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गुरुवार, 21 अगस्त 2014

माँ बनी हैं, तो कर्तव्य भी निभाइए

आज सुबह सुबह प्रवीण शाह जी के फेसबुक स्टेटस पर नज़र पड़ी...

"शोक सूचना :-
'हिन्दी ब्लॉगिंग' का असामयिक निधन हो गया है।"

और शाम को वंदना अवस्थी दुबे ने फेसबुक पर लिखा ,
"ब्लॉग-जगत की हालत बहुत गम्भीर है भाई...सबने वहां लिखना बंद ही कर दिया..या बहुत कम कर दिया है. तो मुझे लगता है, कि हमें यहां फेसबुक पर ही एक ऐसा समूह बनाना चाहिये, जिस पर सभी अपनी ब्लॉग-पोस्ट का लिंक पेस्ट करें. समूह के सारे सदस्य महीने में कम से कम एक पोस्ट ब्लॉग पर लिखने के लिये प्रतिबद्ध हों, और यहां पोस्ट किये गये लिंक पर पहुंच कर कमेंट करने के लिये भी. ब्लॉग-जगत का बहुत अच्छा समय हमने देखा है, और अब फिर वही समय हम ही वापस लौटायेंगे....आमीन..."

और संयोग कुछ ऐसा हुआ कि मैं यह सब फेसबुक स्टेटस के रूप में लिखने वाली  थी पर फेसबुक के हिसाब से  पोस्ट बहुत लम्बी हो रही थी और मुझे सारी बातें समेटने का मन था .फिर वंदना की बात मस्तिष्क में कौंधी कि क्यूँ न ब्लॉग पर ही लिख दूँ ...

अगस्त का अपना  कोटा तो पूरा :)


आज अपनी बचपन की सखी पर फिर से गर्व हो आया . 

उसने अपनी बेटी का रिश्ता एक IIT और IIMA से पढ़े लड़के से तय किया. बेटी भी MBA कर एक अच्छी नौकरी में है. लड़के के पिता राज्य सरकार में सेक्रेटरी लेवल पर हैं. बातचीत में लड़के के थोड़े से गर्वीले होने की झलक  मिली पर उसने ज्यादा ध्यान नहीं दिया और बात पक्की कर दी. शादी पक्की होने की खबर सुन  एक विजातीय लड़के ने जो उसकी बेटी से कॉन्फ्रेंस और सेमिनार वगैरह में मिल चुका था , लड़की से शादी  की इच्छा जाहिर की . मेरी सहेली ने अपनी बेटी से पूछा तो उसका कहना था , 'वो लड़के को जानती है ,दोनों दोस्त हैं, पर उनका कोई अफेयर नहीं है. जैसा उसका निर्णय हो ' सहेली ने विजातीय लड़के को मना  कर दिया .

लड़के-लड़की फोन पर बातें करने लगे .एक दिन बेटी ने अपनी माँ से कहा, 'तुम्हे सचमुच ये लड़का इतना पसंद है ?..मुझे थोडा घमंडी लगता है ,बिलकुल आत्ममुग्ध , केवल अपनी अचीवमेंट की बातें  ही करता रहता है . मेरी पढ़ाई और नौकरी को ज्यादा महत्व नहीं देता "

मेरी सहेली ने अपने बेटे को लड़के से मिलने भेजा . बेटे ने मिल कर कहा ,'मुझसे तो अच्छे से ही मिला .बातें करने में भी ठीक है. शायद शादी से पहले लड़की को इम्प्रेस करने के लिए बढ़ चढ़ कर बातें कर रहा है . यह इतनी चिंता की बात  नहीं है. ' 

जब शादी की तैयारियों की बातें होने लगी तो लड़के के पिता ने फरमाया कि ये बातें सिर्फ पुरुषों के बीच होंगी, महिलायें शामिल नहीं होंगी (जबकि मेरी सहेली एक उच्च  पद पर कार्यरत है )  .लड़की के पिता से उन्होंने कहा ,'आपकी एक ही बेटी है आप तो कंजूसी नहीं करेंगे . शादी का पूरा खर्च  तो आपको उठाना ही होगा' और साथ में उन्होंने बेटे के लिए एक महँगी कार और महानगर में एक फ़्लैट की मांग रख दी. साथ ही ये भी कहा कि बेटे को इस सम्बन्ध  में कुछ न कहा  जाए . सहेली के पति तो ये कहकर चले आये कि 'सबकी पत्नी घर की होम मिनिस्टर तो होती ही हैं ,मेरी पत्नी घर की फाइनेंस मिनिस्टर भी है ,उससे सलाह के बाद ही  कुछ कह पाऊंगा.'

