Thursday, May 6, 2010

माता-पिता की स्नेहिल छाया के अभाव में ज़िन्दगी की कड़ी धूप में जलती ये निरुपमायें

पता नहीं, निरुपमा की मौत का सच सामने आ पायेगा या नहीं. अगर मान लें , उसके माता-पिता ने हत्या नहीं की पर जमीन तो तैयार की ही उसकी आत्महत्या के लिए. और ये अकेला उदाहरण नहीं है हमारे समाज में,पता नहीं कितनी निरुपमायें, या तो मार दी जाती हैं, आत्महत्या कर लेती हैं या फिर तिल तिल कर जलती रहती हैं और उन्हें जन्म देने वाले स्नेहिल हाथ उनके सर की छाया नहीं बनते.

मेरी छोटी बहन सी एक सहेली है.जब से ब्लॉग पर लिखना शुरू किया.उसकी कहानी लिखने का मन था,उस से इजाज़त भी ले ली थी. क्यूंकि वह अब सुदूर दक्षिण के एक शहर में है और उसके परिवार का ना कोई मुझे जानता है,ना ब्लॉग ही पढता है.पर शायद जेहन में पलती यह कहानी इस क्षण के इंतज़ार में थीं.पर उसके पहले एक और सच्ची घटना का जिक्र कि कैसे पढ़े लिखे आधुनिक माता-पिता भी झूठी शान का शिकार हो जाते हैं. मुंबई के कोलाबा जैसे पौश इलाके में रहने वाले एक इसाई परिवार की लड़की का प्रेम एक इसाई लड़के से ही हो जाता है.पर वह गोवन कैथोलिक है .इसलिए माता-पिता मंजूर नहीं करते.उसे दक्षिण के एक गाँव में उसकी दादी के पास छोड़ आते हैं.और जल्दबाजी में उसकी शादी पास के एक शाहर के ,एक साधारण से युवक से कर देते हैं जो ड्रग एडिक्ट निकलता है. उसे मारता-पीटता है फिर भी वे कहते हैं निभाओ.लड़की नौकरी करने लगती है और एक दिन तंग आकर घर छोड़ एक रिश्तेदार के यहाँ शरण ले लेती है. उसके माता-पिता वहीँ उसे एक घर किराये पर लेकर उसका अकेले रहना मंजूर कर लेते हैं पर साथ में मुंबई लाने से इनकार कर देते हैं कि लोग क्या कहेंगे ??.और कुछ सालों बाद उनका इकलौता लड़का एक महाराष्ट्रियन से शादी कर लेता है और वे कुछ नहीं कर पाते.

अब मेरी छोटी बहन की कहानी. कुछ साल पहले वो मेरी बगल की बिल्डिंग में अपने पति और दो छोटे बच्चों के साथ शिफ्ट हुई. .उसे कभी चलते नहीं देखा मैंने...हमेशा भागती रहती. दोनों बच्चों के स्कूल का अलग समय. पति सुबह ८ बजे जाता और रात के दस बजे वापस आता. स्कूल,बाज़ार, डॉक्टरों के चक्कर सारा भार उसके ऊपर ही था. इस बीच मुंबई  घूमने वाले रिश्तेदारों का हुजूम भी आता रहता और उन्हें ले चिलचिलाती धूप में कभी वह शौपिंग के लिए लेकर जाती,कभी मुंबई दर्शन को. पर मुझे देख ख़ुशी होती वह हमेशा चहकती  रहती और यहाँ के अनुरूप ढाल लिया था खुद को.एक दिन बातों बातों में 'दीदी' का संबोधन देकर तो हमेशा के लिए ही दिल में जगह बना लिया उसने. फिर भी कभी घर आना-जाना नहीं था. मेरे बच्चे बड़े, उसके छोटे.हमारी फ्रेंड सर्किल अलग थी.और समय की कमी भी एक बड़ी वजह थी.

एक दिन उसकी बेटी का आइ-कार्ड मुझे गेट के पास पड़ा मिला और मैंने सोचा घर दे आऊं,वो परेशान होगी. जब उसने दरवाजा खोला,तो देखा उसकी आँखें पनीली और लाल थीं. पूछने पर जबरदस्ती मुस्कुराते  हुए बोली,'नहीं..ऐसे ही सर में बहुत दर्द था'.पता नहीं कैसे मैंने जबरदस्ती ही उसके घर के अंदर कदम रख दिया.और उसके आंसुओं का बाँध टूट गया. उसने अपनी पूरी रामकहानी बतायी कि उसका पति इतना पढ़ा-लिखा है, इतने अच्छे पद पर है पर बहुत गुस्सैल है. छोटी छोटी बातों पर नाराज़ हो कर चीजें  उठा कर फेंक देता है और उसपर हाथ भी उठाता है. गाली-गलौज करता है और फिर दिनों तक बात नहीं करता. जब मैंने पूछा तुमने अपने माता-पिता को नहीं बतायी,ये बात? तब उसने कहा,हर बात बतायी है. शादी के  एक साल बाद ही ये सब शुरू हो गया.तब से ही सबकुछ बताया है.पर वे लोग ,बस कहते हैं..गुस्सा आ जाता है उसे. तुम गुस्सा मत दिलाया करो. ये सब चलता रहता है. उसने इतना आजिज होकर कहा  कि वह  सिर्फ इतना चाहती थी कि कभी वे प्यार से ही उसके पति से पूछें कि' वह हाथ क्यूँ उठाता है?' पर उन्होंने  जैसे आँखें ही बंद कर ली हैं. अपने रिश्तेदारों में पड़ोसियों में वे दामाद के गुण गाते नहीं थकते कि वह इतना कमाता है. बच्चे इतने अच्छे स्कूल में पढ़ते हैं. इतने कीमती तोहफे उन्हें लाकर देता है. बेटी के सुख की उन्हें कोई चिंता नहीं है.

