Wednesday, March 23, 2011

जरा सी सूझ-बूझ ,संवाद और संयम से संभव है समस्याओं का समाधान (१)


अपनी पिछली पोस्ट के विषय को ही आगे बढाने की कोशिश है....पर इस बार कुछ सकारात्मक कदम की चर्चा. अक्सर बच्चों द्वारा आत्महत्या की ख़बरें पढ़ मन दुखी हो जाता है..और हाल में ही ग्यारह साल की बच्ची द्वारा ऐसे कदम उठाने की खबर से तो जैसे पूरी मुंबई ही दहल गयी. इस समस्या को सुलझाने की कोशिश कई अखबारों ने भी की. Mumbai Mirror ने मशहूर मनोचिकित्सक हरीश  शेट्टी का एक आलेख प्रकाशित किया है जिसमे उन्होंने चार ऐसे बच्चों की समस्या की चर्चा की..जहाँ अभिभावक-शिक्षक की सूझबूझ से बच्चे उस राह तक जाते-जाते लौट आए.

एक बारह साल  के बच्चे को उसकी माँ 'हरीश शेट्टी' के क्लिनिक में ले गयी और चीख कर कहा ..."इसने हमारा जीना मुश्किल कर दिया है...इसने अपना हाथ काट लिया है" डॉक्टर ने माँ को बाहर भेज कर बच्चे के कंधे पर हाथ रखा . बच्चा आधे घंटे तक  आँखों में आँसू लिए सर झुकाए बैठा रहा. कुछ नहीं बोला. माँ ने बताया कि बच्चे की किताब में से 150 रुपये मिले हैं...इसने चोरी की है.पर वह कुछ नहीं बता रहा...बहुत मारने पर भी कुछ नहीं बोला और बाथरूम में जाकर अपना हाथ काट लिया...मेरे पति सारा दोष मुझे देते हैं..." वह रोने लगी.

उसके पिता को बुला कर पूछने पर उन्होंने रूखेपन से कहा, "इस से कहिए चोरी ना करे...मैं सारा दिन इसके अच्छे भविष्य के लिए खटता हूँ ...अगर फिर से उसने ऐसा किया तो मैं इसे घर से बाहर निकाल दूंगा"
 

हरीश शेट्टी ने बच्चे के सामने ही उसकी माँ से कहा.. “There is nothing like a word Lie in my dictionary. Lie is truth postponed, suspended, delayed. He was just scared.

अगली मीटिंग उन्होंने क्लिनिक से अलग  एक कैफे में रखी और बच्चे ने कहा  कि "आप मेरे पापा को नहीं बताएँगे तब मैं सारी बात बताऊंगा"....और उसने आगे बताया कि "मैने  अपने पिता के पर्स में  से 500 रुपये निकाले... अपने दोस्तों को कोल्ड ड्रिंक और बर्गर खिलाया,क्यूंकि वे हमेशा मुझे  खिलाते थे....मैं बहुत खुश था....मुझे ये नहीं लगा कि मैने चोरी की है...मुझे लगा वे मेरे पापा के पैसे हैं.....मैं उनका अच्छा मूड देखकर उन्हें बता दूंगा...वे हमेशा नाराज़ रहते  हैं...आराम नहीं करते..ठीक से सोते नहीं....पर मेरे बताने के पहले ही उन्हें पता चल गया और उन्होंने मुझे बहुत मारा...मैंने गुस्से और डर के मारे नहीं बताया...मैं मर जाना चाहता था...पर मैं डर गया...और मैने, अपना हाथ काट लिया "

डॉक्टर ने माता-पिता से बात की....पिता ने भी अपनी समस्याएं रखीं....अपने कठिन बचपन  की बातें शेयर की...और घर में शांतिपूर्ण माहौल  बनाने की कोशिश  का वायदा किया.

