Thursday, January 20, 2011

टर्निंग थर्टी : एक अलग सी फिल्म, एक Chick Flick


(एक डिस्क्लेमर भी डाल ही दूँ कि जो भी फिल्म..:'टर्निंग थर्टी " देखने के इच्छुक हों, ये पोस्ट ना पढ़ें क्यूंकि मैं जब किसी फिल्म के बारे में लिखती हूँ...तो फिल्म ,उस पर अपने विचार..उसकि कहानी  से जुड़े अनुभव,...सब कुछ ही उँडेल डालती हूँ , मात्र समीक्षा नहीं होती ये.)

जब सहेलियों के साथ 'टर्निंग थर्टी ' देखने का प्लान बन रहा था..मैने यूँ ही पूछ लिया.."पर हमलोग यह फिल्म देखने क्यूँ जा रहे हैं??...हमने तो कब का वो मोड  पार कर लिया.."
एक ने कहा..."पर अभी भी हमलोग उस मोड के आस-पास ही समझते हैं,ना खुद को..." ये तर्क ठीक लगा...यूँ भी दिल बहलाने को..ऐसे ख़याल हमेशा अच्छे ही लगते हैं...वरना अपना तो कब...सोलह पार हुआ...कब तीस पता ही नहीं चला...पर ये फिल्म देखने का मन हो आया...आखिर देखें तो सही,तीस पार होने पर ...'ये हंगामा है क्यूँ, बरपा.."
वैसे इस  फिल्म से देश की आम लडकियाँ रिलेट नहीं कर पाएंगी.पर जो लडकियाँ...महानगरो में रहती  है..प्राइवेट फर्म में काम करती हैं...उनकी ज़िन्दगी से काफी मिलती जुलती है,फिल्म की कहानी

शुरुआत में तो फिल्म में बस पार्टी..डांस...स्मोकिंग...वा
इन..बियर...और कुछ बोल्ड सीन ही हैं. शायद पुरुष दर्शकों को टिकट खिड़की तक खींचने के लिए क्यूंकि ये कहानी है...एक लड़की की...जो एक हफ्ते बाद ही तीस की होनेवाली  है...और उसे लगता है....ज़िन्दगी पर से उसकी पकड़ छूटने ही वाली है. उसकी दो  सहेलियों की कथा भी साथ में चलती रहती है.

नैना (गुल पनग) एक विज्ञापन  एजेंसी में काम करती है. तीन साल से उसका एक steady boyfriend  है,जो रहता तो अपने माता-पिता के साथ है पर ज्यादा समय नैना के फ़्लैट में ही गुजारता है.उसका आधा सामान भी नैना के फ़्लैट में ही पड़ा रहता  है. नैना की माँ दिल्ली से बार-बार फोन करती है कि अब वो तीस की होनेवाली  है...और उसे शादी कर लेनी चाहिए. नैना को पूरा विश्वास है कि उसके बर्थडे पर ऋषभ ( सिद्धार्थ मक्कड़ ) उसे प्रपोज़ करेगा और वो एक्सेप्ट कर, शादी कर लेगी
.
  (एक ऐसी ही लड़की को काफी करीब  से
जानती हूँ जो एक टी.वी. चैनल में 'जेनरल  मैनेजर' थी...आज से पांच साल पहले, ७५ हज़ार रुपये उसकी तनख्वाह थी और तीस  की हो चली थी...शादी के लिए बेताब...किसी को भी हाथ दिखाने बैठ जाती.."मेरी शादी कब होगी??" पर लडको की मानसिकता वही है कि पत्नी की आय उनसे अधिक नहीं होनी चाहिए. आखिरकार उसे एक अधेड़ NRI  से शादी करनी पड़ी. 

