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बुधवार, 5 जनवरी 2011

दीदार-ए-युसुफ खान

'कॉफी विद करण' कोई बहुत ही उत्कृष्ट प्रोग्राम नहीं है पर मनोरंजक तो है ही....और याद रह जाए तो मैं कभी मिस नहीं करती. करीब एक हफ्ते पहले से ही प्रोमोज देख रही थी,कि इस बार अमिताभ बच्चन आ रहे हैं पर उनके साथ आए गेस्ट को देखने की  मुझे ज्यादा उत्सुकता थी. और कैमरा था कि एक झलक  श्वेता की दिखा कर फिर से अमिताभ बच्चन पर टिक जाता. श्वेता बहुत ही स्लिम लग रहीं  थीं  और पहली बार एक ऑफ शोल्डर मॉडर्न ड्रेस में थी. श्वेता बच्चन नंदा  हमेशा बहुत ही शर्मीली, कैमरे से दूर रहनेवाली रही हैं. उन्हें  काफी करीब से भी देखने का मौका मिला पर तब तो इतनी स्लिम  नहीं थी. एक ढीलीढाली सी सलवार कमीज़ पहने थीं और बालो को पीछे कर एक रबर बैंड से बाँध रखा था .लिपस्टिक की हल्की  सी रेखा भी नहीं. माथे पर लाल टीका लगा हुआ था  (एकता कपूर की तरह) माँ ने घर से निकलते वक्त लगाया होगा. पर प्रोग्राम में तो सीधी किसी फैशन शो के रैम्प पर चलने वाली श्वेता लग रही थीं.


प्रोग्राम में पिता-बेटी की गुफ्तगू में कई अनोखी बातें भी पता चलीं . बच्चन  परिवार का कोई भी व्यक्ति घर में आई किसी भी पत्रिका या अखबार का कोई आलेख पढता है तो हाशिए पर अपना नाम लिख देता है जिस से दूसरे सदस्य को भी पता चल जाए कि यह आर्टिकल दूसरे ने पढ़ रखी है और फिर उस विषय पर डिस्कस किया जा सके. करण के पूछने पर कि "क्या ऐश्वर्या भी ये रूल फॉलो करती हैं?" दोनों ने एक स्वर से कहा.."हाँ, वे  ARB लिखती हैं."


जब श्वेता से पूछ गया कि अमिताभ बच्चन की एक कमजोरी बताएँ....तो उसने कहा," डैड बहुत जल्दी पैनिक हो जाते हैं..जैसे मैं बीमार पड़ गयी तो घबरा जाते हैं और फिर मुझे ही डांटना शुरू कर देते हैं." अमिताभ ने भी जबाब दिया,..."वो इसलिए कि मैं बहुत ज्यादा केयर करता हूँ" पर श्वेता ने कहा ,"लेकिन मैं बीमार हूँ...मुझे आप कैसे डांट सकते हैं?"


यह बात मैने भी गौर की है. हम सब ऐसा करते हैं. मैं छोटी थी तब भी ऐसे ही डांट सुनती थी और आज मैं भी एक्जैक्टली ऐसा ही करती हूँ. होता ये है कि हम घबरा जाते हैं...बच्चे को बीमार देख,हमें अच्छा नहीं लगता. और हम उसे ही डांटने लगते हैं, "कहा था ना..स्वेटर पहनो..ठंढ में बाहर मत जाओ...आइसक्रीम मत खाओ...पर सुनना ही नहीं है..वगैरह..वगैरह." पर दरअसल जो बीमार है...उसे, उस वक्त ये सब नहीं कहना चाहिए. लेकिन  सच ये भी है कि बस उसी वक्त वे चुपचाप सुन लेंगे.लेकिन इसे सही तो नहीं कहा जा सकता और ऐसा करना भी नहीं  चाहिए. सोचा तो है....मैं भी ऐसा नहीं करुँगी..पर कितना अमल  हो पाता है,पता नहीं.


अमिताभ बच्चन की एक आदत पर श्वेता और करण दोनों बहुत हँसे, वे बहुत ही organized हैं .एक चश्मा, बेडरूम में..दूसरा ड्राइंगरूम में..तीसरा कार में ऐसे ही inhaler भी (उन्हें दमा है) ...बेडरूम , ड्राइंगरूम, बाथरूम,कार..सब जगह रहती  है. अमिताभ बच्चन के  सफाई देने पर श्वेता ने कहा.."पॉकेट में एक चश्मा और एक inhaler ही काफी है..नॉर्मल लोग ऐसा नहीं करते" और ये तो सच है...ऐसा नहीं कि कोई चाहे तो चार चश्मे नहीं बनवा सकता. पर कोई करता नहीं ऐसा.