यह बहुत ही साधारण सी बात लगती है. पता नहीं..कितने लोगों ने बचपन में घर से कुछ चुराने के लिए मार खाई होगी. पर आज मुझे भी लग रहा है...इस 'चोरी' शब्द का प्रयोग क्या सही है?? बच्चों को शायद हमेशा यही लगता हो कि ये उनका घर है...उसकी चीज़ों पर उनका हक़ है...डर के मारे वे पहले पूछते नहीं होंगे क्यूंकि ' सार्थक संवाद ' की कमी अक्सर भारतीय परिवारों में रहती है. पहले भी पिता,बहुत घुल-मिलकर अपने बच्चों से बातें नहीं करते थे.


मुझे याद है..मेरे  छोटे भाई ने सात साल  की उम्र में बिना पूछे , घर से  एक चवन्नी ले कर टॉफी खाई थी....और इसके लिए उसे मम्मी का चांटा भी पड़ा था (टॉफी के लिए नहीं...बिना पूछे,पैसे उठाने के लिए और अकेले दूकान तक जाने के लिए )...आज भी हम उस घटना को याद करते हैं कि वो कितना शरारती था...पर आज मुझे लग रहा है..उसने अपना 'हक़' समझा होगा...ऐसे ही किसी ने अपना संस्मरण सुनाया था...कि वो घर से पैसे लेकर पतंग ख़रीदा करता था...उसकी माँ उसे पतंग की दुकानों  पर ले गयी और उनसे कहा  कि..."इसे पतंग मत देना....यह घर से पैसे चुरा कर पतंग खरीदता  है"  तब के बच्चे ...एक घंटे बाद ही, ये मार-पिटाई भूल जाते थे...पर आज जमाना सचमुच बदल  गया है. हमें भी अपने तौर-तरीके बदलने  होंगे. और कहीं ऐसा तो नहीं कि ये बड़ों का अहम् है कि हर चीज़ हमसे पूछ कर करे. अनुशासन सिखाते हुए हम अति कर  जाते  हैं.अगर बच्चे ने बिना पूछे कुछ ले लिया तो हम यह सोच घबरा जाते हैं कि...यह बड़ा होकर चोर-डाकू ही न बन जाए. पर फिर अच्छी  बातें सिखाना भी जरूरी....बड़ी ही जटिल स्थिति है.

एक दूसरे केस में एक रुढ़िवादी  परिवार की महिला, अपने किशोर बेटे की डायरी लेकर उनके पास आई. बेटे ने बारह से चौदह वर्ष की उम्र की तीन लड़कियों की प्रशंसा में गद्य और कविताएँ लिख रखी थीं. 60 पन्नों की वो डायरी पढ़कर उसकी लेखन प्रतिभा पर हरीश शेट्टी चमत्कृत रह गए. जब उन्होंने उसकी माँ से कहा...कि "आपको गर्व होना चाहिए अपने बेटे पर, इतना अच्छा लिखता है...उसे प्रोत्साहित करना चाहिए"
 

तो उसकी माँ नाराज़ हो गयी...."मैं आपके पास सलाह लेने आई थी कि उसे कैसे निकाला जाए इन सब से और आप प्रोत्साहन की बात कर रहे हैं...वह तीन लड़कियों की तारीफ़ में कविताएँ कैसे लिख सकता है?....पढ़ाई और प्रेम की अपनी उम्र होती है"

उन्होंने माँ से पूछा, "अपने बेटे की उम्र में आपको कोई अच्छा लगा था?"

माँ ने कहा..."हाँ लगता था...पर हमारे भारतीय संस्कृति में ऐसी भावनाओं को प्रकट  नहीं किया जाता...."
 

