कुछ दिनों पहले एक सफ़र पूरा हुआ जो बारह साल पहले शुरू हुआ था.वो था बच्चों के स्कूल में 'स्पोर्ट्स डे' में उपस्थिति का सिलसिला.मेरे छोटे बेटे का स्कूल में यह अंतिम 'खेल दिवस' था और मैं प्रोग्राम देखते हुए यादों के समंदर में डूब उतरा रही थी.
ठीक बारह साल पहले बड़े बेटे किंजल्क ने स्कूल से आकर कहा था,मेरी स्कूल डायरी देख लेना,टीचर ने कुछ लिखा है.और उसमे लिखा था,"आपके बेटे ने १०० मीटर की रेस में गोल्ड मेडल जीता है' कल स्पोर्ट्स डे के दिन उसे मेडल मिलेगा.".इनके स्कूल में सारी प्रतियोगिता पहले ही हो जाती है.'स्पोर्ट्स डे' के दिन सिर्फ रंगारंग कार्यक्रम के बीच पुरस्कार वितरण होता है.मैंने जब खुश होकर उस से पूछा,'तुम रेस में फर्स्ट आए?' तो अपने खेल में मगन वह लापरवाही से बोला,'वो तो मैं कई बार फर्स्ट आया'...वह अभी पहली कक्षा में था और उसे अभी फर्स्ट राउंड,सेकेण्ड राउंड,सेमी फाइनल ,फाइनल की समझ नहीं थी.स्कूल से कार्ड पहले ही आ चुका था और मुख्य अतिथि के रूप में 'एकनाथ सोलकर' का नाम देखकर मैं वैसे ही रोमांचित थी अब यह जान कि उनके हाथों ही मेरे बेटे को मेडल भी मिलेगा मेरी ख़ुशी कई गुना बढ गयी.मेरे पापा और भाई भी सुनकर बहुत खुश हुए,पापा सोलकर के जबरदस्त फैन थे.उन्हें भी शायद इसके गोल्ड मेडल मिलने से ज्यादा इसकी ख़ुशी थी कि वो सोलकर के हाथों मिलेगी.
उसके बाद ये सफ़र चलता रहा..दो साल बाद छोटा बेटा कनिष्क भी शामिल हो गया.उसका भी पहला परफौरमेंस आँखों के सामने आ गया. मुझे उसे प्रोग्राम के बाद कलेक्ट करने में थोड़ी देर हो गयी थी.और उसके लाल लाल फूले फूले गालों पर मोटी मोटी बूँदें गिर रही थीं पर वह एक बडा सा लड्डू खाने में भी मगन था.रोते हुए भी स्कूल से मिले लड्डू खाना उसने एक सेकेण्ड के लिए नहीं छोड़ा था.
इनलोगों को कभी मेडल्स मिलते,कभी नहीं मिलते.जब नहीं मिलते तो मेरा काम ज्यादा बढ़ जाता.मुझे सारी कहानी सुननी पड़ती,'वो तो मेरा पैर फिसल गया...जूता ठीक नहीं था...पीछे वाले लड़के ने धक्का मार दिया...टीचर पक्षपात करती है, वगैरह वगैरह.मैं कहती,'कोई बात नहीं...भाग लेना ही बस मत्वपूर्ण है,मेडल मिले ना इसकी फ़िक्र नहीं करनी चाहिए '...बाद में बच्चे हंसने भी लगे थे.'ममी ...डायलॉग चेंज भी तो करो"
एक बार सातवीं कक्षा में किंजल्क ने आकर बताया,कि उसने 'लॉंग जम्प' में महाराष्ट्र का अंडर फोर्टीन का रेकोर्ड तोडा है,कई जगह उस से हस्ताक्षर कराये गए.कोई सेना का ऑफिसर भी उपस्थित था,(किस हैसियत से ,ये नहीं पता)...पर किंजल्क उनकी यूनिफ़ॉर्म का बखान किये जा रहा था.वह कुछ ज्यादा ही प्रभावित था क्यूंकि उसे 'एयरफोर्स पायलट' बनने की तमन्ना थी .शायद उन्हें देखकर ही उसे ज्वाइन करने कि इच्छा जाग्रत हुई.घर से NDA ज्वाइन करने की इजाज़त नहीं मिली,वो अलग किस्सा है.फिर कई साल बाद जब वह ग्यारहवीं में था और अपने कोचिंग सेंटर के नीचे दोस्तों के साथ खड़ा था.थोड़ी दूर पर उसे यूनिफॉर्म में सेना के एक अफसर दिख गए.उसकी नज़र बार बार उनकी तरफ उठ जाती.थोड़ी देर बाद उन्होंने उसे पास .बुलाया.किंजल्क थोड़ा डर गया,शायद बार बार उन्हें देख रहा था.इसीलिए उन्होंने बुलाया है.पर उन्होंने बुला कर पूछा,'तुम तो खुश हो गए होगे..तुम्हारे बोर्ड के रिजल्ट में २ परसेंट और जुड़ गए होंगे"
'सॉरी सर...शायद आप मुझे कोई और समझ रहें हैं,हम कभी नहीं मिले हैं.'
