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शनिवार, 17 जुलाई 2010

कितने युग और लगेंगे इस मानसिकता को बदलने में??


कोई भी घटना जब अपने चरम पर पहुंचती है तभी अखबारों की सुर्खियाँ बनती है. लेकिन उन सुर्ख़ियों तक पहुँचने की नीचे वाली पायदानों तक भी बहुत  कुछ घटित होता रहता है, समाज में. हम, अपनी रोजमर्रा की ज़िन्दगी में लिप्त,अपने समान विचारों वाले लोगों के बीच उठते बैठते,सीमित दायरे में क़ैद , यह जान ही नहीं पाते कि अभी तक कितनी ही कुरीतियों , उंच-नीच ,भेदभाव, और संकीर्ण मानसिकता से आप्लावित है हमारा ,दूसरे क्षेत्रों में तेजी से प्रगति करता समाज.

महानगरों की छोड़ दें तो बड़े शहरों में भी अभी तक 90% शादियाँ, अरेंज्ड ही होती हैं. और यहाँ वर पक्ष हमेशा विशिष्ट माना जाता है. लड़कीवाले उनके सामने बिछे जाते हैं और लड़के वालों के नखरों का अंत ही नहीं होता. कभी कभी तो ऐसी घटनाएं घटती हैं आँखों के समक्ष कि बार बार खुद को याद दिलाना पड़ता है कि यह किसी फिल्म का दृश्य नहीं...सच है.


करीब तीन साल पहले, मैं एक लड़की की शादी में शामिल हुई थी. लड़केवाले बहुत अमीर घराने से थे. लड़कीवालों ने पटना के सबसे अच्छे 'मौर्य' होटल में बहुत अच्छा इंतज़ाम किया था. बारात आई. बारात की सारी महिलायें लग रहा था अपना लॉकर पहन कर चली आई हैं. इतने सारे सोने के आभूषणों से लदी थीं. जयमाला हुई और अचानक चारों तरफ पुलिस मैन भर गए.पता चला उनके दो साथी नेता, अपने बौडी गार्ड एवं चमचों के साथ तशरीफ़ लाये हैं. तिल भर भी जगह नहीं बची हॉल में. हॉल के बाहर, पीछे, सब तरफ लोग ही लोग. लड़कीवाले दूसरे शहर से आकर शादी कर रहें थे,उनके मेहमान वैसे भी  काफी कम थे. जो थे, वो भी दीवारों से लग कर खड़े हो  गए.

जयमाल के बाद फोटो खिंचवाने का कार्यक्रम काफी देर तक चला. फिर बाराती, खाना खाने के लिए चल पड़े. हम महिलायें बैठकर बातें कर रही थीं. अचानक शोर सुनायी दिया. देखा दुल्हे के पिता एवं भाई गुस्से में दनदनाते हुए चले आ रहें हैं. पता चला,लड़के वाले 250  बाराती कह कर 500 बाराती ले आए और अब खाना कम पड़  गया है. जब लड़के के परिवार वाले खाना खाने गए, तब तक खाना ख़त्म हो चुका था.इसीलिए वे गुस्से में हैं...होटल वालों ने और खाना तैयार करने की मोहलत मांगी है और कुछ डिश बनाने में अपनी असमर्थता जताई  क्यूंकि उनके पास अब सामग्री नहीं थी.

पर ये लोग तो लड़के वाले थे. लड़के के पिता कह रहें थे ,बारात वापस जाएगी अब..दो-चार महीने बाद शादी की डेट फिक्स करेंगे. लड़की वाले सकते में आ गए. यहाँ दुल्हन मंडप में बैठी, रस्म का इंतज़ार कर रही थी. और लड़का उसी होटल के एक कमरे में (जो उन्हें आराम करने के लिए दिया गया था ) अपने दोस्तों के साथ बैठा था. कमरा अंदर से बंद था. मोबाईल का ज़माना है..शायद उसके पिता भाई ने मना कर दिया आने से. लड़की का भाई दरवाजा खटखटा कर परेशान, वहीँ सीढियों पर बैठ गया. लड़की के पिता एक तरफ सर पे हाथ धरे बैठे थे. लड़की की माँ ,रोती रोती बेहोश हो गयीं थीं. और लड़की के चाचा, उनके सामने हाथ जोड़ कर खड़े  थे और बाकी रिश्तेदार उन्हें मनाने  में जुटे थे.