कुछ देर बात करने पर माँ ने बताया कि उनका बेटा, बारह साल की उम्र तक उनसे सब शेयर करता था. एक दिन वह स्कूल से भागता हुआ उनके पास किचेन में आया और उन्हें बताया कि उसके क्लास की एक लड़की उसकी बहुत अच्छी दोस्त है...उसे होमवर्क में मदद करने के लिए उसकी कॉपी लेकर घर आया है. माँ ने उसे बहुत डांटा कि "लड़कियों से दोस्ती करने में नहीं ..अपनी पढ़ाई पर ध्यान दो" तब से वह अंतर्मुखी हो गया...और अब उनसे कुछ भी  शेयर नहीं करता."

हरीश शेट्टी ने उन्हें सलाह दी कि आप बेटे से कहिए कि आपने उसकी डायरी देखी है...वह बहुत अच्छा लिखता है...उनके ऐसा कहने पर बेटे ने खुश होकर उन्हें अपना लिखा कुछ और भी दिखाया. पर जब यह बात उसके पिता को पता चली तो उन्होंने बहुत हंगामा किया. डॉक्टर की क्लिनिक में आकर कहा की..."ये उनका परिवार है..वे निश्चित करेंगे कि कौन क्या करेगा"

डॉक्टर ने कहा कि वे सिर्फ इतना चाहते हैं कि "उसकी विलक्षण लेखन प्रतिभा की तारीफ़ की जाए..इसके लिए उसे शर्मिंदा ना किया जाए.." कुछ देर बाद पिता ने भी अपने बचपन की यादें शेयर कीं कि कितना कठोर बचपन गुजरा उनका. 

यहाँ माता-पिता ने बिलकुल उपयुक्त  समय पर सही सलाह  लेकर अपने बच्चे के साथ कुछ कठोर व्यवहार करने और उसे डिप्रेशन में जाने से बचा लिया.

शायद अक्सर माता-पिता अपने बचपन की कुंठाएं ही अपने बच्चों पर भी  निकालते  हैं और यह पैटर्न पीढ़ी दर पीढ़ी चलता रहता है.
 
(अगली पोस्ट में दो और किशोर समस्याओं की  चर्चा )

34 comments:

abhi said...

एक मेरा दोस्त है, बात है लगभग १९९७-१९९८ की...फिल्म बोर्डर उसके आसपास रिलीज हुई थी, उसे मैंने फिल्म बोर्डर का एक गाना "संदेशे आते हैं" एक कागज़ पे लिख के दिया था, मुझे भी ये गाना मेरे मित्र प्रभात ने दिया था...वो बहुत खुश था की उसे पहली बार किसी गाने के बोल मिल रहे हैं...उसे उसने बड़ा ही संभाल कर अपने बैग में रख लिया था...
दूसरे दिन वो मुझसे मिला नहीं...तीसरे दिन मुझे बात पता चली की उसकी माँ ने जब देखा की बैग में एक कागज़ पे फिल्म के गाने लिखे हुए हैं तो आग बबूला हो गयी...उसी समय उन्होंने वो कागज़ बाहर फेंकवा दिया और थोड़ी पिटाई भी हुई उसकी, उसकी माँ ने उससे कहा की तुम्हारी दोस्ती बहुत गलत गलत लड़कों से हो गयी है...ये सब बिगड़े हुए लड़कों का काम है...उसकी माँ ने जब अच्छे से उसका बैग चेक किया तो पाया की कुछ शायरी जैसा उसने लिखा था...उनका गुस्सा और बढ़ गया और दोस्तों से मिलना जुलना भी उन्होंने बंद करवा दिया...

मैं हैरान तब हो गया जब वो एक किताब "विंग्स ऑफ फायर" अब्दुल कलाम का लिखा हुआ किताब घर ले गया था पढ़ने को और फिर जब उसके पापा को पता चला तो बहुत डांट भी खायी उसने..उसके पापा का कहना था ये सब फ़ालतू काम इस घर में नहीं चलेगा...केवल पढाई करो..

