Thursday, February 9, 2012

क्या बुढ पुरनिया सब सच कह गए हैं...



हाल की एक घटना ने बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर दिया.

हुआ यूँ कि एक मित्र ने दूसरे मित्र को एक नई राह दिखाई...और उसपर चलने को कहा...दूसरे का मन आशंकित था...मन में दुविधा  थी...फिर भी पहले मित्र के बार-बार प्रेरित करने पर उसने उस राह पर कदम रख दिया...दो चार कदम चलते ही....रास्ते के दोनों तरफ खड़े लोगों ने तालियाँ बजायीं...उसका हौसला बढ़ा....उसने मुड़कर उस राह पर चलने के लिए उत्साहित करनेवाले का धन्यवाद किया....और आगे बढ़ चला.

कुछ दूर और चलने के बाद उसे एक बड़ी ख़ुशी....मान-सम्मान-अनुदान मिला . फिर से रूककर  उसने सबसे वो ख़ुशी बांटी. पर उस मित्र को नज़रअंदाज़ कर दिया जिसने उसे यह राह दिखाई थी...उसके एक परम मित्र ने टोक दिया..."उसका भी नाम ले लो...और शुक्रिया कह दो...जिसने इस राह पर चलने  के लिए उकसाया" अब सम्मान का आलोक ही ऐसा होता है कि आँखें चौंधियाँ जाएँ....पीछे  का कहाँ नज़र आता है. उसने टाल दिया..."अब एक बार तो शुक्रिया  कह दिया...कितनी बार कहूँ ...यही करता रहूँगा तो आगे कैसे बढूँगा ??"

मित्र ने फिर फुसलाया..."कितना समय लगेगा....दुबारा कहने से महत्त्व कम नहीं हो जायेगा"
इसपर वह तुनक कर बोला, "इतना पेट में दर्द हो रहा है...तो आप ही शुक्रिया कह दो" मित्र हंस कर चुप हो गया, अब किसी अनजान के लिए वह अपनी दोस्ती तो दांव पर नहीं लगा सकता था.

यह सब देख मेरे एक मित्र ने बड़े क्षुब्ध होकर मुझसे कहा, "बुढ  पुरनिया कह गए हैं..."बिना पूछे किसी को रास्ता नहीं बतलाना चाहिए " 
मैने कहा..."लेकिन... 'नेकी कर दरिया में डाल' ये भी तो बड़े लोग ही कह गए हैं "

मित्र शायद ज्यादा ही  कुपित थे, कहने लगे, " ये भी कहा गया है कि किसी  काल खंड में दुश्मन ने भी मदद की हो तो उसका भी शुक्रिया कहना चाहिए "

मैने बात बदल दी...मुझे क्या लेना-देना....पर यह सोचने जरूर लगी.."क्या बुढ पुरनिया (इतने दिनों बाद ये शब्द सुन भी बड़ा अच्छा लगा ) सब सच कह गए हैं कि 'बिना पूछे किसी को रास्ता नहीं बतलाना चाहिए??'
अगर ऐसा हो तब तो कितने रास्ते अनदेखे...अनजाने...unexplored रह जाएँ. कितने लोग यूँ ही इधर-उधर भटक कर समय नष्ट कर दें...उन्हें पता ही ना चले कि उनके अंदर तो काबिलियत फलां रास्ते पर चलने की थी. 

मैं भी यहाँ, जो यह सब लिख पा रही हूँ अजय (ब्रह्मात्मज) भैया की ही बदौलत. अगर उन्होंने अपना ब्लॉग बनाने की सलाह नहीं दी होती तो इस ब्लॉग जगत से अनजान ही रहती मैं. {अजय भैया का जिक्र इतनी बार कर चुकी हूँ कि शायद सब बोर होने लगे पर एक पंक्ति और पढ़ने में कितनी बोरियत हो जाएगी :) }..मुझे उनका जिक्र कर आत्मिक संतुष्टि मिलती है......वरना वे तो इतने व्यस्त रहते हैं कि उन्हें कभी पता भी नहीं चलता ,मैने उनका नाम लिया है...या उनका शुक्रिया अदा किया है...कभी-कभार मेरे ब्लोग्स देखते हैं और "Keep it up "कह कर शाब्बशी  दे जाते हैं .