मेरी फ्रेंड ने लड़के को फोन मिलाकर पूछा ,"किस मॉडल की कार तुम्हे पसंद है.  अपनी पसंद बताओ तो हम बुक कर दें " 
लड़का चौंक गया और बोला ," आप क्यूँ बुक करेंगी ?..इतना तो मैं कमा ही लेता हूँ कि अपनी पसंद की कार खरीद सकूँ "
लेकिन तुम्हारे पिताजी ने तो हमें  तुम्हारी पसंद की कार खरीदने के लिए कहा है "
"पापा ने आपसे और क्या क्या कहा है ?
ये मेरे और उनके बीच की बात  है , रहने दो " सहेली  के ये कहते ही लड़के ने फोन रख दिया . 

शाम को सहेली के पास लड़के के पिता का फोन आया .गुस्से में बोले, "आपने मेरे बेटे से क्यूँ बात की मैंने मना किया था न आपको "
"ये कोई चाइल्ड मैरेज है क्या ..कि लड़के की राय न पूछी जाए ' सहेली  बोली.
"आपकी एक ही बेटी है इतनी इतनी  ऊँची नौकरी वाले लड़के से रिश्ता करना चाहते हैं...और  अपनी बेटी के लिए इतना भी नहीं कर सकते हैं "
"हम अपनी बेटी के लिए क्या कर सकते हैं क्या नहीं उसकी बात जाने दीजिये पर आप तो अपने बेटे के लिए ,उसकी  शादी में एक बैंड भी नहीं ठीक कर सकते हैं .उसकी फरमाइश  भी हमसे ही की है ' सहेली ने कहा ( यू पी ,बिहार में शादी से जुड़ी हर छोटी बड़ी चीज़ का खर्च लड़की वाले ही उठाते हैं )
लड़के के पिता ने फोन काट दिया और उसके बाद दोनों पक्षों में कोई संवाद नहीं हुआ .

मेरी सहेली ऊँचे पद पर   है, पति डॉक्टर हैं, बेटा भी अच्छी  नौकरी में है, काफी जमीन जायदाद है .वो वर पक्ष की मांगें आराम से पूरी  कर सकती थी . लड़का अच्छी नौकरी में था .पिता बहुत पहुँच वाले थे . खानदान अच्छा था . लड़के की भी दहेज़ न लेने वाली बात उसे अच्छी  लगी थी. पर मेरी सहेली  ने अपनी बेटी की ख़ुशी सर्वोपरि रखी . कुछ लड़के का स्वभाव भी उसे खटक  रहा था और फिर उसने ये भी सोचा कि इस तरह के परिवार में लड़की जायेगी तो पता नहीं ,उसे कितना  कुछ सुनना सहना पड़े. और उसने लड़की के दूसरी जाति वाले दोस्त से संपर्क किया .और जब लड़के से मिली तो पाया कि वह लड़का उसकी बेटी की बहुत इज्जत करता है . उसने भी IIM से पढ़ाई की है पर CA के बाद. भले ही पहले वाले लड़के से थोड़े कम पैसे कमाता हो दूसरी जाति का है पर उसकी बेटी का सम्मान करता है,यह बात बहुत मायने रखती थी .उसने अपने नाते-रिश्तेदारों के विरोध के बावजूद अपनी बेटी की शादी दूसरी जाति में करना तय कर लिया .

लेकिन यहाँ लड़के को अपने घर वालों को मनाने में समय लगा .उसके माता-पिता , समाज और अपने रिश्तेदारों के ताने से डर रहे थे . लेकिन जब मेरी सहेली और बेटी से मिले तो बहुत प्रभावित हुए. यहाँ तक कह दिया कि 'आपकी जैसी बेटी अगर हमारे समाज में होती तो हम उसे मांग कर घर ले आते "
यह बताते हुए मेरी सहेली का गला भर आया . जल्द ही दोनों की शादी होने वाली है .

