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शुक्रवार, 2 मार्च 2012

साड्डा चिड़ियाँ दा चंबा वे ...(कहानी --२ )


(इस किस्तों वाली कहानी का उपयुक्त शीर्षक नहीं मिल रहा था और मेरी सलाहकार वंदना अवस्थी दुबे ने (सोचती हूँ...इन्हें ऑफिशियल सलाहकार ही अपोयेंट कर लूँ...पर डर है,कहीं मोहतरमा लम्बी-चौड़ी फीस न फरमा  दें :)) सलाह दी...हर किस्त का एक अलग शीर्षक रख लो और बात मुझे जंच गयी...पूरी कहानी का शीर्षक  ढुंढने की  कवायद मुल्तवी  }

कहानी अब तक--
(जया के कविता संग्रह को एक बड़ा पुरस्कार मिला. पत्रकार पूछने लगे, उसकी कविताओं में इतना दर्द कहाँ से आया ?और जया पुरानी यादों में खो गयी.. दो बड़े भाई और दो बड़ी बहनों..माँ-बाबूजी के संरक्षण में बचपन बड़े प्यार में बीता...बाबूजी के दुनिया से चले जाने के बाद उसने सोचा नौकरी करके माँ की देखभाल करेगी..पर एक पड़ोस के लड़के ने ख़त भेजकर..रास्ते में रोक कर अपने प्यार का इजहार शुरू कर दिया..उसने हर बार उसे मना  कर दिया...)
गतांक से आगे ---


कुछ दिन यूँ ही डरते-डरते बीत गए. पर   -धीरे महसूस किया...अब दो आँखें पीठ पर नहीं जड़ी होतीं...ना ही किसी के द्वारा घूरे जाने का अहसास ही होता...और वह थोड़ी निश्चिन्त हो गयी...लगता है 'राजीव समझ गया और कोशिश छोड़ दी....चलो अच्छा हुआ बला टली...अब यूँ डर के साए में नहीं जीना पड़ेगा...अब इत्मीनान से कहीं आ जा सकती है. बिजली का बिल जमा कर लौट रही थी कि देखा...राजीव के घर के बाहर ढेर सारे गद्दे चादरें..सूखने को फैलाई हुई हैं. पड़ोस की मिसेज मिश्रा ...मिसेज गुप्ता से  कह रही थीं..'लगता है...राजीव की अम्मा आई हुई हैं....कभी मिश्रा जी के पास तो कभी बेटे के पास...एक पैर इहाँ त एक पैर उहाँ रहता है,उनका....आते ही झाड़-पोंछ में लग जाती हैं...चलते हैं शाम को मिलने...' 

उसने ऐसे ही उत्सुकता से एक नज़र मुड कर देखा...पर कोई नज़र नहीं आया...वो घर चली आई.

दूसरे दिन अलसाई सी लेटी थी कि तीन बजे के करीब...दरवाजे पर जोर की खट-खट हुई..."अरे कोई है..?"
हडबडा कर उठी तो देखा अधेड़ उम्र की एक औरत खड़ी थीं...उसके दरवाज़ा खोलते ही...उसे ऊपर से नीचे तक घूरने लगीं...उसे थोड़ा अजीब सा लगा...असमंजस में चुप खड़ी रही..जब उनका घूरना बंद नहीं ही हुआ तो पूछ लिया..."किस से मिलना है??.."
"अपनी माँ को बुलाओ"
"आप बैठिये अभी बुलाती हूँ..."
माँ भी लेटी थीं...बताने पर " कौन है...." कहती...हडबडाते हुए सर पर पल्ला ठीक करते बैठक की तरफ भागीं "
"का हाल है..नरेस की माँ....बढ़िया हुआ यहाँ चली आयीं...अपना घर होते हुए काहे बेटा-बहू के आसरे रहतीं.."
"नहीं आसरे की बात नहीं है...ये घर भी इतने दिनों से बंद पड़ा था....इसकी देख-रेख करनी थी...रहने पर ही पता चलेगा ना...किधर क्या मरम्मत कराना  है..इसीलिए यहाँ चली आई " 

वो एक कोने में खड़ी थी...माँ ने उसकी तरफ  मुड़ कर देखा..."जरा  सरबत-पानी लेकर आओ...." फिर उसकी आँखों में सवाल देख खुद ही जबाब दे दिया.."अरे राजीव की माँ हैं...तुमको याद नहीं होगा...कम ही मुलाकात हुआ है...कभी जब हमलोग आते थे तो ये नहीं और ये आती थीं तो हमलोग नहीं.." फिर उन महिला की तरफ मुड़ कर पूछा.."आपने पहचाना,इसे...जया है.."

"हाँ अच्छी तरह पहचाना...अब तो एही बाकी  है ना सादी  के लिए....बाकी सबको तो सरमा जी निबटाइए  के गए हैं.."

उनका इस तरह 'निबटाइए  के' बोलना..उसे अच्छा नहीं लगा...पर चुपचाप मुड़ गयी. शरबत देने के बाद ...वह वापस कमरे में आ कर लेट गयी..अचानक उनकी बातचीत में अपना नाम सुन..उसके कान खड़े हो गए . राजीव की माँ कह रही थीं..." छोटकी बेटी की सादी के लिए का सोची हैं..?"
"अभी तो कुछ नहीं...बी.ए.का इम्तिहान दी है..रिजल्ट आ जाए...तब देखें..कहती तो है कि अभी और आगे पढेंगे...नौकरी करेंगे..."
"अरे का लड़की जात से नौकरी करवाईयेगा....सादी-ब्याह का सोचिये.."

और माँ की दुखती रग छू गयी हो जैसे...बिना देखे ही वो बता सकती थी..उनकी आँखें गंगा-जमुना बन गयी होंगी...जब भी उसकी बात होती...माँ बाबूजी को याद करके रोने लगतीं..क्या क्या अरमान थे उनके..अभी भी रुआंसी सी बोल रही थीं.." हाँ..देखना ही होगा...इसके बाबूजी तो रहे नहीं...बीच मझधार में छोड़ चले गए...हमेशा कहते थे इसके लिए तो राजकुमार जैसा दूल्हा लायेंगे....क्या पता क्या लिखा है..इसकी किस्मत में.."
"अरे ऐसा क्यूँ कहती हैं....सरमा जी का अरमान था तो राजकुमार जईसा दुल्हा ही मिलेगा इसको.."
"आप बताइए...राजीव को भी तो नौकरी में आए बहुत दिन हो गया...कब कर रही हैं...ब्याह  उसका..?"