ऐसे ही  सबको किसी ना किसी ने ब्लॉग बनाने को प्रेरित किया होगा....या कविता-गद्य-संस्मरण लिखने को कहा होगा...अगर वो पूछ कर ही बताने लग जाए तब तो बहुत कुछ अनलिखा-अनपढ़ा रह जाए. कोई नाम ले या ना ले...यह उसके स्वभाव...उसके संस्कार पर निर्भर है...मगर आप किसी की सफलता की सीढ़ी बनते हैं....यह संतोष और प्रसन्नता तो कोई आपसे छीन  नहीं सकता. सीढ़ी गिरा देने की या उसके अस्तित्व को नकार ,सारा श्रेय खुद ले लेने  के उदाहरण तो भरे पड़े हैं.

इन उक्तियों पर कि 'अच्छे कर्म का फल अच्छा ही होता है"...या "जैसा कर्म, वैसा फल " या 'भगवान के घर देर हैं, अंधेर नहीं" पर मुझे विश्वास नहीं {आज पुरानी  उक्तियों के ही पीछे पड़ी हूँ :)}. मैं घोर आस्तिक नहीं हूँ ना ही नास्तिक हूँ...पर इतनी उम्र में कुछ ऐसे लोगो को देख  चुकी हूँ कि लोगों का अच्छा करते-करते दुनिया से चले गए...पर उनका कुछ अच्छा ना हुआ....या अभी भी ऐसे लोग हैं...दूसरों  की भलाई में लगे होते हैं..पर उनका अपना कुछ भला नहीं होता...जबकि वहीँ दांव-पेंच खेलनेवाले....चालें चलनेवाले सबके प्रिय बने रहते हैं...हाँ, ये जरूर है कि चालें चलनेवाले ..गेम खेलने वाले...आत्मिक सुख से महरूम रहते हैं....उन्हें यही चिंता बनी रहती है ..कैसे किस से काम निकाला जाए...कैसे झांसा दिया जाए......कैसे कैसे किसी को खुश/दुखी  किया जाए.....जबकि दूसरी कैटेगरी वाले...बस अपने काम से मतलब रखते हैं और चैन की नींद सोते हैं.
"सब पूर्वजन्मो के कर्म हैं " यह सब भी बस दिल बहलाने वाली बात है.
मुझे तो लगता है..इस संसार में सबकी  एक निश्चित भूमिका है...और उसे वह निभाना है. अगर ख़ुशी ख़ुशी निभाते  हैं तो आपके होठों की हंसी कायम रहती है और अगर खीझकर निभाते हैं तो तनाव  आपका ही जीना मुहाल  कर देता है. कोई किसी के बड़े काम का जरिया बनता है...और उसके बाद उसे भुला दिया जाता है...तो यह जरिया बनने तक  ही उसकी भूमिका थी.

आप अपने चार अलग-अलग दोस्तों का आपस में परिचय करवाते हैं...वे चारों आपस में मिलकर आपको ही भूल जाते हैं....इसका अर्थ यही है कि आपकी भूमिका यहीं तक थी. वे सब आपके दोस्त ही इसलिए बने थे ताकि आप उन्हें आपस में मिलवा सके...भूमिका ख़त्म अब दूसरी तरफ का रुख.