अच्छा लग रहा है देख, मेरी कई सहेलियां अपनी बेटी की खुशियों  के लिए ढाल बन कर अपने पति,परिवार और समाज के सामने खडी हो जाती हैं. अपनी ज़िन्दगी में जितने भी समझौते करने पड़े ,जैसे भी ज़िन्दगी जी पर अपनी बेटियों को अच्छी  शिक्षा देने ,आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने और सुख सम्मान से भरी ज़िन्दगी देने के लिए कटिबद्ध हैं.
एक बार माँ बन जाने के बाद फिर ज़िन्दगी सिर्फ अपनी नहीं रह जाती.अपने बेटे/बेटियों के अच्छे  भविष्य के लिए हर प्रयास जरूरी है .

गुरुवार, 23 अगस्त 2012

किन किन चीज़ों के लिए आखिर लड़ें महिलाएँ??

चोखेरबाली, ब्लॉग  पर आर.अनुराधा जी की इस पोस्ट ने तो बिलकुल चौंका दिया. मुझे इसकी बिलकुल ही जानकारी नहीं थी कि 1859 में केरल की अवर्ण औरतों को शरीर के उपरी भाग को ढकने का अधिकार मिला. यानि कि अब वे अंगवस्त्र या ब्लाउज पहन सकती थीं. इसके पहले ऊँची जाति की स्त्रियों को भी घर के भीतर और मंदिर में  ब्लाउज पहनने की इजाज़त नहीं थी...और निम्न  जाति की स्त्रियों को कहीं भी अंगवस्त्र पहनने की मनाही थी. 

ब्लाउज पहनने पर ऊँची जाति के पुरुष लम्बे डंडे पर छुरी बाँध कर उस ब्लाउज को फाड़ दिया करते थे. कई बार वे ऐसी औरतों को रस्सी से बांधकर पेड़ पर लटका दिया करते थे..ताकि दूसरी औरतों को सबक मिले. धीरे धीरे समय बदलने लगा....केरल के लोगों में श्रीलंका में जाकर चाय बगान में काम करने , बेहतर आर्थिक स्थिति ,इसाई धर्म परिवर्तन आदि से जागरूकता फैली और औरतें शालीन कपड़े पहनने लगीं. पुरुषों का पुनः विरोध शुरू हुआ तो सारी स्त्रियों ने मिलकर इसका सामना किया और वे पूरे कपड़े पहनकर बाहर निकलने लगीं. (slut walk की याद आती है...जब बेतुकी बंदिशें लगाई जाती  हैं तो ऐसी ही प्रतिक्रियाएँ होती हैं. ).

आखिर पचास साल के संघर्ष के बाद 1859   में स्त्रियों को यह अधिकार मिले कि वे अपने शरीर का उपरी हिस्सा ढँक सकती हैं यानि कि ब्लाउज पहन सकती हैं .

1859 यानि करीब डेढ़ सौ साल पहले इसका अर्थ बहुत पुरानी  बात नहीं है, यह. हमारे परदादा -परनाना के समय की ही बात है. क्या स्त्रियों का अपनी इच्छानुसार अपने लिए ही कोई निर्णय लेना,सदा से पुरुषों को खटकता आया है. समय के अनुसार वे नहीं बदल सकतीं? उन्हें अपनी पुरानी स्थिति में बदलाव का कोई हक़ नहीं? पहले पूरे कपड़े पहने तो क्यूँ पहने..और अब पूरे कपड़े क्यूँ नहीं पहने यानि ना जीते चैन ना मरते चैन. 

