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मंगलवार, 27 नवंबर 2012

ये कैसा चक्रव्यूह

पिछले कुछ महीनो में कई फ़िल्में आयीं और उन्होंने  काफी दर्शकों को थियेटर की तरफ आकर्षित किया। बर्फी, इंग्लिश-विन्ग्लिश, OMG , जब तक है जान आदि। पर इन सबके बीच ही एक बहुत ही सार्थक, चिंतनशील, हमारे समाज की एक बहुत ही गंभीर समस्या से रूबरू करवाती एक  फिल्म आयी 'चक्रव्यूह' और गुमनामी के अंधेरों में खो गयी। मुझे इस फिल्म का बहुत पहले से ही इंतज़ार था वैसे भी  प्रकाश झा की कोई फिल्म मुझसे नहीं छूटती। इन फिल्मों की भीड़ में इसे भी देखा और तब से ही लिखना चाह रही थी, पर कुछ  prior commitment  ने व्यस्त रखा। 


नक्सल समस्या पर बनी इस फिल्म ने सोचने पर मजबूर कर दिया। हम जो बाहर रहकर देखते हैं क्या सम्पूर्ण सच वही है? बिना उस समस्या को पास से देखे, उस से जूझते लोगो को जाने हम इस समस्या की गंभीरता को नहीं समझ सकते । हालांकि नक्सलियों का रास्ता गलत ही है, हिंसा किसी समस्या का हल नहीं है। और निर्दोष लोगो की ह्त्या, चाहे किसी  पैसे वाले की हो या बेचारे पुलिस वाले की ,कहीं से भी सही नहीं है। पर उनकी तंगहाली, उन पर किये जा रहे जुल्म, अपनी ही जमीन से  बेदखल करना, उनकी जमीन पर फैक्ट्री का निर्माण कर पैसे कमाना, ये सारी स्थितियां उन्हें गहरे आक्रोश से भर देती हैं।

पुलिसकर्मी भी अपने परिवार से दूर, सारी सुख सुविधाओं से दूर , इन बीहड़ जंगलों में रह कर इन नक्सलियों से लड़ते हैं। बड़ी मेहनत से  जाल बिछा, दिनों रणनीति रचकर अपने कई साथियों की शहादत के बाद किसी बड़े नक्सलवादी नेता को  पकड़ते हैं और नक्सलियों द्वारा किसी बिजनेसमैन के अकर्मण्य बेटे को छुडाने के लिए उन्हें उस नक्सली नेता को आज़ाद कर देना पड़ता है। और फिर वे खुद को वहीँ खडा पाते हैं, जहाँ से चले थे . सारी  लड़ाई फिर नए सिरे से लड़ने की तैयारी करनी पड़ती है।
टुकड़ों -टुकड़ों में इन सारी बातों से हम सभी अवगत हैं। पर जब परदे पर सिलसिलेवार इन्हें  घटते हुए देखते हैं ,तब हम पर सच्चाई तारी होती है। 

