children लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
children लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

गुरुवार, 7 अक्टूबर 2010

पैरेंट्स की प्यार भरी सुरक्षा किसी पेड़ जैसी हो या शामियाने जैसी ??

यह विषय काफी समय  पहले से ज़ेहन में हलचल मचा रहा था...पिछली पोस्ट में जब  बच्चों  के साथ प्यार भरे व्यवहार पर चर्चा हुई तो लगा यही उचित समय है, इस विषय को छेड़ने का .पर मैं खुद भी कन्फ्यूज्ड  सी हूँ....कि हल आखिर क्या है?

बच्चों को हर माता-पिता अपनी सीमा से बढ़कर सुख-सुविधाएँ देने का प्रयत्न करते हैं. उनकी राहों से  कांटे चुन लेने की कोशिश करते हैं. अपनी शक्ति भर प्रयास करते हैं कि उनके जीवन से दुख का साया भी दूर रहें. और वे उत्फुल्लता के साथ अपना जीवन व्यतीत करें.

पर हाल में घटी  कुछ घटनाओं ने यह सब सोचने पर मजबूर कर दिया कि यह कहाँ  तक सही है??
मेरे बेटे का कॉलेज खुला और  दो दिन बाद ही इंजीनियरिंग फाइनल ईअर के एक स्टुडेंट ने अपनी बिल्डिंग के टेरेस से कूदकर आत्महत्या कर ली. वह रात भर जागकर एक प्रेजेंटेशन तैयार कर रहा था , सुबह चार बजे तक मोबाइल के जरिये अपने दोस्तों के संपर्क में था. और सुबह छः बजे कॉलेज जाने से पहले...उगते सूरज के साथ ही अपने जीवन को अलविदा कह दिया.

वह लड़का, अकेलेपन का शिकार नहीं था..कई दोस्त थे उसके. सुना, माता-पिता भी इतने सख्त नहीं थे. सिर्फ एक अच्छे प्रेजेंटेशन की चिंता, अपनी इहलीला समाप्त करने की वजह बन गयी??. इतना अहम आ गया है बच्चों में...कि जरा सी असफलता की आहट भी ऐसे भयानक अंजाम तक पहुंचा देती है. कितना असुरक्षित महसूस करने लगे हैं वे कि अगर टॉप पर ना पहुंचे या अपने तय किए स्टैण्डर्ड से नीचे रह गए तो जीना ही व्यर्थ हो उठता है.

एक जगह कुछ ऐसी ही घटना के बारे में पढ़ा था, जो हमारे  अज़ीज़ पूर्व राष्ट्रपति, ए.पी.जे. कलाम जी के साथ हुई थी. उनके प्रदर्शन से उनके प्रोफ़ेसर खुश नहीं थे, और उन्हें चेतावनी दे दी थी कि "अगर दो दिनों के अंदर वे  अच्छा प्रेजेंटेशन तैयार नहीं करते तो वे अपनी स्कॉलरशिप खो बैठेंगे." दो दिन बिना पलक झपकाए , वे प्रेजेंटेशन तैयार करते  रहें. तीसरे दिन सुबह ,प्रोफ़ेसर उनके लैब में आए और उनका शानदार काम देख उन्हें गले से लगा लिया.

आखिर वो क्या चीज़ थी जो कलाम जी से रात-दिन मेहनत करवाती रही और इस बच्चे ने बदले में अपना जीवन ही त्याग  दिया . जबकि अगर इसका एक साल भी खराब हो जाता  तो माता-पिता की  इतनी हैसियत थी कि वे उसे पढ़ा सकें.

