यह विषय काफी समय पहले से ज़ेहन में हलचल मचा रहा था...पिछली पोस्ट में जब बच्चों के साथ प्यार भरे व्यवहार पर चर्चा हुई तो लगा यही उचित समय है, इस विषय को छेड़ने का .पर मैं खुद भी कन्फ्यूज्ड सी हूँ....कि हल आखिर क्या है?
बच्चों को हर माता-पिता अपनी सीमा से बढ़कर सुख-सुविधाएँ देने का प्रयत्न करते हैं. उनकी राहों से कांटे चुन लेने की कोशिश करते हैं. अपनी शक्ति भर प्रयास करते हैं कि उनके जीवन से दुख का साया भी दूर रहें. और वे उत्फुल्लता के साथ अपना जीवन व्यतीत करें.
पर हाल में घटी कुछ घटनाओं ने यह सब सोचने पर मजबूर कर दिया कि यह कहाँ तक सही है??
मेरे बेटे का कॉलेज खुला और दो दिन बाद ही इंजीनियरिंग फाइनल ईअर के एक स्टुडेंट ने अपनी बिल्डिंग के टेरेस से कूदकर आत्महत्या कर ली. वह रात भर जागकर एक प्रेजेंटेशन तैयार कर रहा था , सुबह चार बजे तक मोबाइल के जरिये अपने दोस्तों के संपर्क में था. और सुबह छः बजे कॉलेज जाने से पहले...उगते सूरज के साथ ही अपने जीवन को अलविदा कह दिया.
वह लड़का, अकेलेपन का शिकार नहीं था..कई दोस्त थे उसके. सुना, माता-पिता भी इतने सख्त नहीं थे. सिर्फ एक अच्छे प्रेजेंटेशन की चिंता, अपनी इहलीला समाप्त करने की वजह बन गयी??. इतना अहम आ गया है बच्चों में...कि जरा सी असफलता की आहट भी ऐसे भयानक अंजाम तक पहुंचा देती है. कितना असुरक्षित महसूस करने लगे हैं वे कि अगर टॉप पर ना पहुंचे या अपने तय किए स्टैण्डर्ड से नीचे रह गए तो जीना ही व्यर्थ हो उठता है.
एक जगह कुछ ऐसी ही घटना के बारे में पढ़ा था, जो हमारे अज़ीज़ पूर्व राष्ट्रपति, ए.पी.जे. कलाम जी के साथ हुई थी. उनके प्रदर्शन से उनके प्रोफ़ेसर खुश नहीं थे, और उन्हें चेतावनी दे दी थी कि "अगर दो दिनों के अंदर वे अच्छा प्रेजेंटेशन तैयार नहीं करते तो वे अपनी स्कॉलरशिप खो बैठेंगे." दो दिन बिना पलक झपकाए , वे प्रेजेंटेशन तैयार करते रहें. तीसरे दिन सुबह ,प्रोफ़ेसर उनके लैब में आए और उनका शानदार काम देख उन्हें गले से लगा लिया.
आखिर वो क्या चीज़ थी जो कलाम जी से रात-दिन मेहनत करवाती रही और इस बच्चे ने बदले में अपना जीवन ही त्याग दिया . जबकि अगर इसका एक साल भी खराब हो जाता तो माता-पिता की इतनी हैसियत थी कि वे उसे पढ़ा सकें.
पर आज के युवाओं ,बच्चों में संघर्ष करने की क्षमता घटती जा रही है और कहीं इसके कसूरवार हम तो नहीं. हम सबकुछ उनके लिए इतना सुगम बना देते हैं. स्कूल में किसी टीचर ने डांट दिया... (हाथ लगाने की तो अब सोच भी नहीं सकता) पैरेंट्स लड़ने पहुँच जाते हैं. अच्छे नंबर नहीं आए, डोनेशन देकर मनपसंद स्कूल-कॉलेज में एडमिशन दिलवा देते हैं. दुनिया की सारी सुख-सुविधाएं उनपर न्योछावर कर देते हैं. बच्चे इतने आदी हो जाते हैं, इन सारी सुविधाओं के कि एक बार भी अपने दम पर कुछ साबित करना हुआ और वे बिखर जाते हैं. ये बच्चे इतनी कम उम्र के होते हैं कि जीवन का मोल नहीं समझ पाते.क्या इसलिए कि सबकुछ आसानी से मिल जाता है ?? पर पैरेंट्स भी क्या करें.....जानबूझकर तो बच्चों को सुख-सुविधा से वंचित नहीं रख सकते.
ये आत्महत्या की प्रवृत्ति तो इतनी बढती जा रही है कि माता-पिता की साँसे ही अटकी होती हैं. इतनी उम्र हो जाने के बाद भी मैने आत्महत्या की खबर सिर्फ अखबारों में ही पढ़ी थी. और वहीँ मेरे बेटे आठ साल की उम्र से अपने आस-पास , परिचित चेहरों के आत्महत्या की खबरे सुन चुके हैं. एक नवीं क्लास का लड़का..घर से स्कूल को निकला, पता नहीं माँ ने डांटा था पिता ने या क्या...हमारी दायीं तरफ की बिल्डिंग के टेरेस से जाकर कूद गया. बाईं तरफ की बिल्डिंग का लड़का तो मेरे बच्चों के साथ खेलता था. उसके पिता गल्फ में थे. यह अपनी माँ के साथ यहाँ रहता था. पिता ने वहाँ दूसरी शादी कर ली. पैसे भेजने बंद कर दिए. लड़के ने दसवीं के बोर्ड के इम्तहान दिए थे.मकान मालिक ने आकर धमकी दी, "घर खाली करो" और दूसरे दिन इस लड़के ने भी टेरेस ही चुनी, उस जिल्लत से मुक्ति पाने के लिए. आस-पास की बिल्डिंग के बच्चे रोज शाम उसे याद करके रोते थे. मेरे बच्चे भी कहते, "वो पिज्जा डिलीवरी बॉय का काम कर सकता था..मैकडोनाल्ड ,CCD कहीं भी काम मिल जाता उसे....उसने ऐसा क्यूँ किया?? मैने भी उन्हें अपनी शक्ति भर समझाया कि यह बहुत ही कायरतापूर्ण कदम था.