होटल वालों ने आ कर खबर भी दे दी...कि खाना तैयार है.पर वे मानने को तैयार नहीं. यहाँ तक कि लड़के वालों की  तरफ से भी  एक बुजुर्ग उन्हें  समझा रहें थे. पर  वे लोग लड़कों वाले के गुरूर में इतने मदमस्त थे कि कुछ सुनने को तैयार नहीं.

यहाँ लड़की वालों की तरफ से एक बच्चे ने भी नहीं खाया था,कुछ भी. इस मान मनौव्वल  में रात के दो बज गए. उनकी  एक रिश्तेदार लन्दन से छुट्टियों में आई हुईं थीं, वे भी शादी में शामिल होने आई थीं और उसी होटल में रुकी हुई थीं. उनकी छोटी बेटी ने कहा, "मम्मा भूख लगी है.." और उसने अपनी बड़ी बेटी को बुला कमरे की चाबियाँ दीं और कहा,मेरे बैग में बिस्किट के दो पैकेट्स पड़े हैं वो ले आओ . फिर देखा रात के दो बजे, सजे-धजे दस-बारह बच्चे (मेरे बेटे भी शामिल थे,उनमे  ) एक गोल घेरा बना एक-एक बिस्किट खा रहें हैं. वो दृश्य जैसे स्थिर है, अब तक आँखों के सामने.

 3 बजे के करीब सबके मनाने  पर वे लोग माने और खाना खाने गए. बस एक पगड़ी नहीं रक्खी गयी, उनके पैरों पर, बाकी हर उपाय किए.(वो भी शायद इसलिए कि किसी ने पहनी नहीं थी वरना शायद वह भी रख देते.)  इसके बाद लड़के को बुलाया गया. और जल्दी जल्दी में सारी रस्मे निबटाईं गयीं. बाद में भी उनलोगों के बहुत नखरे रहें, जैसे लड़की  को मायके ना भेजना...उसी शहर के  रिश्तेदारों से ना  मिलने देना, वगैरह. पर सुकून की बात बस यही रही कि लड़की को कोई तकलीफ नहीं दी. क्यूंकि वह अब उनके घर की हो गयी थी.कम से कम इतना सोचना ही काफी था.

और ऐसा नहीं कि बिहार बहुत पिछड़ा प्रदेश है इसलिए वहाँ ऐसी घटना हुई. इस तरह की घटनाएं थोड़ा रूप बदल कर हर बड़े शहरों में देखने को मिल जाती हैं. ये "लड़के वाले " होने की मानसिकता इस युग में भी नहीं बदली.  आज तो लडकियां भी समान रूप से  शिक्षा ग्रहण कर रही हैं. माता-पिता उनकी शिक्षा में भी उतना ही खर्च करते हैं .पर जब दहेज़ और शादी में किए गए खर्च   की बात आती है , तो यह खर्च लड़की वालों को ही वहन करना पड़ता है.

और यह सब सिर्फ शादी तक ही नहीं सीमित नहीं रहता,आजीवन जैसे लड़कीवाले,लड़केवालों के कर्ज़दार होते हैं. इतनी सारी रस्में बनी हुई हैं, किसी ना किसी बहाने लड़कीवाले उनकी मांगे पूरी करते रहते हैं. शादी में दान-दहेज़ दिए, बच्चे के जन्म पर उपहार,बच्चे के अगर ऊपर के दांत आ गए तो मामा, चांदी की कटोरी में खीर खिलायेगा. गुजरात के एक सम्प्रदाय में  तो एक साल का होने तक बच्चा ननिहाल के कपड़े ही पहनता है. तीज-त्योहार पर कपड़े,पैसे भेजना.यहाँ तक कि शादी के 25 साल बाद भी बच्चों की शादी में , पूरे खानदान के कपड़े ननिहाल से आते हैं, जिसे यू.पी.में 'मामा का भात' कहते हैं. वृद्धावस्था  के कगार पर पहुंचे माता-पिता के लिए , अपने नाती-नातिनों की शादी में इतना कुछ जुटाना एक अतिरिक्त भार होता है,फिर भी लोग निभाते जाते हैं यह रस्म.

आखिर और कितने युग लगेंगे  इस मानसिकता को बदलने में??

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