पर आज के युवाओं ,बच्चों में संघर्ष करने की क्षमता घटती जा रही है और कहीं इसके कसूरवार हम तो नहीं. हम सबकुछ उनके लिए इतना सुगम बना देते हैं. स्कूल में किसी टीचर ने डांट दिया... (हाथ लगाने की तो अब सोच भी नहीं सकता) पैरेंट्स लड़ने पहुँच जाते हैं. अच्छे नंबर नहीं आए, डोनेशन देकर मनपसंद स्कूल-कॉलेज में एडमिशन दिलवा देते हैं. दुनिया की सारी सुख-सुविधाएं उनपर न्योछावर कर देते हैं. बच्चे इतने आदी हो जाते हैं, इन सारी सुविधाओं के कि एक बार भी अपने दम पर कुछ साबित करना हुआ और वे बिखर जाते हैं. ये  बच्चे इतनी कम उम्र के होते हैं कि जीवन का मोल नहीं समझ पाते.क्या इसलिए कि सबकुछ आसानी से मिल जाता है ?? पर पैरेंट्स भी क्या करें.....जानबूझकर तो बच्चों को सुख-सुविधा से वंचित नहीं रख सकते.

ये आत्महत्या की प्रवृत्ति तो इतनी बढती जा रही है कि माता-पिता की साँसे ही अटकी होती हैं. इतनी उम्र हो  जाने के बाद भी मैने  आत्महत्या की खबर सिर्फ अखबारों में ही पढ़ी थी. और वहीँ मेरे बेटे आठ  साल की उम्र से अपने आस-पास , परिचित चेहरों के आत्महत्या  की खबरे सुन चुके हैं. एक नवीं क्लास का लड़का..घर से स्कूल को निकला, पता नहीं माँ ने डांटा था पिता ने या क्या...हमारी दायीं तरफ की  बिल्डिंग के टेरेस से  जाकर कूद गया. बाईं तरफ  की बिल्डिंग का लड़का तो मेरे बच्चों के साथ खेलता था.  उसके पिता गल्फ में थे. यह अपनी माँ के साथ यहाँ रहता था. पिता ने वहाँ दूसरी शादी कर ली. पैसे भेजने बंद कर दिए. लड़के ने दसवीं के बोर्ड के इम्तहान दिए थे.मकान मालिक ने आकर धमकी दी, "घर खाली करो" और दूसरे  दिन इस लड़के ने भी टेरेस ही चुनी, उस जिल्लत से मुक्ति पाने के लिए. आस-पास की बिल्डिंग के बच्चे रोज शाम उसे याद करके रोते थे. मेरे बच्चे भी कहते, "वो पिज्जा  डिलीवरी बॉय का काम कर  सकता था..मैकडोनाल्ड ,CCD कहीं भी काम मिल जाता उसे....उसने ऐसा क्यूँ किया?? मैने भी उन्हें अपनी शक्ति भर समझाया कि यह बहुत ही कायरतापूर्ण कदम था.
पर खुद को नहीं समझा पायी. माना कि वह 16 साल का अबोध किशोर था. पर कितने ही किशोरों ने उसी उम्र से जिम्मेवारी संभाली है. पर आजकल युवाओं में संघर्ष करने का माद्दा ही नहीं रह गया है. सबसे आसान तरीका यही लगने लगा है. पहले बच्चे  मीलों दूर साइकिल चला कर जाते थे, रुखी-सूखी खाकर , दो कपड़ों में गुजारा करते थे .पर मानसिक अस्वस्थता से दूर होते थे. आज वे शारीरिक श्रम  में अपनी उर्जा नहीं खर्च  कर पाते और यह संचित उर्जा उनमे उग्रता को जन्म देती है. कोई फैसला शांत-चित्त मन से वे  कर ही नहीं पाते.
और ऐसे में सबसे जरूरी लगने लगता है "खेल-कूद की अनिवार्यता " . खेल  के मैदान में वे हारते भी हैं, साथी  खिलाड़ियों की डांट भी सुनते हैं. कोच कभी कभी हाथ भी चला देते हैं. मैच हारने पर दर्शकों  की हूटिंग से अपमान भी झेलना पड़ता है. यह सब उन्हें आनेवाले  जीवन की कठिनाइयों का सामना करने के लिए तैयार  कर सकता है.  पर कोई भी अनभिज्ञ  नहीं कि खेल-कूद को हमारे देश में कितना महत्त्व दिया जाता है. जिन स्कूलों में खेल की टीम बनायी भी जाती है उसमे अंडर 10, अंडर 12, अंडर 14 के वर्ग होते हैं . दो क्लास के बच्चे एक वर्ग के अंतर्गत आ जाते हैं. हर क्लास में आठ से दस डिविजन.एक डिविज़न में साठ बच्चे . यानि हज़ार -बारह सौ बच्चों के बीच खेलने का मौका मिलता है पच्चीस  बच्चों को, जिनमे ग्यारह ही नियमित रूप से खेल पाते हैं. बाकी बच्चे कहाँ से लें ये अनुभव? अगर गंभीरता से बच्चों के स्वस्थ मानसिक विकास के लिए कुछ कदम उठाने हैं तो मेरी समझ  से खेल-कूद को पढ़ाई से भी ज्यादा महत्त्व देना चाहिए.