"अरे अब का बताएँ...दू साल हो गया नोकरी लगे...लड्कीवाला लोग सुबह-साम दुआर अगोरता है...पर इ माने तब ना...अभी और परीक्षा देना है..अफसर बनना है...एही कहता है...मेरा तो उ लोग को चाय पिलाने में ही महीना का पांच किलो चीनी...और दू किलो चाय ख़तम हो जाता है. कम से कम सादी करे तो ई खर्चा त कम हो.."
"आप भी ना.."..हंसने लगीं  माँ...
"पर अब मान गया है...एक लड़की पसंद आ गयी है...."
"ओह फिर देर काहे की...जल्दी से बजवाइये बाजा.."
"इसीलिए तो इहाँ आए हैं.."
"समझी नहीं..." माँ सचमुच कुछ नहीं समझी थीं...पर वो सब समझ रही थी...उसका दिल बैठ गया...उनकी चाय की चर्चा सुन चाय बनाने उठी थी..धम से वापस चौकी पर बैठ गयी...'तो ये वजह है राजीव की माँ के यहाँ आने का"
"का नहीं समझीं....आपकी बेटी जया पसंद आ गई है राजीव को...अब तक सादी के नाम पर ना ना कहता था..अब अपने से कहा है...बात करने के लिए...त का करें...अब आपके घर में कोई मरद माणूस भी नहीं है ना...किस से बात किया जाए...इसीलिए हमको आना पड़ा...नहीं तो औरत लोग कभी ई सब काम करती है...पर अब का करें...दुसर कौनो उपाए नहीं था..."
माँ शायद सकते में थीं...एक शब्द नहीं निकला उनके मुहँ से....
"का सोच रही हैं....सरमा जी कहते थे ना..राजकुमार जैसा दूल्हा ढुंढेंगे  त देखिए बिना मेहनते के दुआरी पर राजकुमार जैसा दूल्हा आ गेया "
" हाँ..भाग्य है लड़की का..पर बातचीत त मेरा दुनो बेटा ही करेगा...अब वही दोनों गार्जियन  है इसका.." शायद माँ को घर में कोई मरद मानुस नहीं होने की बात अखर गयी थी...उसे भी सुकून आया..डर रही थी कहीं माँ..एकदम से हाँ ना कह दें.

"ठीके है...खबर कर दीजिये उ लोग को...दुनो खुसे होगा...भाग-दौड़ का मेहनत बच गया....अब चलेंगे...राजीव के ऑफिस से आने का टाइम हो रहा है..जब तक हियाँ हैं..चाय-पानी त  दे दें.." 

"आप चाय तो पी के जाइए...जयाss..जयाss " माँ पुकार ही रही थीं...पर राजीव की माँ बीच में ही उन्हें रोक कर उठ गयीं.." अब त मिठाईये खायेंगे...चाय ओए रहने दीजिये"  
उसने भी राहत की सांस ली...उसका भी मन नहीं था उनके सामने जाने का 

***
माँ घबराई सी अंदर आयीं...' जया..बेटी...सुना तुमने क्या कह रही थीं...राजीव की माँ..."
माँ को कुछ समझ ही नहीं आ रहा था...खुश भी थी...और उनकी आँखें भी भरी जा रही थीं...
पर उसने सख्त चेहरा बनाए हुए कह दिया.." सब सुना...पर  मैने पहले ही बता दिया है...शादी नहीं करनी..अभी और पढूंगी...नौकरी करुँगी.."

ज़िन्दगी में पहली बार माँ ने जोर से डांटा.."ऐसे कुलच्छन बोल नहीं बोलते.... कोई लड़की अनब्याही रही है आजतक...भगवान ने भेजा  है..इतना सुन्दर घर और वर....उनकी इच्छा को ना नहीं करते..चल  मेरे साथ चल...दोनों भैया को फोन कर दे... "
"माँ....मैं कहीं नहीं जा रही....इतना हडबडाने की जरूरत नहीं है.
"अब इ शाम  को हम अकेले जाएँ...हमको तो नंबर मिलाना भी नहीं आता...काहे नहीं बात मान रही हो..सीमा और रीता को भी फोन कर देंगे...सबसे ई खुसखबरी बाँटने का मन हो रहा है..."
"कैसी खुसखबरी माँ...अभी से सब जगह  ढिंढोरा मत पीटो...आज तो हम कहीं नहीं जायेंगे...कल देखेंगे.." और इतना कह वह उठ कर चली गयी .

माँ भी शायद समझ गयीं...वो नहीं मानेगी..."ठीक है...कल ही चलना..पर जरा कागज़ कलम दे...सबको चिट्ठी तो लिख दें".. और सीधा चिट्ठी लिखने बैठ गयीं...ये माँ का एकदम बदल हुआ रूप था...अब तक रोने-धोने सोग मनाने वाली माँ, एकदम से कामकाजी हो उठी थीं .....माँ की पनीली आँखों में एक नई चमक आ गयी थी. एक नई जिम्मेवारी के अहसास से एकदम सीधी तन कर बैठी थी... माँ ने तो लम्बी चिठ्ठी दोनों भैया और दोनों दीदी को  लिखी... लिखते वक्त....खुद से ही बातें करतीं...कभी रोती..कि बाबूजी नहीं है..अपनी रानी बेटी की शादी देखने को...कभी खुश होती...कि कितनी चिंता थी..उन्हें जया की शादी की..भगवान ने घर बैठे लड़का भेज दिया. उसने भी लिफ़ाफ़े में दो लाइन लिख कर डाल दिया कि उसे शादी नहीं करनी...और कोई जल्दी नहीं है...जैसे छुट्टी मिले...वैसे ही लोग आएँ.

माँ नहीं मानीं..दूसरे दिन सबको फोन किया और कह दिया...कि चिट्ठी में सब विस्तार से लिखा है. बड़े भैया तो दो दिन बाद ही आ गए .बहनों ने भी पत्र के उत्तर में ,ख़ुशी जाहिर की और उसे समझाया कि बचपना ना करे. पर भैया जबतक आए...राजीव की माँ वापस चली गयीं थीं . भैया, राजीव से मिलकर बहुत खुश हुए कि होनहार लड़का है  और उनके मात-पिता से मिलने...उनकी पोस्टिंग पर चले गए. लौट कर बताया...."उनलोगों को जया बहुत पसंद है..."
"और लेन-देन की बात ?"...माँ ने आशंका से पूछा.

"मेरे पास ज्यादा वक्त नहीं था...उन्होंने कहा दो-तीन दिन छुट्टी लेकर आऊं..फिर आराम से बातें करेंगे...तुम चिंता मत करो...जब खुद लड़की का हाथ मांग रहे हैं तो उनलोगों की ज्यादा डिमांड नहीं होगी....और अपने घर की लडकियाँ, अपनी  किस्मत लेकर आती हैं....सीमा और रीता  की शादी में भी कहाँ ज्यादा दहेज़ माँगा  उनलोगों ने..दोनों दामाद कितने अच्छे मिले हैं...और हम दोनों भाई की शादी में भी पिताजी ने नहीं ली ..तो जया की शादी में क्यूँ देना पड़ेगा....जो भी करेंगे हमलोग अपने शौक से करेंगे....और सबसे छोटी बहन है...पूरे धूमधाम से शादी करेंगे...उन्हें शिकायत का कोई मौका नहीं मिलेगा..."

माँ की आँखों से झर झर आँसू गिरने लगे...वे बस आँचल से आँखें पोंछती रहीं...कुछ बोली नहीं...शायद मन ही मन भगवान  का शुक्रिया  अदा कर रही थीं.

"बस इतना कहा है कि सोने के सिक्के से लड़के का टीका कर जाऊं...."
"हाँ, लड़के का रोका तो करना होगा....चलो संदूक खोलती हूँ...देख लो...उसमे से क्या लेना होगा "

ये सब सुनकर थोड़ा मन उदास हो गया उसका..शुरुआत तो कर ही दी उनलोग ने मांगने की....दीदी-भैया के समय ऐसा कुछ तो नहीं कहा था.. पता नहीं आगे क्या होने वाला है." एक गहरी सांस ली उसने.

कानो कानो ये बात पूरे मोहल्ले में फ़ैल गयी. उसका बाहर निकलना  दूभर हो गया. वो तो ज्यादा लोगों  को पहचानती नहीं..लेकिन लोग उसे दिखा कर कहते..."यही है वो लड़की " उसे लगता पता नहीं लोग क्या सोच रहे होंगे......माँ के चहरे से उदासी की परत गायब हो गयी थी..वे सारा समय शादी का हिसाब-किताब ही करती रहतीं.