आदिल (अर्जुन रामपाल ) को नक्सली इलाके में पोस्टिंग मिलती है।वहां अब तक पुलिस को कोई कामयाबी नहीं मिली है .आदिल का एक पुराना मित्र है कबीर (अभय देओल ). आदिल  ने विद्यार्थी जीवन में उसके कॉलेज की फीस भरी है, अच्छे दोस्त हैं दोनों . कबीर,आदिल की मदद के लिए नक्सलियों के दल  में एक नक्सली बनकर शामिल हो जाता है। शुरुआत में तो वो आदिल को सूचनाएं देता है , जिसकी वजह से पुलिस को कई कामयाबी मिलती है और नक्सली नेता राजन (मनोज बाजपेयी ) पकड़ा जाता है । पर फिर धीरे-धीरे उन नक्सलियों के साथ  रहते  हुए कबीर  महसूस करता है कि सचमुच आदिवासियों पर बहुत जुल्म और अत्याचार हो रहे हैं।  नेताओं के अपने घिनौने  स्वार्थ हैं, जिसे पूरा करने  के लिए वे उनकी जमीन हड़पते  हैं और विरोध करने वालों की  निर्ममता से ह्त्या कर दी जाती है। आदिवासियों की जमीन पर कबीर बेदी, एक बड़ी फैक्ट्री लगाना चाहते हैं . नेतागण गाँव वालों  से कहते हैं कि उनके विकास के लिए यह सब किया जा रहा है। पर असलियत में वह गाँव की जमीन पर अपनी फैक्टरी खड़ी कर बड़ा मुनाफा कमाना चाहते हैं और इसके लिए नेताओं को भी अच्छे पैसे दिए गए हैं . इसीलिए  वे उनके सुर में सुर मिलाते नज़र आते हैं।  फैक्ट्री लगाने के लिए उन्हें गाँव की जमीन चाहिए। राज्य के मुख्यमंत्री से लेकर सारे नेता , उनकी मदद को तैयार हैं। जमीन खाली करने के आदेश का नक्सल विरोध करते हैं। तो पुलिस उनका दमन करती है . विरोधस्वरूप नक्सल कबीर बेदी के  बेटे का अपहरण कर  लेते हैं और फिर आदिल को बिजनेसमैन के बेटे को आज़ाद कराने के लिए नक्सल नेता राजन को छोड़ना पड़ता है। इस लड़ाई में दोनों दोस्त आमने-सामने होते हैं. कबीर ,अपने मित्र को आगाह कर देते हैं कि औरतों और बच्चों पर जुल्म ढाना बंद करे पुलिस वरना अगली मुठभेड़ में दोनों दोस्त में से एक ही जिंदा वापस लौटेगा। और एक मुठभेड़ में आदिल को, कबीर  पर गोली चलानी पड़ती है।

फिल्म में वही सबकुछ है जो रोज घटित हो रहा है। मुफ़्ती मोहम्मद सईद की बेटी को छुडाने के लिए खूंख्वार आतंकवादी को छोड़ना पड़ा था . पता नहीं कितनी रातों की नींद त्याग कर कितनी  तैयारियों कितने पुलिसकर्मियों की शहादत के बाद ,उस आतंकवादी को पकड़ा गया होगा।

एक फिल्म में पूरी नक्सल समस्या ,पुलिस की लाचारी, नेताओं की बेईमानी , कुछ भ्रष्ट पुलिसकर्मियों के अनाचार ,बड़े उद्योगपतियों द्वारा जनता को गुमराह करना, इन सबको समेटना मुश्किल था। इसीलिए फिल्म कुछ अधूरी सी  लगती  है।पर नक्सल  समस्या को देखने की एक अलग दृष्टि जरूर प्रदान करती है। जब नक्सली महिला नेता जूही (अंजलि गुप्ता ) के पिता के क़र्ज़ न चुका पाने की सजा के रूप में सूदखोर उसकी दोनों बहनों को उठा ले जाते हैं। जूही के पुलिस में रिपोर्ट करने जाने पर पुलिसकर्मी उसके साथ ही अनाचार करना चाहते हैं तो वह जंगल में जाकर बन्दूक उठा लेती है। उसके मन में अमीरों के प्रति, पुलिस के प्रति नफरत होगी ही। उसकी दोनों बड़ी बहने चुपचाप जुल्म सह गयीं पर जूही समझौता नहीं कर पायी हालांकि बच्चों और स्त्रियों की रक्षा के लिए जब वह आत्मसमर्पण कर देती है तो पुलिसकर्मी उसक साथ बलात्कार करते हैं और उसके साथ वही सब होता है जिस से बचने के लिए वो जंगल में आकर नक्सली बन गयी थी। यानी कि गरीब का कोई निस्तार नहीं।