आजकल रिअलिटी शोज़ में जिस तरह बच्चों को जज अपने कमेन्ट से एक सीमा तक अपमानित करते हैं, उस पर काफी लोगों ने अपना रोष जताया  हैं. मुझे एक बड़े पत्रकार की प्रतिक्रिया याद आती है. जिन्होंने कहा था, "आगे की ज़िन्दगी में पता नही कितनी बार अपमानित होना पड़ेगा, कितनी जिल्लतें उठानी पड़ेंगी, ये सारी नकारात्मक प्रतिक्रियाएँ उन्हें आने वाली ज़िन्दगी के लिए तैयार कर रही है."  हालांकि ,यह भी कितना सही है...नहीं कहा जा सकता क्यूंकि डांस शो में भाग लेने वाली  एक १४ वर्षीया लड़की, ऐसे कमेंट्स सुन...कोमा में चली गयी  .पर बात फिर वही है कि अब तक उस लड़की ने अपने लिए कहीं कुछ नकारात्मक सुना ही नहीं होगा.

मैने पहले भी इसी "रुचिका-राठौर  केस" विषय पर एक पोस्ट लिखी थी, खामोश और पनीली आँखों की अनसुनी पुकार लेकिन तब इस समस्या को दूसरी दृष्टि से देखा था कि आस-पास वालों को पता भी नहीं चलता , बच्चे इतने डिप्रेशन से गुजर रहें हैं. वे इसे नज़रंदाज़ कर देते हैं या सीरियसली नहीं लेते. उन्हें बच्चों का ख़ास ख्याल रखना चाहिए. पर आज दूसरी तरह से इस समस्या को देखने की कोशिश की है कि जब बच्चे , डिप्रेशन से लोहा ले, हंस-खेल रहें हैं, स्कूल-कॉलेज जा रहें हैं, दोस्त बना रहें हैं....फिर ऐसे कदम उठाने के विचार को भी क्यूँ नहीं त्याग पाते. और पैरेंट्स ऐसे कदम से दूर रखने के लिए क्या करें?

आजकल पैरेंट्स का प्यार और देखभाल एक शामियाने जैसा हो गया है, जो बच्चों को जीवन की आंधी,तूफ़ान, बारिश, धूप से महफूज़ रखता है जबकि उनका साया एक पेड़ की तरह होना चाहिए, जो प्यार,ममता की शीतल छाया भी दे और उसके पत्तों से छन, ज़िन्दगी की धूप, बारिश ,आंधी भी उन्हें प्रभावित करती रहें तभी वे जीवन की कठिनाइयों से लड़ने को तैयार हो पाएंगे.


मंगलवार, 16 फ़रवरी 2010

वह सिलसिला भी अब ख़त्म हुआ...