राजीव ने कई सारी परीक्षाएं दे रखी थीं. और उनके रिजल्ट आने शुरू हो गए थे.पता चला...पी.सी.एस. का इम्तहान पास कर लिया है और वो अब डिप्टी कलक्टर बन जाएगा. राजीव के माता-पिता घर आ गए और एक बड़ी पूजा रखी. वो तो पूजा में नहीं गयी पर माँ बता रही थी कि मोहल्ले के सारे लोग ,उसे बधाई दे रहे थे कि 'लड़की के पैर बड़े अच्छे हैं...रिश्ता जुड़ते ही बढ़िया नौकरी लग गयी.'
 
माँ ने तो बस इतना ही बताया.पर एक दिन पास-पड़ोस की औरतें घर पर आई थीं...उनमे से ही दबंग मिसराइन चाची ने कहा.."अरे जब मैने राजीव  की माँ से कहा, बहू के पैर बड़े शुभ हैं..आने के पहले ही...खुशखबरी आ गयी" तो तमक कर बोली.."अभी कैसी बहू...कोई छेका थोड़े ही हुआ है... " 
मैने भी सुना दिया.."क्या अब दहेज़ की चकाचौंध में भुला  गयीं  का...कि आप ही गयीं थीं..लरकी का हाथ मांगने...तब ना सोचीं कि कहीं बेटा अफसर बन जायेगा त बड़का गाड़ी में लोग आएगा रिश्ता ले के...नहीं जाना चाहिए था ना. "
 वो तो राजीव के बाबूजी उसी वक्त बात सम्भाल लिए.."अरे नहीं भौजी...जुबान देने के बाद...हम फिरने वाले में से नहीं हैं..' ..वरना मैं तो और सुनाने वाली थी." 

सबने हाँ में हाँ मिलाई..."पूरा सहर  जानता है....कि इन दुनो का सादी पक्का हो गया है...इसके भाई त सिक्का से लरिका का टीका भी कर गए थे...तुम कंजूस लोग ने लड़की को कुछ नहीं दिया..तो का शादी नहीं ठीक  हुआ"...बोलो सुधीर  की माँ...गलत कहे का हम?" मिसराइन चाची ने आगे जोड़ा.

"ना ना एकदम ठीक बात है..अरे लरकी का भाग है की ऊ अफसर बन गया "...ये सुधीर  की माँ थीं.
यह सब सुन उसे डर भी लगा और थोड़ा सुकून  भी...अच्छा हो, वे लोग कहीं और रिश्ता कर लें...और उसके मन की बात पूरी हो जाएगी"

पर उसने मन का शक दूर करने को सीधे राजीव से ही बात करने की सोची. इस बार वो रास्ते में राजीव के इंतज़ार में खड़ी थी. वो उसे देख  गर्व से मुस्कुराया और उसके कंधे थोड़े  और  भी चौड़े हो गए. वो नज़रें झुकाए बोली.. "आप बिलकुल फ्री हैं..कहीं और शादी करने के लिए....मेरी तरफ से एकदम स्वतंत्र"
"नहीं जी शादी तो हम आपसे ही करेंगे...और अब तो हम अफसर भी बन गए हैं...अब तो आपके भाई लोग की बराबरी में हैं ना?"..आज उसके स्वर में वो नम्रता और वो मनुहार नहीं था ..बल्कि..थोड़ा  विद्रूपता और उपहास था.

पर वो भी फैसला करके आई थी..दो टूक बात करेगी..." देखिए आपको दूसरी जगह अच्छा दहेज़ मिल जायेगा...मेरी माँ -भाई का  इतना सामर्थ्य नहीं है "
"ये सब बात लड़की लोग के मुहँ से शोभा नहीं देता...और ये सब तो परिवार के बड़े-बुजुर्ग तय करेंगे...हम आप क्या बोलें उसमे...फिर अजीब ढंग से मुस्कुरा कर बोला..." और आप सबसे छोटी हैं..इतना बड़ा मकान है...बाबूजी भी बढ़िया पैसा छोड़ कर गए ही होंगे...दो दो अफसर भाई है..आप क्यूँ चिंता करती हैं...जाइये जिस रूप पर इतना घमंड है ना...उसका साज-श्रृंगार कीजिए.....अब उसपर मेरा हक़ है "

वो अंदर तक सिहर गयी...इस आदमी से उसकी शादी होने जा रही है...उसके स्वर में लेश-मात्र का प्यार नहीं था...ऐसा भाव था..जैसे उसने कोई जीत हासिल कर ली हो. और रूप पर घमंड??....जबसे बाबूजी गए हैं...उसने ठीक से आईना  तक नहीं देखा...घमंड क्या करेगी?

***

वो नीची निगाह किए, थके कदमो से लौट आई...कैसे गुजरेगा उसका आगामी जीवन?...माँ,भैया सब खुश हैं...उन्हें बिना भाग-दौड़ के एक अफसर दामाद मिल गया...वो कैसे मना करे...मना भी करे तो किस बात पर...कोई बड़ी वजह तो हो...सिर्फ इतनी सी बातचीत पर कैसे कोई निर्णय ले...और क्या पता शायद उसे इस बात का गुस्सा हो कि उसने बधाई नहीं दी...शर्मा कर हंस कर बात नहीं की..सीधा दो टूक बात की. छुई-मुई लडकियाँ ही लड़कों को अच्छी लगती हैं...लजा कर शर्मा कर आदाओं से बातें करने वाली लडकियाँ ही भाती हैं, उन्हें...शायद ये साफगोई उन्हें धृष्टता लगी हो...और फिर अंतर्मन ने जैसे आवाज़ दी.."क्या खुद पर 
भरोसा  नहीं...अगर पत्थरदिल भी होगा...तो उसे वो अपने प्यार और समर्पण से मोम बना लेगी. और खुद तो प्रपोज़ किया है....मन में प्यार तो होगा ही.....वो नाहक चिंता कर रही है. और सर झटक घर के अंदर आ गयी...गुनगुनाने की कोशिश की....खुश होने की कोशिश की...लेकिन दिल में जैसे किसी गहरी उदासी ने घर कर लिया था. मन को समझाया शायद माँ से दूर एक अजनबी घर में जाने के डर से मन उदास है.

पर डर बेबुनियाद नहीं  था. भैया छुट्टी लेकर शादी की बातचीत करने राजीव के पिताजी के पास गए  थे. लौट कर आए तो बहुत परेशान. उनकी तो अच्छी खासी मांगें थी. माँ से बता रहे थे..."पहला सवाल ही उन्होंने किया...कितने भर सोना देंगे??".महानगरीय जीवन के आदि भैया जब यह समझ नहीं पाए तो जोर का ठहाका लगाया, ससुर जी ने और विद्रूपता से बोले, "बहन की शादी करने चले हैं या मजाक करने...इतना भी नहीं जानते...या जानना नहीं चाहते....मतलब कितने ग्राम सोना देंगे....?

 ऐसे ही लम्बी लिस्ट,पकड़ा दी है उन्होंने,...कार...फर्नीचर ...फ्रिज ..टी.वी. से लेकर गृहस्थी का हर सामान है...और फिर उनके खानदान भर के कपड़े....शादी भी वे अपनी पोस्टिंग वाले शहर से ही करेंगे...यहाँ से नहीं...बारात का आना -जाना ठहराना...स्वागत -सत्कार सब..
और ऊपर से कैश " भैया  के स्वर में  चिंता थी...माँ ने भी आशंका से पूछा..."क्या कहा तुमने...."