धीरे धीरे  यह नक्सलवाद पूरे देश के 200 जिलों में फ़ैल गया है ,और भविष्य में इसके और भी बढ़ने की  ही संभावनाएं हैं क्यूंकि इनकी समस्या को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा। अगर आदिवासियों का शोषण बंद हो,उन्हें भी ज़िन्दगी की बुनियादी जरूरतें मुहैया हों।दो जून की रोटी,कपडे, शिक्षा का अधिकार हो तो फिर उन्हें ये नक्सली नेता नहीं बहका पायेंगे . पर उनके लिए जारी किये गए फंड तो नेताओं की जेब में जाते होंगे और उनकी जमीन हड़पने की भी चालें चली जाती हैं तो फिर उनकी तरक्की कैसे हो? फिल्म में आदिवासियों में शिक्षा के अभाव को बहुत ही बुद्धिमत्तापूर्वक रेखांकित  किया गया है। जब नक्सली व्यायाम करते हुए बीस तक की गिनती गिनते हैं और उसके बाद पुनः एक से शुरू करते हैं क्यूंकि उन्हें बीस से ऊपर की गिनती नहीं आती। 

नक्सली नेता राजन के रूप में मनोज बाजपेयी और उनके शिक्षक-चिन्तक के रूप में ओम पुरी, छोटी भूमिकाओं में हैं पर बेहतरीन अभिनय किया है। अभय देओल का रोल एक author backed  रोल था और उन्होंने पूरा न्याय किया है उसके साथ। अर्जुन रामपाल  के फैन (मैं भी ) निराश होंगे। एक्टिंग तो उनके वश की है नहीं पर लुक में भी वे इम्प्रेस नहीं कर पाते । पता नहीं प्रकाश झा ने  इतने फिट पुलिसकर्मी कहाँ देख लिए। इस रोल के लिए अर्जुन को बहुत मेहनत करनी पड़ी,अपना वजन काफी घटाना  पड़ा। उनकी पत्नी के रोल में ईशा गुप्ता भी अति स्लिम हैं पर ख़ास प्रभावित नहीं करतीं। उनका रोल भी छोटा सा है ,और अर्जुन रामपाल  के साथ एक लम्बा प्रेम प्रसंग का सीन एडिटिंग की भेंट चढ़ गया।  पर इस फिल्म की देन  हैं ,अंजलि गुप्ता। अपने नक्सली किरदार को बखूबी निभाया है उन्होंने, उनकी बौडी लैंग्वेज, बोलने का अंदाज़ , भाषा,आक्रोश सब बहुत ही गहराई से अभिव्यक्त हुआ है। 

संगीत पक्ष कमजोर सा ही है। एक आइटम सॉंग डाला गया है, पर उसका  फिल्मांकन ,नृत्य-
गीत-संगीत सब बहुत ही निचले स्तर का है।

हमेशा की तरह ,प्रकाश झा का निर्देशन लाज़बाब है। पुलिस और नक्सलों की मुठभेड़ के दृश्य, धूल धूसरित इलाकों में नक्सलों के कार्यकलाप के दृश्य बहुत ही जीवंत बन पड़े  हैं। 

गुरुवार, 20 जनवरी 2011

टर्निंग थर्टी : एक अलग सी फिल्म, एक Chick Flick


(एक डिस्क्लेमर भी डाल ही दूँ कि जो भी फिल्म..:'टर्निंग थर्टी " देखने के इच्छुक हों, ये पोस्ट ना पढ़ें क्यूंकि मैं जब किसी फिल्म के बारे में लिखती हूँ...तो फिल्म ,उस पर अपने विचार..उसकि कहानी  से जुड़े अनुभव,...सब कुछ ही उँडेल डालती हूँ , मात्र समीक्षा नहीं होती ये.)