वो पढ़ी लिखी है ,अपने पैरों पर खड़ी हो सकती है. पर कितनी तनख्वाह मिलेगी उसे? कहाँ रहेगी? दोनों बच्चों की देखभाल ,भरण-पोषण कैसे करेगी? ये सारे सवाल उसे तलाक के लिए सोचने नहीं देते. उसका एक भाई भी है ,उच्च पद पर है पर समझता है ये सब उसके पिता की जिम्मेवारी है. पिता क्लास वन पोस्ट से रिटायर हुए हैं. पर उनकी भी बस वही चिंता है, "लोग क्या कहेंगे ?"
मुंबई से  जाने के पहले तक जब भी वो नीचे मिली मुस्कुराती हुई ही मिली. कभी पूछने पर कह देती, 'सब कुछ वैसा ही है..पर क्या करूँ बच्चों का मुहँ देख कर हंसती रहती हूँ,नहीं तो उनपर असर पड़ेगा." फोन पर भी यही कहती है.

और यह अकेली लड़की नहीं है,पता नहीं कितनी लडकियां अंदर से यूँ तिल-तिल मर कर भी ऊपर से मुस्कुरा रही होंगी. उनके माता-पिता ,निरुपमा के मात-पिता से कैसे अलग है? यह तो उनकी लड़कियों की हिम्मत है कि वे सब सह रही हैं और मौत को गले नहीं लगा रहीं. जो ज्यादा भावुक ,कमजोर होती हैं वे ख़ुदकुशी कर ही बैठती हैं.
ऐसा लगता है, जैसे लड़कियों  के जन्म के साथ ही उनके लिए एक खुदी कब्र भी साथ चलती है. और एक सन्देश दे दिया जाता है,हर पल उसे अपनी नज़रों के सामने रखो, कुछ भी लीक से हट कर किया  तो खुद कूद जाओ या उसमे धकेल दी जाओगी .

49 comments:

  1. रश्मि कल ही दीपक की एक लघु कथा पढ़ी थी .." लोग क्या कहेंगे " और आज आपकी ये पोस्ट पढ़कर मन भर आया है ....ये कहानी किसी एक निरुपमा या आपकी छोटी बहन की नहीं है ..ऐसी लड़कियां हर दूसरे घर में मिलेंगी आपको और ये दुर्भाग्य है हमारे समाज का कि जन्म देने वाले माता - पिता, बेटी शादी करके गंगा नहा लेते हैं ..उसके बाद बेटी का जो भाग्य हो निभाये उसे.. उसकी समस्याओं को सुलझाना तो दूर सुनने तक तो तैयार नहीं होते वे ..अब ऐसे हालात में कोई लड़की क्या करे या तो सहती रहे या जान दे दे..और विकल्प क्या है उसके पास ...और अगर सर उठाया तो कलम कर दिया जायेगा.....

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  2. har shabd sahii haen aur aesi naa jaanae kitni satya kahaniyon sae roj mera parichay hotaa haen

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  3. रश्मि,

    ये वर्षों की परंपरा है की लड़की की शादी कर दी और माँ बाप की जिम्मेदारी ख़त्म, किसकी क्या कहन्नि९ है, इसको देखने की फुरसत नहीं. अपने लड़के और बहुओं से मतलब होता है. और जब कहीं से आसरा नहीं होता तो लड़की कहाँ जाए? हम आज जहाँ आधुनिकता की बात कर रहे हैं, लड़की आज आत्मनिर्भर होने के बाद भी क्या क्या झेल रही है? इस बारे में बहुत खोज की है और कभी इसको प्रस्तुत करके बताउंगी . जिनको वाकई सहारे की जरूरत है, उनको माँ बाप को सहारा देना चाहिए शादी के बाद भी वे आपकी संतान हैं. माता पिता के साया बहुत शक्ति देने वाला होता है. माँ के आँचल में मुंह छिपा कर रोने का हक़ मत छीन लिया करें.

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  4. "लोग क्या कहेंगे ?"

    यह मानसिकता भी महिलाओं के लिए घातक साबित हो रही है...
    ऐसी लडकियां हज़ारों नहीं, लाखों मिल जाएंगी...
    पहले तो लड़कियां माता-पिटा को कुछ बता नहीं पातीं...
    जो बता भी देतीं हैं तो उनसे यही कहा जाता है कि अब यही उनका नसीब है...
    ऐसे में तिल-तिल कर मरने के सिवा उनके पास चारा ही क्या रह जाता है...

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  5. रेखा जी, रचना जी,शिखा एवं फिरदौस...मन बहुत क्षुब्ध है...ये सब लिखते हुए किस दर्द से गुजरी हूँ...बताना मुश्किल है...बस संतोष है..हम सबकी सोच एक जैसी है..और एक नारी का दर्द समझते हैं हम.

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  6. रश्मि जी आपने बहुत से मुद्दो को एक साथ समेट लिया है लेकिन इस सबका सार एक ही है और वो ये कि जिन्दगी, परिवार और बच्चो के बारे मे हमारी सोच की वुनियाद गलत है. किसी मा वाप को दोष दे देने से ये समस्या हल नही होगी. लडकियो को जो सीख दी जा रही है और जो जीवन की डोर उनके हाथ मे पकडाई जा रही है बहुत से प्रश्नो पर चिन्तन यहा से शुरु करना पडेगा. समाज हम सबसे मिलकर ही बना है.

    अच्छे पदो पर बैठे हुए लोग घर मे ठीक आचरण नही करते इसले लिये कौन जिम्मेदार है ? यही हमारी सोच. लडके से यही चाहना होती है कि किसी तरह खूब पढलिखकर बडा अधिकारी बन जाये. बहुत कम परिवारो मे मानवीय गुणो के आधार पर सपूत का आन्कलन होता है. मैने खुद अपने घर मे ये जन्ग लडी है और ये सन्तोष भी है कि लडते-लडते थका जरूर पर हारा नही.

    जिन कहानियो का जिक्र आपने किया ऐसी कहानिया चारो ओर बिखरी हुई है लेकिन एक दिन मे इन समस्याओ का कोई समाधान नही होता. हम माता पिता को दोष देकर अपने कर्तव्य की इतिश्री नही कर सकते. कल हमे भी अपने बच्चो के फ़ैसले देखने को मिलेन्गे, कौन जाने हमारे फ़ैसले क्या होगे. हम सबकी ये जिम्मेदारी तो बनती ही है कि हम अपने बच्चो को ये विश्वास दे कि हम उनकी खुशियो के दुश्मन नही है और हमसे अपने डर और परेशानिया सान्झा करके उन्हे कोई नुकसान नही होने जा रहा है. कई बार बच्चे गलती करते है और अपने मन मे बहुत डर बैठा लेते है और ग्लानि और निराशा मे डूब जाते है मा वाप से खुलकर वो इससे बच सकते है.

