Friday, January 11, 2013

एक रोचक संवाद


बेटा अति उत्साहित स्वर में "पता है माँ,  आज क्या हुआ ?"
माँ --"कुछ बहुत इम्पोर्टेंट बात है ? "
बेटे के स्वर में थोड़े से उत्साह की कमी -- "नहीं इम्पोर्टेंट तो नहीं, इंटरेस्टिंग है "
"अभी टी वी पर कितना हीटेड डिस्कशन चल रहा है, ब्रेक में बात करें ?"
"हाँ ठीक है " बेटा भी टी वी पर नज़रें गड़ा  देता है .
ब्रेक में माँ को किचन का कोई काम ध्यान आ जाता है और वो उठ कर चली जाती है। 
प्रोग्राम ख़त्म होने पर बेटा थोड़े से शंका भरे स्वर में पूछता है ," अब सुनोगी ?"
"हाँ किचन में चलें, खाना लगाने की तैयारी करते हुए बता देना "

"ओके" कहते बेटा किचन में आकर पुनः उत्साह में बात शुरू करता है ," आज एक फ्रेंड के साथ एक छोटे से रेस्टोरेंट में गया था , हमारी बगल वाली टेबल पर एक आदमी अकेला बैठा था . तभी छह लोगो का एक बड़ा सा ग्रुप आया रेस्टोरेंट वालो ने हमसे रिक्वेस्ट किया कि उन अकेले बैठे आदमी की टेबल पर चले जाएँ। इनके लिए टेबल खाली  कर दें .हमें अच्छा नहीं लगा, फिर भी हम चले गए। वहां बैठे उस आदमी से इंट्रो हुआ, उसने बताया वो अमुक कंपनी ( एक मल्टी नेशनल ) में काम करता है। बहुत फ्रेंडली था, थोड़ी देर बातें की फिर वो अपनी सैंडविच ख़त्म कर चला गया। थोड़ी देर बाद हमने भी अपना सूप ख़त्म किया और जब वेटर से बिल लाने को कहा तो वेटर ने बोला  "आप दोनों का बिल तो उस व्यक्ति ने चुका  दिया है . हमें बड़ा अजीब लगा फिर हम भागते हुए होटल से बाहर आये तो देखा वो अपनी मोटरसाइकिल स्टार्ट करके जा रहा था . हमने उनसे थैंक्स कहा और ये भी कहा, 'ऐसा  क्यूँ किया आपने ?'

वे हँसते हुए कहने लगे ,"कोई बात  नहीं मैं अक्सर यहाँ आता हूँ अगली बार आप हमारा बिल दे देना, हम मिलते रहेंगे ." उसने फिर से गर्मजोशी से हाथ मिलाया और चला गया . तुरंत मैंने और मेरे फ्रेंड ने उसका नाम गूगल किया तो पता चला वो तो बिग शॉट है।  अपने डिपार्टमेंट का हेड है " 

अब एक बड़ी मल्टीनेशनल कम्पनी के एक डिपार्टमेंट के हेड ने एक स्टूडेंट से इतनी आत्मीयता से बात की , बेटा इस बात से रोमांचित था। पर माँ उसके रोमांच पर ठंढा पानी डालने के लिए ग्लास ही नहीं पूरा जग लिए बैठी थी। 

"तुम्हे कैसे पता वह आदमी सच बोल रहा है , कहीं उसने अपने डिपार्टमेंट के हेड का नाम ले लिया होगा "
" माँ , नेट पर उसके प्रोफाइल के साथ  उसकी तस्वीर भी थी, ये वही आदमी था " बेटा  जोर देकर कहता है .
"तो फिर वह बाइक पर क्यूँ  सवार था ,उसे तो किसी  फैंसी कार में होना चाहिए था ?"
"वो फैंसी बाइक ही थी, पता है वो बाइक कितने की आती है? पंद्रह लाख की "

माँ ने खुद को घिरता हुआ पाकर दूसरा पॉइंट  ढूंढ लिया "वो इतने छोटे रेस्टोरेंट में क्यूँ  आया था  ?"