जब सहेलियों के साथ 'टर्निंग थर्टी ' देखने का प्लान बन रहा था..मैने यूँ ही पूछ लिया.."पर हमलोग यह फिल्म देखने क्यूँ जा रहे हैं??...हमने तो कब का वो मोड  पार कर लिया.."
एक ने कहा..."पर अभी भी हमलोग उस मोड के आस-पास ही समझते हैं,ना खुद को..." ये तर्क ठीक लगा...यूँ भी दिल बहलाने को..ऐसे ख़याल हमेशा अच्छे ही लगते हैं...वरना अपना तो कब...सोलह पार हुआ...कब तीस पता ही नहीं चला...पर ये फिल्म देखने का मन हो आया...आखिर देखें तो सही,तीस पार होने पर ...'ये हंगामा है क्यूँ, बरपा.."
वैसे इस  फिल्म से देश की आम लडकियाँ रिलेट नहीं कर पाएंगी.पर जो लडकियाँ...महानगरो में रहती  है..प्राइवेट फर्म में काम करती हैं...उनकी ज़िन्दगी से काफी मिलती जुलती है,फिल्म की कहानी

शुरुआत में तो फिल्म में बस पार्टी..डांस...स्मोकिंग...वा
इन..बियर...और कुछ बोल्ड सीन ही हैं. शायद पुरुष दर्शकों को टिकट खिड़की तक खींचने के लिए क्यूंकि ये कहानी है...एक लड़की की...जो एक हफ्ते बाद ही तीस की होनेवाली  है...और उसे लगता है....ज़िन्दगी पर से उसकी पकड़ छूटने ही वाली है. उसकी दो  सहेलियों की कथा भी साथ में चलती रहती है.

नैना (गुल पनग) एक विज्ञापन  एजेंसी में काम करती है. तीन साल से उसका एक steady boyfriend  है,जो रहता तो अपने माता-पिता के साथ है पर ज्यादा समय नैना के फ़्लैट में ही गुजारता है.उसका आधा सामान भी नैना के फ़्लैट में ही पड़ा रहता  है. नैना की माँ दिल्ली से बार-बार फोन करती है कि अब वो तीस की होनेवाली  है...और उसे शादी कर लेनी चाहिए. नैना को पूरा विश्वास है कि उसके बर्थडे पर ऋषभ ( सिद्धार्थ मक्कड़ ) उसे प्रपोज़ करेगा और वो एक्सेप्ट कर, शादी कर लेगी
.
  (एक ऐसी ही लड़की को काफी करीब  से
जानती हूँ जो एक टी.वी. चैनल में 'जेनरल  मैनेजर' थी...आज से पांच साल पहले, ७५ हज़ार रुपये उसकी तनख्वाह थी और तीस  की हो चली थी...शादी के लिए बेताब...किसी को भी हाथ दिखाने बैठ जाती.."मेरी शादी कब होगी??" पर लडको की मानसिकता वही है कि पत्नी की आय उनसे अधिक नहीं होनी चाहिए. आखिरकार उसे एक अधेड़ NRI  से शादी करनी पड़ी. 

फिल्म में , ऋषभ के पिता का बिजनेस अच्छा नहीं चल रहा और उसमे
सहयोग के लिए वे एक अमीर  लड़की से ऋषभ की शादी करना  चाहते हैं. और अचानक ऋषभ को अपने परिवार के प्रति अपने उत्तरदायित्व का ख्याल आता है. वह उस लड़की से शादी के लिए 'हाँ' कह देता है. (ऐसे लड़के हमने अपने आस-पास  भी देखे ही होगे )

ऑफिस में भी नैना ने जिस कैम्पेन पर काम किया..और जो उसका आइडिया था....वह बहुत सफल  रहा और उसे फ्रांस में एक अवार्ड मिलनेवाला है लेकिन सारा क्रेडिट उसका सीनियर ले जाता है.अवार्ड लेने भी वही जाता है.नैना के विरोध करने पर वे लोग कहते हैं...या तो तुम रिजाइन कर दो या फिर एक छोटे से विज्ञापन पर काम करो जो थर्टी प्लस की औरतों के लिए बना है क्यूंकि अब तुम भी तीस की होने जा रही हो...और देश के युवाओं की नब्ज़ पर तुम्हारी पकड़  नहीं.