उस दोस्त का नाम मैं बताऊंगा नहीं, लेकिन इन सब के बाद उसकी बहुत दोस्तों से दोस्ती खत्म हो गयी, उसे घर से ज्यादा निकलने की मनाही हो गयी..वो बेहद उदास रहने लगा....माँ=बाप ये सोचने लगे की वो इन सब चक्करों में रहेगा तो बर्बाद हो जाएगा...

इस दोस्त के कुछ और किस्से हैं जिसे मैं अभी नहीं कहूँगा.

प्रवीण पाण्डेय said...

कई बार बात करते रहने से ही नैराश्य नहीं पनपता है।

अरुण चन्द्र रॉय said...

रश्मि जी एक बार मैंने भी चोरी की थी.. रूपये चुरा कर गाड दिए थे कि पेड़ बनेंगे... बाबूजी उस दिन कोई सजा नहीं दिए.. बस साप्ताहिक हाट ले जाते थे वे सो नहीं ले गए... यही सजा थी.. आज भी अपने पोतो को बताते हैं वो घटना और हँसते हैं कि वही गाड़े हुए पैसे वृक्ष बने हैं और आज जो थोड़ी बहुत कमी है सो वहीँ से है... वो दिन आज भी याद है.. अधिक पढ़े लिखे नहीं थे लेकिन बच्चो के मनोविज्ञान से परिचित थे शायद....

Rakesh Kumar said...

बच्चों को 'विषाद योग'की अति आवश्यकता होती है.उचित सूझ बुझ , संवाद और संयम से ही उनका विषाद योग बनता है

शुभम जैन said...

samay ke saath badlaw bahut jaruri hai...

Vivek Rastogi said...

बच्चों की मानसिकता को समझते हुए उनसे संवाद बहुत ही महत्वपूर्ण है।

वन्दना said...

आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
कल (24-3-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

http://charchamanch.blogspot.com/

डॉ टी एस दराल said...

बच्चों को बहुत सावधानी से हैंडल करना पड़ता है । उनके नाज़ुक मन पर हर बात का प्रभाव पड़ता है ।

Rahul Singh said...

गंभीर और नाजुक.

रश्मि प्रभा... said...

एक छोटी सी ख्वाहिश में चोर नहीं कहना चाहिए बच्चों को ... समझाना है तो कहिये कि यह गलत बात है , मांग लेते , होने पर देंगे , नहीं तो अपनी बात बताएँगे ... आपसी समझ होनी चाहिए .

सतीश पंचम said...

बहुत ही नाजुक मसला है ये.....सख्ती और ढील के बीच बहुत संतुलन साधना पड़ता है। जरा सी नासमझी से क्या से क्या होने में देर नहीं लगती। कोई बात यदि बच्चे अपने दिल पर ले लें तो फिर उससे उबरने में बहुत लंबा वक्त लगता है।

वैसे, इस तरह के मामले अब तमाम कम्पटीशन वाले वातावरण वगैरह के कारण ज्यादा बढ़ते जा रहे हैं। पिता चाहता है कि बेटा कुछ बन जाय तब जाकर शौक पूरा करे और बेटा चाहता है कि अपने बाकी दोस्तों की तरह अभी अपना शौक पूरा न करे तो कब करे और यहीं से टकराहट बढ़ जाती है।

पोस्ट तो बढ़िया है ही, टिप्पणियां भी बहुत ज्ञानवर्धक है।

मनोज कुमार said...

@ शायद अक्सर माता-पिता अपने बचपन की कुंठाएं ही अपने बच्चों पर भी निकालते हैं
बिल्कुल सही कहा है आपने।
एक विचारोत्तेजक आलेख।

Sadhana Vaid said...