एक बात और अमिताभ ने अपने बुरे दिनों की बताई  कि जब उनकी फिल्मे फ्लॉप हो रही थीं. तो प्रीतीश नंदी ने Illustrated Weekly में फ्रंट पेज पर बोल्ड अक्षरों में छाप  दिया था " FINISHED  " अमिताभ ने अपने टेबल पर वो पन्ना खोल कर रख दिया था और रोज़ ,सुबह शाम वे उस पेज को देखा करते  और कसम खाया करते कि इस इबारत को  बदल डालना है.


एक बार सिमी गरेवाल के शो में भी बच्चन परिवार आया था और अमिताभ ने बताया कि उनके दोस्त,परिवारजन सब  उनके  KBC होस्ट  करने के विरुद्ध  थे. पर उन दिनों वे  इतने क़र्ज़  में डूबे हुए थे और इतने जरूरतमंद थे कि सेट पर  झाडू तक लगाने को तैयार थे (प्रतीकात्मक रूप में  ही यह कहा होगा..पर वैसी बुरी स्थिति से उबर कर आना, जीवट वाले ही कर सकते हैं. )


अमिताभ बच्चन sms सेवा का भी भरपूर उपयोग करते हैं. पूरे परिवार का  एक sms ग्रुप है. और वे लोग एक दूसरे को हर एक्टिविटी की खबर करते रहते हैं. उन्होंने शाहरुख़ खान और धोनी द्वारा उनके sms का उत्तर नहीं दिए जाने की शिकायत भी की.(जिसके लिए शाहरुख़ खान ने अगले प्रोग्राम में हाथ जोड़कर माफ़ी मांगी, न्यूज़ चैनल वालो ने ये दृश्य सौ बार तो दिखाए ही होंगे ) श्वेता ने यहाँ भी पापा को प्यार भरी  झिड़की दी.."कम ऑन डैड...वो जानते भी नहीं होंगे कि सच में आपने  sms किया है."


करण जौहर के एक प्रश्न पर प्रोग्राम में ठहाके गूँज उठे..जब करण ने पूछा, "जया आंटी की कोई कमजोरी बतायें " अमिताभ का तुरन्त जबाब था.."मरवाना है क्या?" :) श्वेता ने भी कहा..".मुझे तुम्हारा शो....कॉफी हैम्पर '(जीती जाने वाली बास्केट) कुछ भी नहीं चाहिए..पर माँ के विरुद्ध  एक शब्द नहीं कह सकती.


आप सब सोच रहे होंगे...शीर्षक  में दिलीप कुमार हैं...और चर्चा अमिताभ और श्वेता की .दरअसल ज्यादा महत्वपूर्ण  बात तो अंत के लिए बचा कर रख ली जाती है,ना.. श्वेता को मैने मुंबई से दिल्ली जाने वाली फ्लाईट  में करीब से देखा था. और उसी प्लेन में दिलीप कुमार भी थे. वैसे वे लोग बिजनेस क्लास  में थे और उन दोनों की आया हमलोगों के साथ एक्जक्यूटिव क्लास में.:( दिलीप-सायरा के साथ वाली लड़की तो काफी स्मार्ट थी. पर श्वेता के बच्चो की आया तो नारंगी रंग के बड़े से क्लिप और चटख नारंगी रंग के साधारण से  सूट में प्लेन में अलग सी ही दिख  रही थी.


मेरे पतिदेव ने कई सालों  तक एक टेलिविज़न चैनल में जॉब की है.(कमर्शियल साइड)  लिहाज़ा अवार्ड फंक्शन वगैरह में काफी करीब से बड़े बड़े स्टार्स को देखने  का मौका मिला है.खासकर हम रिहर्सल देखने जाया करते थे. जहाँ कोई भीड़-भाड़ नहीं होती थी और सारे स्टार बिना किसी मेकअप के रिहर्सल करते और आस-पास आकर बैठ जाते. एक बार फ्लाईट में हृतिक रौशन,जैकी श्रौफ़,सुष्मिता सेन वगैरह भी मिले थे.पर कभी किसी की ऑटोग्राफ लेने की नहीं सोची.