मेरे एक मित्र (नॉन ब्लॉगर  ) को मेरे लिए  बहुत दुख होता है...कि मैंने बहुत कम उम्र में लिखना शुरू करने के बावजूद लम्बा ब्रेक ले  लिया. इतने दिन घर -गृहस्थी में उलझी लेखन से दूर रही. मेरे ये कहने पर कि, " अब तो लिख पा रही हूँ..." वे खीझ कर कहते  हैं, "   "Like u have more  fifty years to write...u have wasted your precious time "

पर मुझे नहीं लगता मैने कोई टाइम वेस्ट किया....बच्चों की प्रारम्भिक शिक्षा...उनके स्कूल..पैरेंट्स मीटिंग...स्पोर्ट्स डे..एनुअल डे ...बर्थडे पार्टी...माँ की भूमिका में भरपूर  एन्जॉय किया....अब उस भूमिका से थोड़ी फुरसत मिली और अब लिखना एन्जॉय कर रही हूँ...लिख भी इसलिए ही पा रही हूँ क्यूंकि अनुभवों का खज़ाना समृद्ध है. 

मैने तो लिख कर एक ब्लॉगर की भूमिका निभाई....अब आप पढ़कर पाठक की भूमिका निभाइए...टिप्पणीकर्ता की भूमिका ऑप्शनल है :)

43 comments:

  1. हमें तो यहाँ तक "होकर भी नहीं होना" वाले पंकज उपाध्याय लेकर आये :)

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  2. बढ़िया आप भूले नहीं..:)

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  3. मेरा ब्लॉग बनाया तो मेरी बेटी ने , पर उसे लोगों तक पहुँचाया संजीव तिवारी जी ने ...... वे संभव से सबको सिखाते, बताते रहे - पर यह नाम मैं भूल नहीं सकती . स्वार्थ से परे जो राह दिखाते हैं , उनका नाम लेने में कैसी कंजूसी !

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  4. जिम्मेदारियों को निभाने में समय तो जाता है परन्तु इसे टाइम का वेस्टेज नहीं कहा जा सकता. अनुभव और परिपक्वता इन सब से ही आती है जिनकी सुंदर लेखन के लिये सबसे अधिक आवश्यकता होती है.

    मेरी तो शुभकामनायें हैं कि तुम पचास क्या सौ साल साल तक ऐसे ही सुंदर लिखती रहो.

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  5. @रचना जी..
    क्या मैं कोई अमर बूटी खा कर आई हूँ...:) :)

    हाँ यही है...जो लिखूं जितना लिखूं...आत्मसंतोष मिले..बस

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  6. मेरा ब्लॉग तो सब जानते हैं कि वंदना अवस्थी दुबे ने बनवाया बल्कि बनाया ,, मुझे तो परोसी हुई थाली मिली थी ,,मैंने तो बस इतना किया कि थाली का स्वादिष्ट खाना खा लिया :)
    और
    मुझे ये स्वीकार करने में ज़रा भी हिचक और शर्म नहीं आती बल्कि पूरा श्रेय मैं उस को ही देती हूँ ,,इतना ही नहीं आज भी मुझे अगर कोई समस्या हो तो उस को ही फ़ोन लगाती हूँ सहायता के लिये लेकिन वंदना से शुक्रिया शब्द कह कर मुझे डाँट नहीं खानी है :):)
    रचना जी द्वारा दी गई दुआओंमें थोड़ा और बढ़ा लो मेरी तरफ़ से भी :)

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  7. इंसान तो मंदिर भी जाता है तो भगवान से कुछ माँगने.. कभी ऐसा हुआ है कि कोई मंदिर जाए सिर्फ यह कहने कि हे परमात्मा! तूने जो भी दिया है उसका शुक्रिया. परमात्मा भी इसीलिए परमात्मा है कि वह किसी से शुक्रिया सुनने की उम्मीद नहीं रखता. हमारी अपेक्षाएं ही हमारी गहरी हताशा का कारण होती हैं.. खैर! मुझे इस ब्लॉग जगत में सिर्फ हमारे माहौल लेकर आए. मैं और मेरे मित्र चैतन्य के आस-पास ऐसे माहौल बन रहे थी जहाँ घुटन महसूस होने लगी थी. और हमने घुटन से लड़ने के लिए लिखना शुरू कर दिया. एक दूसरे के प्रेरक भी और पूरक भी!!

