गुरुवार, 22 दिसंबर 2011

एक ख़याल...बस यूँ ही सा...



कितना अच्छा होता
सपने बाजारों में बिका करते...
बड़े-बड़े शोरूम में सजे
चमकते शीशे की दीवारों के पीछे 
ए.सी. की ठंडक में महफूज़

रुपहले,सुनहले,चमकीले सपने
पास बुलाते...दूर से लुभाते..
पर,उनकी सतरंगी आभा से चकाचौंध  
आम लोग, 
अपनी  जेबें टटोल 
निराश मन 
मुहँ मोड़ आगे बढ़ जाते 

लेकिन  सपने तो पड़े  होते हैं 
हर कहीं
टूटी झोपडी के अँधेरे कोने में 
धूल भरी पगडंडियों  पर 
चीथड़े ढके तन पर
चोट खाए मन पर

बस उठा कर 
बसा लो, आँखों में 
पर टूटते सपनो की किरचें 
कर जाती हैं लहुलुहान 
तन और मन 

काश! होते सपने 
सबकी पहुँच से दूर 
बहुत दूर..
फिर हर कोई नहीं खरीद पाता उन्हें...

24 टिप्‍पणियां:

  1. सपनों की दुनिया का यह रंग, सपनों को लेकर यह ख्याल.. बहुत ही खूबसूरत हैं... एक पुराना शेर याद आगया आपकी बात से:
    ख्वाब तो कांच से भी नाज़ुक हैं,
    टूटने से इन्हें बचाना है!

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  2. बहुत सुंदर !!
    सपने हों लेकिन उन्हें पूरा करना जब अपने वश में न हो तो जो तकलीफ़ होती है उसका सजीव चित्रण है
    बहुत बढ़िया !!

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  3. सच है...बहुत खूबसूरत कविता है दीदी...
    सपने मुझे तो बड़े कम्प्लीकेटेड से लगते हैं....:(

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  4. ...पर सपने ही तो है तो ठीक-ठाक लिए जा सकते हैं

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  5. सपनों की एक दुनिया सबके पास है, देखने के लिये, जीने के लिये। बहुत ही सुन्दर कविता।

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  6. अब सपने भी महंगे शो रूम के हवाले कर दिए जायेंगे तो हम जैसे गरीबे गुरबा क्या करेंगे :)

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  7. सपने तो मुफ्त में ही मिल जाते हैं । लेकिन सच कहा , उन्हें हकीकत में बदलने की भारी कीमत होती है, जो सब के पास नहीं होती ।

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  8. अपने तो अपने होते हैं, बाकी सब सपने होते हैं....

    जय हिंद...

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  9. कितना अच्छा होता
    सपने बाजारों में बिका करते... सड़ जाते - क्योंकि अब तो कोई खरीदता भी नहीं
    ........
    लेकिन सपने तो पड़े होते हैं
    हर कहीं
    टूटी झोपडी के अँधेरे कोने में
    धूल भरी पगडंडियों पर
    चीथड़े ढके तन पर
    चोट खाए मन पर- यही सही मायनों में सपने हैं , जिन्हें बेचा नहीं जा सकता

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  10. लेकिन सपने तो पड़े होते हैं
    हर कहीं
    टूटी झोपडी के अँधेरे कोने में
    धूल भरी पगडंडियों पर
    चीथड़े ढके तन पर
    चोट खाए मन पर
    इन जगहों पर पड़े सपने कभी पूरे नहीं होते, अपने विशेषण को सार्थक करते रहते हैं. सुन्दर कविता.

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  11. क्यों रश्मि, सपनों से क्यों वंचित करना चाहती हो? मेरा काम तो सपनों के बिना नहीं चलेगा।
    घुघूती बासूती

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  12. सपने तो हकीकत में भी बिकते हैं। सपनों के सौदागर हर रोज हमें ठगते हैं, और हम ठगे जाने के बाद भी फिर से सपने खरीदने के लिए तैयार रहते हैं।

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  13. यही फ़र्क होता है सपने और हकीकत मे।

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  14. ए.सी. की ठंडक में कांच के बड़े बड़े शो रूम्स में सजे सपने खरीदने का जिनमें बूता होता है वही उन्हें सच कर पाते हैं ! टूटी झोंपड़ी के आस पास धूल भरी पगडंडियों पर बिखरे और यहाँ वहाँ चीथड़ों में लिपटे सपनों की नियति में टूटना ही लिखा होता है ! बहुत ही सुन्दर कविता ! बधाई स्वीकार करें !

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  15. फिर तो झोपड़ियां सपनों के लिए भी तरस जायेंगी...

    अच्छी रचना
    सादर.

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  16. सपने तो सपने ही होते हैं...चाहे वो अमीर के हो या गरीब के...

    कुछ ए सी रूम में दिखाई देते तो फ्रेश हैं और फ्रेश ही रह जाते है ताउम्र...पूरे नहीं हो पाते...जिन्हें दूर से देख कर रश्क होता है कईयों को...

    और झोपड़ियों के सपने कब चुपके से पूरे हो जाते है पता ही नहीं चल पाता क्यूँ कि वहां तक किसी की कभी नज़र ही नहीं जाती...

    फिर सपने सपने ही होते हैं...पूरे हो गए तो यथार्थ में बदल जाते हैं...सुन्दर और कुरूप दोनों ही...

    चाहे सपने वो अमीर के हों या गरीब के...सपने ही रहें तो बेहतर है...

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  17. लेकिन सपने तो पड़े होते हैं
    हर कहीं
    टूटी झोपडी के अँधेरे कोने में
    धूल भरी पगडंडियों पर
    चीथड़े ढके तन पर
    चोट खाए मन पर ...

    बाज़ारों में बिकते भी हो तो भी सपने खुद ही देखने चाहियें ... उनके टूटने पे किरचें नहीं होती ...
    आज अलग अंदाज़ है आपका ... रचना बहुत ही संवेदनशील लगी ...

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  18. "काश ! सपने बाज़ारों में भी बिकते" ऐसा कहने वाले भी बहुत मिलते हैं जी :)

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