तीसरी पारी पूरी हुई यानि कि तीन साल हो गए ब्लॉगजगत में कदम रखे. बल्लेबाजी चल ही रही है...चौकों-छक्कों का नहीं पता...पर रन तो बनते ही रहे, यानि लिखना चलता रहा.
इच्छा हुई, जरा ब्लॉग बही को उलट- पुलट कर देखा जाए.
ब्लॉग शुरू करने से पहले की कशमकश भी याद आ रही है. जब अजय (ब्रह्मात्मज ) भैया ने कहा था कम से कम अब तक जो लिखा है...वो तो एक जगह एकत्रित हो जाएगा. यही सोच कर ब्लॉग बना लो. पर मैने जो कुछ लिखा था वो अट्ठारह साल पहले..अपने कॉलेज के दिनों में. घर गृहस्थी की उलझन और मुंबई प्रवास ने तो हिंदी पढ़ने से भी वंचित कर रखा था तो लिखने का मौका कहाँ से आता. सोच रही थी...जितना लिखा है,वो टाइप करके डाल दूंगी..
पर उसके बाद?...उस से आगे?
लेकिन
लेकिन
बस, एक पहले से लिखी पुरानी कहानी और एक कविता पोस्ट कर दी...पर इन दोनों पोस्ट ने ही मानो बाँध की मेड से मिटटी हटा दी..और हहराता हुआ लेखन प्रवाह इस गति से बह निकला..कि इन तीन सालों में दोनों ब्लॉग में कुल 321 पोस्ट लिख डालीं. अब क्या लिखा ..कैसा लिखा ..इसका आकलन तो गुणीजन करेंगे पर हम तो इतना जानते हैं कि खूब सारा लिखा. :)
समसामयिक विषय....कुछ सामाजिक मुद्दे...संस्मरण..खेल...फ़िल्में..कहानियाँ और कुच्छेक कविताएँ {वो भी पता नहीं,कैसे लिख डालीं :)} .ब्लॉग्गिंग की वजह से कई सारे मौके भी मिले.
दिल में ये कशमकश भी हमेशा जारी रहती है...कहानी या सामाजिक आलेख?? दिमाग कहे..."कहानी लिखो.." और दिल किसी ना किसी सामाजिक या समससामयिक विषय पर आ जाए . पर कभी -कभी दिमाग की जोरदार डांट सुन, दिल को कहानी में मन लगाना ही पड़ता है और फिर इस तरह कहानी में दिल रमता कि १८ किस्त हो जाते हैं और पता ही नहीं चलता. इस साल फ़रवरी में एक लम्बी कहानी शुरू करने से पहले एक अख़बार के आग्रह पर उनके लिए एक आलेख लिखा था...उन्हें बहुत पसंद आया और उन्होंने नियमित एक कॉलम लिखने का प्रस्ताव ही रख दिया .पर तब तक मैं कहानी लिखना शुरू कर चुकी थी. दिमाग ने फुसलाया .."कहानी के बीच बीच में समय निकाल कोशिश कर लो" पर दिल ने साफ़ कह दिया.."खुद ही तो कहा ,कहानी लिखो..अब मन लगाकर कहानी लिखने दो.." वो कहानी भी कुछ ऐसी थी कि डूब कर, महसूस करके लिखना जरूरी था.
अवसरें गंवाने का ये मौका नया नहीं है...:( .क्या ये सिलसिला चलता रहेगा...हमेशा कोई ऑफर ऐसे अवसर पर ही क्यूँ आता है जब सामने दोराहे होते हैं और निर्णय लेना मुश्किल हो जाता है....रेडियो स्टेशन में काम (जुड़ी तो अब भी हूँ आकाशवाणी से पर नियमित जॉब नहीं स्वीकार कर सकी.) और कॉलेज में पेंटिंग सिखाने का ऑफर तब आया था जब मेरे बेटे दसवीं में थे.
