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रविवार, 29 जुलाई 2012

गैर फ़िल्मी वीर-ज़ारा ने ना मानी सरहद की हद


बचपन में एक कहानी सुनी थी जिसमे एक राक्षस को देखकर सारे मनुष्य छुप जाते थे पर राक्षस को उनकी  गंध आती थी और वो 'मानुस गंध...मानुस गंध' कहता हुआ उन्हें ढूँढने की कोशिश करता रहता था. जब से ब्लॉग बनाया है...मुझे भी जैसे हमेशा कहानी की गंध आती रहती है...{अब यहाँ सिर्फ गंध वाली समानता ही देखी जाए :)}किसी ने कहीं किसी घटना का जिक्र किया और मैने उसमे छुपी कहानी(आलेख,संस्मरण ) देख कर अपनी फरमाइश रख दी..'मुझे लिख भेजिए' .इस क्रम में...ममता कुमार, इंदिरा शेट्टी, जया मेनन   और जी.जी. शेख मेरे आग्रह पर मेरे ब्लॉग पर लिख चुके हैं. अभी पिछली पोस्ट पर युवा  कवि अविनाश चन्द्र जी ने सरहद पार की एक प्रेम कथा का जिक्र किया मैने आदतवश तड़ से फरमाइश कर दी और उन्होंने उसे झट से पूरा कर दिया. शुक्रिया अविनाश :)
शुक्रिया ममता भाभी का भी..जिन्होंने मुझे ब्लॉग बनने के लिए सिर्फ प्रोत्साहित ही नहीं किया बल्कि पहली पोस्ट से लेकर अब तक मेरी सारी पोस्ट पढ़ी  भी है.पर उन्हें दुखांत प्रकरण या  दुखांत कहानियाँ पसंद नहीं हैं...हमेशा की तरह पिछली पोस्ट पर भी उन्होंने हैप्पी एंडिंग वाले आलेख  की डिमांड की और इस पोस्ट का ख्याल अंकुरित हुआ.

तो सबसे पहले अविनाश जी की सीमा पार वाले नॉन ग्लैमरस वीर ज़ारा की कहानी. जिसे उनके वरिष्ठ सहकर्मी ने उन्हें सुनायी थी.

मुझे साल एकदम सही से याद नहीं, २००४ या २००५ की बात है (यानि जब मैं नया नया कॉलेज गया रहा होऊंगा)।
जिस कंपनी में मैं काम करता हूँ उसके business clients दुनिया में हर जगह हैं और जिस ख़ास client के लिए हमारी division काम करती है उसके तब एशिया में २ पार्टनर हुआ करते थे - एक हम और एक पाकिस्तानी कंपनी।

तो पाकिस्तान से उनका एक पूरा ग्रुप ताजमहल देखने आया था, यहाँ से भी १२-१५ लोग गए थे - फ्रेशर टाइप के जिन्हें थोडा समय मिल जाता है, शुरुआत में। मेरे वर्तमान सहकर्मी नितिन भी जाने वालों में से एक थे और वहाँ उनकी ठीक-ठाक पहचान आसिफ नाम के लड़के से हो गई जो लगभग उसी technology पर काम करता था और दोनों एक दूसरे के नाम से पहले से हल्का-फुल्का परिचित थे। जैसा कि होता है, वापसी के समय दोनों ने numbers exchange किये - डेस्क का land-line नंबर, अविश्वास एक कारण हो सकता है - मैंने पूछा नहीं।

offices में एक एरिया में एक फ़ोन होना आम बात है, जिससे ३-४ लोग उसी से काम चला सकें। हाँ, senior लोगों को individual फ़ोन ही मिलते थे।
नितिन जब भी आसिफ को फ़ोन करते हमेशा एक लड़की उठाया करती, फ़ोन उसी के करीब रखा रहता हो शायद। मामूली औपचारिक अभिवादन के बाद फ़ोन आसिफ के पास चला जाता।
धीरे-धीरे फ़ोन, ऑरकुट, chat-rooms, yahoo messenger (तब तक facebook ज्यादा प्रचलित नहीं था )  के सहारे इनके सम्बन्ध प्रगाढ़ हुए।