किशोर वय के बच्चे बहुत भावुक और संवेदनशील होते हैं ! उनके साथ बहुत समझदारी से पेश आने की ज़रूरत होती है ! डरा धमका कर, मारपीट कर या जोर ज़बरदस्ती से अपनी बीमार मानसिकता को उनपर थोपने का प्रयास करने पर गंभीर परिणाम ही सामने आयेंगे ! उनके साथ प्यार और सहानुभूति के साथ दोस्तों की तरह व्यवहार करना चाहिये ताकि वे निर्भीक हो आपके साथ अपने मन की उलझनों और भ्रांतियों को बाँट सकें ! जब आपका व्यवहार संतुलित, संयमित और मित्रवत होगा तो आप पर निश्चिन्त होकर विश्वास कर सकेंगे और तब वे आपके बताए सुझावों को मानने से भी हिचकिचाएंगे नहीं ! आपने बहुत नाज़ुक मुद्दे को विमर्श के लिये उठाया है ! इतने चिंतनीय आलेख के लिये बहुत बहुत बधाई !

राजेश उत्‍साही said...

रश्मि जी आपने बहुत अच्‍छी श्रंखला शुरू की है। यह पोस्‍ट बहुत सधी हुई और सार्थक है। मुझे लगता है इसे हर अभिभावक को पढ़वाया जाना चाहिए।
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मुझे याद है कि जब मैं शायद चार का रहा होऊंगा तब मैंने घर में रखे एक‍ डिब्‍बे से पांच रूपए निकालकर उससे पांच पैसे वाली एक फिरकनी खरीदी थी। बाकी पैसे लाकर डिब्‍बे में रख दिए थे। माता-पिता को पता चला तो पिटाई नहीं की। बल्कि समझाया कि जो चाहिए उन्‍हें बताएं। एक समय हम छह भाई बहन थे।(अब चार ही हैं।) पिताजी रेल्‍वे में थे। हर महीने जब वे वेतन लेकर आते, वेतन हम सब बच्‍चों को बताया जाता। उसे मां एक संदूक में रखती थीं।संदूक की चाबी कहां रखी है,यह भी हमें पता होता था। हम से कहा जाता था हमारे पास इतने ही पैसे हैं। इसीसे महीने भर का खर्च चलाना है। अब जिसे जितने पैसे चाहिए हों वह सोच समझकर ले ले। जाहिर है जिम्‍मेदारी हम बच्‍चों पर भी होती थी। इससे पैसे चुराने का कभी मौका ही नहीं। साथ ही साथ पैसे को कैसे खर्च करना है इसकी एक समझदारी भी विकसित होती गई।
*

मेरे दो बेटे हैं। मैंने और पत्‍नी ने भी यही उनके साथ किया। पैसे घर में कहां रखे हैं,बच्‍चों को मालूम होता था। जो जरूरत है ले लो,लेकिन बताकर। मुझे यह बताते हुए बहुत संतोष होता है कि हमारा प्रयोग भी सफल रहा। हम कभी भी चोरी जैसी समस्‍या का सामना नहीं करना पड़ा। साथ ही घर और उसकी जरूरतों के प्रति एक जिम्‍मेदारी का भाव भी उनमें हम पैदा कर पाए।

राजेश उत्‍साही said...

मैंने जब कविताएं लिखना शुरू किया तो जाहिर है वे प्रेम कविताएं थीं। और कुछ ऐसा हुआ कि उन कविताओं में मेरी प्रेरणा स्रोत रही लड़की का नाम भी आ ही जाता था। ये कविताएं दो कॉपियों में थीं। पिताजी को मेरे लिखने-पढ़ने से ऐतराज तो नहीं था,पर वे चाहते थे कि मैं पढ़ाई में भी ध्‍यान लगाऊंगा। बहरहाल एक बार जब वे अपनी एक ट्रेनिंग के लिए भुसावल गए तो मेरी कविताओं की कॉपियां मांगकर अपने साथ ले गए। मैं बहुत घबराया कि अब जब लौटेंगे तो बहुत नाराज होंगे। वे पंद्रह दिन बाद लौटे और मेरी कॉपियां भी सही सलामत लौंटी। इतना ही नहीं एक दो जगह उन्‍होंने अपने हाथों से कुछ सुधार भी उनमें किए थे।

राज भाटिय़ा said...