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  8. हूँ स्वार्थ परे सोचकर रास्ता सुझाने वाले लोग आज मिलते है..... सुंदर पोस्ट , यूँ ही लिखती रहे ,शुभकामनाएं

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  9. बस पूछने वाले को पता होना चाहिए कि उसे जाना कहां है, वरना बताया गया कोई भी रास्‍ता भटकाने वाला ही होगा और बूढ़ पुरनियों के कथन में आपसी संवाद को महत्‍वपूर्ण माना गया है शायद. मांगने पर दी गई लाख टके की सलाह, बिना मांगे देने पर दो टके की हो जाती है.

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  10. बहुत ही प्रशंसनीय प्रस्तुति। कामना है आप और भी अच्छा लिखें । मेरे नए पोस्ट पर आपका इंतजार रहेगा । धन्यवाद ।

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  11. "आप अपने चार अलग-अलग दोस्तों का आपस में परिचय करवाते हैं...वे चारों आपस में मिलकर आपको ही भूल जाते हैं."
    -कुछ ऐसा हुआ था मेरे साथ, जिसपे मैंने पिछले साल एक पोस्ट भी लिखी थी और एक छोटी कविता भी..शायद आपको याद भी हो.

    पते की बात तो आपके ब्लॉग से पता चली...की अपनी कोई भूमिका-शुमिका थी इसमें :P

    एनीवे दीदी हम तो पाठक के साथ साथ टिप्पणीकर्ता की भूमिका भी बखूबी निभा रहे हैं ....और उसका सबूत ये टिप्पणी है...:D

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  12. आप उन चेहरों में कृतघ्नता ना देखा करें ज़रूर उनकी कोई मजबूरी रही होगी !

    आप अच्छा लिख रही हैं क्या यह काफी नहीं है :)

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  13. @ सलिल जी,
    इंसान तो मंदिर भी जाता है तो भगवान से कुछ माँगने.. कभी ऐसा हुआ है कि कोई मंदिर जाए सिर्फ यह कहने कि हे परमात्मा! तूने जो भी दिया है उसका शुक्रिया

    यह पोस्ट से इतर विषय है..फिर भी मुझे तो लगता है...जब हम किसी परीक्षा में पास हो जाने पर या कोई काम पूरा हो जाने पर या मन्नत पूरी हो जाने पर...मंदिर जाते हैं...तो यह शुक्रिया का ही एक रूप होता है.

    और कैथोलिक लोगों में तो बाकायदा thanx giving day ही होता है..

    आपको तो हमेशा चैतन्य जी का जिक्र करते देखा है...आपलोग ऐसे ही लिखते रहें...शुभकामनाएं

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  14. @राहुल जी,

    पते की बात कही आपने...
    बिना मांगे दी हुई सलाह दो टके की क्या टके भर की भी नहीं होती..:):)

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  15. @अभी

    हाँ, ऐसे ही समझा करो...कि तुम्हारी भूमिका आपस में उनका परिचय कराने की ही थी और तुमने एक अच्छा काम किया...
    पहले भी कहा है...
    People come into your life
    For a reason
    For a season
    or For lifetime

    reason ख़त्म हुआ..season ख़त्म हुआ...वो चले गए...अच्छा हुआ...उनके असली चेहरे दिख गए....जो lifetime के हैं वही साथ रह जायेंगे

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  16. @अली जी,

    जो ऐसा करते हैं...उनकी मजबूरी ही होती है...स्वभाव की मजबूरी ..फितरत की मजबूरी..वो कैसे बदल जायेगा :)

    हौसला अफजाई का शुक्रिया :)

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  17. हम्म!