'तुम SVIS के स्टूडेंट हो ना.जिसने 'लॉंग जम्प' में महाराष्ट्र का अंडर फोर्टीन का रेकॉर्ड ब्रेक किया था".
अब किंजल्क स्तंभित, 'आपको कैसे पता?'
और उन्होंने कहा,' You are carrying the same face my boy ,You hvnt changed at all.' और उन्होंने बताया कि अभी तक वह रेकॉर्ड उसी के नाम है.हमें तो पता भी नहीं था कि उस सर्टिफिकेट का कुछ फायदा उठाया जा सकता है,जरूरत भी नहीं पड़ी..उसे अच्छे नंबर मिले और मनपसंद कॉलेज में एडमिशन मिल गया.
और उन्होंने यह भी बताया कि चेहरे से पहले उन्होंने उसकी चाल नोटिस कि.उनका कहना था कि ये पैर उठा कर चलता है जबकि ज्यादातर बच्चे पैर घसीट कर.(मैंने तो आजतक नोटिस नहीं किया)..
इन खुशनुमा लमहों के साथ कई दुखद पल भी आए.किंजल्क दसवीं में था और उसका अंतिम 'स्पोर्ट्स डे' था.वह बहुत खुश था.उसके सारे competitor स्कूल से निकल गए थे.करीब करीब सारे रेस के फाइनल में था वह और उसे कई सारे मेडल जीतने की पूरी उम्मीद थी लेकिन फाइनल्स के एक दिन पहले वह स्कूल में ही गिर गया और घुटने पे ११ स्टिचेस लगे.
वो 'खेल दिवस' मेरे लिए सबसे बडा दुविधा का दिन था.प्रोग्राम तो मैं कई बार देख चुकी थी पर छोटे बेटे को कुछ मेडल्स मिलने वाले थे.और मैंने देखा है, स्टेज से उतरते वक़्त उनकी आँखें भीड़ में मुझे जरूर ढूँढती हैं.कभी वे मुझे देख पाते हैं,कभी नहीं.पर वह एक अहसास बड़ा होता है कि आपके इस ख़ास क्षण में कोई अपना आपके साथ है,आपको देख रहा है.
किंजल्क ने ही यह मुश्किल आसान कर दी.मुझे जबरदस्ती जाने के लिए बोला.और मैं देख रही थी,मेरे किशोर बेटे में सारे पुरुषोचित गुण आ गए हैं.उसके मन के गहरे दुःख का अहसास था मुझे पर वह निर्विकार भाव से चेहरे पर मुस्कान सहेजे सोफे पे लेता हेडफोन लगाए गाने सुन रहा था.