दोनों ने एक दो बार एक दूसरे को वाघा पर जा कर देखा भी। ये मुझे भी फ़िल्मी लगता है।
२००९ तक (तब मुझे नौकरी करते साल भर हो चुका था) दोनों ने शादी करना तय किया और लड़के के घर वाले तो जैसे तैसे मान गए (उसने यही कहा है) पर लड़की के पिता जो की वहाँ की आर्मी में general है (वो जनरैल कहतीं हैं) को तो बिलकुल नहीं मानना था।  वापस कभी पाकिस्तान न आने की शर्त पर, सम्बन्ध तोड़ देने की शर्त पर उन्होंने उसे जाने दिया और दिसम्बर २०१० में दोनों ने शादी कर ली।

उन्हें हर १५ दिन में ढेरों दफ्तर के चक्कर लगाने पड़ते हैं, दिल्ली छोड़ के जाने पहले भी बहुत जगह applications डालतीं हैं।
एक बार (reception dinner पर) हम भी मिले थे उनसे।
उनकी हिंदी और उर्दू दोनों ही निहायत ख़राब है (अंग्रेज़ी-पंजाबी बेशक ठीक है) पर वो बॉलीवुड के गाने अच्छे गा लेती हैं। इस मोड़ से जाते हैं, कुछ सुस्त कदम रस्ते.....:)

दुआ है, उनका प्रेम यूँ ही परवान चढ़ता रहे...जिंदगी की राह में और कठिनाइयां ना आएँ..और जीवन खुशहाल बना रहे.

किसी रोमांचकारी फिल्म सा वाकया

अक्सर युवा मित्र अपनी समस्याएं रखते रहते हैं..और मैं  भी agony aunt  का अवतरण धारण कर उसे सुलझाने की पूरी कोशिश करती हूँ. पर नीलाभ की समस्या बड़ी अजीबोगरीब थी. उसने कहा 'मेरी शादी की पहली वर्षगाँठ  आ रही है..पर समझ नहीं आ रहा किस दिन मनाऊं?' मेरे चौंकने पर वो हंसा और फिर बोला..'मैने अब तक बताया नहीं कि मेरी तीन बार शादी हुई है " मैं कुछ कहती इसके पहले ही उसने जोड़ दिया.."एक ही लड़की से तीन बार..."
और आगे जो उसने बताया वो किसी थ्रिलर से कम नहीं था.

नीलाभ और महेश बचपन से ही बेस्ट फ्रेंड्स हैं. उनका एक दूसरे के घर आना-जाना भी था. महेश की  एक छोटी बहन मीना है...पर नीलाभ उस से ज्यादा  बातें नहीं करता  था. एक बार महेश बीमार था...उसका हाल पूछने के लिए  नीलाभ ने फोन किया. महेश सो रहा था...फोन छोटी बहन ने उठाया...और इन दोनों ने देर तक बातें की...और दोनों के बीच प्रेम का अंकुर  प्रस्फुटित होने लगा.. महेश को इनके रिश्ते से कोई एतराज नहीं था. उसके माता-पिता भी नीलाभ के साथ मीना के घूमने-फिरने  से मना नहीं करते थे. गरबा हो या न्यू इयर पार्टी...नीलाभ देर रात मीना को उसके घर छोड़ता. 
पर मीना के माता-पिता उसकी शादी कहीं और तय करने लगे. जब मीना  ने नीलाभ से शादी की इच्छा जताई तो माता-पिता का तर्क था..."नीलाभ मराठी है..और हम सिन्धी..ये शादी नहीं हो सकती." जब नीलाभ के यह कहने पर 'फिर आपने हमें साथ घूमने-फिरने की इजाज़त क्यूँ दी?' उनका अजीबोगरीब तर्क था.."मीना  तुम्हारे साथ सुरक्षित रहती...हमें तुम पर भरोसा था...तुमसे दोस्ती नहीं होती तो शायद किसी और लड़के से उसकी दोस्ती हो जाती और वो हमें पसंद नहीं था" 
 मीना का भाई महेश इन दोनों की शादी के पक्ष में था पर वो विदेश चला गया था..वहाँ से फोन से अपने माता-पिता को नाकाम समझाने की कोशिश करता रहता. मीना के माता-पिता किसी तरह नहीं माने और एक जगह मीना की बात पक्की कर दी. इतवार को लड़के वाले मीना के घर आने वाले थे. मीना  ने ये बात नीलाभ को बतायी और शनिवार की रात नीलाभ फुल स्लीव की शर्ट और पैंट पहनकर तैयार हो गया .उसकी माँ ने पूछा भी...इतनी रात को फौर्मल्स  पहनकर कहाँ जा रहे हो ? अब क्या कहता.शरीफ बनकर लड़की का हाथ मांगने जा रहा हूँ...:)