पर दिलीप कुमार तो legend हैं. उनका ऑटोग्राफ लेने का मौका मैं नहीं छोड़ने वाली  थी. दिल्ली एयरपोर्ट पर पति से  बस कहा कि 'मैं दिलीप कुमार का औटोग्राफ लेने जा रही हूँ'...उन्हें 'हाँ'....'ना' कहने का ऑप्शन ही नहीं दिया और सामान कलेक्ट करने की जिम्मेवारी उनपर छोड़ मैं चल दी,दिलीप कुमार को ढूँढने.  पर वे तो कहीं नज़र ही नही आ रहे थे. तभी कुछ दूरी पर सायरा बानो अपनी उसी आया के साथ खड़ी दिखीं. सोचा....ऑटोग्राफ के बहाने थोड़ी देर उनके पास ही रुका जाए. दिलीप साहब जहाँ भी होंगे, आयेंगे तो यहीं. पर उनकी तरफ बढ़ते हुए ख्याल आया कि ऑटोग्राफ लूंगी किसपर??  कोई डायरी वगैरह तो है नहीं. पर्स में एक पेन तो मिल गया (जो एक पार्टी में हाउजी खेलने के लिए रख  छोड़ा था ) और पर्स में से दो बिल निकले एक लौंड्री  के और एक टेलर के.{ 'रॉक ऑन' फिल्म  का वो गाना हमेशा याद आता है.." मेरी लौंड्री का एक बिल...एक आधी पढ़ी नोवेल" :)} ...मैने उस बिल को ही  पलट कर ,पर्स से आईना निकाला (अभी लास्ट पोस्ट में ही पर्स में आइने के महत्त्व का उल्लेख किया है....जिस काम के लिए रखा जाता है...वो तो संकोचवश कभी नहीं किया...पर दूसरे कार्यों  में बहुत साथ दिया, इस छोटे से शीशे ने )  आइने को उलट कर, उसपर वो लौंड्री का बिल बिछाया और कलम  लेकर सायरा जी के पास पहुँच गयी. वहाँ  समय भी काटना था  और सायरा बानो की, 'जंगली' छोड़ कोई और फिल्म  याद ही नहीं आ रही थी..जिसका जिक्र कर के थोड़ा बातचीत आगे बढाऊं. जंगली का ही जिक्र किया..फिर याद आया कहीं पढ़ा था 'वे भोजपुरी में फिल्म बनाने की सोच रही थीं क्यूंकि विदेशो में उसका अच्छा मार्केट है....उन्होंने कनाडा में बसे  भारतीयों  के भोजपुरी प्रेम  का जिक्र किया था ,(अब समीर जी और अदा इस पर रौशनी डाल सकते हैं )..पर सायरा जी थोड़ा भाव खा रही थीं...जबाब तो दे रही थीं...पर जरा अनमने ढंग से फिर मैने पूछ  ही लिया,.."दिलीप जी ..नज़र नहीं आ रहे "


सायरा जी ने कहा, "साहब को पायलट अपनी केबिन में और लोगो से मिलाने ले गए हैं " {कौन नहीं  है उनका मुरीद :)}


मैने कुछ और पूछा ..और सायरा जी जबाब दे ही रही थीं...कि अपनी सदाबहार मुस्कान के साथ,दिलीप जी खरामा ,खरामा  इस तरफ आते दिखे.  कुर्तानुमा  सफ़ेद शर्ट और सफ़ेद पैंट पहन रखी थी उन्होंने. माथे पर झुके बाल भी  सही सलामत थे, वो मशहूर  लट भी. (विग तो नहीं लग रहा था ) .मैने ध्यान ही नहीं दिया कि सायरा जी की बात ख़त्म नहीं हुई है.और दिलीप कुमार की तरफ बढ़ गयी. सायरा जी के आग्नेय नेत्र पीठ पर महसूस हो रहे थे पर उसे निरस्त्र करने को दिलीप जी की शीतल मुस्कान  सामने ही थी:) . मैने झट से इस बार टेलर वाला  बिल सामने बढ़ा दिया..(याद नहीं..पर 'ऑटोग्राफ प्लीज़' ही कहा होगा) दिलीप कुमार ने झुक कर साइन कर दिया. पर उनका सिग्नेचर कुछ समझ में नहीं आ रहा था और मैने पूछ ही लिया " आपने दिलीप कुमार के नाम से साइन किया है या युसुफ़ खान नाम से "


