Tuesday, July 5, 2016

हैप्पी बर्थडे अंकुर

ब्लॉग, अब सबकुछ सहेजने कर रखने के काम ही आने लगा है . पिछले चार साल से बेटों के जन्मदिन पर उनकी कुछ शरारतों का फेसबुक पर जिक्र करती रहती हूँ .अब लगा, ये रोचक किस्से क्रमवार यहाँ सहेज लेने चाहिए:)
ये जनाब एक डिफरेंट टाइम ज़ोन में रहते हैं...जब सब सो रहे होते हैं ये जागते हैं...और जब चिड़ियाँ गीत गा कर सारी दुनिया को जगा रही होती हैं तो ये उसमे अपने खर्राटे का सुर मिलाते हैं. फुटबॉल खेलते हैं..नाटकों में भाग लेते हैं..गिटार बजाते हैं...और जब परीक्षा सर पर आए तो रात रात भर जागकर काली कॉफी और मैगी के सहारे थोड़ी सी पढ़ाई भी कर लेते हैं.
जब लगातार फोन पर घंटे टाइप करते देख माँ ने कहा."लगता है...गर्ल-फ्रेंड आ गयी है ,लाइफ में ' तो फोन सामने कर दिखा दिया..'इस गर्ल-फ्रेंड का नम ट्विटर है...कई फिल्मो के प्रीमियर शो के टिकट...क्रिकेट मैच -रॉक कंसर्ट्स के टिकट..टी-शर्ट्स,स्केट बोर्ड ..जीत चुके हैं,ट्विटर पर फिर भी एक महंगा गिटार जीतने की ललक धडाधड करवाती रहती है.
 

चुनिन्दा आर्ट फिल्मे ही देखते हैं...और फिल्मे देख, रोने में जरा नहीं शर्माते...बल्कि बड़े फख्र से कहते हैं..'कैंसेरियन तो रोतडू होते ही हैं' .टी.वी. पर पसंदीदा कार्यक्रम है...' मास्टर शेफ' और सिर्फ प्रोग्राम देख देख कर ही खुद को बढ़िया शेफ समझने लगे हैं...माँ को टिप्स देते रहते हैं. वैसे मैगी..ऑमलेट..सैंडविच..पिज्जा बना लेते हैं...एक बार बढ़िया चॉकलेट केक भी बनाया था .पर अगर मूड ना हो तो एक कप चाय बनाने के लिए कहने पर भी मासूमियत से पूछते हैं..."कैसे बनाते हैं,चाय?" माँ भी इतनी ढीठ है...हर बार चाय की विधि बात देती है...जिसे ये अगली बार सुविधानुसार भूल जाते हैं.

कभी मूड हो तो घर का कोना-कोना शीशे सा चमका देते हैं (साल में एक बार )...आठवीं क्लास से दिवाली पर घर के सामने रंगोली यही बनाते हैं. पर दूसरी क्लास से ही माँ सिखा रही है..'अपने कपड़े जगह पर रखो' ये नहीं सीखा. कपड़े हमेशा फर्श पर फेंके हुए ही मिलते हैं.एक बार माँ ने पुरानी लौंड्री बास्केट हटा दी..और दूसरी अभी लाई नहीं थी..दो दिन में हकलान कर दिया.."कमरे में लौंड्री बास्केट नहीं है..कपड़े कहा रखूँ?" जब माँ ने कहा..लौंड्री बास्केट में तो कपड़े आज तक नहीं रखे..तो जबाब मिला..'लौंड्री बास्केट रहता था कमरे में तो कम से कम इतना पता रहता था..कपड़े किस दिशा में किधर फेंकने है..अब कुछ समझ में ही नहीं आता'
वैसे आज इनकी इतनी बातें क्यूँ कर रही हूँ...क्यूंकि आज इनका ..यानि मेरे बड़े सुपुत्र हैं..जन्मदिन है...
जन्मदिन बहुत बहुत मुबारक हो अंकुर

पिछले कुछ दिनों से इनकी ज़िन्दगी ने 180 डिग्री का टर्न ले लिया है. कहाँ वो लापरवाह सा थ्री-फोर्थ और
चप्पल में घूमना,और अब प्रेस की हुई शर्ट को दुबारा प्रेस करना और मैचिंग मोज़े का ख्याल,माँ पीछे पड़ी रहती थी, 'हेयर कट लो' और अब ऑफिस से लौटकर नौ बजे रात को बाल कटवाने जाना ,दिन रात हेड फोन लगाए लैपटॉप पर गाने सुनना और फ़िल्में देखना, गए युग की बात लगती है. पर इनकी माँ की ज़िन्दगी ने 360 डिग्री का टार्न ले लिया है, जहां से चली थी वहीँ पहुँच गयी, जब ये छोटे थे, इन्हें सुबह उठा कर इनका लंच पैक कर ऊँगली थामे स्कूल बस के स्टॉप तक पहुंचाना और आज भी सुबह उठाना,टिफिन पैक करना और ऊँगली थाम कर नहीं पर कार से ही सही, कम्पनी के बस स्टॉप तक छोड़ कर आना .
आज जनाब ने छुट्टी ली, सब खुश हो गए 'जन्मदिन परिवार के साथ बिताने का इरादा है ' पर असल वजह थी कि ऑफिस में सब घेर कर केक कटवायें और हैप्पी बर्थडे गायें , ये पसंद नहीं .पर हमसबने ने तो घर में ही जोर से हैप्पी बर्थडे गाकर बिल्डिंग वालों को गाकर बता ही दिया 
 