नीलाभ उनके घर पर जाकर सोफे पर जम गया...कि 'आपलोग जबतक हमारी शादी के लिए हाँ नहीं कहेंगे...मैं यहाँ से नहीं उठूँगा.' मीना भी अपने माता-पिता को मनाने की कोशिश करने लगी. पर उसके पैरेंट्स की एक ही रट थी...'हमारी जाति एक नहीं है..ये शादी नहीं हो सकती' नीलाभ के माता-पिता बहुत सीधे-सादे, आदर्शों वाले थे. अगर वो मीना  को भगाकर घर ले आता तो वे कभी उसे घर में रहने की आज्ञा नहीं देते. नीलाभ ने इन सबकी चर्चा अपने मामाजी से की थी . वे मुंबई के पास ही एक गाँव में रहते थे. उन्होंने कहा था...'अगर कोई समस्या हो तो लड़की को लेकर मेरे घर आ जाना' यहाँ बात ना बनती देख...नीलाभ ..घर के बाहर मामा को मोबाइल से फोन करने गया...कि 'लगता है लड़की को लेकर आना होगा' पर वो जैसे ही घर से बाहर निकला.मीना  के पैरेंट्स ने दरवाज़ा बंद कर दिया. काफी देर घंटी बजाता रहा...आखिर मीना ने किसी तरह दरवाज़ा खोल दिया..फिर से पैरेंट्स को मनाने का दौर शुरू हो गया. अब मीना  की माँ चीखने चिल्लाने लगीं और कहा..'अगर तुम दोनों शादी करोगे तो मैं खुद को चाक़ू मार लूंगी' वे चाकू लाने किचन में गयीं...पीछे से उनके पति उन्हें रोकने गए. और इसी बीच नीलाभ ने कहा..'यही मौका है'..और वो मीना  का हाथ पकड़ बाहर की तरफ भाग लिया...पीछे-पीछे उसके माता-पिता भी दौड़ते हुए आए. पर ये लोग सीढियां उतरते हुए...गेट पारकर कार में जा बैठे. मुड कर देखा तो मीना की माँ चिल्ला रही थीं..पर नीलाभ गाड़ी स्टार्ट कर दूर निकल गया.

रात के एक बज रहे थे और ये संयोग ही था कि वाचमैन ने उस दिन गेट नहीं बंद किया था वरना बारह बजे सोसायटी के गेट बंद कर दिए जाते थे. अब नीलाभ को चिंता हुई कि अकेले लड़की को लेकर इतनी  रात में अकेले गाँव की तरफ जाना ठीक नहीं. उसने अपने एक कजिन को साथ चलने के लिए फोन किया जिसका घर रास्ते में पड़ता था. और ये भी कहा कि एक चप्पल लेते आना.क्यूंकि मीना  नंगे पैर ही भागी थी. 
और एक साधारण से टी शर्ट-ट्रैक पैंट और नौ नंबर की चप्पल में नीलाभ अपनी होने वाली दुल्हन को लेकर सुबह के चार बजे अपने मामा के घर पहुंचा. दूसरे दिन ही मंदिर में इन दोनों की शादी करा दी गयी. अब नीलाभ के पैरेंट्स को खबर की गयी. नीलाभ की माँ ने कहा बिना समाज के सामने उनकी शादी किए वो लड़की को अपने घर में नहीं रख सकतीं. मीना को एक रिश्तेदार के घर ठहराया गया....जल्दी से शादी की तैयारियाँ की गयीं और मराठी रस्मों  से उनकी शादी कर दी गयी. अब मीना  के पैरेंट्स को भी इनकी शादी स्वीकारनी पड़ी . पर उनका भी कहना था हमें भी अपने समाज में मुहँ दिखाना है...लिहाजा तीसरी बार उनकी सिन्धी  ढंग से शादी हुई. 

अब सब लोग खुश हैं और उनकी गोद में एक साल का एक बेटा भी है. अपनी पत्नी से काफी सोच-विचार के बाद मंदिर में की गयी पहली शादी वाली तारीख को ही नीलाभ ने शादी की वर्षगाँठ के रूप में मनाना  निश्चय किया .

