उसने अपने ह्रदय पर पत्थर रखकर किसी ओर से विवाह कर लिया। मेरा मित्र आज भी उस लड़की से प्रेम करता है और अपनी प्रेमिका के निर्णय पर फख्र भी महसूस करता है। इसे क्या कहेंगे हम? मैं तो दोनों को ही सेल्यूट करता हूं।

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  25. बात करने से ही बात बनती है, कहीं किसी विज्ञापन में सुना था, वह सही लगता है इस प्रकार के प्रकरणों में, हाँ समय लगता है मनाने को, पर मैंने कई कड़क लोगों को भी मानते देखा है, भले ही उन्हें २ से ५ वर्ष तक का इंतजार करना पड़ा और कुछ ऐसे भी कि लड़की के पापा नहीं माने तो मजबूरी में लड़्की को अपना भविष्य उसी लड़के में नजर आ रहा था तो उस लड़के के साथ हो ली।

    दोनों ही प्रकार के प्रकरणों में संवाद होना चाहिये, दोनों तरफ़, हाँ अगर कोई सुनना ही न चाहे तो भी उसका दिल जीतने की कोशिश करना चाहिये।

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  26. pyaar bahut chhotaa saa shabd hai par bade bhaare bhaare arth liye hue. mai prem kee bhaavanaa kaa bahut adar karataa hoo lekin prem kee pariniti vivaah hee ho isse sahamat nahee hoo. prem hai isliye vivaah nishchit roop se honaa hee chaahiye ye bahut hee asaan lagataa hai lekin itnaa jarooree nahee hai. vivaah do vyaktiyo kee jeevan bhar saath rahne aur saath dene aur aise hee bahut see jimmedariyo ko saath poore karne ke sankalp ke saath shuru hotaa hai. koi ladkaa yaa koi ladkee kisee saathee se prem kare lekin kisee aur se vivaah kaa faislaa kare ismai asangati kahaa hai? ham sabhee bahee rojagar to nahee karate jo kam hame achchaa lagataa hai. haa kuchh log aisa kar paate hai.

    ek baat aur ham aaj kise ko prem karte hai aur kal prem naa rahe to? prem moment ko jenaa sikhaataa hai jabaki vivaah ek lambee yaatraa kee tayaaree hai jise hame prayaas poorvak aaraam daayak banana hai.

    is sab se hatkar dr kunwar bechain ko yad kare to -

    kunwar chalne se pahle hee ye thak kar baith jaatee hai
    mohabbat ko lagee hai jabse paise kee ye beemaaree

    yaa neeraj jiko yaad karoo -

    swarn kee jhankaar ne aisaa kiyaa hai chhal samay se
    chaatako kee pyaas bhee bazaar mai bikne lagee hai

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