पर खुद को नहीं समझा पायी. माना कि वह 16 साल का अबोध किशोर था. पर कितने ही किशोरों ने उसी उम्र से जिम्मेवारी संभाली है. पर आजकल युवाओं में संघर्ष करने का माद्दा ही नहीं रह गया है. सबसे आसान तरीका यही लगने लगा है. पहले बच्चे मीलों दूर साइकिल चला कर जाते थे, रुखी-सूखी खाकर , दो कपड़ों में गुजारा करते थे .पर मानसिक अस्वस्थता से दूर होते थे. आज वे शारीरिक श्रम में अपनी उर्जा नहीं खर्च कर पाते और यह संचित उर्जा उनमे उग्रता को जन्म देती है. कोई फैसला शांत-चित्त मन से वे कर ही नहीं पाते.
और ऐसे में सबसे जरूरी लगने लगता है "खेल-कूद की अनिवार्यता " . खेल के मैदान में वे हारते भी हैं, साथी खिलाड़ियों की डांट भी सुनते हैं. कोच कभी कभी हाथ भी चला देते हैं. मैच हारने पर दर्शकों की हूटिंग से अपमान भी झेलना पड़ता है. यह सब उन्हें आनेवाले जीवन की कठिनाइयों का सामना करने के लिए तैयार कर सकता है. पर कोई भी अनभिज्ञ नहीं कि खेल-कूद को हमारे देश में कितना महत्त्व दिया जाता है. जिन स्कूलों में खेल की टीम बनायी भी जाती है उसमे अंडर 10, अंडर 12, अंडर 14 के वर्ग होते हैं . दो क्लास के बच्चे एक वर्ग के अंतर्गत आ जाते हैं. हर क्लास में आठ से दस डिविजन.एक डिविज़न में साठ बच्चे . यानि हज़ार -बारह सौ बच्चों के बीच खेलने का मौका मिलता है पच्चीस बच्चों को, जिनमे ग्यारह ही नियमित रूप से खेल पाते हैं. बाकी बच्चे कहाँ से लें ये अनुभव? अगर गंभीरता से बच्चों के स्वस्थ मानसिक विकास के लिए कुछ कदम उठाने हैं तो मेरी समझ से खेल-कूद को पढ़ाई से भी ज्यादा महत्त्व देना चाहिए.
आजकल रिअलिटी शोज़ में जिस तरह बच्चों को जज अपने कमेन्ट से एक सीमा तक अपमानित करते हैं, उस पर काफी लोगों ने अपना रोष जताया हैं. मुझे एक बड़े पत्रकार की प्रतिक्रिया याद आती है. जिन्होंने कहा था, "आगे की ज़िन्दगी में पता नही कितनी बार अपमानित होना पड़ेगा, कितनी जिल्लतें उठानी पड़ेंगी, ये सारी नकारात्मक प्रतिक्रियाएँ उन्हें आने वाली ज़िन्दगी के लिए तैयार कर रही है." हालांकि ,यह भी कितना सही है...नहीं कहा जा सकता क्यूंकि डांस शो में भाग लेने वाली एक १४ वर्षीया लड़की, ऐसे कमेंट्स सुन...कोमा में चली गयी .पर बात फिर वही है कि अब तक उस लड़की ने अपने लिए कहीं कुछ नकारात्मक सुना ही नहीं होगा.
मैने पहले भी इसी "रुचिका-राठौर केस" विषय पर एक पोस्ट लिखी थी, खामोश और पनीली आँखों की अनसुनी पुकार लेकिन तब इस समस्या को दूसरी दृष्टि से देखा था कि आस-पास वालों को पता भी नहीं चलता , बच्चे इतने डिप्रेशन से गुजर रहें हैं. वे इसे नज़रंदाज़ कर देते हैं या सीरियसली नहीं लेते. उन्हें बच्चों का ख़ास ख्याल रखना चाहिए. पर आज दूसरी तरह से इस समस्या को देखने की कोशिश की है कि जब बच्चे , डिप्रेशन से लोहा ले, हंस-खेल रहें हैं, स्कूल-कॉलेज जा रहें हैं, दोस्त बना रहें हैं....फिर ऐसे कदम उठाने के विचार को भी क्यूँ नहीं त्याग पाते. और पैरेंट्स ऐसे कदम से दूर रखने के लिए क्या करें?
आजकल पैरेंट्स का प्यार और देखभाल एक शामियाने जैसा हो गया है, जो बच्चों को जीवन की आंधी,तूफ़ान, बारिश, धूप से महफूज़ रखता है जबकि उनका साया एक पेड़ की तरह होना चाहिए, जो प्यार,ममता की शीतल छाया भी दे और उसके पत्तों से छन, ज़िन्दगी की धूप, बारिश ,आंधी भी उन्हें प्रभावित करती रहें तभी वे जीवन की कठिनाइयों से लड़ने को तैयार हो पाएंगे.