दिलीप कुमार ने फिर मुस्कुरा कर कहा.."दिलीप लिखा है....कहिए तो युसुफ भी लिख दूँ..??" इस दिलकश अंदाज़ में कहा था कि अगर उम्र का वो  फासला नहीं होता ..और ये डायलॉग उन्होंने अपने स्टार वाले दिनों  में कहे होते  तो मैं तो वहीँ बेहोश ही हो गयी होती.:)


"लिख दीजिये..." चहक कर बस इतना ही कहा. और उन्होंने इस बार स्पष्ट शब्दों में युसुफ लिख दिया.


मुझे ऑटोग्राफ लेते देख..कुछ और लोगों की  हिम्मत बढ़ी और उनलोगों ने भी दिलीप जी को घेर लिया.

अब, मुझे अपने पति-बच्चो की सुध आई .पतिदेव ने अकेले सामान संभाला था और अब उन्हें ये किस्से भी सुनने थे.

शनिवार, 21 अगस्त 2010

भाई-बहन के निश्छल स्नेह के कुछ अनमोल पल

राखी का एक दिन तो ऐसा है जब भाई सात समंदर पार हो....कितना भी व्यस्त हो, किसी काम में आकंठ डूबा हो...बहन की याद आ ही जाती है और कैसे नहीं आएगी?? बहन इतने दिल से जो याद करती है :)

इस राखी  पर मैं भी , अपने ब्लॉग जगत में मिले  भाइयों ...खुशदीप भाई,शहरोज़ भाई, दीपक मशाल, अभी, सौरभ हूँका , प्रशांत  (PD ), रोहित, मिथिलेश , अरशद, चन्दन  ..के लिए दिल से दुआ करती हूँ कि 

सफलताओं के शिखर हो,उनके कदमो तले
हर डाली पर जीवन की,नव पुष्प खिले,
दीपों की माला सी, पाँत खुशियों की जगमगाए
सुख,समृधि, शांति ,से उनका दामन भर जाए
.

यह पोस्ट मेरे इन प्यारे भाइयों को समर्पित है.

हम मध्यमवर्गियों का इतिहास में कहीं नाम नहीं होता पर रस्मो-रिवाज़,त्योहार,परम्पराएं..एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक इन्ही के द्वारा हस्तांतरित की जाती है. राखी में भी बहने बड़े शौक से राखी खरीदती हैं या खुद बनाती हैं, मिठाइयां  बनाती हैं,भाई शहर में हुआ तो राखी बाँधने जाती हैं  वरना दिनों पहले ,राखी पोस्ट की जाती है, भाई भी उसी स्नेह से इसका प्रतिदान करते हैं.

पर जब भाई -बहन का यही प्यार निम्न वर्ग और उच्च  वर्ग में देखने को मिलता है तो बड़ी सुखद अनुभूति होती है.

एक बार मैं अपने दादा जी के पास गाँव गयी हुई थी.देखा हमारी गायें चराने वाला चौदह -पंद्रह वर्ष का एक किशोर, मेरे दादा जी से सौ  रुपये मांग रहा है (तब वह एक बड़ी रकम थी ) कुछ दिन बाद उसकी माँ ने बताया कि शिवराम अपनी बहन 'प्रमिला' से मिलने पहली बार उसके ससुराल गया .प्रमिला चावल का पानी निकाल रही थी (भोजपुरी में कहें तो मांड पसा रही थी )..उसने जैसे ही सुना, भाई आया है, ख़ुशी में उसका ध्यान बंट गया और गरम पानी से उसका हाथ जल गया. शिवराम अंदर गया तो देखा,उसकी बहन पुआल पर सोती है. घर आकर वह अपनी माँ से बहुत झगडा कि ऐसी जगह उसकी शादी कर दी कि उसका हाथ जल गया और वह पुआल पर सोती है. उसने मेरे दादाजी से एडवांस पैसे लिए और एक चौकी खरीद,बैलगाड़ी पर लाद, अपनी बहन के ससुराल पहुंचा आया.