प्रसिद्द कथा-लेखिका 'शिवानी ' ने अपने शान्तिनिकेतन के दिनों के संस्मरण  में लिखा था कि 'शान्तिनिकेतन में बहुत सारी आदिवासी महिलाएँ घास काटने आया करती थीं. शिवानी जी और उनकी सहेलियों ने उनके लिए ब्लाउज सिले और उन्हें पहनने को दिए. उन महिलाओं  ने पहनने के बाद , वे ब्लाउज निकाल कर उन्हें वापस कर दिए कि उन्हें इसे पहनने में शर्म आती है. ' अभी अनुराधा जी की ये पोस्ट पढ़कर मुझे ये घटना याद आ गयी. जरूर उन्हें सामजिक अस्वीकृति का ही डर होगा...इसीलिए ये हिचक होगी. 

कुछ समय पहले तक स्त्रियों का चप्पल पहनना, छाता लेना भी सहज स्वीकार्य नहीं था. मेरे बचपन  की ही बात है...मेरे पिताजी की पोस्टिंग एक छोटे से कस्बे में हुई थी. उस इलाके में घरों में झाडू -बर्तन  करने वाली बाइयां चप्पल नहीं पहनती थीं. एक काम वाली बाई  ने चप्पल पहनना शुरू किया था, उसकी बहुत आलोचना होती थी. मेरे घर एक बूढी औरत छोटे-मोटे काम करने आती थी.वो हमेशा कहती..'वो तो चप्पल पहन कर घूमती है..जैसे महारानी हो कहीं की..कहती है..पैर जलते हैं...मेरी इतनी उम्र हो गयी..हमारे पैर तो नहीं जले कभी.' मेरी उनसे अक्सर बहस हो जाती. अब यहाँ लोग ये ना कहने लगें, स्त्री ही स्त्री की दुश्मन होती है. उनके समाज में ही स्त्रियों को चप्पल पहनने का प्रचलन नहीं होगा .चप्पल पहनने वाली स्त्रियों की आलोचना की जाती होगी. इसीलिए और उन बूढी महिला का रिएक्शन भी स्टीरियो टाइप ही होगा.

सामाजिक प्रचलन का ख्याल तो हमारी भूतपूर्व प्रधान मंत्री 'इंदिरा गांधी' को भी रखना पड़ता था. वर्षों पहले,धर्मयुग में 'पी.डी. टंडन' का एक संस्मरण पढ़ा था. इंदिरा गांधी को धूप बिलकुल बर्दाश्त नहीं होती थी और उन्हें अपने चुनावी दौरों के लिए गाँव -कस्बों में धूप  में जाना पड़ता था. पर वे छतरी नहीं लेती थीं क्यूंकि गाँव में औरतों के छतरी लेने का प्रचलन नहीं था. और शायद अपने चुनावी दौरों में  वे उनमे से एक दिखना चाहती थीं. एक बार वे कार से उतर कर चिलचिलाती धूप में सभा-स्थल की तरफ जा रही थीं . पी.डी. टंडन भी साथ थे...उन्होंने छाता  आगे बढ़ाया  पर इंदिरा जी ने मना कर दिया और कहा.."हम स्त्रियों के पास अपना छाता है'...उन्होंने सर पर आँचल रख कर छोटा सा घूँघट निकाल लिया. पी.डी. टंडन ने तुरंत कैमरे से तस्वीर खींच ली. उस संस्मरण के साथ, इंदिरा गांधी की वो तस्वीर भी छपी थी. (शायद नेट पर भी उपलब्ध हो वो तस्वीर) .अब उस इलाके में जिस स्त्री ने भी पहली बार छतरी ली होगी..उसे तो ना जाने कितनी बातें सुननी पड़ी होंगी..कितना विरोध सहना पड़ा होगा. 

पता नहीं...ये सब सोच सोच कर ही एक थकान सी तारी हो जाती है,मन पर. किन किन चीज़ों के लिए आखिर लड़ें  महिलाएँ??. ब्लाउज पहनने के अधिकार के लिए,..चप्पल पहनने के लिए....छतरी लेने के लिए... इतनी छोटी-छोटी चीज़ों के लिए भी उन्हें लम्बी लड़ाई लड़नी पड़ती है...ताने सुनने पड़ते हैं..प्रताड़नायें झेलनी पड़ती हैं...विरोध सहना पड़ता है. फिर बड़ी चीज़ों के लिए तो उनका संघर्ष दुगुना-चौगुना-सौ गुणा  हो जाएगा..बहुत ही त्रासदायक स्थिति है. 