"क्या कहता...कार में तो असमर्थता जता दी...बाइक के लिए हाँ की है......बाकी सब चीज़ें तो देनी ही पड़ेंगी...बार-बार सुना रहे थे..फलां जगह से इतने लाख का ऑफर है...वहाँ से अच्छी कार और कई  लाख रुपया का ऑफर है...वो तो हमने  आपको जुबान दी है...अब समाज में  नाक की बात थी..हमें क्या पता था...ये नालायक लड़का सचमुच पी.सी.एस. निकाल ही लेगा...लगा क्लर्की के लिए ये घर ठीक है...गुस्सा  तो इतना आ रहा था...कि  कह दूँ...वो सब पैसे चार दिन में चले जाएंगे...पर मेरे सोने जैसी बहन आपके आँगन में जायेगी तो आपका खानदान सँवर जायेगा....पर लड़की का भाई था...खून का घूँट पी कर रह गया...बोला नहीं कुछ "

"पर बेटा...कहाँ से होगा इंतजाम ?"

"हो जायेगा माँ...छोटे से भी  कहूँगा...हम दोनों भाई हैं...कर लेंगे  इंतजाम "

वह अंदर कमरे में सब चुपचाप सुन रही थी...अब उस से नहीं रहा गया...सारा भय-संकोच त्याग कर भाई के सामने आ बोली,"भैया....जरूरी है क्या यहाँ शादी करना....मैने तो पहले भी कहा था...मैं शादी नहीं करुँगी...नौकरी करुँगी "

"गुड़िया..क्यूँ चिंता करती है...सारा इंतजाम हो जायेगा...पिताजी ने इतना कुछ किया है हम सबके लिए...बस एक तेरी जिम्मेवारी छोड़ गए हैं...वो भी हम दोनों भाई पूरी नहीं कर सकते??...चिंता मत कर...शुरू शुरू में हर लड़केवाले ऐसे ही बातें करते हैं...फिर मान जाते हैं....जा एक कप चाय बना ला..." भैया ने स्नेह से बोला.

बाबूजी के जाने के बाद पहली बार किसी ने गुड़िया कह कर पुकारा था...आँखें भर आयीं उसकी....अच्छी भली ज़िन्दगी गुजर रही थी,भैया लोगों की...कहाँ से उस पर 'राजीव' की नज़र पड़ गयी और उसके भाई मुसीबत में पड़ गए.

इसके बाद देखती...शादी की जो भी बात करनी हो...भैया और माँ की बैठक छत पर बने कमरे में होती ताकि उसके कान में कुछ ना पड़ सके...पर दोनों का चिंताग्रस्त चेहरा और माथे की गहरी लकीरें उसे आभास दे देती कि सबकुछ सही नहीं है...और अपनी असमर्थता पर खीझ कर रह जाती वह.

धीरे-धीरे शादी की तैयारियाँ शुरू होने लगीं. राजीव ट्रेनिंग पर चले गए थे....थोड़ी राहत थी...कि अब  राजीव से मुलाकात नहीं होगी और फिर कुछ उल्टा-सीधा नहीं सुनना पड़ेगा.

शादी  की तारीख नज़दीक आने लगी....घर में  मेहमान भरने लगे...चाची,मौसी ,बुआ....सारे रिश्तेदार उत्साह से भरे  थे...इतने अच्छे घर में इतनी आसानी से जया का रिश्ता तय हो गया...बैठे -बिठाए इतना अच्छा लड़का मिल गया. माँ और दोनों भैया ने लेन-देन दहेज़ की बातें अपने तक ही रखीं थीं....बहनों को भी ज्यादा कुछ नहीं बताया  था...उसने दीदी से राजीव से मिलने की बात बतायी....और बताया कि किस रूखे  ढंग से उसने बात की...
दीदी ने उसे दिलासा दिया ..."उसे लड़कियों से कैसे बाते करते हैं नहीं पता होगा...कई लडको को नहीं होता...वे ऐसे ही ऐंठ कर बातें करते हैं. पर उसने खुद तुम्हे पसंद किया है....घबरा मत...सब ठीक होगा."

वो भी यही आस लगाए बैठी थी...कि शादी के  तीन दिन पहले...उसके नाम राजीव का ख़त आया...पहली बार कुछ कोमल अहसास ने सर उठाये....अच्छा था कि भैया के बेटे ने उसे ही पत्र थमाया.  धड़कते दिल से कमरे के कोने में जाकर ख़त खोला...सिर्फ एक पंक्ति थी...कोई संबोधन नहीं..."अगर बारात  लेकर नहीं आया तो क्या करोगी??.....राजीव " वो तो पत्ते सी कांपने लगी. संयोग वश दीदी आ गयी कमरे में और उसे यूँ कांपते देख.."क्या हुआ...जया??" कहते थाम लिया...वरना वो बेहोश ही हो गयी होती. दीदी  ने वो पत्र देख  लिया...वे भी घबरा गयीं...उसे बिठाया पानी पिला कर लिटा दिया...और दौड़ गयी भैया को बताने. उसी कमरे में दोनों भैया, माँ  और दीदी  की बैठक हुई. तय हुआ बड़े भैया और जीजाजी जाकर बात करें...आखिर माजरा क्या है?"

उसे तो तेज बुखार चढ़ गया....भैया और जीजाजी जब बात करके लौटे तो भैया बड़े निराश से थे...और जीजाजी गुस्से में. अब उस से कुछ भी छुपाने का कोई फायदा नहीं था...दो दिन बारात चढ़ने में रह गए थे...और यहाँ लड़के वालों के ये तेवर थे. भैया ने बताया, राजीव ने कहा..."वो तो उन्होंने ,अपनी होने वाली पत्नी को लिखा था...इनलोगों ने क्यूँ पढ़ी?"

जीजाजी नाराज़ हो गए..." वहाँ लड़की बेहोश हो गयी है...उसे तेज बुखार हो गया...और आप कह रहे हैं..मजाक था...ऐसा मजाक करता  है कोई"

इसपर सुना उसने कहा.."मजाक तो आपने देखा ही  नहीं..कैसा कैसा कर सकते हैं?"

भैया उन्हें शांत करके ले आए...पर आज भैया फूट फूट कर रो रहे थे...गलती हो गयी...ऐसे घर में बेटी नहीं देनी थी...उस दिन राजीव के पिताजी ने भी कहा था..."आपलोग कह रहे हैं...ये नहीं दे सकते...वे नहीं दे सकते...अखबार में पढ़ते हैं कि नहीं कि बहू जला दी गयी...मार दी गयी....डर नहीं लगता आपलोगों को.."
जीजाजी को फिर गुस्सा आ गया.."और आप सुनकर चुप रह गए?'

"नहीं मैने कहा...ऐसा क्यूँ   कह रहे हैं....तो कहने लगे....हम तो एक बात कह रहे हैं....हमलोग इतने नीच नहीं हैं..."...अभी आठ दिन पहले की बात है...क्या करता...सब तैयारी हो गयी है,शादी की. अब क्या कर सकते हैं..."

माँ अलग रोने लगीं.."अब तो शादी तोड़ दें ..तो इसकी शादी फिर कभी नहीं होगी....ज़िन्दगी भर बिनब्याही बैठी रहेगी...लड़की ससुराल जाएगी पर जी वहीँ टंगा रहेगा..पता नहीं  कैसी है...?"

उसे सामने की दीवार घुमती सी लगी....दोनों हाथों से सर थाम लिया....कुछ उपवास...कुछ घर छोड़ने का दुःख..और अब ये नयी टेंशन...जोरों का चक्कर आ गया ,सर में..इन लोगों की बातें भी  उस तक टुकड़ों टुकड़ों में ही पहुँच रही थीं....पलकें मुंदने लगी थीं...धीरे धीरे मुंदती पलकों वाले शरीर को बेहोशी ने अपने आगोश में ले लिया...
(क्रमशः )

सोमवार, 6 दिसंबर 2010

छोटी सी ये दुनिया...पहचाने रास्ते हैं...