बहुत सुंदर बात कही आप ने, हमे बच्चो के संग मित्र जैसा व्याहार ही करना चाहिये, मै अपने पर्स मे हमेशा १००€ रख देता हुं जिस बच्चे को जितने चाहिये ले जाये, ओर बच्चे खुद ही बता देते हे, कारण खत्म होने पर फ़िर से १००€ रख दे

rashmi ravija said...

@राजेश जी,
आप सचमुच भाग्यशाली हैं कि आपके पिता इतने उदार थे....वरना प्रेम कविताएँ लिखने की छूट शायद ही किसी किशोर को मिली हो :)

anshumala said...

रश्मि जी

कुछ लोगो को छोड़ दे तो कितने अभिभावकों में ये क्षमता है की वो ये समझे की बच्चे के साथ कोई समस्या है या हमें उससे बात करनी चाहिए ये उसे समझाना चाहिए यहाँ तो ज्यादातर माँ बाप खुद मनोचिकित्सक के पास ले जाने लायक बीमार होते है | खुद एक नीरस रूटीन जीवन जीते है और चाहते है की बच्चे भी बस सोना खाना और पढ़ना के सिवा कुछ न करे और उनके हुकुम के गुलामो की तरह रहे | विवाह हुआ और बच्चे हो गए से माता पिता बनने वालो से हम संवेदन्शीलता भावुकता समझदारी जैसे शब्द इस्तेमाल नहीं कर सकते है उन्हें तो ये ही नहीं लगता की बच्चो को भी कोई समस्या हो सकती है वो मानसिक रूप से परेशान हो सकते है उनके अन्दर भी मन अपमान आदि की भावना हो सकती है उनके लिए उनका बच्चा सदा बच्चा ही होता है और वो वही पुरेने तरीके से उन्हें पलते और समझते है जैसे वो और उनके बाप दादा पलते आये है | आज कल के बच्चे हमसे बहुत ही अलग सोच और समझ ले कर इस दुनिया में आये है उन पर हमें अपनी क्षमता से ज्यादा ध्यान देना होगा | अच्छी पोस्ट |

rashmi ravija said...

@ अभी
अफ़सोस हुआ तुम्हारे मित्र की बातें सुन....पर यह आम किशोरों का किस्सा है....बहुत कम माता-पिता ही इतने उदार होते हैं कि सहज भाव से यह सब स्वीकारें...और प्रोसाहित भी करें.

वन्दना अवस्थी दुबे said...

सम्वादहीनता की स्थिति बहुत खतरनाक होती है. जिन घरों में अभिभावक बच्चों की बात सुनते-करते हैं वहां बच्चे अपेक्षाकृत प्रसन्न दिखाई देते हैं, निराशा नहीं पनप पाती.
रश्मि, पहले के बच्चे सचमुच ही डांट या मार को गम्भीरता से नहीं लेते थे, लेकिन आज समय बदल गया है माहौल भी. कौन सी बात बच्चे के मन में बैठ जाये पता नहीं.
गम्भीर मुद्दे पर बहुत अच्छी पोस्ट. ज़रूरी भी.

वाणी गीत said...

अभिभावकों को बढती उम्र के बच्चों के साथ व्यवहार करते समय अपने समय को भी याद कर लेना चाहिए ...अनुशासन और दुलार दोनों का सही मिश्रण बच्चों को आपके करीब लाता है ...
अच्छी पोस्ट !

खुशदीप सहगल said...

