शनिवार, 7 जुलाई 2018

अनजानी राह


अनिमेष ऑफिस से एक हफ्ते की छुट्टी लेकर अपने घर आया हुआ था . निरुद्देश्य सा सड़कों पर भटक रहा था .उसे यूँ घूमना अच्छा लगता. जिन सड़कों पर सैकड़ों बार पैदल चला था. तपती  दोपहरी और ठिठुरती ठंढ में घंटो साइकिल चलाई थी. इन पर चलते हुए हमेशा कहीं पहुँचने की जल्दी होती थी.पर आज खरामा खरामा चलते हुए जैसे सडकों की आवाज सुन रहा था और वे मानो शिकायत कर रही थीं, इतने दिन लगा दिए वापस लौटने में . पर बस सड़कें ही जानी पहचानी  रह गयी थीं वरना इस छोटे से शहर में बहुत कुछ बदल गया था. मॉल्स ,मैकडोनाल्डस ,बड़े बड़े शो रूम खुल गए थे. सडकों के किनारे छोटे छोटे दुकानों का जमघट सा लग गया था. जानी पहचानी दुकानों को ढूंढना पड़ता.  पहले जहां सडकों पर इक्का दुक्का कार दौड़ती नज़र आती थी, अब सड़कों पर ट्रैफिक जाम होने लगे थे . बड़ी तेजी से बदल रहा था शहर उसका, पर उसे अपना वो पुराना ऊंघता  हुआ  शहर ही प्यारा और अपना सा लगता .
फिर अनिमेष ने सर झटक दिया ,’क्या वो अपने शहर को तरक्की करते हुए नहीं देखना चाहता ‘. तभी हवा की एक लहर आई और अपने साथ अदरक इलायची वाली चाय की खुशबू भी लेती आई. ये तो रघु काका के चाय की खुशबू है. इधर उधर देखा तो पाया, सामने ही दो चमकते जनरल स्टोर के बीच में रघु काका की चाय की टपरी छुप सी गई थी. पर थी बिलकुल जस की तस .वही सामने लकड़ी के तख्ते पर बिस्कुट के बड़े बड़े डब्बे और एक तरफ स्टोव पर अदरक-इलायची वाली ,उबलती चाय. स्कूल जाते वक़्त हमेशा इसी राह से गुजरना होता .जब स्कूल में था,तब चाय तो नहीं पीता था, आदत तो अब भी नहीं थी. पर ये चाय की खुशबू  बड़ी जानी-पहचानी सी लगती और जब भी अपने शहर आता, थोड़ी देर बाहर ही खडा, इस खुशबू को अपने अन्दर भरता रहता और फिर अन्दर चला जाता.

आज भी थोड़ी देर बाहर खड़े  रहकर जैसे ही अन्दर गया .एक तरफ कुर्सी पर बैठे उसके स्कूल के हिन्दी  सर दिख गए. वे तो शायद उसे नहीं पहचान पाते . उसने सामने जाकर 'नमस्ते सर' कहा और सर ने अपनी ऐनक ठीक करते नज़रें उठा कर देखा और आदतन बोल गए, खुश रहो बेटा...कैसे हो ?”

ठीक हूँ सर...आप कैसे हैं ?”

तुssम ..अनिमेष हो न...अच्छाss..अच्छाss..रीयूनियन के लिए आये हो. देख कर बहुत अच्छा लगता है कि तुमलोग अपने स्कूल को भूले नहीं हो. अच्छा रिवाज़ शुरू हुआ है. हमलोग भी अपने पुराने छात्रों से मिल लेते हैं “.सर ने उसे पहचान लिया था .

नहीं सर, मैं तो यूँ ही घर आया हुआ था. हमारी बैच का रीयूनियन है? मुझे नहीं पता था

कल ही तो है. जरूर आना बेटा. शाम चार बजे है, बहुत सारे छात्र आते हैं. तुम सबसे मिलकर बहुत अच्छा लगेगा. चलो अब चलता हूँ...कितने हुए चाय के? सर अपने कुरते की जेब में हाथ डालने ही वाले थे कि अनिमेष ने रोक दिया, सर प्लीsज़

आगे कुछ कहने की जरूरत नहीं पड़ी. सर हंस दिए,ठीक है ठीक है...आज की चाय तुम्हारी तरफ से

सर तो चले गए पर वो बड़े पेशोपेश में पड़ गया .वो जाए या नहीं , उसे इस रीयूनियन की कोई खबर नहीं थी. खबर भी कैसे होती, वो किसी सोशल नेटवर्क साईट पर तो था नहीं. उसे ये सब फ़िज़ूल का समय बर्बाद करना लगता. जिनलोगों से संपर्क में रहना चाहता उनके फोन नंबर तो उसके पास थे ही. रोज रोज बात नहीं होती पर एक दूसरे की ज़िन्दगी में क्या चल रहा है , इसकी खबर होती थी. दो साल पहले रंजन ने बताया तो था . अनिमेष से पूछा भी था बल्कि जोर भी डाला था रीयूनियन में चलने के लिए .स्कूल के सभी पुराने छात्रों ने फेसबुक पर अपने स्कूल की  कोई कम्युनिटी बनाई थी , और वहीँ रीयूनियन का प्लान किया था .वह तो फेसबुक पर है ही नहीं.पहली बार रंजन ने बताया था .पर उसने मना कर दिया. इतना ज्यादा किसी से मिलने की चाह नहीं थी. 
और कुछ औपचारिक बातों और बनावटी मुस्कुराहटों के लिए वो छुट्टी लेकर जाए, उसे मंजूर नहीं था. बाद में  उसकी अनिच्छा देख फिर रंजन ने भी जिक्र नहीं किया. 

पर आज तो इसी शहर  में था. उसके पास समय भी था ..अनिमेष ने तुरंत रंजन को फोन मिलाया . रंजन  इस बार नहीं आ रहा था पर उसने अखिल का फोन नंबर दिया .जो इस आयोजन का कर्ता-धर्ता  था . अखिल तो उसका नाम सुनते ही उछल पडा, अरे हमारे बैच के स्टार, तुम शहर में हो और किसी को खबर ही नहीं. तुम्हे तो आना ही पड़ेगा .मैं  लेने आउंगा...किसी 'ना' का तो सवाल ही नहीं.

उसने आश्वस्त किया , “ना लेने आने की जरूरत नहीं. मैं खुद समय से पहुँच जाऊँगा

अब जब जाने का मन बना लिया तो जैसे वो स्कूल के दिनों में ही पहुँच गया . कितने बेफिक्री भरे दिन थे वे, बस पढाई और क्रिकेट दो ही शौक या कहें जूनून था उसके जीवन में .

सारे टीचर्स उसे बहुत मानते थे क्यूंकि मन लगाकर पढ़ाई करता ,समय पर होमवर्क करता ,कोई शैतानी नहीं करता और क्लास में फर्स्ट तो खैर आना ही था . घर आकर स्कूल बैग घर पर पटकता और फिर माँ जो भी देती बिना नखरे के खा कर खेल के मैदान में . क्यूंकि ना नुकुर करने में समय बर्बाद होता और उसे अपने खेल का एक मिनट भी बर्बाद करना पसंद नहीं था .अंधेरा होने के पहले ही घर वापसी .फिर पढ़ाई और खाना खा कर सो जाना .इस रूटीन में कोई बदलाव नहीं आता.
टीचर्स का, अपने आस-पास के बड़े बूढों का तो वह बहुत प्यारा था पर उसकी उम्र के बच्चे उसे ज्यादा पसंद नहीं करते, क्यूंकि हर वक़्त उन्हें अनिमेष का उदाहरण दिया जाता. "देखो, कितना अच्छा लड़का है .कितना मन लगाकर पढाई करता है ".स्कूल में भी उस से सब थोडा दूर दूर रहते .सिर्फ परीक्षा के दिनों में उसके आस-पास मंडराते रहते. अनिमेष मैथ्स का ये सवाल समझा दो’, ‘हिस्ट्री के नोट्स दे दो’, ‘जरा ग्रामर में हेल्प कर दो’. लडकियां भी अपने नोट बुक्स लेकर आगे-पीछे घूमती रहतीं. वो सबकी हेल्प कर देता और फिर वहाँ से उठ कर चल देता. किसी से भी जरूरत से ज्यादा बातें नहीं करता. उसे भी गुस्सा आता बस एग्जाम के दिनों में ही सबको अनिमेष की याद आती है.  