पर एकाध मौके ऐसे भी आए जब सारा जहां ( अब मेरे जानने वाले ही मेरे जहां हैं ) एक तरफ और मेरी मकर राशि (capricorn ) का मिजाज़ एक तरफ. (कहते हैं capricornian.. surefooted होते हैं ,सोच -समझकर निर्णय लेते हैं,पर फिर अपने निर्णय से जल्दी नहीं हटते. मन की ही करते हैं. ) वैसे भी मेरे मित्र तो कहते हैं तुम्हारी फितरत है.." सुनो सबकी..करो अपने मन की " कुछ तो ये भी कहते हैं..जिनके नाम के अंत में 'मि' या 'मी' हो वे अपनी मर्जी के मालिक होते हैं ( अजीबोगरीब फंडे हैं )
हुआ यूँ कि इस ब्लॉग लेखन की बदौलत टी.वी.से एक ऑफर आया. एक प्रसिद्द प्रोडक्शन कंपनी (बाला जी टेलीफिल्म्स नहीं ) वाले एक नेशनल चैनल के लिए एक नया प्रोग्राम बना रहे हैं...उनलोगों ने निलेश मिश्र ('याद शहर' फेम वाले और 'जादू है... नशा है'..जैसे गीत के रचयिता ) से चर्चा की...निलेश जी ने अनु सिंह चौधरी से जिक्र किया कि मुंबई की एक महिला से संपर्क करना चाहते हैं...और अनु ने हमारा नाम सुझा दिया . उस प्रोग्राम की डायरेक्टर नेशनल अवार्ड विनर फिल्म की कहानी लिख चुकी हैं. उन्होंने मेरा ब्लॉग देखा...कई पोस्ट पढ़ीं...उन्हें पसंद आया और मेरे पास एक मेल आया कि इस प्रोग्राम के सिलसिले में मिलना चाहती हैं. मुझे भला क्या एतराज होता. और उनकी असिस्टेंट ने इतनी स्वीटली बात की थी..."आप को डिस्टर्ब तो नहीं कर रही...कब कॉल करूँ..कब का अपोयेंटमेंट देंगी आप ? {जैसे पता नहीं, कितनी बड़ी लेखिका हूँ :)}
नियत समय पर हम उनके ऑफिस पहुँच गए. बड़ा सा कॉन्फ्रेंस रूम और छः लोग ..चार लड़के और दो लडकियाँ, मुझे प्रोग्राम की रूपरेखा समझाने के लिए बैठे थे. गोल मेज की एक तरफ मैं बैठ गयी. मुझे लगा था लिखने का काम होगा, परदे के पीछे रहकर पर यहाँ परदे के सामने आना था. वे मुंबई की पांच अलग-अलग उम्र और अलग अलग वर्ग की महिलाओं की रोजमर्रा की जिंदगी...उनकी सोच...उनके सपने...पर आधारित कार्यक्रम बनाना चाहती थीं. इसमें कैमरा महिला के सुपुर्द ही कर देना था कि वो जो चाहे शूट करे...अपनी नज़र से दुनिया को कैमरे में कैद करे. अपनी रोजमर्रा की जिंदगी भी. वे यह दिखाना चाहती थीं कि महिला किसी भी वर्ग की हो...उम्र की हो..उनकी सोच आपस में मिलती-जुलती होती है.
पर यह सुनकर मेरा मन हामी भरने को तैयार नहीं हुआ. मुझे कैमरे के सामने नहीं...पीछे की दुनिया पसंद थी. मैने तो पहले ही 'ना' कह दिया. पर वे 'ना' सुनने को तैयार नहीं...करीब 3 घंटे तक वे सब मुझे कन्विंस करने की कोशिश करते रहे. हमें तो पता ही नहीं...पर उन्हें मेरी लाइफ बड़ी इंटरेस्टिंग लग रही थी. एक छोटे शहर से आई हूँ...मुंबई में रम गयी...यहाँ के जीवन को आत्मसात कर लिया...ब्लॉग है...कहानियाँ लिखती हूँ...वगैरह..वगैरह . अपने प्रोग्राम के लिए मेरा चयन उन्हें बिलकुल परफेक्ट लग रहा था.