एक प्रेरक प्रेम-कथा 

शैलेन्द्र बिलकुल हैपी-गो-लकी टाइप का लड़का है. जिंदगी से भरपूर. अपने परिवार के बहुत करीब  है..अपनी बहन की बिटिया में तो उसकी जान बसती है. शायद  ही दुनिया की कोई मशहूर किताब या मशहूर फिल्म उसने नहीं देखी हो. पर वो अपना ज्ञान किसी पर बघारता नहीं बल्कि दूसरों की बात ज्यादा ध्यान से सुनता है.उसकी बड़ी जल्दी किसी से दोस्ती हो जाती  और उस दोस्ती को वो निभाता भी है. 

उसकी एक चैट फ्रेंड थी कनु जो सिंगापुर में नौकरी करती थी. कनु की तबियत थोड़ी नासाज़ रहने लगी और वो सिंगापुर की  नौकरी छोड़कर मुंबई आ गयी. उसे भयंकर एलर्जी हो गयी थी. उसे अनाज, दूध हर चीज़ से एलर्जी थी. सिर्फ चुनिन्दा फल और सब्जियां  ही खा सकती थी. उसकी त्वचा की परत उतरने लगी थी. सूख कर काँटा  हो गयी थी. सिर्फ मुलायम सूती कपड़े ही पहन पाती थी. बाहर आना-जाना बंद हो गया था. घर में कैद होकर रह गयी थी. इस दौरान उसका सबसे बड़ा संबल  शैलेन्द्र था. वो उस से चैट करता...फोन पर बात कर के उसका मन लगाए  रहता. कई बार छुट्टी  लेकर हैदराबाद से मुंबई उस से मिलने भी आया. 

कनु का बड़े से बड़े डॉक्टर का इलाज चल रहा था. पर कोई फायदा नहीं हो रहा था. उसके पूरे शरीर,.चेहरे तक की त्वचा की परत रुखी होका उतरती रहती. कोई मलहम दवा .फायदा नहीं कर रहा था. इसी तरह एक साल गुजर गए.और एक दिन शैलेन्द्र ने उसे प्रपोज़  कर दिया. कनु और उसके के माता-पिता भी अचंभित रह गए. कनु आईना भी देखने से घबराती थी. पर शैलेन्द्र का निश्चय पक्का था कि शादी तो कनु से ही करनी है. इसके छः महीने बाद...सारे दूसरे इलाज़ छोड़कर कनु ने नैचुरोपैथी अपनाया  और उस से उसे फायदा होने लगा. अब शैलेन्द्र की  जिद कि उसे सगाई करनी है. शादी भले ही कनु के पूरी तरह ठीक होने के बाद करे..पर सगाई  अभी करनी है. 

शैलेन्द्र तेलुगु और कनु कन्नड़...शैलेन्द्र दो भाइयों में बड़ा था उसके माता-पिता के  भी उसकी शादी को लेकर कुछ अरमान थे पर उन्होंने अपने बेटे की इच्छा को  सहर्ष स्वीकृति दे दी.  कनु ना तो अपनी सगाई में रेशमी साड़ी ही नहीं पहन पायी...ना ही कोई जेवर.  और शैलेन्द्र उसे अंगूठी भी नहीं पहना सका..क्यूंकि उस वक़्त भी उसे किसी भी मेटल  से एलर्जी थी.  शैलेन्द्र ने अपनी सगाई की फोटो मुझे भेजी थी.....कनु के नाक-नक्श बहुत सुन्दर थे..पर कई जगह से त्वचा रूखी होकर उखड़ी हुई थी. मेरे मुहँ से निकल ही गया.." she is lucky "  पर शैलेन्द्र ने तुरंत जोर देकर कहा... "No I am lucky to hv her in my life. She is a gem of a person  "                                             

एक साल बाद कनु के पूरी तरह ठीक हो जाने पर उनकी शादी हो गयी. कनु ने हैदराबाद में एक बड़ी कंपनी में नौकरी भी कर ली..और अभी तीन महीने पहले वे प्यारे से बेटे के माता-पिता बन गए हैं. 