    आओ मेरे देश के माता पिताओ सन्कल्प ले कि अप्ने बच्चो को ये यकीन दिलने की पूरी ईमानदार कोशिश करे कि हर हाल मे हम उनके साथ है.

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  8. मेरे दोस्त की एक बहन है जो मेरे दोस्त से बहुत बड़ी थी , करीब २ साल पहले उसकी शादी हुई , माँ बाप उसकी शादी अपने मर्जी करना चाहते थे परंतु वह किसी और से प्यार करते थी । मेरे दोस्त के पापा नें फिर भी उसकी शादी जबरदस्ती कर दी , लड़का इंजिनीयर है । लड़का बहुत ही सभ्य और अच्छे घर से था , वह उससे बहुत प्यार करता था । शादी के कुछ दिंन बाद मेरे दोस्त की बहन को पता चला कि शादी से पहले वह जिस लड़के से प्यार करती थी वह पहले से शादी शुदा और एक बच्चे का बाप भी था । ये सब जानकर मेरे दोस्त की बहुन को बहुत दुःख हुआ ।

    जवाब उपेक्षित है ।

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  9. @ हरी जी ! ठीक कहा आपने कि अपनी कमजोरियों के लिए माँ - बाप को दोष देना ठीक नहीं ....परन्तु क्या शादी के बाद बेटी अनाथ हो जाती है ? उसका अपने माँ बाप पर कोई भावात्मक हक़ भी नहीं रहता ? यदि कभी वह मुश्किल में है तो माँ - बाप का इतना फ़र्ज़ भी नहीं कि उसे और कुछ नहीं तो भावात्मक सहारा ही दे सकें या उसके साथ उसकी परेशानियों में खड़े रह सके ...जबकि बेटे के साथ हर परिस्तिथि में वे साथ होते हैं अपना सब कुछ बेचकर भी उसे परेशानी से निकालने पर अमादा रहते हैं .आज अगर निरुपमा कि जगह कोई लड़का होता जिसकी कहीं नाजायज औलाद होती तो क्या उस लड़के के साथ भी इसी तरह का व्यवहार करते उसके जन्म दाता ?
    अगर बहु ऐसी बद्द्मिजाज हो (जैसा कि रश्मि जी ने अपनी पोस्ट में अपनी सहेली के पति को बताया है)...तो क्या तब भी माँ बाप अपने बेटे को सब कुछ झेलने की और निभाने की सलाह देते.? कभी नहीं उसे यही कहा जाता कि छोड़ दे ....परन्तु बेटी को हर हाल में सहने और निभाने कि सलाह ही दी जाती है.और लोग क्या कहेंगे के डर से अपने घर के तो क्या अपने दिल तक के दरवाजे बंद कर दिए जाते हैं.

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  10. हमारे समाज को सोच बदलने की दिशा में अभी बहुत चलना है.

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  11. नारी को एक सम्मानित और अपनी इच्छा का जीवन जीने का हक़ खुद लड़ के लेना होगा माता पिता भाई बहन या पति दोस्त किसी से भी साथ कि उम्मीद नहीं करना चाहिए क्योकि तब वो हक़ कभी हासिल नहीं हो पायेगा | हर नारी को अपने लिए खुद ही लड़ना होगा जब तक वो अपनी सहने कि आदत नहीं बदलेंगी तब तक उन्हें ये सब सहना ही पड़ेगा | जब हम पहला अत्याचार नहीं सहेंगे और कडाई से उसका विरोध करेंगे तो अगली बार आप से कोई गलत वयव्हार करने से पहले जरुर एक बार सोचेगा | रही बात माता पिता से भावनात्मक सहयोग कि तो मुझे लगता है कि ये भावनाए ही है जो हमें पुरुषो के आगे कमजोर बना देती है | उसके लिए दिल में क्यों भावनाए रखना जो अपने दिल में आप के लिए कोई भावना न रखता हो |

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  12. शब्दों का प्रवाह रुक जाता हैं और कुछ समझ नहीं आता कि कहा जाये और क्या करा जाये....कौन जिम्मेदार हैं, समाज, औरत, पुरुष, रिश्तेदार......औरत पर जुल्म होता हैं तो वो चुप रहती हैं......समाज में बातें न बनने लगे, यह सोच कर चुप हो जाती हैं......पति तो पत्नी पर जुल्म करता हैं, सास भी करती हैं जो खुद एक औरत हैं......पत्नी जब तक खुद नहीं बोलेगी, कुछ नहीं होगा......औरत भी जुल्म कर रही हैं........झूठे दहेज़ उत्पीडन के केस रोज सामने आते हैं.......

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  13. रश्मि आज इस बारे मे कुछ नही कहुँग़ी सिर्फ़ मेरि ये रचना ही बोलेगी जो काफ़ी वक्त पह्ले मैने लिखी थी।

    "औरत का घर?"

    सदियों से औरत अपना घर ढूंढ रही है
    उसे अपना घर मिलता ही नही
    पिता के घर किसी की अमानत थी
    उसके सर पर इक जिम्मेदारी थी
    हर इच्छा को ये कह टाल दिया
    अपने घर जाकर पूरी करना
    पति के घर को अपनाया
    उस घर को अपना समझ
    प्यार और त्याग के बीजों को बोया
    खून पसीने से उस बाग़ को सींचा
    हर आह,हर दर्द को सहकर भी
    कभी उफ़ न किया जिसने
    उस पे ये इल्जाम मिला
    ये घर तो तुम्हारा है ही नही
    क्या पिता के घर पर देखा
    वो सब जो यहाँ तुम्हें मिलता है
    यहाँ हुक्म पति का ही चलेगा
    इच्छा उसकी ही मानी जायेगी
    पत्नी तो ऐसी वस्तु है
    जो जरूरत पर काम आएगी
    उसकी इच्छा उसकी भावना से
    हमें क्या लेना देना है
    वो तो इक कठपुतली है
    डोर हिलाने पर ही चलना है
    ऐसे में औरत क्या करे
    कहाँ ढूंढें , कहाँ खोजे
    अपने घर का पता पूछे
    सारी उम्र अपनी हर
    हर तमन्ना की
    बलि देते देते भी
    ख़ुद को स्वाहा करते करते भी
    कभी न अपना घर बना सकी
    सबको जिसने अपनाया
    उसको न कोई अपना सका
    आज भी औरत
    अपना घर ढूंढ रही है
    मगर शायद ......................
    औरत का कोई घर होता ही नही
    औरत का कोई घर होता ही नही

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  14. 'लोग क्या कहेंगे' ....इसी की चिन्ता मे तो भारत दुबला रहा है।

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  15. ये बात सही है की हमारे समाज में बेटी की शादी करने के बाद माँ बाप सोच लेते हैं की अब सारी ज़िम्मेदारी ससुराल वालों की है या लडकी को खुद ही निभाना है...सब ठीक है तो उसका अच्छा नसीब और यदि कुछ बुरा हुआ तो उसका दुर्भाग्य बस....इसके आगे कोई साथ नहीं देता....