और आज कनिष्क का स्कूल का अंतिम 'स्पोर्ट्स डे' था और उसने इसका भरपूर फायदा उठाने की सोची थी.कई सारे प्रोग्राम में हिस्सा लिया था.सबसे पहले उसे सफ़ेद कमीज़ और काली पैंट में डिसिप्लिन मिनिस्टर का बैज लगाये मार्च पास्ट करते देखा,थोड़ी देर बाद ही वह सफ़ेद बनियान और काले शौर्ट्स में 'ह्युमन पिरामिड' बना रहा था. जब आप अपने बच्चे के ऊपर तीन तीन लडको को खड़े देखते हैं तो एक पल को सांस रुक जाती है...फिर तालियों की गड़गडाहट से ही ध्यान टूटता है.थोड़ी देर बाद देखा वो चमकीले लाल शर्ट में गले में स्कार्फ लगाए माइकेल जैक्सन के गाने पर डांस कर रहा था.इस अजीबोगरीब गेटअप में देख एक पल को विश्वास करना मुश्किल हो रहा था,ये अपना ही बेटा है.और इसके बाद उसे सफ़ेद कुरता पैजामा पहने साफा बांधे लेजियम बजाते देखा.अंत में अपनी फुटबाल टीम के साथ जर्सी में दौड़ते हुए पूरे ग्राउंड का चक्कर लगा रहा था..और वही मेरे लिए उस स्कूल का अंतिम प्रोग्राम था.
स्कूल में 'स्पोर्ट्स डे' का दिन बच्चे सबसे ज्यादा एन्जॉय करते हैं क्यूंकि उस दिन कोई अनुशासन नहीं होता.पूरी छूट होती है टीचर्स दूसरे काम में बिजी होती हैं और छोटे छोटे ग्रुप में बच्चे रंग बिरंगे कपड़ों में चहकते नज़र आते हैं.कनिष्क ने भी प्रोग्राम ख़त्म होने के बाद थोड़ी देर और स्कूल में रुकने की इजाज़त मांगी और हैरान हो गया,जब मैंने एकदम से हाँ कह दी.वह अभी इस अहसास से बेखबर था कि बेफिक्री भरे उसके ये दिन फिर कभी वापस नहीं आने वाले.
एक घटने का जिक्र करूँ तो बच्चे बहुत नाराज़ हो जायेंगे और घटना इतनी मजेदार है कि जिक्र ना कैसे करूँ?...कनिष्क अपने स्कूल के लेजियम ग्रुप में तीन साल से है और इनका स्कूल मुंबई में फर्स्ट आया था.इसलिए कभी भी किसी नेता का आगमान हो,शिक्षा मंत्री या कोई भी विशिष्ट व्यक्ति तो इनके स्कूल को बुलाहट आ जाती है.नेतागण तो अपनी ए.सी. कार में आते हैं और ये बच्चे कड़ी धूप में घंटो लेजियम लिए सड़क के किनारे उनका इंतज़ार करते रहते हैं.खैर इसी वजह से कनिष्क को हर बार सफ़ेद कुरते पैजामे की जरूरत पड़ती थी..मैंने पतिदेव का एक कुरता पायजामा काँट-छाँट कर उसके नाप का कर दिया.हर प्रोग्राम के बाद धुलवा कर रख देती.इस बार कनिष्क के स्पोर्ट्स डे के एक दिन पहले किंजल्क के ड्रामा का शो था.उसे भी सफ़ेद कुरता पायजामा चाहिए था,मैंने निकाल कर दे दिया.जब रात में कनिष्क ने अपने सारे कॉस्ट्यूम्स रखने शुरू किये और सफ़ेद कुरता पायजामा माँगा तो मेरी हालत का अंदाज़ा लगाया जा सकता है.सुबह सात बजे उसे स्कूल जाना था और किंजल्क शो ख़त्म करके बारह के पहले घर नहीं आनेवाला था.उन दिनों हमारी बिल्डिंग में 'पानी बचाओ मुहिम' भी चल रही थी' और रात के 11 बजे पानी बंद हो जाता था...लिहाजा वाशिंग मशीन में धोकर सुखाना भी संभव नहीं था..मैंने कनिष्क को बिना कुछ बताये किंजल्क को फोन किया...और उसने कहा 'मैंने ड्रामे में पहना तो है...पर ज्यादा गन्दा नहीं हुआ...उसे प्रेस करके वापस वो दूसरे दिन पहन सकता है'...कनिष्क ने देखा तो बहुत नाक भौं सिकोड़ा और बोला 'तुमने 'सचिन तेंदुलकर' वाली पोस्ट लिखी ना...कि उनके पास एक ही सफ़ेद शर्ट पैंट थी...इसीलिए हमारे साथ भी ऐसा ही हुआ.'