पर एक बार कुछ ऐसा हुआ कि वो एक दिन में ही स्कूल का हीरो बन गया
एक दिन वह स्कूल से निकल घर की तरफ बढ़ा ही था कि उसके क्लास की अंकिता दौड़ती हुई उसके पास आयी, ‘अनिमेष अनिमेष...देखो न सुरेश को कुछ लोग पीट रहे हैं.उसे इन सबमे नहीं पड़ना था फिर भी उसने सोचा कोई मुसीबत में है, उसकी मदद करनी चाहिए . स्कूल के पीछे की तरफ दो लड़के मिलकर एक दुबले-पतले मरियल से लड़के सुरेश को मार रहे थे . अनिमेष ने उनमे से एक से कहा, “दो लोग मिल कर एक को क्यूँ मार रहे हो...जाने दो न उसे

तुम्हे क्या है....जाओ तुम यहाँ से उस लड़के ने अनिमेष को धक्का देकर हटाते हुए कहा .

इस तरह किसी को मारना ठीक नहीं...चलो सुरेश..मेरे साथ चलोकहते अनिमेष ने सुरेश को अपने साथ आने का इशारा किया.

सुरेश ने आशा भरी आँखों से उसे देखा और उठ कर उसकी तरफ बढ़ा .तभी एक लड़के ने सुरेश का कॉलर पकड़ लिया, किधर चला..

अनिमेष के फिर से कहने पर कि छोड़ दो लड़के को एक लड़का उसकी तरफ बढ़ा और उसे धक्का देते हुए बहुत ही बद्तमीजी से कहा, “ जा जा किताबों में मुहं छुपा कर बैठ और कुछ बोला तो सारे दांत तोड़ कर हाथ में दे दूंगा

इतना सुनते ही अनिमेष के अन्दर गुस्से का एक सैलाब उठा. उसने थोड़ी दूर पर खड़ी अंकिता को अपना बैग थमाया ,और तूफ़ान की तरह वहीँ से दौड़ते हुए आया और उस लड़के को जोर से धक्का दे जमीन पर गिरा दिया. दूसरा लड़का हतप्रभ रह गया और उसकी तरफ बढ़ा पर अनिमेष पर जैसे गुस्से का भूत सवार हो गया था . ज़िन्दगी में पहली बार किसी ने उस से इतनी बद्तमीज़ी से बात की थी . उसके अन्दर जैसे पांच लोगों की ताकत आ गयी थी. वैसे भी घंटो क्रिकेट के अभ्यास से उसका शरीर मजबूत हो गया था. जबकि ये लड़के न तो पढ़ते थे और न ही खेल में कोई रूचि थी उनकी . दो दो साल से फेल हो रहे थे और सारा दिन कोने में बैठ हंसी मजाक करते, फ़िल्में देखने जाते या फिर पत्ते खेलते. उनके शरीर में जान नहीं थी. अनिमेष अंधाधुंध हाथ पाँव सब चला रहा था . उसकी शर्ट के बटन टूट गए, शर्ट भी फट गयी . मार-पीट शायद और थोड़ी देर चलती पर इतने में छोटी सी भीड़ इकट्ठी हो गयी थी किसी ने स्कूल में जाकर बता दिया था और दो टीचर दौड़ते हुए आये , और बहुत फटकारा उन्हें.
अनिमेष को भी डांट लगाई. अनिमेष ने अपना बैग लिया और घर की तरफ चल पडा.

घर पर छोटे भाई ने पहले ही जाकर बता दिया था .माँ ने डांटा , “अब यही सब करो. तुम्हे क्या जरूरत थी बीच में पड़ने की. नयी शर्ट भी फट गयी (शर्ट फट जाने का अफ़सोस तो उसे भी था. तब साल में दो बार ही कपड़े बनते थे होली और छठ में. फिर धुल धुल कर उनके रंग उतर जायें या वे फट जाएँ ,उन्हें ही सिलवा कर पूरे साल काम चलाना पड़ता था )

पर अभी अनिमेष को शर्ट के फट जाने के दुःख से ज्यादा दुःख माँ की डांट से हो रहा था. गुस्से में बोला,  तो क्या करता उस लड़के को मार खाने देता ?? अकेले लड़के को सब पीट रहे थे

पर माँ  से तो इतना कह गया. जब शाम को पिताजी ऑफिस से आये ,उनके कानों में भी बात पड़ी और उन्होंने भी डांटा तब अनिमेष सर झुकाए बस सुनता रहा . मन ही मन सोच रहा था , किसी की मदद करना क्या इतनी बुरी बात है ,आज तक सबने तारीफ़ ही की पर अब टीचर, माँ, पापा सब डांट रहे हैं . बस छोटा भाई बहुत खुश था, सोते वक़्त धीरे धीरे बोल रहा था, “क्या मारा भैया तुमने, उन्हें.... धूल चटा दी...बड़ा मजा आया

पर सबसे डांट सुनकर अनिमेष का मन खिन्न हो गया था, उसने भाई को डांट दिया ,”सो जाओ चुपचाप

सुबह सुना , पापा बगल वाले शेखर दादा से कह रहे थे, किसी की रक्षा के लिए सामने आना बहुत बड़ी बात है , अच्छा किया अनिमेष ने

शेखर दादा तो पहले ही उसे बहुत मानते थे ,कहने लगे..लोरका तो आपका हीरा है हीरा

रात का मलाल उसके मन से मिट गया . खुश खुश स्कूल गया तो पाया , सबकी नज़रें उसपर ही टिकी हैं. सब कल की ही बातें कर रहे हैं , क्लास के लड़के-लड़कियों ने उसे घेर लिया ,”सुना बहुत मारा तूने उन लड़कों को किधर छुपाकर  रखा था अपना ये रूप..

तुम्हारा बैग कितना भारी है अनिमेष ..क्या क्या भरे रहते हो इसमें. इतनी देर उठाये उठाये मेरे हाथ दुःख गए अंकिता बार बार ये दुहरा कर सबको जता रही थी कि उसने अनिमेष का बैग उठा रखा था .

अनिमेष को इन सबका इतना अटेंशन पाकर ख़ुशी कम नाराज़गी ज्यादा हो रही थी. इतने मन से पढ़ाई करने पर, हमेशा फर्स्ट आने पर सबने इतनी सम्मान भरी नज़रों से नहीं देखा और ज़रा सी मार-पीट करते ही उसकी इज्जत बढ़ गयी . 

उसने इन सबको ज्यादा तवज्जो नहीं दी. उसे ज़िन्दगी में बहुत कुछ करना था, बहुत आगे जाना था. उसके बड़े बड़े सपने थे और बहुत जल्दी उसे पता चल गया था ,उन सपनो के ताले की कुंजी थी पढाई’ . अच्छी पढ़ाई से ही उसे आई आई टी  में एडमिशन मिल सकती थी और उसके बाद तो फिर स्काई इज़ द लिमिट उसने खुद को पढ़ाई में झोंक दिया. अंतिम छः महीने तो उसने क्रिकेट को भी अलविदा कह दिया. एक जूनून सा सवार हो गया था .सुबह जल्दी जाग कर रात में देर से सोता. खाना भी पढ़ते पढ़ते ही खाता. कभी कभी भाई उसकी थाली में से रोटी उठा लेता और जब वो खाली थाली में हाथ घुमाता रहता तो जोर से हंस पड़ता. माँ भाई को डांटती और फिर उसकी भी मनुहार करतीं, “खाते समय तो किताब अलग रख दे.” पर उसका ध्यान तो किताब पर रहता, ये सब जैसे उसे सुनाई ही नहीं देता.  