फिल्म में , ऋषभ के पिता का बिजनेस अच्छा नहीं चल रहा और उसमे
सहयोग के लिए वे एक अमीर  लड़की से ऋषभ की शादी करना  चाहते हैं. और अचानक ऋषभ को अपने परिवार के प्रति अपने उत्तरदायित्व का ख्याल आता है. वह उस लड़की से शादी के लिए 'हाँ' कह देता है. (ऐसे लड़के हमने अपने आस-पास  भी देखे ही होगे )

ऑफिस में भी नैना ने जिस कैम्पेन पर काम किया..और जो उसका आइडिया था....वह बहुत सफल  रहा और उसे फ्रांस में एक अवार्ड मिलनेवाला है लेकिन सारा क्रेडिट उसका सीनियर ले जाता है.अवार्ड लेने भी वही जाता है.नैना के विरोध करने पर वे लोग कहते हैं...या तो तुम रिजाइन कर दो या फिर एक छोटे से विज्ञापन पर काम करो जो थर्टी प्लस की औरतों के लिए बना है क्यूंकि अब तुम भी तीस की होने जा रही हो...और देश के युवाओं की नब्ज़ पर तुम्हारी पकड़  नहीं.

 

नैना के बॉयफ्रेंड ने धोखा दे दिया...नौकरी में निराशा मिली ...और अब वो तीस की होने जा रही है. वो बिखर सी जाती है लेकिन उसकी दो सहेलियाँ,उसका साथ देती हैं...उसे शॉपिंग-लंच-पार्लर लेकर जाती हैं ..और एक नए हेयरकट के साथ उसे एक नया लुक देती हैं,कहती हैं.."जब प्रेमी धोखा दे...उस रिश्ते को अपने बाल की तरह काट कर फेंक दो.."(आज की नारी का स्लोगन हो सकता है.)

नैना भी अपनी बिखरी ज़िन्दगी समेटने की कोशिश  करती है और वो छोटे बजट के विज्ञापन पर काम शुरू कर देती है. कई तीस-पैंतीस के ऊपर की उम्र की औरतों का इंटरव्यू लेती है कि कैसे उनलोगों ने उम्र के साथ  अपनी ज़िन्दगी की रफ़्तार में कमी नहीं आने दी....और नए शौक..नए काम ढूंढें.


नैना की ज़िन्दगी में उसके  कॉलेज का प्रेमी वापस आ जाता है...जो कैरियर बनाने के लिए नैना को छोड़ कर चला गया था.अब वह एक कामयाब फोटोग्राफर है..और नैना से शादी करना चाहता है.(ऐसा सिर्फ फिल्मो में ही होता है या कहानियों में...एक प्रेमी गया नहीं कि दूसरा हाज़िर..मगर रियललाइफ  में लडकियाँ/लड़के इतने लकी नहीं होते...अक्सर वे अकेले ही पड़ जाते हैं )


पर नैना ऋषभ को भूली नहीं है और भूलने से ज्यादा इस तथ्य को नहीं भुला पाती कि उसने उसे धोखा दिया है..वो हर हाल में चाहती है..ऋषभ उस लड़की को छोड़ उसके पास वापस आ जाए. ऋषभ को फोन करती  है..मैसेज करती है...आखिरकार उसके घर पहुँच..उसके माता-पिता को भी बहुत खरी-खोटी  सुनाती है कि ,वे जब उसे पसंद करते थे फिर ऋषभ की शादी..दूसरी लड़की से क्यूँ  कर रहे हैं.." (यह प्रकरण गले नहीं उतरता..पर आज की नारी
  के लिए कुछ भी असंभव नहीं...वे ऐसा कर सकती हैं..इतनी आसानी से वे अपने दोषी को माफ़ करने को तैयार नहीं है (एकाध, इस तरह के सच्चे उदाहरण भी सुने हैं)