    सोचना ये है की अब तक जो हो गया हो गया..पर क्या आज के बाद हम जो माता पिता हैं क्या बेटियों का साथ देंगे....लकीर पीटने से कुछ नहीं होना....आगे के लिए संकल्प लेना है...

    या फिर हम भी वही समाज का रोना रोते हुए कि लोग क्या कहेंगे पुरानी लकीर को पीटते चले जायेंगे....

    ये सच है कि घर परिवार के लिए मोह रखते हुए बहुत कुछ दांव पर लगती हैं नारियाँ...पर अब खुद के अस्तित्व कि तलाश भी करनी चाहए...जो सही लगे उसका साथ दें और जो गलत हो उसका विरोध करें...

    पर इसका ये मतलब नहीं है कि उन्छ्ख्रल बन जाएँ...अपनी बात में दृढ़ता होनी चाहिए बस...

    अब पता नहीं क्या क्या लिख गयी हूँ...पर तुमने जो उदाहरण दिए हैं उनको मध्य्नाज़र रख कर ही ये भाव मन में उठे....

    एक ही बात कि ....खुद का दीपक स्वयं बनो...

    एक बहुत सार्थक पोस्ट है

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  16. बच्चों को सेंसिबल होने की जरूरत है .....

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  17. बहुत सा ऐसा कुछ अपने आस-पास देखते हुवे मिल जाता है ... पर हर बार अफ़सोस होता है ये देख कर की बस लड़की को ही समझौता करना पढ़ता है ... हालात या हमारा समाज जो पुरुष प्रधान समाज है शायद इस बात को समझने को तैयार ही नही है ....

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  18. ऐसा लगता है, जैसे लड़कियों के जन्म के साथ ही उनके लिए एक खुदी कब्र भी साथ चलती है.'
    और फिर 'लोग क्या कहेंगे ??' क्योकि वह लड़की है. यह प्रश्न कभी लड़कों के लिये क्यों नहीं आता??

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  19. एक सार्थक बहस आकार ले रही है.
    ॒ Blogger shikha varshney - शिखा जी हमारी और आपकी बात मे बहुत अन्तर नही है लेकिन मै समस्या को व्यापक अर्थो मे लेके चल रहा हू.

    दुनिया मे जो भी क्रन्ति होती है वो अपने वाहको को नुकसान पहुचाती है. अन्तर्जातीय विवाह अब खूब हो रहे है लेकिन आम प्रचलन मे नही है. इसलिये इस ओर कदम बढा रहे लोग सहजता से सामाजिक और पारिवारिक स्वीक्रिति की उम्मीद लगाते है तो ये खुद को धोखा देने जैसा है. माता पिता को अपने इरादे बता दिये और उनके विचार जान लिये फिर फ़ैसला जो भी हो तुरन्त होना चाहिये. धैर्य हमेशा मन्गलकारी नही होता.

    दीपक की पोस्ट मैने पढ ली थी. इस पर हमारी चर्चा भी हो गई थी यथार्थ यही है कि हमारी प्रगतिशीलता भी क्रमिक है.

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  20. नारी तुम केवल श्रद्धा हो विश्वास रजत नग पद तल में,पियूष स्रोत सी बहा करो, जीवन के सुन्दर समतल में

    उपरोक्त पंक्तिया जो की मेरे प्रिय कवि द्वारा रची गयी थी छायावाद युग में, इस काल में अपनी अर्थ खो चुकी है , नारी को अब केवल श्रद्धा नहीं , दुर्गा भी बनना होगा,. वो किसी मनु से किसी तरह कम नहीं है. जहा तक सवाल है लोग क्या कहेंगे का , ऐसे रुढ़िवादी सोच वाले नारी विकास में बाधक है और समाज के कोढ़ भी., और माँ तो माँ होती है चाहे बेटा हो या बेटी ., मुझे तो लगता है की माँ बेटी के ज्यादा करीब होती है EMOITIONALLY.

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  21. रश्मि जी रुला दिया आपने…
    कितना निष्ठुर है ख़ुद को सहिष्णु कहने वाला समाज
    जैसे हर घर में एक यातनागृह पल रहा हो…पता नहीं कब तक…पता नहीं…

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  22. यहाँ जो उदाहरण मिथिलेश जी ने दिया है उस ओर भी देखने की जरूरत है।

    आप को शायद याद होगा कि कमल हसन की एक फिल्म आई थी - एक दूजे के लिए.......उस फिल्म का असर था कि बहुत सारे अंतर्जातीय विवाह हुए थे और उसी दौरान कई प्रेमियों ने फिल्म की देखा देखी आत्महत्या भी की थी।
    और उसी दौरान ही मेरे पड़ोस में भी एक विवाह हुआ जिसमें लडका उत्तर का और लडकी दक्षिण की थी। एक दो महीने ठीक चला...जब लडका अपने गाँव लडकी को ले गया तो पहले तो उसे तिरस्कार मिला अपने गाँव में...लेकिन धीरे धीरे लोगों ने उन लोगों को स्वीकार कर लिया।

    अब आगे हुआ यह कि परिवार वालों द्वारा स्वीकृत होने के बावजूद कुछ समय बाद लडकी को उत्तर भारत का समाज नागवार गुजरने लगा और धीरे धीरे मामला बिगड़ता गया।

    अंत...अलगाव हुआ। आज वह लडकी दक्षिण भारतीय लडके के साथ विवाह कर कहीं और रह रही है और ये महाशय एक दो साल की आहत भावनाओं के नजारे लिए घूमते रहे.....बाद में एक दूसरा विवाह किए....उत्तर भारत की लडकी के साथ..जात बिरादरी वाली के साथ।