    हम भी दिमाग पर जोर डालते है कि हमें किसने ब्लॉग्गिंग का ककहरा सिखाया?

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  18. @दूसरों की भलाई में लगे होते हैं..पर उनका अपना कुछ भला नहीं होता...जबकि वहीँ दांव-पेंच खेलनेवाले....चालें चलनेवाले सबके प्रिय बने रहते हैं...

    यह सबकुछ जीवन में इतनी बार देखा ,अनुभव किया है कि अब कोई निभा जाए तो हैरानी होती है :)
    नेकी कर कुँए में डाल , और यह विश्वास रखना चाहिए कि ईश्वर सब देखता है ! हमें भी :)

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  19. किसी काम के लिए कभी देर नहीं होती और हर समय अच्छा समय होता है ...आपने आज के दौर में लिखना शुरू किया सारे पाठक आपको एक ही अंतरजाल पर मिल गए, लिखने के लिए मन की शान्ति चाहिए जो आपके पास है क्योंकि आपने अपने सारे कर्त्तव्य पूरी तरह निबाहे है .... तो खुश रहिये .

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  20. कोई इंसान जन्‍म से सब कुछ सीखकर नहीं आता..... हर कदम पर इंसान को कुछ न कुछ सीखने मिलता है और गुरू कोई भी हो सकता है......
    बढिया विचार। सुंदर चिंतन।

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  21. हम तो अपने उठने के काल से ही सबेरा मानकर जी रहे हैं..

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  22. रश्मि जी , हमारी (वेल्युएबल) टिप्पणी क्या स्पैम में चली गई ?

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  23. @दराल जी,

    आपकी कोई टिप्पणी तो नहीं मिली..स्पैम तो मैं हमेशा चेक करती रहती हूँ .

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  24. रश्मि जी , हमने लिखा था --राह दिखाने वाले का काम तो राह दिखा कर ख़त्म हो जाता है . उसके बाद राह पर चलने वाले पर निर्भर करता है की वह सही चल रहा है या राह भटक गया है .
    लेखन के मामले में तो यही कह सकते हैं की यह एक शौक होता है जिसे कभी भी पूरा किया जा सकताहै .
    हमने पिछले चार पांच साल पहले ही हास्य और कविता आदि लिखना शुरू किया था .

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  25. शुक्रिया दराल जी...
    दुबारा टिप्पणी करने की मेहनत की आपने...

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  26. रश्मि, कृतज्ञता और कृतघ्नता ये दोनों ही गुण केवल मनुष्य में पाये जाते हैं. जिसके भीतर कृतज्ञता का गुण होता है, वह छोटी से छोटी सलाह/मदद के लिये धन्यवाद ज्ञापित करता है और हमेशा इस बात को याद रखता है कि उसकी किसी ने मदद की या नेक सलाह दी. मुझे लगता है कि कम से कम इतनी कृतज्ञता की भावना तो सबको अपने भीतर जीवित रखनी ही चाहिये, कि किसी की उन सलाहों पर हमेशा नत रहे, जिनके चलते उसे कोई उपलब्धि हासिल हुई हो. धन्यवाद देने से देने वाले का मान बढता है जबकि लेने वाले का मन भर जाता है.
    किसी को केवल उसकी मदद/सलाह के लिये मौके-बेमौके याद कर लेने से कुछ नहीं घटता, अपना सम्मान उसकी नज़रों में बढता ही है. वैसे भी अगर हमारे लिये किसी ने कुछ किया है, तो भूलना सबसे बड़ी कृतघ्नता होगी.
    अखबार और बाद में स्कूल के चलते मेरा लेखन बुरी तरह प्रभावित हो रहा था. केवल पढने तक सीमित रह गई थी, लेकिन शुक्ल जी ने मुझे ब्लॉग बनाने और निरन्तर लिखने के लिये प्रेरित किया, मेरे लेखन को एक तरह से जीवन-दान दिया, ये मैं कभी नहीं भूल सकती.
    बहुत जीवंत फ़लसफ़ा प्रस्तुत किया है रश्मि. आभार तुम्हारा.