आशानुसार रिजल्ट भी आया .एक प्रतिष्ठित कॉलेज में उसका एडमिशन हो गया .घर से हॉस्टल में आ गया पर इसके सिवा और कुछ नहीं बदला .यहाँ भी वो सिर्फ पढाई से ही मतलब रखता . और जब कोर्स बुक से ऊबता तो लाइब्रेरी की खाक छानता . चार साल कट गए और अंतिम वर्ष में एक बढ़िया कम्पनी में जॉब भी मिल गयी .

अब उसकी असली ज़िन्दगी की जंग शुरू हुई. अब तक सब कुछ बहुत आसान था.  बस पढ़ाई करना, इम्तहान देना और क्रिकेट मैच देखना . किताबों से बाहर की दुनिया उसने देखी नहीं थी और लगा अचानक जैसे किसी अनजान देश में चला आया है. सब कुछ नया सा लगता ,उसे. अब तक अपने पहनावे के प्रति बेपरवाह था. दो जींस और चार टी शर्ट में ही साल गुजर जाता. पर अब पूरी बांह की शर्ट, ट्राउजर और चमकते जूते में कैद होना पड़ता. प्रत्येक शुक्रवार को सब अलग अलग टी शर्ट में नजर आते. उसे भी मजबूरन खरीदनी पडती. सबकी भाषा भी अलग सी ही लगती. उसकी अंग्रेजी अच्छी थी पर शुद्ध किताबी अंग्रेजी थी . ऑफिस की शब्दावली ही अलग थी . कौन कौन से शब्दबोलते ये लोग , कूल,ब्रो, डूड, चिल्ल, चिक, ग्रामर का भी घालमेल कर देते. ये सारे शब्द बोल तो अब भी नहीं पाता वह ,पर अब अटपटा नहीं लगता. आदत पड़ रही थी. खाने-पीने में भी बर्गर, सैंडविच, पिज़्ज़ा, पेस्ट्री की आदत डाल रहा था . आये दिन ऑफिस में किसी न किसी का बर्थडे होता और फिर यही सब चीज़ें मंगवाई जातीं. महानगर की जीवनशैली ही अलग थी. हर वीकेंड्स पर ये लोग फिल्म-पार्टी-पिकनिक का प्लान बना लेते. फिल्म और पिकनिक के लिए फिर भी वह साथ चला जाता पर पार्टी के लिए तैयार नहीं होता. सब जम कर पीते और डांस करते. 

दोनों ही उसके वश का नहीं था . वह अपनी तरह से अपनी छुट्टियां बिताता. अपने तरीके से शहर घूमता ,कभी भी कोई ट्रेन पकड़ कर किसी छोटे से स्टेशन पर उतर जाता ,फिर वहाँ से किसी गाँव में चला जाता .

एक बार यूँ ही खेत के किनारे खड़ा एक किसान को हल चलाते देख रहा था.  खेत में गोल गोल चक्कर लगाते किसान दो तीन बार पास से गुजरा और फिर पूछ ही लिया.."क्या देख रहे हो भैया ?? " और उसने अचानक से कह दिया.."मैं एक बार हल चला कर देखूं ? "

किसान  हंसने लगा और इशारे से उसे बुला लिया. पहली बार हल चला कर उसे  बहुत मजा आया. थोड़ी देर बाद किसान बोला, "बस भैया...अब मैं घर जाउंगा...रोटी खाने " फिर थोडा ठहर कर हिचकते हुए बोला, "आप साथ चलोगे ?" 

किसान ने बैलों को एक बैलगाड़ी में जोता और घर की तरफ चल दिया. अनिमेष भी बैलगाड़ी पर बैठ गया . संकरी सी पगडंडी पर हिचकोले खाती बैलगाड़ी . दोनों तरफ लहलहाते खेत किसी और ही दुनिया का आभास देते. फूस की झोपडी थी पर साफ़ सुथरी .सामने की जगह मिटटी से लीपी हुई थी. एक तरफ एक चारपाई खड़ी की हुई थी. किसान ने चारपाई बिछा दी और बोला, "आप बैठो बाबू ..."
पास ही अमरुद के पेड़ पर चढ़ी दो छोटी लडकियां  दौड़ती हुई पास आ गयी," बाबा आ गए...बाबा आ गए  "

फिर उसे देख सहम कर थोड़ी दूर पर ही ठिठक गईं .अनिमेष,उन्हें पास बुला कर उनका नाम पूछने लगा.

तब तक किसना बैलों को दाना डाल कर चापाकल से हाथ-पैर धोने लगा.
वह भी हाथ मुहं धोने उठ आया .

हाथ मुहं धोकर आया तो देखा चारपाई पर  दो बड़े से थाल में करारी सिंकी दो मोटी रोटियाँ, चटनी और प्याज रखे थे .किसान  की पत्नी पल्लू को दांतों से पकडे पास ही एक बड़े से लोटे में पानी लिए खड़ी थी .

"बाबू जो रुखा सूखा हम खाते हैं वही आपके लिए भी है.."

रोटियाँ और चटनी देख उसे भूख  लग आयी थी. उन्हें धन्यवाद कहना अजीब औपचारिक सा लगा. इसलिए जल्दी से थाली खींच कर एक टुकड़ा रोटी का चटनी में  लगाकर मुहं में डाला और बोला, "बहुत स्वाद है...बड़ी अच्छी बनी है " अनिमेष सोचने लगा. स्वाद के लिए बस भूख होनी चाहिए. जिन्हें भूख नहीं लगती, वे ही खाने में स्वाद डालने के सौ जतन करते हैं. जम कर भूख लगी हो तो हर खाना स्वादिष्ट लगता है .और तेज भूख तभी लगेगी जब कड़ी मेहनत की गयी हो .आज उसने भी मेहनत की है तो ये चटनी रोटी भी इतना सुस्वादु   लग रहा है.  उसे चटनी बहुत अच्छी लगी और सोचने लगा, ऐसी चटनी बनाने का जुगाड़ हो जाए तो फिर वो भी सिर्फ रोटी और प्याज से काम चला सकता है.

खाना खा कर किसान  फिर से खेतों की तरफ जाने लगा . अनिमेष से भी पूछा पर उसने मना कर दिया . वह अभी गाँव में थोड़ा घूमना चाहता था . जाते वक़्त दोनों लडकियां झोपडी के पास लगे छोटे से सब्जियों वाले खेत से उसके लिए एक खरबूजा तोड़ लाई. और शरमाती हुई उसे देने लगीं. अनिमेष ने बिना ना नुकुर के ले लिया. समझ नहीं पा रहा था 
, उनका कैसे शुक्रिया अदा करे .बस इतना ही कहा, "यहाँ आकर बहुत अच्छा लगा, फिर आऊंगा " .

थोडा आगे बढ़ा तो कुछ लड़के कंचे खेल रहे थे .उनके साथ थोड़ी देर कंचा खेला. सबके साथ मिलकर खरबूजा खाया .और फिर शाम को शहर लौट आया. ऐसे ही उसने दुनिया देखने का भी प्लान बना रखा था. खूब पैसे जमा करेगा और फिर पेरिस,स्विट्ज़रलैंड ,न्यूयार्क नहीं दुनिया के छोटे छोटे शहर देखेगा. कैसी है ज़िन्दगी उनकी...कैसे रहते हैं लोग वहां .

अब तक वह लड़कियों से दूर दूर रहता था. संयोग से कॉलेज में उसके बैच में ज्यादा लडकियां भी नहीं थीं. और उसकी किसी से दोस्ती भी नहीं हुई. पर ऑफिस में लडकियां ही लडकियां थीं . रंग बिरंगी चिड़ियों की तरह चहचहाती रहतीं. अपनी डेस्क पर टिक कर बैठती भी नहीं. उसे  बहुत जल्दी पता चल गया था, ऑफिस के सारे लड़के/लडकियां काम को लेकर बहुत  सिंसियर नहीं है. लडकियां किसी बहाने उससे बातचीत बढ़ातीं और फिर अपना काम उसके सर पर डाल चल देतीं. अनिमेष को गुस्सा नहीं आता क्यूंकि उसे बिजी रहना अच्छा लगता था और काम भी सीखने को मिलता.पर काम के बाद जो थैक्यू का सिलसिला शुरू होता, उस से उसे चिढ़ थी. 