"इस रेस्टोरेंट का चिकन सूप और सैंडविच बहुत मशहूर है, दूर दूर से लोग आते हैं, हो सकता है वो अपने स्टूडेंट डेज़ से यहाँ आता हो ,पता है कितने बड़े बड़े लोग कैसी कैसी जगहों पर अपने टेस्ट का खाने के लिए जाते हैं? पढ़ा था मैंने मुकेश अम्बानी, सलमान खान वगैरह  कहाँ जाते हैं ,पर जाने दो नहीं बताऊंगा वरना फिर कुछ सवाल शुरू हो जाएगा। कुछ कहना ही बेकार है " और बेटा मुहं फुला कर चला गया।

अब वो माँ  इस रूठे बेटे को कैसे मनाये  :):)

{अब पढ़कर ये मत कहियेगा  कि रश्मि रविजा  तो कुछ भी लिखती है .  PD का कहना है, मेरा ब्लॉग है, मैं उसमे बस इतना लिखुं  "आज मैंने एक ग्लास पानी पिया " तो :):) }

56 comments:

  1. अरे बेटे मुंह फुलाने से क्या होगा.
    कोई बात नही समझने वाला.. हाहाह

    बढिया

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    1. चलिए 'बढ़िया' कह कर तो आपने मन का बोझ हल्का कर दिया।
      कल शाम से ही इसे याद कर इतनी हंसी आ रही है कि लगा और लोगो से भी शेयर किया जाए

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  2. बच्‍चों की बात ध्‍यान से सुननी चाहिए नहीं तो आगे से वे बात करना ही बन्‍द कर देंगे।

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    1. मुझे लग रहा था, लोगों की ऐसी ही प्रतिक्रिया होगी,

      पर सुनती हूँ, तभी तो बताते हैं :)
      ये वाला संवाद थोड़ा अलग सा इंटरेस्टिंग हो गया,इसीलिए लिख भी दिया :)

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  3. ऐसी बा ते सुनने समझने से ही तो बच्चे" सच्चे" बनते है ।सुनते रहिये ,सुनते रहिये ।
    हाँ मुझे भी एक नुस्खा मिल गया की जब भी कोई विचार आये तुरंत ब्लाग पर डाल दो ।उन विचारो को सजाने सवारने में असली विचार कही खो जाता है ।

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    1. बिलकुल शोभना जी,
      ब्लॉग आखिर होता किसलिए है .वैसे भी मैंने तो आजतक दूसरा ड्राफ्ट बनाया ही नहीं .गंभीर पोस्ट हो या हलकी-फुलकी जो लिखा बस ब्लॉग पर डाल दिया .

      आप तो वैसे ही माशाल्लाह इतना अच्छा लिखती हैं, इतना क्या सोचना शब्द सज संवर के ही आपकी कलम (कीबोर्ड) की नोक पर आते होंगे

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  4. समस्या ये है की हम कितना भी चाहे अपने बच्चो को हमेसा बच्चा ही समझते है और माँ बापगिरी करने से बाज नहीं आते है और अपनी तरफ से सलाह देना नहीं भूलते है :)

    जबकि आज के बच्चे कही ज्यादा स्मार्ट हो गए है , आप के बच्चे तो इतने बड़े है हमारी बिटिया तो इतनी छोटी है फिर भी हम उनको बहलाने फुसलाने , सलाह देने , समझाने और मजाक तक करने के लिए झूठ या तर्कहीन बात नहीं बोल सकते है , ये बच्चे सब जानते है :)

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    1. "माँ बापगिरी "
      हीहीही...बड़ा रोचक शब्द ईज़ाद किया है।

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  5. इतनी अच्छी बात पर आपको भी सूप पिला देना था..

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  6. kya samy aa gaya hai ham imaandari me bhi beimaani dhoondhane lage hai..badiya post...