ऑफिस में ..नैना का काम क्लाइंट को बहुत पसंद आता है...और वे इस विज्ञापन का बजट बढ़ाकर हज़ार करोड़ कर देते हैं. यह देख अब उसके सीनियर्स फिर एक बार चाल  चलते हैं...और नैना के प्रेजेंटेशन को रिजेक्ट कर कहते हैं...'उन्होंने कुछ दूसरा आइडिया सोचा है'. नैना के पास रिजाइन करने के सिवा कोई चारा नहीं रह जाता (ऐसे प्रकरण आम हैं...विज्ञापन एजेंसियों में)


इधर उसका  कॉलेज का प्रेमी..पूरब...उसपर शादी के लिए दबाव डाल  रहा है. उसे भी  नैना कह देती है..."तुम अपनी सुविधा से मेरी ज़िन्दगी से चले गए और अब अपनी सुविधा से लौट आए...मुझे सोचने के लिए समय चाहिए " और वह फिर से एक बार चला जाता है.

 एक बार फिर नैना  के पास ना नौकरी  है... ना बॉयफ्रेंड ...वो किसी का फोन नहीं उठाती..घर से बाहर नहीं जाती .एक बार फिर उसकी दोनों सहेलियाँ उसका ख्याल रखती  हैं. एक सहेली, उसके लैपटौप पर अपना मेल चेक करने जाती है...और एक फ़ाइल खुली हुई है...जिस में नैना अपने विचार लिखती रहती  है. उसकी सहेली...उसके पीछे पड़कर एक पब्लिशर को उसके सारे नोट्स दिखलाती है.पब्लिशर इम्प्रेस्ड होकर उसे एक किताब लिखने का ऑफर देता है

( देखने पर लगता है...ऐसा सिर्फ फिल्मो में ही संभव है...पर
चेतन भगत  के 'फाइव पॉइंट समवन'  का उदाहरण हमारे सामने है...जो उनके हॉस्टल  के जीवन पर आधारित थी...हाँ, पर तभी..अगर आप अंग्रेजी  में लिखते हों. एक आइ.आइ.टी. के स्टुडेंट की (वे मेरे कजिन भी हैं..'अनिमेष वर्मा ") उनकी पुस्तक,"Love, Life and Dream  On ' की भी पब्लिशर ने ना सिर्फ छापने  की जिम्मेवारी ली...बल्कि धुंआधार  प्रचार भी किया...हर बड़े अखबार और ऍफ़.एम चैनल्स से उनके इंटरव्यू प्रसारित किए...पांच हज़ार कॉपी छपी उस किताब की जबकि सुना है...हिंदी की किताबो की 200 से ज्यादा प्रतियाँ नहीं छपतीं..और हिंदी के एक नए लेखक की किताब का कितना प्रचार  किया जाता है...इसका  मुझे कोई इलहाम  नहीं)

फिल्म की तरफ लौटते हैं....इधर ऋषभ..एक बार फिर से नैना को  कॉल करना और उसके फ़्लैट पर आना शुरू कर देता है.पर नैना का रुख देखकर ही उसकी कामवाली  बाई..कह देती है.."दीदी बिजी है..नहीं मिलेंगी) (मुंबई की
बाइयों पर एक पोस्ट मैने लिखी थी...यहाँ की  बाइयां सचमुच...अकेली औरतों के लिए एक गार्जियन की तरह होती  हैं...और कई बार उनकी इमोशनल एंकर भी  बन जाती हैं.)
 

एक बार पब्लिशिंग हाउस से लौटते हुए नैना, की नज़र एक होर्डिंग पर पड़ती है और वो पाती है कि उसकी विज्ञापन एजेंसी ने उसका आइडिया और उसका प्रेजेंटेशन ही इस्तेमाल किया है.टी.वी. पर भी उसकी लौन्चिंग पर सारा क्रेडिट उसके बॉस और उसके सहकर्मी ले लेते हैं.. वह उनपर केस कर देती है और जीत भी जाती है,{आखिर  फिल्म की हिरोइन है :)}