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  27. कई बार क्या होता है न.. हम दोस्त समझने में भूल कर देते हैं... जिसे हम दोस्त समझ रहे होते हैं... वो ऐक्चुयली में दोस्त होता ही नहीं है.. बस ! हमारी कुछ ज़रूरतें ऐसी होती हैं (इमोशनल) .. जो हमें सामने वाले को दोस्त समझने की भूल पैदा कर देतीं हैं.. कई बार ऐसे एहसान फरामोश लोग भी हमारे ज़िन्दगी में आ जाते हैं.. जिनका साथ हमने हर मुसीबत में और ज़रूरत पर दिया हो... लेकिन वो ऐसे बिन पेंदे के लोटे होते हैं.. कि ऐंवें ही लुढ़क जाते हैं ... और स्टैंड बाय बना कर रखते हैं और दस दस साल पुरानी दोस्ती भी बिना मतलब में भूल जाते हैं... ... पर ऐसे लोगों का जाना अच्छा ही होता है.... जो चला गया वो वाकई में आपका कभी था ही नहीं... ऐसे लोगों का जाना ख़ुशी ही मनाना चाहिए.. कि ठीक है भई तू अपने रस्ते खुश हम अपने रस्ते... हमने कुछ अच्छे पल साथ बिताये उसके हम शुक्रगुजार हैं... देखिये दोस्त\प्यार और आपको कभी भी छोड़ कर नहीं जायेंगे.. जो चला गया तो यही समझिये कि वो साला/साली कभी लाइफ में था/थी ही नहीं...

    रही बात ब्लॉग और ब्लॉग बनाने की... तो काफी हद तक आपकी गलती दूंगा कि आपसे इंसान समझने में गलती हो गई... यहाँ ब्लॉग जगत में (दोस्त) आपको नहीं मिलेगा..यह आपकी गलती है... कि आपने ऐसा कैसा दोस्त बनाया... कि जो आपसे दोस्ती ख़त्म होने के बाद भी आपकी बुराईयां कर रहा है.... और आपके दोस्ती/एहसान/प्यार को नकार दे रहा है..... जो आपसे दोस्ति ख़त्म होने के बाद भी आपकी बुराई करे... तो ऐसे इंसान का वैसे भी कोई भरोसा नहीं कि वो ऐसा किसी और के साथ भी नहीं करेगा... अब कोई और बेवकूफ बने तो बने... आपने दोस्ती निभाई... यह आपका बड़प्पन है.. मैं तो एक चीज़ जानता हूँ .. जो आपको यूज़ करे... स्टैंड बाय समझे... मुसीबत में साथ ना दे...आपके सक्सेस को नकारे, किसी और दोस्त के लिए आपको छोड़ दे... तो ऐसे लोगों को सिर्फ धीरे से छोड़ कर आगे बढ़ जाना चाहिए.... कुछ नहीं कहना चाहिए... जिसने जाना होगा वो तो जायेगा ही... जो सच्चा होगा वो जा कर भी लौट कर आएगा...आपने अपनी ज़िम्मेदारी निभा दी... अब सामने वाले की बारी है....

    मैं तो एक बात जानता हूँ कि रश्मि रविजा को अपनी काबिलियत बताने की ज़रूरत नहीं है.. जो अपने पैदा होने से पहले ही मिडिया में छप रही हो.. वो भी किसी जनसन्देश टाइम्स या अलीगंज टाइम्स में नहीं... धर्मयुग में छपना ... और माधुरी में छपना.. .कोई मामूली बात नहीं है.... और सबसे बड़ी बात अगर आपसे महफूज़ अली बात कर रहा है तो समझ लीजिये कि आपका लेवल क्या है... मैं बहुत क्लास कौन्शियास हूँ वैसे भी... मुझे गरीब, अनपढ़, बदसूरत, सेमी इंटेलिजेंट, और यहाँ वहां गिरने वाले लोग भी नहीं पसंद हैं.. तो आपका लेवल बहुत हाई है.. बाकी नेकी कर दरिया में दाल यही सही है.. हमें हर बीते हुए पल को अच्छा पल समझ कर रखना चाहिए..