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  7. कभी कभी बच्चों का मन बहुत उत्साह से कुछ बताने का होता है ...... सच में रोचक किस्सा

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  8. आपकी पोस्ट मे काफी काम की बातें है गौर करने लायक ...
    १ :- टीवी पर हीटेड डिस्कशन चल रहा था - अर्णब वाला क्या ???
    २ :- रेस्टोरेंट का चिकन सूप और सैंडविच बहुत मशहूर है - रेस्टोरेंट का पता कीजिये ... कॉफी और सैंडविच के लिए तो आप जा ही सकती है ... एक और बढ़िया पोस्ट मिलेगी ... :)
    ३ :- "बिग शॉट" से जान पहचान होने मे कोई हर्ज़ नहीं - आगे काम आ सकता है !

    अब सब से जरूरी बात ...
    ४ :- "रश्मि रविजा तो कुछ भी लिखती है ..." - पीडी गलत नहीं कहता ब्लॉग बनाया है तो अपडेट रखना भी जरूरी है ... और फिर यह तो पाठकों पर छोड़ दीजिये कि वो कुछ मे से बहुत कुछ खोज निकालते है या बहुत कुछ मे भी कुछ नहीं खोज पाते !

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    1. ब्लॉग अपडेट रखने के लिए पोस्ट नहीं लिखी, शिवम
      वो नौबत अब तक तो नहीं आई :):)
      और PD के भी ऐसा कहने का यह मतलब नहीं था।
      जब लोग आपत्ति करते हैं,'ऐसा क्यूँ लिखा...वैसा क्यूँ लिखा' उस पर उसका कहना था 'मेरा ब्लॉग है मैं कुछ भी लिखूं, मुझे कोई निर्देश नहीं दे सकता '.

      तुमने तो सच्ची बहुत कुछ ढूंढ लिया :)

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    2. तुमने तो सच्ची बहुत कुछ ढूंढ लिया :)
      ये ब्लॉग अपडेट रखनेवाला एंगल भी :):)

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    3. मेरे ब्लॉग पर मैंने लगा रखा है कि "Feed your blog often or it will die!"

      मैं तो यही मानता हूँ ... जब तक आप दिखते है ... लोग आपको जानते है ... मानते है ... उसके बाद किस ने कितने दिन याद रखा ... न कोई देखने जाता है न कोई बताता है ... :-)

      थोड़ा कड़वा है ... क्या करें सच है ... ;-)

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    4. हाँ ,आपका कहना सच है, शिवम्
      "आँख ओट पहाड़ ओट" या "Out of sight out of mind " कहावत ऐसे ही तो नहीं बने .

      पर सिर्फ अपडेट रखने के लिए कुछ भी लिखने का क्या अर्थ??
      इस से अच्छा ये नहीं कि जबतक सार्थक, मनोरंजक लिखा, लोगो ने याद रखा। बाद में न याद रखे
      की फर्क पड़ता है :)

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    5. कोशिश तो यही करते है कि सार्थक ही लिखें ... अब आप देखिये और बताएं है या नहीं !

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    6. हमने तुम्हारे लिए कुछ नहीं कहा,शिवम्
      बस तुम्हारी इस बात का रिप्लाइ किया "पीडी गलत नहीं कहता ब्लॉग बनाया है तो अपडेट रखना भी जरूरी है ."
      तुम तो सार्थक लिखते ही हो, जारी रखो :)

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  9. अरे ऐसे संवाद तो पूरी रोचकता के साथ सुनने चाहियें और वैसे भी यदि हम ही कम्यूनिकेशन गैप कर देंगे तो कल शिकायत करने का हक भी नही रखेंगे।

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  10. संवाद तो रोचक था।
    लेकिन सच कहिये तो आजकल किसी अनजान पर विश्वास करने का ज़माना नहीं रहा।
    पता नहीं उसकी क्या मंशा हो।