नैना की  किताब( Turning Thirty ) पूरी होकर छप गयी  बहुत सफल भी हुई .उसकी बुक रीडिंग में उसकी माँ,  दोनों पूर्व प्रेमी..उसकी सहेलियाँ...सब मौजूद रहते हैं. ऋषभ उस से कहता है...कि उसने सगाई तोड़ दी है..क्यूंकि दोनों के विचार मेल नहीं खाते थे और अब वो वापस लौटाना चाहता है. पर नैना  मना कर देती है...वो पुराने प्रेमी के पूरब पास जाती है..पर इस बार अपनी सुविधानुसार और उस से पूछती  है.."विल यू मैरी मी .."आज की नारी
  :).

फिल्म हिट नहीं,हुई ..पर इसके हिट होने के  सारे मसाले डाले गए हैं. दृश्यों और संवादों में काफी बोल्डनेस है. ऑल गर्ल्स  पार्टी में लडको की एक स्ट्रीप्तीज़ भी रखी गयी है. नैना की एक सहेली,एक गेम ..'ट्रुथ एंड डेयर'  के दरम्यान स्वीकार करती है कि वो लेस्बियन है.." दूसरी सहेली..ऊपर से बहुत खुश दिखती है..पर उसके पति के एक्स्ट्रा मेरिटल अफेयर्स हैं.

 
उच्च वर्ग  में जो कुछ भी हो सकता है....वह .सब कुछ  दिखाने की कोशिश की गयी है.

सारे पात्रो ने अपने कैरेक्टर  के साथ न्याय किया है. अगर 'डोर' फिल्म वाले 'गुल पनग' को ढूंढेंगे तो निराशा होगी. इस फिल्म में शायद गुल को ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ी होगी. क्यूंकि ऐसे  ही जीवन की वे आदी हैं  हैं. काफी दिनों तक प्रकाश झा  की असिस्टेंट डाइरेक्टर रह चुकी अलंकृता  श्रीवास्तव की पहली फिल्म है...फिल्म को सफल बनाने के लिए कोशिश कुछ ज्यादा ही  कर डाली...और ये कोशिश ईमानदार नहीं थी...बाज़ार से समझौते की थी...इसीलिए फिल्म पार्ट्स में ही अच्छी है.पर विषय बिलकुल नया है..इसीलिए आकर्षित करती है,फिल्म ....प्रकाश झा ने प्रोड्यूस की है. गाने अच्छे    हैं.


शायद मुंबई बेस होने से और नायिका के एक विज्ञापन एजेंसी से जुड़े होने से फिल्म  कुछ ज्यादा ही आधुनिक लगती है.लेकिन लखनऊ...रांची..पटना.. जैसे शहरों में भी लडकियाँ अब अपने जीवन का कंट्रोल अपने हाथों में ले रही हैं. अगर अरेंज्ड मैरेज करती हैं..फिर भी...अपनी,पसंद-नापसंद खुलकर बताती हैं. और पसंद ना आने पर लड़के ही रिजेक्ट नहीं करतीं ...एंगेजमेंट भी तोड़ने की हिम्मत रखती हैं. और ये सब इसलिए कर पाती हैं क्यूंकि वे आत्मनिर्भर हैं. ज्यादा से ज्यादा लड़कियों का अपने जीवन पर नियंत्रण हो...तभी सारी कुप्रथाएँ समाप्त होंगी.


इस पोस्ट को लिखने के दौरान ही...'
रश्मि प्रभा' जी की ये कविता पढ़ी...उसके ये अंश बहुत सटीक लगे.
नई पीढ़ी ने
हर तथाकथित मर्यादाओं को ताक पर रख दिया
और भीड़ में गुम हो गई !
कभी देखा है -
अपने अस्तित्व के लिए
अपने टुकड़े के लिए
रात दिन एक करती ये लड़कियाँ

बहुत पहले पढ़ी...शरद कोकस जी की ये कविता भी, कामकाजी लड़कियों के जीवन को अच्छे से बयाँ करती है...इसकी ये पंक्ति खासकर,अच्छी लगी थीं.