    तो मेरा यह कहना है कि अपनी मर्जी से की गई शादियां भी नाकाम हुई हैं और मां- पिता की मर्जी से की गई शादियां भी। अब यह जोडों पर निर्भर करता है कि वह क्या और कैसे निबाह ले जाते हैं।

    और हर एक चीज के लिए मां बाप को दोष देना भी ठीक नहीं। उनकी भी आखिर ढेरों मजबूरियां होती है। हम यदि समर्थ हैं तो लगता है कि बाकी भी हमारी तरह समर्थ-संपन्न होंगे...लेकिन एक बार उन मां बाप के स्तर पर भी सोच कर देखा जाय जो अपने अभाव में जीते हुए भी बच्चों के लिए कुछ न कुछ करने, बनाने की ओर लगे रहते हैं....वह कोई दुस्मन तो होते नहीं अपने बच्चो के उनकी भी इच्छा होती है कि हमारे बच्चे अच्छे घर विवाह करें...यह अलग है कि कई मजबूरियों के चलते वह अपने सपने पूरा नहीं कर पाते।

    मेरा मानना है कि शादी विवाह का फैसला जितना हो सके सबकी सहमति से किया जाय न कि केवल अपनी मर्जी देखी जाय...फिल्मों में अच्छा लगता है अपनी मर्जी, अपनी दुनिया की बात....बाकी तो चिडिया या चिड़ा कितना भी उड़े उन्हें आखिर को धरती पर ही उतरना पड़ता है।

    लोग फैसला लें लेकिन जैसा कि संगीता स्वरूप जी ने कहा कि उछृंखल होकर नहीं, बल्कि गंभीरता से सोच समझ कर फैसला करें.

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  23. ये एक या दो निरुपमा की नहीं... कई निरुपमाओं की कहानी है... इलाहाबाद में अपने शोध के दौरान एक ग्रुप के साथ काम कर रही थी. तब हर दूसरे-तीसरे दिन ऐसे केस आते थे. उनकी केस-स्टडी लिखते-लिखते मन जाने कैसा-कैसा हो जाता था. लगभग साठ से सत्तर प्रतिशत औरतों की यही कहानी... पति चाहे जैसा भी हो, निभाना है. पति जानता है कि उसे कोई कुछ नहीं कहेगा, इसलिये मनमानी करता है... और पत्नियाँ अपने बच्चों के लिये सब सहती जाती हैं.
    रश्मि दी, मेरा मानना है कि अगर माता-पिता और रिश्तेदार दबाव बनायें, तो ये प्रवृत्ति कम हो सकती है. मैंने अपने एक बहुत करीबी दोस्त को देखा है, पालन-पोषण ऐसा होता है कि औरतों पर हाथ उठाना ये लोग गलत समझते ही नहीं है, और लोग भी आपस की बात समझकर बीच में बोलते नहीं है. लेकिन जब सार्वजनिक रूप से ये मुद्दा उठाया गया, तो मेरे उस दोस्त की बात-बात में चपत लगा देने की प्रवृत्ति पर रोक लगी... चपत लगाने को हम प्यार समझ लेते हैं, पर यही आगे चलकर मारपीट में बदल जाता है.
    इसलिये औरतों को भी चाहिये कि सबसे पहले हाथ उठाने पर प्रतिकार करें... पर प्रश्न यही है कि कोई उनका साथ न दे तो क्या करें वो...और खुद जन्म देने वाले माँ-बाप ही साथ छोड़ दें तो... तब तो कोई भी अपने को असहाय पाता है और जीवन घुट-घुटकर जीने को अभिशप्त होता है.
    @ हरि शर्मा, मैं हरि जी के विचारों का सम्मान करते हुये उनसे ये कहना चाहती हूँ कि समस्या को व्यापक रूप से देखना अच्छी बात है... लेकिन घरेलू हिंसा के केसेज़ में परिवार और रिश्तेदारों का दबाव एक बहुत बड़ी भूमिका निभाता है. पहले के संयुक्त परिवारों में इसीलिये मार-पीट की घटनायें कम होती थीं क्योंकि घरवालों का दबाव होता था. बात ये है कि कोई भी घरेलू हिंसा जैसे मामले को बाहर लाना ही नहीं चाहता "लोग क्या कहेंगे" के डर से. इस डर कि भुलाकर अगर माता-पिता अपनी पुत्री का साथ दें, तो बहुत से मसले आप ही सुलझ जायें... समस्या के व्यापक समाधान की तो सोचना ही चाहिये, पर इस समस्या का तात्कालिक समाधान यही है कि समाज घरेलू हिंसा के मामलों को व्यक्तिगत न समझे और माता-पिता अपनी लड़की के वास्तविक सुख की ओर ध्यान दें, न कि इस बात पर कि उसका पति कितनी अच्छी पोस्ट पर है और कितना अधिक कमाता है.

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  24. रश्मि तुम्हारे आलेख मुझे बहुत प्रभावित करते हैं.......

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  25. सतीश जी,
    आपने 'प्रेम विवाह ' को केंद्र में रखकर टिप्पणी की है. पर मेरा मुद्दा है कि माता -पिता लड़कियों का कितना साथ देते हैं? लडकियां जब मुसीबत में होती हैं तब कितना सहारा बनते हैं उनका? और इसका सम्बन्ध , समर्थ और विपन्न होने से नहीं है. एक सोच से है कि शादी कर दी ,हमारी जिम्मेवारी ख़त्म.

    कौन सी मजबूरियाँ होती हैं, माता-पिता की कि वे अपनी संतान के लिए सहारे की दीवार बन कर नहीं खड़े हो सकते. आज इतने सारे क़ानून बन गए हैं कि कोई चाहे तो उनकी लड़कियों को टेढ़ी आँख से देख भी ना सके.पर कानून खुद चल कर मदद करने नहीं आयेगा. उसका सहारा लेने की जरूरत है और उसकी जरूरत भी नहीं पड़ेगी, अगर सताने वाले को यह पता चल जाए कि अपनी लड़की के पीछे उसके माता-पिता खड़े हैं. और जरूरत पड़ने पर क़ानून का सहारा ले सकते हैं.आधी समस्याएं वहीँ सुलझ जाएँगी .पर नहीं आज भी लड़की को सबकुछ चुपचाप सहने की शिक्षा दी जाती है.
    वे चाहते हैं सुखी देखना ,अपनी बेटियों को पर बस उपरी तौर पर और दुनिया की नज़रों में.