बस हौसला बना रहे...बहुत लंबा है,सफ़र और मंजिल बहुत दूर. दरख्तों का साया भी नहीं..पैरों तले समतल जमीन भी नहीं...आस-पास खुशनुमा वातावरण भी नहीं...जंगली जानवरों से बचते,उसी कंटीली खुरदरी जमीन पर लहुलुहान पैरों से चलकर आने वाली पीढ़ियों के लिए रास्ते बनाने हैं...कि उन्हें तो मंजिल मिले. 

रविवार, 22 जुलाई 2012

क्या लडकियाँ सचमुच लड़कों की नक़ल या उनकी बराबरी करती हैं??



कई बार किसी विषय पर लिखना शुरू करो तो बातें जुडती चली जाती हैं...और पोस्ट्स की एक श्रृंखला सी ही बन जाती है.."इतना मुश्किल क्यूँ होता है ना कहना.."..."लड़कियों की उड़ान किसी  इत्तफाक की मोहताज नहीं "...."आखिर कुछ  पुरुषों/लड़कों के अंदर ही एक जानवर क्यूँ निवास करता है "
के बाद लड़कियों की समस्याओं से ही सम्बंधित एक और पोस्ट 

काफी दिनों से कई बार ..कई जगह ..ब्लॉग जगत में ..फेसबुक पर लोग ( हमारे देश के सारे पुरुष नहीं..पर अधिकाँश ).चिंता जताते नज़र आ जाते हैं..'लडकियाँ हर चीज़ में लड़कों की बराबरी क्यूँ करती हैं??...उन्हें लड़कों की नक़ल नहीं करनी चाहिए ..आदि..आदि .
मन सोचने पर मजबूर हो गया क्या सचमुच ऐसा है..लडकियाँ, लड़कों की नक़ल कर रही हैं?..लडको की बराबरी करना चाहती हैं??

अब ये तो सर्वज्ञात और सर्वमान्य  है कि पुरुष समाज....महिलाओं से कई वर्षों से बहुत आगे चल रहा है.

करीब सत्तर-अस्सी साल से भी पहले से ही पुरुष ..उच्च  शिक्षा,नौकरी के लिए अपना घर छोड़ कर दूसरे शहर जाकर रहने लगे थे.
महिलाओं में बमुश्किल पिछले दस वर्षों से यह देखने में आ रहा है कि वे भी उच्च शिक्षा..नौकरी के लिए अकेली दूसरे शहर जाकर रहने लगी हैं. उनका भी अभी प्रतिशत बहुत कम है.
तो क्या यह कहा जाएगा कि वे लड़कों की नक़ल करने लगी हैं?

करीब इतने ही बरस पहले से पुरुषों ने धोती-कुरता  छोड़कर शर्ट-पैंट अपना ली है..क्यूंकि धोती मेंटेन करने में बहुत कठिनाई आती थी. उसे बाँधने में ज्यादा  समय लगता था . तेज चलने में भी मुश्किल होती थी..और उन्हें ये भी भान है कि धोती से ज्यादा स्मार्ट वे पैंट में लगते हैं. इन सारी असुविधाओं से बचने के लिए उनलोगों ने धोती को टाटा-बाय बाय कहकर पश्चिम से आई वेश-भूषा शर्ट-पैंट  को अपना लिया .


अब आजकल लडकियाँ भी कॉलेज-यूनिवर्सिटी जाती हैं...नौकरी करती हैं. उन्हें भी साड़ी से ज्यादा सुविधाजनक जींस लगती है. साड़ी बाँधने में समय लगता है. उसे मेंटेन करने में (यानि धोना-प्रेस करना  ) परेशानी होती है. तेज-तेज चलने में कठिनाई होती है तो उन्हें  भी जींस पहनना ज्यादा सुविधजनक लगता है . और जींस किफायती भी है. दो जींस ले लिए और छः टॉप्स...छः ड्रेस बन गयी. जबकि सलवार-कुरत-दुपट्टे और साड़ी-ब्लाउज-पेटीकोट के  छः सेट लगेंगे...लिहाजा पैसे भी अधिक लगेंगे. पर ये सारी बातें तो गौण है...समझा तो ये जाता है कि वे तो बस लडको की बराबरी के लिए जींस पहनती हैं...उनकी नक़ल करने के लिए.