कुछ दिनों पहले एक सफ़र पूरा हुआ जो बारह साल पहले शुरू हुआ था.वो था बच्चों के स्कूल में 'स्पोर्ट्स डे' में उपस्थिति का सिलसिला.मेरे छोटे बेटे का स्कूल में यह अंतिम 'खेल दिवस' था और मैं प्रोग्राम देखते हुए यादों के समंदर में डूब उतरा रही थी.

ठीक बारह साल पहले बड़े बेटे किंजल्क ने स्कूल से आकर कहा था,मेरी स्कूल डायरी देख लेना,टीचर ने कुछ लिखा है.और उसमे लिखा था,"आपके बेटे ने १०० मीटर की रेस में गोल्ड मेडल जीता है' कल स्पोर्ट्स डे के दिन उसे मेडल मिलेगा.".इनके स्कूल में सारी प्रतियोगिता पहले ही हो जाती है.'स्पोर्ट्स डे' के दिन सिर्फ रंगारंग कार्यक्रम के बीच पुरस्कार वितरण होता है.मैंने जब खुश होकर उस से पूछा,'तुम रेस में फर्स्ट आए?' तो अपने खेल में मगन वह लापरवाही से बोला,'वो तो मैं कई बार फर्स्ट आया'...वह अभी पहली कक्षा में था और उसे अभी फर्स्ट राउंड,सेकेण्ड राउंड,सेमी फाइनल ,फाइनल की समझ नहीं थी.स्कूल से कार्ड पहले ही आ चुका था और मुख्य अतिथि के रूप में 'एकनाथ सोलकर' का नाम देखकर मैं वैसे ही रोमांचित थी अब यह जान कि उनके हाथों ही मेरे बेटे को मेडल भी मिलेगा मेरी ख़ुशी कई गुना बढ गयी.मेरे पापा और भाई भी सुनकर बहुत खुश हुए,पापा सोलकर के जबरदस्त फैन थे.उन्हें भी शायद इसके गोल्ड मेडल मिलने से ज्यादा इसकी ख़ुशी थी कि वो सोलकर के हाथों मिलेगी.

उसके बाद ये सफ़र चलता रहा..दो साल बाद छोटा बेटा कनिष्क भी शामिल हो गया.उसका भी पहला परफौरमेंस आँखों के सामने आ गया. मुझे उसे प्रोग्राम के बाद कलेक्ट करने में थोड़ी देर हो गयी थी.और उसके लाल लाल फूले फूले गालों पर मोटी मोटी बूँदें गिर रही थीं पर वह एक बडा सा लड्डू खाने में भी मगन था.रोते हुए भी स्कूल से मिले लड्डू खाना उसने एक सेकेण्ड के लिए नहीं छोड़ा था.

इनलोगों को कभी मेडल्स मिलते,कभी नहीं मिलते.जब नहीं मिलते तो मेरा काम ज्यादा बढ़ जाता.मुझे सारी कहानी सुननी पड़ती,'वो तो मेरा पैर फिसल गया...जूता ठीक नहीं था...पीछे वाले लड़के ने धक्का मार दिया...टीचर पक्षपात करती है, वगैरह वगैरह.मैं कहती,'कोई बात नहीं...भाग लेना ही बस मत्वपूर्ण है,मेडल मिले ना इसकी फ़िक्र नहीं करनी चाहिए '...बाद में बच्चे हंसने भी लगे थे.'ममी ...डायलॉग चेंज भी तो करो"