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  26. रुला दिया आपने.





    बचपन से सुना था

    माँ के मुँह से

    कि

    यह घर मेरा नहीं है

    जब मैं बड़ी हो जाऊँगी

    तो मुझे

    शादी होकर जाना है

    अपने घर.


    शादी के बाद

    ससुराल में सुना करती हूँ

    जब तब...

    अपने घर से क्या लेकर आई है

    जो यहाँ राज करेगी?

    यह तेरा घर नही है,

    जो अपनी चलाना चाहती है...

    यहाँ वही होगा जो हम चाहेंगे,

    यह हमारा घर है, हमारा !

    कुछ समझी?

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  27. रश्मि जी,

    जहां तक कानून की बात है तो वह हम आप सब जानते हैं कि कानून केवल जबर लोगों के लिए है, पैसे वालों के लिए है...आम इंसान के लिए नहीं....।

    एक डेढ़ साल पहले NDTV पर देखा था कि एक रिटायर्ड कैबिनेट सेक्रेटरी कह रहे थे कि आज किस कर्मचारी को पड़ी है कि वह अपना फर्ज निभाए...कानून को लागू करे...गर्ज किसे है....जबकि सरकारी तनख्वाह समय से मिलती रहे...।

    उनका यह कहना कि गर्ज किसको है...एक सच्चाई है।

    माता -पिता यदि कम्पलेंट लेकर जाते भी हैं तो थाने पर ही समझाईश शुरू कर देता है पुलिसवाला....थाने पर ही पैसे ले दे का खेल शुरू हो जाता है।

    कानून लागू करने में बंधी बंधाई तनख्वाह मिलने पर सरकारी कर्मचारियों के लिए कही गई बात 'गर्ज किसे है' बहुत मायने रखती है।

    रही बात माता पिता जब साथ दे तो आधी समस्या वहीं हल हो जाएगी - से पूरी तरह सहमत हूँ। यदि माता पिता थोडा भी सहारा देते हैं तो बिटिया में हिम्मत आ जाती है और सामने वाले को ललकार सकती है कि तू है कौन....लेकिन माता पिता भी उसी सिस्टम को देखताक कर दब से जाते हैं।

    और मेरा तो यह मानना है कि यदि बिटिया को यदि ससुराल वालों की तरफ से तकलीफ हो तो माता पिता को चाहिए कि उसे अपने साथ ले लें। बुला लें अपने पास। उसे अपने पैरों पर खड़ा होना सिखाएं। लेकिन यह सब इतना आसान नहीं है। लडकी के भाई तो अपनी बहन को तवज्जो देंगे लेकिन उसकी भाभी तो वह लगाव न रखेगी।

    यहां फिर वही बात कि औरत ही औरत की दुश्मन होती है लागू होती है।

    इस पर ढेरों बातें लिखी कही जा सकती हैं, लेकिन फिर वही ढाक के तीन पात।

    क्या कहूँ...बहुत कुछ पुराने ख्यालों से भी सोचता हूँ...और बहुत कुछ नये से भी....इन दोनों के बीच चलना ठीक रहेगा....यही कह सकता हूँ फिलहाल।

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  28. समाज के सच को बयां करती पोस्ट. लोग क्या कहेंगे? ये एक ऐसा कीड़ा है जो न जाने कितने लोगों के जिंदगी की दिशा बदल देता है. पता नहीं लोग क्यों नहीं समझते जब हम सब जुड़ते है तभी तो ये समाज बनता है, हर इंसान खुद को मजबूत कर ले तब ये समाज भी बदल जायेगा. मैंने भी बहुत सी पढ़ी लिखी लड़कियों को बहुत कुछ सहते हुए देखा है, क्यूंकि बचपन से ही लड़कियों को सीखा दिया जाता है सहन करना लड़की की ताकत है, पर पता नहीं क्यों समझ नहीं पाते हम कि गलत सहन करना ताकत नहीं कायरता है. एकदम शायद न बदले पर धीरे धीरे बदलाव आएगा,. मेरा मानना है जो खुद को अच्छा लगे जो ख़ुशी दे खुद को वो करो.

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  29. रश्मि जी, शिखा जी, मुक्ति जी और अन्य सभी जो इस बहस का हिस्सा बने, इस मामले मे तो कोई मत भिन्नता है ही नही कि निरूपमा के माता पिता या जिसने भी हत्या की ने बहुत हे निन्दनीय काम किया है. मै सहमत हू कि नये जमने के हिसाब से आज के पढे लिखे लोग अपने जीवन साथी का चुनाव खुद कर ले.

    मेरे विनती इस नये युग की युवतम पीढी से यही है कि जब ये जिम्मेदारी लेने लायक हो गये हो तो मेहरबानी करके कम-से-कम वेहतर जीवन साथी चुने और देह के मन्दिर को शादी से पहले अपवित्र ना करे.

    पारिवारिक हिन्सा का मै पैदायशी विरोधी हू और इसकी हर स्तर पर निन्दा करता हू. मेरे बच्चे गवाह है और आश्वस्त भी कि किसी भी हालत मे मै किसी भी प्राणी पर हाथ नही उठा सकता हू.

    पारिवारिक और सामाजिक दबाब के प्रयोग मैने खुद किये है लेकिन जब तक ये एक निरन्तर आन्दोलन का रूप नही ले लेता इसके दीर्घ कालीन परिणाम नही निकलते.

    कानून का भय होना ही चाहिये लेकिन इसका लाभ जिनको मिलना चाहिये वो अबलाये घरो मे पिस रही है और अधिकतर मामलो मे इनका दुरुपयोग हो रहा है. मुझे बहुत खुशी होगी यदि इसका सही उपयोग वास्तविक पीडितो द्वारा हो.