उनलोगों का बार-बार कहना था 'आप क्यूँ हिचकिचा रही हैं'...हमारी तरफ से कोई निर्देश नहीं होगा. कोई इंटरफेयारेंस नहीं होगा. आप कैमरे पर जो दिखाना चाहती हैं...बस वही शूट कीजिए. हमारी टीम का कोई मेंबर आपके घर भी नहीं जाएगा,यह सब कॉन्ट्रेक्ट में लिखा होगा. मैं बीच -बीच में कह भी देती ,'आपलोग बेकार टाइम वेस्ट कर रहे हैं...मैं 'हाँ' नहीं कहने वाली'.पर उनका कहना था, "आपके माध्यम से बहुत कुछ पता चल रहा है..एक महिला के सपने..उसकी सोच..उसकी रोजमर्रा की जिंदगी..." वे लोग अपनी नोट बुक में कुछ नोट भी करते जा रहे थे. उन्होंने कैमरा ऑन करने के लिए भी कहा...कि ये इंटरव्यू रेकॉर्ड करना चाहते हैं. पर जब मैने मना कर दिया तो तुरंत मान गए कि 'ठीक है...जब आप कम्फर्टेबल नहीं हैं तो रेकॉर्ड नहीं करेंगे.'
मेरी पूरी जिंदगी के पन्ने दर पन्ने पलटे जा रहे थे. कहाँ से स्कूलिंग की??..कहाँ कॉलेज में पढ़ी?...जीवन में क्या करना चाहती थी??...क्या सपने थे??.." मुझे भी वो सब कहते हुए लग रहा था कि कब से यूँ पलट कर अपनी जिंदगी को देखा ही नहीं.
आखिर विदा लेते समय भी उन्होंने यही कहा..." घर जाकर, अच्छी तरह इस ऑफर पर विचार कीजिए...परिवार जन...सबसे सलाह ले लीजिये...फिर फैसला करिए "
परिवार वाले पहले तो थोड़ा सा हिचकिचाए पर किसी ने भी 'ना ' नहीं कहा.
पतिदेव ने तो बड़ा डिप्लोमैटिकली कहा..".देख लो..करना तो तुम्हे है..."
बड़े बेटे किंजल्क ने कहा ,"मैं तो ज्यादातर बाहर ही रहता हूँ....बस कैमरे को हाय और बाय ही बोलूँगा..."
छोटे बेटे कनिष्क की छुट्टियाँ चल रही थीं...वो थोड़ा असहज था पर उसने कहा.."मैं तो सारा समय अखबार पढता रहूँगा. कैमरा जब भी सामने आएगा...पेपर सामने कर लूँगा "
पर मना किसी ने नहीं किया. ये नहीं कहा कि 'इंकार कर दो.' सहेलियों से चर्चा की तो वे तो ख़ुशी से उछल गयीं..."तुम्हे जरूर करना चाहिए..ऐसे मौके बार बार नहीं आते..मौका हाथ से जाने मत दो..आगे भी तुम्हे सहायता मिलेगी..जान-पहचान बढ़ेगी...आदि आदि ."
माता-पिता..भाई-भाभी तो इसी बात से खुश हो गए कि हमें टी.वी. पर देखते रहेंगे. मेरी कजिन अलका ने तो डांट ही दिया.."पागल हो तुम...ऐसा मौका कोई छोड़ता है?..चुपचाप 'हाँ ' कह दो.."
विभा (रानी )भाभी ने कहा.."कुछ नया करने का मौका मिलेगा...इसे एक चैलेन्ज की तरह लो."
कुछ ब्लॉगर मित्रों से चर्चा करने पर सुनने को मिला ," दुनिया को बचा क्या है..आपके बारे में जानने के लिए...अपने परिवार...दोस्तों के फोटो ब्लॉग-फेसबुक पर लगाती ही हैं...ब्लॉग में अपने जीवन से सम्बंधित घटनाएँ लिखती ही हैं...ये ऑफर स्वीकार कर लेनी चाहिए."
मतलब ये कि हर दरवाजा खटखटा लिया कि कोई तो मेरे निर्णय को सही बताए और मुझे संतोष .मिले...पर नहीं..जैसे अपना सलीब सबको खुद ही ढोना पड़ता है...वैसे ही अपने निर्णय का सलीब भी मुझे ही ढोना था .