 

नैना के बॉयफ्रेंड ने धोखा दे दिया...नौकरी में निराशा मिली ...और अब वो तीस की होने जा रही है. वो बिखर सी जाती है लेकिन उसकी दो सहेलियाँ,उसका साथ देती हैं...उसे शॉपिंग-लंच-पार्लर लेकर जाती हैं ..और एक नए हेयरकट के साथ उसे एक नया लुक देती हैं,कहती हैं.."जब प्रेमी धोखा दे...उस रिश्ते को अपने बाल की तरह काट कर फेंक दो.."(आज की नारी का स्लोगन हो सकता है.)

नैना भी अपनी बिखरी ज़िन्दगी समेटने की कोशिश  करती है और वो छोटे बजट के विज्ञापन पर काम शुरू कर देती है. कई तीस-पैंतीस के ऊपर की उम्र की औरतों का इंटरव्यू लेती है कि कैसे उनलोगों ने उम्र के साथ  अपनी ज़िन्दगी की रफ़्तार में कमी नहीं आने दी....और नए शौक..नए काम ढूंढें.


नैना की ज़िन्दगी में उसके  कॉलेज का प्रेमी वापस आ जाता है...जो कैरियर बनाने के लिए नैना को छोड़ कर चला गया था.अब वह एक कामयाब फोटोग्राफर है..और नैना से शादी करना चाहता है.(ऐसा सिर्फ फिल्मो में ही होता है या कहानियों में...एक प्रेमी गया नहीं कि दूसरा हाज़िर..मगर रियललाइफ  में लडकियाँ/लड़के इतने लकी नहीं होते...अक्सर वे अकेले ही पड़ जाते हैं )


पर नैना ऋषभ को भूली नहीं है और भूलने से ज्यादा इस तथ्य को नहीं भुला पाती कि उसने उसे धोखा दिया है..वो हर हाल में चाहती है..ऋषभ उस लड़की को छोड़ उसके पास वापस आ जाए. ऋषभ को फोन करती  है..मैसेज करती है...आखिरकार उसके घर पहुँच..उसके माता-पिता को भी बहुत खरी-खोटी  सुनाती है कि ,वे जब उसे पसंद करते थे फिर ऋषभ की शादी..दूसरी लड़की से क्यूँ  कर रहे हैं.." (यह प्रकरण गले नहीं उतरता..पर आज की नारी
  के लिए कुछ भी असंभव नहीं...वे ऐसा कर सकती हैं..इतनी आसानी से वे अपने दोषी को माफ़ करने को तैयार नहीं है (एकाध, इस तरह के सच्चे उदाहरण भी सुने हैं)

ऑफिस में ..नैना का काम क्लाइंट को बहुत पसंद आता है...और वे इस विज्ञापन का बजट बढ़ाकर हज़ार करोड़ कर देते हैं. यह देख अब उसके सीनियर्स फिर एक बार चाल  चलते हैं...और नैना के प्रेजेंटेशन को रिजेक्ट कर कहते हैं...'उन्होंने कुछ दूसरा आइडिया सोचा है'. नैना के पास रिजाइन करने के सिवा कोई चारा नहीं रह जाता (ऐसे प्रकरण आम हैं...विज्ञापन एजेंसियों में)


इधर उसका  कॉलेज का प्रेमी..पूरब...उसपर शादी के लिए दबाव डाल  रहा है. उसे भी  नैना कह देती है..."तुम अपनी सुविधा से मेरी ज़िन्दगी से चले गए और अब अपनी सुविधा से लौट आए...मुझे सोचने के लिए समय चाहिए " और वह फिर से एक बार चला जाता है.