शिल्पी(बीच में ) JNU के अपने गैंग के साथ 
मेरी छोटी बहन 'शिल्पी' JNU से फिलॉसफी में पी.एच.डी कर रही है और 'जानकी देवी कॉलेज' में 'एड हॉक लेक्चरर' भी है...(मुझे तो समझ नहीं आता इतनी छोटी सी लड़की की बातें बाकी बच्चे कैसे सुन  लेते हैं.....ये भी तो उनमे से एक ही लगती है). शादी में JNU से उसके  कई फ्रेंड्स आए थे और शादी का सारा कार्यभार 'शिल्पी और उसके फ्रेंड्स ने ही संभाल रखा था. ये बच्चे सुबह से देर रात तक शादी की तैयारियों में व्यस्त रहते. कभी सुबह सुबह सब्जी  मंडी जा कर ढेर सारी सब्जी लाते..तो कभी फूलवाले , मिठाईवाले या फिर टेलर के पास दौड़ लगाते. इतना अच्छा लगा देख,'शुचि' (bride to be) को पार्लर लेकर उसका चौथी कक्षा में मिला दोस्त अनुज जा रहा था...आज,अनुज ड्राइव कर रहा था और दोनों मुझे वो किस्से सुना रहें थे जब स्कूल  में अनुज,उसकी बड़ी बहन नमिता,  शिल्पी और शुचि एक ही रिक्शे में स्कूल जाते थे. शुचि-नमिता एक क्लास में थे और शिल्पी -अनुज एक क्लास में. चारो आमिर खान के  फैन...उसका नया पोस्टर या ऑडियो कैसेट आते ही टूट  पड़ते...अनुज को पोहा पसंद था ,उसने पहले से ही  कह रखा था.. 'शुचि दी.. मेरे लिए जरूर बचा कर रखना" और शुचि लंच-बॉक्स में  उसके लिए बचा कर ले आती थी. दोनों याद कर रहें थे..कितने अच्छे दिन थे बस रिजल्ट के एक दिन पहले टेंशन होता...बाकी सारे समय मस्ती. लकी हैं वे लोंग..जिनकी, बचपन की दोस्ती यूँ लगातार बनी रहती है.


शिल्पी के  एक फ्रेंड सत्येन ने रंग-बिरंगे दुपट्टों को पता नहीं कैसे मोड कर बड़े ख़ूबसूरत  फूलों का रूप दिया था. और संगीत वाले दिन पूरे हॉल को उन दुपट्टों से सजाया था. मेरी भी सीखने  की तमन्ना थी पर वक्त ही नहीं मिला..वरना एक पोस्ट भी लिख देती उसपर. जब उस से ये बात कही.तो कहने लगा, "ओह! मैं एक सेलिब्रिटी बनने से चूक गया" .जो भी काम सामने दिखे उसे  ये लोंग बिना किसी का इंतज़ार किए झट से पूरा कर देते . सत्येन, अफज़ल, ललित,पवन,जावेद,अनुज  (और नाम मुझे याद नहीं आ रहें ) तुम सबो को तन और मन  से ख़ूबसूरत लड़की जीवनसंगिनी के रूप में मिलेगी ...ऐसा शाहरूख खान ने DDLJ में कहा था कि लड़की की शादी में काम करने से ख़ूबसूरत दुल्हन मिलती है :)


पवन मेराज
शादी के दो  दिन पहले शिल्पी ने बताया कि आज  उसका एक फ्रेंड आ रहा है 'पवन मेराज' वो भी एक ब्लॉगर  है. मेरी उत्सुकता जगी. पूछने पर बताया कि वह नई, आधुनिक कविताएँ लिखा करता है. पवन ने मिलते ही कहा,'हाँ मैं आपको जानता हूँ...आपका ब्लॉग देखा है' अब यह नई बात नहीं रह गयी थी.  परिचय करवाते ही एक उत्सुकता होती है, कि लोंग पूछेंगे...".कहाँ रहती हैं..क्या करती हैं?" उसके अधिकाँश फ्रेंड्स...एक लाइन में बात ख़तम कर देते,'हाँ... आपको जानते हैं' .:(. मैने पवन से यूँ ही पूछ लिया, ' अशोक कुमार पाण्डेय..और शरद कोकास का ब्लॉग पढ़ते हो?"..लगा कविताओं में रूचि है..तो उन्हें जरूर पढता होगा. और वह कहने लगा..."वे दोनों तो मेरे बड़े  भाई जैसे हैं . शरद भैया  हमेशा गाइड करते हैं. अशोक भैया से तो अक्सर  मिलना होता है. वे कदम-कदम पर मेरा मार्गदर्शन करते हैं. कोई भी बड़ा निर्णय मैं उनकी राय के बिना नहीं लेता." .पवन ब्लॉग पर ज्यादा सक्रिय नहीं है...उसकी दूसरी बहुत सारी गतिविधियाँ हैं. उस से साहित्य जगत की ही बातें होती रहीं. हाल में ही 'वसुधा' पत्रिका में उसकी एक लम्बी कविता छपी है. उसने चौदह साल की उम्र से कविताएँ लिखनी शुरू  कर दी थीं...और पवन को अपनी  सारी कविताएँ कंठस्थ हैं. उर्दू का भी उसे अच्छा ज्ञान है और एडवेंचरस भी काफी है...सेल्समैनशिप  से लेकर पत्रकारिता तक आजमा चुका है...अभी तो एक अच्छी सी नौकरी में है.


अशोक जी बिटिया वेरा के साथ
जब मैने शिल्पी को यह सब बताया  कि ' अशोक कुमार पाण्डेय अच्छे मित्र हैं..पवन उन्हें बड़े भाई की तरह मानता है' तो  शिल्पी बड़े जोर से चौंकी .."तुम अशोक भैया को कैसे जानती हो..?" (अशोक जी से मित्रता का  भी दिलचस्प किस्सा है. उन्होंने शायद कुछ सामयिक विषयों पर  मेरी टिप्पणियाँ देख मुझे "जनपक्ष' ज्वाइन करने का आमंत्रण  भेजा था. मैने 'जनपक्ष' ब्लॉग चेक किया और पाया वहाँ तो बड़े बड़े साहित्यकारों...पत्रकारों के गंभीर आलेख  थे .और मैने  अशोक जी को जबाब भेज दिया कि "वहाँ तो बड़ा गंभीर साहित्य लिखा जाता है..जबकि मैं तो बहुत हल्का-फुल्का लिखती हूँ, क्या कंट्रीब्यूट करुँगी? " अशोक जी का जबाब आया "गंभीर साहित्य  क्या होता है?" और मैने मजाक में  लिख डाला, "बोरिंग सा.." दरअसल सोचा ,'कौन से मेरे मित्र हैं...बुरा भी मान जायेंगे तो कोई फर्क नहीं पड़ेगा.' पर अशोक जी ने बुरा नहीं माना और उनका दो तीन स्माईली  के साथ जबाब आया कि "गंभीर साहित्य हमेशा बोरिंग नहीं होता " और मानती हूँ इस बात को...शुक्रगुजार हूँ कि उन्होंने 'जनपक्ष' से परिचय करवाया और कुछ बहुत ही उत्कृष्ट आलेख पढने को मिले. ) शिल्पी  को तो बता दिया..पर अब मेरी बारी थी पूछने की कि वो कैसे जानती है,उन्हें  तो बताने लगी.."मैं तो उनके घर पर दो दिन रही भी हूँ...जब वह ग्वालियर कोई परीक्षा देने गयी थी तो अशोक जी के घर पर ही रुकी थी " (रिश्तेदारों से कई साल बाद मिलो तो कितना कुछ घट चुका होता है उनके जीवन में... कितने नए रिश्ते बन गए होते हैं...पता भी नहीं चलता )