अक्सर उसे लडकियाँ ओवर फ्रेंडली लगतीं. बात शुरू कर देतीं, किसी बहाने से फोन करतीं, अक्सर चाय-कॉफ़ी के लिए भी साथ जाना पड़ता. अनिमेष समझता था वह और लड़कों से थोडा अलग है, आगे बढ़कर उनसे दोस्ती का हाथ नहीं बढाता. उनसे हंसी मजाक नहीं करता , इसलिए वे उसपर भरोसा करती हैं. और करीब आना चाहती हैं ,पर वो भी क्या करे, उसकी रुचियाँ उनसे बिलकुल ही मेल नहीं खातीं. किसी भी विषय पर वो एक प्लेटफॉर्म पर होते ही नहीं. उसे एक्शन मूवीज, साइंस फिक्शन  पसंद आते तो लड़कियों को रोमांटिक फ़िल्में .उसे इंस्ट्रूमेंट बेस्ड म्युज़िक  पसंद था तो लडकियों को बॉलीवुड गाने . ज्यादातर बातचीत में वो हाँ हूँ ही करता रह जाता और उम्मीद करता कि उसकी हाँ हूँ से बोर होकर वे उस से दूर हो जायेंगी. पर लड़कियों को इतना अच्छा श्रोता कहाँ मिलता ? उसे ही उनसे दूर  रहने के सौ बहाने बनाने पड़ते, कभी मोबाइल स्विच ऑफ कर देता , कभी बीमारी का बहाना बनाता . तंग आ गया था पर निजात नहीं मिल रही थी . बस कंपनी चेंज करता, शहर बदलता तो थोड़े दिन की राहत मिलती पर फिर वही सारे वाकये सिरे से खुद को दुहराते .

और अब तो घर वाले किसी के पल्ले उसे बाँधने के लिए बेताब थे . बार बार दुहराते ,’उसे नौकरी करते हुए पांच साल हो गए हैं अब तो सेटल हो जाना चाहिए ‘. पर उसे सेटल होने वाली बात समझ में नहीं आती .वो सेटल ही तो था, अपनी मर्जी से अपनी ज़िन्दगी जी रहा था. उसे वो स्टीरियो टाइप ज़िन्दगी नहीं चाहिए थी. पढाई-नौकरी-शादी-बच्चे के चक्कर में नहीं फंसना था .उसे अपनी ज़िन्दगी अपनी तरह से जीनी थी. पर उसकी बात कोई नहीं समझता. माँ-पापा-रिश्तेदारों-पड़ोसियों की एक ही रट सुन उसने घर आना भी कम कर दिया था.

इस बार तो माँ से कह ही दिया, ‘अगर वो शादी की बात करेंगी, फोटो दिखाना शुरू करेंगीं तो फिर वह घर नहीं आएगा

माँ का ख्याल आते ही ध्यान आया कब से वो सड़कों पर ही भटक रहा है. अन्धेरा होने को आया ,माँ परेशान हो रही होंगीं कि कहाँ चला गया. जल्दी जल्दी घर की तरफ कदम बढ़ा दिए.

दूसरे दिन वह समय से अपने स्कूल पहुँच गया. गेट पर ही बैनर लगा हुआ था और सजे-धजे लोग भीतर जा रहे थे. लग रहा था जैसे कोई उत्सव हो. अखिल गेट पर ही मिल गया. गर्मजोशी से हाथ मिलाया और फिर गले ही लग गया .और भी दोस्त आस-पास सिमट आये .वो सबको पहचान भी नहीं पा रहा था . दस साल बाद मिल रहा था सबसे . बहुत बदल गए थे सब , चेहरा तो फिर भी गौर से देखने पर जाना-पहचाना लग रहा था पर सबका शरीर भर गया था .सबके नाम भी नहीं याद आ रहे थे. .अन्दर आकर उसने अखिल से कह भी दिया तो अखिल हो हो कर हंसने लगा, फिकर न कर ..तुझे सब पहचनाते हैं..तेरी सारी खबर है सबको. आखिर स्टार थे हमारे स्कूल के.अब भी नहीं बदले तुम तो. और कैसे बदलोगे अब तक छड़े घूम रहे हो..यार शादी क्यूँ नहीं की अबतक ?”

अब तू भी शुरू मत हो जा...कोई ये सवाल करे तो फिर मैं वहां जाना ही छोड़ देता हूँ..

अरे बाबा कोई नहीं...चिल्ल...नहीं करेंगे कोई सवाल


अखिल के कंधे पर किसी ने हाथ मारा और अखिल उस से मुड़ कर बातें करने लगा. अनिमेष हॉल में सबका जायजा लेने लगा ,लडकियां जो अब औरतें ज्यादा लग रही थीं एक घेरा बना कर बैठी थीं. कुछ के गोद में छोटे बच्चे थे तो कुछ की उंगलियाँ पकडे बच्चे हैरानी से सबको देख रहे थे . उनके पास में ही एक लड़की कुर्ता जींस में ,गले में बड़े बड़े मोतियों की माला डाले , कानों में लम्बे इयर रिंग्स पहने खड़ी थी. उसके काले बालों के बीच एक लट हाई लाईट किये हुए लाल रंग की थी. अनिमेष को यकीन हो गया कि ये लड़की उसके बैच की तो हो ही नहीं सकती .

उसने पास खड़े अमित से पूछ लिया, “जूनियर्स भी आये हैं क्या ??

 नहीं जुनियर्स तो नहीं पर जिनके भाई-बहन इसी स्कूल में पढ़े हैं और शहर में हैं वे साथ में आये हैं ." अमित ने बताया

अनिमेष ने सोचा, उसके स्कूल से निकल जाने के बाद इतनी फैशनेबल लडकियां पढने लगीं, बहुत तरक्की कर ली उसके स्कूल ने  उसके वक़्त में लड़के लड़कियों के अलग अलग ग्रुप में रहने का रिवाज आज भी कायम था .आज भी लड़के अलग गोल बना कर खड़े थे और लडकियां अलग घेरा बना कर बैठी थीं . 
वो लड़कों के साथ खड़ा था. करीब करीब सभी दोस्तों की शादी हो चुकी थी और वे बढ़ते खर्चों और इन्वेस्टमेंट की बातें ही ज्यादा कर रहे थे . अनिमेष सबकी बस सुन रहा था, उनकी बातों में शामिल नहीं हो पा रहा था .वह थोडा अलग हटकर खिड़की के पास खड़ा हो गया ,जहाँ से स्कूल का मैदान दिख रहा था . वही मैदान जहाँ हज़ारों रन बनाए थे ,सैकड़ों विकेट चटकाए थे और कैच पकडे थे . अब बरसों हो गए बैट थामे. उन दिनों एक अच्छे से बैट की कितनी हसरत थी उसे. दूकान में तीन सौ के बैट को उलट-पुलट कर देखता और फिर रख देता. जानता था उसके पिता की सीमित आय में ये शहंशाही खर्च संभव नहीं .आज चाहे तो रोज तीन सौ का एक बैट खरीद कर फेंक दे.पर वो दिन कहाँ से लौटा कर लाये?

इन्हीं सोचों में गुम था कि अपना नाम सुन कर पलटा. सामने वही जींस वाली लड़की खडी थी .कैसे हो..पहली बार आये हो रीयूनियन पर??...बिजी रहते होगे

अनिमेष की आँखों में आये अपरिचय के भाव को पढ़ कर हंस दी वह, नहीं पहचाना मुझे? अंकिता...तुम्हारी क्लास में थी

ओह ओके...पर उसके क्लास की कैसे हो सकती है ? उसकी क्लास में तो सारी लडकियां सलवार कुरता पहनतीं और कंधे पर चौड़ा सा तह किया हुआ दुपट्टा लेतीं थीं या फिर घुटनों तक ढीला ढाला स्कर्ट. और दो चोटियाँ तो सबकी होती थीं. कुछ उसे डबल कर कान के पास बाँध लेतीं उनके कान के पास दो बड़े बड़े लाल फीते के फूल देख उसे हमेशा ही हंसी आ जाती .अगर उसके क्लास की होगी भी तो इतना कैसे बदल सकती है. इसे कोई ग़लतफ़हमी तो नहीं हो गयी.