दरअसल हम बच्चों में अपना वो अक्स ढूंढना शुरू कर देते हैं जो हम जीवन में न बन पाए या जिसके हमने सपने संजो रखे थे..ऐसी स्थिति में हम यही उम्मीद करते हैं कि जैसा हम चाहते हैं बच्चे बस वैसा ही करें...ये बच्चों को फॉर ग्रान्टेड लेना ही समस्या पैदा करता है...इसका बस एक ही समाधान है, हम अपनी उम्र को भूल कर उसी उम्र, उसी परिवेश में जाकर सोचें जिससे कि बच्चा गुज़र रहा है...लेकिन हम क्या ऐसा कर पाते हैं...

जय हिंद...

ali said...

अगली पोस्ट में आने वाले दोनों किशोरों की समस्या भी पढ़ लूं तो शायद कमेन्ट करने में सुविधा होगी !

ZEAL said...

सूझ बुझ , संवाद और संयम से ही सारी समस्याओं का समाधान मिल जाता है , लेकिन व्यक्ति इतना impatient होता जा रहा है की अपनों के लिए ही वक़्त नहीं निकाल पाता और फिर तमाम हादसे होते रहते हैं , छोटी-छोटी भूलों से ।

ताऊ रामपुरिया said...

संवाद हीनता ना हो और समयानुसार तालमेल बना रहे तो बहुत ही बेहतर रहता है. बहुत सटीक आलेख.

रामराम.

संजय भास्कर said...

बहुत सुंदर बात कही आप ने
बच्चे बहुत भावुक और संवेदनशील होते हैं ! उनके साथ बहुत समझदारी से पेश आने की ज़रूरत होती है !

रवि धवन said...

वो दिन याद आ गए दीदी। शाम को वीडियो गेम खेलने के लिए पैसे नहीं होते थे तो रसोई में अखबार के नीचे से चुपके से अट्ठनी और एक रुपए का सिक्का चुराकर भाग जाता था। ऐसा महीनाभर तक चला। पोल तो खुलनी ही थी। पर शुक्र है मम्मी-पापा ने पिटाई नहीं की। प्यार से समझाया और गाजर का मुरब्बा भी खिलाया।
तब से सुधर गया।
अगर बच्चा कुछ उल्टा-पुल्टा करे तो मम्मी-डैडी को मुरब्बा जरूर ट्राई करना चाहिए।

neera said...

माता-पिता को जागरुक करने का बेहतर प्रयास...

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

सौभाग्यशाली हूँ कि डॉक्टर शेट्टी जैसे माँबाप हमें मिले.. न चोरी की, न कोर्स की किताब में छिपाकर कहानी की किताब पढ़ी.. हाँ प्रेम के मामले में माता जी से विवाद भी हुआ.. लेकिन मैंने उनसे जस्टिफिकेशन माँगा विरोध का और शायद उस दी उनके पास कोई जवाब नहीं था, सिवा इसके कि वो मेरी माँ हैं और मुझे उनकी बात माननी चाहिए!
यह पोस्ट एक मनोवैज्ञानिक दस्तावेज़ है रश्मि जी. आज भी कई अभिभावक अपने बच्चों का नुकसान कर रहे हैं!

स्नेह ... said...

यह लेख बहुत अच्छा लिखा है रश्मि आपने ! शुभकामनायें आपको !
बहुत कम लोग इन मनोवैज्ञानिक विषय पर लिखना पसंद करते हैं , मगर यह महत्वपूर्ण लेख किसी मासूम की जान तक बचा लेने में समर्थ है ! यह लेख अपने आपमें आदरणीय होना चाहिए काश अधिकतर लोग इसे ध्यान से पढ़ें ! मैं अपने कुछ मित्रों को इसका लिंक भेज रहा हूँ !

शोभना चौरे said...