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  30. kya kahoon.. kuchh soojh nahin pad raha di.. har ghar ki yahi kahani si hai aur kranti ki chingaari har ghar me sulag bhi rahi hai, der hai to bas bhadakne ki.. 'log kya kahenge' meri patented laghukatha ka title utha liya aur ittala bhi nahin kia.. bahut galat baat. Oopar se gussa ye ki padhne bhi nahin gayeen.. :(

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  31. " लोग क्या कहेंगे...." सूक्त वाक्य सा हो गया है हमारे समाज का. सारे काम तो बस इन्हीं " कहने" वाले लोगों के मद्देनज़र किया जाता है. लड़की की अभी शादी करने की इच्छा नहीं है, मां-बाप भी इस बात को लेकर बहुत परेशान नहीं हैं, लेकिन लोग?? बस इन लोगों की परेशानी दूर करने के लिये ही बेटी ब्याह दी.
    बेटी को इन्सान की जगह बोझ समझने या मात्र ज़िम्मेदारी समझने की मानसिकता से जब तक हम बाहर नहीं आयेंगे तब तक निरुपमाएं मरती रहेंगी, या ज़िन्दा निरुपमाएं अपनी लाश घसीटती रहेंगी, लोग कुछ न कहें केवल इसीलिये.

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  32. अभी भी पढ़ कर अच्छे से समझ रहा हूँ... aata hoon ....phir se...

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  33. निरुपमा को जोड़ते हुए माता पिता की भूमिका पर अच्छी पोस्ट लिखी है...मगर मैं इस बात से इत्तिफाक नहीं रखती कि आधुनिक माता पिता अपने बच्चो को अपनी स्नेहिल छाया से वंचित रखते होंगे ...गिने चुने लोग ही ऐसे रहे होंगे
    ...

    @ मेरे विनती इस नये युग की युवतम पीढी से यही है कि जब ये जिम्मेदारी लेने लायक हो गये हो तो मेहरबानी करके कम-से-कम वेहतर जीवन साथी चुने और देह के मन्दिर को शादी से पहले अपवित्र ना करे...

    मैं हरि शर्मा जी की इस टिप्पणी से शब्द -दर -शब्द सहमत हूँ ..बच्चों को माता पिता की दी हुई छूट और प्रश्रय का सम्मान करना चाहिए...

    जहाँ तक ससुराल में प्रताड़ित किये जाने का मामला है ...मुझे तो ससुराल वाले ज्यादा प्रताड़ित नजर आ रहे हैं इन दिनों ...पिछले १० वर्षों में समाज में तेजी से बदलाव आया है ...ये मेरा आकलन है ...ये भी हो सकता है कि मैं गलत हूँ ..मगर मैं जो देखती हूँ बिना लाग लपेट कहती हूँ ...पिछले कुछ वर्षों में मैंने अपने आस- पास ससुराल वालों को ही प्रताड़ित होते देखा है ....:):)

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  34. चलो कोई बात नहीं ....वैसे भी औरत तो बहुत हिम्मतवाली होती है ....और फिर मैंने सुना है की ...आज की नारी बहुत ही संघर्षशील और मर्द से किसी भी मामले में पीछे नहीं है ...एक तरफ खुद को ....शक्तिशाली और दूसरी तरफ .....अबला होने की दुहाई क्या उचित है .....? :( : ( : (

    माफ़ करना औरतो का स्वाभाव समझने की बहुत कोशिश की पर ... नाकाम रहे

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  35. ऐसा लगता है, जैसे लड़कियों के जन्म के साथ ही उनके लिए एक खुदी कब्र भी साथ चलती है. और एक सन्देश दे दिया जाता है,हर पल उसे अपनी नज़रों के सामने रखो, कुछ भी लीक से हट कर किया तो खुद कूद जाओ या उसमे धकेल दी जाओगी .
    .....such mein aaj bhi ek sadharan ladki ke liye jindagi kee raah aasan nahi....... padhi-likhi hone ke bavjood bhi sach mein us se hi apekshayen rahti hai ki wahi har kadam par samjhota karegi..
    samajik Bidambanao ka sajeev maarmik chitran ke liye aabhar....

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  36. @.वाणी
    ."मगर मैं इस बात से इत्तिफाक नहीं रखती कि आधुनिक माता पिता अपने बच्चो को अपनी स्नेहिल छाया से वंचित रखते होंगे गिने चुने लोग ही ऐसे रहे होंगे ".

    वाणी,दो उदाहरण तो मैंने ही रख दिए,इनके माता-पता आधुनिक ही कहलायेंगे. और ऐसे लोग सिर्फ गिने-चुने ही नहीं हैं. मुक्ति ने अपने शोध के समय देखा है, मैंने एक नारी संस्थान में कुछ दिन काम किया है और सैकड़ों ऐसे केस देखें हैं,जहाँ माता-पिता झूठी शान के लिए बेटियों को चुपचाप सब कुछ सहने की सलाह देते हैं,ताकि किसी को पता ना चले. जितना हमें दिखता है सिर्फ उतना ही सच नहीं होता...सच उस से कहीं बड़ा है.
    और हरि शर्मा जी की बात से असहमत कौन है..पर यहाँ तो विषय बेटियों के माता-पिता का उनका सहारा बनने का है. और अगर उनकी बच्चियों से कोई गलती हो जाए तो वे अपनी स्नेहिल छाया हटा लेंगे?

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  37. @राजेन्द्र मीणा जी,
    आज की नारी संघर्षशील है , तभी हर परिस्थितियों का सामना करते हुए भी आगे बढ़ रही है और जीना नहीं छोड़ा उसने. मेरे दोनों उदाहरण में लडकियां अपने दम पर ज़िन्दगी आसान बनाने की कोशिश कर रही हैं. पर वे सबला होते हुए भी एक इंसान भी हैं और अगर उनके संघर्ष में दो जोड़ी हाथ उनके सर पर छाया बन कर साथ चलते हैं तो उनका संघर्ष कुछ आसान हो जाता है,बस और कुछ नहीं,वरना वे सक्षम तो हैं ही.