शिल्पी, अशोक जी की ..किरण भाभी की (अशोक जी की पत्नी किरण पाण्डेय अच्छी बैडमिन्टन प्लेयर है....नेशनल लेवल पर बैडमिन्टन खेल चुकी हैं,पर तब वे 'किरण विश्वकर्मा' थीं. ) और उनकी प्यारी बिटिया 'वेरा' की छोटी सी उम्र में समझदारी भरी कई बातें बताती रही. शिल्पी ने एक रोचक बात बतायी कि वे लोंग यूँ ही चर्चा कर  रहें थे कि 'बचपन की   कौन सी हसरत बाकी है...जो अब तक नहीं की' { अगली परिचर्चा के लिए एक नया आइडिया भी मिल गया :) } शिल्पी ने कहा.."उसे 'बबल गम' से गुब्बारे बनाने नहीं आते " और वेरा ने तुरंत उसे सिखाने का बीड़ा उठा लिया..सिखाया ही नहीं...अगले दिन ताकीद की कि ढेर सारे बबल गम्स लेकर आइयेगा आपको प्रैक्टिस करानी है. :)


जब मुंबई लौट कर ये सब बातें अशोक जी को बताईं तो उनका चौंकना लाज़मी था ...अच्छा था हम चैट कर रहें थे वरना जिस तरह से वे चौंके थे अगर फोन पर बताती तो फोन उनके हाथों से गिर,अपनी  सदगति को प्राप्त हो गया होता:). उन्होंने कहा  " दुनिया कितनी छोटी है, न "..सच में दुनिया कितनी छोटी है ..और खूबसूरत  भी...फिर भी लोंग प्यार से एक-दूसरे की तरफ दोस्ती का हाथ नहीं बढाते बल्कि सामने हाथ बांधे , टेढ़ी गर्दन किए... तिरछी  नज़रों से देखते रहते हैं..{कितने ही चेहरे घूम गए नज़रों के सामने ..:) :) }

गुरुवार, 2 दिसंबर 2010

एक मुख़्तसर सी मुलाकात.......महफूज़ के साथ

लखनऊ  में बहन की शादी तय होने की खबर सुनते ही ,मैने लखनऊ जाने का प्लान बना लिया था. और लखनऊ जाऊं और महफूज़ से ना मिलूं ये तो मुमकिन ही नहीं.  महफूज़ के साथ हुए हादसे के बाद तो मिलने की इच्छा और भी बलवती हो गयी कि अपनी आँखों से देख लूँ..वो बिलकुल ठीक तो है.
पर गिरिजेश राव जी की तरह महफूज़ से भी यही कहा कि शादी की गहमागहमी से फ्री होते ही खबर करती हूँ. शादी संपन्न हो जाने के बाद मेरे पास दो दिन थे. इन्ही दो दिनों में महफूज़ से मिलने की  सोच रखा था .पर हुआ यूँ कि बारात वाले दिन मैं अपना मोबाइल चार्ज करना ही भूल गयी. दूसरे दिन बहन की विदाई के बाद बातें करते कब सो गयी पता ही नहीं चला. (दो तीन दिनों से सुबह तीन-चार बजे सोना...और शादी की रात का जागरण तो था ही ) मोबाइल स्विच्ड ऑफ हो चुका था. रात में ख्याल आया तो चार्जर लगाया.

 दूसरे दिन सुबह स्विच ऑन करते ही महफूज़ के मेसेज आने शुरू हो गए..."आप कहाँ है?"..."आप लौट तो नहीं गयीं"..."प्लीज़ कॉल मी"...अब जाकर अपनी लापरवाही  का अहसास हुआ .उस दिन तो महफूज़ से मिलना था. तुरंत  कॉल बैक किया.  पता चला, महफूज़ फोन कर-कर के परेशान था और मराठी में रेकॉर्डेड मेसेज सुन और परेशान हो गया कि शायद मैं बिना मिले लौट गयी.(ऐसा भला कैसे हो सकता है ) यह सुन और भी अफ़सोस हुआ कि उसने अपनी बहन आएशा के साथ घर आने का प्लान किया हुआ था. आएशा से भी मिलने का सुनहरा  अवसर गँवा दिया था, मैने. आज का दिन तो था पर मेरी शॉपिंग पूरी बाकी थी. चिकन के कुरते...टॉप, सलवार-सूट ,साड़ियों की ढेर सारी खरीदारी करनी थी और शाम की ट्रेन थी. हिचकते हुए महफूज़ से कहा तो उसने कहा ."कोई बात नहीं शॉपिंग ख़तम कर के घर आ जाइए फिर मुझे कॉल करिए .मैं घर पर मिलने आ जाऊँगा." मन ही मन सौ बार थैंक्स कहा उसे.

पर घर से 'अमीनाबाद  मार्केट' बहुत दूर था उस पर से  घर से निकलने में भी देर हो गयी. शादी के घर से निकलना  कितना मुश्किल होता है,सबको आभास होगा...कहीं कोई बहन,मौसी अटैची खोले बैठी होती है..और दूसरी कहती है."जरा ये साड़ी तो देखो..कितनी सुन्दर लग  रही है"...वहाँ ठिठकते हुए, आगे बढ़ो..तो कोई जेवर दिखा रहा होता है...कहीं कोई बच्ची प्यारा सा डांस कर रही होती है,  दो पल  को कदम रुक  ही जाते हैं.....दरवाजे से निकलने  को ही होते हैं कि कोई  काम करनेवाला  फरमाइश कर देता है..'जरा किचन से ये निकाल  कर दे दो" अब या तो खुद उनका काम कर दो..या किसी को ढूंढ कर सौंप दो...सब पूरा कर बाहर निकलो ..तो कुछ
एक्चुअली मैं शादी में इसमें बिजी थी..
बना बनाया जो मिल रहा था :)

बुजुर्ग, कुर्सी लगाए बैठे होते हैं..देखते ही आवाज़ देंगे.."जरा देखो तो कब से चाय के लिए कहा था...लाया क्यूँ नहीं अब तक.." अब वापस पूरी दूरी तय कर चाय के लिए ताकीद करने जाओ.. ..आप सोचते हैं,जल्दी से ऑटो ले निकल  जाएँ..पर किसी घर वाले की नज़र पड़ जाती है..और वे पीछे पड़ जाते हैं.."अरे इतनी गाड़ियां हैं..ऑटो से क्यूँ जाओगी...अरे जरा उसको बुलाओ..वो नहीं है..तो फलां को बुलाओ."....अब इंतज़ार करो..गाड़ी और ड्राइवर का..तो कहने का अर्थ ये कि इन सब अडचनों को पार करते हुए हमें मार्केट के लिए निकलने में दोपहर हो  गयी.

लखनऊ  की ट्रैफिक तो सुब्हानल्लाह ...कोई भी किधर से गाड़ी लिए घुसा चला आता है. वैसे ये boasting  नहीं है.पर मुंबई जैसी systematic  traffic कहीं नहीं है. हैदराबाद जैसे मेट्रो में भी देखा है...कोई extreme right lane से सीधा left turn ले लेता है. राम-राम करके मार्केट पहुंचे...और जल्दी-जल्दी खरीदारी शुरू की. दुकानदार सोच रहें होंगे ,'ऐसे कस्टमर रोज आएँ'. हम चार कुरते देखते और उसमे से दो सेलेक्ट कर लेते.  एक नज़र घड़ी पर थी और एक नज़र कपड़ों पर. शो केस में लगी कितनी ही पोशाकें ललचा रही थीं (अभी भी आँखों के सामने घूम रही हैं :( ) पर समय की कमी के कारण उन्हें ट्राई नहीं कर पायी.