"आज़ाद हवा से दोस्ती की उसने 
मजबूती से ज़मीन का दामन थामा 
और  एक कदम आसमान की ओर बढ़ा दिया "

और ये भी
 "कॉफी का एक प्याला उसका डॉक्टर था
और खिड़की से आया ,हवा का ताज़ा झोंका, नर्स"


अरुण चन्द्र राय ने भी इस उम्र की कामकाजी लड़कियों  पर एक बढ़िया कविता लिखी है.

35 comments:

  1. जॉब और जीवन के बीच का असंगत तालमेल.

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  2. तीस साल पूरे होने पर इतना कुछ घटित हो सकता है.....बढ़िया कॉन्सेप्ट लेकर फिल्म बुनी गई।

    वैसे एक सिरियल आता था बहुत पहले - ये जो है जिंदगी. इसमें एक तकिया कलाम होता था - मुझे थट्रटी ईयर्स का एक्सपिरियंस है - उस दौर में काफी प्रचलित हुआ था यह थट्टी इयर का डायलॉग ।

    संभवत: उस सिरियल में शफी इनामदार के साथ एक भट्टाचार्यजी का कैरेक्टर था, वही इस तकिया कलाम का इस्तेमाल करता था।

    राप्चिक शैली में राप्चिक पोस्ट :)

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  3. मुझे लगता है हम सबके इर्द-गिर्द ऐसे एकाधिक पात्र हैं. इसीलिए पढ़ते हुए लगा कि कहानी तो एक ही है, पात्र मेरे जाने पहचाने और कई-एक हैं.

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  4. चूंकि मैं भी तीस का होने वाला हूँ(भले ही लड़की ना होकर लड़का हूँ ;-) ) सो मेरी जितनी भी मित्र हैं सभी इसी उम्र के आस-पास हैं.. सभी की सभी आत्मनिर्भर, और लगभग सभी अविवाहित भी.. सभी मेट्रो में ही रह रही हैं, मगर छोटे शहरों से मेट्रो तक का सफर तय किया है उन्होंने.. सो अधिक हाई-फाई ना जाते हुए इस सिनेमा की कहानी उनकी कहानियों जैसी ही लगी..
    मेरे लिए इसे Co-relate करना अधिक आसान है..

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  5. इसे पढने के बाद ये ख़्याल आया मन में प्रश्न की तरह की क्या आज कल लड़कियां तीस की होने पर या उसकी आस पास की, ही शादी कर लेने के बारे में सोचती हैं। :)
    पता नहीं।
    अब आएं इस आलेख पर, बिल्कुल रश्मि रवीजा टच, स्टाइल और लम्बाई, पर वही पूरा पढवाने की शैली। अब जब पढ लिया है तो आपके डिस्क्लेमर के अनुसार फ़िल्म न देखने वाली बात शायद सही हो जाए, इसलिए नहीं कि हम डिस्क्लेमर पढ चुके हैं, बल्कि इसलिए कि एक फ़िल्म मैं दोबारा अब नहीं देखता। अरे हां, आपने लिखा ही इस तरह है कि सब कुछ तो चलचित्र की भांति आंखों के सामने गुज़र रहा था।
    इतना अच्छा फ़िल्म पर लेखन मैंने ब्लॉगजत में नहीं पढा, शायद अन्यत्र भी।

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  6. पोस्ट ने तो फ़िल्म देखने की थोड़ी उत्सुकता जगा दी है.