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  11. मैं भी कितना अजीब हूं जो इस वार्तालाप को और भी लंबा खैंच ले गया ! मुझे लगा कि ये किस्सा कुछ इस तर्ज़ पर खत्म होने वाला है कि बेटे ने मुंह फुलाने से पहले ये भी कहा कि गूगल करते हुए मैंने ये भी जाना कि वो बिग शाट आपका बहुत बड़ा फैन है :)

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    1. अली जी,
      आप भी न...मौका नहीं चूकने वाले :)

      मेरे साथ तो पता नहीं कभी ऐसा हो या न हो। पर मेरी एक पड़ोसन के साथ हुआ था।
      वे एक स्कूल में टीचर हैं। जब उनका बेटा एक जॉब इंटरव्यू के लिए गया तो इंटरव्यू लेने वाले ने उसकी सी. वी. देखकर पूछा , "अमुक स्कूल में आपकी माँ टीचर हैं? मैं उनका स्टूडेंट रह चूका हूँ। "
      वैसे बेटे को नौकरी अपनी योग्यता के आधार पर ही मिली होगी .वह अपने कॉलेज का टॉपर भी था।

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    2. अली जी,
      हमें एक और किस्सा याद आ रहा है , जहाँ एक प्रोफ़ेसर एक दुसरे कॉलेज में 'वाइवा ' लेने जाते हैं . कुछ लडकियां उन प्रोफ़ेसर को नहीं पहचान पाने के कारण ढिठाई से कुछ कह देती हैं और फिर उन जनाब को ही अपना 'वाइवा ' लेने के लिए नियुक्त देख घबरा कर रोने लगती हैं।

      एक लड़की नहीं रोती .अच्छे से जबाब देती है पर जब प्रोफेसर महाशय उसके सुन्दर कवर लगे जतन से सँवारे गए फ़ाइल को देख तारीफ़ के दो बोल की जगह यह कहते हैं कि "रिसर्च फ़ाइल को इतना सजाने की जरूरत नहीं,सादगी होनी चाहिए " तो वो बड़ी निराश होती है।

      कुछ दिनों बाद संयोग से वो लड़की प्रोफ़ेसर साहब की धर्मपत्नी बनती है और वो सारी घबराई हुई लडकियां प्रोफ़ेसर साहब की सालियाँ :)

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    3. उनसे हमें भी मिलवाइयेगा :)

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    4. अगर उन्हें खुद से मिलने की फुर्सत हो जाए तो आपको भी जरूर मिलवायेंगे :)

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    5. जी जरूर , हमें इंतज़ार रहेगा :)

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  12. एक बोझिल माहौल से बाहर निकलकर आपने इतनी अच्छी माँ-बेटे की दोस्ताना बातचीत शेयर की. पढकर एक मुस्कराहट सी तैर गयी होठों पर.. खुद को माँ और बेटे दोनों के स्थान पर रखकर सोचने लगा... बड़ा मज़ा आया..
    हमारे प्रधान कार्यालय (बेंगलुरु) के एक अधिकारी अपनी पत्नी को छुट्टी के बाद उनके ऑफिस से पिक करते थे. कभी कभी उनको आने में देर हो जाती थी. ऐसे ही एक दिन जब वो पत्नी को पिक करने पहुंचे, तो अन्धेरा हो चुका था. उनकी पत्नी के साथ एक बुज़ुर्ग सज्जन भी खड़े थे. जब हमारे कलीग वहाँ पहुंचे तो उन बुज़ुर्ग महाशय ने उनकी कार की खिडकी में झांककर कहा, "ज़रा जल्दी आया कीजिये! बहुत देर से इंतज़ार कर रही थीं!"
    बाद में उनकी पत्नी ने बताया कि वो उनकी कंपनी के सी ई ओ थे. बेंगलुरु की यह कंपनी विश्व की एक नामी सॉफ्टवेयर कंपनी है!!
    ऐसे लोग होते हैं दुनिया में जो साबित करते हैं कि फलों से लदे वृक्ष झुक जाते हैं और एक बहुत पुराना शे'र:
    आपसे झुक के जो मिलता होगा,
    उसका कद आपसे ऊंचा होगा!