महफूज़ का फोन भी आ रहा था."घर कब पहुँच रही हैं?"  पांच बज चुके थे .और घर जाकर सामान पैक कर वापस स्टेशन के लिए निकलना था. पौने आठ  की ट्रेन थी. किसी तरह शॉपिंग ख़तम की और ईश्वर से प्रार्थना  करते कि कोई ट्रैफिक जैम ना मिले ,घर की तरफ चले.

मेरे आने के कुछ ही देर बाद महफूज़ मियाँ भी अवतरित हो गए...एक सुन्दर सा बुके और मिठाई का पैकेट लिए. उसे बिलकुल स्वस्थ देख, सच बहुत ही ख़ुशी हुई . वही सदाबहार हंसी थी चेहरे पर...किसी अजनबियत की तो कोई गुंजाईश थी ही नहीं. पिछले एक साल में दोस्ती के हर रंग देख लिए हैं. महफूज़ को देखते ही मैने कह दिया.."तुम तो इतने छोटे लगते हो...अभी दो-चार साल शादी  ना करो तब भी "मोस्ट एलिजिबल बैचलर" का खिताब कहीं जाने वाला नहीं." ये चॉकलेट,मिठाई, बुके का जिक्र करना मुझे ठीक नहीं लग रहा. पर वे लोंग लाए थे तो कहना तो पड़ेगा ही..वैसे  ये सब  जरूरी नहीं ..मैने तो उनलोगों को कुछ भी नहीं दिया... बस  शादी की मिठाई ही ऑफर की ..वो भी मौसी की दी हुई....और हाँ एक और चीज़ दिया ....वो था...धन्यवाद  :).

....और ' शिखा, महफूज़  लाल रंग की टीशर्ट पहन कर नहीं आया था.:) ' मैं और शिखा, महफूज़ के  लाल रंग के ऑब्सेशन पर उसकी काफी खिंचाई करते हैं. {पता नहीं, पुरुषों को क्यूँ ये खब्त है कि वे रेड कलर में ज्यादा स्मार्ट दिखते हैं ...अब सारे पाठक अपनी रेड कलर की शर्ट, टी-शर्ट, कुरते  याद कर रहें होंगे...आपलोग कॉन्शस मत होइए, बेहिचक पहनिए :)

 पर महफूज़ से आराम से बैठकर बात तो हो ही नहीं सकी. कभी मैं भाग कर रिश्तेदारों को विदा करने जाती...कभी समान संभालती..कभी महफूज़ से दो बातें करती...महफूज़ को बड़ा अफ़सोस था, ' मेरे ममी-पापा से नहीं  मिल सका' वे स्टेशन के लिए निकल चुके थे. और मुझे अफ़सोस हो रहा था कि वक्त ही नहीं है...जरा

वैसे ,मैने  इतना सारा काम भी किया
आराम से बैठ कर बातें करें. बातों से ज्यादा बस अफ़सोस ही प्रकट होता रहा. एक घंटा  कैसे निकल गया  पता ही नहीं चला. कैमरा ऊपर ही पड़ा था पर एक फोटो लेने की भी याद नही रही...जबकि इतने भाई-बहन सामने थे..कोई भी खींच  देता. बहनों ने मेरे सारे समान  एक जगह जुटा दिए थे. पैकिंग भी कर रही थीं. पर एक बार देख कर सब लॉक तो मुझे ही करना था. इधर मौसी की पुकार भी चल रही थी, "कुछ तो खा लो" बड़े बेमन से महफूज़ को विदा कहा. अब अगली बार सब सिस्टमैटिक होगा. मोबाइल चार्ज करना हरगिज़ नहीं भूलूँगी.

महफूज़ से तो घंटे भर की ही मुलाकात थी..पर उसकी लाई स्पेशल मिठाई ,मेरे साथ मुंबई तक आई. गुझिया के आकार की मिठाई जिसकी पूरी पेठे की थी और अंदर खोया और ड्राई फ्रूट्स  भरा था..जरूर वहाँ की स्पेशियालिटी होगी क्यूंकि यहाँ मुंबई में नहीं मिलती. ट्रेन में मैने को-पैसेंजर्स को ऑफर किया...तो सब नाम पूछने लगे. अब मुझे तो पता ही नहीं था.(अब भी नहीं पता :( ) अली और अब्बास ने तो बस अंदर का खोया खाया और आउटर कवरिंग को चॉकलेट का रैपर समझते रहें. उनके  डैडी ने कितना कहा..'इसे भी खा जाओ...ये खाने की चीज़ है"...पर वे नहीं माने.. रैपर समझ फेंकने ही वाले थे कि डैडी जी ने उदरस्थ  कर लिया.

अपनी सहेलियों को भी खिलाया....उन्होंने  इसे अच्छा नाम दिया.."ये तो बिलकुल पान की तरह है.:)"  मेरे बच्चों ने भी कहा..'आंटी ने सही कहा...बिलकुल पान जैसा है.." और मेरे अंदर की माँ ने गंभीर होकर पूछ लिया.."तुमलोगों को कैसे पता..पान का स्वाद.....कब खाया?"  दोनों ने एक स्वर में कहा.."शादी में खाए हैं...." हाँ! शादी..में बच्चों को चाय-कॉफी-पान की छूट मिल जाती है. पटना  में अटेंड की एक शादी याद आ गयी...वहाँ बिलकुल एक नौटंकी कलाकार की तरह सजा-धजा एक पान वाला था...जो घूम घूम कर कुछ नृत्य जैसी मुद्राएँ बनाते हुए सबको अपने हाथों से पान खिला रहा था. नए से नए तरीके इंट्रोड्यूस हो रहें हैं.

महफूज़ ने बताया इस 'पान वाली  मिठाई' को  ऑनलाइन भी ऑर्डर कर सकते हैं...अब आप में से जो भी ऑर्डर करे..मेरा कमीशन मत भूलियेगा....आखिर मैने ही इसके बारे में बताया है आप लोगों को .:)

 (एक और ब्लॉगर  से मिलने का दिलचस्प किस्सा ..अगली पोस्ट में )

शनिवार, 17 जुलाई 2010

कितने युग और लगेंगे इस मानसिकता को बदलने में??


कोई भी घटना जब अपने चरम पर पहुंचती है तभी अखबारों की सुर्खियाँ बनती है. लेकिन उन सुर्ख़ियों तक पहुँचने की नीचे वाली पायदानों तक भी बहुत  कुछ घटित होता रहता है, समाज में. हम, अपनी रोजमर्रा की ज़िन्दगी में लिप्त,अपने समान विचारों वाले लोगों के बीच उठते बैठते,सीमित दायरे में क़ैद , यह जान ही नहीं पाते कि अभी तक कितनी ही कुरीतियों , उंच-नीच ,भेदभाव, और संकीर्ण मानसिकता से आप्लावित है हमारा ,दूसरे क्षेत्रों में तेजी से प्रगति करता समाज.

महानगरों की छोड़ दें तो बड़े शहरों में भी अभी तक 90% शादियाँ, अरेंज्ड ही होती हैं. और यहाँ वर पक्ष हमेशा विशिष्ट माना जाता है. लड़कीवाले उनके सामने बिछे जाते हैं और लड़के वालों के नखरों का अंत ही नहीं होता. कभी कभी तो ऐसी घटनाएं घटती हैं आँखों के समक्ष कि बार बार खुद को याद दिलाना पड़ता है कि यह किसी फिल्म का दृश्य नहीं...सच है.