नई वस्तुओ का आकर्षण हमेशा से ही हर युवा होते बच्चे के मन में रहता है और वह उसे सबसे छिपाकर उसकर उसका प्रयोग करना चाहता है और यही छोटी -छोटी बाते कब विकराल बन कर बुरी आदतों में शुमार हो जाती है मालूम ही नहीं पड़ता और ऐसे ही समय माता पिता, शिक्षक ,सहपाठी और मित्र ही अच्छे सहायक बन skte है आज के युग में कदम कदम पर आकर्षण और पैसा भी है तो भटकने के अवसर भी है किन्तु अगर सबमे संतुलन बनाया जय तो इन परिस्थियों से बचा जा सकता है डाक्टर शेट्टी जैसी सकारात्मक सोच इससे उबरने में अनुकरणीय है |
एक महत्वपूर्ण विषय पर बहुत सार्थक पोस्ट |

Arvind Mishra said...

शायद अक्सर माता-पिता अपने बचपन की कुंठाएं ही अपने बच्चों पर भी निकालते हैं
बिलकुल यही लगता है -निश्चय ही एक उपयोगी श्रृंखला !-

mukti said...

दी, पता है. मैं जब ऐसी बातें सुनती हूँ तो मुझे लगता है कि मेरे पिताजी ने कितने मनोवैज्ञानिक ढंग से हमें पाला था, तब के ज़माने में जब माँ-बाप अक्सर सख्त हुआ करते थे. हाँ, अम्मा ज़रूर अनुशासनप्रिय थीं, पर बहुत कठोर नहीं. जब वो ज्यादा सख्त होने लगती थीं तो बाऊ उनको समझाते थे.
बाऊ ने बचपन से ही पढ़ने के लिए हम पर कभी दबाव नहीं डाला और पाठ्येतर गतिविधियों के लिए प्रोत्साहित भी किया.
वो हमेशा यही कहते थे कि गलत काम भी करो तो बता दो. झूठ मत बोलो. और इसीलिये मैंने कभी उनसे कुछ भी नहीं छिपाया.
आपकी ये पंक्तियाँ मुझे बहुत अच्छी लगीं,'कहीं ऐसा तो नहीं कि ये बड़ों का अहम् है कि हर चीज़ हमसे पूछ कर करे. अनुशासन सिखाते हुए हम अति कर जाते.'
बाऊ भी कहते थे कि हमारे यहाँ लोग अपने बच्चों को अपनी जागीर समझते हैं.

वन्दना अवस्थी दुबे said...

माता-पिता जब बच्चे की मनसिकता को नहीं समझ पाते तब मुझे बहुत कोफ़्त होती है. हर बच्चा लगभग वैसी ही हरकतें करता है, जिन्हें ये मां-बाप अपने बचपन में, ठीक उसी की उम्र में कर चुके होते हैं.ऐसे में क्यों नहीं वे अपना बचपन याद करते, कि जब किसी ग़लत बात पर उन्हें दोष दिया जाता था तो वे कैसा महसूस करते थे? अगर अपने समय को याद करेंगे, तो निश्चित रूप से बच्चे के साथ न्याय कर पायेंगे. आज समय बदल गया है. बच्चों की ज़रूरतें भी. ऐसे में यदि हम बच्चों की ज़रूरतों को ध्यान में रक्खें, उनकी जायज़ बातों को मानें तो चोरी जैसी घटनाएं हों ही नहीं.
लड़के और लड़की की दोस्ती को लेकर भी मां-बाप नाहक ही परेशान रहते हैं. यदि दोस्ती के बीच लिंग भेद न करें तो बच्चों में स्वाभाविक और बराबरी की दोस्ती का रिश्ता क़ायम होता है.जितनी रोक लगाई जायेगी, उत्सुकता और इच्छा उतनी ही बढेगी.
मेरी दोस्ती बचपन से ही लड़्कों से ज़्यादा रही, या मेरे घर के आस-पास लड़के ही ज़्यादा थे तो दोस्त भी वही थे. लेकिन मेरे घर में कोई रोक-टोक नहीं थी, तो मुझे कभी अटपटा लगा ही नहीं. दोस्ती के अलावा कोई दूसरे विचार भी मन में नहीं आये.
सही मार्गदर्शन के अभाव में बचपन भटकता है.