शनिवार, 7 जुलाई 2012

हमारी केक क्वीन 'तंगम'


आप लोगों ने सब्जी काटना.. फल काटना सुना होगा और काटे भी होंगे. पर कभी किसी को किशमिश काटते सुना है ??.हमने भी नहीं सुना था, जबतक 'तंगम ' से दोस्ती नहीं हुई थी. क्रिसमस के समय 'तंगम' को बहुत सारे केक के ऑर्डर मिलते हैं और 'तंगम' केक में बाकी मेवों के साथ किशमिश भी काट कर ही डालती है तो हम सब सहेलियाँ एक महीने पहले से बारी-बारी से उसके घर जाकर मेवे काटने में उसकी मदद करते हैं. उसके पतिदेव  हम सबको उकसाते रहते हैं कि तंगम से हम इन मेवों को काटने का मेहनताना लिया करें. पर तंगम तो हमारी मेहनत का मोल चुका देगी...लेकिन  सालो भर जो इतने प्यार से हमें केक-पेस्ट्री-बिस्किट्स खिलाती है...उस प्यार का मोल हम कहाँ से चुकायेंगे?? बल्कि यही वजह है कि इतना वॉक और योगा करने के बाद भी 'वेइंग स्केल' की सूई टस से मस नहीं होती :):)

करीब छः साल पहले तंगम से मुलाक़ात हुई तो पता चला...वो बहुत बढ़िया केक बनाती है. हमने आजमाया भी और उसके मुरीद हो गए. अब तो ये हाल है कि हम सहेलियों..हमारे रिश्तेदारों...किसी को मौन्जिनीज़ ..बर्डीज़..कहीं के केक नहीं भाते. बच्चों की फरमाइश भी यही रहती है कि तंगम आंटी के ही हाथों का केक होना चाहिए. और तंगम को भी चाहे सुबह  की फ्लाईट पकडनी हो पर वो सुबह चार बजे उठकर केक बना कर बच्चों की फरमाइश पूरी कर देती है. जब उस से मिली थी यही लगा था...उसने कहीं से केक बनाने और उसकी साज-सज्जा का कोर्स किया है तभी वो इतना अच्छा केक बना पाती है. पर जब उसे करीब से जाना तो पता चला..उसने कहीं से कोई कोर्स नहीं किया है और खुद से ही नए नए प्रयोग कर इतने सुन्दर और स्वादिष्ट केक बना लेती है. 

मुझे बहुत आश्चर्य हुआ और मैने उस से विस्तार से पूछा कि उसने कब और कैसे केक बनाना शुरू किया??...और यह सब जानने के बाद से ही मेरी इच्छा थी कि ब्लॉग पर शेयर करूँ...कि उम्र के किसी भी मोड पर नई शुरुआत की जा सकती है और सफलता की ऊँचाइयों तक पहुंचा जा सकता है. तंगम जब कॉलेज में थी तो उसकी तमन्ना एयरहोस्टेस बनने की भी थी...उसने क्वालिफाई भी कर लिया था ..पर परिवार से इज़ाज़त नहीं मिली . फिर उसने सोचा कि वो एक बुटिक कम पार्लर खोलेगी..जहां  महिलाएँ...शॉपिंग भी कर सकेंगी और अपने सौन्दर्य की देखभाल भी .पर  २२ साल की कच्ची  सी उम्र में उसकी शादी  हो गयी और वो चेन्नई से मुंबई आ गयी. नया शहर... नई भाषा {आज भी तंगम हिंदी में सिर्फ सब्जी वालों से ही बात करती है और इतने धीमे से प्यार से पूछती है.."भैया, ये कैसे दिया.?.' कि सब्जी वाला सुनता ही नहीं...फिर हमें जोर से पूछकर उसकी सहायता करनी पड़ती है :):)}. साल के छः से आठ महीने उसके पति 'शिप' पर रहते हैं .(वे मर्चेंट नेवी में हैं ). ज्यादातर समय अकेले ही अपने बेटे और बेटी की देखभाल करती .पर उसे अपना सपना याद था और उसने ब्यूटीशियन  का कोर्स किया . ब्यूटी पार्लर खोलने के लिए  सारे जरूरी उपकरण ख़रीदे और घर में ही पार्लर खोल लिया. पर बच्चे छोटे थे .उनको माँ का पूरा अटेंशन चाहिए था. जब वो किसी क्लाइंट को अटेंड कर रही होती उसी वक़्त पांच वर्षीय बेटा चीखना शुरू कर देता. कुछ ही दिनों में उसे बच्चों का ख्याल कर पार्लर बंद कर देना पड़ा. 