करीब तीन साल पहले, मैं एक लड़की की शादी में शामिल हुई थी. लड़केवाले बहुत अमीर घराने से थे. लड़कीवालों ने पटना के सबसे अच्छे 'मौर्य' होटल में बहुत अच्छा इंतज़ाम किया था. बारात आई. बारात की सारी महिलायें लग रहा था अपना लॉकर पहन कर चली आई हैं. इतने सारे सोने के आभूषणों से लदी थीं. जयमाला हुई और अचानक चारों तरफ पुलिस मैन भर गए.पता चला उनके दो साथी नेता, अपने बौडी गार्ड एवं चमचों के साथ तशरीफ़ लाये हैं. तिल भर भी जगह नहीं बची हॉल में. हॉल के बाहर, पीछे, सब तरफ लोग ही लोग. लड़कीवाले दूसरे शहर से आकर शादी कर रहें थे,उनके मेहमान वैसे भी  काफी कम थे. जो थे, वो भी दीवारों से लग कर खड़े हो  गए.

जयमाल के बाद फोटो खिंचवाने का कार्यक्रम काफी देर तक चला. फिर बाराती, खाना खाने के लिए चल पड़े. हम महिलायें बैठकर बातें कर रही थीं. अचानक शोर सुनायी दिया. देखा दुल्हे के पिता एवं भाई गुस्से में दनदनाते हुए चले आ रहें हैं. पता चला,लड़के वाले 250  बाराती कह कर 500 बाराती ले आए और अब खाना कम पड़  गया है. जब लड़के के परिवार वाले खाना खाने गए, तब तक खाना ख़त्म हो चुका था.इसीलिए वे गुस्से में हैं...होटल वालों ने और खाना तैयार करने की मोहलत मांगी है और कुछ डिश बनाने में अपनी असमर्थता जताई  क्यूंकि उनके पास अब सामग्री नहीं थी.

पर ये लोग तो लड़के वाले थे. लड़के के पिता कह रहें थे ,बारात वापस जाएगी अब..दो-चार महीने बाद शादी की डेट फिक्स करेंगे. लड़की वाले सकते में आ गए. यहाँ दुल्हन मंडप में बैठी, रस्म का इंतज़ार कर रही थी. और लड़का उसी होटल के एक कमरे में (जो उन्हें आराम करने के लिए दिया गया था ) अपने दोस्तों के साथ बैठा था. कमरा अंदर से बंद था. मोबाईल का ज़माना है..शायद उसके पिता भाई ने मना कर दिया आने से. लड़की का भाई दरवाजा खटखटा कर परेशान, वहीँ सीढियों पर बैठ गया. लड़की के पिता एक तरफ सर पे हाथ धरे बैठे थे. लड़की की माँ ,रोती रोती बेहोश हो गयीं थीं. और लड़की के चाचा, उनके सामने हाथ जोड़ कर खड़े  थे और बाकी रिश्तेदार उन्हें मनाने  में जुटे थे.

होटल वालों ने आ कर खबर भी दे दी...कि खाना तैयार है.पर वे मानने को तैयार नहीं. यहाँ तक कि लड़के वालों की  तरफ से भी  एक बुजुर्ग उन्हें  समझा रहें थे. पर  वे लोग लड़कों वाले के गुरूर में इतने मदमस्त थे कि कुछ सुनने को तैयार नहीं.

यहाँ लड़की वालों की तरफ से एक बच्चे ने भी नहीं खाया था,कुछ भी. इस मान मनौव्वल  में रात के दो बज गए. उनकी  एक रिश्तेदार लन्दन से छुट्टियों में आई हुईं थीं, वे भी शादी में शामिल होने आई थीं और उसी होटल में रुकी हुई थीं. उनकी छोटी बेटी ने कहा, "मम्मा भूख लगी है.." और उसने अपनी बड़ी बेटी को बुला कमरे की चाबियाँ दीं और कहा,मेरे बैग में बिस्किट के दो पैकेट्स पड़े हैं वो ले आओ . फिर देखा रात के दो बजे, सजे-धजे दस-बारह बच्चे (मेरे बेटे भी शामिल थे,उनमे  ) एक गोल घेरा बना एक-एक बिस्किट खा रहें हैं. वो दृश्य जैसे स्थिर है, अब तक आँखों के सामने.

 3 बजे के करीब सबके मनाने  पर वे लोग माने और खाना खाने गए. बस एक पगड़ी नहीं रक्खी गयी, उनके पैरों पर, बाकी हर उपाय किए.(वो भी शायद इसलिए कि किसी ने पहनी नहीं थी वरना शायद वह भी रख देते.)  इसके बाद लड़के को बुलाया गया. और जल्दी जल्दी में सारी रस्मे निबटाईं गयीं. बाद में भी उनलोगों के बहुत नखरे रहें, जैसे लड़की  को मायके ना भेजना...उसी शहर के  रिश्तेदारों से ना  मिलने देना, वगैरह. पर सुकून की बात बस यही रही कि लड़की को कोई तकलीफ नहीं दी. क्यूंकि वह अब उनके घर की हो गयी थी.कम से कम इतना सोचना ही काफी था.

और ऐसा नहीं कि बिहार बहुत पिछड़ा प्रदेश है इसलिए वहाँ ऐसी घटना हुई. इस तरह की घटनाएं थोड़ा रूप बदल कर हर बड़े शहरों में देखने को मिल जाती हैं. ये "लड़के वाले " होने की मानसिकता इस युग में भी नहीं बदली.  आज तो लडकियां भी समान रूप से  शिक्षा ग्रहण कर रही हैं. माता-पिता उनकी शिक्षा में भी उतना ही खर्च करते हैं .पर जब दहेज़ और शादी में किए गए खर्च   की बात आती है , तो यह खर्च लड़की वालों को ही वहन करना पड़ता है.

और यह सब सिर्फ शादी तक ही नहीं सीमित नहीं रहता,आजीवन जैसे लड़कीवाले,लड़केवालों के कर्ज़दार होते हैं. इतनी सारी रस्में बनी हुई हैं, किसी ना किसी बहाने लड़कीवाले उनकी मांगे पूरी करते रहते हैं. शादी में दान-दहेज़ दिए, बच्चे के जन्म पर उपहार,बच्चे के अगर ऊपर के दांत आ गए तो मामा, चांदी की कटोरी में खीर खिलायेगा. गुजरात के एक सम्प्रदाय में  तो एक साल का होने तक बच्चा ननिहाल के कपड़े ही पहनता है. तीज-त्योहार पर कपड़े,पैसे भेजना.यहाँ तक कि शादी के 25 साल बाद भी बच्चों की शादी में , पूरे खानदान के कपड़े ननिहाल से आते हैं, जिसे यू.पी.में 'मामा का भात' कहते हैं. वृद्धावस्था  के कगार पर पहुंचे माता-पिता के लिए , अपने नाती-नातिनों की शादी में इतना कुछ जुटाना एक अतिरिक्त भार होता है,फिर भी लोग निभाते जाते हैं यह रस्म.

आखिर और कितने युग लगेंगे  इस मानसिकता को बदलने में??

फिल्म The Wife और महिला लेखन पर बंदिश की कोशिशें

यह संयोग है कि मैंने कल फ़िल्म " The Wife " देखी और उसके बाद ही स्त्री दर्पण पर कार्यक्रम की रेकॉर्डिंग सुनी ,जिसमें सुधा अरोड़ा, मध...