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  28. @महफूज़,

    हमेशा की तरह आप अपनी रौ में लिखते चले गए...:)

    मैने तो एक सामान्य से विषय की चर्चा की है..कईयों के साथ ऐसा होता रहता है.
    और आपका यहाँ -वहाँ गिरने वाले को नापसंद करना सही है...परन्तु गरीब,अनपढ़..बदसूरत (ऐसा कोई शब्द है ही नहीं..हर चीज़ में खूबसूरती होती है..देखने वाले की नज़र चाहिए )...एक मजबूरी होती है.

    बहरहाल.....स्वागत है...ब्लॉगजगत में आपकी टिप्पणियाँ आनी शुरू हो गयी हैं....आज इधर का भी रुख कर लिया..शुक्रिया :)

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  29. टिप्पणीकर्ता की भूमिका ऑप्शनल है????? :)

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  30. रश्मि,
    कई महीनों के बात कमेन्ट कर रही हूँ....
    कहते हैं दुनिया में दो ही बातें रह जातीं हैं हमारे जाने के बाद...नेकी और बदी
    तुमने एक नेक काम किया और जिसके साथ किया उसे भी इसका पूरा अहसास है...कोई कितना भी दुनिया की नज़र में खुद को सही दिखाता/दिखाती रहे...लेकिन जब भी अकेले, खुद के साथ बैठता/बैठती है...खुद से आँखें मिलाना उतना आसान नहीं होता...और ये पक्की बात है वो शख्स भी अपने ज़मीर से रोज़ लात खाता/खाती होगा/होगी..इसलिए निश्चिन्त रहो...जिसकी नियत ठीक नहीं होती उसकी नियति भी ठीक नहीं होती...
    'अदा'

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  31. @ अदा जी ,
    मैं कहना चाहता हूं कि ये हुई ना बात अदा की तर्ज पर ! लेकिन कहूंगा इस तरह से ...

    अदावत कहन :)

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  32. आपने याद दिलाया तो याद आया कि हमारा ब्‍लाग गुल्‍लक हमारे मित्र शिवनारायण गौर ने 2007 के आखिरी दिन बनाया था। पहली पोस्‍ट भी उन्‍होंने ही पोस्‍ट की थी। फिर लगभग साल भर उसमें हमने कुछ नहीं किया। फिर 2009 में जो शुरू हुए तो अब तक जारी है। और अब तो एक नहीं तीन-तीन हैं।
    *
    बहरहाल आप भले ही अमरबूटी खाकर न आई हों,पर हम तो यही कहेंगे कि न केवल सुंदर लिखती रहें,बल्कि ऐसी सुंदर दिखती भी रहें।

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  33. समाज मे रहते हैं तो सभी को साथ लेकर चलना पडता है कुछ साथ चलते है और कुछ छोड जाते हैं ………बस यही बात सब जगह लागू होती है फिर चाहे ज़िन्दगी हो या ब्लोगिंग्………और सब पर लागू होती है कोई मान लेता है कोई नाशुक्रा निकलता है।

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  34. रश्मि जी , मेरे विचार से यह बात हर व्यक्ति पर उसके अपने मन की उदारता, संस्कार और आत्मसात किये हुए मूल्यों के अनुसार लागू होती है ! कुछ लोग छोटी से छोटी बात का श्रेय अपने मेंटर्स और सहायकों को देने में कभी कंजूसी नहीं करते वहीं ऐसे अहसानफरामोश लोग भी हैं जो अपने माता-पिता के किये हुए त्याग और बलिदान को भी किसी गिनती में नहीं गिनते ! मेरे विचार से दूसरी श्रेणी से के लोगों से बढ़ कर निकृष्ट और कोई नहीं हो सकता ! आपके आलेख सदैव विचारोत्तेजक होते हैं ! आभार आपका !