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  7. film ke baare mein batate hue uske sashakt her paksh ko ujaagar kiya hai... aur kathanak ke saath hum bloggeron kee panktiyaan , door drishti , paripakw samajh ka taalmel hai

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  8. फिल्म की कहानी तो पढ़ी है मुझे तो अच्छी लग रही है भले उसे गंभीर फिल्म की जगह व्यवसायिक फिल्म का ट्रीटमेंट दिया हो | आप ने सही कहा अब ये कहानी केवल मैट्रो शहरों की लड़कियों तक सिमित नहीं है ये अब हर बड़े शहर की आत्मनिर्भर लड़की की कहानी है | अब उन्हें अरेंज मैरिज से भी अपनी पसंद बताने में हिचक नहीं होती है और अच्छी बात है की बहुत सारे माँ बाप अब उनकी बात सुन भी रहे है और समझ भी रहे है |

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  9. बेचैनी तब होती है जब लगता है कि 30 होने पर जीवन का महत्वपूर्ण भाग जीवन से निकला जा रहा है।

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  10. आप के लेख से पुरी फ़िल्म देख ली जी धन्यवाद

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  11. काफ़ी विस्तृत समीक्षा!! देखता हूँ समय मिलता है तो!!

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  12. हम्म... वैसे ऐसे लोग भी हैं जिन्हें ज्यादा सैलरी वाली पत्नी से बिलकुल भी शिकायत नहीं होगी :)

    देखता हूँ ये फिल्म.

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  13. बेहतरीन पोस्ट लेखन के लिए बधाई !

    आशा है कि अपने सार्थक लेखन से, आप इसी तरह, ब्लाग जगत को समृद्ध करेंगे।

    आपकी पोस्ट की चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है - पधारें - नयी दुनिया - गरीब सांसदों को सस्ता भोजन - ब्लॉग 4 वार्ता - शिवम् मिश्रा

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  14. काश डिस्क्लेमर पर ध्यान दिया होता -हम इन्हें यूं ही ले लेते हैं -पोस्ट पढ़ाने की एक जुगत के रूप में ! पर अब पछताये क्या होगा ? :)
    मुझे भी एक ऐसी लडकी का पता है जो तीस की है मगर उधेड़बुन में है :)

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  15. बहुत बढ़िया रश्मि जी, आपने फिल्म के बारे में इतने विस्तार से चर्चा की, लगता है सारी फिल्म परदे पर देख रहा हूँ .आप भी कविताओं के मसाले डालना नहीं भूली.साथ में अपने व्यक्तिगत अनुभवों का तडका भी लगा दिया. आपकी कलम को सलाम.

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  16. तुम्हारा डिस्क्लेमर मेरे काम का नहीं था ...इसलिए उसे अनदेखा कर दिया..

    फिल्म की कहानी मुझे तो रोचक लगी ...केंद्रीय पात्र महिला होने के कारण ...एक दुसरे के कन्धों का उपयोग सीधी के रूप में कर ऊपर चढ़ जाना और फिर उसी सीधी को लात मारने वाली मानसिकता खूब उभर कर आयी तुम्हरी समीक्षा में ...

    16वां कब बीता , कब तीस ...वाकई पता नहीं चला ...आंकड़े गिनने बैठो तो ही पता चलता है की इतनी उम्र बिता चुके वर्ना तो ...:)
    आजकल एक नया विज्ञापन आ रहा है २6के बाद...मुझे आश्चर्य हुआ क्योंकि तब तक तो हम लड़कपन में ही थे ...

    चेतन भगत की सीधी सरल अंग्रेजी भाषा के अलावा एक काम वाली बाई (प्रेमचंदजी के किसी रिश्तेदार के घर काम करती थी ...उनके प्रोत्साहन ने उसे लिखने की हिम्मत दी...नाम तो तुम ही बताओगी ) का भी सरल हिंदी में एक उपन्यास काफी लोकप्रिय हुआ है ...दरअसल हर क्षेत्र में सहजता को स्वीकार किया जाने लगा है ..!