 एक बार फिर नैना  के पास ना नौकरी  है... ना बॉयफ्रेंड ...वो किसी का फोन नहीं उठाती..घर से बाहर नहीं जाती .एक बार फिर उसकी दोनों सहेलियाँ उसका ख्याल रखती  हैं. एक सहेली, उसके लैपटौप पर अपना मेल चेक करने जाती है...और एक फ़ाइल खुली हुई है...जिस में नैना अपने विचार लिखती रहती  है. उसकी सहेली...उसके पीछे पड़कर एक पब्लिशर को उसके सारे नोट्स दिखलाती है.पब्लिशर इम्प्रेस्ड होकर उसे एक किताब लिखने का ऑफर देता है

( देखने पर लगता है...ऐसा सिर्फ फिल्मो में ही संभव है...पर
चेतन भगत  के 'फाइव पॉइंट समवन'  का उदाहरण हमारे सामने है...जो उनके हॉस्टल  के जीवन पर आधारित थी...हाँ, पर तभी..अगर आप अंग्रेजी  में लिखते हों. एक आइ.आइ.टी. के स्टुडेंट की (वे मेरे कजिन भी हैं..'अनिमेष वर्मा ") उनकी पुस्तक,"Love, Life and Dream  On ' की भी पब्लिशर ने ना सिर्फ छापने  की जिम्मेवारी ली...बल्कि धुंआधार  प्रचार भी किया...हर बड़े अखबार और ऍफ़.एम चैनल्स से उनके इंटरव्यू प्रसारित किए...पांच हज़ार कॉपी छपी उस किताब की जबकि सुना है...हिंदी की किताबो की 200 से ज्यादा प्रतियाँ नहीं छपतीं..और हिंदी के एक नए लेखक की किताब का कितना प्रचार  किया जाता है...इसका  मुझे कोई इलहाम  नहीं)

फिल्म की तरफ लौटते हैं....इधर ऋषभ..एक बार फिर से नैना को  कॉल करना और उसके फ़्लैट पर आना शुरू कर देता है.पर नैना का रुख देखकर ही उसकी कामवाली  बाई..कह देती है.."दीदी बिजी है..नहीं मिलेंगी) (मुंबई की
बाइयों पर एक पोस्ट मैने लिखी थी...यहाँ की  बाइयां सचमुच...अकेली औरतों के लिए एक गार्जियन की तरह होती  हैं...और कई बार उनकी इमोशनल एंकर भी  बन जाती हैं.)
 

एक बार पब्लिशिंग हाउस से लौटते हुए नैना, की नज़र एक होर्डिंग पर पड़ती है और वो पाती है कि उसकी विज्ञापन एजेंसी ने उसका आइडिया और उसका प्रेजेंटेशन ही इस्तेमाल किया है.टी.वी. पर भी उसकी लौन्चिंग पर सारा क्रेडिट उसके बॉस और उसके सहकर्मी ले लेते हैं.. वह उनपर केस कर देती है और जीत भी जाती है,{आखिर  फिल्म की हिरोइन है :)}

नैना की  किताब( Turning Thirty ) पूरी होकर छप गयी  बहुत सफल भी हुई .उसकी बुक रीडिंग में उसकी माँ,  दोनों पूर्व प्रेमी..उसकी सहेलियाँ...सब मौजूद रहते हैं. ऋषभ उस से कहता है...कि उसने सगाई तोड़ दी है..क्यूंकि दोनों के विचार मेल नहीं खाते थे और अब वो वापस लौटाना चाहता है. पर नैना  मना कर देती है...वो पुराने प्रेमी के पूरब पास जाती है..पर इस बार अपनी सुविधानुसार और उस से पूछती  है.."विल यू मैरी मी .."आज की नारी
  :).