तभी उसने नाक फुला कर कहा ,“क्या इतनी मोटी हो गयी हूँ कि तुम पहचान ही नहीं रहे

इन लड़कियों को बस मोटे-पतले की ही चिंता रहती है, नहीं नहीं पहचान लिया ... वो सफ़ेद झूठ बोल गया.

तुम लास्ट टू रीयूनियन में क्यूँ नहीं आये ?...कितना अच्छा लगता है सबसे मिलकर ..कहाँ से चले थे हम और कहाँ पहुँच गए पर अपने बैच के साथ बड़ी अच्छी बात है , सबकी ज़िन्दगी में पौज़िटिव चेंज ही आये हैं.

अनिमेष को पक्का यकीन हो गया . इसकी शादी जरूर विदेश में हुई है तभी इसका रंग-ढंग इतना बदल गया है. पर ये है कौन ?

वो अपनी रौ में बोलती चली जा रही थी..क्या दिन थे वे न...कोई फिकर नहीं कोई चिंता नहीं...बस जिए जाओ..खाओ-पियो-पढो और मस्त रहो. मैं तो वैसे अब भी वैसी ही ज़िन्दगी जीती हूँ पर ये घर वाले और दुनिया वाले राम जाने इनके पेट में इतना दर्द क्यूँ होता है

क्यूँ क्या हुआ ..उसे सचमुच समझ नहीं आ रहा था .

अरे वही शादी की रटजैसे ज़िंदगी की सबसे जरूरी चीज़ है यह. रात-दिन मेहनत करके पढो-लिखो...पैसे कमाओ और फिर जब अपने ढंग से जीने का समय आये तो शादी करके बैठ जाओ .वही घर गृहस्थी -बच्चे .मुझे नहीं पड़ना इस जंजाल में

मुस्कुरा दिया अनिमेष,ये तो उसकी भाषा बोल रही है .

हाँ, हंसो हंसो....सबको ये बेवकूफी भरी बात ही लगती है. छोडो तुम नहीं समझोगे और सुनाओ....कहाँ हो आजकल...कैसी हैं तुम्हारी पत्नीश्री और बच्चे

हम्म... अब तक उनका पदार्पण तो हुआ नहीं ज़िन्दगी में

ओहो !!! शहर के मोस्ट एलिजिबल बैचलर हो तब तो तुम.....हाँ चाचा-चाची को कोई पसंद ही नहीं आ रही होगी ना ....अक्सर होता है ,पैरेंट्स को लगता है,उनके बेटे के लायक तो कोई लड़की पैदा  ही नहीं हुई...वे लडकियां छांटते चले जाते हैं और बेटे की उम्र बढती चली जाती है...मेरी पूरी हमदर्दी है,तुम्हारे साथ...करो अपनी ड्रीम गर्ल का इंतज़ार

ऐसा कुछ नहीं है, ओके ...वो मैंने ही मना कर रखा है...

ओह!! अच्छा ऑफिस में कोई पसंद होगी पर तुम्हारे कास्ट की नहीं होगी ..इसीलिए श्रवण कुमार डर रहें होंगे...माता-पिता को कैसे बताएं ..है न

अब अनिमेष को बहुत गुस्सा आ रहा था ,वो पहचान भी नहीं रहा है इसे और ये इलज़ाम लगाए जा रही है उस पर . उसने भी उसे झटका देने की सोची, तुम सचमुच हमारे बैच की हो...पर मैं पहचान नहीं पा रहा

बताया तो नाम अंकिता’ . अरे, अब तक थैंक्यू उधार है,तुम पर....तुम्हे हीरो बना दिया था पूरे स्कूल का .याद है? टेंथ में वो जो फाईट की थी तुमने दो लड़कों के साथ . मैंने ही तो तुम्हे बुलाया था .तुम तो अपने रास्ते जा रहे थे. नहीं बुलाती तो तुम कैसे फाईट करते और कैसे हीरो बनते  और सारे समय तुम्हारा बैग भी उठा कर रखा था

ओह्ह !! वो खुलकर मुस्करा दिया .उसे पुरानी अंकिता पूरी की पूरी याद हो आयी. वही कंधे तक लटकती दो चोटियाँ और लम्बी सी स्कर्ट. बिलकुल सींक सलाई सी थी. अब कोई मिलान ही नहीं था इस नयी और उस पुरानी अंकिता में ,

वो बैग उठाये रखने वाली बात अब तक कितनी बार दुहराई जा चुकी है हँसते हुए कहा,उसने

हाँ तो कोई झूठ तो नहीं बोला...

तभी विजय पास आ गया , “ ये बढ़िया मौक़ा है ,कल मेरे छोटे भाई की शादी है . इतना काम रहते हुए भी मैं सिर्फ सबको इनवाईट करने आया हूँ. सब एक ही जगह मिल गए. कितना अच्छा लग रहा है सबको साथ देख. अंकिता...अनिमेष..तुम दोनों को भी आना पड़ेगा.

मुझे तो तुम पहले ही बता चुके हो और मैं आ भी रही हूँ...इन छुपे रुस्तम से पूछ लो

पर मैं तो कल शाम जा रहा हूँ...मेरी छुट्टी ख़त्म हो गयी है..

अरे एक्सटेंड कर लो न..इतने सालों बाद मिले हो..अच्छा लगेगा...फिर अगले साल आ पाओ या नहीं...विजय ने बहुत जोर देकर कहा.

फिर सबको खाने-पीने के लिए बुलाया जाने लगा . सब छोटे छोटे ग्रुप में खाने की टेबल की तरफ बढ़ गए. जाने के समय अंकिता पास आयी और कहने लगी, आ रहे हो न कल..प्लीज़ ना मत कहना..तुम रहोगे तो मैं थोड़ी बची रहूंगी..वरना घर परिवार क्या ये सारे दोस्त भी पीछे पड़े रहते हैं. किसी को मैं अपनी पत्नी के भाई तो किसी को अपने पति के भाई के लिए सही मैच लगती हूँ. इनका वश चले तो उसी मंडप में मेरा भी फेरा करवा दें ..तुम कल आ रहे हो बस
उसने मुस्कुरा कर बस इतना कहा ,”देखता हूँ..

पर घर आया तो एक खुशनुमा अहसास उसे घेरे हुए था .पहली बार उसका भी मन हो रहा था किसी से फिर से मिले. उसकी बातें सुने ...उसे बस देखता रहे . उसे नहीं पता ,इस राह की कोई मंजिल है भी या नहीं...या है तो कितनी दूर पर सामने जो  राह नज़र आ रही थी उसपर कदम रखने को उसका दिल उस से मिन्नतें  कर रहा था और वह सोच रहा था ,पहली बार दिल ने कोई फरमाइश की है. एक बार उसकी भी सुन लेनी चाहिए.
.और वह अपनी लीव एक्सटेंड  करवाने के लिए अपने बॉस को फोन मिलाने लगा .