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  17. बहुत अच्छा लगा ये लेख, तुम्हारी कलम से पूरी फ़िल्म देख डाली है. इसमें उठा एक मुद्दे से मैं भी सहमत हूँ. वैसे अपने से अधिक आमदनी वाली पत्नी न स्वीकार पाने में पुरुष दंभ आहत होता है क्योंकि कमतर किसी भी दृष्टि से वे पसंद नहीं करते और अगर ऐसे हालात हों भी तो इसके परिणाम सुखद तो बिल्कुल नहीं होते. बल्कि इससे परिवार बिखर तक जाते हैं.

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  18. रश्मि जी आमतौर पर क्रिटिक्स की साढ़े तीन स्टार रेटिंग के बाद ही फिल्म देखता हूँ लेकिन इस फिल्म को आपकी समीक्षा के बाद देखूंगा.. बहुत सजीव चित्रण है आपका, फिल्म और उनके पात्रों का.. साथ में जो लिंक्स दिए हैं वे भी अच्छे हैं.. मेरी कविता का लिंक देने के लिए बहुत बहुत आभार... ऐसे चरित्र हमारे आसपास घुमते रहते हैं.. हमारे परिवेश में होते हैं.. मध्यवर्ग और उच्च मध्य वर्ग में उम्र के विभिन्न पडावो का एहसास हो होता है लेकिन ये एहसास पत्थर के नीचे के दूब की तरह अँधेरे में बंद रह जाते हैं ग्रामीण परिवेश में.. और सारी उम्र निकल जाती हैं यो ही... कभी इस ओर भी लिखियेगा..

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  19. फिनिशिंग सिक्सटी पे आधारित कंसेप्ट है शायद :)

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  20. अरे यार तुम्हारी वाली बात ………कब सोलह आया और कब थर्टी पता ही नही चला……………ज़िन्दगी मे ये सब चलता है आज क्योंकि अब लडकिया कहीं भी कमजोर नही है फिर उसके लिये चाहे उन्हे कितनी ही मुश्किलो का सामना क्यो ना करना पडे…………बहुत अच्छा लिखा है फ़िल्म देखी नही तो पता नही।

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  21. बहुत ही सुंदर समीक्षात्मक प्रस्तुति..... फिल्म के बारे में जिज्ञासा बढ़ गयी है अतः अब देखनी पड़ेगी. सुंदर प्रस्तुति.

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  22. हम भले ही महानगर में रहने आ गये हैं, परंतु सोच शायद महानगरों वाली नहीं हो पाई, इसकी एक वजह ये भी हो सकती है कि विचार ज्यादा खुले नहीं हैं और इस तरह की जीवनशैली पसंद भी नहीं है, इस तरह के जीवनशैली वाले लोग तो हमें आज भी अजायबघर वाले ही लगते हैं।

    पर फ़िर भी फ़िल्मों में शायद इनको समझना आसान होता है, क्योंकि निजी जिंदगी मॆं तो अगर ऐसा कोई बंदा आसपास भी होगा तो मैं दूरी बनाना ही पसंद करूँगा।

    आपका लेखन बहुत ही अच्छा लगा।

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  23. रश्मि जी किसी भी फिल्‍म को एक नजरिए के साथ देखना और विश्‍लेषण करने का आपका तरीका बहुत प्रभावशाली है। इस पोस्‍ट में ब्‍लाग में प्रकाशित कविताओं को याद करना भी एक नया प्रयोग है।
    *
    @वाणी गीत जी ने किताब का जिक्र किया है और नाम भी पूछा है। शायद जवाब आप भी देतीं। पर मुझसे रहा नहीं जा रहा। उन्‍होंने जिस उपन्‍यास का जिक्र किया है,वह वास्‍तव में लेखिका की अपनी जिन्‍दगी की कहानी है। लेखिका है प्रेमचंद के नाती प्रबोधकुमार के घर में काम करने वाली महिला बेबी हालदार। और किताब का नाम है आलो आंधारी यानी अंधेरे में रोशनी।

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  24. राजेश जी,
    बहुत बहुत शुक्रिया....लेखिका का नाम और उपन्यास की जानकारी देने के लिए.
    उसे लिखे जाने के प्रकरण की भी विस्तार से जानकारी दी.
    मैं ढूंढ ही रही थी कि कहीं से नाम पता चले तो वाणी को उत्तर दूँ या फिर कोई सुधि पाठक ही नाम बता दें.आपने बता दिया...धन्यवाद.