लड़कियों के लम्बे बाल बड़े अच्छे लगते हैं...लम्बी सी कमर तक लहराती चोटी...उसमे फूलों  का गजरा लगा हुआ. पर आज की  दौड़ती-भागती जिंदगी में इतना समय सबके पास है??...और लम्बे बाल की सिर्फ चोटी बनाने में ही समय नहीं लगता...बल्कि बालों को लम्बा और घना रखने के लिए..उनकी अच्छी देख-भाल भी बहुत जरूरी है. पहले औरतें घर में रहती थी..तेल..दही..रीठा शिकाकाई लगाए जा रहे हैं..बालों में. पर अब इन्हें घना और लम्बा बनाए रखने को इतना समय नहीं दे पातीं...और कैंची चल जाती है..बालों पर .पर झट से आरोप लग जाता है कि ये तो नक़ल कर रही हैं. 

जबकि पुरुषों ने भी काफी समय से रंगीन....छींटदार शर्ट पहननी शुरू कर दी है...शौर्ट्स और बरमूडा पहनते हैं..आजकल लड़के लम्बे बाल रखते हैं...ब्रेसलेट पहनते हैं..कानों में बालिया..गले में मालाएं. तब ये नहीं कहा जाता कि वे लड़कियों की नक़ल कर रहे हैं...(वे नक़ल कैसे कर सकते हैं..वे तो हमेशा से श्रेष्ठ हैं ) बल्कि तिरस्कार से कहा जाता है कि 'क्या लड़कियों जैसा ये सब पहना है. 

यानि कि लड़के  ये सब करें तो 'फैशन ' और लडकियाँ करें..तो वे बिगड़ गयी हैं..बहक गयी हैं...नक़ल कर रही हैं.

ऐसे ही  आजकल..अपने बच्चों की पढ़ाई-लिखाई...स्कूल के होम वर्क..पैरेंट्स मीटिंग..उनके बीमार पड़ने पर डॉक्टर के पास ले जाना...उनका वैक्सीनेशन ज्यादातर औरतों के जिम्मे ही होता है. ये सब काम पहले पुरुषों की जिम्मेवारी ही होती थी क्यूंकि स्त्रियाँ पढ़ी-लिखी भी नहीं होती थीं और अकेली घर से बाहर भी नहीं जाती थीं....तो फिर यहाँ भी कहना चाहिए..'ये तो नक़ल और बराबरी कर रही हैं.

अब जब स्त्रियाँ भी पुरुषों की तरह ही उच्च शिक्षा ग्रहण कर रही हैं...नौकरी कर रही हैं ..घर से बाहर  निकल रही हैं तो उन्हें सिर्फ एक स्त्री के रूप में ना देख कर 'एक अलग व्यक्तित्व'...' एक इंसान'की तरह देखा जाना चाहिए. क्यूंकि अब वे भी वो सारे काम करती हैं जो पुरुष करते हैं..(बल्कि ऑफिस से आकर घर का काम भी...क्यूंकि अभी पुरुष वर्ग इतना उदार नहीं हुआ है कि घर के  कामों में भी बराबरी से हाथ बटाए  ) .

निस्संदेह  पुरुष शारीरिक रूप से अब भी स्त्रियों से ज्यादा शक्तिशाली हैं. पर अफ़सोस ..वे अपनी इस एडिशनल शक्ति का कोई उपयोग नहीं कर पाते...:) (हाँ...कुछ  कापुरुष...स्त्रियों पर अपना शक्ति-प्रदर्शन जरूर आजमाते हैं ).