बुधवार, 21 फ़रवरी 2018

भावना शेखर की नजर में "काँच के शामियाने "

भावना शेखर एक प्रतिष्ठित कवयित्री , कहानीकार और शिक्षिका हैं । शहर दर शहर विभिन्न साहित्यिक आयोजनों में शिरकत करती हैं यानि कि अति व्यस्त रहती हैं। भावना को आराम से खरामा खरामा चलते शायद ही किसी ने देखा हो, भागती ही रहती हैं 
इतनी व्यस्तता के बीच भी इतवार की एक दोपहर 'काँच के शामियाने' के नाम कर दी और इतनी सारगर्भित टिप्पणी लिखी है ।
बहुत बहुत शुक्रिया,भावना 
काँच के शामियाने
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एक पेंडिंग फ़ाइल की तरह बार बार मुझे याद दिलाती यह किताब जिसके दो पन्ने ही पढ़ पाई थी... कल रात से आज दोपहर तक तीन सिटिंग में कांच के शामियाने के भीतर बाहर घूम आई। शुरू से अंत तक सचमुच काँच का फर्श, कांच की दीवारें और छत भी काँच की, यही तो रहा सदियों से औरत का जीवन...ज़माने की बेधती निगाहों से कितनी ही बार चटकता है, कितनी ही किरचें चुभती हैं, लहूलुहान तलवों से चलते जाना है अग्निपथ पर... उफ़ करने का अधिकार नहीं...आत्मा पर बैंडेज बांधकर एक मुखौटे के पीछे छिपा लेना है किस्मत के गूमड़ों को। पूरा उपन्यास एक औरत की पीड़ा का आख्यान है। जया की पीड़ा विवाह संस्था के भीतर घुटती आकांक्षाओं का दस्तावेज़ है। नाज़ों से पली बेटी पराए घर जाती है और तन मन झोंक देती है उस घर के दरोदीवार को अपनाने में पर उसके साथ हुआ पाशविक व्यवहार पाठक को उद्वेलित करता है और जया के धैर्य और सहनशीलता पर कई बार पाठक झुंझला भी उठता है। आज ऐसा कहाँ होता है.... पर होता है, आज भी होता है --- यही तस्वीर पेश करता है यह उपन्यास। औरत का जीवन मायके और ससुराल, इन दो किनारों के बीच बहती अनुशासित नदी सा है जिसे न तटबन्ध तोड़ने की आज़ादी मिलती, न कोई उसे नई धारा में फूटने का हौंसला बख्शता। अपनी सलीब खुद ही उठानी पड़ती है।
रश्मि रविजा ने कोई नई बात नहीं कही पर आज के नवलेखन में जब नए नए मुद्दों में यह मूल मुद्दे छूट रहे हैं, इस पौराणिक दर्द को बयां करना ज़रूरी है जो औरत की प्रगति के तिलस्मी आंकड़ों को तोड़ता है क्योंकि ज़मीनी हक़ीक़त यह है कि औरत आज भी कांच के शामियाने में रह रही है। सदियों से पुरुष की सामंती वृत्ति के अंकुश तले दबी रहने को अभिशप्त हैं ग्रामीण, कस्बाई और शहरी स्त्रियाँ। लोकापवाद और समाज के उपालम्भ आज भी औरत को पंख नहीं खोलने देते।
रश्मि का सबसे बड़ा अस्त्र उसकी पात्रों के अनुरूप इस्तेमाल की गयी ठेठ आंचलिक भाषा है। जो समूचे कथानक को एक सच्चाई बख्शती है। आधी आबादी की सीधी सच्ची दास्तान पढ़ते हुए आंखों की कोर भीग भीग जाती है। किताब पढ़ते पाठक को अपने इर्द गिर्द किसी न किसी जया का अक्स उभरता दिखता है। यही कहानी की सफलता है। रश्मि रविजा ने औपन्यासिक शिल्प की चकाचौंध से परे मानवीय सम्वेदना को जगाने वाला एक सहज उपन्यास रचा है जो उनके अनायास सृजन के प्रतिफल सरीखा है। जिसे हाल में महाराष्ट्र सरकार का साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त हुआ है। लेखिका को खूब बधाई और शुभकामनाएँ।

बुधवार, 14 फ़रवरी 2018

"काँच के शामियाने " को "महाराष्ट्र साहित्य अकादमी स्वर्ण पुरस्कार "

ब्लॉग से  ही मेरे लेखन की दूसरी पारी की शुरुआत हुई .कई कहानियाँ, उपन्यास सभी यहाँ लिखे .ब्लॉग पर ही किस्तों में लिखे "काँच के शामियाने' को पाठकों का बेशुमार प्यार मिला और सोने पर सुहागा, "महाराष्ट्र राज्य साहित्य अकादमी  का  जैनेन्द्र कुमार स्वर्ण पुरस्कार" पुरस्कार भी मिला. १७ जनवरी २०१८ को एक भव्य समारोह में सम्मान पत्र, पुरस्कार राशि का चेक, ,शाल एवं स्मृति चिन्ह से सभी पुरस्कार्र्थियों को समानित किया गया. 

अपनी  ख़ुशी ,उपलब्धि और गौरव के ये क्षण फेसबुक पर तो लिखा लेकिन  ब्लॉग पर सहेजना ही भूल गई थी .

पापा  ये आपके लिए .....
आपने ही बचपन से हमें,नंदन,पराग,धर्मयुग ,इलस्ट्रेटेड विकली जैसी पत्रिकाएँ पढने की आदत डाली. नोबल पुरस्कार प्राप्त कैंसर वार्ड, डॉक्टर ज़िवागो जैसी किताबें आप खरीद कर लाते थे. तब समझ नहीं आती थीं,फिर भी पढने की भूख हमसे पढवा ले जाती. आप कभी भी हमें गलत हिंदी नहीं  बोलने देते...अगर हम भाई बहन में से किसी ने स्त्रीलिंग पुल्लिंग में गलती की और आप तुरंत टोक देते, 'हवा बह रहा है यभ रही है?..."भूख लगा अहै या भूख लगी है " . आपके इस तरह सुधारते रहने का ही परिणाम था कि एक बार बस में मैं और बस में ही बनी एक  फ्रेंड खूब बातें कर रहे थे. पीछे बैठे कोई हिंदी के शिक्षक हमारी  बातें सुन रह थे. एक जगह जब बस रुकी और सब खाने पीने उतरे तो उन्होंने मुझे पास बुलाकर बोला, ' मैं इतनी देर से सुन रहा हूँ , तुमने एक बार भी गलत हिंदी या गलत उच्चारण  नहीं किया है " 
आपने शुरू से ही मेरी शिक्षा दीक्षा का विशेष ख्याल रखा, हॉस्टल में रख कर अच्छे स्कूल-कॉलेज में पढ़ाया पर आपके मन में कहीं मलाल था कि पढाई खत्म होते ही मेरी शादी कर दी, मुझे आगे बढ़ने के अवसर नहीं मिले. आपकी इच्छा थी मैं पटना वीमेंस कॉलेज में पढूँ, एडमिशन भी मिल गया था पर हॉस्टल तीन महीने बाद मिल रहा था. मैं वहाँ नहीं पढ़ पाई. मुझे लोगों ने बताया कि रिटायरमेंट के बाद जब आप पटना रहने लगे .ऑटो में कोई लड़की वीमेंस कॉलेज जाती मिल जाती तो आप उसे किराया नहीं देने देते .उस से कहते ,"मैं चाहता था मेरी बेटी यहाँ पढ़े, अब तुम मेरी बेटी सी ही हो."


सभी मिलने जुलने वालों को मेरा ब्लॉग,अखबार में छपी कोई रचना बड़े उत्साह से पढवाते और साथ में अफ़सोस भरे स्वर कहते,' उसमें बहुत पोटेंशियल था पर मैं उसे प्रोत्साहित नहीं कर सका.'
पापा ये छोटा सा जो कुछ अचीव किया है वो आपके द्वारा साहित्य में जगाई गई रूचि का ही परिणाम है. पुरस्कार मिलने की खबर से सबसे ज्यादा ख़ुशी आपको होती पर आप तो ऊपर से सब देख ही रहे हैं, हर पल हमारे साथ हैं . पुरस्कार मिलना,माँ का इस अवसर पर उपस्थित रहना ,सब आपके आशीर्वाद से ही संभव हुआ .
प्रणाम पापा



















रविवार, 4 फ़रवरी 2018

डिप्रेशन को भी एक आम बीमारी सा समझें

(फेसबुक पर यह पोस्ट बहुत लोगों ने पढ़ी,इसपर अछा विमर्श किया और कई लोगों ने शेयर भी किये ,लगा इसे ब्लॉग पर सहेज लेना चाहिए )