ऐसा ही प्यार हाल में देखा. मेरी कामवाली मराठी  बाई, 'माँ बीमार है' कहकर एक दिन अचानक गाँव चली गयी.उसकी बहन काम पर आने लगी तो बताया कि उसके पति ने बहुत मारा-पीटा है..इसीलिए वह चली गयी है. करीब दस दिन बाद वह वापस आई, उसने कुछ नहीं बताया तो मैने भी नहीं पूछा...अचानक उसके थैले में से मोबाइल बजने लगा.मैने यूँ ही पूछ लिया ,'नया मोबाइल लिया?"

तब उसने सारी बात बतायी कि यह सब सुनकर ,उसका भाई चार लोगों के साथ गाँव से आया और उसके पति की अच्छी धुनाई की (कितने मध्यमवर्गीय भाई हैं जिन्होंने यह सुन, अपने जीजाजी को दो झापड़ रसीद किए हों कि मेरी बहन पर हाथ क्यूँ उठाया ?..खैर..) एक कमरा किराये पर ले उसका सारा समान वहाँ शिफ्ट किया और बहन को एक मोबाइल खरीद कर दिया कि जब भी जरूरत हो,बस एक फोन कर ले .इसका  परिणाम भी यह हुआ कि उसका पति खुद माफ़ी मांगता हुआ साथ रहने आ गया.

भाई-बहन का ऐसा  ही निश्छल स्नेह ,उच्च वर्ग में देख भी आँखें नम हो जाती हैं.

अमिताभ बच्चन जब कुली फिल्म की शूटिंग के दौरान भयंकर रूप से बीमार  पड़े थे ,उन्हीं दिनों राखी भी पड़ी थी और डॉक्टर के मना करने के बावजूद ,अमिताभ बच्चन ने 'सोनिया गांधी' और रमोला (अजिताभ की पत्नी ) की राखी कलाई से नहीं उतारी थी. बाद में सोनिया गाँधी और अमिताभ बच्चन  के सम्बन्ध मधुर नहीं रहें.पर जब तक निश्छल प्रेम था,उसे नज़रंदाज़ कैसे किया जा सकता है? पता नहीं कितने लोगों को पता है,सोनिया गाँधी की शादी ,हरिवंश राय बच्चन के घर से हुई थी ,मेहंदी,हल्दी की रस्म वहीँ अदा की गयी थी और इसी नाते अमिताभ से भाई का रिश्ता बना.

संजय दत्त से सम्बंधित घटना बहुत ही द्रवित करनेवाली है. एक प्रोग्राम में उनकी बहन प्रिया बता रही थीं. संजय दत्त सबसे बड़े थे,इसलिए दोनों बहनों को हमेशा इंतज़ार रहता कि राखी पर क्या मिलेगा,वे अपनी फरमाईशें भी रखा करतीं.पर जब संजय दत्त जेल में थे,उनके पास राखी पर देने के लिए कुछ भी नहीं था. उन्हें  जेल में कारपेंटरी और बागबानी  कर दो दो रुपये के कुछ कूपन मिले थे. उन्होंने वही कूपन , बहनों को दिए. जिसे प्रिया ने संभाल कर रखा था और उस प्रोग्राम में दिखाया. सबकी आँखें गीली हो आई थीं.

ऋतिक रौशन का किस्सा कुछ अलग सा है. उनका और उनकी बहन सुनयना के कमरे तो अलग अलग थे पर उन्हें बाथरूम शेयर करना पड़ता था. ऋतिक रौशन को सफाई पसंद थी जबकि टीनएज़र लड़कियों सी सुनयना  के क्रीम, लोशन,क्लिप्स, नेलपौलिश इधर उधर बिखरे होते. उनका रोज झगडा होता. फिर सुनयना  की शादी हो गयी.ऋतिक जब दूसरे दिन  बाथरूम में गए तो एकदम साफ़ झक झक करता बाथरूम  देख हैरान रह गए.और इतनी  याद आई बहन  की कि तौलिया आँखों से लगाए बाथरूम के फर्श पर ही बैठ रोने लगे.

ये थे भाई बहनों के निश्छल स्नेह के कुछ खट्टे-मीठे पल.


एक बार फिर मेरे भाइयों को राखी की ढेर सारी  शुभकामनाएं

फिल्म The Wife और महिला लेखन पर बंदिश की कोशिशें

यह संयोग है कि मैंने कल फ़िल्म " The Wife " देखी और उसके बाद ही स्त्री दर्पण पर कार्यक्रम की रेकॉर्डिंग सुनी ,जिसमें सुधा अरोड़ा, मध...