पहले पुरुष....धूप में.. खेतों में काम करते थे...लकडियाँ ,काट कर लाते थे...मीलों पैदल चलते थे. स्त्रियाँ घर के काम करती थीं और बच्चे संभालती थीं. पर अब पुरुष भी स्त्रियों की तरह ही..ऑफिस जाने के लिए किसी वाहन का ही उपयोग करते हैं. ऑफिस में भी डेस्क जॉब...कंप्यूटर..पर ही काम होता है...जिसमे दिमाग की ही आवश्यकता पड़ती है और जो दोनों में बराबर मात्रा में है {अभी हाल में ही लंदन में हुए सर्वे मे पाया गया कि स्त्रियों का IQ  पुरुषों से ज्यादा है...उसकी बात हम नहीं कर रहे :)} इसका अर्थ है कि स्त्रियों में भी पुरुषों जितना ही सोचने-समझने की शक्ति  है.  लेकिन पुरुषों के अंदर ये जड़ें बहुत गहरी जमी हुई हैं कि वे महिलाओं से श्रेष्ठ  हैं...इसलिए उनपर बंधन लगा सकते हैं...उनके लिए नियम बना सकते हैं...और ना पालने की दशा में उन्हें सजा दे सकते हैं. जबकि जो महिलाएँ, आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर नहीं हैं...या जिनमे अपनी बात कहने का साहस नहीं है..वे तो पुरुषों के सारे नियम-कायदे मानती ही हैं.
 पर पुरुषों की  जिद ये है कि जो स्त्रियाँ अपने जीवन का निर्णय खुद ले सकती हैं. उन्हें क्या पहनना है..अपनी जिंदगी कैसे बितानी है...खुद तय कर सकती हैं. स्व-विवेक से निर्णय लेने में सक्षम हैं. उनपर भी पुरुषों के  बनाए नियम ही लागू होने चाहिए. कानून स्त्रियों को सारे अधिकार देता है.पर हमारे समाज के अधिकाँश  पुरुष नहीं. 

अब जब पुरुष और स्त्री..समान स्तर पर आ गए हैं तो उनके गुण-अवगुण भी समान  हो गए हैं. जहाँ पहले स्त्रियाँ...भीरु-लजालू-धीमा बोलने वाली होती थीं..अब वैसी नहीं हैं. 
और सबसे ज्यादा परेशानी पुरुष वर्ग को यहीं होती है. अब लडकियाँ कमाती हैं...उनके पास पैसे होते हैं...वे अपनी मर्जी से खर्च करने लगी है. पांच दिन ऑफिस में खटकर वीकेंड पर वे भी unwind       होना चाहती हैं...पार्टी करती हैं. डिस्को जाती हैं..अपनी मर्जी के कपड़े पहनती हैं. 
पर  उनका यह सब करना सबको बड़ा नागवार गुजरता है..जब तक वे ऑफिस में चुपचाप काम करके घर आ बच्चे संभालती हैं...किसी को परेशानी नहीं होती...पर वे पार्टी कैसे कर सकती हैं? संस्कृति तो रसातल में चली जायेगी ?..उसकी रक्षा का भार तो उनके कन्धों पर ही है. जबकि ऐसी लड़कियों का प्रतिशत बहुत बहुत कम है...पर अगर एक भी लड़की ऐसा करती है..तो क्यूँ करती है...?..हमारी संस्कृति पर तो आंच आ गयी. 

कुछ लडकियाँ...सिगरेट भी पीती हैं...और कुछ शराब भी. यह बहुत ही बुरा है. पर इतना ही बुरा पुरुषों के लिए भी है. सिगरेट-शराब ..स्त्री/पुरुष के फेफड़े और जिगर को नुकसान पहुंचाने में कोई भेद-भाव नहीं करती. दोनों के लिए ही बहुत ही नुकसानदेह है और त्याज्य भी. पर आलोचना..धिक्कार सिर्फ लड़कियों के हिस्से आता है. पुरुषों का सिगरेट पीना तो बिलकुल आम और स्वीकार्य है...फेसबुक प्रोफाइल में लोग अपनी सिगरेट पीते हुए फोटो लगाते हैं. अक्सर जिक्र भी कर देते हैं...'वहाँ  जाम छलकाई...' दोस्त आए तो ये बोतल खोली...'कई बार ब्लॉग पर भी जाम टकराते हुए फोटो लगा देते हैं. क्या यह सही है?? 
हाँ ..उनके लिए सही है..पर अगर कहीं भनक भी मिल गयी कि किसी लड़की ने किसी पार्टी में जाम टकराए. तो तुरंत हिकारत से कहा जाता है...लड़कों की नक़ल कर रही हैं..लड़कों की बराबरी करना जरूरी है?