एक फ्रेंड है, जो फेसबुक पर एक्टिव हैं,पर सिर्फ पढ़ने के लिए । उन्होंने डिप्रेशन पर कुछ लिख कर मुझे भेजा है कि मैं इसे अपनी वाल पर शेयर करूँ। बहुत जरूरी और सटीक बातें लिखी हैं,उन्होंने।आज समाज में डिप्रेशन के विषय में जागरूकता अतिआवश्यक है ।
उन्होंने देवनागरी के साथ रोमन का भी प्रयोग किया है ,जिसे मैंने यथावत रहने दिया है ।
Depression,एक ऐसी बीमारी है जिसके बारे में हमारा भारतीय समाज कभी खुलकर बात नहीं करता।यूं तो अधिकतर cases मे रोगी खुद ये स्वीकार करने को तैयार नहीं होता कि वो depressed है,और कहीं अगर कोई अपनों से इसका ज़िक्र करता भी है तो उसे परिवार वाले ही कहते हैं कि दिमाग पर control रखो,खुद को व्यस्त रखो आदि आदि । ये कहते हुए उन्होने कभी ये नहीं सोचा होता है कि दिमाग पर control भला करना पड़ता है क्या?क्या thyroid का कोई रोगी thyroxin hormone को control मे रहने को कह सकता है,BP का रोगी अपने BP को control मे रख सकता है भला? ।ये एक mental illness है,और अन्य बीमारियों की तरह ही हमारा इसपर कोई control नहीं हो पाता । जैसे हम BP Sugar,Cholestrol आदि अन्य बीमारियों से ग्रसित हो सकते है, उसी तरह depression के भी शिकार हो सकते है।
मतलब ये कि हर बीमारी का अपना एक अलग इलाज़ है। और हाँ, लोगों के पास उन्हे उसे न छिपाने का एक सम्मानजनक कारण भी। फिर जब हमारे यहाँ लोग depress होते हैं तो हम समाज को ये क्यों नहीं कह पाते,कि हाँ ये बीमार हैं और हम doctor/psychiatrist से मिल रहे हैं। अगर कोई depressed है और उसके परिवार ने सही समय पर इसे पहचान लिया और accept भी कर लिया तो ये रोगी के लिए बहुत अच्छा है। पर रोगी की समस्या यही खत्म नहीं हो जाती ,हाँ कम से कम उन्हे उनलोगों की तरह नहीं जीना पड़ता जिसके परिवार मे ही उसकी ये बीमारी स्वीकार्य नहीं है और वो बिना दवा के अपने दिमाग को control मे रखकर जीने या यूं कहें घुटघुटकर जीने को बाध्य है।
वैज्ञानिकों के अनुसार Brain मे serotonin नाम का एक chemical होता है जो brain में दो cells के बीच neuro transmitters की तरह कार्य करता है। यह mood balance,याददाश्त भूख आदि के लिए ज़िम्मेवार होता है। उनका मानना है कि serotonin के असंतुलन की वजह से डिप्रेशन होता है। हालांकि इसको लेकर वैज्ञानिक sure नहीं हैं की इसकी कमी से डिप्रेशन होता है या डिप्रेशन की वजह से serotonin कम हो जाता है क्योकि brain के अंदर serotonin लेवेल की जांच हो पाना अभी तक संभव नहीं हुआ है।

Doctors के अनुसार इस बीमारी मे रोगी का दिल किसी काम मे नहीं लगता।थकान,कमजोरी नींद व भूख की कमी होती हैं। रोगी उदास व अकेला महसूस करता है साथ ही जीने की इच्छा न होना व suicidal attempt जैसे लक्षण भी होते हैं।शुरुआत मे अगर हम इस रोग को पहचान लें तो psychotherapy जिसे talk therapy भी कहते है से काम बन सकता है।इसमे psychologist रोगी के साथ बात कर उन्हे उनकी बीमारी का अहसास दिलाते हैं।रोगी को stress न लेने और अपने mood swings को (जो उनकी बीमारी की अहम वजह होती है) समझने को कहा जाता है। साथ ही उन्हे ये समझाया जाता है की जो चीज उन्हे परेशान कर रही है उसका कैसे सामना कर सके या उससे निजात पा सके।और सबसे अहम बात कि psychologist पहले उन्हे समझते है,बिना निर्णायक बने।लेकिन कई मामलों मे जब रोगी को दवा की जरूरत होती है ,तो psychiatrist के सलाहनुसार उन्हे antidepressant medicine लेना पड़ता है।

आज हमारे देश मे लगभग 40 प्रतिशत लोग डिप्रेशन के शिकार हैं।हालांकि world health organisation जैसी संस्थाएं लोगो को जागरूक बनाने के लिए अपने तरीके से काम कर रही है। अभी हाल मे ही उन्होने let’s talk depression campaign किया है ,पर छोटे शहरों और गावों मे इसके प्रति सजकता लाना जरूरी है।doctors को इस बीमारी के प्रति सजगता लाने के लिए आगे आना चाहिए। साथ ही depressed patient के परिवार को को भी इस बीमारी को छिपाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए,ताकि रोगी खुद को अलग न समझे। साथ ही उनके बात करने से समाज में उनके आसपास कोई और, जो इसी बीमारी से जूझ रहा हो लेकिन समझ नहीं पा रहा हो कि वो बीमार है उसे भी दिशा मिले,और वो भी अपना इलाज कराने की सोच सके!आए दिन हम किसी न किसी जगह से depression से suicide कर लेने वाली घटना के बारे में सुनते है।अगर depression को लेकर एक बेहतर सोच बनाई जाए व depressed लोगों के लिए हमारे परिवार workplace व समाज मे बेहतर माहौल बन सके तो शायद ऐसे घटनाएँ न हो।come on, let’s talk ,let’s act!
(इस पोस्ट पर आये कमेंट्स ) 
बीनू भटनागर :  रश्मि मै मनोविज्ञान में ऐम ए हूं और ख़ुद अवसाद या डिप्रैशन से गुज़री हूं। डिप्रैशन के लिये दवाइयों की ज़रूरत पड़ती है पर सायकौथैरैपी भी कम महत्व नहीं रखती। मेरा लेखन सायकौथैरैपी सैशन में ही शुरू हुआ। सायकॉलजिस्ट और सायकेट्रिस्ट दोनों के काम अलग है। मैने Anxiety disorder, bipolar disorder, OCD, dysylaxia, attention deficit hyper activity तथा और कुछ सामान्य मनोरोगों के बारे में जागरूकता लाने के लिये बहुत लेख लिखे है। कोई चाहे तो लिंक दे सकती हूं पर हम लोग हमेशा इसे नकारने के आदी है किसी से चिकित्सा लेने को कहो तो वो बुरा मान जाता है। बहुत संकीर्ण सोच है। मैने तो अपनी पहली किताब की भूमिका में भी इसका जिक्र किया था।

सक्सेना : आर्ट ऑफ लिविंग के प्रणेता श्री रविशंकर ने प्राणायाम तथा ध्यान को हर मनोवैज्ञानिक समस्या का समाधान बताया है । वे सुझाते हैं कि प्रसन्नता किस प्रकार हमारे जीवन का अंग बने । हम वर्तमान में कैसे जियें । 

प्राणायाम तथा ध्यान से देह की अंतस्रावी ग्रंथियाँ को सक्रिय बनाया जा सकता है इसमें सन्देह नहीं । स्राव ठीक तरह से होते रहें तो किसी औषध की आवश्यकता ही नही पड़ेगी ।

Manage


बीनू भटनागर :  योग से फायदा होता है पर हर मनोरोग बिना दवा केठीक नहीं होता।reactive depression ठीक हो सकता है clinical depression नहीं ठीक होगा।

नीलू नीलपरी : सही लिखा है रश्मि आपकी दोस्त ने। मैं भी साइकोलॉजी में एमएससी हूँ, साइकोलोजिस्ट और खुद भी डिप्रेशन और suicide attempt कर साइकेट्रिस्ट की मदद से उस अवसाद की स्थिति से निकली हूँ। अब मेरा बेटा भी adhd और डिप्रेशन की ट्रीटमेंट ले रहा है। इनमें साइकेट्रिस्ट और साइकोलोजिस्ट के साथ साथ परिवार, सहकर्मी, मित्रों का साथ भी बहुत ज़रूरी है, नहीं तो अवसाद कब सुसाइड और अन्य mental illnesses में बदल जाये कह नहीं सकते। अपनी प्रॉब्लम करीबी व्यक्तियों से शेयर करने से, बात करने से ही इलाज की राह पर जाय जा सकता है। जो भी ट्रीटमेंट हो साइकेट्रिस्ट की देखरेख में ही दवा, काउंसलिंग, मैडिटेशन सब चलना चाहिए। otc यानी केमिस्ट से खुद से दवा लेकर, या किसी अन्य पेशेंट की दवा को खुद पर आजमाना रोग को बढ़ा सकता है, इससे बचना चाहिए। यह केमिकल imbalance ही है जो ठीक हो जाता है, जैसे विटामिन की कमी विटामिन की गोलियों और उचित खानपान से ठीक होती है। छुपाने जैसी कोई बात नहीं इसमें। रोग है ठीक होता है 100%.