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    1. आपको पोस्ट पढ़कर मुस्कराहट आयी और हमें सुकून आ गया वरना दुविधा में थी कि इसे पोस्ट करना भी चाहिए या नहीं :)

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  13. The incident depicted in this post as well as the comments , both are interesting . For the problem of convincing upset son ..... No idea :-( ...but i guess there shouldn't be any harm if Mo'm tells her son to say thanks to that person for his generosity .

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    1. Thanx Summary..U liked the post...:)

      children dnt stay upset for longer period, he went in the room n then came out asking for smthing (good for me , left his anger in the room only )
      and as hv mentioned in the post " हमने उनसे थैंक्स कहा और ये भी कहा, 'ऐसा क्यूँ किया आपने ?'" he thanked him profusely ..this much children know these days.

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    2. >> this much children know these days.
      ओह ! शायद , यह पीढ़ी बहुत बेहतर है .....
      मुझे तो बार बार बताया जाता था और हर बार थैंक यू कहते वक़्त शब्द हलक में फस जाते थे :-(

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    3. summary and u want me to believe this :):)

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  14. हा हा हा हा गजब , एकदम कमाल धमाल पोस्ट है , मुझे तो ये भी एक धांसू एपिसोड ही लगा , बहुत ही रोचक और मनोरंजक और सच के बहुत करीब । ब्रेक में बात करने की फ़ुर्सत वाली परंपरा तो अब शायद बहुत से घरों में पड चुकी है । बेटे ने फ़ौरन ही गूगल पर सर्च किया यानि कंप्यूटर और नेट भी अब घर का एक मेंबर बन चुका है , बढिया है । कुल मिलाकर मुझे तो बहुत पसंद आया आपका अंदाज़ भी , आपकी ये पोस्ट भी और पीडी तो अपना बैरागी बाबा है ही , सो जो कहे , हम तो सत्य वचन महाराज कहते हैं :)

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    1. अजय जी,
      आपको ये धमाल पोस्ट लगी और एक हम थे जो इसे पोस्ट करने से इतना हिचकिचा रहे थे।
      और इंटरनेट सिर्फ घर का सदस्य ही नहीं बल्कि शरीर का एक अतिरिक्त अंग सा बन गया है। हाथों में मोबाइल तो रहता ही है चौबीसों घंटे और मोबाइल में इंटरनेट .हर पल आज के बच्चे पूरी दुनिया से जुड़े रहते हैं।

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  15. संवाद कई मजेदार पहलू उठाता है.

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  16. यह संवाद भी बहुत जानदार है.

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  17. :)
    कुच्छो!!! हुंह.. :P

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    1. comment bhi "कुच्छो!!! हुंह.. :P :D"

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  18. ये तो घर घर की कहानी है ... आपने सूना दी अच्छी बात है ... अब पढ़ के लग रहा इतने प्रश्न करना ठीक नहीं ...

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    1. प्रश्न करना ,बिलकुल ठीक है,
      ये ही जीवन में जीवन्तता बनाए रखते हैं,वरना बोरिंग न हो जाए ज़िन्दगी :)

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  19. दीदी , आप तो कुछ भी लिखती है :)
    कह दीजियेगा कल कोई जासूसी मूवी या सीरियल देखते देखते नींद आ गयी थी ;)

