कितना अच्छा होता
सपने बाजारों में बिका करते...
बड़े-बड़े शोरूम में सजे
चमकते शीशे की दीवारों के पीछे
ए.सी. की ठंडक में महफूज़
रुपहले,सुनहले,चमकीले सपने
पास बुलाते...दूर से लुभाते..
पर,उनकी सतरंगी आभा से चकाचौंध
आम लोग,
अपनी जेबें टटोल
निराश मन
मुहँ मोड़ आगे बढ़ जाते
लेकिन सपने तो पड़े होते हैं
हर कहीं
टूटी झोपडी के अँधेरे कोने में
धूल भरी पगडंडियों पर
चीथड़े ढके तन पर
चोट खाए मन पर
बस उठा कर
बसा लो, आँखों में
पर टूटते सपनो की किरचें
कर जाती हैं लहुलुहान
तन और मन
काश! होते सपने
सबकी पहुँच से दूर
बहुत दूर..
फिर हर कोई नहीं खरीद पाता उन्हें...

acchi lagi aapki yah kavita rashmi ji......
ReplyDeleteसपनों की दुनिया का यह रंग, सपनों को लेकर यह ख्याल.. बहुत ही खूबसूरत हैं... एक पुराना शेर याद आगया आपकी बात से:
ReplyDeleteख्वाब तो कांच से भी नाज़ुक हैं,
टूटने से इन्हें बचाना है!
बहुत सुंदर !!
ReplyDeleteसपने हों लेकिन उन्हें पूरा करना जब अपने वश में न हो तो जो तकलीफ़ होती है उसका सजीव चित्रण है
बहुत बढ़िया !!
सच है...बहुत खूबसूरत कविता है दीदी...
ReplyDeleteसपने मुझे तो बड़े कम्प्लीकेटेड से लगते हैं....:(
...पर सपने ही तो है तो ठीक-ठाक लिए जा सकते हैं
ReplyDeleteसपनों की एक दुनिया सबके पास है, देखने के लिये, जीने के लिये। बहुत ही सुन्दर कविता।
ReplyDeleteअब सपने भी महंगे शो रूम के हवाले कर दिए जायेंगे तो हम जैसे गरीबे गुरबा क्या करेंगे :)
ReplyDeleteसुन्दर प्रस्तुति
ReplyDeleteGyan Darpan
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सपने तो मुफ्त में ही मिल जाते हैं । लेकिन सच कहा , उन्हें हकीकत में बदलने की भारी कीमत होती है, जो सब के पास नहीं होती ।
ReplyDeleteअपने तो अपने होते हैं, बाकी सब सपने होते हैं....
ReplyDeleteजय हिंद...
कितना अच्छा होता
ReplyDeleteसपने बाजारों में बिका करते... सड़ जाते - क्योंकि अब तो कोई खरीदता भी नहीं
........
लेकिन सपने तो पड़े होते हैं
हर कहीं
टूटी झोपडी के अँधेरे कोने में
धूल भरी पगडंडियों पर
चीथड़े ढके तन पर
चोट खाए मन पर- यही सही मायनों में सपने हैं , जिन्हें बेचा नहीं जा सकता
लेकिन सपने तो पड़े होते हैं
ReplyDeleteहर कहीं
टूटी झोपडी के अँधेरे कोने में
धूल भरी पगडंडियों पर
चीथड़े ढके तन पर
चोट खाए मन पर
इन जगहों पर पड़े सपने कभी पूरे नहीं होते, अपने विशेषण को सार्थक करते रहते हैं. सुन्दर कविता.
क्यों रश्मि, सपनों से क्यों वंचित करना चाहती हो? मेरा काम तो सपनों के बिना नहीं चलेगा।
ReplyDeleteघुघूती बासूती
सपने तो हकीकत में भी बिकते हैं। सपनों के सौदागर हर रोज हमें ठगते हैं, और हम ठगे जाने के बाद भी फिर से सपने खरीदने के लिए तैयार रहते हैं।
ReplyDeleteयही फ़र्क होता है सपने और हकीकत मे।
ReplyDeleteकल 24/12/2011को आपकी कोई पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
ReplyDeleteधन्यवाद!
बहुत अच्छी कविता।
ReplyDeleteए.सी. की ठंडक में कांच के बड़े बड़े शो रूम्स में सजे सपने खरीदने का जिनमें बूता होता है वही उन्हें सच कर पाते हैं ! टूटी झोंपड़ी के आस पास धूल भरी पगडंडियों पर बिखरे और यहाँ वहाँ चीथड़ों में लिपटे सपनों की नियति में टूटना ही लिखा होता है ! बहुत ही सुन्दर कविता ! बधाई स्वीकार करें !
ReplyDeleteफिर तो झोपड़ियां सपनों के लिए भी तरस जायेंगी...
ReplyDeleteअच्छी रचना
सादर.
खूबसूरत कविता
ReplyDeleteसपने तो सपने ही होते हैं...चाहे वो अमीर के हो या गरीब के...
ReplyDeleteकुछ ए सी रूम में दिखाई देते तो फ्रेश हैं और फ्रेश ही रह जाते है ताउम्र...पूरे नहीं हो पाते...जिन्हें दूर से देख कर रश्क होता है कईयों को...
और झोपड़ियों के सपने कब चुपके से पूरे हो जाते है पता ही नहीं चल पाता क्यूँ कि वहां तक किसी की कभी नज़र ही नहीं जाती...
फिर सपने सपने ही होते हैं...पूरे हो गए तो यथार्थ में बदल जाते हैं...सुन्दर और कुरूप दोनों ही...
चाहे सपने वो अमीर के हों या गरीब के...सपने ही रहें तो बेहतर है...
है कोई सपनो का सौदागर?
ReplyDeleteलेकिन सपने तो पड़े होते हैं
ReplyDeleteहर कहीं
टूटी झोपडी के अँधेरे कोने में
धूल भरी पगडंडियों पर
चीथड़े ढके तन पर
चोट खाए मन पर ...
बाज़ारों में बिकते भी हो तो भी सपने खुद ही देखने चाहियें ... उनके टूटने पे किरचें नहीं होती ...
आज अलग अंदाज़ है आपका ... रचना बहुत ही संवेदनशील लगी ...
"काश ! सपने बाज़ारों में भी बिकते" ऐसा कहने वाले भी बहुत मिलते हैं जी :)
ReplyDelete:)
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