👍




सुरेश चन्द्र उपाध्याय ;इसके अतिरिक्त मैंने एक पत्रिका में पढा कि होम्योपैथी का आरिटैनम अचूक दवा है, जिसे आयुर्वेद में स्वर्ण भस्म कहा है। 
इसके अलावा दोनों समय पसीने आने तक कसरत भी जरुरी है। मैंने शाइजोफ्रेनिया मरीज को कसरत और अच्छी खुराक़ से ठीक होते देखा है। 
कसरत सबसे अधिक प्रभावी उपाय है। साथ ही भारतीय शास्त्रीय संगीत का नियमित सुनना, गाना, बजाना असरकारक है। मेरे दो साथियों पर पडे प्रभाव को देख रहा हूँ। नींद आने लगी है, डिप्रैशन बिलकुल नहीं है,आत्मविश्वास बढ गया है कसरत टुकडों में हो तो भी असरकारक


गुरुवार, 28 दिसंबर 2017

काँच के शामियाने पर 'उषा भातले जी' एवं 'अश्विनी कुमार लहरी' की टिप्पणी

उषा भातले जी ने किताब भले ही देर से मंगवाई पर मिलते ही पढ़ डाली और पढ़ते ही प्रतिक्रिया भी दे दी।
आपने बड़ी सटीक और समीक्षा की है,बहुत बहुत शुक्रिया ।

"काँच के शामियाने "
लगभग दो सालों से " कांच के शामियाने " की समीक्षाएं पढ़ रही हूँ।कभी सोचा नहीं था कि लेखिका ही मेरे लिये बुक कर देंगी😊 धन्यवाद रश्मिजी ।
पुस्तक पर सुधा अरोड़ा जी की भूमिका से लेकर अब तक की सारी समीक्षाएं पूरे मनोयोग से पढ़ीं ,और एक औरत के संघर्ष की इस दुःखद कहानी से हर बार इतना जुड़ जाती थी कि पूरी बात जानने की इच्छा होती थी,आख़िर उसका पति ऐसा क्यों करता है ? शादी के इतने सालों बाद भी उसका व्यवहार ऐसा क्यों है कि नायिका को अपने बच्चों के साथ अलग रहने का निर्णय लेना पड़ा ?
मुझे लगता है ,राजीव के इस तरह के व्यक्तित्व के निर्माण की नींव बचपन में ही पड़ गई थी ,जहाँ दादी के लाड़- प्यार ने उसकी हर इच्छा पूरी करने में सहयोग दिया ,उसका अहम तब चोट खा गया जब जया ने उसका विवाह प्रस्ताव ठुकरा दिया । लेकिन अपने अहम की संतुष्टि के लिये जया से शादी और उसे प्रताड़ित करने में उसे स्वयं क्या मिला ? अंत में अकेलापन ? ऐसे मानसिक रोगियों को इलाज की आवश्यकता है ,लेकिन पहल कौन करे ?
जया के संघर्ष के बारे में तो सभी समीक्षाओं में पढ़ा था ,लेकिन माँ ,बहिन ,सास और ननद के रूप में दूसरी महिलाओं की मानसिकता को समझने की कोशिश की । बहिनें जया से सहानुभूति रखते हुये भी पूरी तरह से साथ नहीं दे पायीं ,क्योंकि उनकी अपनी विवशताएँ ( पराश्रित होना) थीं । ननद के ताने स्वाभाविक थे ,क्योंकि उसकी सुंदरता से तुलना जो की जा रही थी ? सास तो अपनी सास के जमाने से ही बेटे की ज़िद के आगे हथियार डाल चुकी थीं। माँ ,जिसने बेटी के दृढ़ प्रतिज्ञ होने के बाद उसका साथ दिया ,उनका डर भी स्वाभाविक था , क्योंकि वह जानती थी पति को छोड़कर आने वाली महिला को समाज के दूसरे पुरुष कैसी लोलुप नज़रों से देखेंगे । अपनी बेटी को खाई से बचाने के लिये उसने कुँए में ही पड़े रहने की सलाह दी ,इस उम्मीद में कि शायद हालात सुधर जाएं ?
माँ और बहिनें जया के लिये जो नहीं कर पायीं ,वो बेटी की पंक्तियों ने कर दिया ,उसमें जीने का संचार और उस नर्क से बाहर निकलने की हिम्मत ।
सतही तौर पर ही सही लेकिन एक समस्या को और छुआ है रश्मि जी ने ,विवाह में लड़के की नौकरी के अनुसार दहेज । राजीव के पिता और भाई के रूखे व्यवहार का मुख्य कारण यही था । इसके लिये लड़कियों के माता - पिता भी उतने ही जिम्मेदार हैं ,जो पद की नीलामी में बोली लगाने पँहुच जाते हैं ।
हालांकि अब हालात सुधर रहे हैं ,लड़कियाँ आत्मनिर्भर हो रही हैं ,फिर भी जया जैसी लड़कियों से केवल सहानुभूति जताने की बजाय समाज को उनका साथ देना होगा , ताकि किसी और राजीव की ऐसा करने की हिम्मत ना हो ।

फेसबुक परइनबॉक्स में बहुत ज्यादा तो नहीं पर फूल पत्ती के साथ गुड मॉर्निंग,गुड नाईट और सुवचन वाले पोस्टर मिलते ही अश्विनी कुमार लहरी के संदेश पर मेरी नज़र ही नहीं पड़ी थी। कोई आपकी पुस्तक मंगा कर पढ़े ,अपनी प्रतिक्रिया लिख कर भेजे और आप पढ़ें भी ना ये तो बहुत बड़ी गुस्ताखी है,सो सॉरी अश्विनी 
रहते हैं। इस वजह से इनबॉक्स में झांकना ही छोड़ दिया है। कल जब किसी का पता ढूंढने के लिए स्क्रॉल किया तो पाया
मैंने पहले भी कहा है जब इस उपन्यास को कोई पुरुष पढ़ता और पसन्द करता है तो मुझे अतिरिक्त खुशी होती है। उस पर युवा लोग पढ़ें तो हिंदी के प्रति उम्मीद बची रहती है। ये संवेदनशीलता बनाये रखिएगा अश्विनी, बहुत शुक्रिया आपका 
"प्रणाम मैम ...आपका बहुत बहुत धन्यवाद इस उपन्यास के लिए ,ये पुस्तक मैंने बहुत पहले मंगायी थी लेकिन किन्ही कारणों से इसको पढ़ नहीं पा रहा था लेकिन जब इसको पढ़ा तो बिना खत्म किये रुक भी न सका।
आपने काफ़ी सधे हुए शब्दों का जो ताना बाना बुना है क्या कहने और समाज का सजीव चित्रण इस उपन्यास में बख़ूबी दर्शाया जो कि समाज मे आये दिन देखने और सुनने को मिल जाते हैै । अंत तक ये उपन्यास हमें बाँधे रखता है ...ऐसे ही आशा करता हूँ कि आपके औऱ उपन्यास मुझे ऐसे ही पढ़ने के लिए मिलते रहेंगे ।"

फिल्म The Wife और महिला लेखन पर बंदिश की कोशिशें

यह संयोग है कि मैंने कल फ़िल्म " The Wife " देखी और उसके बाद ही स्त्री दर्पण पर कार्यक्रम की रेकॉर्डिंग सुनी ,जिसमें सुधा अरोड़ा, मध...