एक बार सातवीं कक्षा में किंजल्क ने आकर बताया,कि उसने 'लॉंग जम्प' में महाराष्ट्र का अंडर फोर्टीन का रेकोर्ड तोडा है,कई जगह उस से हस्ताक्षर कराये गए.कोई सेना का ऑफिसर भी उपस्थित था,(किस हैसियत से ,ये नहीं पता)...पर किंजल्क उनकी यूनिफ़ॉर्म का बखान किये जा रहा था.वह कुछ ज्यादा ही प्रभावित था क्यूंकि उसे 'एयरफोर्स पायलट' बनने की तमन्ना थी .शायद उन्हें देखकर ही उसे ज्वाइन करने कि इच्छा जाग्रत हुई.घर से NDA ज्वाइन करने की इजाज़त नहीं मिली,वो अलग किस्सा है.फिर कई साल बाद जब वह ग्यारहवीं में था और अपने कोचिंग सेंटर के नीचे दोस्तों के साथ खड़ा था.थोड़ी दूर पर उसे यूनिफॉर्म में सेना के एक अफसर दिख गए.उसकी नज़र बार बार उनकी तरफ उठ जाती.थोड़ी देर बाद उन्होंने उसे पास .बुलाया.किंजल्क थोड़ा डर गया,शायद बार बार उन्हें देख रहा था.इसीलिए उन्होंने बुलाया है.पर उन्होंने बुला कर पूछा,'तुम तो खुश हो गए होगे..तुम्हारे बोर्ड के रिजल्ट में २ परसेंट और जुड़ गए होंगे"
'सॉरी सर...शायद आप मुझे कोई और समझ रहें हैं,हम कभी नहीं मिले हैं.'
'तुम SVIS के स्टूडेंट हो ना.जिसने 'लॉंग जम्प' में महाराष्ट्र का अंडर फोर्टीन का रेकॉर्ड ब्रेक किया था".
अब किंजल्क स्तंभित, 'आपको कैसे पता?'
और उन्होंने कहा,' You are carrying the same face my boy ,You hvnt changed at all.' और उन्होंने बताया कि अभी तक वह रेकॉर्ड उसी के नाम है.हमें तो पता भी नहीं था कि उस सर्टिफिकेट का कुछ फायदा उठाया जा सकता है,जरूरत भी नहीं पड़ी..उसे अच्छे नंबर मिले और मनपसंद कॉलेज में एडमिशन मिल गया.
और उन्होंने यह भी बताया कि चेहरे से पहले उन्होंने उसकी चाल नोटिस कि.उनका कहना था कि ये पैर उठा कर चलता है जबकि ज्यादातर बच्चे पैर घसीट कर.(मैंने तो आजतक नोटिस नहीं किया)..

इन खुशनुमा लमहों के साथ कई दुखद पल भी आए.किंजल्क दसवीं में था और उसका अंतिम 'स्पोर्ट्स डे' था.वह बहुत खुश था.उसके सारे competitor स्कूल से निकल गए थे.करीब करीब सारे रेस के फाइनल में था वह और उसे कई सारे मेडल जीतने की पूरी उम्मीद थी लेकिन फाइनल्स के एक दिन पहले वह स्कूल में ही गिर गया और घुटने पे ११ स्टिचेस लगे.
वो 'खेल दिवस' मेरे लिए सबसे बडा दुविधा का दिन था.प्रोग्राम तो मैं कई बार देख चुकी थी पर छोटे बेटे को कुछ मेडल्स मिलने वाले थे.और मैंने देखा है, स्टेज से उतरते वक़्त उनकी आँखें भीड़ में मुझे जरूर ढूँढती हैं.कभी वे मुझे देख पाते हैं,कभी नहीं.पर वह एक अहसास बड़ा होता है कि आपके इस ख़ास क्षण में कोई अपना आपके साथ है,आपको देख रहा है.
किंजल्क ने ही यह मुश्किल आसान कर दी.मुझे जबरदस्ती जाने के लिए बोला.और मैं देख रही थी,मेरे किशोर बेटे में सारे पुरुषोचित गुण आ गए हैं.उसके मन के गहरे दुःख का अहसास था मुझे पर वह निर्विकार भाव से चेहरे पर मुस्कान सहेजे सोफे पे लेता हेडफोन लगाए गाने सुन रहा था.