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  38. ओह तो धुंआधार चालू है , मैं ही थोडे से विलंब से पहुंचा खैर मालगाडी देर से ही चलती है । देर से आने का एक फ़ायदा ये होता है कि आप सिर्फ़ पोस्ट ही नहीं बल्कि पाठकों की राय से भी बराबर रूबरू होते हैं ।

    मेरे ख्याल से सबसे बडी समस्या ये है कि यहां हमार मानसिक स्तर में बहुत बडा अंतर है । एक ही शहर में एक ही गली में और शायद कभी कभी तो एक ही मकान में भी रहने वाले लोगों का मानसिक स्तर इतना अलग अलग होता है कि वहां पर आप कोई भी बात कहते हैं तो उसकी प्रतिक्रिया वैसी ही उतने रूपों में आएगी । मसलन आज लिव इन पर हम बहस कर रहे हैं जबकि महानगरों से बाहर ये लिव इन किसी चिडिया का नाम ही समझा जा रहा है , यानि न त्प पल्ले पड रहा है और न ही इससे मतलब है तो ऐसे में कोई वहां से निकल कर दिल्ली मुंबई में लिव इन रहते हुए बच्चे पैदा करता है , फ़िर उसे डंके की चोट पर बताता है कि हां ऐसा किया है तो ये सिर्फ़ उन मामलों में ठीक ठाक हो पाता है जहां समाज चाहकर भी उनका कुछ नहीं बिगाड सकता । सैकडों उदाहरण हैं ..नीना गुप्ता , सारिका , श्रीदेवी ..गर्भ धारण करने और शायद विवाह से पहले ही ऐसा करने को लेकर जो समस्याएं उठती हैं वो इनके साथ भी तो उठी होंगी न मगर ...
    समरथ के नहिं दोष गोसाईं ..

    तो सबसे पहला काम तो ये करना होगा न जिस आप आधी दुनिया कहते हैं उसे इस जगह पर खडा करिए न वो शोषक बने ..शोषित नहीं । जी हां बिल्कुल सच कह रहा हूं शोषक ही और कुचल दे हर वो बात हर वो हाथ जो उसकी ओर किसी दुर्भावना से बढते हैं । मगर पता नहीं क्यों फ़िर जब देखता हूं कि किरन बेदी को भी अन्याय के कारण प्द छोडन पडा , फ़ौज में पुलिस में और अन्य जगहों पर भी महिलाओं पर शारीरिक अत्याचार तक की खबरें देखता पाता हूं तो फ़िर सोच में पड जाता हूं कि आखिर क्या हो ऐसा कि लगे कि अब नारी ..एक शिकार नहीं है ।


    अभी फ़िर आऊंगा पढने । और हां मैंने खुद प्रेम विवाह किया हुआ है ..मैं बिहारी हूं .पत्नी पंजाबन हैं ...ज़ाहिर है कि ये इतना आसान नहीं था ..मगर ऐसा भी नहीं था कि कत्ल होने करने तक की नौबत आए । लगता है इसपर जल्दी ही कुछ लिखना पडेगा । रश्मि जी आपने सच कहा था कि मैं समय पर नहीं पहुंच पाता हूं ।

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  39. उसने इतना आजिज होकर कहा कि वह सिर्फ इतना चाहती थी कि कभी वे प्यार से ही उसके पति से पूछें कि' वह हाथ क्यूँ उठाता है?' पर उन्होंने जैसे आँखें ही बंद कर ली हैं. अपने रिश्तेदारों में पड़ोसियों में वे दामाद के गुण गाते नहीं थकते कि वह इतना कमाता है. बच्चे इतने अच्छे स्कूल में पढ़ते हैं. इतने कीमती तोहफे उन्हें लाकर देता है. बेटी के सुख की उन्हें कोई चिंता नहीं है.

    The post has been beautifully written.

    I wish parents can justify.....

    "Twamev mata cha pita twamev...Twamev bandhu sakha twamev...."


    Parents are our saviour, our rescuer.

    Dad-Mom...we expect a lot from you both...Help us !...Save us !

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  40. came on net after a long time,because of shifting and all.Read four of your posts in one go.All interesting as usual.Will give detailed comment later.

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  41. rashmi jee....in haalaat mein ye kaha jata hai ki aurat ko bardaasht karna hi chahiye...jo aurat apne liye aawaaz uthaati hai log use jine nahi dete

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  42. rashmi jee....in haalaat mein ye kaha jata hai ki aurat ko bardaasht karna hi chahiye...jo aurat apne liye aawaaz uthaati hai log use jine nahi dete

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  43. आज से कमेन्ट देना बंद.... अब से सबको "Very good" कहूँगा.... अगर कोई मर भी गया होगा तो यही कहूँगा .... Very good.... कोई मुझे समझ नहीं पाता.... बस! नाराज़ होना आता है....

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  44. Didi, ladkiya paida hi hoti hai word adjustment ke saath...har haal me kisi bhi paristhiti me ladkiyo ko hi adjust karna hai...ek makan ko ghar banane wali aurat ko aksar mere ghar se nikal ja jaisi jhidkiyan suna di jati hai...fir bhi aurat ko sahna hai adjust karna hai kyo ki "log kya kahege" ye sochne ki jimmedari bhi to aurto ke jimme hi hai...jab pida asahay ho jati hai to jin haatho ko pakad kar usne kabhi chalna sikha tha unhe thamne ke liye wo machal uthti hai lekin is baar badi dedardi se uske haath jhatak diye jate hai aur fir wahi lok bhay aur adjustment ki baate suna kar use uske haal per akela chod diya jata hai...sach me bahut taklif hoti hai...aakhir kab tak ye sab chalega kab badelegi logo ki mansikta..??

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  45. वो पढ़ी लिखी है ,अपने पैरों पर खड़ी हो सकती है. पर कितनी तनख्वाह मिलेगी उसे? कहाँ रहेगी? दोनों बच्चों की देखभाल ,भरण-पोषण कैसे करेगी? ये सारे सवाल उसे तलाक के लिए सोचने नहीं देते.....jis din itnee see himmat kar legee....pati ke hosh thikaane aa jaaenge...dukhee bane rahne se kuchh haasil nahi hota...is soch ko badalna hai....aur ye badlegee

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  46. बहुत कुछ न जाने क्यों नहीं बदल पाता, सच ही है जो भी लिखा है ..माता पिता शादी के बाद क्यों इतने पराये हो जाते हैं समझ से बाहर हो जाती है यह बात ...बस पढ़ कर आँखे नम हो गयी

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  47. ye samaj to nahin badlega aur mujhe lagta hai ki hame iske badlne ka intzar bhi ab nahi karna chahiye. Jhoothi shan ke liye bachchon ki jaan lene wale mata pita jis samaj me rahte hain waha aur kya hoga. Mujhe lagta hai apni jindgi apne haath me lene ki jaroorat hai. warna marti rahengi nirupmayen til til kar...

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