वो बच्चों की देखभाल में पूरी तरह संलग्न थी. उन्ही दिनों उसकी एक सहेली ने अपने बेटे के बर्थडे पार्टी पर मदद करने के लिए अपने घर बुलाया . उसकी सहेली ने खुद ही केक बनाया था और उसकी आइसिंग कर रही थी. उसकी सहेली के  बच्चे भी बड़े उत्साहित थे और केक को सजाने में अपनी माँ की मदद कर रहे थे. तंगम बहुत प्रभावित हुई और सोचा वो कोशिश करे तो इस से भी अच्छा केक बना सकती है. कुछ ही दिनों बाद , उसके माता-पिता के शादी की 'पचासवीं वर्ष्गांठ'  थी. वर्षगाँठ वाले दिन तंगम के घर पर ही कुछ रिश्तेदारों की छोटी सी पार्टी थी . दस दिनों के बाद होटल में बड़ी पार्टी थी. जिसमे देश और विदेश से उसके काफी रिश्तेदार आने वाले थे. घर वाली पार्टी में तंगम ने खुद ही केक बनाने की सोची. पर उस समय उसके पास अवन भी नहीं था. उसने बाजार से स्पंज केक ख़रीदा और आइसिंग का सारा सामान भी खरीद कर लाई. देर रात तक जागकर केक को सजाया. उसके पति भी पूरे उत्साह से उसका साथ देते रहे. सारे रिश्तेदारों ने केक की बहुत तारीफ़ की .और दूसरे ही दिन पति के साथ जाकर वह अवन खरीद लाई. (अवन से सम्बंधित एक रोचक वाकया है...मैं जब पहली बार 'तंगम' के घर गयी तो सबसे पहले उसका अवन देखने की इच्छा जाहिर की...मुझे लगता था इतने बढ़िया प्रोफेशनल तरीके से केक बनाने का अवन भी कुछ अलग सा होता  होगा, पर हैरानी हुई ये देख उसके पास भी वही अवन था जो मेरे पास था.....और आम घरों में होता है...यानि कि बढ़िया केक बनाने का हुनर उसके हाथों में था..अवन में नहीं )
अब तंगम का ट्रायल एंड एरर शुरू हुआ. उसके साथ एक मजेदार बात और हुई थी. जब एंगेजमेंट के बाद उसके होने वाले पति ने फोन कर के पूछा.."तुम्हारे लिए क्या उपहार लाऊं?" 
तंगम को कुछ समझ नहीं आया. उसने किसी के घर पर चमकीले चिकने कागज़ वाली केक के सुन्दर तस्वीरों से सजी विदेशी रेसिपी बुक देखी थी. और उसी की फरमाइश कर डाली.  पतिदेव ने भी बड़ी मेहनत से छांटकर केक बनाने के सरल तरीकों वाली किताब  खरीदी और उसे भेंट की. इतने दिनों तक वो किताब बक्से के निचली तह में रखी हुई थी. अब तंगम ने उस किताब को निकाला ...और उसमे से पढ़ पढ़ कर केक बनाना शुरू किया. 

उस बड़ी पार्टी में भी इस बार तंगम ने खुद ही केक भी बनाया और उसको डेकोरेट भी किया. सबको केक का स्वाद और सज्जा बहुत पसंद आई. दस दिनों बाद ही उसके एक रिश्तेदार की बेटी की शादी थी. कैथोलिक लोगों में केक का बहुत महत्व होता है. उसकी रिश्तेदार ने लंदन से कलर और सजाने का समान मँगा कर एक प्रोफेशनल बेकर  को दिए थे. पर उस शादी में सबकी जुबान पर कुछ  ही दिनों पहले तंगम के बनाये केक की चर्चा ज्यादा थी और सबका कहना था कि  तंगम के बनाए केक का  स्वाद और सज्जा दोनों  इस प्रोफेशनल बेकर के केक से ज्यादा बढ़िया था.  इसके बाद से ही किसी भी अवसर पर रिश्तेदार...दोस्त ..पड़ोसियों के लिए केक तंगम ही बनाती. उसने कई किताबें खरीदीं...इंटरनेट से भी  हमेशा नई नई चीज़ें सीखने की कोशिश करती  रही. करीब चार साल के बाद...लोग उसपर ऑर्डर से केक बनाने के लिए जोर डालने लगे और तंगम ने केक बनाने का ऑर्डर लेना शुरू कर दिया.