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  20. :)
    हल्का महसूस करवाती हुई सहज पोस्ट |
    अभी हाल ही में मैं शिरडी गया था , वहाँ सुबह २-२.३० बजे हम लोग मंदिर के अंदर कक्ष में बैठे सुबह होने का इन्तेजार कर रहे थे | ज्यादातर लोग सो गए | अक्सर मेरी जेब में एक पेन होता है , मैं उसी पेन को निकालकर इत्तेफाक से मिले एक कागज़ पर कुछ लिखने लगा | मेरे पास ही बैठे एक सज्जन ने मुझसे एक और पेन माँगा , इस तरह से हमारा संवाद शुरू हुआ | धीरे-धीरे मुझे पता चला कि वो भी एक इंजिनियर ही हैं और बहुत अच्छे कॉलेज से पास-आउट हैं | बातचीत में मैंने इंजीनियरिंग से जुड़ी अपनी समस्याएँ उन्हें बतायीं और मेरे जैसे सामान्य या सामान्य से कमतर विद्यार्थियों का दुःख दर्द उन्हें सुनाने लगा | उन्होंने भी पूरा सहयोग किया , जहां तक संभव हुआ मेरी परेशानियों का समाधान भी बताया | लगभग आधा-एक घंटे की बातचीत के बाद मुझे पता चला कि वो अपने कॉलेज के टॉपर और गोल्ड मेडलिस्ट रहे हैं और आजकल एक बहुत बड़ी कम्पनी की किसी बेहद अच्छी पोस्ट पर हैं |
    हमारी बातचीत आज भी उतनी ही सहजता से जारी है |

    सादर

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    1. क्या बात आकाश जी ,
      कितनी अच्छी बात है, सबके पास एकाध ऐसे सुखद अनुभव हैं :)

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  21. होता है ,होता है ऐसा...आगे -आगे देखिये कितना कुछ लिखना पड़ेगा बच्चे से बतियाते बतियाते...

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  22. मज़ा आया पढ़कर, कुछ ख़ास न होक भी सब कुछ ख़ास है इस पोस्ट में...
    आप चाहे कुछ भी लिख दें अच्छा लगता है, और हम चाहे सब कुछ लिख डालें कोई पढने नहीं आता... :-(

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    1. शेखर,
      ताने दे रहे हो क्या, आजकल बड़ी आलसी हो गयी हूँ , कई ब्लोग्स पर नियमित नहीं हूँ :(

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  23. रोचक , दरअसल आज किसी की अच्छाई में भी त्रुटि ही दिखती है ...कितना स्वार्थ है दुनिया में ...या फिर कहीं कोई दगा न कर दे ..अतिरिक्त सावधानी रखना चाहती है दुनिया ...

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  24. रश्मि, कई बार बच्चे किसी के अच्छे व्यवहार को एप्रिशियेट करना चाहते हैं, और सोचते हैं कि हमारी प्रतिक्रिया भी वैसी ही होगी, लेकिन जैसा कि पोस्ट की बातचीत से ज़ाहिर है, बच्चा निराश हुआ :( कभी कभी बेपरवाही खुद का मन कचोट देती है न?

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    1. न हमें कोई कचोट नहीं हुई, मजा अता है कभी कभी बच्चों को यूँ खिझाने में :)

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  25. कोई दिक्कत नहीं, कभी कभी ऐसा भी होता है।वैसे बच्चे ज्यादा देर तक माँ से रूठे नहीं रहते।

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  26. बड़े जतन से ये लिंक खोज कर निकाला हूँ. पढ़िए - "http://stutipandey.blogspot.in/2010/06/blog-post_29.html"

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  27. अरे ये तो हमारे साथ भी खूब होता है....कितने तो किस्से होते हैं बच्चों के पास...और सुनने वाली खाली माँ.....खूब रूठना मनाना भी होता है....रश्मि सच्ची बड़ा रोचक अंदाज़ है लिखने का....आपकी वो ट्रेन में बेटे को तीन हमसफ़र जो मिले थे न..rehab center वाले...वो पोस्ट तो हमने बच्चों को भी सुनाई थी...even they had tears in their eyes...
    लिखे रहिये....हम पढ़ते रहेंगे...
    वादा..
    प्यार
    अनु

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  28. कुछ भी हो बेटा प्यारा है ....
    शुभकामनायें !

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  29. ufhooo didi...aap bhi na :D

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