और उस पर से पैसे भी बड़े अच्छे मिल रहे थे. इतने पैसे तो मैं खुद कमाने की कभी सोच भी नहीं सकती थी .
पर मुझे खुद को यूँ टी.वी. स्क्रीन पर देखना मंजूर ही नहीं हो रहा था. अभी ख्याल आ रहा है...अपना ब्लॉगजगत भी फेमस हो जाता. मेरी रोजमर्रा की जिंदगी में तो ये भी शामिल है..यहाँ की अच्छाइयां....राजनीति....गुटबंदियां .. .सब दर्शकों के सामने आ जातीं..:)
एक बार निलेश मिश्र की 'मंडे मंडली' में स्टोरी सेशन के लिए गयी थी. वहाँ भी इस कार्यक्रम की बड़ी चर्चा सुनी. वहाँ भी सबका कहना था..आपको स्वीकार कर लेना चाहिए था. प्रोडक्शन कंपनी से मेल और उनके कॉल्स भी आते रहे .सबके यूँ कहने पर हर बार पुनर्विचार करने को विवश होती पर फिर वही अपनी तो एक बार ना..हज़ार बार ना :)
पर ब्लॉग्गिंग को एक थैंक्यू तो बनता है..ऐसे अवसर उपलब्ध करवाने के लिए :)
पर ब्लॉग्गिंग को एक थैंक्यू तो बनता है..ऐसे अवसर उपलब्ध करवाने के लिए :)
तीन साल हो गए ब्लॉग्गिंग करते हुए .मन ये सवाल भी करता है...क्या सारी जिंदगी यही करते रहना है या कुछ और आजमाना चाहिए? ऎसी ही कुछ असमंजस की स्थिति एम.ए के इम्तिहान के बाद आई थी जब इम्तिहान के बाद मैं दुविधा में थी कि अब आगे क्या करना चाहिए. कम्पीटीशन की तैयारी...या एम.फिल. या कुछ और ? उन्ही दिनों 'साप्ताहिक हिन्दुस्तान' में एक विषय पर आलेख आमंत्रित थे ,"डिग्री तो हासिल कर ली..अब क्या करें.." और मैने अपने मन का सारा कशमकश उंडेल दिया था उस आलेख में जो छपा भी था.
पर उसके बाद जल्द ही शादी हो गयी...पतिदेव की अतिव्यस्तता ने बच्चों की सारी जिम्मेवारी मेरे कन्धों पर ही डाल दी . और मैं पूरी तरह उन्हें बड़ा करने में रम गयी. छोटा बेटा जब दसवीं में आया तब ब्लॉग्गिंग में कदम रखा...और पूरी तरह ब्लॉग्गिंग में खो गयी.
पर ब्लॉग्गिंग ने मेरी पेंटिंग लगभग बंद ही करवा दी है..पढना भी पहले से कम हो गया है. पहले तो हफ्ते में दो किताबें ख़त्म कर देती थी. मन को समझा तो लेती हूँ...इतने दिनों सिर्फ पढ़ा,अब लिख रही हो..पर सतत अच्छी किताबें पढना भी बहुत जरूरी है.
अब तक जिंदगी जैसे एक तनी हुई रस्सी पर चलने जैसा था. सारे समय ये चिंता ,अपनी पढ़ाई में अच्छा करना है.....बाद में बच्चे अपनी पढ़ाई..खेलकूद..दूसरी गतिविधियों में अच्छा करें..इसकी चिंता. कभी ये भी सोचती हूँ..रिलैक्स होकर बहने दूँ जिंदगी को,अपनी रफ़्तार से. जब जो अच्छा लगे ..जैसा जी में आए,बस वैसा ही करूँ... पर ऐसे जीने की आदत ही नहीं पड़ी ना. :) कुछ कुछ ना कुछ चैलेंज तो जीवन में चाहिए.
हाँ, लिखना तो शायद ना छूटे कभी...क्यूंकि इतना तो जान लिया है कि यही है जो de stress करता है .चाहे तन और मन कितना भी थका हुआ हो...थोड़ा सा लिख कर ही रिफ्रेश हो जाती हूँ.
तो हम लिखते रहेंगे...आपलोग पढ़ते रहिए :)

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