अब वो इतनी सिद्धहस्त हो गयी है कि उसे जो भी तस्वीर दिखाओ..वो वैसा ही केक बना देती है. किसी की बेटी को सैंडल पसंद है तो सैंडल की आकृति...किसी सहेली को पर्स पसंद है तो..पर्स की आकृति...किसी भी चीज़ की आइसिंग बनाने में वो सक्षम है...और डेकोरेशन के उपयोग में लाई सारी चीज़ें खाई जा सकती हैं.
फेसबुक पर उसने केक की बहुत सारी तस्वीरें अपलोड कर रखी हैं.(यहाँ देखी जा सकती हैं ) उन्हें ही देख कर हैदराबाद से एक महिला ने अपनी बेटी की शादी में केक बनाने के लिए उसे निमंत्रित किया. आने जाने का प्लेन का टिकट और एक अच्छे होटल में उसके ठहरने की व्यवस्था भी की. अगर तंगम फ्री ना हो तो लोग अपनी पार्टी का डेट आगे बढ़ा देते हैं.

तंगम को कई बेकरी से उनके लिए केक बनाने का ऑफर मिला है.पर वो अपनी मर्जी से और अपनी सुविधा और अपनी शर्तों पर काम करना चाहती है इसलिए उनका ऑफर स्वीकार नहीं करती.

तंगम के विषय में कुछ और बातें बहुत ही उल्लेखनीय हैं. जब उसके बच्चे छोटे  थे तो वो अपना विशेष ख्याल नहीं रख पाती थी और उसका वजन बढ़ गया था. एक बार रास्ते में किसी ने उसे टोक दिया.."वो पहचान में नहीं आ रही है' और उसने ठान लिया उसे अपना वजन कम करना है.पर उसने ना तो जिम ज्वाइन किया ना ही..डायटिंग की. सिर्फ अपने खाने-पीने  का ख्याल रखा और वॉक किया करती. तीन साल में उसने अपना वजन पंद्रह  किलो घटा लिया. अब दस साल हो गए हैं और आज भी उसका वजन उतना ही है. अगर वो  खुद नहीं बताये तो कोई नहीं जान सकता वो कभी ओवरवेट भी थी.यही अगर डायटिंग और जिम जाकर वजन घटाया जाए तो पुनः वापस वजन बढ़ते देर नहीं लगती. आज तंगम को  देख कर कोई नहीं कह सकता  कि उसका तेइस साल का एक बेटा है. इसमें उसके  खुशमिजाज स्वभाव का भी हाथ है.

तंगम के सारे भाई-बहन..अमेरिका..कनाडा.. ऑस्ट्रेलिया में रहते हैं. लिहाजा उसकी माँ तंगम के पास ही रहती हैं. पति भी शिप पर रहते हैं .बेटे ने भी मर्चेंट नेवी ही ज्वाइन कर लिया है. अकेली ही तंगम अपनी 'बुजुर्ग माँ' की देखभाल करती है .डॉक्टर, ब्लड टेस्ट..हॉस्पिटल का चक्कर चलता ही रहता है,अकेले ही सब संभालती है और वो कहती है...बहन-भाई ने अपने पास ले जाने की कोशिश की पर अब माँ का वहाँ कैसे मन लगेगा...इसलिए माँ  तो मेरे पास ही रहेंगी 

तंगम जैसी महिलाएँ कोई शिकायत नहीं करती...कैसी भी परिस्थिति सामने हो..उसे अपने अनुकूल बनाने की कोशिश करती हैं..और उसी में अपनी राह तलाश कर शिखर तक पहुँचने का प्रयास करती हैं.  ऐसी महिलाएँ ही समाज में परिवर्तन लाने की काबिलियत रखती हैं . उन्हें अपने अधिकार का भी पता होता है और वे अपने कर्तव्य निभाने से भी नहीं चूकतीं.

तंगम के कलात्मक केक के कुछ और नमूने 














फिल्म The Wife और महिला लेखन पर बंदिश की कोशिशें

यह संयोग है कि मैंने कल फ़िल्म " The Wife " देखी और उसके बाद ही स्त्री दर्पण पर कार्यक्रम की रेकॉर्डिंग सुनी ,जिसमें सुधा अरोड़ा, मध...