 
अंकुर जब फर्स्ट स्टैण्डर्ड में था एक दिन घर आकर बोला, 'मिस ने डायरी में कुछ लिखा है ' मैंने डरते हुए डायरी खोली कि जरूर कुछ शिकायत होगी पर ये लिखा था कि उसने १०० मीटर में गोल्ड मेडल जीता है. मेरे ये पूछने पर कि 'रेस में फर्स्ट आये तुम ?' उसने कंधे उचका दिए ,'वो तो कई बार आया '. कई राउंड हुए होंगे उसके बाद फाइनल .पर उसे ये सब समझ में नहीं आया. उसके बाद स्कूल में रेस में कभी गोल्ड, कभी सिल्वर कभी ब्रोंज़ भी मिलते रहे . 'लॉन्ग जम्प' में महाराष्ट्र का रेकॉर्ड भी ब्रेक किया (शायद अब भी उस कैटेगरी का रेकॉर्ड उसके ही नाम है. करीब सात साल बाद उस स्पोर्ट्स डे के चीफ गेस्ट, कहीं बाहर मिले और अंकुर को पहचान कर ये बताया )
स्कूल -कॉलेज के दिन ख़त्म हो गए .नौकरी में आ गया रेसिंग भी ख़त्म हो गयी पर दौड़ना ख़त्म नहीं हुआ .आज भी कम्पनी की बस दौड़ कर ही पकड़ी जाती है .शिफ्ट वाली ड्यूटी में ऑफिस कार गेट के पास आती है फिर भी ये जनाब दौड़ते हुए ही जाते हैं क्यूंकि हमेशा लेट हो रहे होते हैं :)
बस यूँ ही दौड़ते हुए नयी मंजिलें तय करते रहें यही आशीर्वाद है . जन्मदिन पर ढेरों शुभकामनाएं !!



आजकल बिल्डिंग के वाचमेन कार को धोने-पोंछने का काम करते हैं. उन्हें कुछ अतिरिक्त आमदनी हो जाती है और कार भी साफ़-सुथरी रहती है. रोज तो वे बाहर से ही धो-पोंछ कर साफ़ करते हैं ,इतवार के दिन चाबी ले जाकर अंदर से भी सफाई करते हैं. एक इतवार को वाचमैन ने कार में से पांच जोड़ी चप्पलें निकाल कर दीं. ये सारी चप्पलें मेरे बड़े सुपुत्र 'अंकुर (किंजल्क ) ने कार में छोड़ी हुई थीं . उसे सुबह सवा सात बजे निकलना होता है .और रात दो के पहले सो नहीं सकता . सुबह दौड़ते-भागते तैयार होता है और जूते हाथ में ले, कार में जाकर पहनता है. चप्पलें वहीँ छोड़ देता है, और पैरों से लग कर चप्पल सीट के नीचे . छोटा भाई , अलग परेशान , सारी चप्पलें कहाँ गायब होती जा रही है.
स्कूल-कॉलेज में भी यूँ ही दौड़ते-भागते तैयार हुआ करता था और मैं सोचती थी नौकरी में जाएगा तब शायद समय पर सोना-उठना हो जाए .पर अब भी वही हाल .पर शुक्र यही है कि बाकी सारे काम बखूबी करता है , आज उसके जन्मदिन पर यही शुभकामनाएं और आशीर्वाद है कि यूँ ही अपने कार्यों को सफलतापूर्वक पूरा करते हुए कामयाबी की सीढियां चढ़ता रहे (और समय पर तैयार भी हुआ करे :) )

Rashmi Ravija
July 5, 2016  
11 hrs · 

महानगरों में ऑफिस दूर हो तो जल्दी निकलना पड़ता है और अक्सर नाश्ता कुर्बान हो जाता है. अंकुर भी सुबह हाथों में एक सेब लेकर घर से निकलता है. मैं हमेशा ध्यान रखती हूँ, घर में सेब की आपूर्ति बनी रहे .पर एक शाम आठ बजे देखा, सेब नहीं हैं .अब बाहर जाने का मन नहीं था .पतिदेव वॉक के लिए निकल गए थे .और वे कभी फोन लेकर नहीं जाते ,शायद इसी डर से कि मैं कोई काम न बता दूँ :)
छोटा बेटा रोज की तरह ,दोस्तों से मिलने चला गया था ,पता नहीं उसके पास उतने पैसे थे या नहीं फिर मैंने सोचा जिसे सेब खानी है, उसी को कहा जाए .उसके आने के रास्ते में ही डी मार्ट के सामने कतार से फल के ठेले वाले खड़े होते हैं .
मैंने उसे फोन किया, "डी मार्ट की तरफ से ही आओगे ना...एक किलो सेब लेते आना "
थोड़ी देर बाद फोन आया ," डी मार्ट में तो कोई फल है ही नहीं. इनलोगों ने फल-सब्जियां रखनी बंद कर दी है "
"तुम्हें अंदर जाने को किसने कहा....बाहर भी तो मिलते हैं ."
"ओह..ओके..हाँ "
इन जनाब को ईश्वर थोड़ी व्यावहारिक बुद्धि भी प्रदान करे ,इसी कामना के साथ जन्मदिन की ढेरों शुभकामनाएं !!

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