वे लड़कों की बराबरी के उद्देश्य से नहीं करतीं ये सब .पर जैसे लड़कों में एकाध जाम लेकर ..लाइफ एन्जॉय करने का...पार्टी में डांस करने  का...मन होता है. एग्जैक्टली वे भी ऐसा ही सोचती हैं. पहले तो पुरुषों में भी पार्टी में डांस करने चलन नहीं था...फिर उनलोगों ने शुरू किया...स्त्रियाँ किनारे खड़ी रहती थीं ..उन्हें खींच कर लाया जाता तो वे जरा सा हिल कर चली जातीं. पर आज की लडकियाँ जम कर डांस करती हैं...और तब ऐसा लगता है कि वे, ये सब लड़कों की बराबरी के लिए कर रही हैं. जबकि वे भी बस जिंदगी को भरपूर जीना चाहती हैं. 

जैसे सोलह-सत्रह साल के लड़के छुपकर एकाध कश लगा..अपने आपको बहुत बड़ा समझने लगते हैं..ठीक यही भावनाएं लड़कियों में भी होती हैं. जो कि दोनों के लिए बहुत गलत है. फिर भी ऐसी लड़कियों की संख्या बहुत ही कम है...छोटे शहरों में तो नगण्य ही है...महानगरों में भी कुछेक लडकियाँ ही ऐसी पार्टियों में जाती हैं या सिगरेट पीती हैं.  जबकि पुरुषों में तो सिगरेट-शराब का चलन ,गाँव-कस्बे-शहर-महानगर..सब जगह एक सा है. पर धिक्कार और नसीहत तो सिर्फ लड़कियों को ही मिलती है.

अगर पति को छोड़कर किसी प्रेमी से विवाह...या पति/प्रेमी को धोखा देने जैसी कोई घटना सामने दिखती है...तब भी लोग यही कहते हैं..पुरुष तो ये सब करते आ रहे हैं...अब क्या स्त्रियाँ भी?? जबकि पुरुषों की तुलना में ऐसे केस  इक्के-दुक्के ही होते हैं. तो स्त्रियों को  बिलकुल एक देवी ही क्यूँ समझा जाता है. वे भी इंसान हैं....वे भी गलतियाँ कर सकती हैं. और पुरुषों की तुलना में उन्हें अपनी गलती की सौगुनी सजा भी भुगतनी पड़ती है. 

अब जब पुरुष समाज नए रास्ते पर चल रहा है....और स्त्रियों से काफी आगे चल रहा है (प्रतिशत में ) ...धीरे-धीरे स्त्रियाँ भी उसी रास्ते पर चलने लगी हैं...शिक्षा..नौकरी..अपने घर -परिवार का ध्यान रखती हैं....तो इसे पुरुषों की नक़ल..या बराबरी कैसे कहा जा सकता है?? 
अब उनके लिए अलग रास्ता क्या हो सकता है..जिस से ये नक़ल ना लगे?? यही हो सकता है कि वे बस पीछे रहकर सिर्फ घर और बच्चे संभालें...जो अब प्रगति के पथ पर कदम रख देने वाली स्त्रियों के लिए संभव नहीं. वे  सफलता भी पाएंगी..असफल भी होंगी.....अपनी मर्जी से अपनी जिंदगी जियेंगी....गलतियाँ भी करेंगी...उसका खामियाजा भी भुगतेंगी और उन्हीं गलतियों से  सीखेंगी भी...क्यूंकि दासी वे रही नहीं...देवी उन्हें बनना नहीं..बस एक इंसान ही बने रहना चाहती हैं. 

और अपनी गलतियों से उन्हें खुद ही सीखने दिया जाए. उनके लिए अब दूसरे तय करना बंद करें कि उनके लिए क्या गलत है क्या सही.



फिल्म The Wife और महिला लेखन पर बंदिश की कोशिशें

यह संयोग है कि मैंने कल फ़िल्म " The Wife " देखी और उसके बाद ही स्त्री दर्पण पर कार्यक्रम की रेकॉर्डिंग सुनी ,जिसमें सुधा अरोड़ा, मध...