और आज कनिष्क का स्कूल का अंतिम 'स्पोर्ट्स डे' था और उसने इसका भरपूर फायदा उठाने की सोची थी.कई सारे प्रोग्राम में हिस्सा लिया था.सबसे पहले उसे सफ़ेद कमीज़ और काली पैंट में डिसिप्लिन मिनिस्टर का बैज लगाये मार्च पास्ट करते देखा,थोड़ी देर बाद ही वह सफ़ेद बनियान और काले शौर्ट्स में 'ह्युमन पिरामिड' बना रहा था. जब आप अपने बच्चे के ऊपर तीन तीन लडको को खड़े देखते हैं तो एक पल को सांस रुक जाती है...फिर तालियों की गड़गडाहट से ही ध्यान टूटता है.थोड़ी देर बाद देखा वो चमकीले लाल शर्ट में गले में स्कार्फ लगाए माइकेल जैक्सन के गाने पर डांस कर रहा था.इस अजीबोगरीब गेटअप में देख एक पल को विश्वास करना मुश्किल हो रहा था,ये अपना ही बेटा है.और इसके बाद उसे सफ़ेद कुरता पैजामा पहने साफा बांधे लेजियम बजाते देखा.अंत में अपनी फुटबाल टीम के साथ जर्सी में दौड़ते हुए पूरे ग्राउंड का चक्कर लगा रहा था..और वही मेरे लिए उस स्कूल का अंतिम प्रोग्राम था.

स्कूल में 'स्पोर्ट्स डे' का दिन बच्चे सबसे ज्यादा एन्जॉय करते हैं क्यूंकि उस दिन कोई अनुशासन नहीं होता.पूरी छूट होती है टीचर्स दूसरे काम में बिजी होती हैं और छोटे छोटे ग्रुप में बच्चे रंग बिरंगे कपड़ों में चहकते नज़र आते हैं.कनिष्क ने भी प्रोग्राम ख़त्म होने के बाद थोड़ी देर और स्कूल में रुकने की इजाज़त मांगी और हैरान हो गया,जब मैंने एकदम से हाँ कह दी.वह अभी इस अहसास से बेखबर था कि बेफिक्री भरे उसके ये दिन फिर कभी वापस नहीं आने वाले.

एक घटने का जिक्र करूँ तो बच्चे बहुत नाराज़ हो जायेंगे और घटना इतनी मजेदार है कि जिक्र ना कैसे करूँ?...कनिष्क अपने स्कूल के लेजियम ग्रुप में तीन साल से है और इनका स्कूल मुंबई में फर्स्ट आया था.इसलिए कभी भी किसी नेता का आगमान हो,शिक्षा मंत्री या कोई भी विशिष्ट व्यक्ति तो इनके स्कूल को बुलाहट आ जाती है.नेतागण तो अपनी ए.सी. कार में आते हैं और ये बच्चे कड़ी धूप में घंटो लेजियम लिए सड़क के किनारे उनका इंतज़ार करते रहते हैं.खैर इसी वजह से कनिष्क को हर बार सफ़ेद कुरते पैजामे की जरूरत पड़ती थी..मैंने पतिदेव का एक कुरता पायजामा काँट-छाँट कर उसके नाप का कर दिया.हर प्रोग्राम के बाद धुलवा कर रख देती.इस बार कनिष्क के स्पोर्ट्स डे के एक दिन पहले किंजल्क के ड्रामा का शो था.उसे भी सफ़ेद कुरता पायजामा चाहिए था,मैंने निकाल कर दे दिया.जब रात में कनिष्क ने अपने सारे कॉस्ट्यूम्स रखने शुरू किये और सफ़ेद कुरता पायजामा माँगा तो मेरी हालत का अंदाज़ा लगाया जा सकता है.सुबह सात बजे उसे स्कूल जाना था और किंजल्क शो ख़त्म करके बारह के पहले घर नहीं आनेवाला था.उन दिनों हमारी बिल्डिंग में 'पानी बचाओ मुहिम' भी चल रही थी' और रात के 11 बजे पानी बंद हो जाता था...लिहाजा वाशिंग मशीन में धोकर सुखाना भी संभव नहीं था..मैंने कनिष्क को बिना कुछ बताये किंजल्क को फोन किया...और उसने कहा 'मैंने ड्रामे में पहना तो है...पर ज्यादा गन्दा नहीं हुआ...उसे प्रेस करके वापस वो दूसरे दिन पहन सकता है'...कनिष्क ने देखा तो बहुत नाक भौं सिकोड़ा और बोला 'तुमने 'सचिन तेंदुलकर' वाली पोस्ट लिखी ना...कि उनके पास एक ही सफ़ेद शर्ट पैंट थी...इसीलिए हमारे साथ भी ऐसा ही हुआ.'