    कविताएँ कम ही पढ़ती हूँ...पर जो याद रह जाती हैं...उनका उल्लेख करना अच्छा लगता है...पहले भी अपनी पोस्ट में , ब्लॉग से ही उद्धृत की हैं,कविता की पंक्तियाँ.

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  25. रश्मिजी
    बहुत उम्दा फिल्म समीक्षा |फिल्म की कहानी को रोजमर की बातो के सन्दर्भ में लिखना और तुलनात्मक लेखन बहुत ही अच्छा लगा साथही ताजी ताजी कविताओ का उल्लेख सोने पर सुहागा |आपकी समीक्षात्मक शैली इतनी प्रभावपूर्ण है की अब फिल्म देखने की भी जरुरत नहीं लगती |
    "फंस गये रे ओबामा "और तेरे बिन लादेन "जरुर देखिएगा |

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  26. रश्मि जी इतनी गहन विवेचना .....?
    आप तो पूरी समीक्षक बन गईं .....
    समीक्षक क्या उससे भी बेहतर लिखा .....
    और ये जो दुसरे ब्लोगों से कवितायेँ संचय की हैं .न ...
    आपकी पोस्ट और आपकी प्रतिभा को चार चाँद लगा रहीं हैं .....
    आप उन महिलाओं में से हैं जो समय के साथ चलतीं हैं ....

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  27. सुन्दर समीक्षा. अब फिल्म नहीं देखेंगे.

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  28. .

    बढती उम्र को gracefully accept करना चाहिए।

    .

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  29. यह पोस्ट (और यह फिल्म, जो देखी नहीं) यह अहसास कराती है पूरी गम्भीरता से कि मेरा अपना परिवेश देखना कितना सतही है। :(
    I have not lived in/seen such an environment!

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  30. बहुत आकर्षक एवं दमदार समीक्षा है ! फिल्म मैंने देखी तो नहीं ! इसमें अतिरंजना भी हो सकती है ! माध्यम वर्ग में, जो कदाचित भारत की आबादी का सबसे विशाल हिस्सा है, ऐसे उदाहरण विरले ही दिखाई देते हैं जहां लडकियां इतनी बोल्डनेस दिखाने की क्षमता रखती हैं ! पता नहीं क्यों अति आधुनिकता का यह रूप मुझे नहीं भाता ! "तू नहीं और सही, और नहीं और सही" वाली मानसिकता को मेरा शायद दकियानूसी मन स्वीकार नहीं कर पाता ! आपकी समीक्षा ने दर्शकों का अच्छा मार्गदर्शन किया है ! शानदार समीक्षा के लिये बधाई एवं शुभकामनाएं !

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  31. एई बच्चा ! थर्टी या थर्टी प्लस के लिए फिल्म की समीक्षा के साथ साथ इतना लिख दिया.
    फिफ्टी प्लस के लिए क्या लिख रही हो?
    अच्छा और ईमानदार लिखती हो.आज दो आर्टिकल पढे.
    उस शख्स के बारे में भी जो अनजान लोगों के अंतिम सफर को मानवता के नाम पर दाग लगने से बचा रहा है.उन्हें प्रणाम. हर व्यक्ति गांधी या गौतम नही हो सकता किन्तु अच्छा इंसान बनने की कोशिश तो कर ही सकता है. वे सच्चे धार्मिक व्यक्ति है.गीता और धर्म को जी रहे हैं.

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  32. फिल्म देखने के बाद पढता हूँ...वैसे भी आपने डिस्क्लेमर डाल रखा ही है :)

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