फिल्म हिट नहीं,हुई ..पर इसके हिट होने के  सारे मसाले डाले गए हैं. दृश्यों और संवादों में काफी बोल्डनेस है. ऑल गर्ल्स  पार्टी में लडको की एक स्ट्रीप्तीज़ भी रखी गयी है. नैना की एक सहेली,एक गेम ..'ट्रुथ एंड डेयर'  के दरम्यान स्वीकार करती है कि वो लेस्बियन है.." दूसरी सहेली..ऊपर से बहुत खुश दिखती है..पर उसके पति के एक्स्ट्रा मेरिटल अफेयर्स हैं.

 
उच्च वर्ग  में जो कुछ भी हो सकता है....वह .सब कुछ  दिखाने की कोशिश की गयी है.

सारे पात्रो ने अपने कैरेक्टर  के साथ न्याय किया है. अगर 'डोर' फिल्म वाले 'गुल पनग' को ढूंढेंगे तो निराशा होगी. इस फिल्म में शायद गुल को ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ी होगी. क्यूंकि ऐसे  ही जीवन की वे आदी हैं  हैं. काफी दिनों तक प्रकाश झा  की असिस्टेंट डाइरेक्टर रह चुकी अलंकृता  श्रीवास्तव की पहली फिल्म है...फिल्म को सफल बनाने के लिए कोशिश कुछ ज्यादा ही  कर डाली...और ये कोशिश ईमानदार नहीं थी...बाज़ार से समझौते की थी...इसीलिए फिल्म पार्ट्स में ही अच्छी है.पर विषय बिलकुल नया है..इसीलिए आकर्षित करती है,फिल्म ....प्रकाश झा ने प्रोड्यूस की है. गाने अच्छे    हैं.


शायद मुंबई बेस होने से और नायिका के एक विज्ञापन एजेंसी से जुड़े होने से फिल्म  कुछ ज्यादा ही आधुनिक लगती है.लेकिन लखनऊ...रांची..पटना.. जैसे शहरों में भी लडकियाँ अब अपने जीवन का कंट्रोल अपने हाथों में ले रही हैं. अगर अरेंज्ड मैरेज करती हैं..फिर भी...अपनी,पसंद-नापसंद खुलकर बताती हैं. और पसंद ना आने पर लड़के ही रिजेक्ट नहीं करतीं ...एंगेजमेंट भी तोड़ने की हिम्मत रखती हैं. और ये सब इसलिए कर पाती हैं क्यूंकि वे आत्मनिर्भर हैं. ज्यादा से ज्यादा लड़कियों का अपने जीवन पर नियंत्रण हो...तभी सारी कुप्रथाएँ समाप्त होंगी.


इस पोस्ट को लिखने के दौरान ही...'
रश्मि प्रभा' जी की ये कविता पढ़ी...उसके ये अंश बहुत सटीक लगे.
नई पीढ़ी ने
हर तथाकथित मर्यादाओं को ताक पर रख दिया
और भीड़ में गुम हो गई !
कभी देखा है -
अपने अस्तित्व के लिए
अपने टुकड़े के लिए
रात दिन एक करती ये लड़कियाँ

बहुत पहले पढ़ी...शरद कोकस जी की ये कविता भी, कामकाजी लड़कियों के जीवन को अच्छे से बयाँ करती है...इसकी ये पंक्ति खासकर,अच्छी लगी थीं.

"आज़ाद हवा से दोस्ती की उसने 
मजबूती से ज़मीन का दामन थामा 
और  एक कदम आसमान की ओर बढ़ा दिया "

और ये भी
 "कॉफी का एक प्याला उसका डॉक्टर था
और खिड़की से आया ,हवा का ताज़ा झोंका, नर्स"


अरुण चन्द्र राय ने भी इस उम्र की कामकाजी लड़कियों  पर एक बढ़िया कविता लिखी है.

फिल्म The Wife और महिला लेखन पर बंदिश की कोशिशें

यह संयोग है कि मैंने कल फ़िल्म " The Wife " देखी और उसके बाद ही स्त्री दर्पण पर कार्यक्रम की रेकॉर्डिंग सुनी ,जिसमें सुधा अरोड़ा, मध...