बुधवार, 27 जनवरी 2010

निर्मल साफ़ पानी सा बच्चों का ये मन...

अक्सर कई ब्लोग्स पर देखा है और मुंबई ब्लॉगर्स मीट में एक साथी ब्लॉगर ने भी बताया कि वे अक्सर इमेल में आये अच्छे विचारों या बोध कथाओं या चुटकुलों का हिंदी रूपांतरण कर अपने ब्लॉग पर पोस्ट कर देते हैं. मुझे भी एक ख़याल आया पर यहाँ स्थिति थोड़ी सी अलग थी.. एक घटना हुई और करीब साल भर बाद ,ठीक उस से मिलता जुलता एक मेल मेरे पास आया.और देख सुखद आश्चर्य हुआ...कहने को देश,भाषा संस्कृति सब अलग हैं...पर पूरे विश्व में मनुष्य की संवेदनाएं एक जैसी ही हैं.पहले घटना का जिक्र करती हूँ फिर इमेल का. कुछ साल पहले की घटना है.मेरे छोटे बेटे कनिष्क के स्कूल में फुटबाल टूर्नामेंट्स शुरू हो गए थे.पर इस बार मुझे थोड़ी राहत थी क्यूंकि पास में ही रहने वाली मेरी सहेली का बेटा भी फ़ुटबाल टीम में शामिल हो गया था.और हमने तय किया कि मैच ख़त्म होने के बाद ये दोनों बच्चे एक साथ ऑटो से आ सकते हैं.वरना मुझे ही लेने जाना पड़ता था.हमने आपस में बात करके दोनों को ५०-५० रुपये दे दिए थे.ताकि मन हो तो कुछ खा लेँ.वैसे हम टिफिन तैयार करके देते थे.पर घर का बना, कब भाता है,बच्चों को. दिन में ३ बजे के करीब इनलोगों ने फोन किया कि हम मैच खेल कर स्कूल पहुँच गए हैं और अब ऑटो से घर आ रहें हैं.हमने जल्दी जल्दी खाना गर्म किया कि बच्चे भूखें होंगे.देर हो रही थी,पर यही सोचा कि शायद ऑटो नहीं मिल रहा होगा. बेटे ने घर में कदम रखा और जब मैंने कहा जल्दी से नहा कर कपड़े बदलो और खाना खा लो तो उसने बोला,'मैं तो अभी अभी CCD (Coffee Cafe Day ) में खा कर आ रहा हूँ". CCD मेरे घर से चार कदम की दूरी पर है और वहाँ से चार कदम पर मेरी सहेली का घर.मैंने आश्चर्य से पूछा,'यहाँ आ कर खाया तुमलोगों ने??"...अब कनिष्क चुप. दरअसल पहली बार अकेले आने का मौका मिला.पास में पैसे भी थे.और मैच ख़तम होते ही कोच ने स्कूल बस में बिठा दिया.इन्हें पैसे खर्च करने का मौका ही नहीं मिला. जाहिर है मुझे गुस्सा आना ही था और उसे जम कर डांट पड़ी.तभी मेरी सहेली का भी फ़ोन आया,'सुना रश्मि ,क्या किया इन दोनों ने?"..थोड़ी देर हम फ़ोन पर ही इनकी शैतानी का जिक्र करते रहें फिर फ़ोन रख कर अपने अपने बेटे की तरफ मुखातिब हो गए,डांटने को. थोड़ी देर बाद जब वह फ्रेश हो कर आया तब मैंने पूछा,'तुमलोगों ने CCD में खाया क्या?" क्यूंकि वहाँ तो एक कॉफ़ी ही ६५ रुपये की मिलती है.