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  35. सुंदर प्रवाह, बढि़या रवानी.

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  36. बहुत बेहतरीन....
    मेरे ब्लॉग पर आपका हार्दिक स्वागत है।

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  37. बुढ पुरनिये के कहे को अपने हिसाब से इस्तेमाल करने वाले बहुत हैं जी. गीता की लाइनें कहाँ नहीं कोट कर देते लोग :) और क्या कहें - ऑप्शनल के चक्कर में हम स्किप कर लेते हैं. :P

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  38. रश्मि जी सुन्दर विचारों से लदी आपकी रचना पढ़ बड़ा अच्छा लगा..
    बड़ा सुकून मिलता है किसी का एहसान मान लेने से...शुक्रिया कहने से मोहब्ब्त का खजाना और बढ़ जाता है..
    आपकी लेखनी चिरायु हो..
    शुभकामनाएँ...

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  39. People come into your life
    For a reason
    For a season
    or For lifetime

    ये बड़ा अच्छा कहा आपने...और व्याख्या भी कर दिया इसका ...:) :)

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  40. ब्‍लाग तो हिन्‍दयुग्‍म पढ़ते हुए अचानक ही बन गया लेकिन इसे चिठटा जगत और ब्‍लागवाणी से जोड़ने का उपाय बताया कविता वाचकनवी जी ने। फिर सभी लोगों की टिप्‍पणियों ने लिखने को प्रेरित किया। वर्तमान में तो ब्‍लाग पर लिखने में ही आनन्‍द आता है, प्रकाशकों के तकाजे आ रहे हैं कि कोई नयी पुस्‍तक नहीं दे रही हैं आप, लेकिन यहाँ तो ब्‍लाग पर लिखने में ही संतुष्टि मिल रही हैं। अच्‍छा आलेख है।

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  41. ऑप्शनल है न, तो मैं चित्र की तारीफ़ करने आया हूँ :)
    जोक्स अपार्ट, वाकई सही बातें कहीं हैं आपने।

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  42. सच कहूँ तो मुझे कभी किसी ने यहाँ नहीं बुलाया, खुद ही पता नहीं कैसे कहाँ से टपक लिया इधर. कुछ लिखना भी अचानक ही शुरू हुआ, बिना किसी के कुछ कहे.
    मगर फिर भी शुरुवाती कला में प्रोत्साहित करने वालों को कैसे भूल सकता हूँ? उनके नाम दिए जा रहा हूँ.

    अविनाश दास(भैया)
    फिलिप शास्त्री जी
    प्रमोद सिंह जी
    समीर जी
    ज्ञानदत्त जी
    दिनेश द्विवेदी जी
    रवि रतलामी जी
    युनुस जी
    अनूप जी

    और भी कई मित्र हैं, सबका नाम समेटा नहीं जा सकता है. सो सिर्फ शुरुवाती दिनों के नाम दे रहा हूँ धन्यवाद सहित.

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  43. @ PD

    हा हा ...ये तो पोस्ट तो जैसे सबको अपने प्रेरकों को याद करने का बहाना बन गया है...

    कई बार ब्लॉग बन जाने के बाद भी लोग सहायता करते रहते हैं...सुझाव देते हैं...इस विधा में लिखो...ऐसा लिखो..वैसा लिखो....
    अब उन्हें याद करना अपने-अपने स्वभाव..अपने संस्कार पर निर्भर है..
    जिन लोगों ने प्रेरणा देने वालों को याद किया..उन्हें याद किया जाना अच्छा लगा होगा..और याद करने वालों को भी ख़ुशी मिली होगी.

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