और इनके पास ज्यादा पैसे तो थे नहीं.धूल धूसरित दोनों को CCD वालों ने अन्दर ही कैसे आने दिया ,यही आश्चर्य था.पर ऐसी जगहों पर आपने टूटी चप्पल या फटे कपड़े पहने हों कोई फर्क नहीं पड़ता अगर आपको अच्छी अंग्रेजी आती हो.कनिष्क ने बताया २० रुपये ऑटो में देने के बाद इनके पास ८० रुपये बचे थे.ये लोग 'मेन्यु कार्ड' गौर से पढ़ रहें थे और कुछ इनकी जेब के लायक मिल ही नहीं रहा था.तब एक वेटर ने पास आकर पूछा,'आपलोगों का बजट क्या है?' इनके बताने पर उसने सलाह दी या तो ४० रुपये की पेस्ट्री ले लो या ३५ रुपये का सैंडविच.मैंने पूछा,'हम्म तो तुमलोगों ने पेस्ट्री ली होगी.'क्यूंकि सैंडविच तो ये दोनों घर में भी खाना पसंद नहीं करते.कनिष्क ने बताया ,'नहीं हम लोगों ने सैंडविच लिया. क्यूंकि फिर वेटर को टिप देने के पैसे कहाँ से बचते और उसने हमारी इतनी मदद की थी.इसलिए दस रुपये हमने टिप में दे दिए" इमेल में अमरीका के एक 8 साल के बच्चे का जिक्र था,उसने अपने पिग्गी बैंक से सारे चेंज ले जाकर काउंटर पे रखे.वेटर ने भी उसकी मदद की गिनने में.उसने आइक्रीम कोन का दाम पूछा.वेटर ने बोला.इतने में आ जायेगा.फिर उसने आइसक्रीम कप का दाम पूछा.उसका मूल्य थोड़ा कम था.उसने आइसक्रीम कप ऑर्डर किया.वेटर को थोड़ा आश्चर्य हुआ.फिर भी उसने कप ले जाकर उसे दिया.उस बच्चे ने आइसक्रीम खाया और जाने लगा तो बाकी चेंज टेबल पर टिप के रूप में छोड़ कर चला गया. दुनिया के किसी कोने में हो सारे बच्चों के दिल यकसाँ होते हैं.धीरे धीरे वक़्त की धूप उन्हें मजहब,देश,रंग की लकीरें खींचना सीखा देती है.और बंद कर देती है, उन दिलों को अलग कटघरों में. निर्मल साफ़ पानी सा होता है,इनका मन ...और इनमे तरह तरह के विचारों को धोकर इसे कितना प्रदूषित कर देते हैं हम. कहीं पढ़ा एक शेर याद आ रहा है, "बच्चो के छोटे हाथो को चांद सितारे छूने दो चार किताबे पढ़ लिख कर ये भी , हम जैसे हो जायेंगे"

फिल्म The Wife और महिला लेखन पर बंदिश की कोशिशें

यह संयोग है कि मैंने कल फ़िल्म " The Wife " देखी और उसके बाद ही स्त्री दर्पण पर कार्यक्रम की रेकॉर्डिंग सुनी ,जिसमें सुधा अरोड़ा, मध...